16 March, 2010

सुखदा ----कहानी---भाग --3

सुखदा    कहानी-- भाग ------ 3
पिछले भाग मे आपने पढा कि कैसे सुखदा
के पिता के बीमार होने पर उसे एक ओझा के पास ले गये उस ओझा ने सुखदा को घर के लिये मनहूस बताया और एक आश्रम का पता दिया कि इसे वहाँ छोड दें। मगर उसकी माँ नही मानी और उसे नानी के घर भेज दिया। जहाँ स्कूल की एक टीचर शारदा देवी और उसके पति उमेश ने उसे गोद ले लिया। अब आगे पढें----

दिन साल बीते सुखदा ने कभी पीछे मुड कर नही देखा और एक दिन वो डाक्टर बन गयी। वो बहुत खुश थी मगर कभी कभी जब उसे अपनी माँ का चेहरा याद आता तो बहुत उदास हो जाती। उस चेहरे को उसने हर दिन याद किया है। कई बार उसका मन तडप उठता-- पता नही कैसे होंगे वो सब छोटा भाई कैसा होगा वो भी तो बहुत रिया था उसके आने पर। मगर वो लोग उसे ऐसे भूले कि किसी ने कभी जरूरत नही समझी उसकी सुध लेने की। पता नही कहाँ होंगे? आज वो अपने बाप को बताना चाहती थी कि वो अभागिन नही है।
उमेश और शारदा ने उसके डाक्टर बनने की खुशी मे घर मे एक पार्टी रखी थी। वो दोनो बहुत खुश थे मगर कई बार सुखदा को उदास होते देख कर वो उसकी हालत समझते थे। अब तक तो उसे यही कहते रहे थे कि बस पढाई की ओर ध्यान दो पिछली बातें भूल जाओ। अपने पिता को दिखा दो कि तुम अभागिन नही हो। और वो उसका ध्यान इधर उधर लगा देते।  वो उसकी उदासी से कभी अनजान नही रहे। उन्हें एहसास था कि सुखदा की उदासी अस्वाभाविक नही है।
आज दोपहर का खाना खा कर सुखदा अपने कमरे मे जा कर लेट गयी। वो कोशिश करती थी कि कभी अपने इन माँ बाप को अपने मन की उदासी का पता न चलने दे मगर शारदा देवी की आँखों से ये छुप नही पता। कुछ देर बाद शारदा ने कमरे मे जा कर झाँका तो सुखदा किसी सोच मे डूबी थी। वो उसके सिरहाने जा कर बैठ गयी
* क्या बात है आज मेरी बेटी कुछ उदास लग रही है।*
कुछ नही माँ क्या कोई काम था?* मै तो ऐसे ही लेटी थी। भला मैं उदास क्यों होने लगी। पार्टी के बारे मे ही सोच रही थी।*
*हाँ मै समझ सकती हूँ । बेटा मैने चाहे कभी तुम से पुरानी बातों का जिक्र नही किया बस मन मे एक ही बात थी कि तुम किसी मुकाम पर पहुंच जाओ। कहीं वो बातें तुम्हें अपनी मंजिल से दूर न कर दें। मगर आज मन मे एक बात है।* कह कर शारदा देवी सुखदा की तरफ देखने लगी।
*हाँ हाँ कहो माँ?*
बेटी मै चाहती हूँ कि एक निमन्त्रण पत्र तुम अपने माँ बाप को भी दो। बेशक मैने कभी तुम से उनका जिक्र नही किया मगर जानती थी कि तुम्हें उनकी याद अकसर आती है। मै नही चाहती थी कि तुम उनके विषय मे सोच कर पढाई से दूर न हो जाओ। आज तुम ने अपने आप को साबित कर दिया है।ाब मुझे कोई डर नही क्योंकि मुझे पता है तुम हमारी बेटी हो और हमे तुम पर पूरा विश्वास है। इसलिये हम तुम्हे उदास भी नही देख सकते। मैं चाहती हूँ कि तुम अपने माँबाप से अब मिल लो।।*
*नही माँ मै इस लिये उदास नही कि मै उनके पास जाना चाहती हूँ । अब तो केवल आप ही मेरे माँ बाप हैं और मुझे आपकी बेटी होने पर गर्व है। आपने मेरे जीवन को एक अर्थ दिया है। आपके सिवा कोई नही मेरा। फिर भी कई बार  माँ का चेहरा और छोटे भाई का रुदन याद आता है तो दिल तडप सा उठता है दोनो की बेबसी याद आती है बस।* सुखदा ने शारदा देवी के गले मे बाहें डालते हुये कहा।
*अच्छा चलो,उठो कुछ कार्ड खुद जा कर देने हैं कल तेरे शहर चलेंगे। कहते हुये शारदा देवी उठ गयी।
अगले दिन अपने घर जाते हुये--- वो सोच रही थी अपना कौन सा घर अपना घर तो उसका वो है जहाँ अब रह रही है।-- वो ति किसी के घर बस कार्ड देने जा रही है। एक अभिलाशा लिये , अपनी सगी माँ से मिलने
की चाह लिये बस कार्ड देना तो एक बहाना था।
सुभ 10 बजे जैसे ही गाडी सुखदा के घर के आगे रुकी मोहल्ले के बच्चे गाडी के आस पास इकट्ठे हो गये। गरीब बस्तियों मे भला कभी कुछ बदलता है? इन लोगों के लिये आज भी गाडी एक दुर्लभ वस्तु है। वो भी तो इतनी उत्सुकता से मोहल्ले मे आने वाली गाडी को देखा करती थी। जैसे ही ये लोग गाडी से बाहर निकले सब इनकी ओर देखने लगे। सामने कुछ लडके जमीन पर बैठे ताश खेल रहे थे औरतें नल से पानी भर रही थी-- बच्चे नंग धडंग खेल रहे थे। मोहल्ले मे कुछ घर नये बन गये थे।उन्हों ने किसी से सुखदा के बाप का नाम ले कर घर पूछा सुखदा को कुछ कुछ याद था । एक लडके ने इशारे से एक घर की ओर उँगली की।
 दरवाजा टूट गया था।सुखदा ने जैसे ही दरवाजे पर हाथ रखा दरवाज चरमराहट से खुल गया। इतनी गंदगी? उसका घर तो जहाँ तक उसे याद है साफ सुथरा हुया करता था। कुछ और आगे बढी तो कंपकंपाती क्षीण सी आवाज़ आयी।
*कौन? अन्दर आ जाओ।*
बरसों बाद माँ की आवाज़ सुनी थी।   दिल धडका और आँख भर आयी। शारदा देवी ने हल्के से उसका कन्धा दबाया और आगे बढने का इशारा किया। वो लोग अन्दर आ गये। कमरे के एक तरफ मैले कुचैले बिस्तर पर उसकी माँ लेटी थी दूसरी तरफ दो टूटी फूटी कुर्सियाँ एक स्टूल पडा था। सुखदा तेजी से माँ की तरफ लपकी
*मईया?* बडी मुश्किल से सुखदा के मुँह से आवाज़ निकली बचपन मे वो ऐसे ही अपनी माँ को बुलाया करती थी। सब की जैसे साँसें रुक गयी थी आँखें सब की नम ---- सुन कर माँ एक झटके से उठ कर बैठ गयी। ऐसे तो सुखदा ही पुकारा करती थी ।इतने बर्षौ बाद किसी ने मईया कहा था। उसे लगा जैसे किसी ने उसके दिल की तपती रेत पर ठंडे पानी की बौछार कर दी हो।
*सुखदा?*
एक झटके से खडी हो गयी उसे छुआ और फफक कर रो पडी। शाय्द गले लगाने से हिचक रही थी उनलोगों के साफ सुथरे कपडे देख कर।
*माँ!* सुखदा झट से उसके गले लग गयी। सब की आँखें सावन भादों सी बह रही थीं।
बेशक माँ के कपडों से बू आ रही थी----- क्रमश"

37 comments:

डॉ. मनोज मिश्र said...

कहानी में रोचकता बनी है,आगे का इन्तजार.....

Amitraghat said...

"मज़ा आ रहा है देखते हैं आगे क्या होता है..........."
amitraghat.blogspot.com

Khushdeep Sehgal said...

मेरी आंखों में भी अब आंसू हैं...

जय हिंद...

विनोद कुमार पांडेय said...

प्यार,अंधविश्वास,भावनाएँ सब कुछ समेटे कहानी अपनी शिखर पर चल रही है..सुखदा ने तो सभी को दिखा दिया की वो किसी के लिए अभागी नही थी पर उसके अनुपस्थित में उसके घर,उसके पिता के क्या भाग्य उदय हुए अब यह भी जानने की जिज्ञासा हो गई....माँ के रूप में बेटी के मन को समझने वाली शारदा जी का बेहतरीन चरित्र चित्रण...आगे के अंक का इंतज़ार है...माता जी प्रणाम

Udan Tashtari said...

भावपूर्ण प्रवाह बना है संपूर्ण रोचकता के साथ...आगे इन्तजार है.

आपको नव संवत्सर की मांगलिक शुभकामनाएँ.

Randhir Singh Suman said...

nice

संजय भास्‍कर said...

बहुत ही सुन्‍दर प्रस्‍तुति ।

संजय भास्‍कर said...

क्या बात है आज मेरी बेटी कुछ उदास लग रही है।*
कुछ नही माँ क्या कोई काम था?* मै तो ऐसे ही लेटी थी। भला मैं उदास क्यों होने लगी। पार्टी के बारे मे ही सोच रही थी।

mummy aanso la diye ankho me

Ashutosh said...

bahut acchi rachna hai ,
हिन्दीकुंज

अन्तर सोहिल said...

कहानी बहुत अच्छी चल रही है जी

प्रणाम

अनिल कान्त said...

पिछली किश्तें भी पढ़ीं . कहानी अच्छी जा रही है और आगे का इंतज़ार है

Riya Sharma said...

Nirmala ji

manviy samvedanaoo par aapkii kalam bakhubi chalti hai.

silk jaisee soft!

सुरेन्द्र "मुल्हिद" said...

bahut hee badhiya...

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

बहुत संवेदनशील कहानी...अंधविश्वास को धता बताती हुई.....आगे इंतज़ार है

रचना दीक्षित said...

एक अच्छी गति से चल रही है कहानी और हम भी उसके ही साथ आगे बढ़ रहे हैं उत्सुकता लिए हुए

rashmi ravija said...

बहुत ही रोचकता के साथ प्रवाह लिए कहानी आगे बढ़ रही है......अच्छी गति है कहानी में ....व्यग्रता के साथ,अगली कड़ी का इंतज़ार

shikha varshney said...

बहुत संवेदनशील कहानी... आगे का इंतज़ार है..

ताऊ रामपुरिया said...

बहुत संवेदनशील और रोचकता से परिपुर्ण, आगे का इंतजार है.

रामराम.

राज भाटिय़ा said...

दिल के किसी कोने मै फ़िर भी अपने बसे रहते है, ओर जिन से मिलने को दिल बेचेन रहता है,कहानी बहुत अच्छी चल रही है, ओर कहानी पढते पढते मै भी कही खो सा गया

मनोज कुमार said...

रोचक। आगे का इंतज़ार!

Dev said...

आज मैंने कहानी के तीनों भाग पढ़ा .....बहुत रोचक .....लगी ये कहानी .......आगे भी रोचकता बरकरार है ......आगे की कड़ी का इन्तेजार है

रंजना said...

आज कहानी का तीनो भाग एकसाथ ही पढ़ा.....मन भर आया है...
बड़े ही मार्मिकता से आपने कथा का ताना बाना बुना है...
अगले भाग की प्रतीक्षा रहेगी...

Urmi said...

कहानी बहुत ही रोचक और मज़ेदार लगा! बेहतरीन प्रस्तुती!

vandana gupta said...

aankhein nam ho gayi ........bas agli kadi ka intzaar hai .

हरकीरत ' हीर' said...

"मईया .....ऐसे तो सुखदा ही पुकारा करती थी "......AAh.....निर्मला जी किसकी कहानी है ये इतनी दर्दनाक .....??

ज़िन्दगी भी क्या क्या रंग दिखाती है ......!!

ज्योति सिंह said...

kahani bahut achchhi lagi ,stri ko apni pahchaan banaane ke liye bahut kuchh kho dena padta hai ,agar sabhi ke marzi baandh kar chale to vazzod .yah ladaai silsila ban chalti rahi ,umda .

Sadhana Vaid said...

इतनी हृदयग्राही कहानी है कि अभी तक उसके सम्मोहन से मुक्त नहीं हो पाई हूँ ! अंत जानने की जिज्ञासा बढ़ती जा रही है ! अधीरता से प्रतीक्षा है !

वाणी गीत said...

सुखदा और उसके के अवास्तविक माता पिता ने साबित दिया कि सुखदा मनहूस नहीं थी ...मनहूस वे लोग होते हैं जो अंधविश्वास अपनाते हैं ...
सुखदा की कहानी दिल को छु रही है ..अगली कड़ी का इन्तजार ....

नवसंवत्सर की हार्दिक शुभकामनायें .....!!

Pushpendra Singh "Pushp" said...

sundar kahani ke liye
bahut bahut abhar

रानीविशाल said...

Vastta ke karan dusara bhag bhi aaj hi pada ...kahani me maza araha hai rochakata bani hui hai ...Dhanywaad!

जोगी said...

waah...agla bhaag le ke aaiye ji jaldi se :) ..

स्वप्न मञ्जूषा said...

Bahut hi sundar prastuti..
Badhai aapko..

kshama said...

Behad achha kathan chal raha hai..agli kadika intezaar hai!

Apanatva said...

agalee kadee ka besabree se intzar..........

kshama said...

न ज़रिया दिया.Wah ! Teeno rachnayen bahut khoob! Kaise soojh jata hai aapko yah shabdon ka khel? Kamal hai!
Ramnavmiki anek shubhkamnayen!

कविता रावत said...

Pravpurn Kahani...
agli kadi ka intjaar hai....
Aapko bahut shubhkamnayne.

निर्मला कपिला said...

सभी का धन्यवाद । जल्दी ही सब के ब्लाग पर आती हूँ।

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