25 January, 2010

जीना सीख लिया है। [कविता]
चल रही है दोनो
मखमली सी चाहतें
और
और खार सी जिन्दगी
समानान्तर रेखाओं की तरह
दूरी बना कर
उठता है
दोनो के बीच
एक समुद्र
कुछ अनुभूतियाँ और
कुछ संवेदनाये लिये
कभी कभी बह जाता है
कागज़ की पगडंडियों पर
शब्दों की दो किरणें
उधार ले कर
शायद दोनो ने
जीना सीख लिया है
कागज़ के साथ


46 comments:

Dr. Smt. ajit gupta said...

जिन्‍दगी में पल रही है मखमली सी चाहते, लेकिन वास्‍तव जीवन में तो खार ही है। अच्‍छा चिंतन है बधाई।

Suman said...

nice

अरूण साथी said...

शायद नहीं, सचमुच जीना सीख लिया.
बहुत अच्छा

Kulwant Happy said...

मुबारक हो..कुछ नया सीखने के लिए।

विनोद कुमार पांडेय said...

jindagi ki raah par aise hi aage badhana hota hai aur fir dhire dhire chalana saikh hi jana hota hai ek sundar abhivyakti..badhiya rachana..prnaam swikaar karen..

अनिल कान्त : said...

Chaahatein aur Zindagi ki samanantarta....

Achchhi Rachna

GK Awadhiya said...

"कागज की पगडंडियों पर
शब्दों की दो किरणें ..."

सुन्दर कल्पना!

Udan Tashtari said...

गहरी भावाव्यक्ति!

डॉ. मनोज मिश्र said...

कागज़ की पगडंडियों पर
शब्दों की दो किरणें
उधार ले कर
शायद दोनो ने
जीना सीख लिया है
कागज़ के साथ..
बहुत सुंदर.

खुशदीप सहगल said...

और निर्मला जी,

हम आपको देख कर जीना सीख रहे हैं...

ये फ़लसफ़ा अपना लिया है..

पहन कर पांव में ज़ंज़ीर भी रक्स किया जाता है,
आ बता दे के तुझे कैसे जिया जाता है...

(अभी आपकी पिछली कहानी पेंडिंग पड़ी है रात को आराम से पढ़ूंगा...)

जय हिंद...

आशुतोष दुबे 'सादिक' said...

बहुत सुन्दर रचना है.
हिन्दीकुंज

पी.सी.गोदियाल said...

कभी कभी बह जाता है
कागज़ की पगडंडियों पर
शब्दों की दो किरणें
उधार ले कर
शायद दोनो ने
जीना सीख लिया है
कागज़ के साथ..

बहुत सुन्दर भाव निर्मला जी !

सुलभ 'सतरंगी' said...

कुछ अनुभूतियाँ और कुछ संवेदनाएं...

बहुत जरुरी है इन्हें बांटते रहना.

अजय कुमार said...

सुंदर प्रस्तुति , अच्छी रचना

sangeeta swarup said...

यही जिंदगी है....समन्वय सी करती हुई...
सुन्दर अभिव्यक्ति....बधाई

सर्वत एम० said...

आपने सभी लेखन से जुड़े लोगों की व्यथा इस कविता के माध्यम से व्यक्त कर दी. सच, जीवन में एक तरफ कांटे ही कांटे होते हैं.

भारतीय नागरिक - Indian Citizen said...

जिन्दगी की यही रीत है, हार के साथ ही जीत है.

भारतीय नागरिक - Indian Citizen said...

जिन्दगी की यही रीत है, हार के साथ ही जीत है.

रंजना [रंजू भाटिया] said...

बेहतरीन बढ़िया कहा आपने निर्मला जी ..

दिगम्बर नासवा said...

खुशी और गम ......... दोनो के साथ रहना भी सीख लेती है जिंदगी ........ गहरी प्रस्तुति है आपकी रचना .......

वन्दना said...

jeevan darshan ko bakhubi bayan kiya hai ..........zindagi phoolon ki sez hi nhi kanton bhari dagar bhi to hai aur dono sath sath hi chalte hain.

ताऊ रामपुरिया said...

बहुत गहन अभिव्यक्ति.

रामराम.

पं.डी.के.शर्मा"वत्स" said...

शायद जीवन इसी का नाम है....
बहुत ही भावपूर्ण अभिव्यक्ति!!
आभार्!

डॉ टी एस दराल said...

चाहत और जिंदगी, सचमुच दोनों का मेल बहुत मुश्किल से होता है, गर नामुमकिन नहीं।
अच्छी संवेदनशील रचना।

प्रसन्न वदन चतुर्वेदी said...

लाजवाब... बहुत ही अच्छी रचना.....

JHAROKHA said...

Adaraneeya Nirmala ji,
apakee kahaniyon kee hee tarah apakee kavitayen bhee bahut samvedanatmak hotee hain.shubhkamnayen.
Poonam

सुरेन्द्र "मुल्हिद" said...

waakai jeena seekh liya hai...
kaagaz ke saath!

राज भाटिय़ा said...

बहुत सुंदर कविता
आप को गणतंत्र दिवस की मंगलमय कामना

PRAN SHARMA said...

SUNDAR BHAAV AUR SUNDAR SHABDON
KE MEL SE BANEE AAPKEE KAVITA
BAHUT ACHCHHEE LAGEE HAI.

Mithilesh dubey said...

बहुत खूब माँ जी , जीना सीख लिया है कागज के साथ, लाजवाब ।

Apanatva said...

bahut sunder abhivyakti!
गणतंत्र दिवस की आपको बहुत शुभकामनाएं

हर्षिता said...

बहुत ही अच्छी रचना।

दीपक 'मशाल' said...

kash har koi aapki tarah hi jeena seekh leta Maasi... to kitne bewajah ke jhagde na hote dunia me... khali dimaag shaitan ka ghar jo hota hai na..
गणतंत्र दिवस की शुभकामनायें....
जय हिंद... जय बुंदेलखंड...

गिरिजेश राव said...

मुक्त छन्द के विरोधी जरा यह प्रभाव ला कर दिखाएँ !

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

मकमली रचना पढ़वाने के लिए आभार!

नया वर्ष स्वागत करता है , पहन नया परिधान ।
सारे जग से न्यारा अपना , है गणतंत्र महान ॥

गणतन्त्र-दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ!

M VERMA said...

उधार लेकर
शायद दोनों ने
जीना सीख लिया है
काग़ज के साथ
बेहतरीन

वाणी गीत said...

कागज की पगडंडियों पर फैला अनुभूतियों और एहसासों का सागर शब्दों की जुबां में ...

योगेश स्वप्न said...

makhmali chahaten.........aur khar si zindgi...........wah wah. bahut umda abhivyakti.

Sadhana Vaid said...

बहुत ही सुन्दर अभिव्यक्ति ! मखमली चाहतों और खार सी ज़िंदगी के प्रतिमान बहुत खूबसूत और सच्चे लगे | यही जीवन की निर्मम सच्चाई है | बहुत बहुत बधाई |

विनोद कुमार पांडेय said...

गणतंत्र दिवस की बहुत बहुत हार्दिक बधाई!!!

महेन्द्र मिश्र said...

गणतंत्र-दिवस की मंगलमय शुभकामना...

sanjeev kuralia said...

जीना सीख लिया है
काग़ज के साथ
बेहतरीन....!

गणतंत्र-दिवस की मंगलमय शुभकामना...

Babli said...

बहुत सुन्दर रचना ! आपको और आपके परिवार को गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनायें!

वन्दना अवस्थी दुबे said...

गणतंत्र दिवस की शुभकामनायें.

Devendra said...

हाँ, मखमली चाहतों और खार सी जिंदगी के बीच कागज ही पुल का काम करता है...वरना यह जिंदगी कितनी नीरस होती न!

रज़िया "राज़" said...

सुंदर। भावपुर्ण।

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