22 August, 2009


ग़ज़ल

तुम मुझको अब शर्मिंदा न परेशान करोAlign Centreमेरी उलझन को थोडा तो आसान करो

कश्ती को आपनी कोई तो किनारा मिल जाए
तूफां में तो राहों की कुछ पहचान करो

खुद को लटकाया था मैंने तेरी सूली पर
जीना मुश्किल था मरना तो आसान करो

चिंगारी लील रही है मजहब की अब तो
अपनी दुनिया को तो यूँ ना सुनसान करो

लुटती है अस्मत उसकी अब बाज़ारों में
रक्षा अबला की तो मेरे भगवान करो

मुर्दादिल लोग नज़र आते हैं दुनिया में
कोई तो पैदा जिंदा दिल इंसान करो

जीयें तो जीयें कैसे ऎसी दुनिया में
जीने को मुहैया अब कुछ तो सामान करो

27 comments:

संजीव गौतम said...

जीयें तो जीयें कैसे......सामान करो.
वाह! अद्भुत शेर है. परिपक्व शेर. हालांकि पूरी ग़ज़ल अच्छी है लेकिन ये मिझे ख़ास तौर पर पसन्द आया.

AlbelaKhatri.com said...

अच्छी रचना ........अच्छे शे'र .........
बधाई !

_______
_______विनम्र निवेदन : सभी ब्लौगर बन्धु आजशनिवार
को भारतीय समय के अनुसार ठीक 10 बजे ईश्वर की
प्रार्थना में 108 बार स्मरण करें और श्री राज भाटिया के
लिए शीघ्र स्वास्थ्य हेतु मंगल कामना करें..........
___________________
_______________________________

अनिल कान्त : said...

मुझे ग़ज़ल बहुत पसंद आई....मज़ा आ गया

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

शानदार गज़ल के लिए बधाई।

दर्पण साह "दर्शन" said...

waise to poori ghazal hi adbhoot hai...
par ye do sher:

खुद को लटकाया था मैंने तेरी सूली पर
जीना मुश्किल था मरना तो आसान करो

....

मुर्दादिल लोग फिरें हैं बहुत दुनिया मे
कोई तो पैदा जिंदा दिल इंसान करो


hamesha ki tarah superb !!

pranam.

श्यामल सुमन said...

खुद को लटकाया था मैंने तेरी सूली पर
जीना मुश्किल था मरना तो आसान करो

खूबसूरत गजल निर्मला जी। जब प्राण शर्मा जी ने इसे सँवारा है तो फिर क्या कहने। एक तुकबंदी देखें-

यूँ तो भूख से मरते हैं रोज हजारों बेबस
स्वाइन फ्लू के डर से और न हलकान करो

मीनू खरे said...

खुद को लटकाया था मैंने तेरी सूली पर
जीना मुश्किल था मरना तो आसान करो

जीयें तो जीयें कैसे ऎसी दुनिया में
जीने को मुहैया अब कुछ तो सामान करो

बहुत अच्छी रचना. इसे यदि संगीतबद्ध किया जाए तो बहुत मनोहारी लगेगी.

sada said...

जीयें तो जीयें कैसे ऎसी दुनिया में
जीने को मुहैया अब कुछ तो सामान करो

बहुत ही बेहतरीन प्रस्‍तुति, आभार्

M VERMA said...

जीयें तो जीयें कैसे ऎसी दुनिया में
जीने को मुहैया अब कुछ तो सामान करो
सही है जिन्दगी यूँ ही तो नही जिया जा सकता है.
यथार्थ रचना

vandana said...

behad khoobsoorat bhavon ki mala hai jismein chun chun kar ek ek pankti piroyi huyi hai.

शारदा अरोरा said...

अच्छे शे'र ,ग़ज़ल बहुत पसंद आई |

विनोद कुमार पांडेय said...

चिंगारी लील रही है मजहब की अब तो
अपनी दुनिया को तो यूँ ना सुनसान करो

संदेश देती एक बेहतरीन प्रस्तुति..
सुंदर ग़ज़ल!!!

विनय ‘नज़र’ said...

अति सुन्दर ग़ज़ल है
----
1. चाँद, बादल और शाम
2. विज्ञान । HASH OUT SCIENCE

अविनाश वाचस्पति said...

निर्मला जी आपने भी निर्मल दिया होगा
तभी तो प्राण शर्मा जी ने प्राण डाल दिए
ऐसे जीवंत भाव खूबसूरती से संवार दिए

अर्चना तिवारी said...

वाह ! सुंदर अशआरों से सजी एक बेहतरीन ग़ज़ल ...

Pt.डी.के.शर्मा"वत्स" said...

शानदार गजल!! हर शेर उम्दा!!
आभार्!

काजल कुमार Kajal Kumar said...

बहुत सुंदर

मनोज गौतम said...

तुम मुझको अब शर्मिन्दा न परेशान करो

मेरी उलझन को थोड़ा तो आसान करो

बहुत सुन्दर गज़ल और सामयिक विन्दुओं के तरफ ध्यान आकर्शित करती हुई गज़ल ।

शोभना चौरे said...

मुर्दादिल लोग फिरें हैं बहुत दुनिया मे
कोई तो पैदा जिंदा दिल इंसान करो

lajvab .schmuch bhut achi vinti hai .
abhar.

"अर्श" said...

जब ग़ज़ल , ग़ज़ल पितामह का प्यार लेकर आयी है तो इसके बारे में कुछ भी कहना उचित नहीं है ... बहोत ही खुबसूरत कहन कहें है आपने... वेसे आपके लेखन के बारे में भी कुछ कहूँ मेरी मजाल कहाँ इसलिए चुप हूँ और सलाम करता चलता हूँ... सादर प्रणाम


अर्श

Mrs. Asha Joglekar said...

Bahut achchee rachana.

लुटती है अस्मत उसकी अब बाज़ारों में
रक्षा अबला की तो मेरे भगवान करों

ओम आर्य said...

जीयें तो जीयें कैसे ऎसी दुनिया में
जीने को मुहैया अब कुछ तो सामान करो
aankhe nam ho gayi .........uffff jindagi haay jindgi ....bahut bahut khub likha ............dero shubh kaamanaye

venus kesari said...

मुर्दादिल लोग फिरें हैं बहुत दुनिया मे
कोई तो पैदा जिंदा दिल इंसान करो

जीयें तो जीयें कैसे ऎसी दुनिया में
जीने को मुहैया अब कुछ तो सामान करो

वाह क्या बात है

आपको पढ़ कर हमेशा सुखद अनुभूति होती है

सुन्दर गजल कही आपने ............

वीनस केसरी

Udan Tashtari said...

हर शेर लाजबाब!! बहुत सुन्दर गज़ल है.

योगेश स्वप्न said...

nirmala ji, umda rachna.

har sher lajawaab.

प्रवीण शुक्ल (प्रार्थी) said...

प्रणाम माँ माफ़ी चाहूंगा कई दिन के बाद आप के ब्लॉग पर आरहा हूँ गजल इंतनी बेहतरीन है की मेरे पास शब्द ही नहीं है जो इसकी तारीफ़ में कह सकूँ लेकिन बिचदो शेर जो कम शब्दों में ही समाज की सारी व्यथा कह देते है, दिल को छू गए
चिंगारी लील रही है मजहब की अब तो
अपनी दुनिया को तो यूँ ना सुनसान करो

लुटती है अस्मत उसकी अब बाज़ारों में
रक्षा अबला की तो मेरे भगवान करो
लास्ट के शेर में आशा की किरण दिखाती बात कहती है आप
मुर्दादिल लोग नज़र आते हैं दुनिया में
कोई तो पैदा जिंदा दिल इंसान करो
मेरा प्रणाम स्वीकार करे
सादर
प्रवीण पथिक

hem pandey said...

'जीयें तो जीयें कैसे ऎसी दुनिया में
जीने को मुहैया अब कुछ तो सामान करो'
- समाज के कुछ चुनिन्दा लोग इस के लिए प्रयास करते हैं. ऐसे लोगों की संख्या जितनी अधिक होगी, जीना उतना आसान हो जाएगा.

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