02 November, 2009

गज़ल

बहुत दिन से किसी के ब्लाग पर नहीं आ पायी जिस के लिये क्षमा चाहती हूँ।
कुछ दिन से अस्वस्थ हूँ। डा़ ने आराम करने की सलाह दी है। मगर 2-4 दिन मे ही लगने लगा है कि जैसे दुनिया से कट गयी हूँ।बच्चे मुझे नेट पर भी नहीं बैठने देते। ब्लोग नहीं लिखने देते तो सारा दिन बिस्तर पर पडा आदमी तो और बीमार हो जायेगा। कल अचानक शाम को 5 बजे एक फोन आया कि *मैं अकबर खान बोल रहा हूँ। [अकबर खान जी The NetPress.Com vaale] हम लोग नंगल आये थे तो सोचा कि आपसे भी मिलते चलें।* मैं उस समय सो रही थी। एक दम से पता नहीं कहाँ से इतनी फुर्ती आ गयी कि मुझे लगा ही नहीं कि बीमार हूँ। उनके आने की इतनी खुशी हुई कि बता नहीं सकती। काफी देर ब्लोगिन्ग के बारे मे बातें हुई। और इस पर भी चर्चा हुई कि एक ब्लागर्ज़ मीट नंगल् मे रखी जाये। सेहत ठीक होते ही इस पर विचार करेंगे । उनकी पत्नि हमारे शहर से है ये जान कर और भी खुशी हुई। दोनो पति पत्नि इस तरह मिले जैसे हम लोग कई वर्षों से जानते हों। जाते हुये मुझ से आशीर्वाद मांगा तो मन भीग सा गया। इस ब्लाग्गिंग ने मुझे कितने रिश्ते कितनी खुशियां दी हैं सोचती हूँ तो मन भर आता है। जीने के लिये और क्या चाहिये? ऐसा लगता है कि अब हर खुशी और हर गम मेरी ब्लागिन्ग से ही जुडा हुया है। कहते हैं कि जिस इन्सान का बुढापा सुखमय और खुशियों से भरा हो वो इन्सान खुशनसीब होता है। क्यों कि जवानी मे तो iइन्सान के पास हिम्मत होती है सहनशक्ति होती है मगर बुढापे मे दुख सहन करने की ताकत नहीं होती। इस हिसाब से मैं खुशनसीब हूँ उमर चाहे कम हो या अधिक क्या फर्क पडता है जितनी भी हो सुखमय हो बस । । अकबरखान जी का धन्यवाद कि उन्होंने मुझे याद रखा और मेरे घर आने का कष्ट किया।
एक छोटी सी गज़ल ठेल रही हूँ पता नहीं बहर मे है या नहीं। आप देखें।ये मिसरा अनुज सुबीर जी ने दीपावली पर तरही मुशायरे पर दिया था उसी पर ये एक और गज़ल है jजो वहाँ नहीं भेज पाई थी।

दीप जलते रहे झिलमिलाते रहे
दौर खुशियों के हम को लुभाते रहे

कौल करके निभाना न आया तुझे
यूँ निरे झूठ हम को बताते रहे

क्या गिला है मुझे कुछ बता तो सही
कौन से फासले बीच आते रहे

दूरियाँ यूँ बनी देखते ही गये
पास रहते हुये दूर जाते रहे

जश्न ऐसे मनाया तेरी मौत का
हम बने आग खुद को जलाते रहे

चाह कर भी भुला ना सकी मैं तुझे
रोज़ ही ख्वाब तेरे रुलाते रहे

खुर्सियाँ राजसी खून से हैं सनी
होलियाँ खून की वो मनाते रहे


28 October, 2009

गज़ल

यह गज़ल भी अपने बडे भाई साहिब आदरणीय प्राण शर्माजी के आशीर्वाद
और गलतियाँ निकालने के बाद ही सजी संवरी है ।
मैं उन की शुक्रगुज़ार हूँ कि अपना इतना कीमती समय निकाल कर
मुझे गज़ल सिखा रहे हैं।उनका धन्यवाद् कह कर इस ऋण से मुक्त
नहीं होना चाहती, उनकी चिरायू और सुख समृद्धि के लिये दुआ करती हूँ।
अपको कैसी लगी?



सुनहरे हर्फों को दिल पर मेरे आकर सजाये कौन
मेरी किस्मत मेरे माथे पे खुशियों की बनाये कौन

बहुत नाराज़ हो तुम भी बहुत नाराज़ मैं भी हूँ
चलो छोडो सभी शिकवे,मगर पहले मनाये कौन

उठे ऊपर अगरचे लौ बुझाने को लगे सब ही
मगर बढती हुई उसकी पिपासा को बुझाये कौन

बनाया स्वार्थ को तूने मुकाम अपना बता क्योंकर
दया, करुणा,मुहब्बत और सच्चाई पढाये कौन

कहे इन्सान खुद को तू मगर हैवान लगता है
बता इन्सानियत के गुर तुझे कुछ भी सिखाये कौन

चले बंदूक ले कर हाथ मे बेखौफ वो ऐसे
फिज़ा मे खौफ की फैली सदाओं को सुनाये कौन


जला तू आग सीने मे बने अँगार जज़्वा यूँ
सिवा तेरे बता तू देश तेरा अब बचाये कौन


26 October, 2009

बेटियों की माँ (कहानी )
सुनार के सामने बैठी हूं । भारी मन से गहनों की पोटली पर्स मे से निकाल कर कुछ देर हाथ में पकड़े रखती हूं । मन में बहुत कुछ उमड़ घमुड़ कर बाहर आने को आतुर है । कितन प्यार था इन जेवरों से । जब कभी किसी शादी व्याह पर पहनती तो देखने वाले देखते रह जाते । किसी राजकुमारी से कम नही लगती थी । खास कर लड़ियों वाला हार कालर सेट पहन कर गले से छाती तक सारा झिलमला उठता । मुझे इन्तजार रहता कि कब कोई शादी व्याह हो तो सारे जेवर पहून । मगर आज ये जेवर मेरे हाथ से निकले जा रहे थे । दिल में टीस उठती है ----- दबा लेती हू ---- लगता है आगे कभी व्याह शादियों का इन्तजार नही रहेगा -------- बनने संवरन की इच्छा इन गहनों के साथ ही पिघल जाएगी । सब हसरतें लम्बी सास खींचकर भावों को दबाने की कोशिश करती हू । सामने बेटी बैठी है -------- अपने जेवर तुड़वाकर उसके लिए जेवर बनवाने है ----- क्या सोचेगी बेटी ----- मा का दिल इतना छोटा है ? अब मा की कौन सी उम्र है इतने भारी जेवर पहनने की ------------- अपराधी की तरह नज़रें चुराते हुए सुनार से कहती हू ‘ देंखो जरा, कितना सोना है ? वो सारे जेवरों को हाथ में पकड़ता है - उल्ट-पल्ट कर देखता है - ‘इनमें से सारे नग निकालने पड़ेंगे तभी पता चलेगा ?‘‘
टीस और गहरी हो जाती है --------इतने सुन्दर नग टूट कर पत्थर हो जाएगे जो कभी मेरे गले में चमकते थे । शायद गले को भी यह आभास हो गया है -------बेटी फिर मेरी तरफ देखती है ----- गले से बड़ी मुकिल से धीमी सी आवाज़ निकलती है ---हा निकाल दो‘ ।
उसने पहला नग जमीन पर फेंका तो आखें भर आई । नग के आईने में स्मृतियां के कुछ रेषे दिखाई दिए । मा- पिता जी - कितने चाव से पिता जी ने आप सुनार के सामने बैठकर यह जेवर बनवाए थे । ‘ मेरी बेटी राजकुमारी इससे सुन्दर लगेगी । मा की आखें मे क्या था --- उस समय में मैं नही समझ पाई थी या अपने सपनों में खोई हुई मा की आखें में देखने का समय ही नही था । शायद उसकी आखों में वही कुछ था जो आज मेरी आखें में है, दिल में है ---- शरीर के रोम-रोम में है । अपनी मा का दर्द कहा जान पाई थी । सारी उम्र मा ने बिना जेवरों के काट दी । वो भी तीन बेटियों की शादी करते-करते बूढ़ी हो गई थी । अब बुढ़े आदमी की भी कुछ हसरतें होती हैं । बच्चे कहा समझ पाते हैं ---- मैं भी कहा समझ पाई--- इसी परंपरा में मेरी बारी है फिर कैसा दुख ----मा ने कभी किसी को आभास नहीं होने दिया, उन्हें शुरू से कानों में तरह-तरह के झूमके, टापस पहनने का शौक था मगर छोटी की शादी करते-करते सब कुछ बेटियों को दे दिया । फिर गृहस्थी के बोझ में फिर कभी बनवाने की हसरत घरी रह गई । किसी ने इस हसरत को जानने की चेष्टा भी नही की । औरत के दिल में गहनों की कितनी अहमियत होती है ---- यह तब जाना जब छोटी के बेटे की शादी पर उन्हें सोने के टापस मिले । मा के चेहरे का नूर देखते ही बनता था ‘देखा, मेरे दोहते ने नानी की इच्छा पूरी कर दी‘‘ वो सबसे कहती ।
धीरे-धीरे सब नग निकल गए थे । गहने बेजान से लग रहे थे । शायद अपनी दुर्दाशा पर रो रहे थे --------------‘ अभी इन्हें आग में गलाना पड़ेगा तभी पता चलेगा कि कितना सोना निकलेगा ।‘‘
‘हा,, गला दो‘ बचा हुआ साहस इकट्‌ठा कर, दो शब्द निकाल पाई ।
उसने गैस की फूकनी जलाई । एक छोटी सी कटोरी को गैस पर रखा, उसमें उसने गहने डाले और फूकनी से निकलती लपटों से गलाने लगा । लपलपाटी लपटों से सोना धधकने लगा । एक इतिहास जलने लगा ---- टीस और गहरी हुई । लगा जीवन में अब कोई चाव ----- नही रह गया है ---- एक मा‘-बाप के बेटी के लिए देखे सपनों का अन्त हो गया और मेरे मा- बाप के बीच उन प्यारी यादों का अन्त हो गया ----- भविष्य में अपने को बिना जेवरों के देखने की कल्पना करती हू तो ठेस लगती है । मेरी तीन समघनें और मैं एक तरफ खड़ी बातें कर रही है । इधर-उधर लोग खाने पीने में मस्त है । कुछ कुछ नज़रें मुझे ढूंढ रही है । थोड़ी दूर खड़ी औरतें बातें कर रही है । एक पूछती है ‘लड़की की मा कौन सी है ? ‘‘दूसरी कहती है ‘अरे वह जो पल्लू से अपने गले का आर्टीफिशल नेकलेस छुपाने की कोशिश कर रही है ।‘‘ सभी हस पड़ती हैं । समघनों ने शायद सुन लिया है ----- उनकी नज़रें मेरे गले की तरफ उठी --------- क्या है उन आखों में जो मुझे कचोट रहा है ---- हमदर्दी ----- दया--- नहीं--नहीं व्यंग है, बेटिया जन्मी हैं तो सजा तो मिलनी ही थी ----- उनके चेहरे पर लाली सी छा जाती है । बेटों का नूर उनके चेहरे से झलकने लगता है । अन्दर ही अन्दर ग‌र्म से गढ़ी जा रही हूं, क्यों ? क्या बेटियों की मा होना गुनाह है ---- सदियों से चली आ रही इस परंपरा से बाहर निकल पाना कठिन है । आखें भर आती हैं । साथ खड़ी औरत कहती है बेटियों को पराए घर भेजना बहुत कठिन है और मुझे अन्दर की टीस को बाहर निकालने का मौका मिल जाता है । एक दो औरतें और सात्वना देती है । ---- आसुयों को पोंछकर कल्पनाओं से बाहर आती हू । मैं भी क्या उट पटाग सोचने लगती हू --- अभी तो देखना है कि कितना सोना है । शायद उसमें थोड़ा सा मेरे लिये भी बच जाए । सुनार ने गहने गला कर सोने की छोटी सी डली मेरे हाथ पर रख दी । मुटठी में भींच कर अपने को ढाढस बंधाती हू । इतनी सी डली में इतने वर्षों का इतिहास समाया हुआ था । तोल कर हिसाब लगाती हू तो बेटी के जेवर भी इसमें पूरे नही पड़ते है ------ मेरा सैट कहा बनेगा । फिर सोचती हू सास का सैट रहने देती हू ---- बेटी को इतना पढ़ा लिखा दिया है एक महीने की पगार में सैट बनवा देगी । मुझे कौर बनावाएगा ? मगर दूसरे ही पल बेटी का चेहरा देखती हू । सारी उम्र उसे सास के ताने सुनने पड़ेंगे कि तुम्हारे मा-बाप ने दिया क्या है------ नहीं नही मन को समझाती ह अब जीवन बचा ही कितना है । बाद में भी इन बेटियों का ही तो है । एक चादी की झाझर बची थी । उस समय - समय भारी घुघरू वाली छन छन करती झाझरों का रिवाज था ----- नई बहू की झाझर से घर का कोना कोना झनझना उठता । साढ़े तीन सौ ग्राम की झाझर को पुरखों की विरासत समझ कर रखना चाहती थी मगर पैसे पूरे नही पड़ रहे थे दिल कड़ा कर उसे भी सुनार को दे दिया । सुनार के पास तो यू पुराने जेवर आधे रह जाते है ------- झाझर को एक बार पाव में डालती हू -------------- बहुत कुछ आखें में घूम जाता है । बरसों पहले सुनी झकार आज भी पाव में थिरकन भर देती है । मगर आज पहन कर भी इसकी आवाज बेसुरी लग रही है ---शायद आज मन ठीक नही है । उसे भी उतार कर सुनार को दे देती हू ।
सुनार से सारा हिसाब किताब लिखवाकर गहने बनने दे देती हू । उठ कर खड़ी होती हू तो लड़खडार जाती हू । जैसे किसी ने जान निकाल दी हो । बेटी बढ़कर हाथ पकड़ती है---- डर जाती हू कहीं बेटी मेरे मन के भाव ने जान ले । उससे कहती हू अधिक देर बैठने से पैर सो गए हैं । अैार क्या कहती ? कैसे बताती कि इन पावों की थिरकन समाज की परंपंराओं की भेंट चढ़ गई है ।
सुनार सात दिन बात जेवर ले जाने को कहता है । सात दिन कैसे बीते बता नहीं सकती--- हो सकता है मैं ही ऐसा सोचती हू । ाायद बाकी बेटियों की मायें भी ऐसा ही सोचती होंगी । आज पहली बार लगता है मेरी आधुनिक सोच कि बेटे-बेटी में कोई फरक नहीं है , चूर-चूर हो जाती है --- जो चाहते हैं कि समाज बदले बेटी को सम्मान मिले --- वो सिर्फ लड़की वाले हैं । कितने लड़के वाले जो कहते है दहेज नहीं लेंगे ? वल्कि वो तो दो चार नई रस्में और निकाल लेते है । उन्हें तो लेने का बहाना चाहिए । लगता है और कभी इस समस्या से मुक्त नही हो सकती ।------ औरत ही दहेज चाहती है । औरत ही दहेज चाहती है सास बनकर ------- औरत ही दहेज देती है, मा बनकर । लगता है तीसरी बेटी की शादी पर बहुत बूढ़ी हो गई हू ----- शादियों के बोझ से कमर झुक गई है ----- खैर अब जीवन बचा ही कितना है । आगे बेटियां कहती रहती थी ‘मा यह पहन लो, वो पहन लो---- ऐसे अच्छी लगती है -----‘अब बेटिया ही चली गई तो कौन कहेगा । कौन पूछेगा ----मन और भी उदास हो जाता है । रीता सा मन----रीता सा बदन- लिए हफते बाद सुनार के यहा फिर जाती हू ---- बेटी साथ है ---- बेटी के चेहरे पर चमक देखकर कुछ सकून मिलता है ।
जैसे ही सुनार ने गहने निकाल कर सामने रखे, बेटी का चेहरा खिल उठता है ---- उन्हें बड़ी हसरत से पहन-पहन कर देखती है और मेरी आखों के सामने 35 वर्ष पहले का दृष्य घूम गया--------मैं भी तो इतनी ही खु थी -----------मा की सोचों से अनजान -------लेकिन आज तो जान गई हू --- सदियों से यही परंपरा चली आज रही है -----मैं वही तो कर रही जो मेरी मा ने किया ---बेटी की तरफ देखती हू उसकी खूशी देखकर सब कुछ भूल जाती ---- अपनी प्यारी सी राजकुमारी बेटी से बढ़कर तो नहीं हैं मेरी खुायॉं -----मन को कुछ सकून मिलता है ----जेवर उठा कर चल पड़ती हॅ बेटी की ऑंखों के सपने देखते हुूए । काष ! मेरी बेटी को इतना सुख दे, इतनी शक्ति दे कि उसको इन परंपराओं को न निभाना पड़े ----- मेरी बेटी अब अबला नहीं रही, पढ़ी लिखी सबला नारी है, वो जरूर दहेज जैसे दानव से लड़ेगी ----- अपनी बेटी के लिए----मेरी ऑंखों में चमक लौट आती है -----पैरों की थिरकन मचलने लगती है --------------।


---निर्मला कपिला

23 October, 2009

क्यों दर्द होता है (कहानी )

एक बार पूछा था तुम ने ------- रुद्र तुम्हारी आँखों मे दर्द क्यों रहता है------ क्यो तुम्हारी आँखें बुझी बुझी सी रहती हैं------ तुम्हारी आवाज़ जैसे कहीं गहरे कूयें से आ रही हो ------ एक बार मे इतने सवाल ------ मै हमेशा की तरह चुप कर गया था------- अपने दर्द मे किसी को शामिल करना मुझे मँजूर नहीं था फिर उसे------- जिस की खुशी के लिये मैने इतने दर्द पाल लिये थे------- सोचा था कि तुम्हें कभी नहीं बताऊँगा-------- मगर ---- आज जरा स्वार्थी हो गया हूँ------- पता नहीं क्यों, शायद जानता हूँ कि अब जीवन के कुछ दिन ही बाकी हैं--- चाहता हूँ कि तुम्हें बताऊँ------ पर शायद ये मेरे पन्नों मे ही कैद रह जाये------ फिर भी बता दूँ------- मुझे कब दर्द होता है क्यों होता है--------
मुझे इन विरान दिवारों मे अकेले लेटे हुये दर्द नहीं होता------ ये रेत की दिवारें मेरे सारे गम सोख लेती हैं------- ये मेरा कमरा मेरे हर पल का साथी है-------- मैं जब इन दिवारों से बातें करता हूँ------ तो कहीं से एक तस्वीर इन पर उभरने लगती है------ एक सुन्दर सी छोटी सी लडकी------- धीरे धीरे वो मेरे पास आ कर खडी हो जाती है------ और मेरा हाथ पकड कर मुझे बाहर की ओर खींचती है मेरे बेजान शरीर मे पता नहीं कहाँ से इतनी ताकत आ जाती है कि मैं उसके पीछे पीछे चल पडता हूँ ------ इस आशा मे कि शायद अब ये मुझे कहेगी कि बाहर देखो जामुन का पेड जामुन से भरा पडा है मुझे तोड कर दो या फिर आम के लिये कहेगी------ फिर से एक सपना आँखों मे तैरने लगता है------- बाहर जाते ही पता नहीं मेरा हाथ छोड कर वो कहाँ गायब हो जाती है------ और मैं खुद को लम्बे लम्बे घने चीड के पेडों के बीच अकेले पाता हूँ जरा सी कसक होती है तो उसे दिल से बाहर फेंकने की कोशिश करता हूँ------- फिर मुझे लगता है कि शायद वो इन पेडों के पीछे छुप गयी है और छुपा छुपी खेलना चाहती है मैं---- इन पहाडों पर पेडों के बीच बनी पगडँडिओं पर चल पडता हूँ------ चलता जाता हूँ----- पहाडों का घना अँधेरा------ सर्द हवा------ मगर उसे ढूँढते हुये पसीन पसीना हो जाता हूँ------ नहीं ढूँढ पाता------ थक हार कर वहीं बैठ जाता हूँ कदम साथ नहीं देते------- दूर दूर तक एक अजीब सा सन्नाटा------ और तब दर्द होता है------- जब उसे ढूँढ नहीं पाता ----शायद तुम्हें इस मे कोई दर्द की वजह ना लगे पर मेरे दर्द की वजह वो छोटी सी मासूम लडकी है------ जिसे जितना भूलना चाहता हूँ उतना ही वो याद् आती है-----
फिर भी चलती जाती है ज़िन्दगी----- कहीं गहरे मे छुपा लेता हूँ अपना ये दर्द------ फिर कई बार इन दिवारों से भी तंग आ जाता हूँ तो बाहर बगीचे मे आ कर बैठ जाता हूँ------ अभी सूरज छिपा ही होता है----- फिर दूर कहीं लम्बे घने पेडों के पीछे से लगता है कि कोई साया सा मेरी तरफ चला आ रहा है------- ये तुम्हारा आँचल है शायद तुम कब बडी हो गयी जान ही नहीं पाया------- आज पहली बार देखा है दुपट्टा ओढे हुये या शायद आगे भी लिया हो मैं ही नहीं देखना चाहता था तुम्हें बडी होते हुये------ फिर कसक होती है हम बडे क्यों हो जाते हैं------- लगता है किसी ने मेरे कन्धे पर हाथ रखा है ------
आँखें बन्द कर लेता हूँ ------- सायँ सायँ की आवाज़ सुन रहा हूँ------- शायद तुम्हारी साँसों की आवाज़ है------- मगर ऐसी तो नहीं थी तुम्हारी साँसों की आवाज़ ---- दिल की धडकन सुनाई दे रही थी------ इतने ज़ोर से तो नहीं धडकता था तुम्हारा दिल------ और टीस उठती है जब देखता हूँ कि तुम नहीं हो ये तो पेडों की सरसराहट ह--- धडकन नहीं---- पत्तों की खडखडाहट है----- फिर उदास हो जाता हूँ----- याद आ जाता है वो दिन जब आखिरी बार तुम बैठी थी मेरे पास ------ तुम तब बडी हो गयी थी------- कितनी चमक थी तुम्हारी आँखों मे ये बताते हुये कि तुम्हारी शादी तय हो गयी है---- तब मैने ऐसी ही धडकन सुनी थी तुम्हारे दिल की------ और तुम्हारी ये धडकन मेरे लिये दर्द बन गयी थी ------ ये घाव इतना गहरा है कि इसे अभी नहीं दिखाऊँगा------ कभी दिखाऊँगा जरूर कि वो रात मेरे लिये कितनी दर्दनाक थी-- अब जब बताने पे आ ही गया हूँ तो सब कुछ धीरे धीरे एक एक कर के बताऊँगा ------ हाँ तो मै क्या बता रहा था---- हां उस दिन्-- तुम पर नहीं खुद पर क्रोध आ रहा था या शायद तरस आ रहा था कि ----- काश ये धडकन मेरे लिये होती ------ काश कि ये चमक मेरे लिये होती---- इसी का तो इन्तज़ार करता रहा था मै------ काश कि तुम्हें बता पाया होता------ क्यों नही बता पाया----- मुझे लगता था कि तुम्हें खुद समझ जाना चाहिये ------ मगर ये जानते हुये कि तुम बहुत नादान और मासूम हो------ बचपना नहीं छोड् पाइ हो------- मै तुम्हारे बडे होने का इन्तज़ार करता रहा------- उस दिन भी तुम्हारी ेआँखों मे खुशी की चमक देख कर मै हमेशा के लिये चुप रह गया------ तुम्हारे चेहरे पर उदासी देख ही नहीं सकता था------
मुझे वो दिन याद करके बहुत दर्द होता है बहुत्त पीडा होती है-------- तुम नहीं समझोगी------
फिर तब और भी दर्द होता है------ जब मैं अपनी किताबें ले कर बैठता हूँ------- तुम चुपके से स्लेट् ले कर मेरे सामने आ जाती हो सवाल पर सवाल पूछती रहती हो------ फिर मै एक बडा सा मुश्किल सवाल दे देता हूँ ताकि तुम्हें इसे हल करते हुये काफी समय लग जाये और मै उतनी देर तुम्हें देख सकूँ------ तुम्हारे चेहरे के एक एक रोम से मै वाकिफ था ----- मगर तुम जान ही नही पाई----- शायद तुम्हें डाँट देता था और तुम मुझ से डरती भी थी------ डाँट इस लिये देता कि तुम सिर उठा कर ना देख सको कि मैं तुम्हें देख रहा हूँ------- इस तरह मै तुम्हें हर पल अपनी आँखों मे बसाये रखता------ हम दूर दूर भी चले गये मगर मै तुम्हारा वो चेहरा नहीं भूल पाया ----- तुम्हें सब कुछ पढा कर भी जैसे कुछ नहीं पढा पाया ----- मेरा एक सवाल तुम कभी हल नहीं कर पाई---- या शायद उस सवाल की इबारत ही मैने गलत लिखी थी ----- ज़िन्दगी के सवाल को भी गणित के सवाल की तरह ही समझा था इस गलफहमी मे रहा कि आखिर तुम हल पूछने तो मेरे पास ही आयोगी-----
मगर अब तुम बडी हो गयी थी अपने सवाल खुद हल करने लगी थी------ और रोज़ जब भी कोई किताब ले कर बैठता हूं तो उन पन्नों पर तुम्हारी तस्वीर देखता हूँ------ और वही मेरे दर्द का कारण् बन जाती है। किस किस बात को कैसे भूलूँ------ मुझे दर्द तब होता है जब इन सब के लिये मै खुद को जिम्मेदार समझने लगता हूँ ----- क्यों नहीं बता पाया तुम्हें ------ कोई देखते देखते मुझ से मेरी जान छीन कर ले गया और मैं---- कुछ नहीं कर पाया मेरी बुजदिली मेरी व्यथा बन गयी-------- तब से आज तक तुम एक पल के लिये भी मुझ से दूर नहीं ----- अब भी कई बार लगता है कभी ना कभी शायद कोई ज़िन्दगी से जुडा सवाल ले कर तुम मेरे पास आओ------- और इसी इन्तज़ार मे जी रहा हूँ-------।
बाकी कल ------ अब कागज़ पर फिर तुम्हारी तस्वीर उभरने लगी है ----- इससे बातें करते करते सो जाऊँगा------ इस दर्द की इन्तहा तक पहुँच कर ही नींद आती है------ कल फिर सुनाऊँग कि मुझे दर्द क्यों होता है-------

21 October, 2009

गज़ल

ये गज़ल भी आदरणीय प्राण भाई साहिब के आशीर्वाद से और उनके हाथों सजी संवरी है। तो पढिये और बताईये कि मेरी ये कोशिश कैसी रही?

1222 1222 1222 1222



रहे तालिब सदा तेरे
दीदार-ए-नूर के जानम
न आया तू न कोई भी
पता तेरा मिला मुझ को

वफा को ही मिले धोखा
बता ऐसी रवायत क्यों
मैं हैराँ हूँ उजाले मे
भी अंधेरा मिला मुझ को

हज़ारों रोनकें होती रहें
होते रहें उत्सव्
उजडता सा सदा मेरा
जहाँ डेरा मिला मुझ को

सदा जीता रहा मर मर
के मैं यारो ख्यालों मे
मिला ये तोहफा देखो
जो गम तेरा मिला मुझ को

तिरे कन्धे पे सिर रख कर
लगा कोई मेरा भी है
चलो जीने को कोई साथ
ही मेरा मिला मुझ को

करे कोई गिला तो क्या?
बताओ तो सही *निर्मल*
मुहब्बत में बना बन कर
खुदा मेरा मिला मुझ को


19 October, 2009

गज़ल

गज़ल से पहले एक सूचना देना चाहती हूँ

क्यों सिर्फ दौलू है, हिन्दी विज्ञान कथा लेखक?


[कल्किआन् हिंदी मे प्रकाशित ] गॉवों में एक कहावत प्रचलित है, "माया तेरे तीन नाम, दौलू, दौलत, दौलत राम", यानि कि किसी के स्टेट्स के साथ उसका नाम भी बदलता जाता है। आज हिन्दी विज्ञान कथा के लेखकों पर विचार करते समय अनायास ही ये बात मुझे याद आई। ---डा. अरविन्द दुबे {पूरा आलेख हिन्दी कल्किआन ब्लोग पर पढें}

कल हिन्दी कल्कियान ब्लोग पर ये आलेख पढ रही थी तो विग्यान कथा मे रुची जागी। यहाँ तक मुझे लगता है कि बहु गिनती के लेखक इस बारे मे अधिक सचेत नहीं हैं । न ही पत्र पत्रिकाओं मे इसके बारे मे अधिक प्रचार प्रसार होता है। अगर कोई नया लेखक लिखने की कोशिश भी करता होगा तो पत्रिकाओं मे छपना बहुत कठिन है । अगर आप लोग विग्यान मे रुची रखते हैं और विग्यान पर साहित्य सृजन करना चाहते हैं तो आप कल्कियोन ब्लोग के लिये लिखें और वहाँ आपका मार्ग दर्शन करने के लिये और विग्यान साहित्य को नयी दिशा देने के लिये एक प्रयासरत टीम है। आप नीचे दिये गये लिन्क पर देख सकते हैं। और वहाँ से पूरी जानकारी ले सकते हैं।
इस आलेख को भी इसी ब्लोग पर पढें।

http://hindi.kalkion.com/articles




गज़ल

मेहरबानी का इजहार न कर
यूँ महफिल मे तु शर्मसार न कर

दोस्त को कुछ भी कह ले मगर
दोस्ती पर भूले से वार न कर

प्यार अगर तू जाने ही नहीं क्या है
यूँ बढ चढ के तो तकरार न कर्

जो *निर्मल * वक्त पे काम न आये
ऐसे दोस्त पर एतबार न कर

जो इन्साँ को हैवान बना दे खुद मे
तू आदत वो शुमार न कर

कौन किसी का साथ निभाए सदा
जाने वाले का इन्तज़ार न कर

इन्साँ है तो इन्सानियत निभा
महरूम वफा से संसार न कर

16 October, 2009

गज़ल

एक और कोशिश की है सही या गलत आप बतायें

सपने सुन्दर उजियारे देख
मौसम के अजब नज़ारे देख

देख घटा शरमाये उसको
नैना उस के कजरारे देख

चोर उच्चकों की दुनिया है
संसद के गलियारे देख

मजहब का ओढ नकाब रहे
मानवता के हत्यारे देख

जूतमजूत चले संसद मे
अब मुफतो मुफत नज़ारे देख

रक्षक,भक्षक जब बन बैठे
तो इन को कौन सुधारे देख

गीत गज़ल लिख वक्त गुजारें
सब तन्हाई के मारे देख

आँखों मे जिसको रखते थे
बह गए बन आँसू खारे देख

उसकी यादें रोज़ रुलायें बस
दर्द-ए-दिल के मारे देख

14 October, 2009

कविता-- जीने का ढंग
कल से मन कुछ उदास सा था । हिमांशी की गज़ल तरही मुशायरे मे सुबीर जी के ब्लाग पर पढी तो जरा मनोबल बना। इस बार घर मे दिवाली भी नहीं मनेगी फिर सभी बच्चे भी अपने अपने घर हैं तो अकेले मे कुछ अच्छा नहीं लग रहा था।अज नेट पर आते ही सुबीर जी की मेल मिली। लिखा था * निर्मला दी*। बस और क्या चाहिये था बुलबुले सी फिर उठ गयी। आज एक कविता सुबीर जी को समर्पित कए लिख रही हूं।मैं सुबीर जी की धन्यवादी हूँ और उनके बडप्पन के आगे नत्मस्तक हूँ कि दीपावली पर एक छोटे भाई का ये तोहफा मेरे लिये यादगार रहेगा। कल बडे भाई साहिब आदरणीय प्राण जी की भी दिवाली पर बधाई मिली । मेरी दिवाली मेरे भाईयों और बेटों ने खुश नुमा कर दी । धन्यवाद नहीं कहूँगी। सुबीर जी को ढेरों आशीर्वाद और शुभकामनायें। बडे भाई साहिब को भी ढेरों शुभकामनायें। और अपने बेटों को भी आशीर्वाद ।बाकी सब का भी धन्यवाद कि इस ब्लागजगत के कारण मैं दिवाली पर कुछ हादसों को भूल सकूँगी।


जीने का ढंग (कविता )

अपनी विजय गाथा के
तुम खुद ही गीत बनाओ
श्रम और आत्मविश्वास की
ऐसी धुन सजओ
अपने आप सुर बन जाते हैं
जो बस विजय गीत सुनाते हैं

मज़िल आती नहीं खुद चल कर
जाना पडेगा हर सीढी चढ कर
सकारात्मक सोच से राह बनाओ
खुद मे इक उत्साह जगाओ
बस बढते जाओ बढते जाओ

निराशा का एक भी पल
कर देता है पथ से विचलित
बुराई से करो किनारा
इस मे है तुम्हारा हित
व्यवस्थित करो जीवन शैली
अपनी ऊर्जा को न व्यर्थ गंवाओ
जीवन है कितना अद्भुत सुन्दर
सोचो जीनी का ढंग अपनाओ


ये नहीं केवल किताबी फलसफा
अपनाओ निश्चित है तुम्हारी सफलता




12 October, 2009

अलविदा
आज कल देश मे खास कर ब्लाग जगत मे धर्म के नाम पर हो रहा है उस से मन दुखी है। इसका हमारे बच्चों पर क्या असर होता है क्या वो ये नहीं सोचेंगे कि धर्म हमे जोडता नहीं है बल्कि तोडता है? अगर कोई किसी के धर्म के खिलाफ बोलता है तो वो आपका कुछ नहीं बिगाड रहा बल्कि अपने धर्म की संकीर्णता और कट्टरता का प्रचार कर रहा है जब कि किसी भी धर्म मे दूसरे धर्म के खिलाफ बोलना नहीं लिखा। अगर वो अपने देश{जिस मे कि वो रह रहा है} के खिलाफ कुछ क हता है तो भी दुनिया को अपनी असलियत बता रहा है कि मै जिस थाली मे खाता हूँ उसी मे छेद भी करता हूँ और जिस डाल पर बैठता हूँ उसे ही काट भी देता हूँ।िस लिये उत्तेजित होने की बजाये आप उस ब्लोग को पढना ही छोड दें। जिस को जिस से शिकायत है वो एक दूसरे के ब्लाग पर ही न जाये। कृ्प्या सभी भाई बहनों से निवेदन है कि ब्लागजगत मे हम सब एक परिवार की तरह ही रहें । इस बात को कहने के लिये मैं आज श्री महिन्द्र नेह जी की कविता प्रस्तुत करना चाहती हूँ जो कि कल श्री दिनेश राय दिवेदी जी के ब्लाग पर छपी थी उन्हीं के साभार !


अलविदा
महेन्द्र 'नेह'

धर्म जो आतंक की बिजली गिराता हो
आदमी की लाश पर उत्सव मनाता हो
औरतों-बच्चों को जो जिन्दा जलाता हो
हम सभी उस धर्म से
मिल कर कहें अब अलविदा
इस वतन से अलविदा
इस आशियाँ से अलविदा


धर्म जो भ्रम की आंधी उड़ाता हो
सिर्फ अंधी आस्थाओं को जगाता हो
जो प्रगति की राह में काँटे बिछाता हो
हम सभी उस धर्म से
मिल कर कहें अब अलविदा
इस सफर से अलविदा
इस कारवाँ से अलविदा


धर्म जो राजा के दरबारों में पलता हो
धर्म जो सेठों की टकसालों में ढलता हो
धर्म जो हथियार की ताकत पे चलता हो
हम सभी उस धर्म से
मिल कर कहें अब अलविदा
इस धरा से अलविदा
इस आसमाँ से अलविदा


धर्म जो नफ़रत की दीवारें उठाता हो
आदमी से आदमी को जो लड़ाता हो
जो विषमता को सदा जायज़ बताता हो
हम सभी उस धर्म से
मिल कर कहें अब अलविदा
इस चमन से अलविदा
इस गुलसिताँ से अलविदा

10 October, 2009


निष्ठा

माँग
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माँ अक्सर कहती
अपने बालों मे
इतनी लम्बी माँग मत निकाला करो
ससुराल का सफर लम्बा होता है
बाद मे जाना कि
इसका अर्थ् तुम तक पहुँचने मे
एक कठिन और लम्बा रास्ता
तय करना है
बस मैने इस राह को सजा लिया
लाल् सिन्दूर से
ताकि इस पर चलने मे
मेरी ऊर्जा बनी रहे
और तुम भी इस रंगोली पर
चाव से अपने पाँव बढा सको
और तब से मैने माँग मे
सिन्दूर लगाना नहीं छोडा


बिन्दी
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शादी के बाद
जान गयी थी कि मेरे माथे
पर तुम्हारा नाम लिखा है
तुम ही मेरी तकदीर लिखोगे
और माथे पर
तुम्हारे हर आदेश के लिये
पहले ही मोहर लगा दी
बिन्दी के रूप मे
स्वीकार कर लिया
अपने भाग्य विधाता का हर आदेश


मंगल सूत्र
**********
जब तुम ने
मेरे गले मे डाला था
मंगल सूत्र जान गयी थी
कि मुझे तुम्हारे खूँटे से
बाँध दिया गया है
अब कभी ये बन्धन नहीं तोड सकती
तुम्हे हर पल सीने पर सजाये
अपनेजीवन पथ पर बढना होगा
और तुम्हारी उलीकी गयी परिधी मे
आज तक घूम रही हूँ
तुम्हारे नाम का मंगल सूत्र पहन कर


मेहंदी
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तुम्हारे साथ चलते
जब कभी हाथ की लकीरें
कुछ धुँधली पडने लगतीं
मैं रंग लेती मेहंदी से अपने हाथ
ताकि लोगों से छुपा सकूँ
इन फीकी पडती लकीरों को
और इस मेहंदी से
फूल और तरह तरह के चित्र
बना लेती
उन मे खो कर भूल जाती
तुम्हारी अवहेलना तुम्हारी हर बात
जो मुझे अच्छी नहीं लगती
मेहंदी नहीं मरने देती
मेरा उत्साह मेरा प्यार


चूडियाँ
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जानते हो ये चूडियाँ
किस लिये पहनती हूँ
ताकि इनकी खनखनाहट मे
याद रखूँ सात फेरों के वक्त
किये गये सात वचन
अपने कर्तव्य निभाते हुये
जब ये खनकती हैं
तो मैं भाग भाग कर
तुम्हारे आदेशों का पालन करती हूँ
और घर की रोनक
और खुशियों को कभी
कम नहीं होने देती।


पायल
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ये पायल ही है एक
जिसे मैने अपने लिये नहीं
तुम्हारे लिये ही पहना है
ताकि तुम कभी भूल जाओ
अपनी चौखट का दरवाज़ा
तो इसकी झँकार तुम्हें याद दिला दे
कि कोई है जो हर वक्त जी रही है
सिर्फ तुम्हारे लिये
और खीँच लाये तुम्हें मेरे पास
सजा लेती हूँ
अपने पाँव भी मेहंदी से
रंगोली की तरह
तुम्हारे घर आने की राह मे स्वागत हेतु


करवा चौथ
***********
ये भी जान लो कि मैं ये व्रत
किस लिये रखती हूँ
कि तुम मेरे इस प्रण का
यकीन करो कि
मैं तुम्हारे लिये कुछ भी कर सकती हूँ
सात जन्म का तो नहीं कह सकती
मगर इस जन्म मे
तुम्हारा साथ निभाने का प्रण लेती हूँ
और छू लेती हूँ तुम्हारे पाँव
इस आशा मे कि
तुम मुझे तन से नहीं मन से
स्वीकार करो और कुछ मोहलत दो
कि मैं अपने लिये भी
कुछ अपनी मर्जी के
आदेश पारित कर सकूँ
और तुम?
बस एक घूँट पानी पिला कर
अपना कर्तव्य पूरा कर लेते हो
आज व्रत तोडने से पहले
एक सवाल करना चाहती हूँ
क्या तुम भी मेरे लिये
इतने निष्ठावान हो
जिन्दगी मेरी है
और फैसले तुम लेते हो
क्या मुझे अपनी जिन्दगी के फैसले
खुद लेने का हक दे सकते हो?
क्या मैं अपनी तकदीर
अपने हाथ से लिख सकती हूँ?
आज देखना चाहती हूँ
तुम्हारी निष्ठा मेरे प्रति
मगर सदियों से ये सवाल
ज्यों का त्यों पडा है
तुम्हारे आदेश की प्रतीक्षा मे


08 October, 2009

दोहरे माप दंड ---कहानी [गताँक से आगे

पिछली बार आपने पढा
कि रिचा और रिया दोनो स्कूल मे इकठी पढती थीं । दोनो सहेलियाँ थी। रिया शहर मे और रिचा साथ लगते गाँव मे रहती थी। जिस दिन स्कूल मे छुटियाँ हुई उस दिन जब रिचा स्कूल से घर नहीं पहुँची तो उसके घर वालों को चिन्ता हुई। उसके पिता पोलिस मे केस दर्ज नहीं करवाना चाहते थे। सभी इसी सोच मे थे कि क्या किया जाये उसे कहाँ ढूँढा जाये। tतभी पता चला कि वो खून् से लथपथ खेत मे पडी है उसे असपताल लाया गया। पोलिस मे केस दर्ज हुया मगर रिचा के पिता ने उसे मना कर दिया कि किसी का नाम मत बताये क्योंकि उन्हें रिचा ने बता दिया था कि वो साथ के गाँव के ्रपंच का बेटा था रिचा घर आ गयी। मगर उसे किसी से बात करने की इजाजत नहीं थी वो अकेली अन्दर बैठी आँसू बहाती रहती उसकी सहेली रिया उससे मिलने आती है। रिचा रिया को बताती है कि कैसे उसके दिल मे एक लावा सा फूट रहा है घर वालों .समाज और उन दरिन्दों के लिये। औसके पढने पर भी प्रतिबँध लग जाता है रिया उसे आश्वासन देती है कि वो अपने माँ बाप को कह कर उसके घर वालों को समझायेगी। ्रिया के पिता के समझाने पर रिचा के पिता उसे घर मे ही पढने की इजाजत दे देते हैं उसकी शादी के लिये भी कोशिश शुरु हो जाती है रिया के पिता उसका रिश्ता अपने पडोसी रवि से करवा देते हैं जिसकी पत्नि की मौत हो चुकी हओ रवि अच्छा लडका है मगर उसकी माँ इस रिश्ते से खुश नेहीं थी और रिचा को तंग करती रहती थी। अब आगे पढिये-------



घर आ कर मै अपनी माँ की गोद मे सिर रख कर खूब रोई। क्या सच मे एक लडकी इतनी कमज़ोर और बेबस होती है?बिना किसी कसूर के हर तरफ से उसे ही सज़ा? मैने माँ और पिता जी को सारी बातें बतायी।फिर माँ और पिता जे के साथ दो तीन बार उनके घर गयी । पिताजी ने धीरे धीरी उसके पिता से उसके बारे मे बात की कि इसे अब स्कूल भेजना चाहिये मगर वो स्कूल भेजने के लिये किसी तरह भी राज़ी ना हुये।मगर पिता जी के बहुत समझाने पर उसके पिता उसे घर रह कर पढाने के लिये मान गये। उसने अब घर रह कर पढना शुरू कर दिया मै हर दूसरे तीसरे दिन उसके घर चली जाती । उसने पलस टू के बाद घर मे ही बी.ए करनी शुरू कर दी और मैने इन्जनीरिन्ग मे प्रवेश ले लिया। उसके माँ बाप उसके लिये लडका ढूँढने लगे। वो जल्दी से उसकी शादी कर देना चाहते थे ।अभी 18 साल की भी पूरी नहीं हुई थी। वो जहाँ भी बात चलाते, वहीं उसके अतीत की परछाई पहले पहुँच जाती। अब तो हम लोग भी चाहते थे कि उसकी शादी हो ही जाये तो सही रहेगा ।इन हालात मे वो अच्छी तरह पढ भी नहीं पा रही थी।

हमारे पडोस मे धर्मपाल जी रहते थे।उनके एक बेटा और दो बेटियां थी।उनका लडका रवि जिस कीदो वर्श पहले शादी हो चुकी थी,मगर शादी के बाद बहुएक बेटे को जन देते ही दुनिया से विदा ले गयी। छोटा सा बच्चा अपनी दादी के पास पलने लगा।रवि की नौकरी दिल्ली मे थी । उसके माँ बाप चाहते थे कि उसकी दोबारा शादी कर दें तो बच्चे को माँ मिल जायेगी ।एक दिन मेरी मम्मी ने ये रिश्ता सुझाया मेरे पिता जी ने रिचा के पिता से बात की। उन्हें क्या आपति हो सकती थी जानते थे कि उनकी बेटी को अब इस से अच्छा घर और लडका नहीं मिल सकता। उसे जो दाग लग गया है इस के साथ इसे कौन स्वीकार करेगा वही जिसमे खुद मे कोई कमी होगी। मगर रवि बहुत अच्छा लडका था पडोस मे होने के कारण हम लोग इकठे खेला भी करते थे मेर अच्छा दोस्त था वो। पिता जे ने और मैने रवि को समझाया तो वो भी मान गया।उसके घर मे सभी मान गये मगर उसकी माँ कुछ असमजस मे थी। रवि की हाँपर उसे भी मानना पडा। उसकी मां को भी यही बात सता रही थी कि लोग क्या कहेंगे कि ऐसी लडकी ही मिली थी इनके लडके को क्योंकि लडके की कोई भी कमी समाज को कमी नहीं लगती।मगर लडकी बेकसूर होते हुये भी अपराधी बन जाती है।लडके मे चाहे लाख अवगुण हों मगर लडकी 16 कला सम्पूर्ण चाहिये होती है। उनको ये भी था कि अभी अपनी लडकियों की शादियाँ करनी हैं तो उनके रिश्ते करने मे इस लडकी के कारण अडचने आयेंगी। लेकिन रवि के समझाने से उन्हें झुकना पडा।मै बहुत खुश थी इस रिश्ते से चाहे रवि एक बच्चे का बाप था मगर फिर भी हर तरह से रिचा के लिये अच्छा पति साबित होगा ये मुझे विश्वास था। वो बहुत संवेदन शील और सनझदार लडका था।वैसे भी उससे अच्छा लडका उसे और कोई मिल नहीं सकता था। शादी हो गयी और रिचा हमारे शहर मे आ गयी पडोस मे होने से मुझे तो खुशी थी ही मगर वो भी खुश थी ।

रवि ने दो महीने की चुटी ले रखी थी। उन दो महीनों मे रिचा के मुँह पर् रोनक लौटने लगी थी।ब्च्चे को वो ऐसे सम्भालती जैसे उसकी सगी माँ हो। शायद उसे ये भी एहसास हो गया था कि रवि एक अच्छा पति है जो उसकी भावनाओं का ध्यान रखता है तो उसे भी अपना ्र्तव्य अच्छी तरह से निभाना है।रवि ने उसे पूरा प्यार दिया उससे कभी उस हादसे का ज़िक्र नहीं किया ना ही उसे एहसास होने दिया कि उसमे कोई दोश है। समाज मे विरले ही ऐसे लोग होते हैं। अब रिचा को भी विश्वास होने लगा कि पाँचों उँगलियाँ बराबर नहीं होती समाज मे अच्छे बुरे सब तरह के लोग होते हैं। दो महीने की छुट्टी के बाद रवि दिल्ली चला गया अपनी ड्यूटी पर।उसका विचार था कि दिल्ली मे मकान ढूँढ कर फिर रिचा को साथ ले जायेगा। दूसरी बात कि रिचा तब तक बच्चे को सम्भालना नहलाना भी सीख लेगी। रवि की माँ पुराने विचारों की औरत थी। र्वि के कारण चाहे उसने शादी की रज़ामंदी दे दी थी मगर अन्दर ही अन्दर उसे रिचा का अतीत कचोटता रहता । आस पडोस की कोई औरत कभी सहानुभूति जताने के बहाने बात छेड लेती तो वो तिलमिला उठती। उसे रिचा का बन ठन कर रहना भी अच्छा न लगता था।बेटियों के रिश्ते की बात कहीं नहीं बनती तो रिचा के सिर भँडा फोड देती।* मै पहले ही कहती थीहमारी बेटियों को कोई अपनी बहु नहीं बनायेगा इस कुलटा के कारण । रवि के जाने के बाद वो उसे काफी रोकने टोकने लगी थी।,पर रिचा कोई जवाब न देती। कई बार मैं उसे बाज़ार ले जाती तो आते ही उसे ताने सुनाने लगती।---* मुझे तुम्हारा कहीं जाना अच्छा नहीं लगता।कहीं पहले जैसी कोई बात हो गयी तो हमारी भी नाक कटवायेगी।* रिचा अन्दर ही अन्दर आहत हो जाती।रवो को पत्र लिखती या फोन करती तो भी माँ की बातें न बताती। वो रवि की एहसान मंद थी कि कम से कम उसने उसका हाथ थामने की हिम्मत तो की।

रवि के कहने पर उसने आगे पढाई भी शुरू कर दी। रिचा उस दिन सारी रात सो न पाई थी।सुबह देर से आंम्ख खुली तो सास गर्म हो गयी।मगर वो कुछ न बोली।सरा काम जल्दी से खत्म किया। आज वो बाज़ार जाना चाहती थी।ागले हफ्ते रवि का जन्म दिन था उसके लिये कोई तोह्फा खरीदना चाह्ती थी।उसने अपनी ननद को साथ चलने के लिये कहा तो उसने मना कर दिया।------ * न बाबा न तेरे साथ नहीं जा सकती।मैं ही ला देती हूँ जो मंगवाना है।* *नहीं दीदी मैं अपनी पसंद से लेना चाहती हूँ।* उधर उसकी सास सुन रही थी ,बोल पडी * हाँ हँ इसे तो बाहर घूमने के लिये बहाना चाहिये। मायके मे भी तो ऐसे ही घूमती थी तभी तो बदमाश उठा कर ले गये।* *माँ क्या ऐसा खतरामुझे ही है भगवान से डरिये,अप बेटियों की मा होकर भी ऐसी बातें करती हैं। * कह कर रिचा अंदर चली गयी और रोने लगी।

आज मेरी दादी ने उसकी यही बात सुनी थी सास ने क्या कहा ये उन्होंने ध्यान नहीं दिया। जिस से दादी पर मुझे भी गुस्सा आ गया था। अपना गुस्सा शाँत होने पर मैने दादी को सारी बात बताई।कि उसकी सास किस तरह के ताने उसे देती है ।तब दादी को भी बुरा लगा। क्रमश: अगले दिन मैं अभी सोयी हुई थी कि पिता जी के कमरे से कुछ आवाज़ें आ राही थी मै उठ खडी हुई । उनके कमरे मे जा कर देखा तो रिचा की सास रो रही थी और रिचा सकते की हालत मे खडी थी। उनकी छोटी बेटी घर से गायब थी।जब वो सुबह पाँच बजे उठे तो आशा उनकी बेटी अपने बेड पर नहीं थी।इस लिये वो पिता जी के पास सहायता के लिये आयी थी। मैं जानती थी कि उसका किसी लडके के साथ अफेयर चल रहा है वो जरूर उसके साथ भाग गयी होगी।एक बार तो मन मे आया कि चुप रहूँ इसकी भी बदनामी हो तो रिचा का दर्द ये समझे। लेकिन मैं ऐसा न कर सकी। बदले की भावना से एक लडकी की ज़िन्दगी क्यों बर्बाद होने दूंम फिर रवि को कितना दुख होगा जब उसे पता चलेगा। मैने अपना शक पिता जी को बताया।पिता जी भी समझ गये। उन्होंने उन्हें समझा कर घर भेज दिया कि मैं देखता हूँ।अप वो रिचा के ससुर को ले कर थाने चले गये।थाने के एस़ एच़ औ पिता जी के दोस्त थे।उन्हों ने सारी बात सुन कर तुरन्त गुप चुप तरीके से कार्यवाई की और -23 घन्टे मे लडकी बरामद कर ली।मामला लडकी की इज़्जत का था सो केस दर्ज नहीं करवाया। लडकी घर वापिस आ गयी।

रिचा के घर मे आज सुबह से ही शाँति थी नहीं तो सुबह उठते ही रिचा के पीछे पड जाती थी। रवि को रात ही फोन कर दिया था।दोपहर तक वो पहुँचने वाला था। आज मुझे भी मौका मुल गया था और मैने सोच लिया था कि अब रिचा के दुखों का अन्त कर दूँगी। उसे सब कुछ बता दूँगी। दोपहर को वो घ आया मैने सोचा अभी खा पी ले बाद मे शाम को बात करूँगी। सारे शहर मी बात फैल गयी थी। शाम को पाँच बजे मैं रिचा के घर पहुँची। सभी एक कमरे मे बैठे थे।रवि अपनी बहन को डाँट रहा था मुझ से कोई लुकाव छुपाव तो था नहीं इस लिये बात चलती रही।थोडी देर बाद मैने अपनी बात शुरू की * देखो माँ जी जो हुया बहुत बुरा हुया।मगर सच पूछो तो रिचा के कारण आपकी कुछ इज़्जत बच गयी।क्यों कि पिता जी रिचा को अपनी बेटी मानते हैं।अज आपसे एक सवाल जरूर पूछना चाहूँगी कि आपने आज तक रिचा को इतना बुरा भला कहा रोज़ दिन मे सौ बार उसे आप उस बात का ताना देती मगर रिचा ने कभी उफ तक न की क्या उस बात मे रिचा का कोई कसूर था?। नहीं ना? आज आपकी बेटी के साथ जो हुया उसमे आपकी बेटी का कसूर है।

मुझे ये समझ नहीं आता कि एक औरत दूसरी औरत का दर्द क्यों नहीं समझती? क्यों उसके दुखों का कारण बन जाती है?* रवि हैरान सा मेरे मुँह की तरफ देख रहा था उसे तो कुछ पता नहीं था कि माँ रिचा के साथ कैसा सलूक करती है। *रवि,मैं जानती हूँ कि आप एक अच्छे इन्सान हैं। आपने रिचा को बहुत सम्मन और प्यार दिया मगर आपके जाने के बाद जो उसे सहना पडा वो अगर मैं होती तो कब की घर चोड कर चली जाती।ाब कहीं ऐसा न हो कि उसकी सहनशक्ति जवाब दे जाये इस लिये मैं एक बहन और दोस्त के नाते चाहती हूँ कि तुम रिचा को अपने साथ ले जाओ।* * नहीं नहीं बेटा मुझे माफ कर दो। मैं रिचा के पाँव पकड कर माफी माँगती हूँ कि मैने उसका दिल दुखाया है।* वो सच मुच रिचा के पाँ पकडने लगी। * नहीं नहीं मा जी मुझ पर पाप मत चढायें* वो पीछे हट गयी। रवि कब से सब कुछ सिन रहा था एक दम से उठा *रिचा चलो सामान बान्धो, हमे आज ही निकलना है।* * सुनो कोई मेरी भी सुनो।* रिचा जोर से बोली देखो रवि मुझे किसी से कोई शिकायत नहीं है। माँ जी ने मुझे जो भी कहा वो अपनी तरफ से सही हैं जो समाज से इन्होंने लिया सीखा वही कहा । वो समाज का हिस्सा हैं और समाज्के लोग दूसरों की इज़्जत को इज़्जत नहीं समझते झट से दूसरे की तरफ उँगली उठा देते हैं ये नहीं सोचते कि एक उंगली दूसरे की तरफ उठी है तो चार अपनी तरफ भी उठी हैं। फिर जब तक अपना हाथ न जले जलन का एहसास कैसे हो सकता है?

मुझे इतना ही बहुत है कि आपने कम से कम समाज की परवाह न करते हुये मुझे अपनाया,मेरे अतीत के साथ और अपने मन से।इसलिये आज मैं इस घर को अपने मन से अपनाना चाहती हूँ।माँ और पिताजी की बेटी बनना चाहती हूँ। आज किसी से कोई गिला शिकवा नहीं है।* कह कर वो चुप हो गयी मुझे लगा कि आज उसके अन्दर का सारा लावा बह गया है। आज वो बिलकुल शाँत और दृ्ढ लग रही थी। आज उसकी सास भी समझ गयी थी लेकिन तब जब अपनी इज़्जत पर बन आयी। *आज तक जिसने जो कहा मैं मानती रह, मगर आज आप सब को मेरी बात माननी होगी ।मैं अभी तक यहीं अपने घर मे ही रहूँगी।जब तक ये बच्चा भी कुछ बडा नहीं हो जाता और दोनो बहनों की शादी नहीं हो जाती।* रवि माँ की ओरे देख रहा था कि अब बताऔ रिचा अभागिन है या हम लोग? * माँ देखा हम कितने भाग्यवान हैं जो हमे रिचा जैसी लडकी मिली?।* आज रिचा के चेहरे पर फिर से वही विश्वास लौट आया था जिसने उसके अतीत को भगा दिया था। और र्मैं सोच रही थी कि काश ये समाज नारी के प्रति कुछ संवेदन शील हो सके कम से कम नारी तो नारी की भावनाओं को समझे।उसके साथ हो रहे अन्याय से लडे न कि खुद ही उससे अन्याय करने लगे। अपनी और पराई बेटी के लिये समाज के दोहरे मापदंड क्यों, अखिर क्यों।

समाप्त

05 October, 2009

दोहरे माप दंड ---कहानी [गताँक से आगे

पिछली बार आपने पढा कि रिचा और रिया दोनो स्कूल मे इकठी पढती थीं । दोनो सहेलियाँ थी। रिया शहर मे और रिचा साथ लगते गाँव मे रहती थी। जिस दिन स्कूल मे छुटियाँ हुई उस दिन जब रिचा स्कूल से घर नहीं पहुँची तो उसके घर वालों को चिन्ता हुई। उसके पिता पोलिस मे केस दर्ज नहीं करवाना चाहते थे। सभी इसी सोच मे थे कि क्या किया जाये उसे कहाँ ढूँढा जाये। tतभी पता चला कि वो खून् से लथपथ खेत मे पडी है उसे असपताल लाया गया। पोलिस मे केस दर्ज हुया मगर रिचा के पिता ने उसे मना कर दिया कि किसी का नाम मत बताये क्योंकि उन्हें रिचा ने बता दिया था कि वो साथ के गाँव के ्रपंच का बेटा था रिचा घर आ गयी। मगर उसे किसी से बात करने की इजाजत नहीं थी वो अकेली अन्दर बैठी आँसू बहाती रहती उसकी सहेली रिया उससे मिलने आती है। रिचा रिया को बताती है कि कैसे उसके दिल मे एक लावा सा फूट रहा है घर वालों .समाज और उन दरिन्दों के लिये। औसके पढने पर भी प्रतिबँध लग जाता है रिया उसे आश्वासन देती है कि वो अपने माँ बाप को कह कर उसके घर वालों को समझायेगी। अब आगे पढिये------------


घर आ कर मै अपनी माँ की गोद मे सिर रख कर खूब रोई। क्या सच मे एक लडकी इतनी कमज़ोर और बेबस होती है?बिना किसी कसूर के हर तरफ से उसे ही सज़ा? मैने माँ और पिता जी को सारी बातें बतायी।फिर माँ और पिता जे के साथ दो तीन बार उनके घर गयी । पिताजी ने धीरे धीरी उसके पिता से उसके बारे मे बात की कि इसे अब स्कूल भेजना चाहिये मगर वो स्कूल भेजने के लिये किसी तरह भी राज़ी ना हुये।मगर पिता जी के बहुत समझाने पर उसके पिता उसे घर रह कर पढाने के लिये मान गये। उसने अब घर रह कर पढना शुरू कर दिया मै हर दूसरे तीसरे दिन उसके घर चली जाती । उसने पलस टू के बाद घर मे ही बी.ए करनी शुरू कर दी और मैने इन्जनीरिन्ग मे प्रवेश ले लिया। उसके माँ बाप उसके लिये लडका ढूँढने लगे। वो जल्दी से उसकी शादी कर देना चाहते थे ।अभी 18 साल की भी पूरी नहीं हुई थी। वो जहाँ भी बात चलाते, वहीं उसके अतीत की परछाई पहले पहुँच जाती। अब तो हम लोग भी चाहते थे कि उसकी शादी हो ही जाये तो सही रहेगा ।इन हालात मे वो अच्छी तरह पढ भी नहीं पा रही थी।

हमारे पडोस मे धर्मपाल जी रहते थे।उनके एक बेटा और दो बेटियां थी।उनका लडका रवि जिस कीदो वर्श पहले शादी हो चुकी थी,मगर शादी के बाद बहुएक बेटे को जन देते ही दुनिया से विदा ले गयी। छोटा सा बच्चा अपनी दादी के पास पलने लगा।रवि की नौकरी दिल्ली मे थी । उसके माँ बाप चाहते थे कि उसकी दोबारा शादी कर दें तो बच्चे को माँ मिल जायेगी ।एक दिन मेरी मम्मी ने ये रिश्ता सुझाया मेरे पिता जी ने रिचा के पिता से बात की। उन्हें क्या आपति हो सकती थी जानते थे कि उनकी बेटी को अब इस से अच्छा घर और लडका नहीं मिल सकता। उसे जो दाग लग गया है इस के साथ इसे कौन स्वीकार करेगा वही जिसमे खुद मे कोई कमी होगी। मगर रवि बहुत अच्छा लडका था पडोस मे होने के कारण हम लोग इकठे खेला भी करते थे मेर अच्छा दोस्त था वो। पिता जे ने और मैने रवि को समझाया तो वो भी मान गया।उसके घर मे सभी मान गये मगर उसकी माँ कुछ असमजस मे थी। रवि की हाँपर उसे भी मानना पडा। उसकी मां को भी यही बात सता रही थी कि लोग क्या कहेंगे कि ऐसी लडकी ही मिली थी इनके लडके को क्योंकि लडके की कोई भी कमी समाज को कमी नहीं लगती।मगर लडकी बेकसूर होते हुये भी अपराधी बन जाती है।लडके मे चाहे लाख अवगुण हों मगर लडकी 16 कला सम्पूर्ण चाहिये होती है। उनको ये भी था कि अभी अपनी लडकियों की शादियाँ करनी हैं तो उनके रिश्ते करने मे इस लडकी के कारण अडचने आयेंगी। लेकिन रवि के समझाने से उन्हें झुकना पडा।

मै बहुत खुश थी इस रिश्ते से चाहे रवि एक बच्चे का बाप था मगर फिर भी हर तरह से रिचा के लिये अच्छा पति साबित होगा ये मुझे विश्वास था। वो बहुत संवेदन शील और सनझदार लडका था।वैसे भी उससे अच्छा लडका उसे और कोई मिल नहीं सकता था। शादी हो गयी और रिचा हमारे शहर मे आ गयी पडोस मे होने से मुझे तो खुशी थी ही मगर वो भी खुश थी ।रवि ने दो महीने की चुटी ले रखी थी। उन दो महीनों मे रिचा के मुँह पर् रोनक लौटने लगी थी।ब्च्चे को वो ऐसे सम्भालती जैसे उसकी सगी माँ हो। शायद उसे ये भी एहसास हो गया था कि रवि एक अच्छा पति है जो उसकी भावनाओं का ध्यान रखता है तो उसे भी अपना ्र्तव्य अच्छी तरह से निभाना है।रवि ने उसे पूरा प्यार दिया उससे कभी उस हादसे का ज़िक्र नहीं किया ना ही उसे एहसास होने दिया कि उसमे कोई दोश है। समाज मे विरले ही ऐसे लोग होते हैं।

अब रिचा को भी विश्वास होने लगा कि पाँचों उँगलियाँ बराबर नहीं होती समाज मे अच्छे बुरे सब तरह के लोग होते हैं। दो महीने की छुट्टी के बाद रवि दिल्ली चला गया अपनी ड्यूटी पर।उसका विचार था कि दिल्ली मे मकान ढूँढ कर फिर रिचा को साथ ले जायेगा। दूसरी बात कि रिचा तब तक बच्चे को सम्भालना नहलाना भी सीख लेगी। रवि की माँ पुराने विचारों की औरत थी। र्वि के कारण चाहे उसने शादी की रज़ामंदी दे दी थी मगर अन्दर ही अन्दर उसे रिचा का अतीत कचोटता रहता । आस पडोस की कोई औरत कभी सहानुभूति जताने के बहाने बात छेड लेती तो वो तिलमिला उठती। उसे रिचा का बन ठन कर रहना भी अच्छा न लगता था।बेटियों के रिश्ते की बात कहीं नहीं बनती तो रिचा के सिर भँडा फोड देती।* मै पहले ही कहती थीहमारी बेटियों को कोई अपनी बहु नहीं बनायेगा इस कुलटा के कारण । रवि के जाने के बाद वो उसे काफी रोकने टोकने लगी थी।,पर रिचा कोई जवाब न देती। कई बार मैं उसे बाज़ार ले जाती तो आते ही उसे ताने सुनाने लगती।---* मुझे तुम्हारा कहीं जाना अच्छा नहीं लगता।कहीं पहले जैसी कोई बात हो गयी तो हमारी भी नाक कटवायेगी।*

रिचा अन्दर ही अन्दर आहत हो जाती।रवो को पत्र लिखती या फोन करती तो भी माँ की बातें न बताती। वो रवि की एहसान मंद थी कि कम से कम उसने उसका हाथ थामने की हिम्मत तो की। रवि के कहने पर उसने आगे पढाई भी शुरू कर दी। रिचा उस दिन सारी रात सो न पाई थी।सुबह देर से आंम्ख खुली तो सास गर्म हो गयी।मगर वो कुछ न बोली।सरा काम जल्दी से खत्म किया। आज वो बाज़ार जाना चाहती थी।ागले हफ्ते रवि का जन्म दिन था उसके लिये कोई तोह्फा खरीदना चाह्ती थी।उसने अपनी ननद को साथ चलने के लिये कहा तो उसने मना कर दिया।------ * न बाबा न तेरे साथ नहीं जा सकती।मैं ही ला देती हूँ जो मंगवाना है।* *नहीं दीदी मैं अपनी पसंद से लेना चाहती हूँ।* उधर उसकी सास सुन रही थी ,बोल पडी * हाँ हँ इसे तो बाहर घूमने के लिये बहाना चाहिये। मायके मे भी तो ऐसे ही घूमती थी तभी तो बदमाश उठा कर ले गये।* *माँ क्या ऐसा खतरामुझे ही है भगवान से डरिये,अप बेटियों की मा होकर भी ऐसी बातें करती हैं। * कह कर रिचा अंदर चली गयी और रोने लगी। आज मेरी दादी ने उसकी यही बात सुनी थी सास ने क्या कहा ये उन्होंने ध्यान नहीं दिया। जिस से दादी पर मुझे भी गुस्सा आ गया था। अपना गुस्सा शाँत होने पर मैने दादी को सारी बात बताई।कि उसकी सास किस तरह के ताने उसे देती है ।तब दादी को भी बुरा लगा।
क्रमश:

03 October, 2009

दोहरे माप दँड
पिछली बार आपने पढा
कि रिचा और रिया दोनो स्कूल मे इकठी पढती थीं । दोनो सहेलियाँ थी। रिया शहर मे और रिचा साथ लगते गाँव मे रहती थी। जिस दिन स्कूल मे छुटियाँ हुई उस दिन जब रिचा स्कूल से घर नहीं पहुँची तो उसके घर वालों को चिन्ता हुई। उसके पिता पोलिस मे केस दर्ज नहीं करवाना चाहते थे। सभी इसी सोच मे थे कि क्या किया जाये उसे कहाँ ढूँढा जाये। tतभी पता चला कि वो खून् से लथपथ खेत मे पडी है उसे असपताल लाया गया। पोलिस मे केस दर्ज हुया मगर रिचा के पिता ने उसे मना कर दिया कि किसी का नाम मत बताये क्योंकि उन्हें रिचा ने बता दिया था कि वो साथ के गाँव के ्रपंच का बेटा था रिचा घर आ गयी। मगर उसे किसी से बात करने की इजाजत नहीं थी वो अकेली अन्दर बैठी आँसू बहाती रहती उसकी सहेली रिया उससे मिलने आती है। आब आगे पढिये-------


दोहरे माप दँड

मै जैसे ही रिचा के घर पहूँची सामने आँगन मे उसकी बेबे{माँ} बैठी थी।
*बेबे नमस्ते।* मैने उन्हें प्यार से बुलाया।
* नमस्ते बेटी आओ।* एक अप्रयातिश खुशी के साथ उनकी आँखें भर आयी।
*रिचा कहाँ है मै उस से मिलने आयी हूँ हम लोग रात ही लुधियाना से आये हैं।*
मुझे बहुत दिन से तेरा इन्तज़ार था रिचा ने बताया था कि तुम लोग लुधियाना गये हो। बेटी उसे समझाओ । वो अन्दर बैठी अपनी तकदीर पर आँसू बहाती रहती है।* कहते हुये उनके आँसू बह गये।
मेरा दिल अन्दर तक एक पीडा से भर गया। बेशक अभी छोटी थी दुख देखा नहीं था मगर समाज मे रहती थी । औरत की, एक माँ की बेबसी देख कर दिल तडप गया।
जैसे ही अन्दर जाने लगी,उसके पिता से सामना हो गया।मेरी नमस्ते का जवाब भी उन्होंने बडी उपेक्षा से दिया। मन को झटका लगा, शायद् मेरा आन भी उन्हें अच्छा नहीं लगा था।पुरुश को किसी भी चीज़ से अधिक अपने घर की इज्जत और अहं प्यारा होता है। अपनी आबरू के आगे औलाद का प्यार दर्द उन्हें नहीं पिघला सकता। शायद घर की बात बाहर न जाये इस लिये उन्हें रिचा का किसी से मिलना अच्छा नहीं लगता था।
कैसा निर्दयी बाप है! बेटी पर क्या गुज़र रही है कैसे अकेली इस सदमे मे घुट रही है? उसकी संवेदनाओं से अधिक समाज का डर है। मन विशाद से भर गया।
मैं अन्दर गयी तो रिचा दिवार की तरफ मुँह करके लेटी हुई थी।
*रिचा<*, मैने उसका हाथ पकडते हुये उसे पुकारा। वो अपलक छत की ओर देख रही थी एक महीना हो गया था इस हादसे कोमगर उसके चेहरे पर अब भी खौफ था। बहुत कमजोर हो गयी थी।उस भयानक हादसे को सुन कर किसी की भी रूह काँप जाये फिर उसने तो झीला था।
*रिचा, क्या मुझ से नाराज़ हो?*
मैने धीमे से उसे हिलाया,उसने मेरी तरफ मुड कर देखा और फफक कर मेरे गले लग गयी।अँ सू ऐसे बहने लगे जैसे बरसाती नदी बान्ध तोड कर बिखरती है। मैने जोर से उसे भीँच लिया जैसे एक माँ अपने बच्चे को भीँचती है। मै उसे रोने देना चाहती थी।पीडा का कुछ अंश तो ये आँसू बहा ही लेते हैं।यूँ तो औरत की नियती ये आँसू ही हैं,इन्हीं से जीवन का ताना बाना बुनती है,मगर अबला नारी अकेली रो भी नहीं सकती उसे रोने के लिये भी एक कन्धा चाहिये होता है ।
मैं बेशक छोटी थी मगर दुनिया को समझने लगी थी। मैने सोच लिया कि चाहे कुछ भी हो मैं उसे कन्धा दूँगी। उसका साथ नहीं छोडूंगी।
*रिचा बस बहुत हो गया ,संभालो अपने आप को।* मैने उसे पेछे सिरहाना रख कर बैठनी मे मदद करते हुये कहा।
*जानती हो जितना दुख मुझे इस हादसे से था उस से भी अधिक इस बात का कि मेरी जान से प्यारी सहेली भी मेरे पास नहीं है,मुझे लगा शायद वो भी दुनिया की भीड मे खो गयी है।*
*तुम जानती थी माँ का आप्रेशन था। क्या मुझ पर भी विश्वास नहीं रहा?*
*विश्वास?जब अपने खून के रिश्तों मे ही मेरा द्र्द समझने का एहसास नहीं तो और किसी से क्या उमीद रखी जा सकती है।* उसने एक लम्बी साँस भर कर कहा
*रोचा अगर एक हादसे से विश्वास टूटने लगेगा तो कैसे चलेगा।जीवन तो अपने आप मे एक हादसा है । अगर आदमी मे मनोबल रहेगा तभी वो जी सकता है।*
अच्छा बताओ अब जख्म ठीक हैं?* मैने उसके शरीर पर नज़र दौदाते हुये कहा।
*तन के ज़्ख्म तो भर गये हैं,पर मन के ज़ख्मों मे इतना मवाद भर गया है कि मौत ही इससे छुटकारा दिला सकती है।*
*देखो रिचा,मरना तो सब को एक दिन है ,ागर मरने से पहले जीना सीख लें तभी मरने पर भी शान्ति मिलेगी। बस इन्साम को निराश नहीं होना चाहिये।*
*सब कहने की बातें हैं। कहने और सहने मे बहुत अन्तर है।एक अफसाना है दूसरा सच्चाई,यथार्थ अगर ये हादसा उस घटना तक ही सीमित रहता तब भी कभी न कभी इस दुख से उभर आती,मगर उसके बाद जो हो रहा है---- अपनों का समाज का इपेक्षापूर्ण व्यवहार,तिरस्कार उस से कैसे उबर सकती हूँ?*
*जानती हो जैसे ही मुझे होश आया, मै एक दम चीख मार कर उठी,मन था कि अभी उन दरिंदों को गोली से उडा दूँ। उन का घिनौना अत्याचार सहा था मैने,म्रे रोम रोम से एक लावा उठ रहा था। मैने जोर से कहा कि मैं उन्हें गोली मार दूँगी मुझे एक पिस्तौल चाहिये--- तभी पोता ने जोर से मुह पर थप्पड मारा-*चुप रह चुपचाप बेड पर पडी रह, नाक तो कटवा ही दी अब और क्या करेगी।*
सच कहूँ उस समय ,इझे मेरा बाप उन बदमाशों से भी निर्दयी लगा।मेरा क्या कसूर था?पिता के चेहरे पर क्रोध और मेरे बेटी होने की शर्मिन्दगी की काली परछाई देख कर दिल टूट गया था। लगा उन दुश्टों से तो हारी ही अपने आप से और जीवन से भी हार गयी हूँ।*
---*माँ की आँखों मे दया ढूँढी वहाँ द्या से अधिक बेबसी के साये थे। वो भी औरत थी इस आदम समाज की वंदिनी एक इज्जतदार पति की कर्तव्यनिष्ठ पत्नी!जो चाहते हुये भी कुछ नहीं कर सकती थी।---
--*भाई ने तो नज़र उठा कर देखना भी गवारा नहीं समझा।उसे तो एक ही चिन्ता थी कि वो लोगों से नज़र कैसे मिलायेगा।मुझे तो ये उमीद थी कि मैं उसकी इकलौती लाडली बहन हूँ वो अभी जायेगा और उन दुश्टों कोगोली से उडा देगा। मगर उसे भी अपनी इज्जत और भविश्य ही प्यारा था। *----
*मेरे साथ अन्याय हुया है ,मुझे न्याय कौन दिलायेगा? कौन?*
*रिचा शाँत हो जाओ।* सच मे इतने दिनो से उसके अन्दर का लावा फूट रहा था।
*किसी को एहसास नहीं कि मैं किस तरह का संताप झेल रही हूँ।कैसे पर कटे पक्षी की तरह छटपटा रही हूँ।* और वो फूट फूट कर रोने लगी थी।
अच्छा अब चुप हो जाओ। तुम अपनी पढाई क्यों नहीं शुरू कर रही हो? मैने बात बदलने की कोशिश की।
*अब कौन भेजेगा मुझे स्कूल ? पिताजी ने मना कर दिया है*
मुझे एक झटका सा लगा। क्या इस की जिन्दगी बरबाद कर देना चाहते हैं?
*देखो तुम अपने आप को सम्भालो तुम्हारा कोई कसूर नहीं है इस लिये किसी से डरने की जरूरत नहीं।तुम घर पर रह कर तो पढ सकती हो ना? पढाई शुरू करो आगे देखते हैं। मैं अपने मम्मी पापा को ले कर आऊँगी वो तुम्हारे पिता से बात करेंगे।चिन्ता मत करो सब सही हो जायेगा और मै अब आती रहूँगी। * इसके बाद मै उसे माँ के आप्रेशन के बारे मे बताती रही ।बेबे चाय ले कर आयी चाय पी ही थी कि तभी मेरे पिता जी लेने आ गये। क्रमश;



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