17 January, 2010

संजीवनी
*इन्विट्रो फर्टेलाईजेशन* जैसे अविष्कार ने आज कल जिस तरह एक व्यापार का रूप ले लिया है,जैसे कि कुछ लोग तो सही मे औलाद चाहते हैं इस लिये कोख किराये पर लेते हैं, मगर कुछ आधुनिक सोच की युवतियाँ जो केवल अपने करियर के लिये और अपने फिगर को बचाये रखने के लिये इस खोज का लाभ उठा रही हैं, उस के कुछ गलत परिणाम कुछ भावनात्मक पहलू भी हैं जिसे ध्यान मे रख कर ये कहानी लिखी गयी है।
संजीवनी {कहानी} अगली कडी   

पहली कडी मे आपने पढा कि मानवी के, उसके पति सुधाँशू की मौत के बाद, बेटे से सम्बन्ध अच्छे नहीं रहे थे।आज जब उसे बेटे विकल्प का पत्र मिला तो वो हैराम हुई, विकल्प ने लिखा था कि वो पत्र घर जा कर फुरसत मे ही पढै। वो घर आ कर उसका पत्र पढने लगी। अब आगे------
    मानवी ने दरवाज़ा अन्दर से बन्द किया और बेड रूम मे पत्र ले कर बैठ गयी। पत्र खोला---
माँ
माँ लिखते हुये खुद पर हैरत हो रही है। मम्मी कहूँ तो शायद् ठीक  रहेगा। क्यों कि पश्चिम के आधूनिकवाद की ओढनी--- नहीँ--- कवच पहन कर आप मम्मी कहलाना ही पसंद करेंगी। मुझे लगता है कि अब समय आ गया है कि आपको अपने 27 वर्षों का लेखा जोखा दूँ जो आपने मेरे लिये किया है। बेशक मेरी बातें आज आपको कडवी लगेंगी मगर बिना सुने आप समझ ही नहीं पायेंगी कि मुझे आपसे शिकायत क्यों रहती है। हम दोनो का रिश्ता सहज क्यों नहीं रहा। मैं वर्षों से जमे मन मे विष को निकालने का एक अवसर माँगना चाहता हूँ और चाहता हूँ कि हमारा रिश्ता हमेशा के लिये माँ-बेटे का पवित्र रिश्ता बन जाये। सब से पहले आपको ये बताना चाहता हूँ कि मैं आपके साथ सहज क्यों नहीं रहता।"
"माँ ये समझने के लिये पहले माँ के अर्थ और उसके वात्सल्य को समझना जरूरी है। माँ सृष्टी की अनुपम रचना है। इस पवित्र रिस्ज्ते के लिये वो अपने आप को मिटा देती है। मैं माँ के जितने रूप जानता हूँ--- वो बताता हूँ, उनमे से तुम खुद तय करना कि तुम कौन सी माँ हो"
एक माँ देवकी होती है जो बच्चे को जन्म देती है। वो गर्भ धाराण से नौ माह तक बच्चे को पेट मे छिपाये, उसे अपने खून से सींचती है। पहले दिन से जब बच्चा कोख मे आता है वो उसकी कल्पना मात्र से रोमाँचित, पुलकित महसूस करती है। उसके भविश्य के लिये सपने बुनने लगती है। नौ माह तकलीफें सह  कर भी उसके माथे पर शिकन तक नहीं आती । पेट मे बच्चे  की जरा सी हलचल उसके मन मे उमंग भर देती है। यहीं से बच्चा बहुत कुछ सीखता है। यहाँ से उसे प्यार की संवेदना का एहसास होता है।अभिमन्यू ने चक्रव्यूह भेदना माँ के पेट मे ही सीखा था।गर्भ से बाहर आते ही बच्चा सब से पहले माँ क स्पर्ष पहचानता है।खून के रिश्ते के साथ साथ वो दोनो संवेदनाओं से भी बन्ध जाते हैं। इसलिये वो माँ से बहुत प्यार करता है। लेकिन तुम ने अपने करियर , और तुम्हारी फिगर खराब न हो, तुम ने सन्तान को जन्म देने का अवसर खो दिया। फिर सन्तान के प्यार की चाह कैसी? अगर मुझे खरीदा भी तोेक वस्तु बना कर रख लिया।"
   " माँ के दूसरे पावन रूप को जानता हूँ वो है यशोधा माँ , जो बच्च्3ए को जन्म तो नहीं देती मगर अपने आँचल की छाँव देती है, पालन पोषण करती है, रातों की नीँद ,ापना सुख चैन उसके लिये लुटा देती है। बच्चे की किलकारिओं मे संसार का सारा सुख पा लेती है। उसकी जरा सी तकलीफ इन माँओं को बहुत बडा दुख लगता है। प्यार तुआग ममता से सराबोर माँ का संरक्षण पा कर बेटा सदा के लिये उसका ऋणी हो जाता है। उस माँ के आँचल की छाँव जीवन भर उसे सहलाती रहती है, उसकी लोरियों का संगीत, लय मे वात्सल्य का अनुराग उसे माँ से बान्धे रखता है। मगर हम दोनो के रिश्ते मे वो भी सुरताल नहीं बना।"
"तीसरी माँ होती है सौतेली माँ।सौतेली माँ भी अगर बच्चे को प्यार नहीं दे पाती तो उसके पीछे भी कई कारण होते हैं उसके लिये वो अकेली ही दोषी नहीं होती। उसे शादी का सुख भोगे बिना अपने कुछ सपनों अरमानों को उस बच्चे के लिये कुरबान करना पडता है ,जिस के लिये और भी बहुत से कारण हैं। फिर भी बहुट सी सौतेली माँये  अपने सौतेले बच्चों से प्यार करती हैं। उनकी तफ्सील मे न जा कर यही कहूँगा कि वो शायद परिस्थितिओं मे बुरी बन जाती है। सपनो के टूट जाने का क्षोभ कभी न कभी उसके व्यवहार मे उभर आता है। मगर तुम्हारे साथ तो ऐसा कुछ भी नहीं हुया। मेरे कारण तुम ने जीवन से कोई समझौता नहीं किया तुम्हारे कोई सपने नहीं टूटे बल्कि मुझे ले कर अपने सपने पूरे किये अपने करियर के लिये मम्तव को छोड दिया।"
"माँ बुरा मत मानना , मुझे आज तक ये समझ नहीं आया कि तुम्हें कौन सी माँ समझूँ? वैसे भी आपको रिश्तों नातों से मोह ही नहीं है। बाकी रिश्तेदारों से इसलिये मेल जोल नहीं रखा कि वो आपकी  पद प्रतिष्ठा का लाभ न उठायें। उन सब को आप मतलवी समझती हैं। आपने भौतिक सम्पदाओं को ही जीवन माना है और उसी मे आप निवेश करती हैं। जीवन मे प्यार सम्मान और रिश्ते पाने के लिये मानवीय संवेदनाओं प्यार और त्याग का निवेश करना पडता है।"
"नीम का पेड लगा कर आम पाने की आशा कैसे की जा सकती है?ापने मातहतों का सैल्यूट पा कर आप गर्व करती हैंपर क्या उन अपने अधीन्स्थ के अतिरिक्त कभी किसी क सम्मान पाया? मैं आप पर अंगुली नहीं उठा रहा मगर ये स्दमझाने की कोशिश कर रहा हूँ कि हम दोनो मे कौन सा प्यार है? किस सम्मान की आशा आप मुझ से करती हैं उसमे आपने क्या निवेश किया? मगर मैं फिर भी चाहता हूँ कि मैं आपके करीब आऊँ। आपसे प्यार करूँ शायद करता भी हूँ तभी तो ये कोशिश कर रहा हूँ कि आप मुझे समझें, प्यार दें।"
"मैं हैरान हूँ कि आपने मेरे पिता जी से प्यार किया। इसका कारण भी शायद पहले उनका रुतवा और रईस परिवार ही था या शायद कच्ची उम्र का तकाज़ा था कि प्यार कर बैठी। मगर पिता जी ने आपके प्यार को बखूबी निभाया। अपने जीवन से आपके लिये सब समझौते किये और उसी समझौते का परिणाम हूँ मैं।"
आदमी अपने सुख के लिये कठिन परिस्थितिओं मे कितनी आसानी से विकल्प ढूँढ लेता है--- अपने स्वार्थ के लिये दूसरे की बलि चढाने वाला विकल्प---- हाँ वही बलि का बकरा विकल्प हूँ मैं। पिता को अपने लिये वारिस चाहिये था मगर आप आधुनिक नारी  अपने करियर, सौंदर्य और फिगर को बच्चे के लिये दाँव पर नहीं लगा सकती थी। महज अपने पति की इच्छा के लिये आपने विकल्प ढूँढ लिया----*किराये की कोख *।"
मेरी नीँव ही धन दौलत,स्वार्थ,मजबूरी, और तृष्णाओं की रेत पर रखी गयी। कैसे भूल सकता हूँ कि मैं अपनी जन्म देने वाली माँ की मजबूरी और दूसरी माँ उन मजबूरिओं की खरीदार के बीच एक व्यवसायी डील का प्रोडक्ट हूँ।"
जिस वैग्यानिक ने इस *इन्विट्रो फर्टेलाईजेशन् {जिसे आज कल *किराये की कोख *के रूप मे देखा जाने लगा है} उसने कभी कल्पना भी नहीं की होगी कि उसका ये अविष्कार लोगों के स्वार्थ के चलते एक व्यापार बन जायेगा। इस तरह मैं किसी की चाहत नहीं बल्कि खरीदी गयी वस्तु बन गया। इस अमीर वंश को आगे बढाने के लिये एक गरीब वंश का अन्त हो गया। माँयही नहीं फिर मेरा आगे का सफर शुरू हुया, असली कहानी तो वहीं से शुरू होती है।------ क्रमश:
 

33 comments:

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

कहानी के पूरा होने के पहले ही उस की आलोचना कर रहा हूँ। कृपया धृष्टता के लिए क्षमा करें। कहानी में लम्बा पत्र एक साथ प्रस्तुत कर देने के शिल्प ने कहानी की गति में व्यवधान पैदा कर दिया है। इतना लंबा पत्र मेरे विचार से कोई भी माँ एक साथ नहीं पढ़ सकती। वह कुछ पंक्तियाँ या एक पैरा पढ़ती और फिर फ्लेश बैक में जरूर चली जाती। उसे खुद याद आता अपना भूतकाल और पुत्र के प्रति व्यवहार।

पूरी कहानी की प्रतीक्षा है।

Dr. Smt. ajit gupta said...

सचमुच पत्र कुछ ज्‍यादा ही लम्‍बा हो गया है। इस कारण कहानी के स्‍थान पर आलेख लग रहा है। एक बात और मन में आ रही है, कि जिन माओं ने अपने कोख में रखकर, अपनी नौकरियां छोड़कर बच्‍चे को बड़ा किया है वे क्‍या माँ को सम्‍मान दे रहे हैं? जब बच्‍चे सम्‍मान ही नहीं देना चाहते तभी तो माँ या महिला ऐसे फैसले लेती है।

काजल कुमार Kajal Kumar said...

आगे की प्रतीक्षा रहेगी...

निर्मला कपिला said...

ादरनीय दिवेदी जे व दा़ गुपता जी आपका सुझाव सही है मुझे कहानी को तब लिखते हुये नहीं लगा था मगर आज पोस्ट करते हुये जरूर लगा है कि इसमे क्या कमी रह गयी है अगले अन्क मे कुछ सुधार करूँगी । मगर बाद मे इस कहानी को एक बार फिर से जरूर लिखूँगी और मुझे लगता है इसका एक लघु उपन्यास बनेगा। आपके सुझाव के लिये मार्गदर्शन के लिये बहुत बहुत धन्यवाद । आगे से भी आशा करती हूँ आपका ये स्नेह बना रहेगा।

Razi Shahab said...

intezaar hai aur aage ka....

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

निर्मला जी,
आप सुझावों को सकारात्मक रूप में लेती है। इसी से सार्वजनिक रूप से उन की कमी बता देने की हिम्मत भी हो जाती है। वर्ना .......

Suman said...

nice

sangeeta swarup said...

आज नारी आगे बढ़ने की चाह में अपनी ममता को भी दांव पर लगा देती है..इसका बहुत सटीक चित्रण किया है....
द्विवेदी जी की बात से सहमत होते हुए भी आगे की कहानी का इंतज़ार है...

Devendra said...

वाह रोचक मार्मिक
सारा सार तो पत्र में ही था ...!
इन्विन्त्रो फ्र्तेलैजेशन ...(अरे चाहे जो हो बहुट कठीन नाम है मैं लिख भी नहीं पा रहा)..व्यापार को करारा थप्पड़.
विज्ञानिक उपलब्धि का बेजा इस्तेमाल हमेशा हानिकारक रहा है.
अच्छा लिख रहीं हैं...अगले अंक की प्रतीक्षा रहेगी.

Arvind Mishra said...

IVF तकनीक के सामवेशन के कारण यह विज्ञान कथा का भी रूप ले रहे है ....

डॉ. मनोज मिश्र said...

बहुत सुंदर,कहानी की प्रतीक्षा रहेगी.

राज भाटिय़ा said...

दिनेश जी की बात से सहमत हुं, ओर जब मां अपनी सही ममता नही दे सकती तो बच्चा ऎसे ही सोचता है, बहुत रोचक, अगली कडी का बेसब्री से इंतजार है

डॉ टी एस दराल said...

निर्मला जी, बहुत महत्त्वपूर्ण मुद्दा उठाया है , आपने।
लेकिन इनविट्रो फ़र्तिलाइज़ेशन का इस्तेमाल केवल आधुनिकता का प्रतीक ही नहीं है।
अक्सर यह एक ज़रुरत होती है जहाँ किसी एक पार्टनर में कमी की वज़ह से या बिना कमी के भी किसी भी वज़ह से गर्भ धारण नहीं हो पाता।वहां ये तकनीक बहुत उपयोगी साबित हुई है।
लेकिन दुरूपयोग तो किसी भी सुविधा का हो सकता है, और निंदनीय है।

वन्दना said...

kahani bahut hi badhiya chal rahi hai ............agli kadi ka intzaar hai.

पी.सी.गोदियाल said...
This comment has been removed by the author.
पी.सी.गोदियाल said...
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पी.सी.गोदियाल said...

आज का एक बेहद संवेदनशील मुदा कहानी के माध्यम से आपने उठाया, निर्मला जी ! बच्चे का उस अंदाज में सोचना जायज है ! मुझे याद है जब मै तीसरी कक्षा में पढता था, मेरा एक सहपाठी जो बोर्डिंग में रहता था किस तरह अपने माँ-बाप को कोश्ता था ! अपने सुख के लिए बच्चे की भावनाओं को जो माँ-बाप अपनी जवानी में इस तरह कुचलते है वे बुढापे में इस बात की शिकायत करते है कि उन्हें उनके बहु बेटे ने ओल्ड एज होम में रख छोड़ा क्योंकि उसका उनके परती वो लगाव नहीं होता !

अनामिका की सदाये...... said...

aadarniye nirmala ji...mujhe aapki is kahani ko padhne ka avsar mila me khud ko saubhagyeshali samajhti hu..bahut acchhi lag rahi he kahani aur aage padhne ki ichha teevr ho rahi hai..

baat patr k lambe hone ki he to mujhe lagta hai iski lambayi itni honi hi chahiye thi..varna bina background k aage ki kahani ko samjha jana mushkil hoga.

chhote muh badi baat kar rahi hu so kshama prarthi hu...kahi.n kahi.n typing mistakes hai kahani me means hindi shabd theek se nahi likhe gaye hai. jo kahani ki sundarta par asar dalte hai. pls. dhyan rakhe. aur meri baat buri lagi ho to ek baar fir se maafi chahungi aur aage k liye saavdhan rahungi.

apki Anamika

rashmi ravija said...

अच्छी जा रही है,कहानी...आगे का इंतज़ार

Apanatva said...

jis mudde ko aapne uthaya hai bahut accha hai
agalee kadee ka intzar hai.

मनोज कुमार said...

कहानी में रोचकता है। अगली कड़ी का इंतज़ार।

Yashwant Mehta said...

इस तकनीक के बारे में तो मुझे जानकारी थी
इसका यह प्रयोग हो सकता हैं यह जानकारी नहीं थी

Yashwant Mehta said...

इस तकनीक के बारे में तो मुझे जानकारी थी
इसका यह प्रयोग हो सकता हैं यह जानकारी नहीं थी

Yashwant Mehta said...

इस तकनीक के बारे में तो मुझे जानकारी थी
इसका यह प्रयोग हो सकता हैं यह जानकारी नहीं थी

विनोद कुमार पांडेय said...

माँ को समर्पित एक पत्र माँ की एक पहचान बता देता है..बेहद भावनात्मक भाव से लिखा गया यह खत..सुंदर भाग पर यह तो पत्र में सिमट गया अब जल्द से अगली कड़ी प्रस्तुत कीजिए..

Dipak 'Mashal' said...

Dwivedi ji ki baat to theek bhi hai kintu Dr. smt.Ajit Gupta kahani ko theek se samajhne ke bajaye apne nazariye se dekh rahee hain.... agar dunia me kuchh maa ya adhikansh maaon ko beton se pyar nahin milta to iska matlab ye to nahin ki maa apna dharm nibhana chhod den... karele ka paudha kadwe fal paida karne ke dar se fal dena nahin chhodta. kaha bhi gaya hai ''poot kapoot sune hain jag me, mata nahin kumata...''
ye kahani bhavishya me surrogate mother ki help se paida hue bachche aur uski maa ke beech me rishte ko lekar likhi gayi hai... aapse nivedan hai is baat ko dhyaan me rakhen.
Jai Hind...

वाणी गीत said...

करिअर के लिए ममत्व को दांव पर लगाने वालों को सोचने पर मजबूर कर रही है यह कहानी ...

ममता और स्नेह से वंचित एक बेटे की करुण कथा के आगे बढ़ने का इन्तजार है ....!!

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

कहानी में रोचकता बरकरार है!
आपकी शैली को नमस्कार है!!

sada said...

बहुत ही सुन्‍दर लेखन, आभार ।

श्रद्धा जैन said...

marmik kahani hai
aajkal waqayi suvidhao ka durproyg hone laga hai
lekin kabhi ye majburi bhi hoti hai

abhi tak to sirf ek hi paksh dekha hai ki maa swarthi hai aur bete ko shikayat
magar shayad koi aur pahlu nikle

aage ki kahani ka intezaar rahega

रंजना said...

Mujhe nahi laga ki patra ka yah vistaar kahin se bhi anuchit hai...Vastutah yah patra katha kee prishbhoomi ko hi aage badhata hai ,use gati deta hai....
Mera anurodh hai ki is kram ko badhit na karen...aise hi chalne den...

Ek atimahatvpoorn vishay ko saarthakta se katha ke maadhyam se uthaya hai aapne...jaaree rakhen..agle bhaag kee utsukta se prateeksha hai...

sanjeev kuralia said...

bahut sunder ...badhaaee

शहरोज़ said...

समय-अभाव के कारण तल्लीनता से कहानी न पढ़ सकने का दुख है, क्षमा कीजिएगा!
लेकिन इतना अवश्य कहने का मन है कि आलोचनाओं से विचलित हरगिज़ न हों.
राहुल जी ने कहा है, जो मन में हो लिख डालो.संभव है बाद में तुम खुद ही उसमें बेहतर संशोधन सुधार कर लो.

प्रवाह गज़ब का है आपके लेखन में तो आपसे यही आग्रह है कि इसे टूटने मत दीजिये.

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