18 March, 2016

गज़ल

         

   गज़ल
गुजारे गांव मे जो दिन पुराने याद आते हैं
सुहानी ज़िन्दगी दिलकश जमाने याद आते हैं

 वो बचपन याद आता है वो खेलें याद आती हैं
लुका छुप्पी के वो सारे ठिकाने याद आते हैं

कभी गुडियां पटोले भी बनाने याद आते हैं
 विआह उनके कभी खुश हो रचाने याद आते हैं

कभी तितली के पीछे भागना उसको पकड लेना
किसी के बाग से जामुन चुराने याद आते हैं

कभी सखियां कभी चर्खे कभी वो तीज के झूले
घडे पनघट से पानी के उठाने याद आते है

कभी फ़ुल्कारियां बूटे कढ़ाई कर बनाते थे
अटेरन से अटेरे आज लच्छे याद आते है

बडे आँगन मे सरसों काटती दादी बुआ चाची
वो मिट्टी के बने चुल्हे पुराने याद आते हैं

2 comments:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (19-03-2016) को "दुखी तू भी दुखी मैं भी" (चर्चा अंक - 2286) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

सु-मन (Suman Kapoor) said...

बहुत सुंदर

पोस्ट ई मेल से प्रप्त करें}

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