12 March, 2010

कहानी---- सुखदा

इस कहानी मे कुछ घटनायें सत्य हैं मगर पात्र आदि बदल दिये गये है। ओझा वाली घटना एक पढे लिखे और मेडिकल प्रोफेशन मे काम करने वाले आदमी के साथ घट चुकी है। मगर उसने जिस मरीज का ईलाज करवाया था वो 3-4 माह बाद ही मर गया था। उस बाबा का जम्मू मे आज भी लाखों का कारोबार है। उसके बारे मे फिर अलग पोस्ट से कभी बताऊँगी। जो सुखदा नाम का पात्र है इसे इस घटना से जोडा गया है और सुखदा नाम का पात्र भी सत्य घटना पर आधारित है। उसे भी उसके माँ बाप ने अभागा समझ कर त्याग दिया था। दोनो अलग अलग घटनाओं को ले कर इसे एक कहानी के कथानक को बुना  गया है। शायद पहला भाग आपको बोर लगे मगर इस कहानी को बहुत लोगों ने सराहा है। और मुझे भी अपनी अच्छी कहानियों मे ये एक अच्छी कहानी लगती है।
सुखदा
गोरा रंग, लाल गाल,छोटे छोटे घुँघराले बाल,गोल मटोल ठुमक ठुमक कर चलती तो उसके पाँव की झाँझर से सारा घर आंम्गन नाच उठता। शरारत भरी हंसी औत तुतली जुबान से सब का मन मोह लेती,घर के सब लोग उसके आगे पीछे घूमते।इतनी प्यारी बेटी थी, तभी तो उसका नाम सुखदा रखा था उसके पिता ने।
जब सुखदा का जन्म हुया था तोबडा भाई राजा पाँचवीं और छोटा भाईरवि चैथी कक्षा मे पढते थे।उसके पिता चने भटूरे की रेहडी लगाते थे।बाज़ार के बीच रेहडी होने से काम बहुत अच्छा था।कुछ घर मे सामान तैयार करने मे उसकी माँ सहायता कर देती थी।कुल मिला कर घर का गुजर बसर बहुत अच्छी तरह हो रहा था।
वो अभी चार वर्श की हुयी थी कि उसके पिता बीमार रहने लगे।चर्ष भर तो इधर उधर इलाज चलता रहा, पर पेटदर्द था कि बढता ही जा रहा था। जान पहचान वालों के जोर देने पर उन्हें पी.जी.आई चन्डीगढ ।मे दिखा कर ईलाज शुरू करवाया।वहाँ आने जाने का खर्च और ऊपर से टेस्ट इतने मंहगे दवायौ का खर्च भी बहुत हो जाता। इस तरह पी.जी.अई के चक्कर मे जो घर मे जमा पूँजी थी वो 1 माह मे ही समाप्त हो गयी।ऊपर से डाक्टर ने कैंसर बता दिया।जिगर का कैंसर अभी पहली स्टेज पर था।डाक्टर ने बताया कि हर माह कीमो थैरापी करवानी पडेगी-- मतलव हर माह 15--20 हजार का खर्च होगा ऊपर से दवाओं का खर्च अलग।इतना मंहगा ईलाज करवाना अब उनके बस मे नही था।इसलिये फिर से नीम हकीमौ के चक्कर मे पड गये।
सुखदा की दादी को किसी ने बताया कि एक ओझा है जो बिना चीर फाड के आप्रेशन कर देता है बहुत से मरीज उसने ठीक किये हैं अगर वहाँ दिखा लें तो ठीक हो जायेंगे।
उस ओझा के पास जाना मजबूरी सी बन गया था। वहाँ गये तो ओझा के चेले ने ऐसा चक्कर चलाया कि दादी तो क्या सुखदा के माँ बाप भी उस से प्रभावित हुये बिना न रह सके।
यूँ भी अनपढता गरीबी औरन्ध विश्वास का जन जन्म का साथ है।जो थोडी सी बुद्धि विवेक होते हैं वो भी अन्धविश्वास के अंधेरे मे अपनी रोशनी खो देते हैं।फिर वो दो वर्ष मे डाकटरी ईलाज मे बिलकुल जेब से खाली भी हो चुके थे।ाब तो सुखदा के पिता काम भी नही कर पाते। बडा लडका अब नौवी की पढाई छोड कर् रेहडी का काम सम्भाल रहा था। मगर बच्चा ही तो था उतनी अच्छी तरह काम नही कर पाता था तो आय भी कम हो गयी थी। ईलाज तो दूर घर का खर्च चलाना मुश्किल हो गया था।मगर किसी तरह जुगाड कर के ओझा के पास जाने का फैसला किया गया। सुखदा की माँ की कानों की वालियाँ और सुखदा की झाँझर बेच कर जम्मू जाने के लिये कुछ पैसे जुटाये गये।
सुखदा तब  बेशक अभी पाँच वर्ष की ही थी मगर तब से अब तक वो काला दिन नही भूल पाई थी।क्यों कि उस अन्ध विश्वास की त्रास्दी और भयानक क्षन ने उसके दिल मे गहरे तक पैठ बना ली थी।, जिस ने हंसती खेलती सुखदा को दुखदा बना दिया था।
तब उसे पूरी बात तो समझ नही आयी थी मगर जो उसने देखा था वो अब भी याद है और उसी से अब सब कुछ समझती है। उसे याद आया----- जब वो आश्रम पहुँचे थे तो उस ओझा के आश्रम मे बहुत भीड थी।सन्त बाबा बारी बारी से मरीजों को बुलाते, जन्त्र मन्त्र करते और्भेज देते । जिनके आप्रेशन होने होते वो वहीं रह जाते वहाँ ऐसे तीन चार मरीज थे। आज उसे लगता है कि वो जरूर बाबा के एजेन्ट होंगे। सब यही कह रहे थे कि जिसकी किस्मत अच्छी हो उसी का आप्रेशन करते हैं बाबा जी।्रात को उनका आप्रेशन होना था।
दोपहर के बैठे थे वो अन्धेरा अपने पाँव पसारने लगा था। तभी दो चोगाधारी बाबा के चेले आये और सुखदा के पिता को चारपाई पर डाल कर ले गये। ये आश्रम एक पहाडी पर था और नीचे एक दरिया बह रहा था।बाकी सभी लोगों को पहाडी पर एक जगह बैठने का निर्देश दे कर मरीज को अप्रेशन के कमरे मे , जो दरिया के किनारे था ले गये।बाकी के बैठे हुये लोगों को अन्धेरे के कारण कुछ दिखाई नही दे रहा था।सुखदा बच्ची थी वैसे भी सहमी सी बैठी थी।कुछ देर बाद किसी जानवर जैसी दहाडने की आवाज़ आयी सुखदा और बाकी लोग डर से काँपने लगे।उसकी माँ ने उसे अपनी छाती से चिपका लिया। तभी  ओझा का एक  चेला हाथ मे मास का एक लोथडा सा ले कर आया।---* ये देखो मरीज के जिगर से कैंसर वाला मास निकाल कर लाया हूँ ताकि आप अपनी आँखों से देख लो इसे बिना आप्रेशन के निकाला है। ये देख कर सभी लोग हैरान हो गये और बाबा की जै जै कार करने लगे। करीब आधे घन्टे बाद वो मरीज को वापिस ले कर आये।मरीज के कपडों पर खून के छीँटे तो थे मगर चीर फाड,बेहोशी का नामोनिशान नही था मरीज सन्तुष्ट लग रहा थ। बाकी दो मरीजों का आप्रेशन कर के बाबा जीवापिस अपने कमरे मे आ गये। फिर मरीज और रिश्तेदारों को बारी बारी अन्दर बुलाने लगे।
सुखदा के परिवार की बारी आयी तो सभी बाबा के सामने जा कर बैठ गये। चढावा चढाया,ाउर बाबा के चरणो मे माथा टेका।
*बम--बम-भोले नाथ--- ये कन्या कौन है?* बाबा ने ऊँची आवाज़ मे पूछा।
सुखदा तो पहले ही दरी हुयी थी और भी सहम गयी।
जी ये मेरी पोती है और जिसका आपने आप्रेशन किया वो मेरा बेटा है उसी की पुत्री है सुख्दा।* दादी ने सुखदा का परिचय दिया
**सुखदा? सुखदा नही दुखदा कहो इसे। माई ये कन्या नही विष कन्या है-- ये बाप के लिये मौत का पैगाम ले कर आयी है।जितनी जल्दी हो सके इसे घर से दूर भेज दो।*
बाबा ऐसा कैसे हो सकता है?ये मेरी बेटी है इस मासूम को कहाँ भेजूँगी?* सुखदा की माँ ने उसे और जोर से छाती से चिपका लिया।
*माई आप घर की सलामती चाहती हैं तो इसे घर से भेजना ही होगा। मै एक आश्रम का पता बता सकता हूँ, वहाँ इसे छोड दें नही तो सारा घर तबाह हो जायेगा।इसके माथे पर शनि और राहू की काली छाया देख रहा हूँ। अभागी है ये लडकी---  अभागी।* कहते हुये बाबा ने एक आश्रम का पता एक कागज़ पर लिख कर दिया। और कहा कि उसे बता दें जब ये वहाँ चली जाये। मैं वहाँ बोल दूँगा कि इसका अच्छा ध्यान रखें।
*बाबा जैसा आप कहते हैं वैसा ही होगा। हमे दो दिन की मोहलत दो।* दादी ने विनीत भाव से बाबा को भरोसा दिलाया।माथा टेक कर सभी बाहर आ गये।
सुखदा दर के मारे माँ को छोड नही रही थी, कुछ कुछ उसको समझ आ गया था कि उसे घर से बाहर भेजने को कहा गया है। उसके लाड प्यार करने वाले उसके पिता उसे गुस्से से देख रहे थे। माँ तो जैसे काठ की मूर्ती बन गयी थी। उसे विश्वास नही हो रहा था कि उसकी इतनी प्यारी बेटी अभागी हो सकती है।---- क्रमश:

32 comments:

Mithilesh dubey said...

मम्मी पड़ने से तो ऐसा लगा कि उसका नाम सुखदा कहीं गलत तो नहीं रखा गया ऐसा मुझे लगा , जिस तरह से कहनी चल रही है कुछ जरुर होने वाला है । कहानी बढ़िया लगी , अगले भाग का इन्तजार रहेगा ।

Amitraghat said...

"कहानी रोचक है.........."
amitraghat.blogspot.com

खुशदीप सहगल said...

ये बाबाओं-ओझाओं ने देश का क्या हाल कर रखा है, सब देख रहे हैं...

कहानी टर्निंग पाइंट पर आकर रुकी है...बेसब्री से इंतज़ार...

निर्मला जी, आपका ब्लॉग विजेट से बड़ा भारी हो गया है...खुलने में काफी वक्त ले रहा है...हो सके तो कुछ हल्का कीजिए...


जय हिंद...

Suman said...

nice

ताऊ रामपुरिया said...

कहानी पढकर अब अगली कडी के बारे मे उत्सुकता बढ गई है.

रामराम.

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

कहानी का आरंभ बहुत अच्छा है।
खुशदीप जी के सुझाव पर ध्यान दें।

वाणी गीत said...

कहानी की शुरुआत बहुत रोचक है ..अच्छी है
जाने क्यों सुखदा के लिए कुछ बूँद आंसू आ ही गये ....!!

dev said...

आप की रचनाये मेरे दिल के बहुत करीब लगती हैं. कहीं न कहीं मे अपने आप को महसूस करता हूँ.



शुभकामनाये.

वन्दना said...

bahut rochak mod par aakar kahani ruki hai......agli kadi ka intzaar hai.

सुरेन्द्र "मुल्हिद" said...

badhiya hai...

agli ka intezaar

sangeeta swarup said...

अन्धविश्वास पर आधारित कहानी की अच्छी शुरुआत ...आगे इंतज़ार है..

रचना दीक्षित said...

बहुत अच्छी जा रही है ये कहानी. बांधे हुए है समय और उसकी गति. आगे ....... इंतज़ार

Kusum Thakur said...

कहानी की शुरुआत बहुत ही अच्छी है उतसुकता बढ़ गयी आगे की कहानी जानने की !

रंजना [रंजू भाटिया] said...

रोचक कहानी है बाबा पुराण तो अब हर जगह एक नयी कहानी कह रहा है .अगली कड़ी का इन्तजार रहेगा ..

rashmi ravija said...

कहानी तो बड़ी अच्छी जा रही है...पर सुखदा के लिए डर सा भी लग रहा है...क्या होगा अब उस नन्ही सी जान का....:(

राज भाटिय़ा said...

अगर मै वहां होता तो इस बाबे को ही पहले पहाडी से नीचे फ़ेंक देता... लेकिन अब भी मेरे देश भारत मै इन बाबाओ क हुकम माननए वाले बहुतेर है.... है राम

अन्तर सोहिल said...

धडकन बढ गयी है जी
कुछ अजीब बुरे-बुरे से ख्याल आ रहे हैं
पता नही क्या होगा सुखदा का ?

चरण-स्पर्श

M VERMA said...

मेरे इस देश को इन बाबाओं से बचाओ

बहुत मार्मिक और कौतूहल जगाती कहानी. आगे न जाने क्या होगा ----------

shikha varshney said...

बढ़िया शुरुआत...आगे देखते हैं सुखदा का क्या होता है

निर्मला कपिला said...

मै जल्दी ही इस देर से ब्लाग खुलने की समस्या को ठीक करवाती हूँ। असल मे आप सब को पता है मै तो इस मामले मे जीरो हूँ बस दामाद जी को फोन लगा दिया है
जल्दी ही इसे ठीक कर देंगे मगर तब तक अपना धैर्य बनाये रखें धन्यवाद।

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

कहानीकला में आप सिद्धहस्त हैं!

RaniVishal said...

Kahani bahut rochak hai nihit udheshya bhi bahut accha hai. ojha aur jhad funk karane walo ne kitano ki hi jaan lili hai ye sab vyarth hai yah samjha jana sabke liye param aavshyak hai ....ab aage janane ke rochakata bani hui hai.
Dhanywaad

Jogi said...

aapne kyun kahan ki pehla bhaag rochak nahi hai ..its really touching one..waiting for the next post...

विनोद कुमार पांडेय said...

अंधविश्वास की एक और मिशाल वो बेटी जिसे भाग्य और अभाग्य के बारे में ठीक से जानकारी भी नही थी आज आपने ही पिता के लिए अभागी बन गई...अभी भी न जाने ऐसे कितने बाबा घूम रहे है जो इस प्रकार के तोहमत लगा कर अपनो को अपनो से दूर कर देते है...
माता जी सुखदा पर क्या बीती उसके माता और पिता ने आगे क्या कदम उठाया जानने को उत्सुकता बढ़ गई...सुंदर सामयिक कहानी जो बाँध देती है अपने सुंदर प्रवाह में.....सादर प्रणाम माता जी

प्रवीण पाण्डेय said...

वास्तविकता है पर रोचक है । अगले अंक की प्रतीक्षा में....

Babli said...

बहुत ही सुन्दर और रोचक कहानी! शुरू से लेकर अंत तक बहुत ही दिलचस्प लगा! अब तो अगली कड़ी का इंतज़ार है!

ओम सोनी said...

बहुत अच्छी कहानी है निर्मला जी और यथार्थ के बिल्कुल करीब। सही कहा है आपने अनपढ़ता और अंधविश्वास का साथ हमेशा रहा है। जब तक हमारे देश में निरक्षरता रहेगी भोले-भाले लोग ऎसे ही ओझाओं के जाल में फंसते रहेंगें।

काजल कुमार Kajal Kumar said...

शेष की प्रतीक्षा रहेगी.

Amit Kumar said...

सुन्दर प्रस्तुति....बधाई !!
______________
सामुदायिक ब्लॉग "ताका-झांकी" (http://tak-jhank.blogspot.com)पर आपका स्वागत है. आप भी इस पर लिख सकते हैं.

दीपक 'मशाल' said...

Deri se aane ke liye maafi diziye maasi.. ye bhi ek bahut prerak haqeeqat cum kahani hai.. ant to mujhe pata hi hai.. :)

संजय भास्कर said...

कहानी की शुरुआत बहुत रोचक है ..अच्छी है

डॉ. मनोज मिश्र said...

आपकी इस कहानी का आरम्भ रोचक है....

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