14 March, 2010

सुखदा --- कहानी -भाग -2

 पिछले भाग मे आपने पढा कि सुखद के पिता को इलाज के लिये एक ओझा के पास ले जाया गया। कहा जाता था कि वि ओझा बिना चीर फाड किये कैंसर के मरीज का आप्रेशन करता था। वहाँ उस ओझा ने कहा कि सुखदा उनके घर का काल बन कर आयी है इस लिये इसे घर से दूर किसी आश्रम मे भेज दें। ये सुन कर सब डर गये। और बाबा के आश्रम से आप्रेशन के बाद घर आ गये। अब आगे पढिये--------
सुखदा-- भाग -2
सुखदा डर के मारे माँ को छोड नही रही थी।उसके पिता उसे गैर की तरह गुस्से मे देख रहे थे।माँ तो जैसे काठ की मूर्ती बन गयी थी। उसे विश्वास नही हो रहा था कि उसकी इतनी प्यारी बेटी अभागी हो सकती है।
घर पहुँचते ही दादी और पिता ने उसे आश्रम भेजने की जिद पकड ली दादी को सुखदा से अधिक अपने बेटे की जान की चिन्ता थी।उसके भाई उसे भेजने के हक मे नही थे मगर वो अभी छोटे थे उनकी कौन सुनता? बाप को तो सिर्फ अपनी चिन्ता थी।खुदगर्ज़ी इन्सान को कितना नीचे गिरा देती है कि वो अपना जीवन बचाने के लिये मासूम बच्ची के जीवन से खेलने मे भी संकोच नही करता।बाप की खुदगर्ज़ी और अन्धविश्वास की भेंत चढने जा रही थी सुखदा।
माँ जानती थी कि उसका भी बस नही चलेगा।कहीं ये लोग सच मे उसे बाबा के बताये आश्रम मे छोड आये तो सुखदा का क्या होगा---- फिर वो कभी अपनी बच्ची को देख भी पायेगी या नही! इससे अच्छा होगा यदि मै इसे इसकी नानी के घर भेज दूँ।कम से कम उसे कभी देख तो सकती हूँ। बडी मुश्किल से वो अपने पति और सास को मना पाई। सुखदा भी सब कुछ समझ रही थी उसे याद आ रहा था कि जब कभी वो रोते हुये पापा की गोद मे समा जाती तो वो एक दम परेशान हो उठते। उनसे उसका रोना देखा नही जाता था। आज जैसे ही वो पापा के पास गयी उन्होंने उसे डाँट कर भगा दिया। दादी तो उसे खा जाने वाली नजरों से देख रही थी। बडा भाई अपने काम काज मे व्यस्त था। छोटा रात भर सुखदा और माँ के पास सुखदा का हाथ पकडे रहा । और माँउसे सीने से चिपकाये आँसू बहाती रही।उसके कलेजे का टुकडा जिसे देख कर वो अपना सारा गम भूल जाती थी अब् उससे दूर जा रहा था। कैसे रहेगी अकेली नानी के पास? माँ के बिना तो उसे नीँद भी नही आती थी। सुखदा की नींद तो जाने कहाँ उड गयी थी।उस मासूम को तो ये भी पता नही था कि अभागिन क्या होती है। क्यों उसे घर से दूर भेजा जा रहा है।
अगले दिन माँ उसे नानी के घर छोड आयी। कितना रोयी तडपी थी घर से चलते वक्त। बाप ने तो उसकी ओर नजर भर कर देखा भी नही।बस माँ और छोटा भाई रो रहे थे। जाने कितने दिन माँ रोती रही होगी। उसे छोड कर जाते हुये बार बार माँ का आँसोयों से भरा चेहरा उसे याद आता जिसे वो पूरी उम्र नही भूल पाई थी। नानी के पास दो दिन उसने एक दाना भी नही खाया था। नानी गाँव मे अकेली रहती थी। मामू अपनी पत्नि और बच्चों के साथ शहर मे रहते थे।बूढी नानी सुखदा को बहलाने की भरसक कोशिश करती थी पर सुखदा तो जैसे पत्थर बन गयी थी। गुम सुम सी सारा दिन रोती रहती थी।
कुछ दिन बाद गाँव के एक सकूल मे उसका दाखिला करवा दिया गया। मगर स्कूल मे भी उसका मन नही लगता था। वो चुप चुप सी सहमी हुयी कलास के एक कोने मे बैठी रहती थी।उसकी भोली सी सूरत देख कर उसकी क्लास टीचर शारदा देवी को उसकी ये उदासी समझ नही आती थी। बहुत बार उसने उसे समझाने की कोशिश भी की मगर वो चुप रही। पता नही क्यों शार्दा देवी को उस लडकी से कुछ लगाव सा हो गया। उसकी अपनी कोई संतान न थी। उसे समझ नही आता था कि इतनी छोटी सी उम्र मे उसे कौन सा दुख सालता रहता है। वो निराश सी क्यों रहती है।
एक दिन आधी छुट्टी मे उसने सुखदा को अपने पास बुलाया।--
*सुखदा, क्या बात है बेटा तुम इतनी उदास और डरी सी क्यों रहती हो?*
वो चुपचाप अपने नाखूनों से अपनी किताब खरोंचती रही।जैसे डर रही हो कि उसे अभागी जान कर कहीं स्कूल से भी ना निकाल दें।
*अच्छा ये बताओ कि तुम अपने माँ बाप के पास क्यों नही रहती नानी के पास क्यों रहती हो?* सहानुभूति के दो शब्दों से सुखदा के सब्र का बान्ध टूट गया। उसके दिल के फफोलों से एक टीस उठी।
*मैं अभागी हूँ मेरे कारण मेरे घर पर विपत्ति आ गयी। पिता मेरे कारण बिमार हो गये। इस लिये मुझे घर से निकाल दिया गया।*
 सुनते ही शारदा देवी का दिमाग   सुन्न हो गया। इस इकीसवीं सदी मे ऐसा अन्ध विश्वास? इतनी छोटी सी बच्ची के साथ ऐसा अन्याय? जिसकी सूरत देख कर मन को सकून मिलता हो वो भोली सी बच्ची अभागी कैसे हो सकती है?कुछ पल मे अपने आप को संयत कर उसने सुखदा को गोद मे ले कर भीँच लिया।
*अच्छा बताओ क्या मेरी बेटी बनोगी?*  शारदा देवी ने उसके आँसू पोंछते हुये पूछा।
* नही,कहीं आप पर भी कोई मुसीबत आ जायेगी।* सुखदा ने सुबकते हुये कहा।
*अरे नही मेरा तो घर महक उठेगा। मैं तुम्हारी टीचर हूँ ना तो टीचर कभी बच्चों से झूठ नही बोलते। एक बात याद रखना,अभागी तू नही अभागे वो लोग हैं जिन्होंने तुझे त्याग दिया। देखना एक दिन तुम साबित कर दोगी। मै कल ही तुम्हारी नानी से मिलती हूँ। अब तुम अपने आँसू पोंछ दो । और क्लास मे जाओ।*
अगले दिन शारदा देवी और उसके पति उमेश सुखदा की नानी के पास गये। पहले तो उन्होंने उसे समझाया कि ये सब अन्ध विश्वास है। मगर नानी इसमे क्या कर सकती थी। फिर उन्होंने उसकी नानी को अपनी इच्छा बताई कि अगर आप इसे हमे गोद दे दें तो इसका भविश्य संवर सकता है। हमारे कोई संतान नही है। आप इसके माँ बाप को बुला कर बात करें। हम अगले इतवार को फिर आयेंगे।
सुखदा की माँ का कलेजा मुँह को आ रहा था ये सुन कर,मगर बाप खुश हो गया कि चलो बला टलेगी। नानी भी कब तक जिन्दा रहेगी कहीं ये मुसीबत फिर गले ना पड जाये। उमेश ने सारी कानूनी औपचारिकतायें पूरी कर ली और उसके पिता को इलाज के लिये कुछ धन भी दिया। इस तरह सुखदा अब शारदा और उमेश की बेटी बन गयी।
उनदोनो के पाँव जमीन पर नही पड रहे थे। मगर सुखदा को रह रह कर अपनी माँ का आँसूयों से भीगा चेहरा याद आ रहा था भाई की कातर निगाहें उसका पीछा कर रही थीं। मगर उन दोनो के प्यार ने उसे कुछ सकून दिया। उसका कमरा सजा दिया गया। वहाँ का माहौल देख कर वो हैरान थी इस तरह के खिलौने और खान पान तो उसने सपने मे भी नही सोचा था! घर मे रोनक हो गयी थी अब वो अपने माँ बाप की लाडली बेटी जो बन गयी थी धीरे धीरे वो माँ के सिवा सब कुछ भूल कर उनके प्यार मे रंगने लगी। उमेश और शारदा ने अपनी बदली कहीं दूर करवा ली । वो सुखदा को सभी यादों से दूर लेजाना चाहते थे।
नया शहर नया स्कूल और नया घर देख कर सुखदा भी खुश थी। बाल मन जल्दी ही उन खुशियों मे रम गया।
वर्षों की सीढियाँ फलांगते सुखदा कहीं की कहीं पहुंच गयी थी मगर नही भूली तो उस बाबा की दहशत और माँ का आँसूयों से भीगा चेहरा।-------  क्रमश

27 comments:

Amitraghat said...

"फू.....कुछ तो राहत मिली....कहानी में और भी उत्सुक्ता पैदा हो गई है......"

प्रणव सक्सैना amitraghat.blogspot.com

विनोद कुमार पांडेय said...

भगवान सब की सुनता है सुखदा पर परिवार वालों ने अन्याय किया तो भगवान ने किसी और को भेज दिया उसकी रक्षा करने के लिए...पर ये भी सोचने वाली बात है की एक अंधविश्वास के चलते लोग अपने बेटे-बेटियों को इतना दूर कर देते है वाह रे इंसान..माता जी कहानी बहुत बढ़िया लग रही है अब आगे जानने इच्छा है की उमेश और शारदा के साथ रहकर सुखदा ने आगे के पल कैसे जिएं और सुखदा के परिवार वालों का क्या हुआ क्या वो फिर से सुखदा से मिलें??? अगली कड़ी का इंतज़ार है..

बढ़िया कहानी के लिए बहुत बहुत धन्यवाद ... प्रणाम

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

कहानी सहज तरीके से चल रही थी। लेकिन आप ने सुखदा को चिकित्सीय सहायता दे ही दी। अब आप की चिकित्सा क्या रंग लाती है देखेंगे अगली कड़ी में। मैं तो सोच रहा हूँ कि यह चिकित्सकीय सहायता न मिलती तो सुखदा का क्या होता?

Mithilesh dubey said...

ओह बेहतरीन माँ जी , जब लगा कि आज कहनी खत्म हो जानी चाहिए , उत्सुकता बहुत बढ़ गयी थी , लेकिन एक बार फिर से आपने इन्तजार करवा दिया , बहुत बढ़िया लगा , कहानी का प्रवाह लाजवाब है ।

Apanatva said...

bahut sunder kahanee hai bas ye hee dil se dua hai ye andhvishwas ke baadal chut jae sabhee ke jeevan se .

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

कहानी तो बहुत ही रोचक लग रही है!

मगर आपका ब्लॉग खुलनें में
बहुत देर लग जाती है!

कोई सफेद बैक-ग्राउण्ड वाला
आसान सा टेम्प्लेट लगाइए!

वन्दना said...

kahani dharapravah chal rahi hai.....ye naya mod kafi sukhad laga jiska dar tha kam se kam wo nhi huaa ab agli kadi ka intzaar hai.

संजय भास्कर said...

ओह बेहतरीन माँ जी , जब लगा कि आज कहनी खत्म हो जानी चाहिए , उत्सुकता बहुत बढ़ गयी थी , लेकिन एक बार फिर से आपने इन्तजार करवा दिया , बहुत बढ़िया लगा , कहानी का प्रवाह लाजवाब है ।

ताऊ रामपुरिया said...

कहानी बहुत दिलचस्प तरीके से आगे बढ रही है. आगे के लिये उत्सुकता बढ गई है.

रामराम.

राज भाटिय़ा said...

पता नही लोगो के दिल केसे पत्थर के बन जाते है, जो अपने ही दिल के टुक्डे को अपने स्वार्थ के कारण फ़ेंक देते है,ऎसे लोगो की पुजा पाठ सब ढोंग होते है, आप ने बहुत सुंदर ढंग से कहानी को आगे बढाया.
धन्यवाद

अनामिका की सदाये...... said...

vo maa sach me kitni vivash rahi hogi...lekin ek maa ki mamta ki kya bisat jo in superstitious logo ke aage kuchh apni baat manva paaye...bahut kuchh man ko chhu gaya...aur bahut kuchh beta hua sa yaad aa gaya...Apne meri kahanai ADHURAPAN laghu katha padhi hogi..bas uski ghatnaye yaad ho aayi. aap ki kahani ne bhi kuchh aise he ehsaas jaga kar man ko bhigo diya he. kahani bahut hi ineresting mod par aa gayi hai..intzaar hai.

aap bahut acchhi kahaniya likhti hai. jo hame b likhne ki prerna deti hai.

badhayi..aap bahut acchha kaam kar rahi he. nirmala anti.

hem pandey said...

कहानी के इस मोड़ से सुखदा का जीवन तो सँवरने की संभावना बढ़ गयी है,किन्तु उसकी जननी किस मानसिक व्यथा से गुजर रही होगी,कल्पना की जा सकती है.

खुशदीप सहगल said...

शारदा देवी में मुझे निर्मला कपिला जी का अक्स क्यों नज़र आ रहा है, नहीं जानता...लेकिन इतना जानता हूं कि अगर निर्मला जी को सच में ऐसी कोई सुखदा मिलती तो ऐसा ही करतीं जैसा कि शारदा देवी ने किया...

जय हिंद...

निर्मला कपिला said...

खुशदीप आपकी टिप्पणी मुझे हमेशा आसमान तक पहुँचा देती है। धन्यवाद और बहुत बहुत आशीर्वाद। मुझे पता है कहानी पढना बहुत धैर्य का काम है फिर भी आप सब पाठक मुझे पढ रहे हैं आप सब की आभारी हूँ।

निर्मला कपिला said...

खुशदीप आपकी टिप्पणी मुझे हमेशा आसमान तक पहुँचा देती है। धन्यवाद और बहुत बहुत आशीर्वाद। मुझे पता है कहानी पढना बहुत धैर्य का काम है फिर भी आप सब पाठक मुझे पढ रहे हैं आप सब की आभारी हूँ।

सुरेन्द्र "मुल्हिद" said...

wah aunty ji...

aapki kahaani nikhaar pe pahunchti jaa rahi hai...

intezaar hai ab agli kadi ka....

sangeeta swarup said...

निर्मला जी,

आपकी ये कहानी बहुत अच्छा मोड ले रही है....सुखदा सच ही किस्मत वाली है....अब आगे?

रचना दीक्षित said...

आपकी कहानी बड़े चाव से पढ़ रही हूँ पर इस कड़ी को पढ़ते पढ़ते तो गले में थूंक अटक गया, सांस की गति बढ़ गयी और न जाने कैसा महसूस होने लगा जी भर आया
आभार

आपका ब्लॉग थोडा परेशान कर रहा है जब से ये नयी सज्जा हुई है

JHAROKHA said...

aadarniya nirmala ji,
apki kahani ke dono bhag bade hi rochak lage.ek tarah ka romanch paida kar diya hai inhone.age kya hota hai isme...ye janne ki utsukta bani rahegi..agle bhag ke intzaar me.....
poonam

मनोज कुमार said...

रोचकता ज़ारी है।

Mrs. Asha Joglekar said...

सुखदा की कहानी, शुक्र है कि सुखद होने लगी है । लोग क्यूं ओझाओं के बाबाओं के चक्करों मेंपड जाते हैं और अपना ही नुकसान करवाते हैं । कहानी के अगले भाग की प्रतीक्षा में ।

दीपक 'मशाल' said...

Maa sunao mujhe wo kahani.. jisme raja na ho na ho rani..
jab koi bachcha ye kahega to maa fir aapki hi kahani sunayegi pakka.. :)

वाणी गीत said...

सुखदा की कथा मन को भीतर गहरे तक छू रही है ....
देखें ....नियति सुखदा को और क्या दिखाती है ...

rashmi ravija said...

कहानी बहुत दिलचस्प तरीके से आगे बढ रही है....बहुत अच्छा मोड ले रही है....कहानी के अगले भाग की प्रतीक्षा में ।

डॉ. मनोज मिश्र said...

कहानी का यह भाग भी बढ़िया लगा..

KAVITA RAWAT said...

Maa ji jab bhi samay milta hai aapki kahani jarur padhti hun... Aapki kahani dil ke bahut kareeb se gujarkar romachit kar deti hai.....
bahut badhai.......

शरद कोकास said...

जी पढ़ रहे हैं कहानी ।

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