03 June, 2009

यह कविता मै पहले भी लिख चुकी हूँ मगर आज ये सिर्फ मै विनिता यशस्वी के लिये विशेष तौर पर लिख रही हूँ1जीवन को एक चुनौती की तरह स्वीकार करो और इन अंधेरों से बाहर आ कर अपनी राहें खुद तलाश करो1फिर देखो जिन्दगी कैसे तुम्हारे कदम चूमती है1ये भी याद रखो कि दुनिया कभी किसी पर रहम नहीं करती बल्कि तुम्हारी कमज़ोरियों का लाभ उठाने से नहीं चूकती1सुख दुख दोनो के बिना जीवन के मर्म को जाना ही नहीं जा सकता !

कुन्दन बनता है सोना जब भट्टी मे तपाया जाता है
चमक दिखाता हीरा जब पत्थर से घिसाया जाता है
श्रममार्ग के पथिक बनो अवरोधों से जा टकराओ
मंजिल पर पहुँचोगे अवश्य बस रुको नहीं बढते जाओ

बदल जायेगी तकदीर

श्रम और आत्म विश्वास हैं ऐसे संकल्प
मंजिल पाने के लिये नहीं कोई और विकल्प

पौ फटने से पहले का घना अँधेरा
फिर लायेगा इक नया सवेरा
देखो निराशा मे आशा की तस्वीर
तनिक धीर धरो राही बदल जायेगी तकदीर

बस दुख मे कभी भी ना घबराना
जीवन के संघर्षों से ना डर जाना
युवा शक्ति पुँज बनो तुम कर्मभूमी के वीर
तनिक धीर धरो राही बदल जायेगी तकदीर

नयी सुबह लाने को सूरज को तपना पडता है
धरती कि प्यास बुझाने को बादल को फटना पडता है
मंजिल तक ले जाती है आशा की एक लकीर
तनिक धीर धरो राही बदल जायेगी तकदीर्



12 comments:

Babli said...

पहले तो मैं आपका तहे दिल से शुक्रियादा करना चाहती हूँ कि आपको मेरी शायरी पसंद आई!
बहुत बढ़िया लगा! आपकी हर एक पोस्ट इतनी अच्छी है कि कहने के लिए अल्फाज़ नहीं है!

"अर्श" said...

wakai vaneeta yashashvi sach me ek kaabil aur ajimoshaan shakhsiyat rakhti hai ye aapke is kavitaa se saaf jhalak rahaa hai....jahan tak main unhe jaantaa hun wo bahot hi mehanati,sahasi aur karmath kavayitri hai unke lekh barbas hi unke baare em saaf saaf kahte hai... unki lekhani ka unpe asim kripaa hai ... sabse achhee baat ye ke wo ek sachhi insaan hai jo is dharti pe honaa jaruri hai...

magar aapkeee kavitaa kub jam rahi hai... har shabd jaise khud me mukammal hai...

aapka
arsh

विनय said...

shukriya, yah to bahut khoob rahee.

ओम आर्य said...

सही तनिक धीर से तक्दीर बदलता तो होगा पर धीर का इंतिहान भी होता है ..............एक विचार प्रस्तुत करती कविता

दिगम्बर नासवा said...

आशा और उम्मीद से भरी.............साथ साथ जीवन के अनुभवों को भी बताती.......चेतावनी देती..............प्रेरक रचना है.........अन्दर तक असर कर गयी...लाजवाब

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

स्वर्णकार ने स्वर्ण को,
दियो आग में डाल।
काँप उठा पानी भयो,
देख परीक्षा काल।।
सोना तो सोना रहा,
खोट हो गया भस्म।
तपकर उसका खिल गया,
कुन्दन जैसा जिस्म।।

RAJNISH PARIHAR said...

VERY NICE...

विनीता यशस्वी said...

Bahut Bahut Shukriya Nirmala ji Is Pyari si kavita ki liye...

vandana said...

bahut badhiya.....prernadayi kavita

SWAPN said...

bahut umda kavita, nirmala ji, prernadayak.

aur sabse badi baat antim char panktian, __AMOOLYA. BADHAAI.

ajay kumar jha said...

nirmala jee sundar rachnaa kisi praarthnaa kee tarah...bahut hee prernaadaayak hai....

प्रसन्न वदन चतुर्वेदी said...

लाजवाब कविता....धन्यवाद.

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