25 July, 2009

शब्दजाल -------कहानी
------- गताँक से आगे

बैंगलोर आये हुये मुझे 4--5 दिन हो गये थे । पहुँच कर इन्हें फोन कर दिया था । कि ठीक ठाक पहुँच गयी हूँ------- उसके बाद चार पाँच दिन से कोई बात नहीं हुई।मन मे चिन्ता भी थी कि पता नहीं कैसे खाते पीते होंगे----- अकेले कैसे रहते होंगे------ सोचा आज फोन करती हूँ । फोन मिलाया--
*हेलो !* फोन उठाते ही इनकी आवाज़ आई
*हेलो ! कौन\ कृष्णा ! कैसी हो तुम । *
*मैं ठीक हूँ आप कैसे हैं----- खाना वगैहरा कैसे चल रहा है \* मन मे था कि अभी कहंगे कि तुम्हारे बिना कुछ अच्छा नहीं चल रहा।
*बहुत बढिया चल रहा है--- काम वाली है ना वो बना देती है ।*
*चलो फिर ठीक है ।*-------- सुनते ही मुझे पता नहीं एक दम क्या हुया मैने फोन ही रख दिया क्या इत्ना भी नहीं कह सकते थे कि तुम्हारे बिन अच्छा नहीं लग रहा-----दिल नहीं लग रहा---कभी दूर भी नहीं रहे थे----- फिर भी जनाब मजे मे हैं----- मन फिर उलझ गया इतने सालों बाद पहली बार घर से बाहर आयी हूँ---- इन्हें काम करने की आदत भी नहीं ह। एक् चाय का कप तो कभी बनाया नहीं फिर घर के और कितने काम होते हैं--।कैसे चलते होंगे। मुझे घर मे अपना वज़ूद ही नगण्य सा लगने लगा ।क्या मैने सारी उम्र घर को बनाते संवारते य़ूँ ही गवा। दी घर तो मेरे बिना भी बढिया चल रहा है ।क्या एक नौकरानी से काम नहीं चल सकता था । बस इस शब्द जाल मे ऐसा उलझी कि पता नहीं सोचें कहाँ कहाँ अपने को तलाश करने लगीं।
जितने दिन बैंगलौर रही मन उदास ही रहा-।सोचने लगी थी कि इन्हें शायद अब मेरी जरूरत ही नहीं है~ तो मैं क्यों घर जा रही हूँ।फिर भी बेटी के पास कब तक रहती। जाना ही था ।इन्हें फोन कर दिया था कि 9 बजे दिल्ली पहुँच कर बस लूँगी----और चार बजे तक घर पहुँच जाऊँगी
चार बजे बस से उतर कर आटो लिया और घर पहुँच गयी। मगर ये क्या ! घर मे ताला \ आज पता था कि चार बजे मैं आ रही हूँ तो भी चले गये । बस आधा घन्टा पहले पहुँच गयी थी । मन ही मन कुढते हुये पर्स मे से दूसरी चाबी निकाली क्यों की दोनो नौकरी मे थे तो दो चाबियाँ रखनी ही पडती थीं ।दरवाज़ा खोला सामान अन्दर पटक कर मै पँखे के नीचे लेट गयी । प्यास भी बहुत लगी थी मगर पानी भी नहीं पीया----बस एक ही बात मन पर हावी होने लगी कि इन्हें मेरी पर्वाह नहीं है । चंचल मन जिन्दगी भर की अच्छाईँयां भूल कर कुछ शब्दों के हेर फेर को ले कर उलझ गया था ।
पाँच मिन्ट बाद ही ये आ गये और आते ही रसोई मे घुस गये ।
यह क्या \ ना दुआ ना सलाम ---- हाल चाल भी नहीं पूछा और रसोई मे घुस गये जैसे रसोई इन के बिना उदास हो गयी हो। मेरी आँखें भर आयी ये आँसू तो हमेशा औरत की पलकों पर ही बैठे रहते हैं बस मौका देखते ही छलक आते हैं -----
*लो कृष्णा जूस पीयो ---मैने सोचा तुम इतनी गर्मी मे आओगी और बस के सफर मे तुम्हें वोमिट भी आती है मुँह का स्वाद भी खराब हो जाता है इस लिये मैं ताज़ा जूस लेने चला गया । रास्ते मे सकूटर खराब हो गया उसे मकेनिक के पास छोड कर पैदल ही भागा आया।* एक ही साँस मे कह रहे थे-----
*कैसी हो तुम्\*
आँखों मे आये आँसू बह गये---- मैं ठीक हूँ आप कैसे हैं। गुस्सा कुछ ठँडा हुया और मैने जूस का गिलास ले कर पी लिया ।
*आप तो पीछे से मज़े मे थे ना ! * दिल की बात ज़ुबान पर आ ही गयी------ ।
*अरे क्या खाक ठीक था\ तुम्हारे बिना घर घर ही नहीं लगता था-। इतने दिन ना ढंग से खाया ना पीय़ा । इस घर की खुशियाँ तो तुमसे ही हैं।*
ये क्या\ क्या उस दिन फोन पर ये सब नहीं कह सकते थे । बस इनकी यही बात मुझे अच्छी नहीं लगती थी--।शब्दों का मायाजाल देखिये इतने दिनों का गुस्सा परेशानी सब एक मिन्ट मे गायब----- अब अपने पर गुस्सा आने लगा---क्या मैं नहीं जानती थी कि ये मुझे कहें या ना कहें मगर मुझ से प्यार करते हैं। फिर क्यों पड जाती हूँ इस चक्कर मे। और इन्हें तो शब्दों का ये हेरफेर बिलकुल भी नहीं आता---मगर मेरे दिल की बात बिना कहे समझ लेते हैं---- और अब मैं क्या चाहती हूँ ये जान गये थे-----आपेक्षित शब्दों की फुहार तन मन भिगो गयी थी । वाह री पत्नि !
---------समाप्त्

24 July, 2009

शब्दजाल (कहानी )

पति का व्यक्तित्व कितना ही सश्क्त हो़- वो कितना ही कर्तव्य़ निष्ठ हो- मगर पत्नि सुलभ मन फिर भी कुछ लुभावने- आपेक्षित शब्दों का मेहताज़ रहता है।और फिर सम्बन्धों को मजबूत बनाने के लिये ये शब्द सेतु का काम करते हैं-जिन्हें गुनगुनते हुये- दिन भर याद करते- हुये पत्नि एक नई उंमँग से भरी रहती है। आज मेरा मन भी इसी शब्दजाल के मोह मे उलझ गया था----। दस दिन हो गये थे बैंगलोर आये हुये--- आई तो घूमने फिरने और बच्चों से मिलने थी मगर मन पीछे घर मे था -उपर से कुछ अन्दर ही अन्दर मन को सताये जा रहा था ।---
कई दिन से मन उदास सा था ।बेटी का फोन आया था---हम दोनो को बैंगलोर आने के लिये कह रही थी । तभी ये आ गये और मैने जवाब देने की बजाये फोन इन्हें पकडा दिया और आप बाहर चली गयी । बच्चों के इस आग्रह को ठुकराना मेरे बस मे नहीं था-- फिर मैं बच्चों के पास जाना भी चाहती थी पर इनसे कहने की हिम्मत नहीं होती। मुझे पता था कि इन्हें घूमने फिरने का शौक नहीं था और घर को इतने दिन सूना छोड कर जायेंगे भी नहीं।
पता नहीं बच्चों से क्या बात हुई- पूछना मेरी आदत् नहीं थी और बताना इनकी फितरत नहीं थी।मैं जानती थी कि आदमी सोच समझ कर उपयुक्त समय पर बात करते हैं और औरत एक दम कहने सुनने को उतावली हो जाती है।ये कहने सुनने के समय का शून्य भी तो शब्दों का मोहताज ही तो होता है---। पत्नि यूँ भी पति से प्यार -सहानुभूति और प्रशंसा के दो शब्द सुनने के लिये लालायित रहती है। दिन भर के गिले शिकवे उन दो शब्दों की फुहार मे घुल कर बह जाते हैं।
इनसे कभी कुछ पूछो या राय माँगो तो कभी भी उसी समय जवाब नहीं देते---कुछ घन्टों य दिनो बाद इनका जवाब मिलता है तब तक उस बात का क्या औचित्य रह जाता है----++!
रात का खाना खाने के बाद मैने काम निपटाया । ये अखबार ले कर बैठ गये और मैं किताब ले कर -- दोनो मौन थे ------।
**कृ्ष्णा ! आज कल तुम भी कुछ उदास रहती हो। बच्चे आने के लिये कह रहे हैं तो कुछ दिन के लिये हो आओ़**----।
*क्या अकेले ही \**---मन मे एक सँतोष सा हुया कि इन्हें पता है कि आजकल मैं उदास रहती हूँ----।
**हाँ आज कल मुझे छुट्टी मिलना मुश्किल है फिर घर भी सूना रहेगा। तुम हो आओ** ।
**आपका खाना-घर का काम ये सब कैसे चलेगा \ मैने इनकी तरफ देखा** ।
**तुम चिन्ता मत करो काम वाली से बनवा लिया करूँगा** ।
मैने भी सोचा कि चलो ठीक है---इनकी मर्जी । इन्हें भी पता चलेगा कि मेरे बिना घर कैसे चलता है ।जनाब को चार दिन मे नानी याद आ जायेगी---- पता नहीं बच्चों से मिलने को उतावली थी या इन्हें ये दिखाने को कि मेरे बिना घर नहीं चल सकता ---क़ि मैने हाँ कर दी---
अगले दिन ये चंडीगढ चले गये कि कुछ काम है मैने पूछा नहीं कि क्या काम है और इन्होने बताया नहीं । रात को वापिस आये तो मेरे हाथ मे एक कागज़ पकडाते हुये बोले * कि ये तुम्हारा टिकेट है---- लो तुम्हारे जाने का प्रबन्ध हो गया है(* ।
**ये क्या ये तो एयर्वेज़ का टिकेट हैं**\--मैने टिकेट को देख कर हैरानी से कहा **मैने ट्रेन से ही चले जाना था इसकी क्या जरूरत थी**\मैने इनकी तरफ देखा ।
**नहीं तीन दिन का सफर म्रे मुझे यहाँ चिन्ता रहती कि तुम ठीक ठाक पहुँच गयी हो कि नहीं** ।-
फिर वही शब्द जाल ------मन फिर इनमे फंस गया ----तो अपनी चिन्ता मिटाने के लिये हवाई यात्रा का टिकेट ले कर आये हैं\---क्या इतना नहीं कह सकते थे कि आने जाने मे इस तरह छ दिन बच जाते और तुम जल्दी आ जाओगी---- तुम्हारे बिना इतने दिन कैसे रहूँगा----। जानती भी थी कि इन्हें बातें बनानी नही आती--- ना भी रह सकेंगे तो भी कहेंगे नहीं---बस यही बात मुझे चुभती---पत्नि मन इन शब्दों के बिना रीता स रह जाता है।इसी शब्दजाल मे कई बार अच्छे पल भी अच्छे नहीं लगते ।
बैंगलोर आये हुये मुझे 4--5 दिन हो गये थे । पहुँच कर इन्हें फोन कर दिया था । कि ठीक ठाक पहुँच गयी हूँ-----क्रमश

23 July, 2009

आज कुछ् टाईप नहीं कर पाई इस लिये एक कविता जो तहलका काँड पर लिखी थी आपके सामने रख रही हूँ पता नहीं इस काँड का क्या बना मगर इसके बाद तो काँड ही काँड दिखे कोई इस चक्रव्यूह के तोड पाया कि नहीं ये आप सब के सामने है

चक्रव्यूह (कविता )

मेरे देश का प्रजातन्त्र्
कब से
तिल तिल कर मर रहा है
भ्रश्टाचार की आग मे
जल रहा है
देश के शासक
इसकी धक्कियाँ उडा रहे हैं
भूखे भेडियों की तरह खा रहे हैं
और आज जब
एक और अभिमन्यू ने
इन दुर्योधनों के चक्रव्यूह मे
सेँध लगायी
प्रजातँत्र् क बलात्कारी साँसदों की
काली करतूत टी वी पर दिखाई
देश की प्रजा ने
शर्म से सिर झुकाया
प्रजातँत्र भी ना सह पाया
लडखडाते हुये कराहा और बोला
अरे! है कोई अर्जुन् तो आये
मुझे इन दुर्योधनों के
चंगुल से बचाये
और मैं लाचार खडी देख रही हूँ
इसका हाहाकार व्यर्थ जायेगा
इस चक्रव्यूह को
कोई नहीं भेद पायेगा
फिर इतिहास
खुद को दोहरायेगा
और एक दिन
ये अभिमन्यूं भी मारा जायेग


22 July, 2009

यही नसीब है------------कहानी

मैने जिन्दगी से कभी कुछ माँगा नहीं था जो भी मिला जैसा भी मिला अगर अच्छा लगा तो उसमे अपने को ढाल लिया नही भी लगा तो उसको अपने मुताबिक ढाल लिया अगर कभी शिकवा हुया भी तो होठों तक नही आया------ हमेशा कुछ कर दिखाने का जज़्वा लिये साहस से चलती रही------- मगर जब से तुम्हें तिल तिल मरते देखा है साहस टूटता सा नज़र आने लगा था----- जिन्दगी से गिले करने लगी थी----- फिर भी जीना नहीं छोडा था----- लेकिन तुम्हारी मौत ने----- मुझे पूरी तरह तोड दिया है------- जिस दुख को तुम ने वर्शों सहा है मैं कुछ पल के लिये भी जी नहीं पा रही हूँ------ पस्त हो गयी हूँ------ इस लिये आज तुम से दो बातें करने आई हूँ-----तुम्हारे जीते जी तो नहीं कह सकी ------- मगर मरने के बाद ------ क्यों कि जानती हूँ तुम अब भी मुझे भूलना नहीं चाहते------- नहीं चाहिये मुझे तुम्हारा ये जनून------ ये कैसा प्यार था तुम्हारा------ जो मुझ से भी मेरी जिन्दगी छीन लेना चाहते हो------- तुम ने कभी एक बार भी मुझे बताया होता--- तो शायद्--- दुख इसी बात का है कि तुम अपने भ्रम पाले बैठे रहे------ किसी दूसरे के दिल से बेखबर------ मैने तो तुम से प्यार नहीं किया था फिर मुझे सजा किस बात की-------
पता नहीं क्यों---अज किसी कन्धे की जरूरत महसूस हो रही है----- एक ऐसे कन्धे की जो मेरे कुछ गम अपने कन्धे पर उठा सके---------- मेरे आँसूओं की नमी अपनी आँखों मे समेट सके-------- मेरी टीस को अपने दिल की गहराईयों मे महसूस कर सके --- अकेली कब तक इस बोझ को ऊठाऊँगी--------- कितना असहाय हो जाता है कई बार आदमी------- कितना भी जीवट हो मगर किसी ना किसी समय और किसी ना किसी बात पर किच्चर किच्चर बिखर जाता है------- मगर मै भी कितनी नादान हूँ जब मै अपना ही बोझ नहीं उठा पा रही हूँ तो कोई कैसे मेरा बोझ उठा सकता है----वो भी आज की दुनिया मे-------- सभी रिश्तों की तरफ नज़र दौडाती हूँ------- जिनके आँसूओं की नमी ही नहींपूरे के पूरे दरिया को अपनी आँखों से बहाया है----- जिनकी टीस को खुद जीया है-------- जिनको किसी दुख तकलीफ का एहसास नहीं होने दिया-------उनको सिर्फ अपना कन्धा ही नही दिया बल्कि अपने जीवन का हर सुख सौँप् दिया-------- वो भी आज मेरे दुख को महसूस नहीं कर सकते ------ क्यों करें----- मेरे दुख से उनका नाता भी क्या है -------- और---- तुम ------- जो सारी उम्र मेरे लिये ही जीने का दम भरते रहे------ और मुझे सुख देने की बजाये दुख दे गये----- ये कैसा प्यार था------ शायद ये तुम्हारा प्रतिशोध था------- या शायद ये तुम्हारी आखिरी कोशिश कि तुम मुझे अपने प्यार का एहसास करवा सको-------- विश्वास दिला सको------- या शायद तुम भी थक गये थे मुझे विश्वास दिलाते दिलाते-------- तुम्हें भी तो कई बार तलाश रही होगी किसी न किसी कन्धे की ------- किसी ने तुम्हारी नहीं सुनी----- मैने भी नहीं तो फिर अब मैं क्यों रो रही हूँ-------- वैसे भी हर कन्धा इतना सश्क्त तो नहीं होता ना कि उस पर अपना सिर रख दिया जाये-------- शायद हम दोनो के लिये कोई कन्धा बना ही नहीं-------- तुम ने झूठ कहा था कि तुम मुझ से प्यार करते हो---- अगर ऐसा होता तो तुम मुझे छोड कर नहीं जाते------- कम से कम मरते नहीं चाहे कहीं दूर चले जाते----------मुझे ये अपराधबोध दे कर नहीं जाते कि तुम्हारी मौत का कारण मैं हूँ-------- मेरे कारण तुम ने अपनी दुनिया नहीं बसाई----- मैने कोई बेवफाई नहीं की थी--------- मैने तो तुमसे प्यार नहीं किया था ------- तुम ने समय पर एक बार कहा होता------- मुझे सुना होता ------ मैने तो वही किया जो बचपन से सुना देखा और समझा------ और तुम ही तो सिखाया करते थे ये बडी बडी बातें------ तुम भी तो महान बनने का मोह नहीं त्याग पाये----
कभी कभी ऐसा क्यों होता है कि इन्सान को अपनी मान्यतायें संस्कार जिन से उम्र भर नाता जोडे् रखता है------ वो झूठे लगने लगते हैं------- वो उन के खिलाफ वगावत करने पर आमदा हो जाता है-------शायद यही मेरे साथ हो रहा है------- आज सोचती हूँ कि मैने अपनी ज़िन्दगी को क्यों रुस्वा किया----- क्यों इसे इतने दुख सहने दिये----- इसके लिये कुछ तो खुशियाँ तलाशनी चाहिये थीं------- फिर से एक बार उन गलियों मे लौट जाना चाहिये था जहॉ---रिश्तों के बन्धन नहीं होते ----बस होता है बचपन ----- मन एक आज़ाद पँछी की तरह उडता है अपनी अपनी उडान ----- निश्छल प्रेम ---- उमँग ---- कोई दुख नहीं कोई दर्द नहीं------- अगर समय नहीं भी ठहरा तो भी----- जब तुमने मेरे दिल को छूने की कोशिश की थी---- मुझे अपने दिल के कवाड खोल लेने चाहिये थे------तब भी शायद ज़िन्दगी को कुछ ऐसे पल मिल जाते जो आज मेरे जख्मों को सहलाने के काम आते------- शायद अब इन सब बातों का कोई फायदा नहीं है-------- मुझे तो ये भी समझ नहीं आ रहा कि मेरे दुख का कारण क्या है जब तुम से प्यार ही नहीं किया तो दर्द क्यों------- यही तो वजह है कि काश तुम्हीं से किया होता ----- हां यही वजह है------- और अब जब तुम दुनिया से चले गये हो तो मुझे तुम्हारी याद आ रही है----- यही तो दुनिया का दस्तूर है और मै दुनिया की भीड का एक हिस्सा हूँ----- तुम्हारी तरह भीड से हट कर नहीं-----
फिर भी आज एक बार तुम्हारा दर्द महसूस करना चाहती हूँ------- क्यों कि आसमान मे तारों के बीच आज तुम्हारा पहला दिन है------ बाहर लान मे आ कर बैठ जाती हूँ-------तारे निकलने का इन्तज़ार है-----मगर ये क्या देखते ही देखते घटायें छाने लगी हैं-------जान जाती हूँ-----तुम्हारा दिल वहाँ नहीं लग रहा -----जरूर तुम्हारी आँखों मे उदासी के साये लहराये होंगे-------मुझे देख लिया होगा आसमान की ओर देखते------ कि मैं कितनी दुखी हूँ बेचैन हूँ------ दूर बादलों मे तुम्हारा साया देख रही हूँ-------- तुम्हारी बडी बडी आँखें------अज भी बादलों मे बनी तुम्हारी तस्वीर मे वैसी ही दिखाई पड रही हैं------- कुछ बून्दें टपकने लगी हैं------- शायद आज तुम खुद को रोक नहीं पा रहे हो कितनी देर रोके इन्सान पूरी ज़िन्दगी ----एक शून्य मे जीते रहे---- हाँ आज रोकना भी मत---- बहने दो ये आँसू------- वहाँ तो दुनिया का डर नहीं है----- कम से कम अपनी मर्ज़ी से रो तो सकते हो--------अज मैं भी तुम्हें निराश नहीं करूँगी मैने वो बून्दें हाथ पर सहेज ली हैं-------इन को पी भी लिया------ ओह इतनी जलन ----कितना दर्द हुया पीते पीते------ कैसे सहा होगा तुमने पूरा बादल --- मै तो एक टुकडा भी सह नहीं पा रही हूँ----- शायद अब तुम भी सह नहीं पा रहे थे तभी तो चल दिये------- बस इससे अधिक मै तुम्हारा साथ नहीं दे सकती----- अब लगता है कि मैं तुम से प्यार करने लगी हूँ------ और तुम्हारे प्रतिशोध की सजा काट कर ही आऊँगी तुम्हारी तरह तिल तिल कर मरूँगी----- मगर मिल तो फिर भी ना सकेंगे------- किसी के साथ सात जन्म के वचन जो लिये हैं अग्निपथ पर ------ मगर ये अग्निपथ के रिश्ते बहुत बेरहम होते हैं वो तुम्हारे लिये मुझे कभी कन्धा नहीं देंगे----- तुम ने चाहे उन की मर्यादा के लिये अपना जीवन दे दिया मगर वो रिश्ते क्यों कि शरतों पर टिके होते हैं----- आत्मा तो शर्तों पर प्यार नहीं करती इस लिये वो रिशते प्यार का अर्थ नहीं जानते------ असंवेदनशील हो जाते हैं भावनाओं के प्रति------ अब तुम जाओ------रहना तो होगा वही----- जैसे यहाँ रहते थे------- और मुझे भी जीने दो----- कभी मत आना मेरी यादों मे------- यही तो नसीब होता है जिसे हम चाह कर भी बदल नहीं सकते--------

21 July, 2009

मेरी नज़र से देखो---गताँक से आगे----कहानी

अनु-------- और वो अचानक अनुजी से अनु पर आ गया था------ मैं फिर असहज हो गयी----- मैं तुम्हरे दुख को समझ सकता हूँ----तुम्हारी भावनाओं की कद्र करता हूँ---महसूस कर सकता हूंम------मैं जानता हूँ कि मुझे देख कर तुम्हें सुमित की याद आती है------- बीते दिनों की यादें------मगर क्या करूँ मैं कितना दुखी हूँ----शायद तुम नहीं समझ सकती------- सुमित ने मुझे आँखें दे कर इस घर से बाँध दिया है------ उसकी आँखें उसके परिवार को ना देखें उसके माँ-बाप को ना देखेंतो ये अपराधबोध मैं सह नहीं सकता------ वरुण के लिये कितने सपने थे इन आँखों मे------ फिर इन आँखों के सपनों का क्या करूँ-------मेरी बातों का बुरा मत मनना मैं किसी परिस्थिति का कोई अनुचित लाभ उठाना नहीं चाहता------- मैं बस ये जानना चाहता हूँ कि क्या तुम इन आँखों के सपनो क्प छीन लेना चाहती हो?------क्या तुम्हें अच्छा नहीं लगता कि मैं उसकी इच्छा पूरी करूँ------ तुम क्यों मुझ से बात करना नहीं चाहती----हम इकठे कितना चहका करते थे-------- ऐसा तो नहीं कि तुम पहले मुझ से बात नहीं करती थी------ बल्कि सुमित से भी अधिक हम दोनो बातें करते थे----- हँसते खेलते थे------- फिर इन आँखों ने क्या कसूर कर दिया-------
नहीं---- सुजान ऐसी कोई बात नहीं है ---तुम समझते क्यों नहीं ------- सुमित के बिना कुछ भी अच्छा नहीं लगता---
सुमित की आँखे?------क्या ये भी नहीं------ सुजान एक दम मेरी आँखों मे झाँक रहा था-------
मै सामने दरिया की ओरे देखने लगी------- सुजान सामने दरिया मे उठती लहरों को देख रहे हो?------ागर ये दरिया के किनारे तोड कर् बाहर बहने लगेंगी तो तबाही मचा देंगी-----सच कहूँ तुम से बात करते हुये मुझे तुम से नहीं इन आखों से डर लगता है------
अगर इन लहरों को मजबूत किनारों से बाँध दिया जये तो ये शाँत दरिया मे बहने लगेंगी------- तुम्हें पता है मम्मी पापा तुम्हारे और वरुण के लिये कितने चिन्तित रहते हैं------- वो तुम से खुल कर कोई बात नहीं कर सकते------- सच कहूँ तो उन्होंने मुझे सुमित की जगह स्वीकार कर लिया है-------क्या तुम ऐसा नहीं कर सकती-----
ये क्या कह रहे हो-------क्या तुम नहीं जानते कि सुमित के बाद मै ाउर वरुण ही मम्मी पापा का सहारा हैं----- मैं उन्हें छोड दूंम्गी ये तुम ने कैसे सोच लिया-------मैं उसकी बातों से कुछ विचलित सी हो गयी थी--------
ये मैने नहीं सोचा मम्मी पापा ने सोचा है---------वो चाहते हैं कि तुम वरुण और उन की खुशी के लिये मुझ से शादी कर लो तो उनकी चिन्ता समाप्त हो जायेगी और इस तरह हम सब एक ही घर मे इकठे रह लेंगे--------
सुजान बस करो मैं ऐसा सोच भी नहीं सकती------सुमित के बिना कुछ भी नहीं ------
मै कब कहता हूँ कि तुम उसके लिये ना सोचो----बल्कि तुम ऐसे सोचो कि जिन आँखों मे तुम्हारी तस्वीर रहती थी वो तुम्हारी इस बेरुखी से आहत नहीं होंगी------- ये आँखें तुम्हारे इन्तज़ार मे बैठी हैं---- मान लो अगर इसके विपरीत आज मेरी आँखें सुमित् के लगी होती तो क्या तुम इन आँखों मे ना देखती------ तुम्हें मुझ से डर नहीं लगता तो फिर इन आँखों से क्यों ----- वो मेरा दोस्त ही नही--- मेरी जान था--- आज जहान भी वही है मेरा----- मैं और तुम मिल कर उसे याद किया करेंगे दुख बाँट लिया करेंगे ---सब जिम्मेदारियां मिल कर निभा सकेंगे --मै तुम्हें एक दम फैसला लेने को नहीं कहता----तुम नहीं चाहती तो कोई बात नहीं मगर सहज व्यवहार तो करो मुझे क्यों सज़ा देती हो-------मुझे इस दर्द से मुक्त करो-----कहते कहते सुजान रो पडा-------
मैं चाय बना कर लाती हूँ----- मैं रसोई मे चली गयी------चाय का पानी खौल रहा था मगर मेरा दिल बेचैन हो रहा था सोच मे खडी रही-------
खैर चाय बना कर बालकनी मे आ गयी
खामोशी ----- बाहर खामोशी मगर दोनो के दिल मे आँधियाँ चल रही थी------ सुजान किनारे मजबूत करना चाहता था-----मगर मैं इन आँखों से डर रही थी----- कैसे बताऊँ सुजान को कि इन आँखों मे झाँकने की उस की कितनी तमन्ना है-----वो तो आँख खुलते ही सुबह पहले इन आँखों मे झाँका करती थी------ जब से इस घर मे आयी थी ----ेआज भी मन होता है------- मगर-------
क्या तुम्हें इन आँखों को देखने की चाह नहीं होती----- अचानक जैसे सुजान ने मेरी चोरी पकड ली थी मेरे दिल की बात जान ली थी------- शायद्
अच्छा तो मैं चलता हूं----- मै यहां इस समय इस लिये आया था कि पापा चाहते थे कि मै तुम से बात करूँ------ वरुण की ज़िन्दगी-------- शहीद बेटे के माँ बाप का सकून------ जो उन्हें ये आँखें देख कर मिलता है--------इन सब के लिये तुम कुछ कर सकती हो मै कर सकता हूँ-------- मै किसी और लडकी से शादी कर के पता नहीं ये जिम्मेडारियाँ निभा पाऊँगा कि नहीं ----- और फिर लोगों को बातें बनाते देर नहीं लगती-------- मैं नही चाहता कि कल को लोग मेरे यहाँ आने पर उँगली उठायें ------ सोच लो फैसला तुम्हारा है अगर फिर भी तुम्हारी ना है तो मैं कहीं दूर चला जाऊँगा-------- कहते हुये सुजान बाहर निकल गया-------
क्या सोचूँ मै------- सुमित तुम कहाँ हो-------- आँखें बह रही थी-------- इस दरिया की तरह----- सुजान ठीक ही तो कहता है सब का सपना टूट जायेगा-------- मम्मी पापा ने तो सुजान की आँखों मे सुमित को पा लिया हओ इसके जाने से वो टूट जायेंगे------- मैं----- हाँ मुझे भी तो सुजान का जाना अच्छा नहीं लगेगा--------कैसे देख पाऊँगी इन आँखों को---
धीरे धी दिन चल रहे हैं-------शाँत हूँ इस दरिया की तरह उसने इस दान से कितने जनों को जीने की राह दिखाई है और मै उसके इस दान को शर्मिन्दा करने जा रही हूँ-------- इस घर को इन आँखों की जरूरत है-------
सुजान रोज़ उसी तरह आता है------- वरुण से खेलता है------- मैं छुप छुप कर उन आँखों को देखती हूँ----वही चमक------वही कशिश् ------- दिल धडक उठता है------ सब की कोशिश रहती है कि जब सुजान आये तो मै उन सब के बीच बैठूँ -------- हाँ सच कहूँ अब मुझे भी उन आँखों का इन्तजार रहता है--------
एक दिन मम्मी पापा बाज़ार गये थे------दिन के 11 बजे थे पापा पैटोल पँप चले गये और मै वरुण को सुला रही थी--------
क्या कर रहे हैं माँ बेटा------- असमय सुजान की आवाज़ सुन कर मै चौँक पडी-------वरुण सो गया था उसे लिटा कर मै बालकनी मे सुजान के पास आ कर खडी हो गयी-------
आज इस वक्त कैसे आयी------- मैने धीरे से पूछा -------
क्या अब इस घर मे आने के लिये मुझे इजाज़त लेनी पडेगी-------- सुजान हंसा
नहीं नहीं ---मैने सोचा कोई काम है-------
बैठौ ------- शुक्र है मुझे देख कर कुछ सोचने भी लगी हो-------- उसने मेरी आँखों मे देखा------ अनु तुम कुछ भी कहो----- मगर ये आँखें तुम्हारी अन्दर तक झाँक लेती हैं------- ये जानती हैं कि तुम चोरी चोरी इन्हें देखती हो----- उसकी नज़र मेरे चेहरे पर थी------
हाँ सुजान------- सुमित शायाद इसी लिये इन्हें तुम्हें दे गया कि मैं इन्हें देख कर जी सकूँ------- उसके होने का एहसास पा सकूँ------- मगर मुझे डर है कि क्या मै तुम से इन्साफ कर पाऊँगी----- तुम मे सुमित को पा सकूँगी-----
अरे सुमित को क्यों भूलेंगे हम दोनो मिल कर उसे ज़िन्दा रखेंगे-------वैसे भी शहीद हो कर अमर हो गया है वो------
हाँ शायद सच कहता था सुमित कि ------ अनु ये आँखें तुम्हें जीनी की शक्ति देंगी ---- इन आखों से तुम्हे बाँध रखूँगा------- और मैने अपना हाथ सुजन के हाथ पर रख दिया------
धूप मे लहरों पर किरणो का नृ्त्य ------झिलमिल करता दरिया---उछलती कूदती लहरें किरणो से गले मिलती----- और दरिया मे हलचल मचा देती------- आज आसपास के पेड फिर से झूमने लगे थे----- इन आंखों ने मेरे दिल मे हलचल मचा दी थी------- वो लौट आया है------ जिन्दा है------ और मै बहे जा रही थी दरिया के साथ साथ ------ समाप्त्

20 July, 2009

मेरी नज़र से देखो------- कहानी------ गताँक से आगे

मैं सुबह उठते ही पहले अखबार देखती थी----- एक दिन अखबार पढते 2 एक खबर पर नज़र अटक गयी------- तो आँखों के आगे अँधेरा छा गया सुमित सुमित कारगिल मे शहीद हो गये थे------- मेरी दुनिया लुट गयी थी माँ बाप के घर का चिराग बुझ गया था------- मगर अभी यकीन करने का मन नहीं था------ उनकी युनिट से कोई खबर नहीं आई थी----अभी तो सुजान के सदमे से नहीं उभरे थे-----

किसी से बात करबे की स्थिती मे नहीं थी------ बेटा उठ गया था पर मुझे होश ही नहीं था मा बाहर आयी मुझे अखबार पकडे सदमे मे देखा तो मुझ से अखबार ले कर देखने लगी----फिर क्या था घर मे कोहराम मच गया ------ एक घन्टे बाद सिपाही भी खबर ले कर आ गया-------मुझे कुछ पता नहीं फिर क्या हुआ-------जब होश आया तो मेरे सामने सुमित की लाश थी------- तिरंगे मे लिपटी हुई------- कोई मुझे लाश से कपडा नहीं उठाने दे रहा था-----मैं बस एक बार सिर्फ एक बार सुमित का चेहरा देखना चाहती थी मुझे यकीन था कि ये सुमित नहीं हो सकता वो मेरे साथ इतना बडा धोखा नहीं कर सकता--------उसकी आँखों को देखना चाहती थी------ जिन्हें देख कर मेरे दिल की धडकन बढ जाती थी----- जिन्हें देख कर मैं खुद पर काबू नहीं रख पाती थी------ मैं सुमित से कहती ऐसे मेरी तरफ मत देखा करो ये आंम्खे किसी दिन मेरी जान ले लेंगी-------तो सुमित हँस पडते------- नहीं अनु---ये आँखें तो तुम्हें जीने की शक्ति देंगी------बस इब आंम्खों से बान्ध रखूँगा तुमको-------
आज उन आँखों की एक झलक देखना चाहती थी-------मगर वो आंम्खें तो सुमित दान कर गया था---- सुजान के लिये-------तो क्या सुजान मुझ से भी प्यारा था------ तो क्या मै फिर देख सकूँगी सुमित की आँखें------- आखिरी बार मुझे सुमित का चेहरा भी नहीं दिखाया गया------ पापा के कन्धे से लगी देख रही थी सारा शहर और युनिट के लोग----- सलामी के लिये फौज़ की टुकडी------- युनिट के साथी उस की बहादुरी की गाथा सुना रहे थे ---मुझे कुछ अच्छा नहीं लग रहा था ----- मेरा संसार उजड गया ये बडी बडी बातें मुझे सकून नहीं दे रही थी------पता नहीं क्या क्या हो रहा था------ कुछ याद नहीं मेरे तो दिन रात सूने हो गये थे--------
सुजान को सुमित की आँखे मिल गयी थी------ बहुत रोया था वो----- उसके दुख को कौन जान सकता था----- सब ने कहा कि रोना नहीं ये सुमित की आँखें हैं इन्हें कोई तकलीफ ना हो------- सुजान और उसकी मा हमारे घर मे ही थे----- सुजान ने तो जैसे अपने आप को इस घर के लिये समर्पित सा कर दिआ था दोनो मा बेटा रात को घर जाते थे मम्मी बीमार रहने लगी------ मैने तो अपने को कमरे मे जैसे कैद कर लिया था---- सुजान के मम्मी सरा काम करते वरुण को सम्भालते बाहर का सारा काम धीरे धीरे आँखें ठीक होते ही सुजान ने अपने जिम्मे ले लिया था------- मै बस शाम को कुछ देर उन लहरों को देखने लान मे आती उन से सुमित के बारे मे पूछती------ मगर कहीं से कोई जवाब नहीं मिलता---------वो मेरी हालत से आहत हो कर दरिया मे समा जाती-------
सुजान बहुत कोशिश करता मुझ से बातें करने की-------मेरा मन बहलाने की------ मगर ना जाने क्यों मुझे सुजान की तरफ देखते डर लगता था------ये सुमित की आँखें------- कहीं मुझे-------- नहीं नहीं-------ये सुजान की आँखें हैं------कई बार मन होता कि उन आँखों मे झाँक कर देखूँ---------- मगर हिम्मत नहीं होती------इन आँखों मे तो मैं रहती थी------ ओह सुमित ये क्या कर दिया तुमने/-------
एक वर्ष हो गया था सुमित को गये-------- मम्मी पापा जब मुझे बहलाते तब मै सोचती कि मुझे तो इन का सहारा बनना चाहिये-----सुमित की निशानी--- वरुण की जिम्मेदारी भी मुझे पर है-----कितने सपने थे सुमित के अपने बच्चे को ले कर मुझे जीना होगा----- वरुण के लिये मम्मी पापा के लिये-------
वरुण ढेड साल का हो गया था------ सुजान से काफी हिलमिल गया था पापा ने और सुजान ने मिल कर पैट्रोल पम्प खोल लिया था------ दोनो व्यस्त हो गये थे------सुजान शाम को पापा को घर छोड कर थोडी देर वरुण के साथ खेलता फिर अपने घर चला जाता --- सुबह फिर पापा को लेने आ जाता------ मै और मम्मी सुमित की बातें ले कर बैठ जाती------ पापा चाहते थे कि मैं कहीं नौकरी ज्वाईन कर लूँ---ताकि मेरा ध्यान बँट सके----- मगर सुमित के बिना मुझे कुछ अच्छा नहीं लगता था-------
पिछले दो तीन महीने से देख रही थी कि सुजान मुझ से बार करने की बराबर कोशिश करता-----उस दिन कह रहा था------- अनुजी मुझे जाने क्यों एक अपराधबोध सा रहता है----अप मुझ से बात नहीं करती तो लगता है कि आप मुझ से नाराज़ हैं------- क्या आपको अच्छा नहीं लगा कि सुमित की आँखें मुझे मिल गयी हैं--------
नहीं नहीं ---- ऐसी बात नहीं है-----बस सुमित के बिन कुछ अच्छा नहीं लगता------ आपसे कोई नाराज़गी क्यों होगी------ मै उसे कैसे बताती कि मैं इन आँखों की तरफ नहीं देख सकती------- ये आँखें तो मुझे बेकाबू कर देती हैं-----
मैं समझ सकता हूँ------ मुझे देख कर आपको सुमित की याद आती होगी------
मैं क्या जवाब दूँ------हाँ चोर नज़रों से उन आँखों को देखने की हसरत बनी रहती-------
आज सुमित की बहुत याद आ रही थी------ मम्मी पापा गाँव गये हुये थे-------शाम ढलने लगी थी----- चाय का कप ले कर बालकनी मे आ कर बैठ गयी वरुण सो रहा था-------सूरज की किरणे धीरे धीरे जा रही थी------मगर दो चार किरने अभी भी लहरों के साथ खेल रही थी कितना कठिन होता है बिछुडना------- इन का भी मन लहरों से दूर जाने का नहीं है मगर समय को कौन बान्ध सका है ------ सब चलायमान है -------
अनु देख रही हो ना इन किरणो को मेरा मन भी इन किरणो की तरह तुम से दूर जाने का नहीं होता------- सुमित मेरा हाथ पकड कर अक्सर कहते----
हाँ मै भी तुम्हारे जाने पर उदास हो जाती हूँ----- इन लहरों की तरह------ सुमित हसरत भरी निगाह से देखते और मैं उनकी बाहों मे समा जाती------
अनुजी कहाँ खोई हैं आप----- मैं यहाँ कब से खडा हूँ-----सुजान की आवज़ सुन कर चौँक पडती हूँ ------
ओह तुम आओ बैठो-----मैने कुरसी की तरफ इशारा करते हुये कहा-------सुमित की यादों मे खोई सुजान के आने की आहट सुन ही ना पाई थी-------बैठो मैं पानी लाती हूँ-------मैं उठते हुये बोली-----
पानी नहीं मै आज आपके हाथ की चाय पीना चाहता हूँ------- बहुत दिन से आपके हाथ की बनी चाय नहीं पी---- सुजान ने सीधा मेरी आँखों मे देखते हुये कहा---तो अन्दर से काँप गयी ------ वही चमक थी आँखों मे------ मैं कैसे धोखा खा सकती हूँ -------
अभी बन कर लाती हूँ मुझे तो वहाँ से उठने का बहाना चाहिये था------ मै तो सुजान की आँखों से दूर रहना चाहती थी------- उस के आते ही मै असहज हो उठी थी
नहीं पहले बैठो मै आपसे कुछ बात करना चाहता हूँ------ बैठो-----
मै उठते उठते बैठ गयी------
क्रमश:

19 July, 2009

तुम ज़िन्दा हो------- कहानी

जाने क्यों इस सुरमई शाम का अब भी मुझे इन्तज़ार रहता है--- जब सूर्य देवता दूसरी दुनिया को रोशन करने चल पडते हैं तो इस दुनिया को अलविदा कहती किरणों की विरह से आत्मसात होना एक सकून देता है-------- देखती रहती हूँ तब तक --- जब तक कि आखिरी किरण विदा नहीं ले लेती------- फिर सुबह की पहली किरण का इन्तज़ार ------- तो और भी------ अच्छा लगता------ सतलुज दरिया पर जैसे ही सुबह की पहली किरन अपनी झलक दिखाती-----शांन्त बहते दरिया मे लहरें मचलने लगती------ शोख किरणो की सरगम पर अठखेलियाँ करती लहरों का नृत्य देखते ही बनता था------- सारा दिन किरणो और लहरों की आँख मिचौली चलती रहती------ शाम होते ही लहरें शाँत हो दरिया मे समा जाती------- बिलकुल मेरी तरह-----उदास---जीवन है तो बस जीना है------ सुमित के बिना---- जीवन की उमँग के बिना-------झरों की तो अगली सुबह फिर आयेगी------- कहीँ और--- पर मैं------- बस यादें ही तो रह गयी हैं-------- प्यार और आदर्शों से सनी इस घर की एक एक ईँट ----इस सुर्मई शाम मे उदास हो उठती है-----अब सुमित के ठहाके जो नहीं गूँजते------- जब पूरा परिवार शाम को इस लान मे चाय पीता तो सुमित की हँसी शरारतों से लहरें भी मचलने लगती आसपास के पेद पौधेलहरा कर उसे और बहका देते----- सुमित की आँखों की चमक तब देखते ही बनती थी------ीनहीं आँखों की दिवानी थी मैं--------- एक अजीब कशिश थी उन आँखों मे---
छ्ह वर्ष हुये थे मुझे व्याह कर इस घर मे आये ---- मैं सुमित के साथ इस परिवार को पा कर धन्य हो गयी थी--- इन के पापा एस डी ओ रिटायर हुये थे और मम्मी सुघड गृहणी थी------ एक बहन थी जिसकी शादी हो चुकी थी ----- छोटा सा पढा लिखा परिवार था सुमित डेफेंस मे थे ----- जब हमारी शादी हुई तो सुमित अम्बाला मे थे------ शादी के 6 माह् के अन्दर ही इन्हे परिवार को साथ रखने की स्वीकृती मिल गयी थी------ सुजान इनका बचपन का सब से प्यारा दोस्त था सगे भाईयों से भी बढ कर प्रेम था दोनो मे------- सुजान की पोस्टिँग भी अम्बाला मे इनकी युनिट मे ही थी------ दोनो गाते बहुत अच्छा थे और सारी युनिट के चहेते थे------- संयोगवश दोनो की पोस्टिंम्ग एक साल बाद लखनऊ हो गयी-------- दोनो कैप्टन बन गयी थे------- एक माह बाद सुमित मुझे भी साथ ले गये -----मौज मस्ती मे ढाई साल कैसे गुजर गये पता हे नहीं चला------- घूमना फिरना ----पार्टियाँ क्लब क्या जीवन था सुजान भी अकसर रोज़ आ जाता था--------
शायद हमारी खुशियों को किसी की नज़र लग गयी थी------- सुजान की ट्राँसफर काश्मीर हो गयी------- सुमित कई दिन उदास रहे-------- उसके बिना पार्टियों मे भी इनका दिल ना लगता था------ तीन महीने बाद ही मनहूस खबर आ गयी कि सुजान उग्रवादियों के साथ मुठभेद मे घायल हो गया है--------ये सुन कर सुमित घबरा गये------- मुझे नंगल भेज कर खुद छुट्टी ले कर काश्मीर चले गये--- पूरा एक महीना सुजान के पास रहे----- इस हादसे मे सुजान की आँखें चली गयी थी--- सरी युनिट के लोग ही क्या सरा शह्र उदास था सुमित का और हम सब का बुरा हाल था सुमित अपनी मा का अकेला बेटा था पिता छोटी उम्र मे छोड कर चले गये थे ----- उसकी मा को हम लोग अपने घर ले आये थे------- सुमित तो जैसे सुजान की परछाई बन गये थे इनके चार दोस्तों ने प्रतिग्याली कि अगर किसी हादसे मे इनकी आँखें चली जायें तो मरणोपरान्त उनकी आँखे सुजान को लगा दी जायें------- सुजान तो अभी चाहते थे कि उसकी एक आंम्ख उसे लगा दें मगर किसी ने इस की इज़ाजत ना दी------- इसी दौरान सुमित की गुहार और दोनो की दोस्ती और सुजान की लाचारी को देखते हुये सुमित की ट्रांम्सफर भी काश्मीर मे हो गयी ---कश्मीर फैमिली स्टेशन नहीं था------ वैसे भी मै माँ बनने वाली थी------ इस लिये मुझे घर ही रहना पडा------ मैने चान्द से बेटे को जन्म दिया था------ लेकिन अभी सुजान अस्पताल मे थे इसलिये सुमित आ नहीं सके थे------ तीन माह बाद जब उसको अस्पताल से छुट्टी मिली तब् उसे घर ले कर ही आये ----- सुजान का गाँव भी नंगल से दो कि मी पर था मगर इन्होंने फैसला किया कि सुजान नंगल मे हमारे घर ही रहेगा और उसके मम्मी को भी अपने घर ले आये------ गाँव मे सुजान खुश ना रह सकेगा -----मगर उसके मम्मी ने केवल एक हफ्ता तक उसे यहाँ रखा छुटी खत्म होते ही ये चले गये-- और मुझे और पापा को कह कर गये कि कभी क्भी सुजान को घर ले आया करें------ मुझे कहते----अनु तुम जानती हो सुजान मेरी जान है------- उसे कभी उदास ना होने देना------ मैं जल्दी ही उसकी आँखों का प्रबन्ध करूँगा--------
सुमित चले गये------- सब उदास थे इन दोनो की वजह से------ कश्मीर की सीमा पर भी हालात खराब थे अखबारों से ही कुछ पता चलता था------ किसी को घर मे कुछ बता नहीं सकते थे------- और एक दिन-----क्रमश:

18 July, 2009

अपनी बात

मै जब भी कोई कहानी लिखती हूँ तो अक्सर मुझे मेल आती हैं कि ये कहनी मेरे जीवन से सम्बन्धित तो नहीं मैने आज तक लगभग 70 कहानियाँ लिखी हैं क्या 70 ही मेरी हो सकती हैं तो मैं स्पश्ट करना चाहूँगी कि मैं अधिकतर आत्मकथानक मे कहानी लिखती हूँ वो मेरी कहनी नहीं होती मेरे दुआरा लिखित जरूर होती है क्यों कि मैने अस्पताल जैसे स्थान पर नौकरी की है जहाँ ज़िन्दगी को बहुत ही करीब से देखने का अवसर मिला है और मुझे जिस जीवन मे कुछ लिखने योग्य मिला उस पात्र के बहुत करीब गयी हूँ उसे दिल से महसूस किया और उनकी भावनाओं को कागज़ पर उतारा मात्र है इनमे बहुत से पात्र मेरे दिल के करीब अब भी हैं जानती हूँ उनके दुख सुख बाँटती हूँ जिसमे फिर से एक नयी कहानी मिल जाती है इस लिये जिसके साथ कहानी लिखा हो वो केवल कहानी होती है ----हाँ अपने जीवन से संमबन्धित कुछ प्रसंगों को भी कहानी का रूप दिया है उन्हें भी आपके सामने रखूँगी और जरूर बताऊँगी कि ये मेरी कहानी है
अपने बारे मे --अपनी रचनाओं के बारे मे स्वयं कुछ लिखना कठिन भी है और रोचक भी कारण कि अपनी निन्दा करना खुद को बुरा लगता है और प्रशंसा करना पाठक को------ वास्तव मे अपनी निगाह मे अपने को देखना असम्भव जैसा है क्यों कि हम उसे केवल अपने नज़रिये से देखते हैं लेकिन भावुक और संवेदनशील व्यक्ति स्वयं को अभिव्यक्त किये बगैर रह भी नहीं सकता
साहित्य हृदय की पुकार है--मनुष्य के आन्तरिक मनोभावों का बाह्म चित्रण है --साहित्यकाए समाज के आन्दर निवास करता है और समाज के अन्याय और् प्रिस्थितियों से प्रभावित होता है इस लिये वो समय की धारा और परिवेशगत प्रभावों से अछूता नहीं रहता--कहना ना होगा कि साहित्य का मूल तत्व जीवन हैऔर उसे साकार करने वाली शक्तियाँ प्रिस्थितियों मे होती हैं कोई भी रचना बादल से गिरी हुई बून्द नहीं होती रचना तो हृदय की उर्वर्क भूमि मे ही अँकुरित होती है और बुद्धि इस की परवरिश करती हैमेरा मानना है कि मनुष्य़ अपने सुख दुख से ही प्रभावित नहीं होता दूसरों के दुख सुख भी उसे प्रभावित करते हैंइस निगूढ्रहस्य को हृदयंगम कर कोई भी रचनाकार कल्पना के सहारेअपने भावों को प्रकट कर सकता हैसंवेदना ही इस कल्पना की जननी है लेकिन कल्पना भी एक शक्तिशाली सत्य होती है क्यों की ये मानसिक अनुभूतियों वेदनाओं और रंग विरंगेसामाजिक और परिवेशगत प्रभावों का अद्भुत प्रतिफल है चूँकि मैअपने पारिवारिक और सामाजिक परिवेश एवं उसके प्रभावों की साक्षी रही हूँ जिसे मैने अन्य लोगों के साथ अपनी रचना प्रक्रिया के जरिये बाँटना चाहा है कहानी किसी की भी हो मगर जो बात ज़िन्दगी की रेत पर कई सवाल छोड जाये वो कहानी समाज की कहानी बन जाती है सो मेरी कहानियां समाज की कहानियां हैं मुझे ज़िन्दगी के बारे मे लिखना पढना जानना और चिन्तन करना बहुत अच्छा है

17 July, 2009

खुशखबरी खुशखबरी

17 जुलाई 2009 को हिन्दीअजित समाचार मे श्री बद्रीनारायण तिवारी जी का एक आलेख छपा है जिसमे उन्होंने लिखा है कि------- राष्ट्र भाषा हिन्दी भाषियों को ये जान कर खुशी होगी कि आप हिन्दी मे बोलते जायेंगे और कम्प्यूटर आपका आग्याकादी बन कर हिन्दी मे लिखता जायेगा हिन्दी प्रेमी वैग्यानिक दिल्ली महनगर स्थित भारतीय आई टी सोहाईटी सेंटर फार दिवेलप्मेन्ट आफ एडवाँस कम्प्यूटरिँग सीडैक मे ये साफ्ट्वेयर तैयार किया जा रहा हैविगत 10 महीनो से इस पर् 35 वैग्यानिक काम कर रहे हैंशब्द सुन कर टाईप किया जाने वल ईन्जन तैयार किया जा चुका हैइन दिनो हिन्दी बोलने की विभिन्न शैलियों और शब्दों का डाता बेस तैयार किया जा रहा है जिसके लिये 5000 लोगों की आवाज़ के नमूने लिये गये हैंजो लिखेंगे कम्प्यूटर हिन्द मे बोल कर बतायेगा कि आपने क्या लिखा है यही नही इसकी विशेशता ये भी है किये हिन्दी का अंग्रेजी मे और अंग्रेजी का हिन्दी मे अनुवाद भी करेगा इसके अतिरिक्त आठ और देशों की भाशा मे भी अनुवाद करेगाइससे संब्न्धित अधिकारियों ने बताया कि ये तीन चरणो मे हिन्दी भाशा को इन देशों की भाशा मे अनुवाद कर सकेगा प्रारम्भ मे ये साफ्टवेयर लोगों को निशुल्क उपलब्ध करवाया जायेगा ताकिफीडबैक से इसकी त्रुटियों को सुधारा जा सके इसे तकनीक ढंग से मोबाईल पर् काम करने के लिये तैयार किया जायेगा विशेशता ये होगी कि इन देशों मे होने वाली परस्पर वार्ता को नौ भाशाओं मे अनुवाद कर के बोलेगा राष्ट्र भाषा हिन्दी के क्षेत्र मे ये एक क्राँतीकारी उपलब्धी है
है ना ये खुशखबरी सभी हिन्दी भाषियों को बधाई

16 July, 2009

चिंगारी---------- गताँक से आगे

मैं समझ नहीं पा रही थी कि रजेश मेरी मुश्किलें क्यों नही समझते-------मै भी इन की तरह नैकरी कर रही हूँ------ और उससे भी अधिक घर का सारा काम---सब की देख भाल ----खुद तो आ कर टी वी के सामने बैठ कर हुक्म चलाने लगते हैं-------- आज ये खाने का दिल है आज वो खाने का दिल है---------
फिर एक दिन मेरी पदोन्नती हो गयी----मै स्कूल की हैड बन गयी थी-------सारा स्टाफ घर बधाई देने आया------ अनुज नया टीचर भी आया था मुझे दीदी कहता और बडा सम्मान करता था-----वो सब से अधिक खुश था-------दीदी मै तो बहुत खुश हूँ-------अप हेड बनी हैं तो स्कूल का जरूर सुधार होगा------हम सब आपके साथ हैं मैं भी बहुत खुश थी-----पर मै देख रही थी कि राजेश को उतनी खुशी नही है------मैने रात को पूछा कि---क्या मेरी प्रोमोशन से आप खुश नहीं-----
मुझे क्या हुआ है-----हाँ एक बात बता दूँ कि इन चापलूस लडकों से दूर ही रहा करो-----कैसे चहक रहा था-----
और मेरी सारी खुशी काफूर हो गयी------राजेश मुझे आगाह नही कर रहे थे---ये उनके अन्दर एक हीन भावना पनपने लगी थी वो बाहर निकल रही थी----- खुद भी मेरे जितनी मेहनत करते पढते-- मैने कौन सा मना किया था------ मैने इन से कई गुना अधिक मेहनत की थी---सारी जिम्मेदारियाँ निभाई फिर भी ये खुश नहीं हैं-----इनको तो मुझ पर नाज़ होना चाहिये-----
मगर मैं भी पागल थी------औरत का वर्चस्व आदमी से बढे ये आदमी को कैसे सहन हो सकता है------ किसी पार्टी मे किसी के घर जब कोई मेरी प्रशंसा करता--मुझ से कोई डिस्कशन करता तो इन्हें वो भी अच्छा ना लगता ----लोगों के सामने अपनी होशियारी झाडती रहती हो ये दिखाने के लिये कि तुम मुझ से अधिक समझ दार हो----- अगर किसी सहेली या सहयोगी के घर जाना पडता तो मना कर देते मुझे अकेले ही जाना पडता वो भी इन्हें अच्छा ना लगता-----धीरे धीरे दोनो के बीच का फासला बढने लगा था------ फिर अचानक माजी और बाऊजी का एक ही साल मे निधन हो गया और देवर की नौकरी दूसरे शहर मे लग गयी--दो साल मानसिक परेशानी मे निकल गये----- इस दुख के समय मे मै राजेश के साथ खडी रही------ कुछ कहते भी तो खून का घूँट पी जाती----- बस उन्हें खुश रखने की हर कोशिश करती-------माँ और बाऊ जी के ना रहने से राजेश को किसी का डर और चिन्ता ना रही-----फिर शराब पीनी शुरू कर दी पी तो पहले भी लेते मगर बाऊ जे से छुप कर----- साल भर मे ही इन्हें जैसे शराब की लत लग गयी रोज़ ही पीने लगे------ बहुत कहती मगर जितना कहती उतना ही और पीते---- मै कमाता हूँ तुम्हारी कमाई से नहीं पीता------धीरे धीरे दोस्तों के साथ महफिल सजाना शुरू कर दिया क्भी कहीं तो कभी कहीं-----मुझे समझ नहीं आ रहा था कि राजेश को हो क्या गया है----- उनकी समस्या क्या है-----बेटी बडी हो रही थी उस पर क्या प्रभाव पडेगा-----मै मन ही मन घुट रही थी------ अभी जिम्मेदारियों से मुक्त हुये थे कि अब सुख के दिन आयेंगे पैसे की कमी नहीं थी फिर जिस आदमी को आसानी से जीवन मे सब कुछ मिल जाये वो ऐश के सिवा क्या सोच सकता था------- घर चलाने के लिये कमाऊ पत्नि थी ही-----
परिवार के लिये मेरा समर्पण मेरा कर्तव्य था पैसे का सुख सब ने भोगा मगर घर की लक्ष्मी की किसी ने सुध नही ली------मैं सब कुछ सह सकती थी मगर राजेश की ये ऐयाशी नहीं---- माँ अनपढ थी तो पति के मन ना भाई और मै पति से अधिक पढ गयी तो पति के मन ना भाई औरत के लिये क्या जगह है इस समाज मे----- आदमी के लिये तो चित भी मेरी और पट भी मेरी------ अब बचपन से मन मे सुलगती चिँगारी फिर से सिर उठाने लगी थी----- राजेश कुछ भी सुनने को तैयार ना थे रोज़ शराब पी कर आना और दोस्तों के साथ आधी रात तक ताश खेलना येही इनका काम रह गया था------अगर मै कहती कि जिन के साथ बैठ कर शराब पीते हो वो अच्छे लोग नहीं हैं----तो शब्दों के नश्तर कहीं गहरे तक उतार देते--------हाँ तुम अफसर बन गयी हो----अब तुम्हें मेरे दोस्त क्या मै भी छोटा नज़र आने लगा हूँ------कभी अपने पीछे नज़र मार कर देखा है कि किस रईस के घर से आयी हो --तुम्हारे भाई नहीं पीते कया-------
अब मैने राजेश से कुछ भी कहना छोड दिया था-----
उस दिन राजेश बारह् बजे तक घर नहीं आये---- बडी चिन्ता हुई ----- ये भी जानती थी कि अधिक पी ली होगी तो किसी दोस्त के घर होंगे----- क्या करती मन मे एक डर भी था कि पी कर स्कूटर चलायेंगे कहीं रास्ते मे गिर ना पडे हों---- हार कर आधी रात को पडोसियों को जगाया------- साथ वाले शर्मा जे बहुत शरीफ् इन्सान थे---उन्हें मैने इनके एक दोस्त का पता दिया जिसका मुझे पता था कि अकेले रहते हैं और उनके साथ बैठना उठना अधिक है----- शर्मा जी अपनी गाडी मे इनको ले आये----- बडी मुश्किल से गाडी तक लाये थे ------फिर घर आ कर बडी मुश्किल से गाडी से उतारा---- और बेडरूम तक पहुँचाया------ शर्मा जी के जाते ही राजेश शुरू हो गये------- तो पीछे से शर्मा के साथ रास रचाती हो-------- ये आधी रात तक यहाँ क्या कर रहा था------ नीच कमीनी औरत आखिर तुम ने अपनी औकात दिखा ही दी---------- और जूता उतार कर मुझ पर फेंक दिया------- ये डाँट फटकार अब रोज़ इनका काम हो गया था बहाना तो कोई भी ढूँढ लेते
उस समय मेरी हालत क्या हुई होगी ये कोई भी समझ सकता है------- रोश उबल पडा------ क्रोध से दिल जिस्म अँगारा बन गया------- चिंगारियाँ उठने लगी------- बचपन से अब तक जितनी आग थी सुलग उठी------ आज उस चिंगारी ने मेरे स्त्रित्व के वज़ूद को जला कर राख कर दिया------- मेरे संस्कार समर्पण त्याग और कर्तव्य सब विद्रोह कर उठे------- अब नहीं सहेंगे ये उत्पीड्न------- ये अपमान ------- और आज मैने एक नया विद्रोही्रूप पाया -- ----- अगले कुछ दिन मैं चुपचाप रही मगर मैने अपनी ट्राँसफर चुपके से करवा ली और एक दिन राजेश को बिना बताये घर छोड कर अपनी बच्ची को ले कर दूसरे शहर चली आयी-----
नहीं जानती कि अच्छा किया या बुरा------ क्या खोया क्या पाया----स्वाभिमान या अभिमान ----- गर्व या दर्प कोई कुछ भी कहे-------क्या फर्क पडता है ---मैं तो बस जीना चाहती हूँ अपनी बच्ची के लिये------- अपने वज़ूद के साथ ------ टुकडों मे कोई कब तक जी सकता है------- स्वाभिमान का अधिकार मुझे चाहिये------ नहीं तो ये चिंगारी पूरे समाज को ---सृ्ष्टी को जला देगी----- बेटी को इस चिंगारी की भेट नही चढने देना चाहती थी------
काश कि पुरुष जौहरी होता------- सहेज लेता नारी मन और उसके अस्तित्व को------- नहीं तो अपना वज़ूद खो कर पत्थर बन जायेगी----- या विध्रोही आग मेरी इस चिंगारी को कसौटी पर कसना समाज का काम है-----जरूरत भी है समाज के वज़ूद के लिये ------ आप क्या कहते हैं कि ये चिंगारी यूँ ही सुलगती रह्ती या इसे बुझाने के लिये जो मैने किया वो सही है------ ऐसी ना जाने कितनी चिंगारियां रोज़ सुलगती हैं------- आपके जवाब का इन्तज़ार रहेगा
---- समाप्त्

15 July, 2009

चिँगारी----गताँक से आगे

मेरे अण्दर की चिँगारी फिर दहकी------- और मै घर पर ही बी ए की तैयारी करने लगी तीन साल मे फर्स्ट क्लास मे बी ए पास कर ली----- बडा भाई दो वर्ष कालेज मे लगा कर घर बैठ गया-------छोटा बी काम मे पाँच साल लगा कर पास हुआ---- और प्राईवेट फैक्ट्री मे मुनीमी करने लगा---लडके कुछ बिगडैल भी थे ---मगर उस के लिये भी माँ को ही जिम्मेदार ठहराया जाता-------जैसी माँ वैसे ही बेटे------ माँ ने ही बिगाडे हैं-----कई बार सोचती पिता जी भी क्या करें---पैसा कमाना कौन सा आसान काम है------ मैने सोच लिया था कि मै भी नौकरी करूँगी ताकि अकेले पति पर बोझ ना पडे------ पर जब पिता जी शराब पी लेते और दोस्तों मे बैठ कर गप शप करते और ताश खेलने मे समय बर्वाद करते तो मन मे फिर एक चिंगारी उठती उन के इस अधिकार के प्रति----क्या वो बच्चों की पढाई के लिये देखभाल के लिये ये समय नहीं बचा सकते------ये जन से सुलगती चिंगारी शायद औरत की चिता के साथ ही जाती है-----
अब मेरी शादी के लिये लडका ढूँढा जाने लगा----पिताजी ने अपनी सामर्थ्य के अनुसार राजेश को दामाद के रूप मे ढूँढ लिया------- बाहरवीं के बाद सरकारी दफ्तर मे क्लर्क------- उस सरकारी नौकरी के सामने मेरी बी ए बेमायने थी----- पर अन्दर कहीँ एक सकून था किाब अनपढ और फूहड तो नहीं सुनना पडेगा------मेरे संस्कारों या समाज की परंपरा ने अन्दर से आवाज़ दी या सवधान किया------ कि अपने कोकहीं लाट साहिब ना समझ लेना----याद रखना कि पति को कभी ऐसा आभास ना हो कि तुम उससे अधिक पढी हो
शादी धूमधाम से--जितनी हो सकती थी हो गयी-------सब ने सर आँखों पर बिठा लिया------नई नई शादी मे सब सुहाना लगता है-------मगर मै कुछ ही दिनों मे जान गयी थी कि स्थितीयाँ यहाँ भी मायके से कुछ अलग नहीं है------- संयुक्त परिवार मे एक छोटा भाई और दो जवान बहने----सास ससुर-----राजेश ही बडे और अकेले कमाने वाले थे-- बाबु जी अब रिटायर हो चुके थे -----शादी के तीन महीने बाद ही मेरा बी एड का इम्तिहान था------घर के काम से फुरसत कहाँ मिलती थी ---ननदें भी पढ रही थी कोई मदद भी नहीं करता-----मैने सोच लिया था कि जैसे तैसे पेपर दूँगी------राजेश को मेरी पढाई से सरोकार ना था---कहते कहीं ना कहीं कलर्क की नौकरी ढूँढ लेंगे-----मगर मैं जानती थी कि मै आगे और पढ कर तीचिंग लाईन मे जल्दी पदोन्ति पा लूँगी---- किसी तरह मैने बी एड भी पास कर ली------और् रोज टीचर के लिये वेकैंसी देखने लगी------मेरा निश्चय रंग लाया और मुझे पास के ही सरकारी स्कूल मे नौकरी मिल गयी-------
जहाँ घर मे सब को मेरी आमदन से खुशी थी वहाँ काम की भी समस्या खडी हो गयी-------ाब बहू घर मे हो तो सस्स काम करते हुये कहाँ अच्छी लगती है------फिर मै औरत ---त्याग समरपण की देवी----- घर मे किसी तरह की कलह ना हो मैं भाग भाग कर काम करती------- बहु सुबह इतनी भाग दौड करती हो कुछ काम इसके लिये भी छोड दिया करो--- और मै इसी बात पर खुश हो जाती कि चलो किसी को तो एहसास है मेरी तकलीफ का
ज़िन्दगी चल रही थी चार वर्शों मे ननदों की शादी कर दी देवर इँजनीयरिंग करने लगा ---- और मेरे फूल सी बेटी आ गयी------पता नहीं चला समय कैसे भाग रहा है ----मैने एम ऎ भी कर ली थी जिम्मेदारिओं से जरा फुरसत मिली तो जाना कि मेर स्वास्थ्य भी बिगडने लगा था------ अपने पहरावे के प्रति भी लापरवाह हो गयी थी------ अब पता नहीं क्यों मुझे लगता कि राजेश हर बात पर मुझ पर हावी होने की कोशिश करते रहते हैं------ मेरे खाने पहनने घर के काम मे सोने उठने हर काम मे उन्हे कुछ् ना कुछ बोलने के लिये मिल ही जाता है-------- तन्ख्वाह इनको देती थी----ापने लिये या बच्ची के लिये कुछ लेना होता था तो इन से माँगना पडता था पहले पहले तो जितने पैसे माँगती दे देते थे ये नहीं पूछते थे कि क्या लेना है------ मगर अब पहले पूछते फिर सलाह देते कि इस चीज़ की क्या जरूरत है----------ागर कहूँ कि कपडे सिलवाने हैं तो कहते कि अभी क्या जरूरत है दो महीने पहले तो सीट सिलवाया था-------चार महीनी भी इन्हें दो महीने लगने लगते-----फिर कुछ न कुछ बोल कर थिडे बहुत दे देते-----जिसमे सूट तो आ जता मगर मर्जी का नहीं-----चु्प रह जाती------ मैं कमाती थी अपनी मर्ज़ी का क्यों ना खाऊँ पहनूँ चिँगारी फिर उठती मगर उसे हवा न लगने देती------ घर की शाँती के लिये-------
घर मे कभी मेरी सहेलियाँ आ जाती--- और जब कभी कोई पुरुष सहकर्मी आ जाते तब तो राजेश को बहुत बुरा लगता------ और कई बार मेरे बन ठन कर रहने पर भी ताने कसने लगते------- अब मैने डबल एम ए भी कर ली घर के काम---- पढाई --बच्चे की देखभाल सास ससूर की जिम्मेदारी और कई छोटे मोटे काम मे सारा दिन निकल जाता कई बार इनका कोई छोटा मोटा काम रह जाता ---कमीज प्रेस करना भूल जाती ---बटन लगाना भूल जाती---- नहाने के लिये तौलिया या अन्डर वीयर बनियान रखना भूल जाती तो शुरू हो जाते----- चार अक्षर क्या पढ गयी अपनी औकात भूल गयी------- अब मेरे लिये तुम्हारे पास समय ही कहाँ है------ अपने सजने संवरने से समय मिले तब ना-----तब मेरी याद आये---- मै समझ नहीं पा रही थी कि राजेश मेरी मुश्किल क्यों नहीं समझते--------

क्रमश

14 July, 2009

चिँगारी (कहानी )

ये मेरी कहानी सरिता पत्रिका मे मई 15 के अँक मे छप चुकी हैैऔर मेरे कहानी संग्रह प्रेम सेतु मे भी

जीवन मंथन मे नारी के हाथ सदा विष ही लगा है1 आज निर्नय नही ले पा रही थी---------बच्ची का भविष्य ---समाज्के बारे मे सोचती तो नारी अस्तित्व के पहल कर्तव्य् त्याग और समर्पण मुझे रोक लेते----तभी भीतर से एक चिँगारी उठती -----पुरुष के अधिकारों के प्रति-------नारी के शोषण के विरुद्ध ---क्या करूँ-----मै ही क्यों घर और बच्चों की परवाह करूँ--------जब राजेश का कठिन् समय था मैने अपना कर्तव्य निभाया-------ापने सुख और इच्छाओं को त्याग कर अपने आप को पूरे परिवार के लिये समर्पित कर दिया-----मगर आज मेरे साथ क्या हो रहा है---अवहेलना-------तिरस्कार-----नहीं नहीं-----ये चिँगारी अन्दर से यूँ ही नहीं उठती-----इसने मेरा संताप देखा है----कहीं करीब से----जिसे अगर शाँत ना किया तो सब बर्बाद हो जायेगा------
मैने अपने अस्तित्व को बचाया या बर्बाद किया---पता नहीं------ये सोचना समाज का काम है मगर अब मैं अबला बन कर नहीं जीना चाहती--------चाय का अखिरी घूँट अन्दर सरकाया---मन कहीं सकून भी आया कि अन्याय सहन करने की कायरता मैने नहीं की ----ापना स्वाभिमान और अधिकार पाने का हक मुझे भी है-------
सब से अधिक बात जो मुझे कचोटती------एक तो बैठे बिठाये हुक्म चलानऔर दूसरा सब के सामने जरा जरा सी बात के लिये मुझे लज्जित करना-------घर की मेरी या बच्चे की कोई जिम्मेदारी नहीं समझना-----डाँटना जैसे मेरा कोई वज़ूद ही नहीं------मायके वालों के उल्लाहने----कभी मेरे मायके मे कोई शादी ब्याह आ जाता तो जाने के नाम पर सौ बहाने----ाउर खर्च की दुहाई-----दिन रात शराब के लिये पैसे थे------तब मन कचोट उठता ----जब मुझे अकेले जाना पडता-------जिस प्रेम प्यार और खुशियों की कामना की थी उनका तो कहीं अता पता ही नहीं था-------बस एक व्यवस्था के अधीन सब चल रहा था-------समाज के लिये ये छोटी छोटी बातें हैं मगर एक पत्नि के लिये बहुत कुछ-------लोग अक्सर कहते हैं कि पति पत्नि के बीच ये छोटी छोटी बातें तो होती रहती हैं---मगर ये नही सोचते कि पत्नि के लिये पति का प्यार और सतकार भी जरूरी हैउसके अभाव मे ये छोटी छोटी चिँगारियां अक्सर भयानक रूप ले लेती हैं---------
बचपन से माँ को देखती आई थी सुबह से शाम तक कोल्हू के बैल की तरह घर के काम मे जुटी रहती-----सब की आवश्यकताओं के लियी सदा तत्पर रहती --- ना खाने का होश ना पहनने की चिँता------शाम ढले जब पिताजी घर आते तो शुरू हो जाते-------- ये नहीं किया ---वो नहीं किया-----ये ऐसे नहीं करना था ---ये वैसे नहीं करना था------पता नहीं सारा दिन घर मे क्या करती रहती है--------एक रोटी सब्जी का ही तो काम है----उन्हें क्या पता कि रोटी सब्जी के साथ और कितने काम जुडे होते-------- हैं बच्चों की-- बज़ुर्गों की सब की जरूरतें---घर की साफ सफाई--------किसे कब क्या चाहिये कपडे धोना बर्तन साफ करना और बहुत से काम-------मगर माँ ने कभी उन्हें ये ब्यौरा नहीं दिया-------चुप चाप लगी रहती------मगर जब शाम को किसी दोस्त के साथ एक दो पेग लगा कर आ जातेतो माँ ही क्या दादा- दादी ाउर बच्चे भी सहम जाते-------पेग लगा कर बाकी केधिकार जताने का बल भी आ जाता---------माँ फिर भी सहमी सहमी स गरम गरम खाना परोसती---ेअपने लिये या बच्चों के लिये बचे ना बचे मगर्ुनकी थाली मे कोई कमी ना रहे जरा सी भी कमी हुई नहींकि भाशण शुरू--------ढंग से खाना भी नहीं खिला सकती------कैसी अनपढ मूरख औरत से पाला पडा है--------
यही सब देखते हुये बडी हुई--------ये एक घर की बात नहीं थी पास पडोस -----रिश्तेदारी------मध्य्म और निम्न वर्ग मे तो बहुधा औरतों को घुट घुट कर जीते देखा है मन मे विद्रोह की एक चिँगारी सी सुलगती और मेरे भीतर एक आग भर देती -------मैं घुट घुट कर नेहीं जीऊँगी--------मैं पढुँगी लिखूँगी और पति के कँधे से कँधा मिला कर चलूँगी----मैं विद्रोह कर के जीना नहीं चाहती थी------बल्कि अपना एक व्ज़ूद कायम कर पति की मन मानी और प्रताडना के विरुद्ध एक कवच तैयार करना चाहती थी------शायद मै गलत थी----पुरुष के अधिकार क्षेत्र मे स्त्रि का हस्ताक्षेप---ताँक झाँक------एक अबला सबल का मुकाबला करे--------पुरुष को कहाँ मँजूर-------उस बचपन की चिँगारी ने यही इच्छा बलवती की कि मैं माँ की तरह अनपढ् नहीं रहूँगी-------- पर ये भी कहाँ उस समय की मध्यम वर्ग के परिवार की लडकी के वश मे था--------पिता जी एक मामूली क्लर्क थे--------घर मे हम दादा दादी --तीन भाई बहन और माँ और पिता जी थे सात सदस्यों के परिवार का एक कलर्क की पगार मे कैसे निर्वाह हो सकता था---उपर से पिता की शराब-------- उन के लिये दोनो लडकों को पढाना जरूरी था-------क्यों कि वो घर के वारिस थे और पराई लडकी का क्या वो तो मायका ससुराल दोनो मे पराई ही होती है-------इस मनमानी का अधिकार भी पिताजी के पास ही था और इसे मनना सब का कर्तव्य था--------- बाहर्वीं पास करने के बाद मुझे घर मे बिठा दिया गया-------ागले कर्तव्य की ट्रेनिँग ----घर के काम काज के लिये-------
मेरे अँदर की चिँगारी फिर दहकी और मैं घर पर ही बी ए की तयारी करने लगी------
- क्रमश---

12 July, 2009

मेरी तलाश (कविता )

मुझे तलाश थी
एक प्यास थी
तुम्हें पाने की
तुम मे आत्मसात हो जाने की
तभी तो
डूबते सूरज की एक किरण को
आत्मा मे संजोये निकली थी
तुम्हें ढूँढने
मैने देखा
कई बडे बडे देवों मुनियों को
किन्हीं अपसराओं मेनकाओं पर
आसक्त होते
तेरे नाम पर लडते झगडते
लूटते और लुटते
तेरे नाम पर
खून की नदियाँ बहाते
aअब कई साधु सँतों की दुकानों पर
तेरा नाम भी बिकने लगा है
फिर मन मे सवाल उठते
तेरी लीलाओं पर
कैसे तुम भरमाते हो
जानती हूँ
मेरी प्यास के लिये भी
तुम नित नये कूयेँ
दिखा देते हो
डूबती नित मगर प्यास
फिर भी शेष रहती
तुम्हें पाने की तुम मे
आत्मसात हो जाने की
इस लिये मैने तुम्हारी सब तस्वीरों को
राम -कृ्ष्ण खुदा गाड
सब को एक फ्रेम मे
बँद कर दिया है
ताकि तुम आपस मे
सुलझ लो और खुद लौट आयी हूँ
अपने अन्तस मे
और यहाँ आ कर मैने जाना की
मुझे तेरे किसी रूप को चेतना नहीं है
बल्कि तुम सब की सी
चेतना को चेतना है
तुझे पूजना नहीं है
तुम सा जूझना है
त्तुम्हें जपना नहीं
तुम सा तपना है
तुम्हारी साधना नहीं
खुद को साधना है
कितना सुन्दर है
धर्म से अध्यात्म का पथ
जहाँ तू मैं सब एक है
और अब मेरी प्यास
शाँत हो गयी है

11 July, 2009

एक कवि दरबार ऐसा भी

कल यू के के एक रेडिओ चैनल् के लिये एक आन लाईन कवि दरबार हमारे शहर नंगल टाउन शिप मे आयोजित किया गया इस रेडिओ चैनल को य़ू के की एक एन जी ओ हर माह पंजाब के किसी ना किसी शहर मे आयोजित करती है इस बार इसे लंदन के प्रवासी पंजाबी स दलजीत सिंह कालडा जी ने सपाँसर किया था इसके आयोजन की रूप रेखा तो नौ जून को ही निश्चित हो गयी थी मगर इसका आयोहन करने वाले साहित्यकार अचानक बीमार हो गये मुझे नौ जुलाई रात को मिसज किरन राय जी का फोन आया कि हमारी कुछ सहायता करें ताकि इसका आयोजन समय पर किया जा सके इतने अल्प समय मे साहित्य प्रचार मंच और अखर चेतना मंच ने मिल कर सभी कवियों से संपर्क किया मुश्किल इस लिये था कि इसका समय बहुत औड था 10 और 11 की रात को तीन बजे से सुबह 6-30 तक फिर भी हमारे कविओं ने साथ दिया औरतों के लिये समय 4-30 बजे रखा गया इस प्रोग्राम की एनाउँसर मिसेज किरन रइ जी थी जो सुबह 2-30 पर ही तयार हो कर आ गयी थी- किरन जी अभी एम एस सी आई टी की पढाई कर रही हैं और इस एन गी ओ के साथ मिल कर पंजाब मे उनकी ओर से चलाये जा रहे लोक भलाई के कार्य भी देखती हैं हर माह कवि दरबार भी आयोजित करती है वो एनाउँसर हैं और इसके हेड श्री हरबँस हीओन जी हैं
ये कवि दरबार इनका अठाहरवाँ कवि दरबार था इसमे कुल बीस लोगों ने भाग लिया जिनमे चार औरतें एक दस साल का लडका जिसने अपनी लिखी कविता पढी और बाकी पुरुष थे हम लोग मोबाईल पर कविता पढते जो साथ साथ यू के के इस चैनल पर प्रसारित हो रही थी ये चेनल एक सौ अठतालीस देशों मे चलता है सब इतने उत्साहित थे कि किसी को ये आभास तक नहीं हुआ कि हम लोग आधी रात से जाग रहे हैं चाय आदि का प्रबँध भी उन लोगों ने हमे नहीं करने दिया और कवि सम्मेलन समाप्त होने पर सब को एक एक लिफाफा दिया घर आ कर देखा तो उसमे पाँच सौ रुपये थे यहाँ ये रुपये मायने नहीं रखते जो कवि दरबार मे आनन्द आया उसके आगे कितने भी पैसे बेकार होते इसका पूरा विवरण मैं अपने पँजाबी ब्लाग पंजाब दी खुश्बू मे दूँगी मुझे इस बात का दुख रहा कि इसकवि दरबार मे कोई गौतम राज रिशी जी जैसे सज्जन नहीं थे जो इस की पूरी रेकार्डिँग कर सकते वैसे बाद मे वो इसकी पूरी सी डी बनवायेंगे और हमे भी देंगे तब तक आपलोग भी इन्तज़ार करें हां ये बताना भूल गयी कि ये पंजाबी कविता गज़ल के लिये ही आयोजित किया जाता है
is chennel kaa adress--- www.panjab radio.com.uk

09 July, 2009

अमर कवितायें (कविता )

कुछ कवितायें
कहीं लिखी नहीं जाती
कही नहीं जाती
बस महसूस की जाती हैं
किसी कोख मे
वो कवियत्री सीख् लेती है
कुछ शब्द उकेरने
भाई की कापी किताब से
जमीन पर उंगलियों से
खींच कर कुछ लकीरें
लिखना चाह्ती है कविता
बिठा दी जाती है
डोली मे
दहेज मे नहीं मिलती कलम
मिलता है सिर्फ
फर्ज़ो का संदूक
फिर जब कुलबुलाते हैं
कुछ शब्द उसके ज़ेहन मे
ढुढती है कलम
दिख जाता है घर मे
बिखरा कचरा,कुछ धूल
और कविता
कर्तव्य बन समा जाती है
झाडू मे और सजा देती है
घर के कोने कोने को
उन शब्दों से
फिर आते हैं कुछ शब्द
कलम ढूढती है
पर दिख जाती हैं
दो बूढी बीमार आँखें
दवा के इंत्ज़ार मे
बन जाती है कविता करुणा
समा जाते हैं शब्द
दवा की बोतल मे
जीवनदाता बन कर
शब्द तो हर पल कुलबुलाते
कसमसाते रहते हैं
पर बनाना है खाना
काटने लगती है प्याज़
बह जाते हैं शब्द्प्याज़ की कडुवाहट मे
ऐसे ही कुछ शब्द बर्तनों की
टकराहत मे हो जाते है
घायल
बाकी धूँए की परत से
धुंधला जाते हैं
सुबह से शाम तक
चलता रहता है
ये शब्दों का सफर्
रात में थकचूर कर
कुछ शब्द बिस्तरकी सलवटों
मे पडे कराहते
तोड देते हैं दम
पर नहीं मिलती कलम
नही मिलता वक्त
बरसों तक चलता रहता है
ये शब्दों का सफर
बेटे को सरहद पर भेज
फुरसत मे लिखना चाहती है
वीर रस मे
दहकती सी कोई कविता
पर तभी आ जाती है
सरहद पर शहीद बेटे की लाश
मूक हो जाते हैं शब्द
मर जाती है कविता
एक माँ की
अंतस मे समेटे शहादत
की गरिमा ऐसे ही
कितनी ही कवियत्रियों को
नहीं मिलती कलम
नहीं मिलता वक्त
नहीं मिलता नसीब
हाथ की लकीरों पर ही
तोड देती हैं दम
जन्म से पहले
जो ना लिखी जाती हैं
ना पढी जाती हैं
बस महसूस की जाती हैं
शायद यही हैं वो
अमर कवितायें


07 July, 2009

गताँक से आगे दिल के पन्ने---------- संस्मरण

तीनो जब सफदरजँग अस्पताल पहुँचे तो वहाँ काफी पूछताछ करने पर पता चला कि इस अस्पताल मे जगह नहीं थी उन दिनों सेल्फ इमोलेशन के बहुत केस हो रहे थे इस लिये इस अस्प्ताल मे जगह नहीं मिली थी या कम्पनी वालों का कोई षडयँत्र था------- मुझे आज भी विश्वास है कि अगर उसे सही उपचार मिलता तो शायद बच जाता
उसे जे.पी अस्पताल ले गये थे हमलोग फिर जेपी अस्पताल पहुँचे तब मोबाईल तो होते नहीँ थे---- और जो मुश्किल हमे उस दिन आयी उसे शब्दों मे लिखा नहीं जा सकता एक ओर जवान बेटा जिन्दगी और मौत से लड रहा था दूसरी ओरे कंपनी वालों का ये गैरज़िम्मेदाराना रवैया! फिर हम लोग जे पी अस्पताल पहुँचे तो बाहर कम्पनी की एक गाडी खडी थी---हमने जल्दी मे उन्हे बताया कि हम लोग नगल से आये हैं और शशी के पेरेँटस हैं------वहाँ उसके कुछ दोस्त हमे वार्ड मे ले गये-------
जैसे ही हमने बेटे को देखा कलेजा मुँह को आ गया 80 प्रतिशत बर्न था-----सारा शरीर ढका था----था जैसे वो हम लोगों का ही इन्तज़ार कर रहा था----देखते ही उसने मुझे इशाराकिया कि रोना नहीं और अपने दोस्त को स्टूल लाने के लिये इशारा किया-------हमारे आँसू नहीं थम रहे थे ----उसके दोस्तों ने हमे पानी पिलाया मगर एक घूँट भी हलक से नहीं उतर रहा था------उसने मेरा हाथ जोर से पकड लिया ये दोनो भाई तो बाहर चले गये और उसके दोस्तों से पूछताछ करने लगे------मैने उसके चेहरे को सहलाया--- उसके माथे को चूमा----- और उसके हाथ को जोर से पकड लिया उसके चेहरे और हाथों के उपर के हिस्से के सिवा हर जगह जले के निशान थे---- कपडा उठा कर उसके शरीर को देखने लगी तो उसने मेरा हाथ जोर से दबा कर मुझे मना कर दिया मैने पूछा बेटा ये तुम ने क्या किया--------ये किस जन्म का बदला लिया------उसने बस इतना ही कहा----मैने कुछ नहीं किया ----वो जो मैने बताया था कि------ अभी उसने इतना ही कहा था ---कम्पनी के एक आदमी ने उसे चुप करवा दिया और मुझ से कहा कि आँटी अभी आप बाहर बैठिये डाक्टर आने वाले हैं-----बाद मे आप जितनी चाहें बातें कर लेना वो चुप तो हो गया मगर उसने मेरा हाथ नहीं छोडा और ना ही मैं बाहर गयी--------
सामने लाडला बेटा क्षण क्षण मौत के मुँह मे जा रहा था और हम कुछ भी कर पाने मे असमर्थ -----------
बाहर ये दोनो रो रो कर बेहाल हो रहे थे मगर कोई हमे कुछ भी बताने से कतरा रहा था-----वो एक टक मेरी ओर देख रहा था----पता नहीं कहाँ से उसकी आँखों मे इतना दर्द उभर आया था मुझे लगा कि जलन से दर्द हो रहा होगा मगर वो जान गया था कि मै इन्हें सदा के लिये तडपने के लिये छोडे जा रहा हूँ--------जरा मुंह खोला मैं आगे हुई ------- वो बोला-----जैसे कहीं दूर से आवाज़ आ रही थी-------- मैने आपको बताया था कि मुझे----
कि मुझे सपना आया था कि कोई मुझे---मारने------ के लिये आता है------वो------- और इसके आगे वो कुछ ना कह सका------- बेहोश हो गया-----सारा दिन हम उसके सिरहाने कभी हाथ पकडते कभी उसे बुलाने की कोशिश करते----मगर उसकी नीँद गहरी होती गयी------ उसके दोस्तों ने हमे बहुत कहा कि आपके लिये पास ही कमरे बुक करवा दिये हैं आप चल कर खाना खा लें और आराम कर लें मगर आराम तो शायद जीवन भर के लिये छिन गया था-------फिर वो खाना वहीं ले आये मगर सामने जवान बेटा जाने की तयारी कर रहा हो तो कोई एक भी कौर कैसे खा सकता था------ ुसके बेड के साथ ही हमने एक चद्दर बिछा ली और दोनो वहीं बैठ गये भाई साहिब को जबरन कमरे मे भेज दिया मगर वहाँ कहाँ उनका मन टिकता था अभी पत्नि और बेटी के गम से उभर नहीं पाये थे कि अब बेटा भी----------- बार बार कमरे से बेटे को देखने आ जाते---------
------- मै भी कभी फिर से उसका हाथ पकड कर बैठ जाती----कभी दोनो इसकी बातें करने लगते------उसके दोस्तों से भी सच्चाई का कुछ पता नहीं चला----सब जैसे अजीब सी खामोशी ओढे हुये थे------- बास का कहीं अता पता नहीं था---- अर्जेन्ट काम के लिये गये ---क्या मौत से भी कुछ अधिक काम हो सकता है -----शायद------
हमने उसके शरीर से जब कपडा उठा कर देखा तो उसकी छाती मे बाई ओर चाकू का निशान था चाकू से उसके सीने पर वार कर उपर से
से मिट्टी का तेल डाल कर जलाया गया था------ अगर ये दिल पर चाकू नहीं लगा होता तो शायद वो बच जाता मगर जिसने भी मारा था बडी होशियारी और पूरे पलान से मारा थाएक आदमी का तो काम हो नहीं सकता क्यों कि वो भी 6 फुट का भरवां शरीर का जवान था------ लडकियों की तरह सुन्दर गोरा और बहुत शरमीला सही मायने मे एक इन्सान था------- देश के लिये और समाज के लिये कुछ करने का जज़्वा लिये कुछ भविश्य के पलान मेरे साथ बनाता था-------इससे पहले वो जब घर आया था तो एक महीना घर रहा अर उसने कहा था कि अब आपसे नौकरी छुडवा लूँगा अपने ज़िन्दगी मे बहुत मेहनत कर ली अब हम मिल कर एक ऐसी संस्था चलायेंगे जो गरीब बच्चों की पढाई लिखाई के लिये काम करेगी-------- इस उम्र मे ये जज़्वा मुझे हैरानी होती थी------- आज जब भी ऐसे किसी लडके को देखती हूँ तो मुझे उस मे वही दिखाई देता है-------- बस कम्पनी के लोग इस बात पर अडे रहे कि इसने सेल्फ इमोलेशन की है अब तो कोट दवार जा कर ही कुछ पता लग सकता था-----कभी पोलिस से पाला नहीं पडा था--------- समझ नहीं आ रहा था कि क्या करें-------
अगले दिन तक उसका चेहरा और आँखें भी सूज गयी थी------ अस्पताल वालों का रवैया इतना खराब था कि यहाँ कुछ ना ही कहूँ तो अच्छा है-------सुबह से ही उसके मुँह से काफी सक्रीशन्स निकल्ने लगी थी बाहर से तो साफ कर देते मगर उसके गले से घर्र घर की आवाज बहुत आ रही थी एक बार स्ताफ ने मशीन से साफ किया पर बार बार कहते तो डाँट देती फिर कई बार उनकी नज़र बचा कर मैं मशीन से साफ कर देती------- डरिप की बोतल भी कई बार खुद ही बदल देती------ागले दिन के शाम के 6 बज गये थे और मैं तो आते ही समझ गयी थी कि बस अब इसका हमारा साथ इतना ही है फिर भी जो दो दिन मिले उन्हें जी भर कर उसके साथ जी लेना चाहते थे---------
ये दोनो उसके दोस्तों से बाहर बातें कर रहे थे और मै उसका हाथ पकड कर उसके बेड के पास बैठ गयी----उस समय अपने दिल का हाल शायद मैं दिल छीर कर भी ना बता पाऊँगी मेरे अपने तीन बेटियाँ थी और ये दोनो बेटे थे सोचती हूँ उधार की कोई चीज़ मुझे फलती ही नहीं है------- संकट के समय मेरा सरा ध्यान उस संकट को दूर करने मे होता है मैं औरतों की तरह उस समय ्रोती नहीं हूँ--------- और अब जब जान गयी थी कि ये संकट अब टलने वाला नहीं तो हिम्मत जवाब दे गयी और मेरे सब्र का बाँध टूट गया था उसका हाथ जोर से पकड कर मैं फूट फूट कर रोने लगी--------कोई आज मुझ से मेरी जान ले ले और बदले मे बेटे की जान दे दे------हम सब इसके बिना नहीं जी पायेंगे---------कैसे महसूस होता होगा जब कोई दिल का टुकडा आप से बिछुड रहा होता है और आपके सामने तड्प तडप कर दम तोड रहा है आप कुछ नहीं कर पा रहे हैं हम तीनो बस रो रहे थे------ और 26 aअक्तुबर की काली रात 11 बजे उसने आखिरी साँस ली------- सब कुछ जैसे खत्म हो गया-----हम लुटे से देख रहे थे मौत का तमाशा------- सुबह तक उसके सिरहने रोते बिलख्ते बैठे रहे------ सुबह उसे पोस्ट मार्टम के लिये ले गये------ काश कि कोई उसका दिल चीर कर मुझे देता तो पूछती ये सब कैसे हुआ------- हमे दोपहर एक बजे लाश मिली------- घर मे किसी को बताया नहीं था------- यही कहा था कि इलाज चल रहा है बूढे दादा दादी का बुरा हाल था-------- कम्पनी वालों ने गाडी का प्रबँध किया और उसके 4-5 दोस्त साथ दूसरी गाडी मे भेज दिये--- गाडी मे सीट के नीचेलाश थी और उपर हम लोग बैठे थे----कितना भयावह होगा वो पल कोई भी सोच सकता है------ अब दो दिन से कुछ खाया भी नहीं था--- रो रो कर दिल बैठा जा रहा था भाई सहिब का भी बुरा हाल था रास्ते मे लडकों ने गाडी रुकवाई और एक ढाबे से खाने का प्रबँध किया-------- ये सब तो नीचे ढाबे मे चले गयी मगर मैं वहीं बैठी रही------ उससे एक पल भी -----पल भी दूर नहीं होना चाहती थी-----कल के बाद दूर चला जयेगा तो कहीं भी बैठी रहूँगी कौन पूछेगा------- मन मे पता नहीं क्या आया कि मुझे लगा कि जोर की भूख लगी है वैसे भी मुझे टेन्शन मे बहुत भूख लगती है और उस दिन बेटे की लाश के उपर बैठ कर मैने खाना खाया------- मैं भी उसे बता देना चाहती थी कि तुझ बिन भी हम जिन्दा रहेंगे तू बिलकुल चिन्ता मत करना-------
रात को हम घर पहुँछे तो शहर और गाँव से सब लोग जमा थे---हमने एक घँटा पहले फोन कर दिया था कि हम लाश ले कर आ रहे हैँ--------बेटे की शादी के सपने देख रहे थे आज उसकी लाश देख कर दुनिआ ही रो पडी------ फिर पता नहीं कैसे सब लोग उतरे मुझे इतना पता है कि मैं रात भर मे एक मिनट उसका हाथ नहीं छोड पाई----- मगर अगले दिन उसे सब ले गये मेरा हाथ छुडा कर----- सारा शहर और गाँव उसकी उसकी आखिरी यात्रा मे हुमहुमा के चल रहा था------- और उसके बाद आज तक उसे तलाश रही हूँ
इसके बाद क्या होना था उस की करम किरिया के बाद कोटद्वार मेरे पति और भाई सहिब गये थे पोलिस को साथ ले कर जब घर खोला तो कफी सामान गायब था रसोई मे गये जहाँ बताया था कि उसने अपने आप आग लगायी तो नीछे फर्श पर कोई ऐसा निशान नहीं था कि यहाँ तेल डाला गया हो रसोई की शेल्फों पर कागज़ बिछे हुये थे जो तस के तस थे हाँ दिवार पर हाथ के जले पँजे के निशान जरूर थे बाहर बरामदे मे उसका ट्रँक पडा था जिसके नीचे जले के निशान थे शायद उसके जले हुये कपडों से आग बुझाने क्वे लिये रखा गया था ट्रँक के बीच पडे कपडे भी नीचे की तह जल गयी थी मतलव उसे रसोई से बाहर जलाया गया था वहाँ घर भी कुछ दूर थे मगर उसके बास का घर इतना दूर नहीं था कि उसकी चीखें सुनाई ना देती खैर बहुत हाथ पैर मारे मगर कुछ पता ना चला जब वो पिछली बार घर आया था तो उसने बताया था कि उसे बास के कुछ राज पता चले हैं कि वो कम्पनी को किस तरह लूट रहा है इसके बारे मे बास से उसकी बात भी हुई बास के एक नेपाली नौकर था जो उसे आजकाल घूर घूर कर देखता था इससे पहले भी वो बैंगलोर टूर पर गया तो उसके घर चोरी हो गयी थी हम लोग उसकी ट्राँसफर पँचकूला करवाने के लिये प्रयास रत थे मगर तभी ये घटना हो गयी निस्ँदेह उस नेपाली नौकर और बास का कहीं ना कहीं हाथ था मगर हमारा उस शहर मे कौन था जो सहायता करता एक दो बार फिर गये मगर पोलिस ने आत्म हत्या का मामला कह कर उसे केस को बाद मे फाईल कर दिया------ इस तरह हम लुटे हुये सब कुछ देखते समझते हुये भी कुछ ना कर सके---------- आज भी इन्तज़ार रहता है कि शायद कहीं से निकल कर एक बार आ जाये मगर जाने वाले कहाँ आते है------------

06 July, 2009

International Blogger's Community


मै आपको बताना चाहूँगी कि श अनिल काँत जी ने मुझे international blogger's community award दिया है मैं अनिल जी की दिल से शुक्रगुज़ार हूँ कि उन्होंने मुझे इस काबिल समझा
1. The person who tagged me:- Anil kant
3. Date of Tag:- 5th july, 2009
4. Persons I have tagged are (जिन्हें मै आगे अवार्ड देना चाहूँग)
The Rules for this tag are:
1. Link the person who tagged you.
2. Copy the image above, the rules and the questionnaire in this post.
3. Post this in one or all of your blogs.
4. Answer the four questions following these Rules.
5. Recruit at least seven (7) friends on your Blog Roll by sharing this with them.
6. Come back to BLoGGiSTa iNFo CoRNeR (PLEASE DO NOT CHANGE THIS LINK) at http://bloggistame.blogspot.com and leave the URL of your Post in order for you/your Blog to be added to the Master List.
7. Have Fun!
Questions & Your Answers:
1. The person who tagged you:
2. His/her site's title and url:
3. Date when you were tagged:
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दिल से एक पन्ना------------- संस्मरण

एक दिन अपनी एमरजेन्सी ड्यूटी पर् थी सुबह से कोई केस नहीं आया था ऐसे मे मैं किताबें पढती रहती या किसी मरीज के रिश्तेदार या मरीज से बाते करती रहती थी उस दिन किताब पढने मे मन नहीं था कुछ परेशान भी थी तो बाहर धूप मे कुर्सी रखवा कर बैठ गयी कुछ देर बाद एक बज़ुर्ग औरत मेरे सामने आ कर स्टूल पर बैठ गयी वो एक दुखी औरत थी अक्सर अस्प्ताल मे आती रहती थी और मेरे साथ कई बार अपने दुख रो लेती थी उसने बैठते ही पूछा कि बेटी क्या बात है आज कुछ उदास लग रही हो ------ मन ही मन उस की पारखी नज़र के लिये आश्चर्य हुआ मगर अनुभव एक ऐसी चीज़ है जो दिल को आँखें दे देती है मैने कहा नहीं कोई बात नहीं तो वो कहने लगी कि बेटी देखो मैं तुम से पूछूँगी नहीं मगर मैने तुम्हें कभी उदास नहीं देखा इस लिये कह रही हूँ कि कभी कोई दुख सताये तो उस समय उस दुख से निज़त पाने का एक तरीक है मै तो ऐसे ही करती हूँ कि उस समय अपने किसी पहले के उससे भी बडे दुख के पन्ने खोल लो उन्हें पढो फिर सोचो कि इतने मुश्किल समय मे भी तो तुम जीती रही हो खाया पीया और सब काम किये फिर भी मरी तो नहीं न इसी तरह ये दुख तो शायद उसके आगे कुछ भी ना हो अगर तुम्हारे पास कोई बडा दुख नहीं है तो किसी अपने से दुखी को देखो तो तुम्हें अपना दुख बहुत छोटा लगने लगेगा -------- ऐसे ही मुझे समझा कर वो चली गयी--------- और तब से मैने इस सूत्र को जब भी आजमाया तो पाया कि जैसे मेरा दुख आधा रह गया है और मैं जल्दी उदासी पर काबू पा लेती------ अब तक बहुत दुख सुख झेले मगर इस सूत्र को कभी हाथ से जाने नहीं दिया इसी लिये तो कहते हैं कि दुख बाँटने से घटता है और खुशी बढ जाती है------ आज कल भी कुछ मन की स्थिती ऐसी ही रही है तो आज फिर से अपने मन का एक पन्ना खोल कर बैठ गयी और कुछ देर के लिये परेशानी तो भूल ही गयी जब याद भी आयी तो इतनी बडी नहीं लगी जितनी मैं इतने दिन से सोच रही थी ऐसे ही एक पन्ने से आज आपका परिचय करवाना चाहूँगी------
कभी कभी मन की परतों के किसी पन्ने को खोल लेना भी मन को सकून देता है -- ( पन्ना जो सब से कीमती हो दिल के करीब हो------ इसे संस्मरण तो तभी कहा जा सकता है जब ये भूल गया हो मगर ये एक पल भी कभी भूला नहीं है तब भी इसे संस्मरण ही कहूँगी आज तक हर दुख को बडे साहस से सहा है वैसे भी असपताल जैसी जगह मे जहाँ हर पल लोगों को दुखी ही देखा है तो आदमी यूँ भी दलेर हो जाता है और शहर मे मैं अपने साहस और जीवटता के लिये जानी जाती हूँ--- मगर शायद ये उम्र का तकाज़ा है या दिल का कोई कोना खाली नहीं रहा कि आज कल मुझे जरूरत महसूस होती है कि किसी के साथ इन्हें बाँटू कई बार ये भी लगता है कि दुख मेरे हैं किसी को क्यों दुखी करूँ और इन कागज़ों से कह कर मन हल्का कर लेना ही श्रेस्कर लगता है 1 फिर दुख तो जीवन की पाठशाला हैं जिन मे आदमी जीवन जीने के पाठ पढता है औरों के साथ बाँटने से दूसरे आदमी को पता लगता है कि उससे भी दुखी कोई और है तो उसे अपना दुख कम लगने लगता है मैने लोगों के दुख बाँट कर यही सीखा है 1
24--10--1990
उस दिन मैं और मेरे पति एक पँडित जी से अपने बेटे की कुन्डली दिखा कर आये थे---उसकी शादी के लिये साथ मे लडकी की कुन्डली भी थी------- मुझे लडकी बहुत पसंद थी और बेटा भी कहता था कि मुझे तो आपकी पसंद की लडकी ही चाहिये और मजाक मे कह देता मा उसके साथ अपनी कुन्डली जरूर मिलवा लेना--अगर सास बहु की नहीं पटी तो मैं मारा जाऊँगा------ वो कोट दुआर मे बी ई एल कम्पनी मे 1990 मे सीनियर इन्जीनियर था शायद कोई ब्लोगर जो अब इस कम्पनी मे हो उसे जानता हो 1-----हम अभी घर आये ही थे कि अस्पताल से किसी के हाथ सन्देश आया कि कोट दुआर से टेलीफोन आया है कि ेआपके बेटे ने सेल्फ इमोलेशन कर ली है और उसे देल्ली सफदरजंग अह्पताल ले कर जा रहे हैं आप वहीं आ जाईये----उन दिनो आरक्षण के खिलाफ बच्चे सेल्फ इमोलेशन कर रहे थे हम तो हैरान परेशान तभी हमरे स्पताल से डक्टर और कई स्टाफ के लोग आ गये----हमे इस बात पर यकीन नहीं हो रहा था------वो तो ऐसा नहीं था फिर उसके घर मे कोई बेकार नहीं थ वो क्यों ऐसा कदम उठायेगा हम लोगों ने इनके बडे भाई सहिब को फोन किया---वो उनका बेटा था मगर बचपन मे जब वो 8--9 साल का था माँ की मौत हो जाने से हमने ही उसे पाला पोसा था शुरू से वो हमारे पास ही था अपने पिता के पास या गाँव कम ही जाता था वो इतना समझदार था कि कई बार मैं भी हैरान हो जाती थी और मेरी परेशानी का हल वो इतनी जल्दि निकाल लेता कि उसके बिना मुझे लगता कि मुझ पर मुसीबतों का पहाड टूट पडा है मेरी शादी के तीन महीने बाद ही इनकी मौत हो गयी थी तब हम गाँव मे ही रहते थे 1
ये पाँच भाई बहन थेऔर मेरी नौकरी के साथ इनका पालन पोशण कोई आसान काम नहीं था सब को तयार करना स्कूल भेजना और घर के काम निपटा कर खुद ड्यूटी जाना और वो उम्र तो मौज मस्ती की होती है --- खास कर जब नयी नयी शादी हुई हो फिर भी हम दोनो पति पत्नि ने मिलकर इसे निभाया----- गाँव का सकूल पाँचवीं तक था मुझे भी ड्यूटी आने जाने मे मुश्किल आ रही थी इस लिये हमने शहर मे रहने का फैसला कर लिया जो कि साथ ही तीन किमी दूर था-----------

भाई सहिब गांव से20 मिनट मे आ गये उस समय आठ बज गये थे और गाडी 9-30 पर जाती थी-----हमने जल्दी से कुछ जरूरी सामान लिया हमे डाक्टर साहिब स्टेशन छोड आये-------- बाकी बच्चों को मेरे स्टाफ ने ही संभाला हम ने ये सफर कैसे काटा होगा इसे बताने की जरूरत नहीं है ऐसा सफर उस दिन भी किया था जब इसकी बडी बहन की दहेज हत्या हुई थी और हम ऐसे ही गये थे उस दिन भी-------

04 July, 2009

पृथ्वि आहत है --भाग-- 3

संवेदनाओं की ज़ुबाँ नहीं होती
कोई कोई आकार
या रूप नहीं होता
मगर उमड पडती हैं
करा देती हैं एहसास
अपने अस्तित्व का
और ढल जाती हैं
परिस्थिती के अनुसार
वो जात पात रंग भेद नहीं करती
आती हैं सब मे बराबर
दुख मे ेआँसू बन कर
बहा ले जाती हैं पीडा
सुख मे समा जाती हैं पाँव मे
थिरकन बन कर
और दे जाती हैं हो्ठ पर्
सुन्दर मुस्कान
वात्सल्य मे माँ
गरीब के लिये करुणा
मगर इन्सान
अपने सुख के लिये
मार देता है इन्हें भी
और बन जाता है
मानव से दानव
नहीं सहेज पाता
इन संपदाओं को
क्या प्रकृति आहत नहीं होगी
अपनी इन संपदाओं के तिरस्कार से
निश्चित ही होगी

03 July, 2009

प्रकृति आहत है भाग -2
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हवा के पँख नहीं होते
फिर भी उडती है जाती है
ब्राह्म्ण्ड के हर छोर तक
क्यों कि उसे देना है जीवन
देनी हैँ सब को साँसें
मगर इन्सान
हाथ पाँव होते हुये भी
किसी की साँसें
छीन लेना चाहता है
काट लेना चाहता है
उडने वालों के पर
और कभी क्भी
बैठा रहता है कर्महीन
बन कर पृथ्वी पर बोझ
निश्चित ही
प्रकृति आहत होगी
अपनी रचना के
इस व्यवहार से
क्या जीव निर्जीव से भी
गया गुज़रा हो गया है

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