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निर्मला कपिला

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निर्मला कपिला
अपने लिये कहने को कुछ नहीं मेरे पास । पंजाब मे एक छोटे से खूबसूरत शहर नंगल मे होश सम्भाला तब से यहीं हूँ। बी.बी.एम.बी अस्पताल से चीफ फार्मासिस्ट रिटायर हूँ । अब लेखन को समर्पित हूँ। मेरी तीन पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी है -1-सुबह से पहले [कविता संग्रह] 2 वीरबहुटी [कहानी संग्रह] 3-प्रेम सेतु [कहानी संग्रह] आज कल अपनी रूह के शहर [ इस ब्लाग ] पर अधिक रहती हूँ । आई थी एक छोटी सी मुस्कान की तलाश मे मगर मिल गया खुशियों का समंदर। कविता, कहानी, गज़ल,मेरी मन पसंद विधायें हैं। पुस्तकें पढना और ब्लाग पर लिखना मेरा शौक है।
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Gazal written by Nirmla Kapila (Na to rishte na dost he koi mera milla mujhko)

कम्प्यूटर दुनिया

Computer Duniya

गज़ल का सफर्

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गज़ल

आजकल जी. मेल मे पता नही क्या प्राबलम आ गयी है। सिर्फ 4-5 मेल ही दिखाता है । कर्सर आगे जाता ही नही न ही मेल भेजी जा रही है। एक साइबर कैफे वाले से पूछा वो कहता है कि पीछे से ही ये प्राबलम ुसके कैफे मे भी नही खुल रही जी मेल्\ मैने अपनी बेटी को दिल्ली मे अपनी मेल खोलने को कहा तो वहाँ खुल गयी। जो लोग मेल भेज रहे हैं उनसे क्षमा चाहती हूँ। अभी कहते हैं कि एक हफ्ता लगेगा इसे सही होने मे । क्या कोई बता सकता है कि और किसी के साथ भी ऐसे हो रहा है? तो चलिये इसी बहाने एक गज़ल हो जाये-=--
गज़ल

आज तक उसने मुझे अपने ख्यालों मे रखा है
हाशिये पर हूँ. बडे मुश्किल सवालों मे रखा है

मर नही सकती मुहब्बत हीर राझें की कभी भी
पाक वो जज़्बा मुहब्बत की मशालों मे रखा है

टूट जायेगा मनोबल गर निराशा यूँ रही तो
आस के कुछ जुग्नुओं को दिल के आलों मे रखा है

आ रही खुश्बू कहीं चम्पा चटक कर हो खिली ज्यों
गुलबदन ने फूल कोई टांक बालों मे रखा है

ज़िन्दगानी के अंधेरों से गिला शिकवा न कर के
हौसले से हर क़दम अपना उजालों मे रखा है

आस्था मे आदमी क्या क्या नही करता है देखो
पूजने के वास्ते पत्थर शिवालों मे रखा है

ज़िन्दगी की अड़चनों ने तोड दी हिम्मत हमारी
बांध कर तकदीर ने अपनी कुचालों मे रखा है

gazal

सब से अपने गम छुपाते ज़िन्दगी की शाम में

चुपके से आँसू बहाते ज़िन्दगी की शाम में

दोष किसका है जो बदतर जिंदगी है मौत से

वक्त का मातम मनाते ज़िन्दगी की शाम में

ख्वाब सारे टूट जायें, साथ छोड़े जिस्म भी

आँखें अपने ही चुराते ज़िन्दगी की शाम में

बेटी घर मे मौज करती फर्ज लादे है बहू

आसिया माफिक घुमाते ज़िन्दगी की शाम में

आदमी के पास कोई पल तो हो आराम का
अब भी हैं चप्पू चलाते जिंदगी की शाम में

आग उगले शह्र की आबोहवा है आजकल

साँप डर के फन उठाते ज़िन्दगी की शाम में

टाँग कर खूँटी पे सारे ख़्वाब सोया मीठी नींद

दर्द पर दिल के जलाते ज़िन्दगी की शाम में

क्या नही करते हैं बच्चों के लिये माँ बाप पर

हैं अनादर वो दिखाते ज़िन्दगी की शाम में

गज़ल

गज़ल 
हाज़िर जी कह कर फिर गैर हाज़िर हो गयी जिसके लिये क्षमा चाहती हूँ । आप सब की दया से अब ठीक हूँ।एक आध घंटा रोज़ बैठने की कोशिश करूँगी। बहुत समय से कुछ लिखा भी नही है लगता है जैसे कुछ लिख ही नही पाऊँगी। एक हल्की सी गज़ल प्रस्तुत कर रही हूँ। --- हाँ कोई अगर बता सके तो बहुत आभारी हूँगी कि मेरे ब्लाग पर पोस्ट का कलर अपने आप बदल जाता है कमेन्त्स आदि का भी रंग बदल जाता है टेम्प्लेट भी बदला लेकिन अभी भी वही हाल है क्या कोई मेरी मदद कर सकता है?
गज़ल
 आज रिश्‍ते कर गये फिर से किनारा
 और कितना इम्तिहां होगा हमारा


ज़ख्‍़म उसने ही हमें बेशक दिये पर
आह जब निकली उसे ही फिर पुकारा

हम झुके दुनिया ने जितना भी झुकाया )
जान कर लोगों से सच खुद को सुधारा

कौन पोंछेगा ये आंसू बिन तुम्‍हारे
है घड़ी दुख की तुम्‍हीं कुछ दो सहारा )


दांव पर लगता रहा जीवन सदा ही )
मौत से जीता मगर तुमसे ही हारा )

मोह ममता के परिंदे उड़ गये सब )
किस तरह मां बाप का होगा गुज़ारा )

चल पड़ा है खुद अंधेरा सुब्‍ह लाने
दुख में समझो है ये कुदरत का इशारा

हाथ से अपने सजा दूं आज तुमको
 लाके बिंदिया पर लगा दूं कोई तारा

चांदनी से जिस्‍म पर ये श्‍वेत चूनर
ज्‍यों किसी ने चांद धरती पर उतारा

हाज़िर जी

 बहुत दिन से अस्वस्थ रहने के कारण ब्लाग जगत से दूर रही। लेकिन ध्यान हर वक्त ब्लाग जगत मे ही रहा। 
आप सब की दुआ मेरे साथ थी, कितने लोगों के मेल और टेलिफोन आये सच कहूँ तो जब भी किसी का फोन आता तो आँखें नम हो जाती। सेहत की चिन्ता और चल फिर न पाने की वजह से शायद दिमाग मे कोई शब्द भी नही आता कि कुछ लिख सकूँ। बस समझ लीजिये कि आराम करते करते आलसी भी हो गयी हूँ लेकिन बैठे बैठे नाती नातिनों के स्वेटर खूब बना लिये, जिसमे कि मै खुद को बहुत माहिर समझती हूँ लेकिन कई सालों से अपनी इस कला को भुला दिया था।मै उन सब की बहुत बहुत आभारी हूँ जिनके मुझे फोन आये और जिन्हों ने मेरे बारे मे जानने के लिये पोस्ट तक लिखीं मेल किये, और मुझे नई ऊर्जा प्रदान की। विशेश रूप से सलिल वर्मा जी,इनके सात मेल मैने सहेज रखे हैं, भाई हो तो ऐसा हो, डा. दराल जिन्हों ने मुझे मेडिकल एडवाइज़ भी दी, खुशदीप सहगल और उनकी पत्नि यानि कि मेरी बहु, उसकी तो विशेष रूप से आभारी हूँ, स्मार्ट इन्डियन यानी अनुराग शर्मा जी संगीता पुरी जी, समीर लाल [उडन तश्तरी जी} सुरिन्दर मुहलिद, सेहर बेटी, सुबीर जी प्राण शर्मा जी,साधना वैद दिव्या, वाणी जी को भी जब पता चला तो मेरे लिये चिन्त व्यक्त की। कुछ नाम भूल भी गयी हूँ, शायद परेशानी मे यादाश्त भी कम हो गयी है। भेजी}उन सब से क्षमा चाहती हूँ। पूरे ब्लागजगत  की आभारी हूँ जिनके प्रेम और प्रेरणा ने मुझे फिर से सक्रिय होने के लिये उत्साहित किया। अभी भी बहुत देर तक बैठने के लिये मनाही है। अगर रोज़ सब के ब्लाग पर न भी आ सकी तो माफी चाहूँगी और आशा करती हूँ फिर से पहले की तरह आप सब के बीच होऊँगी।धन्यवाद।
दीपावली की आप सब को हार्दिक शुभकामनायें।

गज़ल


गज़ल

 कुछ पा लिया कुछ खो लिया
 फिर बेतहाशा रो लिया
आंखों से जब आंसू गिरे
तो ज़ख्म दिल का धो लिया

फिर भी हुयी मुश्किल अगर
आँचल मे माँ की सो लिया

दुश्वारियों का बोझ भी
 जैसे हुया बस ढो लिया

जिसने बुलाया प्यार से
 मै तो उसी का हो लिया

बेकार कर दी ज़िन्दगी
बस खा लिया और सो लिया


करते मुहब्बत सब  मुझे
जो प्यार बाँटा वो लिया

गज़ल


गज़ल
ये गज़ल --http://subeerin.blogspot.com/{ गज़ल गुरुकुल} के मुशायरे मे शामिल की गयी थी\ गुरूकुल की छात्रा न होते हुये भी मुझे सुबीर जी जो सम्मान देते हैं और मुझे इन मुशायरों मे शामिल करते हैं उसके लिये उनकी हृदय से आभारी हूँ।उनके ब्लाग गज़ल का सफर से ही गज़लों की तकनीकी जानकारी मिली है। पहले तो बस तुकबन्दी कर लेती थी। जो साहित्य की निश्काम सेवा वो कर रहे हैं उसके लिये गज़ल के इतिहास मे ही नही बल्कि कहानी उपन्यास और कविता के इतिहास मे भी उनका नाम अग्रनी होगा।एक बार फिर से तहे दिल से उनका शुक्रिया करती हूँ। हाँ इस गज़ल के आखिरी 4  शेर अपनी  मर्जी से पोस्ट करने की हिमाकत कर रही हूँ। क्षमा चाहती हूँ।

डर सा इक  दिल मे उठाती गर्मिओं की ये दुपहरी  ====
घोर सन्नाटे मे डूबी गर्मियों की ये दुपहरी


चिलचिलाती धूप सी रिश्तों मैं भी कुछ तल्खियाँ हैं  =====
आ के  तन्हाई बढाती गर्मिओं की ये दुपहरी


हाँ वही मजदूर जो डामर बिछाता है सडक पर   ======
मुश्किलें उसकी बढाती गर्मिओं की ये दुपहरी


है बहुत मुश्किल बनाना दाल रोटी गर्मिओं मे=======
 औरतों पर ज़ुल्म ढाती गर्मिओं की ये दुपहरी


आग का तांडव  कहीँ  और हैं कहीं उठते बवंडर,   ======
यूँ लगे सब से हो रूठी गर्मिओं की ये दुपहरी


तैरना तालाब मे कैसे घडे पर पार जाना  =====
याद बचपन की दिलाती गर्मियों की ये दुपहरी


रात तन्हा थी मगर कुछ ख्वाब तेरे आ गये थे
पर भला कैसे कटेगी गर्मियों की ये दुपहरी  +=====


बर्फ मे शहतूत रख,तरबूज खरबूजे खुमानी
मौसमी सौगात लाती गर्मियों की ये दुपहरी


चमचमाते रंग  लिये चमका तपाशूँ  आस्माँ पर
 धूप की माला पिरोती गर्मिओं की ये दुपहरी


दिल पे लिखती नाम  तेरा ज़िन्दगी की धूप जब 
ज़ख्म दिल के है तपाती गर्मिओं की ये दुपहरी


जब से  छत पर काग बोले आयेगा परदेश से वो
तब शज़र सी छाँव देती गर्मिओं की ये दुपहरी


याचना करती सी आँखें प्यार के लम्हें बुलाती
बिघ्न आ कर डाल जाती गर्मिओं की ये दुपहरी






गज़ल

गज़ल

जुलाई 2010 मे इस गज़ल पर  कदम दर कदम------  http://kadamdarkadam.blogspot.com/ { तिलक भाई साहिब }के ब्लाग पर विमर्श हुआ था। जिस से ये गज़ल निकल कर सामने आयी थी। ये तिलक भाई साहिब को ही समर्पित हैीआजकल लिखने पढने का सिलसिला तो खत्म सा ही है । देखती हूँ कब तक/ जीने के लिये कुछ तो करना ही पडेगा फिर कलम के सिवा अच्छा दोस्त कौन हो सकता है?चलिये दुआ कीजिये कि कलम रुके नही।

दर्द आँखों से बहाने निकले
गम उसे अपने सुनाने निकले।

रंज़ में हम से हुआ है ये भी
आशियां अपना जलाने निकले।

गर्दिशें सब भूल भी जाऊँ पर
रोज रोने के बहाने निकले।

आग पहले खुद लगायी जिसने
जो जलाया फिर , बुझाने निकले।

आज दुनिया पर भरोसा कैसा?
उनसे जो  शर्तें  लगाने निकले।

प्‍यार क्‍या है नहीं जाना लेकिन
सारी दुनिया को बताने निकले।

खुद तो  रिश्‍ता ना निभाया कोई
याद औरों को दिलाने निकले!

झूम कर निकले घटा के टुकडे
ज्‍यूँ धरा कोई सजाने निकले।

सब के अपने दर्द दुख कितने हैं?
आप दुख  किसको सुनाने निकले।

गज़ल
आज फिर से ब्लाग पर आते हुये खुशी सी महसूस हो रही है\ मै तो उमीद छोड बैठी थी कि अब शायद ऊँगली काटनी ही पडेगी । लेकिन एक दिन श्रीमति संगीता पुरी जी , [गत्यात्मक ज्योतिश वाले ]से अपनी तकलीफ कही तो उन्होंने आश्वासन दिया कि ऐसा गम्भीर कुछ नही है आप जल्दी ठीक हो जायेंगी । उनके आश्वासन से मै फिर से डाक्तर के पास जाने से रुक गयी और एक देसी इलाज शुरू किया, डरी इस लिये भी थी कि पहले एक   अंगूठे मे इसी प्राब्लम के चलते उसका टेंडर कटवाना पडा था।उस देसी दवा से ही ठीक हुयी हूँ लेकिन कुछ दिन स्प्लिन्ट जरूर बान्धना पडा। बेशक ज्योतिश आपकी समस्या हल नही कर देता लेकिन कई बार ऐसे आश्वासन से आशा सी बन जाती है और आशा ही जीवन है। इतने दिनो पढा सब को लेकिन कुछ कह नही पाई लिख नही पाई। अब भी अधिक देर लिखने से अँगुली दुखने लगती है लेकिन ये भी ठीक हो जायेगी कुछ दिन मे । तो चलिये आज एक गज़ल पढिये----



1 गज़ल
न वो इकरार करता है न तो इन्कार करता है
मुझे कैसे यकीं आये, वो मुझसे प्‍यार करता है)

फ़लक पे झूम जाती हैं घटाएं भी मुहब्‍बत से
मुहब्‍बत का वो मुझसे जब कभी इज़हार करता है

मिठास उसकी ज़ुबां में अब तलक देखी नहीं मैंने
वो जब मिलता है तो शब्‍दों की बस बौछार करता है

खलायें रोज  देती हैं  सदा बीते  हुये  कल को
यही माज़ी तो बस दिल पर हमेशा वार करता है

उड़ाये ख्‍़वाब सारे बाप के बेटे ने एबों में
नहीं जो बाप कर पाया वो बरखुरदार करता है

नहीं क्‍यों सीखता कुछ तजरुबों से अपने ये इन्‍सां
जो पहले कर चुका वो गल्तियां हर बार करता है

उसी परमात्‍मा ने तो रचा ये खेल सारा है
वही धरती की हर इक शै: का खुद सिंगार करता है

अभी तक जान पाया कौन है उसकी रज़ा का सच
नहीं इन्‍सान करता कुछ भी, सब करतार करता है

कहां है खो गई संवेदना, क्‍यों बढ़ गया लालच
मिलावट के बिना कोई नही व्यापार करता है

बडे बूढ़े अकेले हो गये हैं किस क़दर निर्मल
नहीं परवाह कुछ भी उनका ही परिवार करता है )

टिप्पणी व्यथा{ क्या व्यर्थ जा रहे हैं तारीफ मे लिखे कमेंन्ट}

इस से पहली पोस्ट मे मैने  ज़ाकिर अली रजनीश जी का टिप्पणियों के बारे मे आलेख  पोस्ट किया था और सब  के कमेन्ट पढ कर iइस नतीजे पर पहुँची कि एक तो सब ने एक स्वर मे कहा कि टिप्पणियाँ तो होनी चाहिये ।इससे लेखन क्षमता बढती है और उत्साह मिलता है। कुछ ने कहा कि अलोचना भी होनी चाहिये--- गलत को गलत और सही को सही। बात सही है लेकिन क्या हम समीक्षक हैं ---क्या क्या हम मे खुद मे इतनी प्रतिभा है कि हम उसकी गलतियाँ निकाल सकें? ये काम समीक्षकों का या आलोचकों का है। दूसरा अगर बहुत लोगों के ब्लाग पर जाना है तो संक्षिप्त टिप्पणी ही का जा सकती है। अब अपना पक्ष रखना चाहती हूँ
 मैने जब अपनी पहली पोस्ट लिखी थी तो उसमे कई गलतियाँ थी। आज जब वो पोस्ट पढ्ती हूँ तो खुद पर शर्म सी महसूस होती है जब्कि सभी ने प्रशंसात्मक टिप्पणियाँ ही दी थी। सब से पहली टिप्पणी श्री गिरिजेश राव जी ने की थी और मेरा उत्साह वर्द्धन किया था। उसके बाद नीरज जी प्रकाश सिंह अर्श डा. अनुराग अदि कई  टिप्पणियाँ आयी तो मेरी खुशी का ठिकाना नही रहा। फिर धीरे धीरे सब के ब्लाग पर जाना शुरू किया तोसब की टिप्पणियाँ प्रशंसा भरी ही होती{ लगभग}  ऐसा नही है कि मै किसी की पोस्ट बिना पढे टिप्पणी देती हूँ। अगर मुझे कुछ लगे तो बजाये ब्लाग पर टिप्पणी देने के उसे मेल कर देती हूँ ताकि वो निरुत्साहित न हो। दिव्या जी ने सही कहा कई लोग केवल अपनी भडास निकालने के लिये या खुद को सर्वश्रेष्ट दिखाने के लिये बिना बजह बहस करने लगते हैं  इसका कटु अनुभव हो चुका है। लेकिन कुछ ऐसे उदार लोग भी हैं जो मेल दुआरा अपनी बात या विरोध करते हैं।
 ब्लाग पढना भी मै जरूरी समझती हूँ क्यों कि इसी ब्लाग जग्त से मैने बहुत कुछ सीखा है। जब पढ ही लिया तो कमेन्ट देने मे क्या हर्ज़ है?ये भी जरूरी नही कि सब लोग टिप्पणियाँ जरूर करें।क्यों कि सब के पास इतना समय भी नही होता। लेकिन कुछ लोग खुद को वरिष्ट या श्रेष्ठ समझ कर ही टिप्पणी नही करते जब कि  इनका मार्ग दर्शन नये लेखकों के लिये बहुत जरूरी व उत्साहवर्द्धक होता है। एक बात ये भी है कि कुछ लोग अच्छे साहित्यकार हैं अच्छे ब्लागर हैं जो श्रम पूर्वक साहित्य साधना मे लगे हुये हैं उनके पास समय नही होता ब्लाग पढने का} लेकिन वो अपने मार्ग दर्शन से बहुत से नये साहित्यकारों को जन्म दे रहे हैं ऐसे लोगों के आगे नतमस्तक हूँ।  इसके लिये एक उदाहरण दूँगी-------
 सुबीर संवाद सेवा एक ऐसा ब्लाग है जिसके स्वामी श्री पंकज सुबीर जी हैं ।वो अपना व्यवसाय , घर चलाने के अतिरिक्त एक गुरूकुल चलाते हैं जिसमे गज़लें सिखाई जाती हैं मुशायरे करवाये जाते हैं फिर फिर उन्हें अपने शिष्यों  की गज़लों को दुरुस्त करना होता है। मैं हैरान हूँ कि वो अपना काम कब करते होंगे इसके अतिरिक साहित्य लेखन , काव्य मंचों मे उपस्थिती और पता नही कितने काम होते हैं। इनका समझ आता है कि वो टिप्पणी नही कर सकते ।ये सच्ची साहित्य साधना और साहित्य धर्म का का निर्वाह करते हुये सब का मार्ग दर्शन कर रहे हैं।  कुछ मेरे जैसे केवल टाइम पास होते हैं जो सिर्फ अपनी सुविधा के लिये ही लिखते है। अगर मैं सब ब्लाग्ज़ पर न जाती होती तो कैसे सब से परिचय होता?
लेकिन हम जैसे लोगों को टिप्पणी जरूर करनी चाहिये मेरा तो यही मानना है। सब से परिचय होने से उनसे बहुत कुछ सीखने को मिलता है। जब मै ब्लागजगत मे आयी थी तो मुझे कविता, गज़ल या नज़्म मे फर्क पता नही था।  लेकिन सुबीर जी से गज़ल सीखी नवीन जी से परिचय हुया तो दोहे सीखे, श्री रामेश्वर कम्बोज हिमाँशू जी से परिचय हुया तो हाईकु और आजकल ताँका गीत  सीख रही हूँ। । इतनी लम्बी चौडी बात का अर्थ   यही निकला कि टिप्पणी जरूर करनी चाहिये । जो गलती निकालने की सामर्थ्य रखते हैं जरूर संतुलित शब्दों मे निकालें, \ कम से कम मै आलोचक या समीक्षक नही हूँ। हाँ अगर लगे तो मेल जरूर करती हूँ। समयाभाव के कारण संक्षिप्त टिप्पणी ही हो पाती है। समीर लाल जी की तरह । वो सब को कमेन्ट देते हैं उत्साह वर्द्धन करते हैं तो अच्छा लगता है। वैसे भी बुढापे मे , बेटिओं के चले जाने से व्यस्त रहने का ये जरिया है समय बिताने के लिये। । कमेन्ट करती हूँ धर्म राजनिती बहस  से दूर रहती हूँ हाँ कई बार रोचक बहस हो तो हिस्सा भी बन जाती हूँ। मुझे मेल दुआरा प्रप्त पोस्ट पर टिप्पणी करने से गुरेज होता है जिन को सबस्क्राईब किया है उन्ही मेल वाली पोस्ट पर जाती हूँ या एक दो बार किसी की मेल मिले तो देख लेती हूँ लेकिन हर बार वो मेल करके ही कमेन्ट लें ये अच्छा नही लगता। मेल करने का ये तरीका कमेन्ट के लिये मुझे इसलिये अच्छा नही लगता कि कितना समय तो मेल बाक्स क्लीयर करने मे लग जाता है। ब्लाग का काम ब्लाग पर ही होना चाहिये। बेशक टिप्पणी लेन देन ही हो लेकिन ये दुनिया के किस रिश्ते या व्यवसाय मे नही होता? हम किसी के घर 4 बार जाते हैं लेकिन वो एक बार भी न आये तो कब तक आप जाते रहेंगी?टिप्पणी की परंपरा जीवित रहेगी तभी हम सब को समझ और पढ पायेंगे ।
डा, नलिन चक्रधर महोपाध्याय[ लखनऊ, उन्होंने मुझे कहानियाँ लिखने के लिये उत्साहित किया था। पत्रिका मे मेरा पता देख कर मुझे पत्र लिखा जब कि मै उन्हें जानती नही थी। जब मैने उन्हें धन्यवाद दिया [पत्र मे] तो उनका जवाब आया कि मै अपनी साहित्य धर्मिता का निर्वाह कर रहा हूँ। । उनकी वो बात आज भी मेरे जहन मे है\ इस लिये
टिप्पणी कीजिये लेकिन उत्साहवर्द्ध, अगर गलती निकालनी है तो बेहतर है मेल करें, नही तो विनम्र शब्दों मे गलत को गलत कहें और सही को सही।मेरा मानना है कि तारीफ मे लिखे कमेन्ट कभी व्यर्थ नही जाते बल्कि उत्साहित करते हैं और उत्साह ही आगे बढने के लिये प्रेरित करता है।जब आप खुद टिप्पणी का मोह रखते हैं तो फिर खुद टिप्पणी करने से परहेज क्यों? दूसरे भी आपसे यहीआअपेक्षा करें तो गलत क्या है?
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क्या व्यर्थ जा रहे हैं तारीफ में लिखे कमेण्ट ?

आप सब कया सोचते हैं इसके बारे मे। अपने विचार जरूर दें ये आलेख श्री ज़ाकिर अली रजनीश जी के ब्लाग से लिया है। कमेन्ट्स को ले कर ब्लाग जगत मे दुविधा और खींच तान बनी रहती है। कुछ दिन से बार बार इसके बारे मे विचार उठते है। ब्लागजग्त मे सभी साहित्यकार नही हैं लेकिन इन्हीं मे से कभी अच्छे साहित्यकार बनेंगे, इसके बारे मे श्री रवि रतलामी जी का आलेख अगर मिलेगा तो जरूर लगाऊँगी। 

12 March 2011


चाहे किसी ब्‍लॉग पर आने वाली टिप्‍पणियों की संख्‍या चाहे 01 हो अथवा 111, उनमें से 99 प्रतिशत टिप्‍पणियों में सिर्फ और सिर्फ तारीफ लिखी जाती है। टिप्‍पणीकर्ताओं के इस रवैये को लेकर जहां अब तक बहुत कुछ लिखा जा चुका है, वहीं बहु‍त से लोग इसीलिए ब्‍लॉगिंग को पसंद भी नहीं करते हैं। ऐसे में सवाल यह उठता है कि क्‍या ये टिप्‍पणियां व्‍यर्थ ही जा रही हैं ?

जो लोग मानव व्‍यवहार में रूचि रखते हैं, उन्‍हें पता है कि अपने समान्‍य जीवन में व्‍यक्ति कितने भी अच्‍छे काम क्‍यों न कर ले, लोग उसकी प्रशंसा करने में शर्म सी महसूस करते हैं। यही कारण है कि समाज में सकारात्‍मक प्रवृत्तियों का लगातार क्षरण हो रहा है और नकारात्‍मक प्रवृत्तियां परवान चढ़ रही हैं। यदि इसे मेरी सोच की अतिरेकता न माना जाए तो मैं ऐसे पचासों लोगों के उदाहरण दे सकता हूँ, जिनमें लेखन के पर्याप्‍त गुण थे, किन्‍तु तारीफ की दो बूंदे न मिल पाने के कारण उनका सृजन रूपी अंकुर असमय ही काल कलवित हो गया।

पता नहीं हमारे समाज का यह कौन का प्रभव है कि हम दूसरों की छोड़ें अपने सगे-सम्‍बंधियों की भी तारीफ करना गुनाह समझते हैं। अगर हम अपने घर के भीतर ही झांकें, तो अक्‍सर ऐसा होता है कि घर पर रहने वाली ज्‍यादातर स्त्रियों में कोई न कोई ऐसा टैलेण्‍ट अवश्‍य पाया जाता है, जिसके बल पर वे समाज में अच्‍छा खासा नाम कमा सकती हैं। ज्‍यादातर पुरूषों को अपनी पत्नियों के उस गुण के बारे में पता भी होता है, पर बावजूद इसके वे उसकी तरफ से ऑंख मूंदे रहते हैं। अगर किसी भी महिला में कोई विशेष गुण न भी हो, तो इतना तो तय है कि वह कोई न कोई खाना तो अवश्‍य ही अच्‍छा बनाती होगी। लेकिन याद कीजिए आपने आखिरी बार अपनी पत्‍नी के बने खाने की तारीफ कब की थी? माफ कीजिए, शायद आपको वह तिथि, वह महीना अथवा वह साल याद नहीं आ रहा होगा।

पत्‍नी ही नहीं, हमारे बच्‍चे, माता-पिता और भाई बहन अक्‍सर ऐसे काम करते हैं, जो प्रशंसा के योग्‍य होते हैं, लेकिन इसके बावजूद हमारे मुँह से तारीफ से दो शब्‍द नहीं निकलते। हॉं, उनसे ज़रा सी गल्‍ती होने पर उन्‍हें लानत-मलामत भेजना हम अपना पहला अधिकार जरूर समझते हैं। जिसका नतीजा यह होता है कि हमारे सम्‍बंधों की मधुरता धीरे-धीरे समाप्‍त होती चली जाती है। यही कारण है कि हमारे सामाजिक सम्‍बंध बेहद जर्जर हो जाते हैं और जरा सा झटका लगने पर वे टूटने के कगार पर पहुंच जाते हैं।

ऐसे में यदि ब्‍लॉग की वर्चुअल दुनिया में ही सही हम दूसरों की (भले ही झूठी सही) तारीफ करने की आदत अपने भीतर डाल रहे हैं, तो यह समाज के लिए एक शुभ संकेत है। इससे न सिर्फ ब्‍लॉगर्स को प्रोत्‍साहन मिल रहा है, वरन हमारे भीतर भी (अनजाने में ही सही्) परोक्ष रूप में सकारात्‍मक सोच का नजरिया पैदा हो रहा है। इसलिए यदि कोई आपकी टिप्‍पणियों में की गयी तारीफ को लेकर आलोचना कर रहा है, तो उससे विचलित न हों और बिना किसी संकोच के अपना काम करते रहें।

आप मानें या न मानें पर प्रशंसा (भले ही झूठी क्‍यों न हो) शरीर में सकारात्‍मक ऊर्जा को बढ़ाती है, प्रशंसा लक्ष्‍य को प्राप्‍त करने में मदद करती है। प्रशंसा हमें दूसरों के बारे में सोचना सिखाती है, प्रशंसा हमारे शुभेच्‍छुओं की संख्‍या बढ़ाती है, प्रशंसा हमारे जीवन में रस लाती है, प्रशंसा हमारी सफलता को नई ऊंचाईयों की ओर ले जाती है। प्रशंसा अगर समय से की जाए, तो अपने परिणाम अवश्‍य लाती है। प्रशंसा अगर सलीके से की जाए तो चमत्‍कार सा असर दिखाती है। और सबसे बड़ी बात यह है कि भले ही हमें यह पता हो कि सामने वाला व्‍यक्ति हमारी झूठी तारीफ कर रहा है, प्रशंसा फिर भी हमें (कुछ क्षण के लिए ही सही) प्रसन्‍न कर जाती है।

कुछ खट्टा कुछ मीठा ---
।।।।।।
दिल्ली जाना तो पहले केवल ब्लाग समारोह के लिये ही हुया था लेकिन 4-5 दिनों मे कुछ घटनाये ऐसी हुयी किदुख और खुशी दोनो तरह के अनुभव रहे।29 को मेरे दामद के भाई की बरसी थी 30 को नातिन के मुन्डन लेकिन 29 रात को दामाद के फूफा जी की मौत हो गयी जिससे मुन्डन स्थगित करने पडे। मूड खराब सा हो गया। इस लिये हम लोग पहली तारीख को वापिस आ गये। फिर भी ब्लागोत्सव समारोह सब दुखों पर भारी रहा। सब से मिलना एक सुखद अनुभूति हुई खास कर जिन लोगों से मिलने की कभी कल्पना भी नही की थी। उनमे बहुत से नाम हैं जैसे दिनेशराइ दुवेदी जी ,अवधिया जी, पावला जी ,अर्विन्द मिश्र जी, रश्मि जी ,संगीता जी शास्त्री जी , साहित्य शिल्पी[[ उम्र के लिहज से माफ करें नाम भूल गयी}और भी कई नाम हैं कुछ की मुझे जानकारी थी ,संगीता पुरी जी, डाक्टर दराल और सिरफिरा जी{ रमेश जी]} वन्दनाजी रेखा श्रीवास्तव। , खुशदीप , शहनवाज अजय जी ललित जी संजय, भास्कर केवल राम नीरज जाट। ,खुशी हुयी और कुछ से मिल कर हैरानी भी। हैरानी ब्लागप्रहरी के कनिष्क कश्यप को देख कर, लगा ये तो अभी छोटा सा बच्चा है, इतनी छोटी सी उम्र , प्रतीक महेशवरी। मै इन्हें उम्र मे कुछ बदा समझती थी। कनिष्क जी कई बार ब्लाग पर समस्या का हल भी बता देते हैं। और एक दो नाम भूल गयी क्षमा चाहती हूँ।खैर आपसब की शुभकामनाओं से जो पुरुस्कार मिला उसके लिये आपसब का धन्यवाद करना चाहूँगी। आज रिपोर्ट्स पढती हूँ।
 वापिस आते समय गाडी मे जो कटु अनुभव हुया वो आपसे साझा करना चाहती हूँ। रोज़ कितने जोर शोर से हम लोग भ्र्ष्टाव्चार आदि के बारे मे बडे बडे आलेख लिखते पढते हैं। मुझे कभी नही लगा कि हमारे समाज से ये कोढ कभी खत्म हो सकेगा। लेकिन  आशा ाउर विश्वास से अगर कुछ किया जायेगा तो शायद कुछ होगा। शायद अन्ना हजारे दुआरा जगायी गयी एक लौ हो। मुझे लगता है अब हम सब को मिल कर ही कुछ करना होगा। जब तक हम स्वंय नहीं उठेंगे तब तक कुछ नही हो सकता उसके लिये जहाँ भी हमे व्यवस्था मे कुछ खामी दिखे उसके खिलाफ अपनी आवाज़ बुलन्द करनी पडेगी। हुया यूँ कि हमने हिमाचल एक्सप्रेस मे टू टायर मे सीटें बुक करवाई थी जब डिब्बे मे चढे तो गन्दगी और बदबू देख कर मन खराब होने लगा औए सीट के सामने पर्दे भी नही थी उसी डिब्बे मे एक आर्मी के कर्नल साहिब भी अपने परिवार समेत यात्रा कर रहे थे । आपस मे सब लोग इस बारे मे बात करने लगे। मैने कहा कि ऐसा करते हैं कि इनकी कम्पलेन्ट बुक पर कम्पलेन्ट लिखते हैं कर्नल साहिन ने टी टी कोआवाज़ दी और उसे सारी समस्या बताई। लेकिन टी टी ने असमर्थता जताई कि इस समय कुछ नही हो सकता। सभी लोग डिब्बे मे इकट्ठे हो गये। कर्नल साहिब ने कहा कि तब तक गाडी नही चलेगी जब तक हमारी समस्या हल नही होती देखते देखते्रेलवे के बाकी कर्मचारी भी आ गये लोगों ने उन्को खूब खरी खोटी सुनाई आनन फानन मे उनलोगों परदे लगा दिये । फिर कर्नल साहिब ने बता कि हर सीट प धुले हुये हैंड टावल होते हैं आपके टावल कहाँ हैं। हमे हैरानी हुयी की हम लोग सैंकडों बार इसी कम्पार्टमेन्ट मे यात्रा कर चुके हैं लेकिन हमने कभी भी टावल नही देखे। फिर क्या था टावल भी आ गये बाथरूम भी साफ हो गये अय्र मच्छर के लिये दवा भी छिडक दी टायलेट मे साबुन भी रखवा दिया गया। । इसका अर्थ ये हुया कि सरकार ने सब कुछ मुहैया करवाया हुया है लेकिन कर्मचारी ही काम नही करना चाहते।सब कुछ होता है, सरकार देती है ,लेकिन् सब आपस मे मिल बाँट कर खा जाते हैं। आप सोचिये सालों से कितने टावल खरीदे गये होंगे वो सब कहाँ गये? या केवल मिली भगत से बिल ही बने होंगे। सब के मिल कर बोलने से फर्क तो पडता ही है। लेकिन लोग व्यवस्था के आगे हार मान कर चुप रह जाते हैं जिस से इनके मन मे किसी का डर नही  रहता। दो डिब्बों मे लगभग 10 करमचारी थे लेकिन जब काम ही नही करना तो सब कुछ कैसे सही चलेगा। टी टी कुछ बोल नही सकता उसने अपने नोट बनाने होते हैं। सब कुछ होने के बाद भी हमने कम्पलेन्ट बुक मे शिकायत दर्ज की उससे पहले भी अधी से अधिक कम्पलेन्ट बुक शिकायतों से भर चुकी थीऔर लोगों ने इतने तीखे कमेन्टस किये थे । शायद ये कम्पलेन्ट बुक भी बोगस हो ऊपर तक जाती ही न हो और दूसरी कोई मेन्टेन कर रखी हो जिसमे कुछ हल्का फुल्का खुद ही लिख लेते हों। काम न करने और सरकारी वस्तूयें जो यात्रियों की सुव्धा के लिये होती हैं उनकी चोरी के चलते लोगों को कितनी असुविधा होती है। जिसे नौकरी मिल जाती है वो इन सब बातों से बेफिक्र हो जाता है।शायद ये भ्रष्टाचार हमारी रग रग मे समा चुका है और जो नही करते वो बेबस चुप हैं अब ये चुपी तोडनी होगी तभी कुछ हो सकता है। जहाँ भी व्यवस्था मे कुछ गलत लगे अपनी आवाज़ जरूर बुलन्द करें, कुछ तो असर होगा।


 दोहे

सब धर्मों से ही  बडा देश प्रेम को मान
सोने की चिडिया बने भारत देश महान ।

शाम तुझे पुकार रही सखियाँ करें विलाप
पूछ रही रो रो सभी कहाँ शाम जी आप ।

दीप जलाये देखती रोज़ पिया की राह
साजन जब आये नही  मन से निकले आह

\लिये चलो मन वावरे प्रभु मिलन  की आस
छोड न उसका दर  कभी  बुझ जायेगी प्यास

तिनका तिनका जोड कर नीड बनाया आज
अब इसमे हर रोज़ ही बजें खुशी के साज

लूट लिया इस वक्त ने मेरे दिल का चैन
बिछुडे मीत मिले नही नीर बहें दिन  रैन

इस जोगन को छोड कर  कहाँ गये घनश्याम 
 तुझ दर्शन की प्यास मे  ढूँढे चारों धाम

सुगन्ध देखो फूल की  सब को रही सुहाय
सीरत हो इन्सान की  फूल सा हो  सुभाय

लघु कथा
लगभग 24 -25 दिन ब्लाग से दूर रहना--- पहले पहले तो कितना तकलीफ देह लगता था मगर फिर इसकी जगह बच्चों [नाती नातिनों की किलकारिओं ने ले ली और मै  ब्लाग से दूर जाने का दुख भूल गयी। कल। अब जब वापिस आ गयी हूँ तो ब्लाग मेरे सामने है मगर अब कानों मे बच्चों की किलकारियाँ गूँज रही हैं़ मन नही कर रहा कि नेट पर बैठूँ। जैसे कोई बच्चा छुट्टिओं के बाद स्कूल जाने से कतराता है कुछ वैसा ही मेरा भी हाल है। लगता है दिमाग बिलकुल साफ हो गया है कोई शब्द नही सूझ रहा कि क्या लिखूँ कहाँ से शुरू करूँ। कोशिश करती हूँ। जब तक कुछ नही लिख पाती आप सब को पढती हूँ। लेकिन एक बात तय है कि ब्लागजगत से मोह टूट गया है। कितना भी प्यार बाँटो मगर आप गये तो कोई नही पूछेगा कि आप कहाँ हो जिन्दा भी हो या नही। ये आभासी रिश्ते ऐसे ही होते हैं। चलो इसी बहाने ब्लाग मोह तो टूटा। मार मार करने से आराम से जितना होता है करते रहेंगे। --- चलिये आज एक लघु कथा पढिये------

लघु कथा

विकल्प


रामू मालिक को सिग्रेट के धूँयें के छल्ले बनाते हुये देखता तो अपनी गरीबी और बेबसी का गुबार सा उसके मन मे उठने लगता। क्यों मालिक अपने पैसे को इस तरह धूयें मे उडाये जा रहे हैं? माना कि दो नम्बर का बहुत पैसा है मगर फिर भी----- उसके घर मे आज चुल्हा नही जला है--- उसके मन मे ख्याल आता है। अगर साहिब चाहें तो इसी धूँएं से उसके घर का चुल्हा जल सकता है। फिर सिगरेट शराब से घुड घुड करती छाती के लिये दवाओं का खर्च  क्या मेरे बुझे चुल्हे का विकल्प नही हो सकता??----

जिस बख्शिश मे मिले अवैध धन की मैं सारा दिन चौकसी करता हूँ क्या किसी के काम नही आ सकता ---- मालिक कभी ये क्यों नही सोचते।

--- ये सब बातें उसके दिमाग मे तब आती जब वो भूखा होता या घर मे चुल्हा नही जलता----  नही तो मालिक से माँग कर वो भी सिग्रेट और शराब पी ही लेता था। आज ये सोचें उसे परेह्सान कर रही थी। जैसे ही मालिक ने उसे आवाज़ दी वो चौंका और मालिक के पास जा खडा हुया

* जा दो बोतल व्हिस्की और दो सिग्रेट की डिब्बी ले आ* मालिक ने उसे पैसे थमाते हुये कहा। और वो थके से कदमो से जा कर सामान ले आया।

वो जब घर जाने लगा तो मालिक ने कहा* लो 50 रुपये बख्शिश के*

बख्शिश मिलते ही उसके मरे हुये से पाँवों फुर्ती आ गयी।और वो भूल गया घर का बुझा चुल्हा,भूख से बिलखते बच्चे,पत्नि की चिथडों से झाँकती इज्जत, भूख से पिचका बूढी मा का पेट  और चल पडा मालिक की तरह बख्शिश मे मिले पैसों को धूँयें मे उडाते हुये वैसे भी ऐसे ख्याल उसे तभी आते जब जेब खाली होती थी । शायद ऐसी कमाई बच्चों की भूख का विकल्प नही हो सकती।


महमान -- हास्य कविता

होली पर एक हास्य कविता

महमान
होली पर जब कभी
महमान घर आते
 पत्नी खुश होती
 पति मुँह फुलाते
पत्नी को उनका रुख
 कभी न भाया
 एक दिन उसने
 पति को समझाया
 एजी! अगर आप यूँ
 मुँह फुलायोगे तो
 मेरी होली कैसे मन पायेगी?
 मेरी सहेलियों मे
मेरी इज्जत क्या रह जायेगी?
होली पर महमान
 होते हैं भगवान
उन्हें देख मुँह नही फुलाते हैं
 बल्कि हंस कर गले लगाते हैं
ये सुन पति मुस्कुराये
" रानी तेरा हुक्म बजाउँगा"
जब आयेगी तेरी सहेली
उसको गले लगाऊँगा
पर जब आयेगी मेरी माँ
 तुझ से भी यही करवाऊँगा
 होली की आप सब को हार्दिक शुभकामनायें।

 दोहे

कौन बिछाये बाजरा कौन चुगाये चोग
 देख परिन्दा उड गया खुदगर्जी से लोग

लुप्त हुयी कुछ जातियाँ छोड गयीं कुछ देश \
ठौर ठिकाना ना रहा पेड रहे ना शेष

कौन करेगा चाकरी कौन उठाये भार
खाने को देती नही कुलियों को सरकार

धन दौलत हो जेब मे ,हो जाते सब काम
कलयुग के इस दौर मे  चुप बैठे हैं राम

जहाँ जिधर भी देख लो रहती भागम भाग
 देख लगे जैसे सभी चले बुझाने आग

दोहे--- dohe

 दोहे

सूरत से सीरत भली सब से मीठा बोल
कहमे से पहले मगर शब्दों मे रस घोल

रिश्ते नातों को छोड कर चलता बना विदेश
डालर देख ललक बढी फिर भूला अपना देश

खुशी गमी तकदीर की भोगे खुद किरदार
बुरे वक्त मे हों नही साथी रिश्तेदार

हैं संयोग वियोग सब  किस्मत के ही हाथ
 जितना उसने लिख दिया उतना मिलता साथ

कोयल विरहन गा रही दर्द भरे से गीत
खुशी मनाऊँ आज क्या दूर गये मन मीत

बिन आत्म सम्मान के जीना गया फिज़ूल
उस जीवन को क्या कहें जिसमे नहीं उसूल

गज़ल --gazal

यूँ तो आज बेटे का जन्मदिन होता है 29 फरवरी। लेकिन 3 साल तो 1 मार्च को ही मनाते थे,बस लीप के साल मे ही 29 फरवरी को मनाया जाता था। शायद उस ने पहले ही आदत डाल दी थी जन्मदिन न मनाने की। \अभी पहले गये हुये भूले नही थे कि ये भी हमे छोड कर चला गया।ये गज़ल उन 7 अपनो के नाम है जो भरी जवानी मे हमे छोड कर चले गये । एक का कोई जन्मदिन या अन्तिम विदाई का दिन आता है तो सब की याद ताज़ा हो जाती है। उन्हें याद करते हुये ये गज़ल लिखी है।

गज़ल
उसकी अर्थी को उठा कर रो दिये थे
रस्म दुनिया की निभा कर रो दिये थे

नाज़ से पाला जिसे माँ बाप ने था
 आग पर उसको लिटा कर रो दियेथे

थी उम्र शहनाइयाँ बजती मगर अब
मौत का मातम मना कर रो दिये थे

दी सलामी आखिरी नम आँखों से जब
दिल के ट्कडे को विदा कर रो दियेथे

यूँ सभी अरमान दिल मे रह गये थे
राख सपनो की उठा कर रो दिये थे

थी बडी चाहत कभी घर आयेगा वो
लाश जब आयी सजा कर रो दिये थे

था चिरागे दिल मगर मजबूर थे सब
अस्थियाँ गंगा बहा कर रो दिये थे

वो सहारा ले गया जब छीन हम से
सिर दिवारों से सटा कर रो दिये थे

रोक लें आँसू मगर रुकते नही अब
दर्द का दरिया बहा कर रो दिये थे

माँ ग ली उसने रिहाई क्यों  खुदा से
कुछ गिले शिकवे सुना कर रो दिये थे

दोहे-- dohe

श्री नवीन चतुर्वेदी जी के ब्लाग -- http://samasyapoorti.blogspot.com/ दोहा के बारे मे पढा तो सोचा यहाँ भी हाथ आजमा लिया जाये। पहली बार दोहे लिखे हैं। सही गलत आप लोग देख लें।

दोहे
1
जीवन मे माँ से बडा
 और नही वरदान
माँ चरणों की धूल ले
खुश होंगे भगवान।
2
भारत की गरिमा बचा
 कर के सोच विचार
भगत सिंह,आज़ाद का
 सपना कर साकार
3
 वेद पुराण भुला दिये
 भूले सच्चे  ग्रंथ
भाँति भाँति के संत हैं
 भाँति भाँति के पंथ
4
मीरा बोली साँवरे
कर जोगन से प्रीत
इन चरणों मे शरण दे
निभा प्रेम की रीत
5
गुस्सा अपना पी लिया
शिकवा था बेकार
बढ ना जाये फिर कहीं
आपस मे तकरार
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गज़ल --gazal

गज़ल
आदरनीय र्श्री पंकज सुबीर जी के ब्लाग --------  http://subeerin.blogspot.com/   पर मुशायरा हुया. बह्र, और काफिया मुश्किल था मगर सुबीर जी के प्रोत्साहन से कोशिश की़। मेरी गज़ल को उस मुशायरे मे जगह दे कर मुझे जो ऊर्जा प्रदान की उसके लिये सुबीर जी का धन्यवाद। मिसरा था----
नये साल मे नये गुल खिलें नई खुश्बुयें नया रंग हो--
गज़ल

नये साल मे सजें महफिलें चलो झूम लें कि उमंग हो
तेरे नाम का पिएं जाम इक खूब जश्न हो नया रंग हो

घटा छा रही उमंगें जवां खिले चेहरे हसीं शोख से
नये साल मे नये गुल खिलें नई हो महक नया रंग हो

तू मुझे कभी नही भूलना किये ख्वाब सब तेरे नाम अब
मेरा प्यार तू मेरे साजना रहूँ खुश तभी कि तू संग हो

कोई रह गया किसी मोड पर नही साथ था नसीबा मेरा
गली से मुझे यूँ विदा किया रहा खत कोई जो बैरंग हो


लिखूँ तो गज़ल मिटे दर्द सा भूल जाउँ मै सभी गम अभी
याद जब  तलक करूँगी उसे रहूँगी सदा यूँ हि तंग हो

मेरे ख्वाब तो मुझे दें खुशीरहे जोश मे जरा मन मेरा
ए खुदा करो इनायत जरा मेरी ये खुशी नही भंग हो

गुजारे हुये कई साथ पल याद जब करूँ रुलायें मुझे
कौन बावफा कौन बेवफा छिडी मन मे जो कोइ जंग हो

कभी वक्त की नज़ाकत रही कभी वक्त की हिमाकत रही
नही लड सके कभी वक्त से  लडे आदमी जो दबंग हो

नहीं गोलियाँ कभी हल रही किसी बात का किसी भी तरह
सभी ओर हो चैन और अमन करो बात जो सही ढंग हो

मिटे वैर और विरोध सा रहें प्यार से सभी देश मे
जियें चैन से ये दुआ करो जमीं पर कभी नही जंग हो

कौन नगर है कौन सी गली जहाँ हो नही कभी शोर सा
जरा होश खो किसी सडक पर युवा जब चलें हुडदंग हो

बन्दे आईना देखा कर---  भाग एक[hindi translation]
writer-- gurpreet greewal-- pati adiye bajare di muthh|
गाडी मे पंजाबी गीत गूँज रहा था"नित नित नी बजारीं औणा बिल्लो खा लै नाशपातियां' [ अर्थात कि हमने रोज़ रोज़ बाजार नही आना ,बिल्लो नाशपातियाँ खा ले} । मै अपने कुछ दोस्तों के साथ जालन्धर जा रहा था ,एक साहित्यिक समागम मे शामिल होना था।गाडी मे साथ सफर कर रहे रंगकर्मी स़. फुलवन्त मनोचा जी ने बहुत विनम्रता से पूछा -- सोढी साहिब का कार्ड आया? '
'अपनी नही बनती किसी सोढी साढी से" 
फुलवन्त जी चुप कर गये। रात नौ बजे हम जालन्धर से वापिस आये। मैने आते ही दरवाजे पर लगा ताला खोला तो जापान के  शहर ओसाका से आये एक खूबसूरत पत्र और नव वर्ष के कार्ड ने मेरा स्वागत किया। ये कार्ड एवं पत्र प्रवासी पंजाबी शायर परमिन्द्र सोढी ने भेजा था। मुझे बहुत शर्म आयी और पंजाबी की मशहूर कहावत याद आयी  इक'चुप सौ सुख"। आदमी बिना सोचे समझी कई बार  कितना कुछ बोल देता है। खैर कडाके की ठँड मै अरामदेह रजाई मे सोने का प्रयास करने लगा। मगर फिर एक बजे उठा ,कमरे की बत्ती जलाई । सोढी को रंग-विरंगे स्केच पेन से एक पत्र लिखा। मैने उसे हूबहू   पूरी बात लिख दी।
  लगभग चार महीने बाद सोढी भारत आया। एक शाम उसका फोन आया । सोढी ने बहुत विनम्रता के साथ पूछा--'कुछ वक्त दे सकोगे?' मै आलू न्यूट्रिला को छौंक लगा रहा था। मैं कडाही मे कडछी छोड कर 'लवर्ज़ पवाईँट' जा पहुँचा। नंगल डैम की सतलुज झील के किनारे  स्थित लवर्ज़ प्वाईँट बहुत खूबसूरत स्थान है। यहाँ बहुत सुन्दरता और शाँति है। रात दस बजे महफिल जमी।सोढी एवं प्रोफेसर मिन्द्र बागी ने आदमी की ज़िन्दगी और बन्दगी के बारे मे गज़ब की बातें सुनाई। जाते जाते शायर सोढी कह गया--'जापान मे आपका स्वागत है, जब कहोगे वीज़ा भेज दूँगा"। महफिल समाप्त हुयी। मैं पैदल चलते हुये घर पहुँचा, सोच रहा था कि आदमी भी क्या चीज़ है! कभी अच्छा सोचता ही नही। जरूरी नही जिनके साथ आपकी जानपहचान या बनती हो वही अच्छा हो।
   अप्रेल महीने मे बोतल, ब्रश,और दरख्तों के लाल लाल फूल देखने वाले होते हैं। घागस के मछली बीज फार्म{ जिला बिलासपुर हिमाचल प्रदेश} मे पहुँचते ही लाल लाल फूलों को देखते ही हमारे चेहरे खिल गये। घागस एक छोटा सा कसबा है जो मनाली जाते हुये बरमाणा के बाद आता है। जा तो मनाली ही रहे थे मगर लंदन से आये घुमक्कड सैलानी स. गुर्दीप सिंह सन्धू ने घागस  मे ही घमासान मचा दिया। हुक्म हुया कि एक रात यहीं रहेंगे।  मछली बीज फार्म ध्योली मे एक छोटा सा गेस्ट हाऊस भी है। हमने कमरा ले लिया। कमरे मे जाते ही उसने फिर शोर मचा दिया कहा कि ये नही वो कमरा चाहिये। घाट घाट का पानी पीने वाले सन्धू साहिब ने बहुत समझाया कि बाबा एक दिन काट लो क्यों शोर मचा रहे हो?मगर आदमी का अहं और ज़िद्द कहाँ  रहने  देती है " मै तो हद दरजे का ज़िदी  --- मै पैसे वाला--- ,बस नही माना।
मैं प्रबन्धक के कमरे मे गया। पत्रकारी की  फिरकी घुमाने के अतिरिक्त प्रबन्धक को मैने उन गेंदों की जानकारी दी जो मैने समय समय पर सरहिन्द की दीवार पर मारी थीं। बात इतनी की प्रबन्धकों ने वहाँ पहले से रह रहे एक सज्जन को कमरा खाली करने का हुक्म सुना दिया। उस शरीफ आदमी ने 10--15 मिन्ट मे कमरा बदल लिया। उस भद्र पुरुष ने लुँगी पहन रखी थी और कागज़- पत्रों का काफी  झमेला डाल रखा था।। खैर हमने मनपसंद कमरा ले लिया। रात घागस के एक मशहूर ढाबे से मक्की की रोटी और देसी घी वाली माँह की दाल खाई। देसी घी की दाल वाला ये ढाबा 24 घन्टे खुला रहता है। खाना खाने के बाद सैर करते हुये मेरी मुलाकात उस भद्र पुरुष से हो गयी।
मुलाकात क्या हुयी मेरे लिये तो डूब  मरने जैसी नौबत आ गयी। लुँगी वाला भद्र पुरुष भारत सरकार  का वैग्यानिक  डा. ए लक्षमी नारायण था। सैंट्रल मैराईन फिशरी रिसर्च इन्स्टीच्यूट कोचीन [केरल} मे बतौर प्रिंसीपल रहे डा. लक्षनी नारायण हिमाचल प्रदेश के 36 दिन के दौरे पर थे। उन्होंने केन्द्र सरकार को ये रिपोर्ट देनी थी कि हिमाचल मे मछली का और उत्पादन कैसे बढ सकता है। इस वैग्यानिक ने मुझे केरल आने का भी आमन्त्रण दिया। देसी घी और माँह की दाल खाओ तो चढ  जाती है-- घूक-- घूक -घूक,  मगर मुझे रात भर नींद नही आयी। सन्धू साहिब तो गलास पी कर कब के सो गये थे। मैं पूरी रात सोचता रहा कि मन क्यों बेचारे वैग्यानिक को तंग करना था, हम तो उस कमरे मे भी ठीक थे। पराँठे  फाडते हुये आधी उम्र बीत गयी मगर अहं और ज़िद्द की दुकान पर ही अटके रहे। कभी पूछा ही नही अक्ल की दुकान का पता।

भाग दो पा ती अडिये बाजरे दी मुट्ठ का हिन्दी अनुवाद
-- भाग दो
आपकी फुरसत का अर्थ हमारी फुरसत  नहीं
पटियाला से एक प्रेमी सज्जन का फोन आया। उसने एक ही साँस मे अपनी बात कह डाली--- "परसों आ रहे हैं हम --- डैम शैंम देखेंगे--  दो दिन रहेंगे भी---- कतला मछली देख लेना आगर आचार डल जाये तो।"
सज्जन ने एक बार भी नही पूछा कि आपके पास फुरसत है या नही। मेरे भी एक बार मुँह से नही फूटा कि भाई रुक ---अभी बहुत व्यस्ततायें हैं। खैर्! प्रेमी सज्जन की मेज़बानी करनी पडी। मैं अक्सर पढे लिखे लोगों के व्यवहार के बारे मे  सोच कर बहुत हैरान होता हूँ। अच्छे भले इन्सान मन मे ये भ्रम पाल लेते हैं कि जब उनकी फुरसत  होती है तो सभी लोग  फुरसत मे होते हैं। एक सज्जन रात 9-10 बजे बिना बताये ही आ गये। मस्ती मे सोफे पर पसर कर  बोले--" खाना खा कर सैर करने निकले थे सोचा महांपुरुषों के दर्शन ही करते चलें।" अगर आपके घर आया कोई आदमी आपको महांपुरुष कहे तो आप क्या करेंगे? न तो गुस्सा कर सकते हैं और न ही  उसे जाने के लिये कह सकते हैं। आप गेस्टहाऊस मे बैठे जैसे बन जाते हो। आपका खाने का समय है और आप चाय पानी तैयार करने मे लग जाते हैं। आये गये के साथ  चाय तो पीनी ही पडती है। 9-10  बजे चाय और फिर खाना मेजबान तो माथे पर हाथ मार कर ही बिस्तर मे  घुसता है। कितना अच्छा हो अगर आने वाला  आने से पहले एक फोन ही कर ले।
जब से भारत सरकार निगम लिमि. ने 311 रुपये का फोन  दिया है मेरे लिये तो मुसीबत ही बन गयी है। ये सकीम तो अच्छी है कि 311 रुपये दो और महीने भर जितनी मर्जी बातें करो।इस सहुलियत का दुरुपयोग कोई अच्छी बात नही। कई लोग तो बात ही यहाँ से शुरू करते हैं--" निट्ठले बैठे थे सोचा आपको फोन ही कर ले।" मोबाईल तो बहुत बडी सिरदर्दी है। जब से मैने मोबाअल फोन लिया है मुझे ये लगने लागा है कि मैं पत्रकार नहीं बल्कि फायर ब्रिगेड का मुलाजिम हूँ। सज्जन ठाह सोटा मारते हैं---"फटा फट चंद मिन्ट लगाओ --- आ जाओ--- आ जाओ--- आ जाओ--"\कोई कोई मोबाईल फोन करते समय पूछता है---"बहुत बिज़ी तो नहीं--- किसी-- संसकार मे तो नही खडे? ---- बाथरूम मे तो नही हो---- ड्राईविन्ग तो नही कर रहे?"
एक अखबार मे काम करते बहुत ही सूझवान उप सम्पादक मेरे जानकार है।एक बजे दफ्तर मे आते ही वो अपना मोबाईल बन्द कर्के दराज मे रख देते हैं। मैने इसका कारण पूछा तो बोले---" बताओ अब दफ्तर का काम करें या मोबाईल सुने।"
उपसम्पादक मोबाईल पर लम्बी पीँघ डालने वालों से बहुत ही तंग थे।उन्हों ने बतायअ कि अच्छे अच्छे डाक्टर,लेखक, प्रोफेसर ,बुद्धीजीवी सरकारी फोन ही घुमाते रहते है।ये बुद्धेजीवी इतना भी नही समझते कि हमारा काम का समय है--- काम की कोई बात हो तो सुन भी लें --- बस ऐसे ही पूछते रहेंगे--- और फिर---- और फिर ---।
प्रवासी भारती दोस्त भी कई बार लोटे मे सिर ही फसा देते हैं
 सीधा ही कहेंगे---" आज  हो गयी 27, 29 को आ रहे हैं हम ---- सीधे दिल्ली एयरपोर्ट पहुँच जाना।" भाई रब के बन्दे दस बीस दिन पहले बता दो। इस बन्दे का भी कोई प्रोग्राम होता है। अब किस किस से माथा पच्ची करें। कोई नही सुनता यहांम।कई बार सोचा बर्फ सोडा मंगवाया करूँ और दो पैग लगाया करूँ और सोने से पहले गाया करूँ------ किस किस को रोईये,---- आराम बडी चाज़ है---- मुंह ढांप के सोईये। मैने ये आज तक सोचा तो है मगर किया नहीं। पर ये भी झगडे की जड है
व्यवस्था और निट्ठले पन  सभ्याचार को बदलने के लिये होश मे रह कर ही प्रयत्न करने की जरूरत है।