30 June, 2009

ik chhoti si muskaan chaheye
माँ का प्यार
एक दिन किसी ब्लागर ने सवाल उठाया था कि लोग ब्लोग पर रिश्ते क्यों बनाते हैं 1 मुझे लगता है कि आजकल के बच्चे एकल परिवारों मे पलते हैं इस लिये उन्हें रिश्तों की अहमियत काa एहसास नहीं हो पाता 1यहाँ मै अपनी बात करूँ तो बचपन से ही बहुत बडे परिवार मे रही हूँ शादी के बाद भी सँयुक्त परिवार था यहाँ मेरी जेठानी जी की मौत हो चुकी थी और उन पाँच बच्चों को भी हमने पढाया पाला मेरे दो जवान भाई चल बसे उन दोनो के 6 बच्चे भी हमारी जिम्मेदारी थी इस लिये बच्चों को पालते पढाते उम्र बीत गयी अब जब सभी अपने अपने परिवार मे मस्त और व्यस्त हो गये हैं तो हम दोनो को अकेलापन सालता है 1मेरे पति ने तो जरूरत मंद बच्चों के लिये खुद को समर्पित कर दिया है1मगर मुझे चाहत होती है कि मेरे आसपास बहुत से बच्चे हों तो उन मे खुद को व्यस्त करूँ 1मैने जीवन मे एक अनुभव किया है कि प्यार बाँटने से बढता हैशायद तभी मुझे किसी भी बच्चे को देख कर अँदर से स्नेह का सागर ठाठेँ मारने लगता है1 मेरे सभी बच्चे मुझे बहुत प्यार करते हैं और अपने परिवारों मे भी उन्हों ने इस प्यार को बाँटा है1 और मैं कहना चाहती हूँ कि अगर आप अपनी माँ से गहरे से जुडे हैं तो आपको प्यार का अद्भुत करिश्मा महसूस होगा कई सुन्दर अनुभूतियाँ इस प्यार से उपजती हैं जिन्हें हर कोई महसूस नहीं कर सकता1ाउर यही अनुभूतियां जीवन मे हर रिश्ते को निबाहने मे काम आती हैं----प्यार के नये नये आयाम इस रिश्ते को जी कर ही मिलते हैं------ इस लिये मैं तो ब्लोग पर भी रिश्ते ढूँढती रहती हूँ--- और र मुझे मिले हैं यहाँ ऐसे बच्चे जो मुझे बहुत प्यार करते हैं छोटे भाई जो हर वक्त मुझे साहस देने की कोशिश करते हैं आज शायद मै इसी स्नेह के कारण यहाँ तक पहुँची हूँ
मेरे कुछ बेटे मुझे अपनी कवितायें समर्पित कर अपना स्नेह बाँट रहे हैं तो फिर इन रिश्तों मे क्या बुराई है जीनी के लिये और क्या चाहिये मेरी एक बेटी भी इसी ब्लोग जगत मे है जो मुझे कई बार इतनी लम्बी 2 मैल करती है मुझे अकेलापन लगता ही नहीं------ तो क्या ये सवाल वाज़िब है कि ऐसे रिश्ते बना कर ब्लोग्गेर्स कया साबित करना चाहते हैं 1 क्या ये एक परिवार नहीं है1 आप किसी की भावनाओं को क्यों कैद कर लेना चाहते हैं------- मगर मुझे किसी की चिन्ता नहीं मुझे जीने के लिये यही सही लगता है तो मैं सब से अपना प्यार बाँटूँगी------ इसी बात पर मेरी एक रचना पढें कि माँ के स्नेह मे क्या है----- एक बार माँ के पास बैठ कर उसके प्यार को महसूस कर के देखें--फिर जो अनुभूतियाँ आप मे उपजेंगी वो जीवन भर सब रिश्तों मे काम आयेंगी-----


माँ की ममता गीता कुरान है
मे की ममता वेद पुराण है

माँ की ममता मंदिर गुरदुवारा है
माँ की ममता प्रेम न्यारा है

माँ की ममता अल्लाह रहमान है
माँ की ममता बडी महान है

खुद भूखी रह कर बच्चों को खिलाती है
वो बच्चों को अपना लहू पिलाती है

उनकी आँख के आँसू पीती है
बच्चों के लिये सब रिश्ते जीती है

माँ जैसी कुर्बानी कोई दे नहीं सकता
माँ की जगह कोई रिश्ता ले नहीं सकता

माँ के कदमों मे बच्चों की जन्नत है
सब देवी देवों की वो मन्नत है

माँ की ममता का ऊँचा ओहदा है
माँ की ममता कृष्ण यशोधा है

माँ की ममता ब्रह्मण्ड से विशाल है
माँ की ममता की नहीं कोई मिसाल है

माँ की ममता का नहीं कोई दाम है
माँ की ममता मे ही चारों धाम हैं

जाने कब मिट जाये माटी का खिलौना है
किस पल छूट जाये प्यार का बिछौना है

माँ के प्यार की जोत जलाये रखना
माँ के प्यार मे पलकें बिछाये रखना

माँ की ममता मे सारा जहान है
माँ की ममता ही तेरी पहचान है

ये बच्चे माँ की जान हैं
उसकी दुआ एक वरदान है

32 comments:

"अर्श" said...

WAKAI RISHTE KAHIN BHI BANE AUR KAHIB BHI JANM LE WO RISHTE TO RISHTE HI HOTE HAI.... AUR JAHAAN MAA AUR BACHHE KI BAAT HOTI HAI USME AUR KYA KAHI JAA SAKTI HAI ISASE PAAK AUR KOI RISHTAA HI NAHI HAI... MUJHE BHI IS BLOG JAGAT NE EK MAA DIYA HAI AUR BAHOT HI PYAARI HAI MERE LIYE,UNKA PYAAR MERE LIYE AMRIT KE SAMAAN HAI, MERI BAHOT SAARI GAZALON ME UNKA PRABHAV AAPKO BAKHUBI DEKHNE KO MIL SAKTI HAI ... AISE HI EK SHE'R DEKHEN KE ....

ISHQ MOHABBAT AAWARAAPN
SANG HUYE JAB CHHUTA BACHAPAN,

MAIN MAA SE JAB DUR HUA TO
ROYA GHAR AANCHAL AUR AANGAN..

MAMATWA KI KOI UPAMAA KYA DE SAKTAA HAI MUJHE TO NAHI LAGTAA KE AISAA HO BHI SAKTAA HAI... BAS YE HAI KE JO RISHTE BANE USE BAS ZINDAGEE BHAR NIBAAH KARI JAYE YAHI RISHTE KI SARTHAKATAA HOTI HAI... AAJ KI POST KE BAARE ME KUCHHNAHI KAH SAKTA BAS KE CHUP HUN AUR MAA KA PYAAR BARBAS MERE UPAR BARAS RAHAA HAI INKE KAVITAA KE JARIYE....


ARSH

ताऊ रामपुरिया said...

बहुत सही लिखा आपने. आपकी सोच सकारात्मक है और सकारात्मक आदमी सब जगह अपनी उपस्थिति से खुद को आनंदित रखते हुये दुसरों को भी आनंदित रखता है.

आपकी सोच को नमन है. शुभकामनाएं.

रामराम.

अनिल कान्त : said...

आपने बिलकुल सही लिखा है ...सकारात्मक सोच ...मैं आपको नमन करता हूँ

अजय कुमार झा said...

आदर्नाय निर्मला जी...बहुत ही सही बात कही आपने...और रही बात उनकी जो ब्लॉगजगत में रिश्तों के बनने पर ऐतराज करते हैं..उन्होंने शायद कभी रिश्ता नहीं निभाया होग ..निजी जीवन में भी नहीं...हम तो इसमें यकीन रखते हैं..

जीवन रिश्तों का दूसरा नाम है.
हम तो दीवारों, और पत्थरों को दोस्त बना लेते हैं..
जो भागते हैं रिश्तों से , न जाने वे,
खुद को किस बात की सजा देते हैं...

बहुत ही उम्दा बात कही आपने..हम तो रिश्ते बनाएंगी भी और निन्भायेंगे भी..

रंजना [रंजू भाटिया] said...

बहुत अच्छा और सही कहा आपने रिश्ते निभे तो बहुत अच्छे लगते हैं ...माँ की ममता की पंक्तियाँ बहुत पसंद आई शुक्रिया

प्रवीण शुक्ल (प्रार्थी) said...

मैं अपने आप को इतना परिपक्व नहीं मानता जो रिश्तो की गंभीरता के बारे मेंमें बात करूँ पर मैं इतना जरुर जानता हूँ की मान के प्यार और स्नेह का दुनिया मेंमें कोई जोड़ नहीं मान शब्द मेंमें ही वो मिठास और अद्भुद स्नेह है जिसकी तुलना नहीं की जा सकती है माँ अतुलनीय है माँ के बारे मेंमें मैं बस इंतना ही कहना चाहूँगा

तेरी उपमा किससे कर दू,,,
किससे दूँ तेरा सम्मान ,,,
मेरा जीवन भी तो तेरा है ,,,
फिर दूँ क्या तेरे को तेरे से मान ...
माँ तू अमित संगिनी मेरी ,,,
हर सांसो प्र्स्वासो में,तेरा भान ,,,,
जब कभी विकल व्याधि सी" माँ ,,
मुझको पीडा बहुत सताती है,,,
जब कभी तीव्र उलझनों से,,,
दुनिया मेरी रुक जाती है ,,,
हर घडी पास तुझको मैंने पाया है ,,,,
जब कड़ी धूप में आता बादल ,,,,
लगता तेरे आंचल का साया है ,,,
इन दूर दूर गामी देशो में रह कर ,,
इन विविध विविध वेशो में रह कर ,,,
माँ मैं कभी नहीं तुझको भुला हूँ ,,,,
इस जीवन के नितान्त अकेले पन में माँ ,,
तुने ही तो साथ निभाया है ,,,
सुख में तू किलकारी बन गूंजी ,,,
दुःख में बनी वेदना ,,,, माँ :::::::
मौन रहूँ तो उसमे भी तू ,,,,,
विचारो की अनवरत श्रंखला है,,,,
तेरा साया पल पल मैंने महसूस किया है ...
तेरी स्म्रतियों के झोको ने भी तो ,,,
नवजीवन ही दिया है ,,,
मैं बौना बन यही सोचता,,,
तेरी गरिमा किससे कर दूँ ...
किससे दूँ तुझको मैं मान ,,,
तेरी उपमा किससे कर दूँ ,,,
किससे दूँ तेरा सम्मान ,,,,,

माँ आप के ह्रदय से निकला हुआ एक एक शब्द मेरे लिए किसी अशिर्बाद से कम नहीं है मेरा
प्रणाम स्वीकार करे
सादर
प्रवीण पथिक
9971969084

ओम आर्य said...

बहुत बहुत बहुत बहुत बहुत सुन्दर......................माँ के ममता के आगे नतमस्तक.........अदभूत

RAJNISH PARIHAR said...

'माँ'तो शब्द ही ऐसा है जो आकर्षित करता है...!जितना लिखा जाये उतना कम है..!दस बच्चे मिल कर एक माँ को नहीं पाल सकते,जबकि एक अकेली माँ दस बच्चों को पाल; लेती है यही होती है माँ...!दूसरा आपने ब्लॉग पर रिश्ते बनाने के बारे जो लिखा है मैं उससे सहमत हूँ....आज के युग में खुशियाँ ढूंढनी पड़ती है...जहाँ मिले वहीँ ठीक...!हमारे करीबी रिश्तेदार तो कम ही करीब होते है,जबकि दूर के दोस्त दिल के करीब ज्यादा रहते है...

विनोद कुमार पांडेय said...

अति सुंदर,अद्भुत रचना,

माँ,ममता का असीम श्रोत हैं,
माँ,इस नश्वर जीवन की,अखंड ज्योत हैं.

माँ,एक पवित्र नाम है,
माँ,के बिना जिंदगी गुमनाम है.

माँ,आँचल की छाया देती रही कठोर धूप मे,
माँ,निहित है,परमात्मा के स्वरूप मे.

awaz do humko said...

mere chehre pe jab bhi fikr ke saye ubharte hain
meri maaN apne hath se niwala chod deti hai...
maaN ki mamta duniya ki anmol doulat hai....

sada said...

ये बच्‍चे मां की जान हैं,
उसकी दुआ एक वरदान है ।

आपकी पूरी रचना, बहुत ही सुन्‍दर, हर शब्‍द में मां की व्‍याख्‍या जो भी की है, अद्भुत है, मां पर जितना भी लिखा जाये, जितना भी कहा जाये, वह कम है, मां की ममता और इस रचना के भावों में जो ममता और रिस्‍तों के धागे आपने पिरोये हैं उनके आगे मैं नतमस्‍तक हूं ।

डॉ. मनोज मिश्र said...

आपनें बहुत सुंदर लिखा है ,वैसे भी यह तो हमारी पुरातन परम्परा रही है-उदार चरिता नाम तु वसुधैव कुटुम्बकम .

दिगम्बर नासवा said...

बहुत सही लिखा आपने निर्मला जी.........ब्लॉगजगत में रिश्तों के बनने पर jisko भी ऐतराज हैं.. शायद कभी उन्होंने रिश्ता banaaya ही नहीं.......वो नहीं jaante rishton की ahmiyat और जो सुख rishton को nibhaane में आता है वो उस से anjan हैं .................achaa लगा आपको और जान कर

हर्षवर्धन said...

सही है रिश्ते बनने-बनाने के लिए जगह के मोहताज नहीं होते। बहुत बढ़िया लेख लिखा है आपने

‘नज़र’ said...

बहुत ही बढ़िया

---
विज्ञान । HASH OUT SCIENCE

परमजीत बाली said...

बहुत सुन्दर रचना है।बधाई।
आपने सही कहा है इस ब्लोग जगत में रिश्तो की एक अलग अहमियत है.....यह अनुभव में आया है कि कुछ रिश्ते अपने आप बनते चले जाते हैं। जो मन को आनंदित करते है

Prem Farrukhabadi said...

maa par likhi rachna achchhi lagi

रंजना said...

आपके इस आलेख और कविता को पढ़ मन में जो भाव आये,उन्हें शब्द दे पाने में मैं स्वयं को नितांत असहाय पा रही हूँ.....बस यही कहूंगी की नतमस्तक हूँ आपके सम्मुख...

रिश्ते तो मन से ही बनते और निभाए जाते हैं...माध्यम तो बस माध्यम हैं....कोई आवश्यक नहीं की जन्म से मिले और बंधे रिश्ते ही मन के भी रिश्ते हों.....

माँ तो अपने आप में ही सम्पूर्ण है...और कुछ आगे कहने की गुंजाइश ही कहाँ रह जाती है....मातृत्व से बड़ा कोई सुख नहीं....

नीरज गोस्वामी said...

निर्मला जी एक अच्छा इंसान ही प्यार बाँट सकता है...आप बहुत नेक दिल हैं और आपके विचार भी बहुत उच्च कोटि के हैं...इश्वर आपको हमेशा खुश रक्खे...माँ पर कविता लाजवाब है...
नीरज

Vijay Kumar Sappatti said...

aadarniy nirmala ji ;

aapko is bete ka bhi pranaam . bus aapki ye post padhkar aankhen bheegi hui hai .. aur kuch na kahunga ...

aapka beta

vijay

M VERMA said...

maa ko bas mera salaam hai

अमिताभ श्रीवास्तव said...

"MAA"
is shbd ki vyakhya to ishvar bhi nahi kar paaye..itne pyare shbd ki mahima bakhaini nahi jaa sakti/ aapki rachna marmsparshi he//
maa par ab tak jitna likha gayaa he sab adhura saa lagtaa he kyuki lagta he abhi kuchh shesh he jo likha nahi gayaa/

राज भाटिय़ा said...

निर्मला जी, कई लोग कुछ गलत सोच वाले भी होते है, जब कि उन्हे मालूम ही नही होता कि वो क्या कर ओर कह रहे है.
समाज मै हम सब को रहने के लिये प्यार की आवशकता तो होती है, ओर उस प्यार को कोई कुछ नाम दे दे तो क्या बुरा है, आप अगर सब बच्चो मे उस प्यार को ढुढती है पाती है, तो इस क्या बुराई है.
बुराई है एक दुसरे की टांग खीचने मै, एक दुसरे को नीचा दिखाने मै.
आप मन छोटा ना करे आप का लेख ओर अप की कविता बहुत ही अच्छी लगी धन्यवाद

creativekona said...

आदरणीय निर्मला जी ,
आपने ठीक लिखा है आज के युग में रिश्तों की समझ रह कहाँ गयी है ....मां के बारे में आपकी ये पंक्तियाँ अद्वितीय हैं

माँ के प्यार की जोत जलाये रखना
माँ के प्यार मे पलकें बिछाये रखना
माँ की ममता मे सारा जहान है
माँ की ममता ही तेरी पहचान है
ये बच्चे माँ की जान हैं
उसकी दुआ एक वरदान है

हेमंत कुमार

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

भाव-प्रणव रचना के लिए बधाई।

●๋• सैयद | Syed ●๋• said...

नीरज सर की बार बिलकुल जायज है की 'एक अच्छा इंसान ही प्यार बाँट सकता है'

आपके विचार अनुकरणीय हैं.

माँ पे लिखी रचना बहुत सुन्दर है.

P.N. Subramanian said...

बेहद सुन्दर. मुझे एक और बहन मिल गयी.

''ANYONAASTI '' {अन्योनास्ति} said...

कपिला जी ,
सर्वप्रथम तो मेरी सवेदानाएं आप के साथ है आप के भाई के मर्डर का जानकर दुःख हुआ भगवान उसकी आत्म को शांति दे | खैर इसमें आप - हम कर ही क्या सकते हैं , मृत्यु ही इस सृष्टि का अकेला शाश्वत -सत्य है ||
मैं आप का आभारी हूँ कि आप मेरी दुनिया में ( ब्लोग्स पर ) आयीं ,कबीरा का अनुसरण किया ,काळचक्र कि प्रशसा की यहाँ तक कि '........के बहाने से ' तक पर तक भ्रमण किया और पसंद किया | कबीरा के अनुसरण तथा मेरी दुनिया में [ब्लोग्स पर ] आने भ्रमण एवं प्रशंसा करने का हार्दिक आभारी हूँ |
कहना तो बहुत कुछ चाहता हूँ , परन्तु इस टिप्पणी में और कुछ नहीं कहूँगा ,क्योंकि परंपरा है कि कंडोलेंस के बाद और किसी विषय पर विचार नहीं करते ;अतः क्षमा - प्रार्थी हूँ ||

मुकेश कुमार तिवारी said...

निर्मला जी,

रिश्ते तो जन्म के साथ ही पैदा हो जाते हैं पर आदमी निभाना नही सीख पाता है। आपने जो ब्लॉगर्स समूह में एक रिश्तेदारी की बात कही वह दिल को छू गई है।

माँ, को लेकर आपने जो भी लिखा वह शाश्वत सत्य है। और रिश्ते जो निभाये हैं वो प्रेरणादायी हैं।

नमन!

सादर,

मुकेश कुमार तिवारी

Abhishek Mishra said...

Tippaniyan nahin aise rishte hi is Blog jagat ki vaastavik uplabdhi hain.

''ANYONAASTI '' {अन्योनास्ति} said...

"माँ " यानि म + अ +न [ MAN ] = मन में , आत्मा में , नयन में जो छवि हमेशा जाने- अनजाने व्याप्त रहती है वही माँ है | उसी से हमारा अस्तित्व है , उसे भूले नहीं कि तुम्हारा अस्तित्व 'शून्य' है |

नवम्बर में कवि योगेन्द्र मौदगिल की एक रचना की प्रशंसा में उनकी एक पोस्ट पर टिप्पणी की थी वही चार लाईने दोहरा रहा हूँ ,

रिश्तों से ही घर होते हैं
इसी लिए रिश्ते ही संग हँसते हैं
रिश्ते ही संग-संग रोते भी हैं
रिश्तों के काँधे इसीलिए होते हैं |


आप का लेखन मन भवन लगा , सबसे बड़ा और कठिन तप - काल गृहस्थाश्रम होता है , उसमें भी रिश्तों को निभाना अगर वे न हो तो उनके आश्रितों को निभाना तो और भी दुष्कर कार्य है | गुंजाईश न होने पर अपनी संतान को तो समझाया -बहलाया और न मानाने पर सख्ती भी की जा सकती है ;पर रिश्तों के आश्रितों को नहीं ,अगर उन्हों ने ही या किसी और ने कह दिया ,' अरे बिन माँ - बाप के बच्चे है या अपने थोड़े ही है जैसा कुछ ' तो सारे करे धरे पर राख़ वो भी गरम वाली पड़ ही गयी |

कंचन सिंह चौहान said...

bahut kuchh milta julta paya maine apne vicharo se...! bahut baar logo ke comments bhi sune "in maa bahano vali aurato ki ek alag prajati hoti hai. inhe log isi roop me pasand karte hai" vagairah vagairah...! magar kya karuN rishta jo bhi ho jab us me pravah prem ka ho to sambodhano ka hisab nahi laga pati mai..jo jis tarah se jude use bas imanadari se nibhana chahati hun

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