03 January, 2009


नारी की फरियाद
मैं पाना चाहती हूँ अपना इक घर
पाना चाहती हूं प्रेम का निर्झर
जहाँ समझी जाऊँ मैं इन्सान
जहाँ मेरी भी हो कोई पहचान
मगर मुझे मिलता है सिर्फ मकान
मिलती है् रिश्तों की दुकान
बाबुल के घर से पती कि चौखट तक
शंका मे पलती मेरी जान
कभी बाबुल् पर भार कहाऊँ
कभी पती की फटकार मैं खाऊँ
कोई जन्म से पहले मारे
को दहेज के लिये मारे
कभी तन्दूर में फेंकी जाऊँ
बलात्कार क दंश मैं खाऊँ
मेरी सहनशीलता का
अब और ना लो इम्तिहान
नही चाहिये दया किसी की
चाहिये अपना स्वाभिमान
बह ना जाऊँ अश्रूधारा मे
दे दो मुझ को भी मुस्कान
अब दे दो मेरा घर मुझ्को
नही चाहिये सिर्फ मकान्

7 comments:

रंजना [रंजू भाटिया] said...

चाहिये अपना स्वाभिमान
बह ना जाऊँ अश्रूधारा मे
दे दो मुझ को भी मुस्कान
अब दे दो मेरा घर मुझ्को
नही चाहिये सिर्फ मकान्

बहुत सही लिखा आपने ..सुंदर भाव

Vishal Mishra said...

bahut achcha likha hai, par ek guzarish hai ki aaj kal ki ladkiyon ko empowerment ka sahi matlab bhi sikhaya jaye. ladkiyan purushon se kandha kilakar chalne ke naam par sharab, ciggret peekar apne ko un jaise banane ki koshish kar rahi. ye sahi nahi hai.. please unhe ye samjhaiye...

padhiye.- indianvishal.blogspot.com

Amit said...

बहुत सुंदर.....अच्छा लगा पढ़ कर...

आशीष कुमार 'अंशु' said...

अद्भूत ...

.....

कमाल कर दिया आपने

Abhishek said...

सही कहा आपने मकान को घर बनने की जरुरत है. संवेदनशील कविता.
(Pls remove unnecesary word verification)

योगेन्द्र मौदगिल said...

नये साल की नयी बधाई.........
आपकी कविता बहुत पसंद आई..........

Dr. Amar Jyoti said...

नारी-वेदना की मार्मिक प्रस्तुति। आज की व्यवस्था में तो मकान भी कितनी नारियों को मिल पाता है? घर तो और भी दूर की बात है।ये word-verification क्या आवश्यक है?

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