18 August, 2009

वीर बहुटी--- कहानी
पहले तो आप सब से क्षमा चाहती हूँ कि 5-6 दिन से कम्प्यूटर खराब रहने की वजह से आप सब के ब्लोग्स पर नहीं आ पाई।अज एक कहानी ले कर उपस्थित हूँ।
ये मेरी सब से पहली कहानी है जो कि वीरबहुटी कहानी संग्रह मे छप छुकी है
पंजाबी और हिन्दी की कई पत्र पत्रिकाओं मे भी प्रकाशित हो चुकी है

वीर बहुटी

वो मेरे साथ सट कर बैठी,धीरे धीरे मेरे हाथों को सहला रही थी।कभी हाथों की मेहँदी कोदेखती कभी चूडियों पर हाथ फेरती, और कभी घूँघट उठा कर मेरे कानों के झुमके नथ और टिक्का देखती।मैं घूँघट से अपल्क उसे निहार रही थी।उम्र मे 25--26 वर्ष की लगती थी।शायद पेट से भी थी।रंग गोरा,चेहरा गोल,गुलाब की पँखडिउओं जैसे लाल पतले होँठ और उसकी बडी बडी आंखों की मासूमियत उसकी खूब सूरती मे चार चाँद लगा रही थी।मगर इस मासूमियत मे भी मुझे लगा कि इन आंखों मे और बहुत कुछ है, कुछ अविश्वास ,कुछ सूनापन जाने क्या क्या जिसे मैं समझ नहीं पा रही थी। मेरी डोली ससुराल आये अभी दो तीन घन्टे ही हुये थे।मुझे पता नहीं था कि वो मेरी क्या लगती, है मेरा उससे क्या् रिश्ता है मगर वो मुझ से ऐसी व्यवहार कर रही थी जैसे मेरी और उसकी पुरानी जान पहचान है।पता नहीं क्यों, अबोध बालिका जैसा उसका प्यार मुझे अंदर तक प्रभावित कर रहा था।एक अनजान घर,अनजान लोग,ऎसे मे उसका प्यार मुझे साँत्वना दे रहा था, सहला रहा था ,------जैसे कह रही हो-----* मैं हूँ ना,क्यों घबराती हो?* मै कुछ आश्वस्त सी हुई। चलो कोई तो इस घर मे अपना हुआ।
*उस पगली को नई बहू के पास क्यों बिठा रखा है? पता नहीं क्या अनाप शनाप बक रही होगी?* बाहर से किसी पुरुष की आवाज़ आयी।
*बेटा तुम ही बुलाओ उसे,इतना काम पडा है, मेरा कहा कब मानती है?* ये किसी औरत की आवाज़ थी। शायद मेरी सासू जे की थी
वो जल्दी से उठ कर भागी, *ओह्! तुम्हें देख कर मै तो सब कुछ भूल गयी।*
मैं सोच मे पड गयी कि ये औरत कौन है? मुझे उस आदमी का उसे इस तरह कहना अच्छा नहीं लगा। पगली तो वो किसी तरह भी नहीं लगती थी----मासूम जरूर थी। आवाज़ सुनते ही कैसे भाग गयी फिर कहना कैसे नहीं मानती? घर मे काफी महमान आये थे---सब खाना खा रहे थे। और वो भाग भाग कर सब के खिलाने लगी किसी को पाने किसी को सब्जी तो किसी को चपाती पूछती और हंस हंस कर बातें भी कर रही थी।उसकी आवाज़ मे एक खुशी ,एक उमंग थी।
जेब सभी खाना खा चुके तो वो मेरे लिये भी एक थाली मे खाना ले आयी।मेरी निगाहें इन्हें ढूँढ रही थीं कि शायद इकठै खाना खायें गे। वैसे भी जब से यहाँ आयी थी उसके बाद इन्हें देखा ही नहीं था।ाइसा भी क्या काम? ---- शायद उसने मेरी निगाहों को पढ लिया था। वो हंसी---- पता नेहीं उसकी हंसी मे क्या था कि मन सहम सा गया---
*किसे ढूँढ रही हो ?ये तलाश तो सारी उम्र ही करती रहोगी!---चलो अब खाना खाओ--गाँव मे पति पत्नि साथ बैठ कर कहाँ खा पाते हैं---- दुल्हा दुल्हन तो बिलकुल नहीं । यहाँ ऐसे ही रिवाज़ है ।अज मैं तुम्हें अपने हाथ से खाना खिलाऊँगी।* मेरे ना ना करते भी उसने जल्दी से मेरे मुँह मे एक कौर डाल दिया। जाने क्यों मेरी आँख नम हो गयी।
*देखो मैं आज तक ऐसे एक कौर के लिये तरस रही हूँ।यहाँ कोई किसी को नहीं पूछता--ना कहता है कि खाना खा लो। खुद खा लिया तो खा लिया वर्ना भूखे सो जाओ।शिष्टाचार, भावनाये जानने का समय गाँव के लोगों के पास कम ही होता है। हाँ मै हूँ तो तुम्हारी जेठानी पर बहिन बन कर रहना चाहूँगी--- क्या इस पगली को बहिन बनायोगी?*
*दीदी,कैसी बात करती हैं आप?मुझे अनजान जगह मे एक बहिन मिल गयी और क्या चाहिये?* और हम दोनो ने इकठे खाना खाया।ापने हाथ से खिलाते हुये उसकी आँखो मे तृप्ति का एहसास--मेरे मन मे आशा के एक किरण जगा गया।
अब मुझे पता चल गया था कि वो मेरी जेठानी है।मैने सुना था कि उसे पागलपन के दौरे पडते हैं।ाब तो उसे पागल कह कर ही बुलाया जाता था।इलाज अब भी चल रहा था। सब तरह के पागलों का एक ही इलाज होता है दिमाग को गोलियाँ खिला खिला कर सुलाने का! किसी की उमँगों को किसी गोली से कहाँ सुलाया जा सकता है? गोली संवेदनायो को कैसी सुला सकती है बस पल भर के लिये जब नीन्द आती है तब तक----
मगर मुझे उसमे ऐसा कुछ नहीं लगा कि वो पागल है।मुझे लगा कि उसके अंदर कहीं गहरे मे कोई वेदना है कोई पीडा है, असुरक्षा और असमर्थता की भावना है। जो साथ पाते ही बाहर आना चाहती है।
*वर्षा {जेठानी का नाम} तो किसी से बात कम ही करती है।उदास, गुमसुम् सी रहती है उसे बोलते हुये कम ही सुना है।मगर आज तुम से खूब बतिया रही है। शायद पहली बार इसके चेहरे पर खुशी देखी है।*
पास बैठी औरत मुझे बता रही थी
अब मै जान गयी थी कि दीदी बहुत भावुक और संवेदनशील हैं। भावबायों को ना जाने कितने गहरे तक छुपाती रही हैं।ये भी सुना था कि जेठ जी बहुत गरम मिजाज और रूखे स्व्भाव के हैं।अखिर क्यों होती हैं ऐसी बेमेल शादियाँ! ग्रह और नक्षत्र मिलान किस काम का? क्यों उपर वाला उपर बैठा ये खेल खेल रहा है। औरत को अबला क्यों बनाया उसने? खुद ही उसकी इतनी बडी परीक्षा लेता है---- शायद भगवान भी पुरुष् है जो अपने मन बहलाने के लिये ही ऐसा करता है।-----
खाने के बाद सब बातें करते करते सोने लगे मैं जहाँ बैठी थी वहीं मेरा बिस्तर लगा दिया गया।पास मे ही 4-5 बिस्तर और थे जिन पर कुछ औरतें सो रही थीं। दीदी आईँ और
मेरी साथ बिस्तर पर बैठ गयी।मैं हैरान थी कि क्या मेरा बिस्तर यहीं लगेगा?क्या मेरा कमरा यहीं होगा? और मेरा नज़रें इन्हें ढूँढ रही थीं।
*बहू अब सो जाओ सुबह चार बजे उठना पडेगा।यहाँ शौचादि के लिये भी खेतों मे जाना पडता है। मैं तुम्हें ले जाऊँगी।-------क्रमश

22 comments:

ताऊ रामपुरिया said...

बहुत सुंदर शुरुआत हुई है कहानी की. आगे के भाग का इंतजार करते हैं.

रामराम.

दर्पण साह "दर्शन" said...

Pranam !!

".....इलाज अब भी चल रहा था। सब तरह के पागलों का एक ही इलाज होता है दिमाग को गोलियाँ खिला खिला कर सुलाने का! किसी की उमँगों को किसी गोली से कहाँ सुलाया जा सकता है? गोली संवेदनायो को कैसी सुला सकती है बस पल भर के लिये जब नीन्द आती है तब तक----
"
ohh...
kya samvednatamak abhivyajti hai...

...derai jethani ka pyar aur pagalpan ki ye kahani baandhe rakhen main saksham hai.

pranam.

दर्पण साह "दर्शन" said...

शायद भगवान भी पुरुष् है जो अपने मन बहलाने के लिये ही ऐसा करता है।......


nai kadi ka intzaar rahega is uttar ke liye:
क्या मेरा बिस्तर यहीं लगेगा?क्या मेरा कमरा यहीं होगा?

आशुतोष दुबे "सादिक" said...

बहुत सुन्दर रचना .
हिन्दीकुंज

सुरेन्द्र "मुल्हिद" said...

very very nice story,
will wait for the next edition of this...

विनोद कुमार पांडेय said...

कहानी वही होती है जो अंत तक बेसब्री बनाए रखे..बढ़िया कहानी...जैसा अभी आगे के कड़ियों का इंतज़ार रहेगा..
सुंदर प्रस्तुति..आभार

sada said...

बहुत ही अच्‍छी शुरूआत अगले भाग की प्रतीक्षा है ...

अनिल कान्त : said...

कहानी की शुरुआत ही बहुत भावनात्मक है...आगे का इंतजार

awaz do humko said...

aage ka intezaar hai

ओम आर्य said...

जेठ जी बडे गर्म मिजाज आदमी है .........और दीदी का अलग होना..........भगवान का बेमेल शादी करवाना.....बिल्कुल सत्य है .......अक्सर हमे हामारे परिवार मे भी ऐसी शादियाँ देखने को मिल जाती है ...........क्या करे भागवान भी कही कही ऐसा खेल रच देता है कि वह आपना टाइम पास करता है ऐसे खेलो को देखकर .........बहुत ही खुब .....शानदार

दिगम्बर नासवा said...

अगर मैं ठीक से पहचान रहा हूँ तो ये punjaabi gaanv के parivaar की prisht bhoomi में likhi kahaani है...........
shuruat बहुत ही लाजवाब, bhavouk है ................ आगे की pratiksha rhegi ............

Nirmla Kapila said...

Naasvajee aapane bilkul sahi pahachaana hai ye punjab aur himachal ki milijulee prishthbhoomi ki kahaanee hai aap sab kee pratikriya ke liye dhanyavaad abhee computer poori tarah sahee nahin hua kai kuch download karana baki hai is liye roman me hi likh rahi hoon aabhaar

Nirmla Kapila said...

Naasvajee aapane bilkul sahi pahachaana hai ye punjab aur himachal ki milijulee prishthbhoomi ki kahaanee hai aap sab kee pratikriya ke liye dhanyavaad abhee computer poori tarah sahee nahin hua kai kuch download karana baki hai is liye roman me hi likh rahi hoon aabhaar

vandana said...

kahaani bahut hi rochak mod par chodi hai.........agli kadi ka besabri se intzaar rahega.

रंजना said...

Bahut hi bhavuk tatha sundar shuruaat ki hai aapne....agle ank ki besabri se pratiksha rahegee.

नीरज गोस्वामी said...

आप हमेशा कहानी को ऐसे मोड़ पर छोड़ देती हैं जब आगे क्या होगा की उत्सुकता अपनी चरम सीमा पर होती है...आपके लेखन का जवाब नहीं...
नीरज

संजीव गौतम said...

आप कहानी कहने में तो माहिर हैं ही सुनाते-सुनते बीच में छोड देने में भी.
अगला अंक भी जल्द पोस्ट करियेगा.

Arvind Mishra said...

औत्सुक्य बरकरार रखा है आपने !

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

हम तो बाढ़ से परेशान हैं,
मगर आपकी इस सुन्दर कहानी के लिए
बधाई तो दे ही देते हैं।

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

कहानी का आरंभ बहुत अच्छा है।

Manbir Redhu said...

बीर बहुटी व इसके बेटे की फ़ोटो व हरियाणवी कहाणी के लिये "चोपट चोपाल" पर "बस युं ए"

Manbir Redhu said...

बीर बहुटी व इसके बेटे की फ़ोटो व हरियाणवी कहाणी के लिये "चोपट चोपाल" पर "बस युं ए"

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