21 January, 2010

संजीवनी कहानी  अगली कडी
पिछली कडियों मे आपने पढा मानवीएक महत्वाकाँक्षी ,अधुनिक विचारों की औरत है।\उसका करियर खराब न हो और फिगर खराब न हो इस लिये अपने बच्चे को जन्म न दे कर किराये की कोख से बच्चा लिया मगर उसे भी माँ जैसा प्यार न दे सकी । पूरी कहानी मे वो बेटा विकल्प उसे पत्र दुयारा उसकी गलती का एहसास करवा रहा है--- आगे
इसी गम मे पिता जी को एक दिन दिल का दौरा पडा। आपके साथ उस समय एक आध मुलाज़म को छोड कर कोई नहीं था। होता भी कैसे? तुम कभी किसी के दुख सुख मे शरीक हुयी होती तो। तुम ने घबरा कर मुझे फोन किया। मैं पहुँचा तो तुम पिता जी के बेड के पास बैठी रो रही थी। मुझे देखते ही तुम उठी और मेरे गले लग कर  फूट फूट कर रोने लगी। अंदर तक भीग गया मैं। पिता जी की आँखों मे पहली बार हलकी सी सकून की एक किरण देखी। शायद तु7म तब भी एक बेटे के गले नहीं लगी थी बल्कि अपनी खरीदी हुयी वस्तु का प्रयोग कर रही थी। फिर भी बहुत अच्छा लगा कि कम से कम तुम्हें ये तो महसूस हुया कि जीवन म्के ऐसे पल भी आते हैं जब हमे रोने के लिये एक कन्धे की जरूरत पडती है। मुझे कुछ आशा भी हुई कि तुम अब अपनो का महत्व समझोगी।*
मानवी की आँखें नम हुई जा रही थीं ---- सच कहा है विकल्प ने उसे तब किसी की जरूरत महसूस हुई थी जो इस दुख की घडी मे उसका साथ दे सके। कई बार विकल्प को भी इस की जरूरत पडी होगी मगर वो समझ न पाई--- पत्र फिर से आगे पढने लगी---

*पिता जी कुछ संभले तो उन्हें घर ले आये। मैने लम्बी छुट्टी ले ली थी,क्यों कि इस दुनिया मे एक ही इन्सान मेरा अपना था----उन की खातिर मैं कुछ भी कर सकता था आप से समझौता भी। तभी से आपके साथ  सहज् रहने की कोशिश करता। बहुत देर बाद उस दिन हम तीनों ने इकट्ठे खाना खाया था मुझे तुम से बातें करते देख पिता जी बहुत खुश होते। तुम्हारी बातें करियर से ले कर मल्टीनेशनल कम्पनी के बारे मे ही होती। मक़िं चाहता था कि तुम मुझ से मेरे बारे मे भी पूछो कि बेटा तुम अकेले कैसे रहते हो, खाना कहाँ खाते हो, अच्छा लगता है कि नहीं , अपनी सेहत का ध्यान रखते हो कि नहीं आदि आदि।*
*उस दिन हम तीनो खाना खा रहे थे तो पिता जी बोले,"मानवी देखो विकल्प हमारा कितना ध्यान रखता है।*
*वो तो ठीक है,इसे अब अपनी ड्यूटी पर भी जाना चाहिये। नई नई नौकरी है ,इतनी छुट्टी लेना भी ठीक नहींइससे करियर पर असर पडता है।*
*तुम ने ापनी बात कह दी मगर पिता जी की आँखों मे एक साया सा लहराया फिर भी उन्होंने साहस बटोरा---
*क्या ऐसा नही हो सकता कि हम दोनो रिटायरमेन्ट लेकर बेटे के साथ रहें।*
*सुधाँशू तुम होश मे तो हो?* फिर न जाने क्या सोच कर तुम ने बात बनाने की कोशिश की
* देखो हम अच्छे भले बेटे पर बोझ क्यों बनें?ाभी मेरी प्रोमोशन होने वाली है। मुझे अभी और आगे जाना है।* कह कर तुम उठ गयी।
पिता जी ने मेरा हाथ थपथपाया और हम दोनो पिता जी के कमरे मे देर तक बातें करते रहे और तुम स्टडी मे रही।
उस दिन पिता जी ने मेरे साथ बहुत बातें की। सब से अधिक तुम्हारे बारे मे तुम्हारे सपनों और उडान के बारे मे। शायद वो एक भूमिका बना रहे थे कि मैं आपको समझूँ। पिता जी तुम से कितना प्यार करते थे-- एक पल के लिये भी तुम्हें नाराज़ या उदास नहीं देख सकते थे। उस दिन उन्हों ने मुझ से वादा लिया था कि अगर उन्हें कुछ हो जाये तो मैं आपका ध्यान रखूँ चाहे कुछ भी हो। सच मानो मुझे उस दिन आपसे ईर्ष्या  होने लगी थी पिता जी को मुझ से अधिक आपकी चिन्ता थी।*
पढते हुये मानवी के सब्र का बाण्ध टूटने लगा था--- आँसो अविरल बह चले थे। सुधाँशो को याद कर । सक़्च मे सुधाँशू का प्यार सच्चा था। उसने तो कभी सुधाँशू के बारे मे कभी ऐसे सोचा ही नहीं था कि सुधाँशू के लिये कभी कुछ किया हो आज उसे बहुत कुछ विचलित करने के लिये काफी था। फिर पत्र पर न्गाह गयी

*माँ मेरे चाहने जीवन मे कभी हुया है कुछ भी? पिता जी ठीक हुये ,मैं लखनऊ लौट गया। मैं अपने जीवन के कोरे कागज़ पर रंग भरने की सोच ही रहा था, मैं पिता जी की खुशी के लिये आपके साथ रिश्ते सुधारने की कोशिश करना चाहता था। वषों से रिश्तों पर जमी बर्फ को पिघलाने  की कोशिश कर रहा था फोन पर तुम से बात करता। मगर मन की मन मे रह गयी। कुछ दिन बाद ही पिता जी के हमे छोड जाने की खबर ने मुझे तोड दिया। हम दोनो के बीच का सेतु टूट गया था। तुम्हाक़्रे दुख को मैं समझ सकता था मगर मेरे दुख को समझने वाला कोई नहीं था।
* मैं साये की तरह तुम्हारे साथ रहना चाहता था । पिता जी के बचन को निभाना चाहता था। तुम से प्रेम बाँटना चाहता था--- तुम्हें सांत्वना देना चाहता था--- मगर तुम्हें अपनी निज़ी ज़िन्दगी मे दूसरो का हस्तक्षेप पसंद नहीं था। तुम ने मौन धारण कर लिया। तुम ने एक बार भी मेरे सिर पर हाथ नहीं रखा,सांत्वना एक शब्द नहीं कहा। मैं अनाथ हो गया था।
* अंतिम रस्मे पूरी हो गयी। रिश्ते दार जा चुके थे
 रहते भी क्यों जैसी औपचारिकता आप निभाती आयीं थीं वही वो निभा कर वले गये।* क्रमश:


30 comments:

ललित शर्मा said...

जीवन के सत्य का बोध कराती कहानी
आगे की कड़ी का ईंतजार है। आभार



चिट्ठाकार चर्चा

कब तक युवा रहेगा बसंत?

अजय कुमार झा said...

उफ़्फ़ ये क्रमश : जान ले के छोडेगा , कहानी बहुत बढिया तरीके से आगे बढ रही है सभी पात्र सजीव हो उठे हैं और आगे पढने की जिज्ञासा बढ गई है ,अगली कडी का इंतजार है
अजय कुमार झा

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

अगली कड़ी की प्रतीक्षा रहेगी।

श्यामल सुमन said...

रोचक प्रस्तुति - अगली कड़ी के इन्तजार में।

सादर
श्यामल सुमन
09955373288
www.manoramsuman.blogspot.com

डॉ. मनोज मिश्र said...

यह कड़ी भी सुंदर लगी,आगे का इन्तजार है.

ताऊ रामपुरिया said...

बहुत प्रवाह है कहानी में, क्रमश: इस प्रवाह को तोडता है. पर ब्लाग जगत के हिसाब से पोस्ट की लंबाई का भी ख्याल रखा जाना निहायत जरुरी है.

रामराम.

काजल कुमार Kajal Kumar said...

अगले भाग की प्रतीक्षा रहेगी.

sada said...

सत्‍यता के बेहद निकट बेहतरीन प्रस्‍तुति ।

वन्दना said...

kahani dharapravah chal rahi hai .........agli kadi ka intzaar hai .

Razi Shahab said...

behtareen aage.......ka intezaar hai

rashmi ravija said...

बहुत ही अच्छी जा रही है,कहानी..पूरी रोचकता के साथ...अगली कड़ी का इंतज़ार .

अजित वडनेरकर said...

अच्छी चल रही है कथा।

अजित वडनेरकर said...

अच्छी चल रही है कथा।

दिगम्बर नासवा said...

कहानी में सवेदना गहराती जा रही है ...... आगे की प्रतीक्षा रहेगी ..

रंजना said...

MARMIK VA ROCHAK....JARI RAKHEN...HAM PRATIKSHARAT HAIN..

KAVITA RAWAT said...

Jiwan ki sachai bayan karti kahani ka agle bhag ki pratiksha mein.......... Maa ji such mein aapka lekhan ke puri nishta se samparpit bhav rakhti hain.... bahut achha lagta yah sochkar ki aap hamari MAA hain....

Apanatva said...

Bhavbheenee kahanee . Agalee kadee ka intzar rahega

शोभना चौरे said...

निर्मला दी
सारे अंक अभी मैंने एक साथ ही पढ़ डाले नेट थोडा प्राब्लम दे रहा था तो पढ़ ही नही पाई थी ।
अंतर्मन को मथती बहूत ही सुन्दर प्रवाहमयी कहानी .अगली कड़ी का इंतजार .

Suman said...

nice

शुभम जैन said...

rochak kahani...agli kadi ke intjar me...
shubham...

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Pran Sharma said...

Aap jitna achchha padhya likhtee
hain utnaa hee achchhaa gadhya bhee.
kahani kaa yah bhaag achchha
lagaa hai.asha hai ki anya bhaag
bhee marmsparshee honge.

राज भाटिय़ा said...

एक कडबा सत्य लगती है, बहुत सुंदर अगली कडी का इंतजार

अनामिका की सदाये...... said...

Nirmala ji lekhak ki kahani ki safalta isi baat par nirbhar karti hai ki kahani ka aadi, madye aur ant uchit samey par utara jaye aur aise mod par chhod di jaye jis se pathak ki ruchi bani rahe jise aap bakhubi nibha rahi hai. bahut flow me chal rahi hai kahani aur utsukta bhi badhti ja rahi hai...aage intzaar rahega.

sangeeta swarup said...

अजीब मन;स्थिति है मानवी की...बहुत अच्छी तरह से समेटे हैं भाव ...आगे इंतज़ार है

Jogi said...

good story...curiously waiting for the next part..

Arvind Mishra said...

आगे क्या हुआ ?

AKHRAN DA VANZARA said...

nice story
waiting 4 next part

---- rakesh verma

Udan Tashtari said...

बेहतरीन प्रवाह...मानवी का मन समझने का प्रयास कर रहा हूँ...जारी रहिये!

वाणी गीत said...

मानवी और विकल्प की पीड़ा एक ही व्यक्ति से जुडी होने के बावजूद कितनी अलग है ...
रोचक प्रवाह ...!!

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

संजीवनी धरातल से जुड़े हुए परिवेश का बखूबी बोध करा रही है!

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