20 August, 2009

वीरबहुटी---गताँक से आगे
---कहानी

पिछली किश्तों मे वीरबहुटी और उससे जुडी बात चीत आपने पढी।नई बहु और उसकी जेठानी सुबह चार बजे खेतों मे गयी थीं और वहीं पर ये सारी बात चीत हुई अब आगे----
वापिस घर पहुँच कर जान मे जान आयी।तैयार होने से लेकर पितर पूजन तक्वो मेरे अंग संग रही। दोपहर का भोजन भी उसने मेरे साथ ही किया।शाम को वो मुझे घर के पिछवाडे वाले बगीचे मे ले गयी। कई तरह के फल सब्जियाँ तथा फलों के पेड लगे थे। वो कुछ सोच रही थी। झट्से उसने क्यारी से एक वीरबहुटी उठाई और हाथ पर रख कर सहलाने लगी।पता नेहीं मन मे क्या चल रहा था। फिर उसे जितनी भी वीर्बहुटियां दिखी सब को उठा उठा कर गुलाब के पत्तों पर रखती गयी।मैं समझ रही थी कि उसे डर है कि किसी के पैर के नीचे आ कर मर ना जाये। वो जरूर खुद को भी असुरक्षित महसूस करती होगी---- अजीब सी बेचैनी --- जैसे किसी ने उसके अरमानों को कुचल दिया हो,उसके रंग रूप और वज़ूद को नकार दिया हो।उसे डर था कि किसी दिन वो भी इसी वीरबहुटी की तरह मसल दी जायेगी---।
*बहु आज सदियों बाद किसी ने ढंग से मुझसे बात की है।जब मैं कोई भी बात करती हूँ,बनती संवरती हूँ ,सब मेरा मजाक उडाते हैं,कभी डाँटते मारती पीटते भी हैं। क्या सच मे मैं पगली हूँ?

*नहीं दीदी,अप बहुत अच्छी और समझदार हैं। फिर हीरे की पहचान हर किस्र्र को थोडे ही होती है!जब तक बाकी पत्थरों मे पडा रहता है पत्थर ही रहता है।पर जब जौहरी के हाथ लग जाता है तो उसकी कीमत पडती है।मैं आपकी ज़िन्दगी को नये मायने दूँगी। अब आप अकेली नहीं हैं मैं हूँ ना आपके साथ । हम दोनो मिल कर सब ठीक कर लेंगी।*
उसकी आँख से एक आँसू टपका, मगर चेहरे पर सकून था। शायद ऐसे ही किसी कन्धे की उसे तलाश थी।जो प्यार और भावनायें वो पति से चाहती थी वो उसे नहीं मिली थी। मन मे एक डर सा बैठने लगा था कि क्या गाँव मे सभी का जीवन ऐसे ही होता है? मेरा कैसा होगा? ----
अगले दिन मैं मायके चली गयी।हम ने दो तीन दिन वहाँ रहना थ घर मे बहुत चहल पहल थी।जाते ही इनको मेरी बहनों और सहेलियों ने घेर लिया हँसते हंसाते दिन बीत गया।
अगले दिन सुबह सब नाश्ता कर रहे थे।--
*ारे कोई फोन क्यों नहीं उठा रहा? कब से घन्टी बज रही है?*
रसूई से माँ की आवाज़ आयी। भईया ने फोन उठाया , सुनते ही जड से हो गये और इनकी तरफ देखने लगे।
*भईया क्या हुया?* इन्होंने पूछा।भईया ने कुछ कहने की बजाये फोन इन्हें पकडा दिया।
*क्या हुया?क्या हुया भाभी को?उधर से पता नहीं क्या कहा गया था।फोन रख कर ये धम्म से बैठ गये।
*भाभी की मौत हो गयी है---हमे अभी जाना होगा।* मैं सुनते ही सकते मे आ गयी।मुझे दुख और आश्चर्य इस बात का था कि कल वो ठीक ठाक थी और खुश भी थी।एक दम क्या हुया होगा? उस *वीरबहुटी* को अभी मैं सहला भी नहीं पाई थी
घर पहुँचे तो आँगन मे उसकी लाश पडी थी आसपास औरते बैठी रो रही थी।मैं जा कर उसके सिरहाने बैठ गयी। मेरे आँसू रुकने का नाम नहीं ले रहे थे।दो दिन मे ही वो मेरे दिल तक उतर गयी थी।पास बैठी औरतें घूँघट मे ही धीरे धीरे आपस मे बातें कर रही थीं---शायद मुझे सुनाने और समझाने के लिये--- * बहुत अच्छी थी भाग भाग कर सारा काम करती थी मुँह मे जुबान नहीं थी--कोई डाँटे फटकारे बस चुप सी साध लेती थीऔर क्यारियों मे कुछ ढूँढ्ने लगती थी। मैं समझ गयी कि जरूर वीरबहुटी को उठा कर सहलाती होगी--- उसका डर शायद सच था।
मेरे पीछे दो और औरतें फुसफुसा रही थीं------ *आदमी गुस्सेबाज और रंगड[ रूखे स्वभाव का} था। भला हरदम कोई इस तरह अपनी पत्नि को मारता पीटता है?जाने किस ने ये गुलाब का फूल कु्रगँदल के सथ लगा दिया!बेचारी उन काँटों की चुभन नहीं सह पायी।कल कैसे सजी संवरी सुन्दर लग रही थी--- देर बाद गहने कपडे ढंग से पहने थे।--अज रसोई मे जरा सा दूध उबल गया सास ने बेटे से शिकायत की कि देखो गहने कपडे मे ही ध्यान है दूध उबाल दिया---- बस पति ने गुस्से मे उसे बहुत मारा--- बेचारी पेट से थी--- बच्चा पेट मे ही मर गया। और साथ ही उसे ले गया।पता नहीं किसकी नज़र लग गयी बेचारी को?----उसकी पतली सी चुन्नी मे से मैं उसे देख रही थी नज़र वाली बात करते उसने मेरी ओरे देखा था---- मन अजीब सी वित्रिश्णा से भर गया।
मेरे अंदर बेबस, क्रोध् और पता नहीं कितनी चिन्गारियां सी उठने लगीं। मैं नई बहु थी मुझे सभी पास बैठने से मना करने लगे।मगर आज मैं उसे एक पल भी अकेले नहीं छोडना चाहती थी---- कोई कुछ भी कहे --परवाह नहीं करूँगी----।
औरतें उसे नहलाने लगीं थी अंतिम स्नान--- कपडे माँग रही थी--कोई और ले कर आता इससे पहले ही मैं उठी अपना मेकाप का सामान और एक नयी लाल साढी निकाल लायी--- औरतें हैरानी से मेरी ओर देख रहीं थीं मगर मुझे किसी की परवाह नहीं थी और मैं उनको एक संदेश भी देना चाहती थी--- मैं वीरबहुटी नहीं *बीर वहुटी* हूँ।मैने बिना किसी की परवाह किये उसे सजाना शुरू किया।उसे सहलाया ,उसके गालों पर हाथ फेरा-- आंसू टप टप उसके माथे पर गिरे।मुझे लगा अभी वो उठेगी और कहेगी ----- बहु देखा ना मैने सच कहा था लोग वीर्बहुटी को कैसे कुचल देते हैं-- तुम बहदुर--- बीरबहुटी बनना --। मैने उसकी कलाई मे चूडियां पहनाई और उसके हाथ को दबा कर जैसे उसे दिलासा दिया कि चिन्ता मत करो---। तभी पीछे से एक औरत फुसफुसाई ------- *मुझे तो ये भी पगली लग रही है।*---
मन से फिर एक लावा सा उठा--- मगर चुप रही उसे घूर कर देखा तो वो मेरी ीआँखों की भाषा जरूर समझ गयी और चुपके से वहां से खिसक गयी---
दीदी जा चुकी थी---छोटे छोटे मासूम पाँच बच्चों को छोड कर --- जैसे उसे इस बात का विश्वास हो कि मैं सब सम्भाल लूँगी---।
रात को छत पर खडी आकाश की ओर देख रही हूँ---- एक तारा टूटा--- कहते हैं टूटते तारे से जो माँगो मिल जाता है।मैने झट से आँख बँद कर दुया माँगी---*हे प्रभू दीदी को मेरी बेटी बना कर भेजना दीदी की तरह ही सुन्दर, प्यारी सी--- मैं उसे वीरबहुटी[veerbahuti] नहीं बीर बहुटी[ beervahutee] बनाऊँगी जिसे कोई पाँव तले ना कुचल सके।---- और मुझे शक्ति देना कि मैं दीदी के बच्चों को माँ का प्यार दे सकूँ।*
और यहां से बीर बहुटी का सफर शुरू होता है । iइस 37 वर्ष के सफर के बाद आज आप सब के सामने है।

19 comments:

दर्पण साह "दर्शन" said...

मैं उसे वीरबहुटी[veerbahuti] नहीं बीर बहुटी[ beervahutee] बनाऊँगी जिसे कोई पाँव तले ना कुचल सके।----


-----to main sahi tha.

----poora nahi to thori bahut hi.

kitna accha lagta hai jab aap kuch sochein aur 'wo' , sahi nikle.

37 varsh ka sangarsh accha raha hoga.....

दर्पण साह "दर्शन" said...

udaas karne wali kahani !!

....der tak.

aapka sangrah padhne ki lalse din -b - din badhti chali ja rahi hai.

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

ओह! बहुत दर्दनाक कहानी है। सहज तरीके से बहुत कुछ कहती है। जितनी बड़ी यह कथा है उस से कहीं दुगना तो यह शब्दों के पीछे से कहती है। न कहते हुए भी कहना इस कहानी की सब से बड़ी उपलब्धि है। नारियों के साथ अत्याचार बहुत देखे सुने हैं। लेकिन इस कहानी में उन्हें जिस तरह पाठक की कल्पना पर छोड़ा गया है वही इस के शिल्प का अनूठा पन है। अंत में उस अन्याय के विरुद्ध प्रतिरोध को भी बहुत सशक्त तरीके से दिखाया है। बधाई!

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

ओह! बहुत दर्दनाक कहानी है। सहज तरीके से बहुत कुछ कहती है। जितनी बड़ी यह कथा है उस से कहीं दुगना तो यह शब्दों के पीछे से कहती है। न कहते हुए भी कहना इस कहानी की सब से बड़ी उपलब्धि है। नारियों के साथ अत्याचार बहुत देखे सुने हैं। लेकिन इस कहानी में उन्हें जिस तरह पाठक की कल्पना पर छोड़ा गया है वही इस के शिल्प का अनूठा पन है। अंत में उस अन्याय के विरुद्ध प्रतिरोध को भी बहुत सशक्त तरीके से दिखाया है। बधाई!

वाणी गीत said...

वीर बहूटी से बीर बहूटी का यह दर्दनाक सफ़र आपकी कलम से रोचकता भी पा गया ..!!

Udan Tashtari said...

कहीं बहुत गहरे जा कर बेध गई..दुखी मन टिप्पणी कर रहा हूँ..शायद यही कथा की सार्थकता हो किसी अंदेशे से!!

अनिल कान्त : said...

इस पीडा को हर कोई नहीं समझ सकता...समझ सकता है तो वो जो उससे गुजरा हो...एक लम्बा सफ़र और संघर्ष...37 वर्ष के इस सफ़र और संघर्ष को मेरा सलाम

मीनू खरे said...

बहुत मार्मिक. मन को पीडा से भर गई आपकी कलम.

ताऊ रामपुरिया said...

बहुत ही मार्मिक कहानी है. शुभकामनाएं.

रामराम.

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

"मैं उसे वीरबहुटी[veerbahuti] नहीं बीर बहुटी[ beervahutee] बनाऊँगी जिसे कोई पाँव तले ना कुचल सके।---- और मुझे शक्ति देना कि मैं दीदी के बच्चों को माँ का प्यार दे सकूँ।*"

निर्मला जी!
कहानी बहुत ही सुन्दर रही।
बधाई।

विनोद कुमार पांडेय said...

उसकी आँख से एक आँसू टपका, मगर चेहरे पर सकून था। शायद ऐसे ही किसी कन्धे की उसे तलाश थी।जो प्यार और भावनायें वो पति से चाहती थी वो उसे नहीं मिली थी। मन मे एक डर सा बैठने लगा था कि क्या गाँव मे सभी का जीवन ऐसे ही होता है? मेरा कैसा होगा? ----

Behad Marmik Kahani..
Ant tak Bandhe rakhati hui...

Bahut Bahut Badhayi..Behtareen Kahani ..

sada said...

उसकी आँख से एक आँसू टपका, मगर चेहरे पर सकून था। शायद ऐसे ही किसी कन्धे की उसे तलाश थी, दिल को छूते शब्‍दों के साथ बेहद ही भावपूर्ण कहानी का सफर मन को भिगो गया, आभार्

vandana said...

nirmala ji
ye kahaani to kahin se bhi lagi hi nhi....sab kuch jaise aankhon ke aage ghatit ho raha ho.......ek haqeeqat lagi.........aur shayad sach bhi ho.......jyada kahne ki sthiti mein nhi hun........nishabd ho gayi hun.

अर्शिया अली said...

बेहद मार्मिक।
( Treasurer-S. T. )

दिगम्बर नासवा said...

बहुत ही maarmik . दर्द naak kahani है .......... jin haaloaaton से aourat को guzarna padhta है वो बस एक aurat ही समझ सकती है ........... बहुत ही naajuk, सीधे दिल में utarti है आपकी kahaani ............

आशुतोष दुबे 'सादिक' said...

बहुत ही मार्मिक कहानी है.

हिन्दीकुंज

डॉ .अनुराग said...

ऐसा लगता है औरत के पास कोई जिरहबख्तर है पीडाओं को झेलने का...

रंजना said...

आपकी यह कहानी तो मन आँखों में समां न सका....धार बन आँखों से बहने लगा है.....

ऐसी परिस्थितियों से न जाने कितनी बहूटियों को चिर काल से अनवरत गुजरना पड़ रहा है और आगे भी तबतक गुजरना पड़ेगा,जबतक वह स्वयं को मजबूत नहीं बना लेती....

कथा में कितनी ही बातें आपने जो कहीं पुरुष और स्त्रियों के प्रवृत्ति के विषय में ...... पढ़ कर आपके अनुभव के सम्मुख अभिभूत होती रही.....

अद्वितीय कथा है.....बस, प्रशंशा को शब्द नहीं मेरे पास.....

Dhiraj Shah said...

aap kahani me maa ka pyar dikha hai

पोस्ट ई मेल से प्रप्त करें}

Enter your email address:

Delivered by FeedBurner