19 January, 2010

संजीवनी----- अगली कडी
पिछली कडियों मे  आपने पढा कि मानवी एक महत्वाकाँक्षी महिला हैं। जो अपने करियर और फिगर को बनाये रखने के लिये बच्चे को जन्म देना नहीं चाहती। मगर पति की इच्छा देखते हुये किराये की कोख से एक बच्चा लिया ।कैसे बच्चा माँ का प्यार दुलार न मिलने से उससे दूर होता चला गया । पति की मौत के बाद जब वो अकेली हो गयी तो विकल्प ने उसे माँ के कर्तव्य समझाने और अपने रोश का कारण बताने के लिये मानवी को एक चिठी लिखी। मानवी वो चिट्ठी पढ रही है------ [ असल मे पूरी कहानी ही एक चिट्ठी के माधयम से कही गयी है अगर विकल्प ये बातें मानवी के सामने आ कर कहता तो शायद उसे देख कर मानवी का अहं सिर उठालेता और वो इस पर अधिक सोच न सकती। इसे सामने रख कर ही पत्र के माध्यम से ये कहानी कही है]--- 
आगे
*माँ बात यहीं खत्म नही हुयी। उसके बाद मेरा पालन पोषण भी किराये की आया के हाथों ही हुया। तुम्हारे पास तो समय ही नहीं था मेरे लिये। मुझे खिलाना पिलाना नहलाना यहाँ तक कि सुलाना भी आयाके हाथ ही रहा। पिताजी जरूर मेरे साथ कुछ समय बिताते , कई बार वो भी तुम्हें नागवार गुजरता-----*\
पढते पढते मानवी को कई पल याद आये जब विकल्प को उसकी जरूरत थी मगर उसके पास समय भी नहीं था। समय हो सकता था अगर उसे दिल से उस बच्चे के लिये प्यार होता। वात्सल्य की एक  किरण भी उसके मन मे कभी फूटी होती। उसे याद आया कि जिस दिन वो बच्चे को घर ले कर आयी थी, तब वो दोनो ही खुश थे सुधाँशू इस लिये कि उसे वारिस मिल गया था और वो इस लिये कि अब उसे बच्चे को जन्म देने का झंझट नहीं करना पडेगा। अगले दिन विकल्प कुछ बिमार हो गया। उसने बिस्तर पर उल्टी कर दी बस फिर क्या था मानवी का मूड उखड गया था।
"मैने पहले ही कहा था कि मुझे ये बच्चो वाला झंझट अच्छा नहीं लगता। कितनी बदबू आने लगी है कमरे मे। "
सुधाँशू चुप रहे मानवी ने आया को आवाज़ दी कि बच्चे और बिस्तर को उठा कर ले जाये । अगले दिन फिर जब सुधाँशू ने बच्चे को साथ सुलाना चाहा तो मानवी नाराज़ हो गयी। उसे अपनी निज़ी ज़िन्दगी मे भी किसी और का होना अच्छा नहीं लगा। फिर कई बार ऐसा हुया जब बिमारी मे बच्चे को माँ की जरूरत होती है तो वो कभी दफ्तर मे तो कभी किसी पार्टी मे होती। बस आ कर आया से बच्चे का हाल पूछ लेती जब खेलता होता तो जरा सा बुला लेती। सोचते सोचते मानवी फिर से पत्र को पढने लगी।  उसे अब अपनी गलती का एहसास होने लगा था शायद --

 माँ मुझे नहीं लगता कि मेरे जन्म दिन के इलावा आप कभी मेरे लिये एक खिलौना भी लाई हो। आप आफिस चली जाती,तो आया अपने बच्चे को ले आती। उसे गोद मे ले कर  बालों को सहलाते हुये ,मेरे हिस्से का आधा दूध पिला देती। इस तरह चार साल का होते होते बहुत कुछ समझने लगा था।
कई बार मुझे नींद नहीं आती, मैं उसी तरह लोरी सुनना चाहता था जैसे आया अपने बच्चे को गोद मे ले कर सुनाती थी । मैं आपसे बतियाना चाहता, खेलना चाहता मगर आपके पास समय नहीं होता । आया के साथ सोते जब मुझे कभी नींद नहीं आती तो आया कडक आवाज़ मे मुझे डांम्ट देती और मैं डर से दुबक जाता। डर उसका बच्चा भी जाता मगर उसे वो अपनी छाती से लगा कर चुप करा लेती। क्या आप कल्पना कर सकती हैं मेरी त्रासदी का? आपकी आधुनिक सोच ने मेरा बचपन का सुख मुझ से छीन लिया। माँ के वात्सल्य से अतृप्त मेरी आत्मा आज भी उस संताप को झेल रही है*

पढते पढते मानवी के सब्र का बान्ध टूट गया आँखें उन सभी क्षणो को याद कर पश्चाताप मे बह रही थी। उसने कभी ऐसे सोचा ही नहीं था । भावुकता को वो कमजोरी समझती थी । सुधाँशू जैसा प्यार करने वाला पति पा कर ही वो दुनिया के बाकी रिश्तों की महक भूल गयी थी। अज भी उसे याद है कई बार विकल्प से कभी वो खुश मूड मे होती तो उसे अपने पास बुला लेती उस दिन सुधाँशू बहुत खुश होता और विकल्प को साथ सुला लेता मगर एक दो दिन बाद ही मानवी उकता जाती और फिर से उसे आया के पास भेज देती। वो पत्र छोड कर खिदकी मे आ कर खडी हो जाती है सामने सर्वेन्ट रूम के आंगन मे आया अपने बच्चे को गोद मे ले कर कैसे दुलार रही है, उसे लोरी सुना रही है और बच्चा खिलखिला कर उस से अठखेलियाँ कर रहा है--- विकल्प ने भी इसी तरह कई बार मचलना चाहा होगा  मगर उसने डाँट  कर उसे चुप करवा दिया था। उसी आया के घर के सामने बन्धी गाय कैसे अपने छोटे बच्चे को अपनी जीभ से चाट कर सहला रही थी--- उस मे कभी ऐसी ममता क्यों नही आयी----- क्या था जिसने मुझे इन भावनाओं से दूर रखा---- शायद उसका स्वार्थ था वो खुद को साबित करना चाहती थी व्यक्तित्व, करियर, और सौंदर्य पर ही उसने अपने ये अनमोल पल गंवा दिये थे  ---- खिडकी से हटने का उसका मन नहीं हो रहा था। बछडे और आया के बच्चे ने उसे विकल्प के बचपन की त्रास्दी और बाद मे उसके प्रति विकल्प के आक्रोश को समझा दिया था। आज उसे महसूस हुया कि औरत को कम से कम माँ का फर्ज़ नज़र अन्दाज़ नहीं करना चाहिये था। एक टीस उठी उसके मन मे विकल्प की उस अवस्था को याद कर उसके अन्दर कुछ पिघलने लगा था। फिर वो पत्र ले कर बैठ गयी
*माँ
मैं आया के बच्चों के संग बडा हुया खेला। उन से गन्दी बातें और गालियाँ सीखा । बडा होते होते तुम्हारे लिये मन मे आक्रोश पनपने लगा। तुम्हारा कहना न मानना ,बार बार तुम्हें तंग करना मेरी आदत मे शुमार हो गया। अपने अन्दर का आक्रोश निकालने के लिये मैं ऊल जलूल हरकतें करता ताकि तुम्हें दुखी कर सकूँ। पिता जी परेशान रहने लगी। फिर तुम्हारी राय पर मुझे रेज़िडेंशल स्कूल मे भेज दिया गया। मैं उस समय तीसरी कलास मे था। मुझे आज भी वो दिन याद है जब पिता जी मुझे छोदने आये तो उनकी आँखों मे आँसू थे। बहुत रोये थे मुझे गले से लगा कर शायद तुम भी उनके प्यार के बदले उन्हे कुछ नहीं दे सकी थी
। यूँ तो मैं हास्टल मे खुश था। पिता जी रोज़ फोन कर लेते और बातों बातों मे तुम्हारे लिये मेरे मन की मैल को साफ करने की कोशिश करते। तुम्हारी मजबूरियां बढा चढा कर बताते। हर माह मुझे एक दो दिन के लिये घर ले आते। उनसे जो प्यार मिला उसी के आसरे3 यहां तक पहुँचा हूँ। वो हर बार एक बात कहना नहीं भूलते* बेटा पढ लेना मुझे लाज मत लगवाना,तुझे बता नहीं सकता तुम मेरे लिये क्या मायने रखते हो मगर कुछ मजबूर हूँ*।कहते हुये वो आँख भर लेते। आज समझ आता है कि उनकी मजबूरी तुम थी। मैं बस उन्हें दुखी नहीं देख सकता था शायद इसी लिये इतना पढ गया*
अन्दर ही अन्दर शायद पिता जी को मेरा गम खाता रहा-- शायद तुम्हारी निष्ठुरता भी----। चलो मैं आई  ए एस बन गया। लखनऊ मे मेरी पोस्टिन्ग हुयी। अब घर आना कुछ कम हो गया था। मेरे और आपके सम्भन्ध कभी प्यार दुलार या सम्मान के नहीं रहे।*
* इसी गम मे पिता जी को एक दिन दिल का दौरा पडा। आपके साथ उस समय एक आध मुलाज़िम को छोड कर कोई नहीं था। आता भी कैसे? तुम कभी किसी के ------ क्रमश:

29 comments:

Arvind Mishra said...

क्या जैवीय सम्बन्ध की कोई सानी नहीं है ? अगर विकल्प की माँ जैवीय होती तो .....तो भी क्या यह दूरी होती ?

विनोद कुमार पांडेय said...

मानवी के चरित्र चित्रण के ज़रिए आप ने समाज के कुछ उन महिलाओं की ओर इशारा किया है जो अपने रंग,रूप और बाहरी दिखावे के खातिर ममता का गला घोंट देती है...पर ममता एक बार तो जागती ही है अब शायद विकल्प के पत्र को पढ़ कर कुछ दिल पसीज जाए पर अब विकल्प का वो बचपन तो आने वाला नही बस एक अफ़सोस के साथ नाम की माँ बन सकती है....एक मार्मिकता से भरी बेहद खूबसूरत कहानी...आगे क्या होता है...बेसब्री से इंतजार है..प्रणाम..

डॉ. मनोज मिश्र said...

खूबसूरत कहानी,अगली कड़ी का इन्तजार...

Suman said...

nice

Udan Tashtari said...

संपूर्ण बहाव में दो अंक एक साथ पढ़ गये फिर...जारी रहिये.


इन्तजार पर लाकर रुकती है आपकी कहानी!!!

महफूज़ अली said...

Mom.... यह कहानी बहुत अच्छी लगी......

लखनऊ से बाहर होने कि वजह से देरी से आया..... माफ़ी चाहता हूँ....

Apanatva said...

khush hoo aaj ye soch kar ki asal jeevan me mera aise patro se paalaa nahee padaapar dookhee hoo ki masoom baccho ko aisee soch ke rahate kis dukh ke dour se gujarna padta hai. bachpan ke scar aasanee se nahee mitate .

वन्दना said...

kahani apni gati banaye huye hai......agli kadi ka intzaar hai

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

मैं तो यह सोच रहा हूँ कि क्या कोई महिला ऐसी भी हो सकती है?

ताऊ रामपुरिया said...

बहुत बढिया प्रवाह है कहानी का, आगे के लिये उत्सुकता है.

रामराम.

अजय कुमार said...

रोचक और अच्छा प्रवाह है कहानी का

सुरेन्द्र "मुल्हिद" said...

interstinng flow...

दिगम्बर नासवा said...

मानवी संबंधों को लेकर आपकी लेखनी कमाल कर देती है ......... विकल्प और मानवी के संबंधों के बीच बुनी इस कहानी को पढ़ रहा हूँ ........ सोचा था पूरी कहानी के बाद कुछ लिखूंगा पर आपकी संवेदनशील कलाम से निकले शब्द कई बार रुला गये तो में भी लिखने को मजबूर हो गया ........... शायद इतना मन को छूने वाला मैने पहली बार पढ़ा है ..... आधुनिकता और ग़ूढ संबंध में रिश्ता कैसे पल्लवित होता है ...... उसकी दिशा तो हम ही निर्धारित करते है .......... आगे की प्रतीक्षा है ........

arvind said...

pravahmay,rochak, khubasurat our marmik kahaani.

Devendra said...

रोचकता बनी हुई है

Babli said...

बहुत ही सुन्दरता से आपने कहानी को प्रस्तुत किया है! पढ़कर बहुत अच्छा लगा! अब तो अगली कड़ी का बेसब्री से इंतज़ार रहेगा!

अनिल कान्त : said...

Waiting For Next Part...

sangeeta swarup said...

भावप्रधान कहानी....आगे इंतज़ार है....

Kusum Thakur said...

कहानी बहुत अच्छी लगी . प्रतीक्षा है अगले अंक की !!

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

संजीवनी की यह कड़ी भी बहुत बढ़िया रही!

sada said...

बहुत ही सुन्‍दरता के साथ आगे बढ़ रही प्रस्‍तुति के लिये आभार ।

ललित शर्मा said...

खूबसूरत कहानी,अगली कड़ी का इन्तजार...

राज भाटिय़ा said...

निर्मला जी युरोप मे एक नही अनेक किस्से है ऎसे, इस लिये यहां बच्चो का मां बाप से प्यार नही रहता ओर साल मे एक बार मदर डे ओर फ़ादर डे मना लेते है,कहानी बहुत अच्छी ओर रोचक लगी.
धन्यवाद

Dipak 'Mashal' said...

Maasi itna bhaavuk kar diya is kahani ne ki kah nahin sakta...

वाणी गीत said...

यशोदा के प्यार को झुठलाते हुए भावविभोर कर दिया आपकी इस कहानी ने ...

Kulwant Happy said...

अविराम चलें..

हरकीरत ' हीर' said...

अगर विकल्प मानसी के सामने आकर ये बातें कहता तो शायद उसका अहं सर उठा लेता .....कितनी गहरी बात कह दी निर्मला जी .....!!

Babli said...

आपको और आपके परिवार को बसंत पंचमी की हार्दिक शुभकामनायें!

saraswat shrankhla said...

prernasprad rachna..

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