04 June, 2009

क्या कहूँ (कविता )

मेरे प्यार मे ना रही होगी कशिश
जो वो करीब आ ना सके
हम रोते रहे तमाम उम्र
वो इक अश्क बहा ना सके
पत्थर की इबादत तो बहुत की
पर उसे पिघला ना सके
जो उन्हें भी दे सकूँ जीने के लिये
वो एहसास दिला ना सके
बहुत किये यत्न हमने
पर उनको करीब ला ना सके
पिला के जाम कर दो मदहोश मुझे
उस बेदर्दी की याद सता ना सके

21 comments:

ajay kumar jha said...

badee hee rumaanee panktiyaan....mohabbat ke kashish se bhari huee...achha laga...

P.N. Subramanian said...

अत्यधिक खूबसूरत. एक पुराणी कविता याद आ गयी "विरह वेदना गले लगायी"

"मुकुल:प्रस्तोता:बावरे फकीरा " said...

अति सुन्दर
सादर

"अर्श" said...

आपके इस कविता पे कितने भावः है ये कहना मुश्किल है मेरे लिए ... दर्द खुद बा खुद टूट के सामने आते चले गए...

बस एक शे'र याद या गया के ..

अब तो एहतियातन उस तरफ से कम गुजरता हूँ...
मेरे लिए कोई मासूम क्यूँ बदनाम हो जाये....

आपका
अर्श

sadalikhna said...

बहुत ही भावपूर्ण अभिव्‍यक्ति ।

Basanta said...

Great! Very sentimental! Very beautiful!

KK Yadav said...

आपने इतना सुन्दर लिखा कि बार-बार पढने को जी चाहे.
_______________________________
विश्व पर्यावरण दिवस(५ जून) पर "शब्द-सृजन की ओर" पर मेरी कविता "ई- पार्क" का आनंद उठायें और अपनी प्रतिक्रिया से अवगत कराएँ !!

vandana said...

kya khoob likha hai........patthar kab pighalte hain ..........dard se sarabore rachna hai.........har koshish ko darshati rachna aur gahre zakhm khati rachna

महामंत्री - तस्लीम said...

याद से बचने के लिए आदमी क्या क्या नहीं करता। इससे पता चलता है कि प्यार कितना सच्चा है।
-Zakir Ali ‘Rajnish’
{ Secretary-TSALIIM & SBAI }

रावेंद्रकुमार रवि said...

आपका नया अंदाज़ अच्छा लगा!

दिगम्बर नासवा said...

यादें दिल से नहीं जाती............ भूना चाहो तो भी याद आती.......सुन्दर अभिव्यक्ति है आपकी

अनिल कान्त : said...

मुंह से वाह वाह निकल रहा है

राज भाटिय़ा said...

बस दिल से इक आह निकली ओर इस फ़िजाम मै खो गई. बहुत सुंदर कविता है

ओम आर्य said...

achchhee rachana hai......

नीरज गोस्वामी said...

पत्थर की इअबदत तो बहुत की
पर हम उसे पिघला न सके...

वाह निर्मला जी वाह....बहुत अच्छी रचना...बधाई...
नीरज

दर्पण साह "दर्शन" said...

पिला के जाम कर दो मदहोश मुझे
उस बेदर्दी की याद सता ना सके


....wah !! wah !!

"pee ke gum kum krna hai ya ye bhi peene ka bahana hai?"

SWAPN said...

nirmala ji itni rumaani rachna padh kar phir madhosh hone laga tha. phir sambhal gaya.

aapko dheron badhai.

रंजना said...

Waah !!

Bahut hi sundar bhaavpoorn rachna...

सुशील कुमार छौक्कर said...

बेहतरीन रचना।

woyaadein said...

बढ़िया........

साभार
हमसफ़र यादों का.......

ARVI'nd said...

दिल को छु गयी आपकी ये कविता

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