07 September, 2009

पिँजरे का दर्द ----
कितनी कोशिश करती हूँ--- बस अब और नहीं मगर फिर भी बेसब्री से सुबह का इन्तज़ार रहता है---- उठते ही खिडकी से झाँकती हूँ--- उस पर नज़र पडते ही जैसे मन को एक स्कून सा मिलता है -- तपती रेत पर बारिश की दो बून्दें ----एक आशा मन मे जागने लगती है---- शायद---- पंख फडफडाता है और चीं चीं करने लगता है जैसे पूछ रहा हो-- मा कैसी हो?-- हाथ उठाती हूँ उसे आशीर्वाद देने के लिये और फिर जलदी से खिडकी की ओट मे हो जाती हूँ---- कहीं मेरी तृ्श्णा फिर से ना सर उठाने लगे---- मेरी आँख नम ना हो जाये वो चाहे कितना ही दूर दूर भागे मगर जानती हूँ मेरे आँसू देख कर आँख उसकी भी नम हो जायेगी ---- कम से कम उसे कोई तकलीफ नहीं पहुँचाना चाहती।---- वो जाते जाते फिर चीँ चीं करता है, जैसे कह रहा हो * अपना ध्यान रखना--- और मैं उदास हो कर अपने बिस्तर पर लेट जाती हूँ---- फिर बुझे से मन से काम मे लग जाती हूँ । काम के बाद फिर से उस खिडकी मे आ कर बैठ जाती हूँ --- एक झलक उसे देखने की चाह मिटा नहीं पाती --- दिखता नहीं है मगर जानती हूँ कि इसी कालोनी के किसी पेड पर बैठा है--- शायद मेरी खिडकी के सामने हो मगर पत्तों मे छिप जाता है देख लेती हूँ उसके पँखों की एक झलक ---- और दिन भार याद करती रहती हूँ उसकी मीठी 2 बातें---- उसका चहकना, उसकी उडान, खाना खाते हुये मुझे भी अपने साथ खिलाने का उसका अन्दाज़ याद कर के आँखें भर आती हैं अपनी चोंच मे रोटी का टुकडा उठा कर खिडकी के पास आ जाता जैसे बुला रहा हो कि मा आप भी खाओ न ! ----
उस दिन मैं खिडकी पर बैठी थी कि अचानक पास की एक डाली पर आ कर चीं चीं करने लगा जैसे पूछ रहा हो आप इतनी उदास क्यों हैं और मुझे अपनी प्यारी प्यारी शरारतों से लुभाने लगा--- और मैं उससे एक दो दिन मे इतना घुलमिल गयी कि मुझे लगा कि मेरे घर मे फिर से बहार लौट आयी है मेरे बच्चों के जाने के बाद ये घर एक दम सुनसान सा हो गया था जिस घर मे हर दम सन्नाटा पसरा रहता वहाँ अब रउनक ही रउनक थी---- फिर एक दिन जब वो खिडकी मे आया मैने उसे बाहर जाने ही नहीं दिया --- खिडकी पर बारीक जाली लगवा दी---- वो घर के कोने कोने मे घूमता--- खुशी से पंख फैलाता और मैं उसके साथ बच्ची सी बनी सारा दिन जैसे हवा मे ुडती फिरती--- कितना खुशनुमा हो गया था जीवन उससे अपने सारे गम कह लेती वो मेरे एक एक पल का साक्षी बन गया था मुझे लगता वो इस दुनिया से अलग है किसी भीड का हिस्सा नहीं ., काश कि ये इन्सान होता। मैं हैरान थी कि मेरे जीवन मे इतनी खुशियाँ कहाँ से आ गयी? अब जीवन मे कुछ नहीं चाहिये इस के सहरे जी लूँगी--- मगर कुछ दिन मे ही जैसे सब कुछ बदलने लगा था -- वो इस घर से उब गया । शायद बाहर बाकी पक्षियों की आवाज़ सुन कर उसे उनकी याद आती थी---- वो खिडकी से बाहर देखते देखते उदास हो जाता --- मैं अन्दर से डर जाती मुझे लगता अब इसके बिना जी नहीं पाऊँगी--- बच्चों की तरह उसे लुभने की कोशिश करती --- शायद अपने घर की जिम्मेदारियों के चलते अपने बच्चों का बचपन भी अच्चे से जी नहीं पाई थी ---- उसी को जीने की चाह ने इसके करीब कर दिया--- एक दिन उसे उदास देख कर मैने खिडकी से जाली उठा दी---- और वो एक पल गवाये बिना उड गया---- बहुत रोई थी उस दिन --- वो मुझे समझाना चाहता था कि कुछ दुनियादारी सीखो --- इतना मोह अच्छा नहीं फिर उसे अभी दुनिया देखनी है सब समझती थी जानती थी मगर समझ कर भी अनजान बनी रही---- कितने दिन रो रो कर उसे आवाज़ लगाती रही मगर उसका दिल ना पसीजा
चाहती हूँ घर बदल लूँ सामने खिडकी पर बैठा हो और मुझ से बात ना करे--- दिल से टीस सी उठती है--- बहुत दर्द होता है--- मगर
मेरे दुख मेरी तन्हाई से उसे क्या लेना उसका अपना जीवन है जब अपने ही अपने नहीं होते तो दूसरे से कैसे अपेक्षा की जा सकती है?--- मगर वो ये नहीं जानता था कि मै उसे इस भीड का हिस्सा नही समझती थी--- और ना ही मैं खुद इस भीड का हिस्सा हूँ---- सीख जाऊँगी धीरे धीरे जीना---- कितने हादसे सहे तब भी तो जिन्दा रही हूँ अब भी रह लूँगी---- कितना मुश्किल होगा जब कि पता हो वो सामने किसी पेड पर बैठा होगा---- अब उसका सुबह पेड पर आना भी एक दर्द दे जाता है, कितना परायापन होता है उसकी चीं चीं मे-- शायद उसे रहम आता है मेरी दशा पर और देखने आता हो कि जिन्दा हूं या नहीं उसके बिना?--- आखिर चाहता तो वो भी मुझे था---- इस बात को कैसे भूल सकती हूँ--- मेरा दिल कहता है|--- वो मेरे पास आ कर एक छोटा सा अबोध बालक सा बन जाता था----- इस का एहसास मेरी ममता ने किया है--- और ममता कैसे झूठ बोल सकती है----- शायद बच्चे उस ममता की मृगतृिश्ना को नहीं समझ सकते--------
जो उधार की खुशी के पल उसने दिये थे उनका कर्ज ज़िन्दगी भर चुकाती रहूँगी--- शायद उधार मे मिले प्यार, और रिश्तों का यही हश्र होता है----- और फिर जब उधार देने वाला पल पल सामने हो--- ओह कितना तक्लीफदेह है ---- आसमान से जब कोई जमीन पर धडाम से गिरता है---- चाहती हूँ खिडकी बन्द ही कर लूँ मगर-- अभी नहीं कर पा रही---- जब तक - ये आँसू सूख नहीं जाते--- पता नहीं कितने जीवन चाहिये इन्हें सूखने मे-- या शायद आशा की एक किरण बचा कर रखना चाहती हूँ---- कभी मन करे तो खिडकी खुली देख कर आ ही जाये या फिर --- बस उसकी एक झलक देखने के लिये ताकि दिन भर तन्हाई मे एक टीस तो साथ हो जिससे उसे महसूस कर सकूँ----- जीने का एक ये भी अंदाज़ है----- मुझे अच्छा लगता है---- पिँजरे का दर्द ऐसा ही होता है--- कोई उसमे है तो भी उसे कैद करने का अपराधबोध ---- उसे आज़ाद होने के लिये तडपते देखना भी तो दर्द देता है----- अगर पिंजरे ने उसे रिहा कर दिया तो भी विरह का दर्द--- उसे तो हर हाल मे दर्द सहेजना ही है------ ।
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05 September, 2009

संवेदनाओं के झरोखे से--संस्मरण गताँक से आगे

उस दिन हम मौसम का आनन्द लेते हुये लेडी डाक्टर से गीत सुन रहे थे।अचानक बडे जोर से हवा चलनी शुरू हो गयी। देखते देखते बदे तूफान का रूप धारण कर गयी सब ओर अन्धेरा छा गया हम सब कमरे मे बन्द हो गए। इतना भयंकर तूफान पहली बार देखा था। अब याद नहीं कि कितनी देर इसका ताँडव चला मगर जैसे ही क्छ थमा हम लोग एमर्जेन्सी मे आ गये। पता था कि इस से बहुत बडी तबाही हुयी होगी। हम लोग एमर्जेन्सी मे सामान तैयार करने लगे । 10 मिनट भी नहीं बीते थे तूफान थमे हुये, कि घायल लोग आने शुरू हो गये। एक घन्टे मे एमर्जेन्सी के अंदर बाहर भीड ही भीड जमा हो गयी आसपास के हिमाचल और पंजाब के गाँव इसी अस्पताल पर निर्भर थे। जो मरीज सब से अधिग गन्भीर हालत मे थे पहले उन सब को अंदर रखा गया सारे स्टाफ को डय़ूटी पर बुला लिया गया। ैतना चीख चिहाडा था कि एक दूसरे की बात सुनना भी मुश्किल था। देखते देखते उन घायलों मे 10 --12 मरीज़ अपना दम तोड चुके थे। बाकी गम्भीर चोटों से चीख रहे थे कुल मिला कर वो दृष्य किसी भी इन्सान को हिला देने के लिये काफी था।

उस समय हमे ये होश नही रही कि हमारे घरों का बच्चों का क्या हुया होगा। मैं तो जैसे जड हो गयी थी मगर उस समय ना जाने कहाँ से इतना साहस आ गया कि झट से हम मरीज़ों को संभालने लगे। उस दिन पहली बार मैने घावों पर टाँके लगाये वो भी पूरे 30। मुझे जरा भी डर नहीं लगा । हाथ कपडे सारा दिन खून से लथपथ रहे 100 से उपर मरीज़ों को राहत दी गयी थी। जो निस्सँदेह स्टाफ की मेहनत के कारण ही हुया था । और मैं खुद को उस दिन धन्य समझ रही थी कि आज मुझ मे सेवा भाव जगा था और उस दिन सोच लिया था कि अब ये नौकरी कभी नहीं छोडूँगी। नहीं तो मैं सोचा करती कि मैं ये काम नहीं कर सकूँगी। मरीज़ के सूई चुभेगी तो दर्द मेरे होगा। उस दिन मैने जाना कि हमारी संवेदनायें मरती नहीं बल्कि दूसरों को राहत पहुँचाने मे हमे शक्ति देती हैं।

हमारे भी घर का बहुत नुक्सान हुया था ।सभी स्टाफ कर्मचारियों के कुछ ना कुछ हुया ही था मगर उन्हें समय नहीं था कि अपने घरों की सुध ले सकते।देखने वाले को जरूर लगता है कि ये लोग पत्थर दिल हैं। और दीदी की वो बात धीरे धीरे वाली याद आ गयी। किसी को देख कर ही संवेदन हीन कह देना कितना आसान होता है। मैं भी तो पहले दीदी को ऐसे ही समझती थी। उस तूफान मे क्या क्या हुया ये बहुत बडी कहानी हो जायेगी। इस लिये इसे यहीं विराम देती हूँ मगर ये बता दूँ कि उस दिन सारा दिन हम लोगों ने कुछ भी खाया पीया नहीं । सुबह आठ बजे से रात के आठ बज गये थे मगर अभी पोस्टमार्टम भी सब का नहीं हुया था लगता था कि आज शायद सारी रात यहीं लगेगी। सारा शहर इन मरीज़ों की सहायता के लिये इकठा हो गया था । मुझे तो अब चक्कर आने लगा था । इतना काम कभी किया ही नहीं था । अब भूख भी बहुत जोरों से लगी थी। हम लोगों ने चाय मगवाई और सुबह के जो समोसे मंगवाये थे वही खाने लगे। बाहर अभी भी 5 लाशें पडी थीं। उस दिन फिर मुझे अपनी वो बात याद हो आयी।जब मैं दीदी को पोस्टमार्टम से आते ही चाय पीते देखा था कि दीदी आप ऐसे कैसे चाय पी लेती हो । मुझे समझ आया कि जिसे मैं संवेदन्हीनता समझ रही थी वो मजबूरी थी ,समय की माँग थी। कितना आसान होता है दूसरों की संवेदनहीनता को चिन्हित करना समझ तभी आती जब खुद उनमे से गुज़रना पडता है।---

फिर भी लोगों मे गुस्सा था कि सब को पूरी सहायता नहीं मिली जब कि सारा स्टाफ अपने घर की परवाह किये बिना काम कर रहा था। अगले दिन अस्पताल के खिलाफ नारे भी लगे। मैं ये नहीं कहती कि अस्पताल मे लापरवाही नहीं होती मगर हर बार उन्हें ही दोशी ठहरा देना सही नहीं है। आप लोगों से भी यही प्रार्थना है कि जब भी आपको ऐसा लगे तो नारेबाजी करने से पहले तथ्य जरूर देख लें कहींिस तरह आरोप लगा कर आप कर्मनिष्ठ कर्मचारियों के साथ अन्याय तो नहीं कर रहे और फिर कई बार क्षुब्ध हो कर कर्मचारी काम के प्रति उदासीन होने लगते हैं।

कुछ दिनो मे ही मुझे महसूस होने लगा कि मैं पहले से भी अधिक संवेदनशील हो गयी हूँ । काम से जब भी समय मिलता किसी ना किसी मरीज के दुख दर्द जरूर सुनती। मेरी ये कहानियां उसी संवेदना की देन है। अभी भी बहुत से पात्र मेरे दिल मे हैं जिन्हें लिखना है। कुल मिला कर कहूँ कि जितनी मुश्किल मेरी ज़िन्दगी रही थी मायके ससुराल मे जवान मौतों के कारण जिम्मेदारियां बढी थी उनका मुकावला शायद मैं इन्हीं संवेदनाओं के कारण कर सकी। ये मरीज़ मेरे दुख सुख के साथी रहे। और मेरे पिताजी मेरे पथप्रदर्श क जिन्होंने कभी मेरे साहस को ढ्हने ना दिया।इसी लिये मेरी सारी रचनायें संवेदनाओं और जीवन के बारे मे ही होती हैं। बस यही है मेरे पास। और भी बहुत से संस्मरण ऐसे हैं जिनसे मैने बहुत कुछ सीखा है फिर कभी कहूँगी।

समाप्त ।

03 September, 2009

संवेदनाओं के झरोखे से--संस्मरण--4

नौकरी छोडने की बात मन मे घर करने लगी थी। अगले दिनो मे भी बहुत कुछ देखा मगर वही दीदी की बात कि धीरे धीरे सब ठीक हो जायेगा । 10 --15 दिन ऐसे ही निकल गये।इस संस्मरण को लिखना तो नहीं चाहती थी मगर इसे लिखने का मकसद इतना है कि सेहत विभाग वालों के प्रति एक आम भावना होती है कि ये लोग बहुत बेशर्म या खुले विचारों के होते हैं या इनकी भाशा को ले कर कई चुटकुले घडे जाते हैं । उस समय भी लडकियों को नर्स का कोर्स करवाना बडे बडे घरों मे सम्मान की नज़र से नहीं देखा जाता था। मुझे भी इस कोर्स के लिये पिता जी मान नहीं रहे थे मगर मेरा बडा भाई अमृतसर मेडिकल कालेज मे ही MBBSकर रहा था जब मुझे MBBSमे दाखिला नहीं मिला तो उसने फार्मेसी करने के लिये पिता जी को मना लिया कि इस मे नर्सों जैसा काम नहीं होता बस दवाओं से ही वास्ता रहता है। इस लिये पिताजी मान गये थे।

मगर इस अस्पताल मे हर जगह डयूटी करनी पडती थी । और हर तरह का काम भी जो मुझे अच्छा नहीं लगता था।मैं बहुत शर्मीली और सीधी सादी लडकी थी। एक दिन एमर्जेन्सी मे केस आया । एक बज़ुर्ग को बैल ने मारा था उसके जननेन्द्री पर बहुत बडा घाव् हो गया जहाँ टाँके लगने थे । जैसे ही डाक्टर साहिब उसे देखने लगे मैं बाहर आ गयी। उनके पास वार्ड अटेन्डेट तो था ही। तभी डा़ साहिब ने मुझे बुलाया और गुस्से मे बोले कि तुम्हारी डयूटी यहाँ है बाहर क्या कर रही ह। तुम्हें पता नहीं कि स्टिचिन्ग करनी है। मैने कहा कि मुझे अभी अच्छी तरह स्टिचिन्ग नहीं आती। तो बोले कि असिस्ट तो करवाना है ।-- तुम्हें ये समझ लेना चाहिये कि यहाँ हम स्त्रि या पुरुष नहीं होते केवल डाक्टर होते हैं जिन्हें बस मरीज का इलाज करना होता है। चलो स्टिच का सामान लाओ। काँपते हाथों से केस असिस्ट करवाया अपने से भी अधिक तरस उस बज़ुर्ग पर आ रहा था जो आँखों पर हाथ रखे स्टिच लगवा रहा था । उस दिन तो पक्का ही सोच लिया कि अब ये सब मेरे बस का नहीं । दीदी ने पूछा कि क्या हुआ है तो मैने बता दिया वो फिर हँसने लगी ---- बस इतनी सी बात? तो इसमे क्या हो गया । ये तो हमारा काम है । तुम नयी हो ना धीरे धीरे सब ठीक हो जयेगा। अब इसमे ठीक होने जैसी क्या बात थी। समझ नहीं आया। आखिर शर्म हया भी तो कोई चीज़ होती है। सच मे ही ये लोग बहुत बेशर्म होते हैं।

दो चार दिन फिर ऐसे ही निकल गये। मेरा मन बिलकुल काम मे नहीं लगता था । मैने दीदी से कहा कि अगर धीरे धीरे सब ठीक ही हो जाना है तो फिर अभी मेरी डयूटी एमर्जेन्सी मे मत लगाओ जब सब ठीक हो जायेगा तब लगा देना। शायद दीदी को मुझ पर तरस आ गया उन्होंने मेरी डयूटी ापने वाले मेडिसिन के काऊँटर पर लगा दी । साथ मे दूसरी फार्मासिस्ट भी थी। वहां का महौल ऐसा था कि कई बा र्दीदी की कोई सहेली आ कर बैठ जाती आपस मे खुल कर बातें करती मुझे वो भी अच्छा नहीं लगता दीदी को इतना तो ध्यान करना चाहिये कि मैं एक अविवाहित लडकी उनके पास बैठी हूँ मगर उनके लिये ये सब बातें आम थी।बिमारी के बारे मे प्रेग्नेन्सी के बारे मे डिलिवरी के बारे मे। इतनी भी बेशर्मी क्या कि आप ये भी ना देखो कि किस के सामने बात करनी है। बाहर इतने लोग खडे होते हैं,कई बातें उनके कान मे भी पडती रहती। अब धीरे धीरे समझ आने लगा था कि इन लोगों का ये रोज़ का काम है इन्हें ना तो ये शर्म की बात लगती है, ना बुरा लगता है। अब बिमार औरतें इनके पास आयेंगी तो ऐसी ही बातें करेंगी। सोचा कि चलो देखा जायेगा जब तक चलता है काम करे जाती हूँ।

एक दिन अपनी भाभी से मैने ऐसे ही मज़ाक मे कुछ कह दिया उनकी प्रेग नेन्सी के बारे मे वो तो मेरे मुह की तरफ देखने लगी--- तुम्हें क्या हो गया आगे तो तुम ऐसी बातें नहीं करती थी । मुझे एक दम झटका लगा ये सब धीरे धीरे का असर था शायद। दो तीन महीने मे मुझे कुछ सहज सा लगने लगा, जो बातें सुन देख कर मुझे गुस्सा आता था वो अब तटस्थ भाव से देख सुन लेती। कई बार सोचती कि अब मुझे गुस्सा क्यों नहीं आता दीदी की बातों पर। शायद अब मैं भी बदल रही थी। उसके बाद कई मौतें हुई एमर्जेन्सी मे । रोने की आवाज़ सुनती तो मन मे दुख तो होता मगर उस तरह से रोना नहीं आता जैसे कि पहले पहले आता था। फिर भी मरीज के रिश्तेदारों को ढाडस बन्धवाना आदि से अपने को रोक नहीं पाती। मगर अब लगने लगा था कि धीरे धीरे कोई चीज़ जरूर है जो इन्सान को पत्थर बना देती है, शायद मैं भी पत्थर बन जाऊँगी ---सब की तरह---
मैं धीरी धीरे कैसे बदल रही हूँ ।

जब ये संस्मरण लिखना शुरू किया था तो लगता था कि छोटा सा ही है म तब इतना ही बताना चाहती थी कि आदमी एक ही जगह एक ही काम करते हुये कैसे उस काम के प्रति और वातावरण के प्रति संवेदनहीन हो जाता है ।मगर अब मुझे लगता है कि जब तक मैं सभी हालात का वर्णन नहीं करूँगी तब तक कैसे समझ आयेगा कि इन्सान को अपने अन्दर आ रहे बदलाव का क्यों पता नहीं चलता। दूसरी बात कि अस्पताल वालों को सब गालियां ही निकालते हैं, कोई उनकी मुश्किलों को क्यों नही समझता । ऐसी बात भी नहीं कि सभी जगह सभी लोग एक जैसे ही होते हैं कई वहाँ भी अच्छी बुरे दोनो तरह के लोग होते हैं मगर ऐसे तो सब जगह ही होते हैं फिर भी अस्पताल वालों की मुश्किलें कोई नही समझता । मेरा अपने लोगों के प्रति दायित्व भी बनता है कि मैं उनकी समस्या को सब के सामने रखूँ ।इस लिये इस आलेख की श्रिंखला को बढाना पडा। शायद आप लोग अच्छे से झील रहे हैं मुझे, इस बात का भी फायदा उठाना चाहती हूँ । सही है या नहीं ये आप बतायें मगर अभी मेर सफर जारी है--- मैं कैसे धीरे धीरे के प्रभाव मे आयी और कैसे निकली। एक सीधी सादी संवेदनशील लडकी कुछ समय के लिये कैसे संवेदनहीन सी बन गयी थी। मगर वो संवेदनहीनता भी नहीं कही जा सकती क्यों कि काम करते हुये खुद को डरपोक या मैदान छोड कर भाग जाने वाली कहलाना भी मुझे अच्छा नहीं लगता था। फिर ऐसे अवसरों पर पिता जी का प्रोत्साहन तो मिलता ही था।

उस दिन कुछ गर्मी अधिक थी। 10 बजते बजते आकाश पर बादल छाने लगे थे। मेरी डय़ूटी एमर्जेन्सी मे थी । साथ मे एक लेडी डाक्टर की डयूटी भी थी। मगर चाय का टाईम भी होने वाला था, तो हम सब लोग OPD मे इकठे हो जाते। डाक्टर कहने लगी कि आज मौसम अच्छा हो रहा है समोसे मगवा लेते हैं। किसी को समोसे लेने भेज दिया। देखते देखते आसमान काला होने लगा। कई मरीज बिना दवा लिये घर भागने लगे। डाक्टर ने बाहर बरामदे मे अपनी कुर्सी रखवा ली और हम लोग भी मौसम का आनन्द लेने लगे।नंगल शहर को नहरों और पहाडों का शहर कहा जाता अस्पताल के सामने पहाड और हरियाली देखते ही बनती है। एक दम ऐसा लगने लगा जैसे रात हो गयी है मन मे हम लोग डर भी गये थे कि बहुत बडा तुफान आने वाला है। OPD पोरी तरह मरीज़ों से खाली हो गयी। शायद डाक्टर ने हमारे तनाव को भाँप लिया था| उन्होंने अचानक हमे एक गीत सुनाना शुरू कर दिया। उनकी आवाज़ इतनी सुरीली थी कि हम लोग उसमे खो गये।

------- क्रमश :

02 September, 2009

सवेदनाओं के झरोखे से--संस्मरण --3


उस दिन मैं घर गयी तो जाते ही लेट गयी। खाना भी नहीं खाया। रह रह कर उस लडकी का चेहरा मेरी आँखों के सामने आ जाता। कैसे होगा उनके घर का गुज़ारा कोई और कमाने वाला भी नहीं । मा भी पढी लिखी नहीं थी उसकी । क्या ऐसे दुख भी होते हैं ---- माँ ने पूछा कि क्या बात है --तो मैने बताया कि आज एक आदमी की मौत हो गयी उसी से मन ठीक नहीं है। माँ भी समझाने लगी कि वह अस्पताल है वहाँ तो रोज़ ही ऐसे केस आते रहें गे तो क्या तू ऐसे ही रोयेगी? चल उठ खाना खा ले, धीरे धीरे सब ठीक हो जायेगा । अभी तूने ये सब पहले कभी देखा नहीं इस लिये। फिर पिताजी आ गये--* मेरी लाडली बेटी को क्या हुया? * मा ने बताया तो मेरे सिर पर हाथ फेरने लगे--- बेटा ये तो ज़िन्दगी की शुरूयात है अब समझो कि ज़िन्दगी शुरू हुई है । दुख और सुख जीवन के दो पहलू हैं आगर दुख ना हो तो सुख का कोई महत्व नहीं रह जाता । मगर यही दुख ज़िन्दगी की पाठशाला है । इन से ही आदमी मे दया, करुणा ,प्रेम क्षमा आदि संवेदनाओं का समावेश होता है। आज जिस तरह तुम मे रहम की भावना का उद्भव हुया है बस इसे समेट लो और हर दुखी के लिये ये भावना जब उपजेगी तो तुम्हें एक अच्छा इन्सान बनायेगी। तुम मे इन को सहन करने की शक्ति विकसित करनी होगी जो समय के साथ हो जाती है बस इतनी सी बात है। अब मन मे ठान लो कि दुखी की सेवा करनी है इसी लिये तुम्हें ये नौकरी मिली है। बात करने का ढंग था। सब कहते कि धीरी धीरे तुम इनकी आदि हो जाओगी मगर आदी होने मे और पिता जी की बातों मे अन्तर समझ आ गया था।
3 - चार दिन आराम से निकल गये । दीदी जब दवा की खिडकी पर बैठी होती तो मैं उनके पास बैठ कर उनके काम करने के तरीके को देखती रहती। हम लोग अन्दर से दरवाज़ा बन्द कर लेते बाहर भीड इतनी होती कि 50--60 मरीज खिडकी पर खडे ही रहते दवाईयाँभे उस समय अस्पताल मे बहुत मिलती थीं । भाखडा दैं का काम जोरों पर होने से शहर की जनसंख्या भी दिन पर दिम बढ रही थी।100 बिस्तर का अस्पताल था मगर 200 से कम मरीज दखिल नहीं रहते बरामदों मे भी अपने बिस्तर ला कर लोग इलाज करवाते थे।

मैं देखती कि दीदी बहुत ऊँचे बोलती हैं और जल्दी जल्दी से मरीज़ को खिडकी से हटने की हिदायत भी देती।लगातार बोलते जाना--- जल्दी करो --लाईन मे आओ--- ये इतने दिन की दवा है --- ये ऐसे खानी है--- इतने इतनी रोज़ खानी है आदि अब दिन मे कम से कम 700 मरीज़ नया पुराना 6 घण्टे मे निपटाना कोई आसान काम नहीं था दो जने भी बहुत मुश्किल से निपटा पाते अगर कोई मरीज़ दूसरी बार कुछ पूछ लेता तो दीदी डाँट देती--- अपना ध्यान इधर रखा करो हम कोई बादाम खा कर नहीं आते कि सारा दिन भौँकते रहें ---- । मुझे बहुत अजीब लगता बेचारे मरीज के मुँह की तरफ देखती रहती। कई मरीज तो लडने पर उतारू हो जाते तो ये समझ नहीं पाती कि कसूर किस क है। कभी मरीज पूरे दिन दवा खा चुका होता तो दीदी कहती जाओ पर्ची रिपीट करवा के आओ तो मरीज कहता कि भीड बहुत है आज दे दो कल करवा लूँगा । दीदी का मूड सही होता तो दे देती नहीं तो डाँट के भगा देती मुझे तब भी बहुत बुरा लगता कोई मरीज़ इतना दुखी होता कि खडा भी नहीं हो पाता वो लाईन से निकल कर दवा लेने आता तो दीदी डाँट देती मुझे बहुत तरस आता मगर दीदी कहती तुम्हें नहीं पता खिडकी पर आ कर सभी ऐसे बन जाते हैं मैं किस किस को देखूँ कि अधिक बीमार है या कम । लाईन मे लगे लोगों की गालियाँ नहीं सुननी मुझे। मतलव कि यहाँ भी मुझे यही लगता कि दीदी मे संवेदनायें मर चुकी हैं उन्हें तो किसी मशीन की तरह बस काम करने का पता है।जब कभी इन बातों पर चर्चा होती तो दीदी का वही पुराना जवाब धीरे धीरे सब समझ जाओगी और तुम भी ऐसी ही हो जाओगी।

इस धीरे धीरी ऐसी ही हो जाओगी मेरी जहन मे इतना घर कर गया कि हर बात पर मैं सोचने लगती कि अगर मैं ऐसी ही हो जाऊँगी तो मैं नौकरी छोड दूँगी मगर पत्थर दिल नहीं बनूँगी। मगर ये बदलाव सच मे इतने धीरे धीरे ही होता है कि इन्सान को पता भी नहीं चलता और वो इस से बचने के लिये अपने पक्ष मे कई बहाने घड लेता है। जैसे बच्चा हर वक्त मा के पास रहता है उसे कब पता लगता है कि किस दिन कितना कद बढा । मशीन की तरह काम करते हुये आदमी मशीन हो जाता है।

तीन चार दिन बाद पुलिस एक व्यक्ति की लाश ले कर आयी जो कि नहर से मिली थी उसका पोस्टमार्टम करवाना था। इस बा र्यहाँ किसी और फार्मासिस्ट की डयूटी थी। मगर दीदी ने कहा कि मुन्नी को भी अब सीखना पडेगा ये सब मैं जाती हूँ और इसे साथ ले जाती हूँ,तुम मेरी सीट देख लो। डाक्टर साहिब तैयार खडे थे। मुझे भी जाना ही पडा। वहाँ मार्चरी मे इतनी दुर्गन्ध आ रही थी मेरा मन खराब होने लगा। सफाई सेवक ने अगरबत्ती जलाई और खिडकियाँ दरवाजे खोले। इसके बाद हम सब लाश के पास खडे हो गये पहली बार इस दृ्श्य को देखा था लाश से दुर्गन्ध आ रही थी सफाई सेवक ने उस पर से कपडा उठाया तो मैं जरा पीछे हट गयी सभी के समने नँगी लाश को देखना अच्छा नहीं लगा। मगर दीदी नी बजू पकड कर साथ खडा कर लिया। सफाई सेवक ने पहले उसके पेट को चीरा और एक एक अंग निकाल कर डाक्टर को दिखाया और उसे जार मे रख्ता गया इस तरह उसने 5-6 जार तैयार किये । डाक्टर ने सभी कुछ नोट किया दीदी ने लाश का माप आदि लिया। मुझे एक दम वोमिट आयी और मैं बाहर भागी। आज तो मन मे पक्का सोच लिया था कि मैं नौकरी नहीं करूँगी। वपिस जा कर दीदी ने फटा फट चाय मंगवाई और साथ मे विसरा पैक करने लगी। वहीं टेबल पर विसरा पडा था और वहीं वो खडे हो कर चाय पी रही थी। मैने कहा दीदी आप बिना नहाये चाय कैसे पीने लगी। लाश के पास हो कर जो आते है वो पहले नहाते हैं फिर खाने की चीज़ को हाथ लगाते हैं, फिर आपने तो लाश को छूआ भी है। दीदी हंस पडी--धीरे धीरे सब जान जाओगी----- अब इसमे जानने की क्या बात है, यही सोचते हुये घर चली गयी मगर जा कर उस दिन भी खाना नहीं खाया गया। उल्टी सी आने को होती रही । नहा कर मैं सो गयी। सोचा शाम को पिताजी से बात करूँगी मुझे ये नैकरी नहीं करनी ये अस्पताल वाले तो निर्दयी और पशूओं जैसे हैं। इन्हें जिन्दा या मरे मे भी फर्क नज़र नहीं आता_।

फिर वही धीरे धीरे सब ठीक हो जाता है----- शायद--- क्या मै भी ऐसी ही हो जाऊँगी-------क्रमश:

01 September, 2009

संवेदनाओं के झरोखे से-2---संस्मरण

पिछले अंक मे घटना का जिक्र किया था कि कैसे लगता है किसी को अपने आस पास के वातावरण के प्रति संवेदनहीन होते देख कर । मैं तो इतनी पत्थर दिल नहीं हो सकती कि पास मे तीन लाशें पडी हों और मै उनके सामने चाय पी लू। मगर् दीदी कहती कि देखना तुम भी असिएए ही हो जाओगी। और उनकी ये बात मैं हमेशा याद करती रहती ताकि मैं भी उस तरह की ना बन जाऊँ। आब बात करती हूँ अपनी नैकरी के पहले दिन से तभी वो सब कह पाऊँगी जो कि मैं कहना चाहती हूँ कि कैसे धीरे धीरेिआदमी मे परिवर्तन आता है अगर वो समय समय पर आत्मचिन्तन ना करे या फिर उसके अपने साथ कोई घटना ना घटे तो वो संवेदनहीन हो जाता है। पहला दिन तो दफ्तर की फारमैलितीज़ पूरी करते हुये बीत गया । उसमे दीदी सारा दिन मेरे साथ रही ।मैने कहा भी कि दीदी मैं करवा लूँगी काम आप अपना काम करें तो उन्होंने कहा --*मुन्नी तुम्हें नहीं पता कि ये कलर्क लोग कितने खराब हैं मैं तुम्हें अकेले दफ्तर मे नहीं भेजूँगी।* उनकी आत्मीयता देख कर मन मे उनके प्रति आदर भाव और बढ गया।

जब मैने डिप्लोमा के बाद 3 माह की practical training उनके पास ली थी तब भी उनके प्रति बहुत आदर था वो सख्ती से जरूर पेश आती मगर हमारे फायदे के लिये ही । वैसे भी उनक रोब पूरी OPD ही नहीं पूरे अस्पताल मे था। इमानदारी,. अपने काम के प्रति निष्ठा ,साफ आचरण बहुत सी ऐसी बातें थी जिन से मैं बहुत प्रभावित थी। मुझे अपनी बेटी की तरह ही समझा और प्यार दिया।उन से सब डरते थे । दफ्तर के बाद हम लोग OPD मे आ गये। उस दिन दीदी ने मुझे काफी काम समझा दिया। उनकी डयूटी दवा के मैन counter पर थी साथ मे एक जुनीयर फार्मासिस्ट थी क्यों कि दीदी को emergency भी देखेनी होती सब फार्मा सिस्ट्ज़ की डयूटी भी लगानी होती थी। पूरी OPD सफाई आदि भी देखनी होती थी।उस समय वहाँ कुल 18 फार्मासिस्ट थे जो कि आम अस्पताल से 3 गुना अधिक थे। female हम तीन थी। उस समय भाखडा डैम् का काम बहुत जोरों पर चल रहा था । अस्पताल भी बहुत बडा था। इसे आज भी मिनी पी जी आई कहा जाता है । क्यों कि इसका खर्च भाखडा बोर्ड ही वहन करता था और दवा और साधनों की कमी नहीं थी। खैर अब पिछली बात पर आती हूँ।

अस्पताल मे आज दूसरा दिन था। पहले दिन तो दीदी के साथ काम समझती रही। अगले दिन मेरी डयूटी एमर्जेन्सी विभाग मे लग गयी ।कुछ दिन के लिये दीदी की डयूटी भी मेरे साथ ही लगी ताकि मैं काम सीख जाऊँ। वैसे मैने प्रेक्टीकल टरेनिन्ग भी यहीं ली थी इस लिये काम तो जानती ही थी। उस टरेनिन्ग के दौरान तो देखा बहुत कुछ था मगर जब ऐसे केस आते तो मैं अकसर दूसरे कमरे मे चली जाती। रोने चीखने की आवाज़ सुन कर बाहर नहीं आती दूसरे कमरे मे ही रोने लगती। मुझे लगता था कि मैं अस्पताल मे नौकरी नहीं कर पाऊँगी। दुख कभी देखा ही नहीं था। खुशहाल बचपन से सीधी इस जगह पर आ गयी थी।

आठ बजे डय़ूटी शुरू ही हुई थी कि एक केस आ गया। सभी उस मरीज के इलाज मे जुट गयी मगर उसे बचा नहीं पाये। मरीज की मौत हो गयी उम्र कोई 40 साल थी ।पहली बार किसी को सामने मरते देखा था। समझ नहीं पा रही थी कि ऐसे कैसे आदमी मर जाता है। उसके साथ उसकी दो बेटियाँ और पत्नि थी। उनकी चीख पुकार सुन कर मैं भी रोने लगी। वहाँ अपने अस्पताल के सब से बजुर्ग डाकटर की डयूटी थी। मुझे रोते देख उन्हों ने मुझे डाँट दिया---* ये क्या तमाशा है तुम डयूटी पर हो । जाओ दूसरे कमरे मे और यहां किसी और को भेज दो।* फिर बाद मे जब सारा काम हो गया और सब लोग उस मृतक को ले कर चले गयी तो डाक्टर साहिब ने मुझे बुलाय और समझाया कि इतने संवेदनशील नहीं होना चाहिये। मैं उनकी बातें सुन कर फिर OPD मे चली गयी वहां जाते ही मेरी फिर रुलाई फूट पडी। इस आदमी की बेटी और पत्नि का चेहरा बार बार आँखों के सामने घूम जाता।

फिर दीदी ने समझाया कि देखो पहले पहले सब के साथ ऐसे ही होता है फिर धीरे धीरे आदत पड जाती है और कह कर वो जोर से हँस पडती---- मुझे मन से अच्छा नहीं लगता क्या धीरे धीरे हमारी संवेदनायें मर जाती हैं? किसी का दुख देख कर हमारी आँखें नम क्यों नहीं होती। तभी तो सभी कहते हैं कि अस्पताल वाले रूखे स्वभाव के होते हैं। उन मे रहम कम होता है आदि आदि। मगर मैं ऐसी नहीं हो सकती। मैं इनकी तरह पत्थर नहीं बन सकती। मुझे लगता है जब मैने ये संस्मरण लिखना शुरू किया था तो बात छोटी सी लगी अब लगता है जब तक इसे पूरी तरह कुछ और दिनों की बातें नहीं कहूँगी तब तक जिन संवेदनाओं की मैं बात करना चाहती हूँ नहीं कर पाऊँगी। इस लिये आपको इसे अभी 1--2 भागों मे और झेलना पडेगा।-----अभी तो शायद भूमिका ही बाँध पाई हूँ अपने असली मुद्दे की।

क्रमश:

31 August, 2009

जीवन के कुछ संस्मरण ---- संवेदनाओं के झरोखे से

जैसे ही बरामदे मे कदम रखा लोगों की भीड देख कर डर गयी एमेरजेंसी रूम तक आते आते पता चला कि एक परिवार की गाडी दुर्घटना ग्रस्त होने से घर के तीन सदस्यों की मृत्यु हो गयी है और तीन लो ग बुरी तरह घायल हैं दो को कुछ कम चोट लगी है । मन दुखी हो गया। रूम मे तीन लाशें पडी थी घायलों को वार्ड मे शिफ्ट किया जा रहा था। सामने ही दूसरे कमरे मे से मेरी सीनियर जिसे मैं दीदी कहती थी उन्होंने मुझे देखा तो आवाज़ दी।
"जी दीदी " मेरी आवाज़ जैसे गले मे अटक रही थी। कभी ऐसा दृश्य देखा ही नहीं था । अभी अस्पताल मे मेरी नौकरी का ये तीसरा ही दिन था।

" मुन्नी,ऎसा करो वार्ड अटेँडेन्ट से कहो कि मरीज़ शिफ्ट करवा के इन शवों को बाहर रखवा दे और 4 कप चाय के ले आये। हाँ साथ मे कुछ खाने के लिये भी।" और डाक्टर ने भी उनकी हाँ मे हँ मिलाई। मैं नयी और उम्र मे उनसे बहुत छोटी थी इस लिये वो प्यार से मुझे मुन्नी कहने लगी थी यूँ भे मैं बहुत पतली दुबली थी और उम्र से छोटी लगती थी उनके बुलाने से अस्पताल के सभी लोग मुझे मुन्नी के नाम से ही बुलाने लगे थे मुझे अच्छा भी लगता था। आज 37 साल बाद भी { आज तक भी शहर मे अधिक लोग मुझे मुन्नी के नाम से जानते हैं किसी की मुन्नी दीदी किसी की मुन्नी आँटी , आगे उनके बच्चों की मुन्नी नानी बन गयी हूँ।} हाँ तो मैं बात कररही थी उस दिन की-----

मैं उनकी बात सुन कर सन्न रह गयी ऐसे मे दीदी यहां बैठ कर चाय कैसे पीयेंगी उनका मन कैसे कर रहा है चाय पीने के लिये \ वो मेरी सोच से बेखबर अपने रजिस्टर पर नज़रें गडाये काम कर रही थी डक्टर साहिब उनके मेडिकल रिपोर्ट तैयार कर रहे थे। वार्ड अटेण्डेण्ट अपना काम करने लगा और मैं बाहर जा कर बरामदे मे खडी हो गयी

वार्ड अटेन्डेंट ने चाय ला कर कप मे डाली और सब के सामने रख दी भीड वार्ड की ओर चली गयी मगर शवों के पास बरामदे मे अभी भी कई लोग खडे थे। एक औरत और एक लडकी बहुत जोरों से रो रही थी। मैं भी उन्हें चुप करवाने की बेकार कोशिश करने लगी और मेरे आँसू रुकने का नाम नहीं ले रहे थे।उस औरत का पति और जवान बेटा मारे गये थे साथ मे डराईवर मारा गया। ऐसा दृश्य देख कर कौन ना रो उठेगा। तभी अन्दर से दीदी की आवाज़ आयी । अंदर आयी तो चाय आ चुकी थी। "लो चाय पीओ" दीदी ने बिना नज़र उठाये कहा।
"दीदी मैं नहीं पीऊँगी।''दीदी ने नज़र उठा कर मुझे देखा---- ''अरे तुम रो रही हो ? अब ये तो रोज़ का काम रहेगा कब तक रोती रहिगी?न चलो चाय पीओ।
"अभी नयी है ना इसलिये अपने आप कुछ दिनो मे आदी हो जायेगी।" डाक्टर साहिब धीरे से मुस्कराये।
ये लोग इतने संवेदन हीन कैसे हो सकते हैं बाह्र तीन लाशें पडी हैं लोग रो रहे हैं और ये लोग मज़े से चाय पी रहे हैं। मन क्षुब्ध सा हो गया
'देखो मुन्नी हम लोग दस बजे से एक टाँग पर खडे हैं सुबह 8 बजे का एक कप चाय का पीया है उसके बाद समय ही नहीं मिला आब तो टाँगे भी काँप रही हैं अगर ये चाय ना पी तो घर तक भी नहीं पहुँचा जायेगा। फिर ये तो रोज़ का काम है ।हम भी अगर इसी तरह रोते रहे तो काम कौन करेगा \पता है जो जख्मी हैं उनकी हालत कैसी थी बहुत कोशिश के बाद उन्हें स्टबल कर पाये फिर खुद डाक्टर साहिब की तबीयत भी ठीक नहीं। चलो चाय पीओ देखना तुम भी एक दिन ऐसी ही हो जाओगी सी ? " खैर मैने चाय दूसरे कमरे मे जा कर वाशबेसिन मे फेंक दी।
मैं सोचने लगी कि सच मे आदमी इतना संवेदन्हीन हो सकता है? कुछ भी हो मैं ऐसी नहीं हो सकती।

बचपन खुशियों से भरा था। दुख क्या होता है जाना ही नहीं था तभी तो कहीं आस पडोस मे जरा सी दुख की बात हो, किसी को जरा सा दुख हो जाये तो आँसू थमने का नाम नहीं लेते थे। दिल पसीज उठता था।
जब अस्पताल मे मेरी नयी नयी नौकरी लगी तो बहुत खुश थी। मैने जिद करके मैडिकल मे दाखिला लिया था । एम बी बी एस मे तो दाखिला नहीं मिला मगर फार्मेसी मे दाखिला ले कर सोचा था कि इसके बाद बी फार्मेसी कर लूँगी। खैर हमेशा इन्सान के चाहने से क्या होता है । डिप्लोमा करते ही 2 माह मे नौकरी मिल गयी और घर वालों को शादी की चिन्ता थी इसलिये आगे ना पढ सकी। घर पर बी ए की तयारी करने लगी।

इस नौकरी को भी मैं अपने लिये वरदान समझती थी। पिता जी कहा करते थे कि वो लोग भाग्यवान होते हैं जिन्हें आजीविका कमाने के साथ साथ लोगों की सेवा करने का अवसर मिलता है। और मैं ये अवसर खोना नहीं चाहती थी इस लिये नौकरी join कर ली। नयी नयी नौकरी थी। बहुत खुश थी। मगर दो तीन दिन मे ही लगने लगा कि ये सफर इतना आसान नहीं है जितना मैने सोचा था।ास्पताल मे तो सब दुखी ही आते हैं । मैं उनके दुख देख कर द्रवित हो जाती और कई बार रोने लगती। अभी पहला दिन ही था मुझे इस अस्पताल मे आये कि एमरजेँसी विभाग मे एक मरीज़ की मौत हो गयी।उम्र कोई 40 वर्श के आस पास होगी।------ क्रमश:
:

29 August, 2009

आओ कर लो मेरा वरण Align Centre

हे नवजीवन दाता
हे त्रिलोकी विधाता
शुद्ध करो मेरा
अन्त:करण
आओ कर लो मेरा वरण
मेरे अवचेतन मन पर
त्रिश्णाओं स्पर्धाओं का धूआँ
बन जायेगा एक दिन
मेरे विनाश का कूआँ
लगा लो अपनी शरण
आओ कर लो मेरा वरण्
मन को लगी है चोट
मन रही कचोट
छटपटा रहा मन दर्पण
आओ कर लो मेरा वरण
दे दो चेतन प्राण
दे दो दिव्य ग्यान
स्वीकार करो समर्पण
आओ कर लो मेरा वरण
सुसंकल्प जगा दो
सुविग्य बना द
लगाओ मुझे शरण्
आओ कर लो मेरा वरण
हे नवजीवन दाता
हे त्रिलोकी विधाता
आओ कर लो मेरा वरण
शुद्ध करो अन्त:करण


28 August, 2009

ये क्या हो गया
साथ ही एक गाँव की घटना पर ये पँक्तियां मन मे आयी।
एक औरत पंचायत मे चुनाव जीत गयी ।
कहने को वो पंच थी मगर काम सारा उसका पति करता था
वो तो बस आँगूठा छाप ही थी।
पंचायत मे हेरा फेरी के केस मे उस औरत पर केस बन गया।
गलती आदमी ने की भुगत रही है औरत ।जिसे कुछ पता नहीं कि क्या हुआ।
ऐसे और पता नहीं कितने केस होंगे। अब ऐसे केस मे कानून भी क्या कर सकता है।
उस औरत ने कई बार कोशिश की थी कि वो पंचायत मे जाया करे
मगर आदमी ने उसकी एक नहीं चलने दी।
इस पर कुछ शब्द कविता के रूप मे------


ये क्या हो गया
पुरुष,
औरत के कन्धे से
कन्धा मिला कर
आज़ाद हो गया
नारी के कन्धे से
बन्दूक चला कर
बेदाग हो गया
देखो! मुज़रिम बनी
उसकी माँ बहन बेटी का
क्या हश्र हो गया
और इन्साफ ?
कानून की अन्धी
चद्दर ओढ कर
जाने कहाँ सो गया

26 August, 2009

गज़लAlign Centre
दुख मे पलती नारी तौबा
जीवन भर लाचारी तौबा

मेरे चैन का दुश्मन है जो
उस से ही दिल हारी तौबा

मुह पर मीठा बोलें सब
दिल मे देख कटारी तौबा

कौन किसी का दुख बँटाता
झूठी रिश्तेदारी तौबा

माँ ना हो तो पीहर कैसा
भाई की सरदारी तौबा

आटा नकली दालें नकली
देखो चोर बजारी तौबा

अन्धी पीसे कुत्ता चाटे
माल जु है सरकारी तौबा

जनता का रखवाला सांसद
जमता पर अब भारी तौबा

चोरों मे से चोर चुनें अब
वोटर की लाचारी तौबा

अफसर करते सैर सपाटे
कारें हैं सरकारी तौबा

चाल समझ तू दुनिया की
बात करें दो धारी तौबा

कैसे रिश्ते रह गये"निर्मल"
माँ ने बेटी मारी तौबा


24 August, 2009

आना मेरी रूह के शहर

अर्धांगिनी
आधेपन की साक्षी
Align Centreफिर भी चाहते हो
सात जन्मों का बन्धन?
अगर चाहते हो
तो बनाओ
पूर्णागिनी ,पूर्णाक्षरी।
केवल जिस्म नही
अपनी रूह के साथ ।
आना मेरी रूह के शहर।
तुम आते हो
आधेपन मे और
टाँग जाते हो
कीली पर कुछ आपेक्षाओं की
गठरियाँ कुछ बन्धन कुछ सवाल
जिन्हें हल करते हुये
रह गयी हैं
मेरी कुछ कल्पनायेंअनव्याही
कुछ सपने अधूरे
तुम चाहते हो
जन्म जन्म का साथ
सम्पूर्ण समर्पण
तो आना
मेरी रूह के शहर
मगर आना एक एहसास ले कर
कुछ अरमान ले कर
एक उन्मुक्त भाव ले कर
सिर्फ मेरे लिये
और
बरस जाना
बादल बन कर
मेरे हृदय की धरा पर
मैं समा लूंगी तुझे
और बुझा लूँगी
जन्मों की प्यास
और व्याह दूँगी
अपनी कुंवारी कल्पनायें
तुम्हारी रूह के साथ
जन्म जन्म के लिये
कभी आना
हवा का झोँका बन कर
उडूँगी तुम्हारे पाँव की धूल बन कर
तुम्हारे साथ साथ्
और सजा लूँगी अपने सब सपने
कभी बहना झरना बन कर
मैं आऊँगी प्यासी बन कर
और बुझा लूँगी अपनी
जन्मों की प्यास
मगर आना एक एहसास बन कर
मत लाना अपनी आपेक्षायें साथ
आना मेरी रूह के शहर
व्याह दूँगी अपनी कुंवारी कल्पनायें
तुम्हारी रूह के साथ्
कर दूँगी सम्पूर्ण समर्पण
और बन जाऊँगी
सम्पूर्णाक्षरी
सम्पूर्णांगिनी
जन्म जन्म के लिये
आना मेरी रूह के शहर

22 August, 2009


ग़ज़ल

तुम मुझको अब शर्मिंदा न परेशान करोAlign Centreमेरी उलझन को थोडा तो आसान करो

कश्ती को आपनी कोई तो किनारा मिल जाए
तूफां में तो राहों की कुछ पहचान करो

खुद को लटकाया था मैंने तेरी सूली पर
जीना मुश्किल था मरना तो आसान करो

चिंगारी लील रही है मजहब की अब तो
अपनी दुनिया को तो यूँ ना सुनसान करो

लुटती है अस्मत उसकी अब बाज़ारों में
रक्षा अबला की तो मेरे भगवान करो

मुर्दादिल लोग नज़र आते हैं दुनिया में
कोई तो पैदा जिंदा दिल इंसान करो

जीयें तो जीयें कैसे ऎसी दुनिया में
जीने को मुहैया अब कुछ तो सामान करो

20 August, 2009

वीरबहुटी---गताँक से आगे
---कहानी

पिछली किश्तों मे वीरबहुटी और उससे जुडी बात चीत आपने पढी।नई बहु और उसकी जेठानी सुबह चार बजे खेतों मे गयी थीं और वहीं पर ये सारी बात चीत हुई अब आगे----
वापिस घर पहुँच कर जान मे जान आयी।तैयार होने से लेकर पितर पूजन तक्वो मेरे अंग संग रही। दोपहर का भोजन भी उसने मेरे साथ ही किया।शाम को वो मुझे घर के पिछवाडे वाले बगीचे मे ले गयी। कई तरह के फल सब्जियाँ तथा फलों के पेड लगे थे। वो कुछ सोच रही थी। झट्से उसने क्यारी से एक वीरबहुटी उठाई और हाथ पर रख कर सहलाने लगी।पता नेहीं मन मे क्या चल रहा था। फिर उसे जितनी भी वीर्बहुटियां दिखी सब को उठा उठा कर गुलाब के पत्तों पर रखती गयी।मैं समझ रही थी कि उसे डर है कि किसी के पैर के नीचे आ कर मर ना जाये। वो जरूर खुद को भी असुरक्षित महसूस करती होगी---- अजीब सी बेचैनी --- जैसे किसी ने उसके अरमानों को कुचल दिया हो,उसके रंग रूप और वज़ूद को नकार दिया हो।उसे डर था कि किसी दिन वो भी इसी वीरबहुटी की तरह मसल दी जायेगी---।
*बहु आज सदियों बाद किसी ने ढंग से मुझसे बात की है।जब मैं कोई भी बात करती हूँ,बनती संवरती हूँ ,सब मेरा मजाक उडाते हैं,कभी डाँटते मारती पीटते भी हैं। क्या सच मे मैं पगली हूँ?

*नहीं दीदी,अप बहुत अच्छी और समझदार हैं। फिर हीरे की पहचान हर किस्र्र को थोडे ही होती है!जब तक बाकी पत्थरों मे पडा रहता है पत्थर ही रहता है।पर जब जौहरी के हाथ लग जाता है तो उसकी कीमत पडती है।मैं आपकी ज़िन्दगी को नये मायने दूँगी। अब आप अकेली नहीं हैं मैं हूँ ना आपके साथ । हम दोनो मिल कर सब ठीक कर लेंगी।*
उसकी आँख से एक आँसू टपका, मगर चेहरे पर सकून था। शायद ऐसे ही किसी कन्धे की उसे तलाश थी।जो प्यार और भावनायें वो पति से चाहती थी वो उसे नहीं मिली थी। मन मे एक डर सा बैठने लगा था कि क्या गाँव मे सभी का जीवन ऐसे ही होता है? मेरा कैसा होगा? ----
अगले दिन मैं मायके चली गयी।हम ने दो तीन दिन वहाँ रहना थ घर मे बहुत चहल पहल थी।जाते ही इनको मेरी बहनों और सहेलियों ने घेर लिया हँसते हंसाते दिन बीत गया।
अगले दिन सुबह सब नाश्ता कर रहे थे।--
*ारे कोई फोन क्यों नहीं उठा रहा? कब से घन्टी बज रही है?*
रसूई से माँ की आवाज़ आयी। भईया ने फोन उठाया , सुनते ही जड से हो गये और इनकी तरफ देखने लगे।
*भईया क्या हुया?* इन्होंने पूछा।भईया ने कुछ कहने की बजाये फोन इन्हें पकडा दिया।
*क्या हुया?क्या हुया भाभी को?उधर से पता नहीं क्या कहा गया था।फोन रख कर ये धम्म से बैठ गये।
*भाभी की मौत हो गयी है---हमे अभी जाना होगा।* मैं सुनते ही सकते मे आ गयी।मुझे दुख और आश्चर्य इस बात का था कि कल वो ठीक ठाक थी और खुश भी थी।एक दम क्या हुया होगा? उस *वीरबहुटी* को अभी मैं सहला भी नहीं पाई थी
घर पहुँचे तो आँगन मे उसकी लाश पडी थी आसपास औरते बैठी रो रही थी।मैं जा कर उसके सिरहाने बैठ गयी। मेरे आँसू रुकने का नाम नहीं ले रहे थे।दो दिन मे ही वो मेरे दिल तक उतर गयी थी।पास बैठी औरतें घूँघट मे ही धीरे धीरे आपस मे बातें कर रही थीं---शायद मुझे सुनाने और समझाने के लिये--- * बहुत अच्छी थी भाग भाग कर सारा काम करती थी मुँह मे जुबान नहीं थी--कोई डाँटे फटकारे बस चुप सी साध लेती थीऔर क्यारियों मे कुछ ढूँढ्ने लगती थी। मैं समझ गयी कि जरूर वीरबहुटी को उठा कर सहलाती होगी--- उसका डर शायद सच था।
मेरे पीछे दो और औरतें फुसफुसा रही थीं------ *आदमी गुस्सेबाज और रंगड[ रूखे स्वभाव का} था। भला हरदम कोई इस तरह अपनी पत्नि को मारता पीटता है?जाने किस ने ये गुलाब का फूल कु्रगँदल के सथ लगा दिया!बेचारी उन काँटों की चुभन नहीं सह पायी।कल कैसे सजी संवरी सुन्दर लग रही थी--- देर बाद गहने कपडे ढंग से पहने थे।--अज रसोई मे जरा सा दूध उबल गया सास ने बेटे से शिकायत की कि देखो गहने कपडे मे ही ध्यान है दूध उबाल दिया---- बस पति ने गुस्से मे उसे बहुत मारा--- बेचारी पेट से थी--- बच्चा पेट मे ही मर गया। और साथ ही उसे ले गया।पता नहीं किसकी नज़र लग गयी बेचारी को?----उसकी पतली सी चुन्नी मे से मैं उसे देख रही थी नज़र वाली बात करते उसने मेरी ओरे देखा था---- मन अजीब सी वित्रिश्णा से भर गया।
मेरे अंदर बेबस, क्रोध् और पता नहीं कितनी चिन्गारियां सी उठने लगीं। मैं नई बहु थी मुझे सभी पास बैठने से मना करने लगे।मगर आज मैं उसे एक पल भी अकेले नहीं छोडना चाहती थी---- कोई कुछ भी कहे --परवाह नहीं करूँगी----।
औरतें उसे नहलाने लगीं थी अंतिम स्नान--- कपडे माँग रही थी--कोई और ले कर आता इससे पहले ही मैं उठी अपना मेकाप का सामान और एक नयी लाल साढी निकाल लायी--- औरतें हैरानी से मेरी ओर देख रहीं थीं मगर मुझे किसी की परवाह नहीं थी और मैं उनको एक संदेश भी देना चाहती थी--- मैं वीरबहुटी नहीं *बीर वहुटी* हूँ।मैने बिना किसी की परवाह किये उसे सजाना शुरू किया।उसे सहलाया ,उसके गालों पर हाथ फेरा-- आंसू टप टप उसके माथे पर गिरे।मुझे लगा अभी वो उठेगी और कहेगी ----- बहु देखा ना मैने सच कहा था लोग वीर्बहुटी को कैसे कुचल देते हैं-- तुम बहदुर--- बीरबहुटी बनना --। मैने उसकी कलाई मे चूडियां पहनाई और उसके हाथ को दबा कर जैसे उसे दिलासा दिया कि चिन्ता मत करो---। तभी पीछे से एक औरत फुसफुसाई ------- *मुझे तो ये भी पगली लग रही है।*---
मन से फिर एक लावा सा उठा--- मगर चुप रही उसे घूर कर देखा तो वो मेरी ीआँखों की भाषा जरूर समझ गयी और चुपके से वहां से खिसक गयी---
दीदी जा चुकी थी---छोटे छोटे मासूम पाँच बच्चों को छोड कर --- जैसे उसे इस बात का विश्वास हो कि मैं सब सम्भाल लूँगी---।
रात को छत पर खडी आकाश की ओर देख रही हूँ---- एक तारा टूटा--- कहते हैं टूटते तारे से जो माँगो मिल जाता है।मैने झट से आँख बँद कर दुया माँगी---*हे प्रभू दीदी को मेरी बेटी बना कर भेजना दीदी की तरह ही सुन्दर, प्यारी सी--- मैं उसे वीरबहुटी[veerbahuti] नहीं बीर बहुटी[ beervahutee] बनाऊँगी जिसे कोई पाँव तले ना कुचल सके।---- और मुझे शक्ति देना कि मैं दीदी के बच्चों को माँ का प्यार दे सकूँ।*
और यहां से बीर बहुटी का सफर शुरू होता है । iइस 37 वर्ष के सफर के बाद आज आप सब के सामने है।

19 August, 2009

वीरबहुटी----गताँक से आगे ---कहानी

सुबह जल्दी उठना होगा ,रिती रिवाज शुरू हो जायेंगे। और पितर पूजन भी होगा इस लिये सोचा कि सो ही जाऊँ नहीं तो कल बहुत थक जाऊँगी। लेट गयी मगर नीँद कहाँ आनी थी।माँ की याद आ गयी,पता नहीं वो भी सोई होगी कि रो रही होग और पिताजी त्प किसी के चुप करवाने पर भी चुप ना हुये होंगे बहुत लाडली थी उनकी।दूसरा इन की एक झलक देखने को मन उतावला था।ये कैसे रिती रिवाज़ हैं जब शादी ही हो गयी तो उनसे मिलने पर प्रतिबंध कैसा?गाँव के जीवन का पहला झटका लगा था मुझे।
फिर मेरी सोच पलट कर दीदी पर आ गयी।दूसरों के मन को कितनी जल्दी पढ लेती थी।वो पागल कैसे हो सकती है। जरूर् उनकी कोमल भावनायें जीवन के कटु यथार्थ से तालमेल नहीं बिठा पाईं। पर क्यों? ये जानना मेरी लिये भी जरूरी था । मेरे आने वाले जीवन की कुछ् कडियाँ भी इन से जुडी थी,जिनका भविश्य मैं उसकी आँखों के आईने मे तलाशना चाहती थी।
नये रिश्तों के सृजन की दहलीज़ पर खडी,मैं रिश्तों की आस्थाओं को उसके अनुभव से सीँचना चाहती थी।इस लिये उसकी भावनाओं को समझना जरूरी था। उन का विश्वास जीतना जरूरी था। सहसा मुझे लगा कि मेरी जिम्मेदारी बहुत बढ गयी है।
सुबह चार बजे उसने मुझे उठाया और खेतों की तरफ ले चली।घना अंधेरा था,पिछले दिन की बारिश से जमीन कुछ नरम थी।संभल संभल कर पैर रखना पडता था।मक्की के ऊँचे ऊँचे पौधों से भरे खेत मे जाते हुये डर लग रहा था। मन मे एक दूसरा भय भी था कि कहीं दीदी को पागलपन का दौरा ना पड जाये।डर के मारे टाँगें काँपने लगी थीं। दीदी आगे आगे चल रही थी वर्ना मेरे मन को पढ कर क्या सोचती? मन ही मन दआ कर रही थी कि घर सही सलामत पहुँच जाऊँ।
*बहु क्या तुमने कभी वीर्बहुटी देखी है?* अचानक दीदी पूछने लगी।
*नहीं* देखी तो थी मगर इस समय मैं बात करने की स्थिती मे नहीं थी।
*मैं दिखाऊँगी। कितनी कोमल मखमल की तरह उसका बदन होता है सुन्दर लाल सुर्ख रंग ।लोग पता नहीं क्यों उसे पाँव के नीचे मसल देते हैं।*
*---------*
चुप रही इस समय कहां से वीर्बहुटी का ख्याल आ गया?
उसने सहजे से एक वीर्बहुती जमीन से उठा कर तार्च की रोशनी मेुअपने हाथ पर रख कर दिखाई।अनार के दाने जितनी सुर्ख मखमल जैसा जीव था।
*छोड दो दीदी नहीं तो मर जायेगी* मैने नीचे रखवा दी *वैसे भी ये इतना छोटा स जीव है कई बार बिना देखे किसी के पाँव के नीचे आ जाती होगी।*
*फिर भी ये जमीन को नुक्सान पहुँचाने वले कीडे खा लेती है इसका इतना तो ध्यान रखना ही चाहिये।*
मैं फिर चुप रही।
* और ये देखो,छल्ली भुट्टा} है *उसने छल्ली पर भी टार्च से रोशनी की * इसके दाने कितने सुन्दर हैं जसे मोटी जडे हों{ जरा सी छल्ली छील कर दिखाई और हंस पडी,--- उन्मुक्त हंसी---- * मगर सुबह कोई आयेगा और जो सब से कोमल होगी उसे तोड कर ले जायेगा उसकी खाल खींचेगा और आग पर रख देगा अपना स्वाद और भूख मिटाने के लिये----कोई किसी को अपनी मर्जी से जीने क्यों नहीं देता?*
मैं डर गयी। ये सुबह सुबह दीदी को क्या हो गया?कैसी बातें कर रही है।मुझे लगा इन चीज़ों का तो बहाना है असल मे मुझे अपने दिल की बात बताना चाहती है आज मुश्किल से तो उस बेचारी की बात सुनने वाला मिला है।मुझे लगा ये भी वीरबहुटी की तरह कोमल और असहाय है।
*दीदी आप सोचती बहुत हैं।भगवान ने एक विधा बना रखी है., सभी को उसमे बन्ध कर चलना पडता है। इस सृष्टी का हर जीव हर पदार्थ एक दूसरे पर आश्रित है। अच्छा बताओ अगर हर जीव अपनी ही मर्ज़ी से जीने लगे,एक दूसरे के काम ना आये एक दूसरे पर आश्रित ना हों तो ये संसार कैसे चलेगा? अगर नदी उन्मुक्त बहती रहे उसके किनारों को बान्धा ना जये तो क्या वो तबाही नहीं मचा देगी?भूख के लिये इन्सान इन पेड पौधों पर आश्रित है अगर इन्हें खाये नहीं तो क्या जिन्दा रह सकता है इन्हें काँटे छाँटे नही तो क्या ये जंगल नहीं बन जायेगा? ऐसे ही वीरबहुटी जीनी के लिये जमीन के कीडे मकौडे खा कर जीवित रहती है।*
*हाँ ये तो ठीक है।* वो कुछ सोच मे डूब गयीं।
* दीदी जीवन सिर्फ भावनाओं मे बह कर ही नहीं जीया जाता। उसे यथार्थ के धरातल पर उतर कर ही अपना रास्ता तलाश करना पडता है।
*बहु तुम्हारी बातें तो पते की हैं।* वो फिर से सोचने लगी।
मुझे आशा की एक और किरण दिखाई देने लगी। मुझे लगा कि मैं उसे जरूर एक दिन इस संवेदनशील मानसिक उल्झन से बाहर ले आऊँगी।उसके दिल की चोट की मैं थाह पा गयी थी।
नारी ही क्यों इतना आहत होती है़? ऐसी बात नहीं कि पुरुश आहत नहीं होता है , जब उसके अहँ पर चोट लगती है।नारी तब आहत होती है जब उसके कोमल एहसासों पर कुठाराघात होता है।पुरुश जिस्म के समर्पण को सरवोपरि मान लेता है जब की औरत रूह तक उतर जाना चाहती है।उसका समर्पण तब तक अधूरा्रहता है जब तक कोई उसकी भावनाओं को ना समझे उसके दिल मे ना उतर जाये।
कहते हैं पुरुष का सम्बन्ध मंगल ग्रह से होता है कठोर, अग्नि तत्व, अहं,अपना अस्तित्व और जीत की कामना। मगर औरत का सम्बन्ध चन्द्रमा से होता है जो भावनाओं भावुकता कोमलता का प्रतीक है। जिसे खुद रोशन होने के लिये सूरज की रोशनी पर निर्भर होना पडता ह, फिर भी खुश है ----समर्पित है प्रकृति को रिझाने मे---शीतलता देने मे। औरत को तो रोने के लिये भी एक कन्धे की तलाश होती है।
शायद उसकी ये तलाश खत्म हो ही नहीं सकती।जीवन नदी के दो किनारे हैं । स्त्री और पुरुष, साथ साथ तो चलते हैं----- ,समानाँतर रेखाओं की तरह------ मगर एक नहीं हो सकते।----- क्रमश

18 August, 2009

वीर बहुटी--- कहानी
पहले तो आप सब से क्षमा चाहती हूँ कि 5-6 दिन से कम्प्यूटर खराब रहने की वजह से आप सब के ब्लोग्स पर नहीं आ पाई।अज एक कहानी ले कर उपस्थित हूँ।
ये मेरी सब से पहली कहानी है जो कि वीरबहुटी कहानी संग्रह मे छप छुकी है
पंजाबी और हिन्दी की कई पत्र पत्रिकाओं मे भी प्रकाशित हो चुकी है

वीर बहुटी

वो मेरे साथ सट कर बैठी,धीरे धीरे मेरे हाथों को सहला रही थी।कभी हाथों की मेहँदी कोदेखती कभी चूडियों पर हाथ फेरती, और कभी घूँघट उठा कर मेरे कानों के झुमके नथ और टिक्का देखती।मैं घूँघट से अपल्क उसे निहार रही थी।उम्र मे 25--26 वर्ष की लगती थी।शायद पेट से भी थी।रंग गोरा,चेहरा गोल,गुलाब की पँखडिउओं जैसे लाल पतले होँठ और उसकी बडी बडी आंखों की मासूमियत उसकी खूब सूरती मे चार चाँद लगा रही थी।मगर इस मासूमियत मे भी मुझे लगा कि इन आंखों मे और बहुत कुछ है, कुछ अविश्वास ,कुछ सूनापन जाने क्या क्या जिसे मैं समझ नहीं पा रही थी। मेरी डोली ससुराल आये अभी दो तीन घन्टे ही हुये थे।मुझे पता नहीं था कि वो मेरी क्या लगती, है मेरा उससे क्या् रिश्ता है मगर वो मुझ से ऐसी व्यवहार कर रही थी जैसे मेरी और उसकी पुरानी जान पहचान है।पता नहीं क्यों, अबोध बालिका जैसा उसका प्यार मुझे अंदर तक प्रभावित कर रहा था।एक अनजान घर,अनजान लोग,ऎसे मे उसका प्यार मुझे साँत्वना दे रहा था, सहला रहा था ,------जैसे कह रही हो-----* मैं हूँ ना,क्यों घबराती हो?* मै कुछ आश्वस्त सी हुई। चलो कोई तो इस घर मे अपना हुआ।
*उस पगली को नई बहू के पास क्यों बिठा रखा है? पता नहीं क्या अनाप शनाप बक रही होगी?* बाहर से किसी पुरुष की आवाज़ आयी।
*बेटा तुम ही बुलाओ उसे,इतना काम पडा है, मेरा कहा कब मानती है?* ये किसी औरत की आवाज़ थी। शायद मेरी सासू जे की थी
वो जल्दी से उठ कर भागी, *ओह्! तुम्हें देख कर मै तो सब कुछ भूल गयी।*
मैं सोच मे पड गयी कि ये औरत कौन है? मुझे उस आदमी का उसे इस तरह कहना अच्छा नहीं लगा। पगली तो वो किसी तरह भी नहीं लगती थी----मासूम जरूर थी। आवाज़ सुनते ही कैसे भाग गयी फिर कहना कैसे नहीं मानती? घर मे काफी महमान आये थे---सब खाना खा रहे थे। और वो भाग भाग कर सब के खिलाने लगी किसी को पाने किसी को सब्जी तो किसी को चपाती पूछती और हंस हंस कर बातें भी कर रही थी।उसकी आवाज़ मे एक खुशी ,एक उमंग थी।
जेब सभी खाना खा चुके तो वो मेरे लिये भी एक थाली मे खाना ले आयी।मेरी निगाहें इन्हें ढूँढ रही थीं कि शायद इकठै खाना खायें गे। वैसे भी जब से यहाँ आयी थी उसके बाद इन्हें देखा ही नहीं था।ाइसा भी क्या काम? ---- शायद उसने मेरी निगाहों को पढ लिया था। वो हंसी---- पता नेहीं उसकी हंसी मे क्या था कि मन सहम सा गया---
*किसे ढूँढ रही हो ?ये तलाश तो सारी उम्र ही करती रहोगी!---चलो अब खाना खाओ--गाँव मे पति पत्नि साथ बैठ कर कहाँ खा पाते हैं---- दुल्हा दुल्हन तो बिलकुल नहीं । यहाँ ऐसे ही रिवाज़ है ।अज मैं तुम्हें अपने हाथ से खाना खिलाऊँगी।* मेरे ना ना करते भी उसने जल्दी से मेरे मुँह मे एक कौर डाल दिया। जाने क्यों मेरी आँख नम हो गयी।
*देखो मैं आज तक ऐसे एक कौर के लिये तरस रही हूँ।यहाँ कोई किसी को नहीं पूछता--ना कहता है कि खाना खा लो। खुद खा लिया तो खा लिया वर्ना भूखे सो जाओ।शिष्टाचार, भावनाये जानने का समय गाँव के लोगों के पास कम ही होता है। हाँ मै हूँ तो तुम्हारी जेठानी पर बहिन बन कर रहना चाहूँगी--- क्या इस पगली को बहिन बनायोगी?*
*दीदी,कैसी बात करती हैं आप?मुझे अनजान जगह मे एक बहिन मिल गयी और क्या चाहिये?* और हम दोनो ने इकठे खाना खाया।ापने हाथ से खिलाते हुये उसकी आँखो मे तृप्ति का एहसास--मेरे मन मे आशा के एक किरण जगा गया।
अब मुझे पता चल गया था कि वो मेरी जेठानी है।मैने सुना था कि उसे पागलपन के दौरे पडते हैं।ाब तो उसे पागल कह कर ही बुलाया जाता था।इलाज अब भी चल रहा था। सब तरह के पागलों का एक ही इलाज होता है दिमाग को गोलियाँ खिला खिला कर सुलाने का! किसी की उमँगों को किसी गोली से कहाँ सुलाया जा सकता है? गोली संवेदनायो को कैसी सुला सकती है बस पल भर के लिये जब नीन्द आती है तब तक----
मगर मुझे उसमे ऐसा कुछ नहीं लगा कि वो पागल है।मुझे लगा कि उसके अंदर कहीं गहरे मे कोई वेदना है कोई पीडा है, असुरक्षा और असमर्थता की भावना है। जो साथ पाते ही बाहर आना चाहती है।
*वर्षा {जेठानी का नाम} तो किसी से बात कम ही करती है।उदास, गुमसुम् सी रहती है उसे बोलते हुये कम ही सुना है।मगर आज तुम से खूब बतिया रही है। शायद पहली बार इसके चेहरे पर खुशी देखी है।*
पास बैठी औरत मुझे बता रही थी
अब मै जान गयी थी कि दीदी बहुत भावुक और संवेदनशील हैं। भावबायों को ना जाने कितने गहरे तक छुपाती रही हैं।ये भी सुना था कि जेठ जी बहुत गरम मिजाज और रूखे स्व्भाव के हैं।अखिर क्यों होती हैं ऐसी बेमेल शादियाँ! ग्रह और नक्षत्र मिलान किस काम का? क्यों उपर वाला उपर बैठा ये खेल खेल रहा है। औरत को अबला क्यों बनाया उसने? खुद ही उसकी इतनी बडी परीक्षा लेता है---- शायद भगवान भी पुरुष् है जो अपने मन बहलाने के लिये ही ऐसा करता है।-----
खाने के बाद सब बातें करते करते सोने लगे मैं जहाँ बैठी थी वहीं मेरा बिस्तर लगा दिया गया।पास मे ही 4-5 बिस्तर और थे जिन पर कुछ औरतें सो रही थीं। दीदी आईँ और
मेरी साथ बिस्तर पर बैठ गयी।मैं हैरान थी कि क्या मेरा बिस्तर यहीं लगेगा?क्या मेरा कमरा यहीं होगा? और मेरा नज़रें इन्हें ढूँढ रही थीं।
*बहू अब सो जाओ सुबह चार बजे उठना पडेगा।यहाँ शौचादि के लिये भी खेतों मे जाना पडता है। मैं तुम्हें ले जाऊँगी।-------क्रमश

13 August, 2009

शहर की खुश नसीब औरत


वो हंसती है
मुस्कराती है और
शहर की सबसे
खुशनसीब, खुशहाल
और समझदार्
औरत कहलाती है
लोगों ने देखे हैं
उसके चमकते
मोती जैसे दाँत
शायद नहीं देख पाये
कि इनके पीछे
बिन्धी है उसकी जीभ
हर एक आन्त क्योंकि
वो हादसे, दुख, दर्द
सब की गोलियाँ बना
निगल जाती है
बिना दाँतों से छूआये
वो जानती है
एक कटु सत्य
कि सब सुख के साथी हैं
उसके दुख की गठरी
कोई नहीं उठायेगा
उसके जख्म कुरेदेगा
अपनी राह चला जायेगा
इस लिये वो हंसती है
खिलखिलाती है
और शहर की
खुशनसीब, खुशहाल
औरत् कहलाती है
वो नहीं जानते
एक बार समर्पण कर
किसी को दे दिये थे
अपने सब हक
उसके त्याग ने
निगल लिये थे सब सपने
और उसके फर्ज़ों ने
लील लिया था उसका वज़ूद
मगर अब तन मन
सब छलनी हो गया है
उसके पास बचा ही क्या है
पीडा टीस दर्द
और रिश्तों की
कुछ बची खुची किचरें
कहीं कोई घाव
रिसने ना लगे घाव
वो पी जाती है
इस दर्द से उपजे आँसू
और जोर से
ह्सती है मुस्कराती है
तभी तो शहर की
समझदार ,खुशनसीब
खुशहाल
औरत कहलाती है
मगर कितना महंगा पडता है
खुशनसीब कहलाना
ये सिर्फ वही जानती है


11 August, 2009

ये गज़ल मैने पंजाबी मे लिखी थी अपने गुरुजी स. बलबीर सैणी जी के आशीर्वाद से और इसे हिन्दी मे भी लिखा है। इसे अर्श जी से पास करवाया है । अर्श को धन्यवाद नहीं आशीर्वाद है कि मेरा बेटा अब मुझे राह दिखाने के कबिल हो गया है।


अपना कोई हाल नहीं
साँसों मे सुरताल नहीं

मार गयी मंहगाई जब्
रोटी है तो दाल नहींAlign Centre
बेटों ने खुद बांटा घर
माँ का हल फिलहाल नही

गीत गज़ल सब झूठे हैं
जिसमे बह* र् ख्याल नहीं

जेब भले ही खाली हो
दिल का पर कँगाल नहीं

नेतायों पे फंदे हो
काम दिखें करताल नहीं

जो नेता ना खेल सके
ऐसी कोई चाल नहीं

तेरे झूठ बना दूँ सच
बद नीयत बदहाल नहीं

बात जमीनी संसद मे
लेकिन  रोज  बवाल नहीं

निर्मल जीवन *निर्मल* है
कोई और सवाल नहीं

08 August, 2009

वक्त के पाँव -----गताँक से आगे -(कहानी)


ये रोज़ का उत्सव मै बहुत याद करती थी।
यासों से बाहर आयीजहाज एयरपोर्ट पर उतरने वाला था।उसके बाद बाहर निकलते एक घन्टा लग गया ।जैसी ही बाहर निकले सामने चाचाजी दिखाई दिये।आँखें बरस पडी----- माँ पिता जी सब याद आ गये।इतने सालों बाद भी चाचा बिलकुल वैसे ही लगे बस जरा कमजोर हो गये थे।चाचा जी के गले लग कर खूब रोई।टैक्सी ले कर घर की ओर चल पडे । कितना रास्ता चुपी मे निकल गया ---क्या पूछूँ--------

```**चाचा जी घर मे सब कैसे हैं\** मैने चुपी तोडी ।
**सब ठीक हैं बेटी तेरा इन्तज़ार कर रहे हैं।**
**शीला बुआ कैसी हैं।**
**क्या येहीं सब कुछ पूछ लेगी\खुद अपनी आँखों से देख लेना।**
**क्या आई हुई हैं ।**
**हा**
मुझे लगा चाचाजी कुछ उदास से हो गये हैं। तभी चाचा इनके साथ बातें करने लगे (कारोबार और बच्चों के बारे मे।4-5 घन्टे का सफर जैसे 4 दिन मे पूरा हुआ हो।
रास्ते मे देखती आ रही थी। इतने सालों मे जैसे भारत का नक्शा ही बदल गया था।शहर गाँव काफी विकसित हो गये थे।
**लो अपने गाँव की सडक शुरू हो गयी।** चाचाजी ने बताया।मैं हैरान ये मेरा गाँव्\ मुझे खुद पर हंसी आयी* इतने सालों बाद भी मै उस पुराने गाँव की कल्पना कर रही थी।कहते हैं वक्त के पाँव कभी रुकते नहीं। ना कभी पीछे मुडते हैं।फिर वक्त के पाँव पर खडा मेरा गाँव कैसे पीछे रह सकता है। कच्चे घरों की जगह पक्के बहु मंजिले मकान । छोटा स एक बाजार भे बन गया था कूँयें की जगह ट्यूबेल जब हम लोग यहाँ थे तो इतनी लम्बी लज्ज**रस्सी** से बालटी बान्ध कर कूयें से पानी निकाला करते थे और घडे भर कर सिर पर उठा कर घर लाते थे।मैं तो बडी उत्सुकता से देख रही थी कि कोई ताई चाची भाभी लम्बा सा घूँघट निकालेसिर पर घडा उठाये जाती मिलेगी। पर ना कोई घूँघट वली ना घडे वाली मिली।प्रिधानों मे पश्चिमी साये जरूर नज़र आये।
जिस गाँव मे साईकिल भी किसी किसी के पास होती थी ाब वहाँ गाडियाँ नज़र आ रही थी।स्कूटर मोटर साईकिल तो आम थे। तालाब की जगह पंचायत घर बन गया था।
एक चौडी सी गली मे हमारी गाडी दाखिल हुई।मै हैरान उस वेहडे के इतने दरवाजे\यहां तो एक ही दरवाज सारे घरों के लिये था जैसे किसी किले मे होता है।चाचा ने एक गेट के आगे गाडी रुकवाई।
चाचीजी और बच्चे भागे आये---- मैं तो सोच रही थी कि सारा वेहडा इकठा हुया होगा----- बचपन मे देखा था कि जब भी कोई लडकी मायके आती तो सारा बेहडा क्या गांम्व ही इकठा हो जाता था ।
आज कुछ अच्छा सा नहीं लगा------ क्या घर पक्के बन जाने से दिल भी पत्थर हो गये हैं\( चारदिवारियोँ से शर्मा कर दिल भीमास के लोथदे मे सिकुड गयी हैं\ दिल को झटका लगा----- जिस प्यार संस्कृति की गाथायें सुन कर बाहर के लोग हैरान होते थे( वह सब कहाँ खो गया\15 बीस घरों मे हमारा और शीला बुआ का बेहडा ही साँझा रह गया था।पहले गाँव सरहदों मे बँटे(ाब बेहडे दिवारों से बँट गयेऔर दिल स्वार्थ से(।
जैसे ही बेहडे मे कदम रखा सामने एक 40-- 45 साल की औरत पीठ किये कुछ कर रही थी।बराबर पहुँची तो धक से रह गयी शीला बुआ\ हाँ वो शीला बुआ थी ।बूढी लग रही थी उम्र से 10 साल आगे----- पास ही उनका भतीजा नवी खडा था----- कुछ कह नहीं पाई उसे जाने क्यों उन दिनों को याद कर आँखें भर आयी---- मैने देखा बुआ बाट पूज रही थी मै सन्न रह गयी------ मैने नवी की ओरे देखा वि भी आँसूपोँछते हुये अन्दर चला गया।मैने प्रश्नवाचक नज़रों से चाची की तरफ देखा---
** बेटी इसका पति फौज मे था भारत के लिये जासूसी करते हुये पकडा गया था अभी गौना भी नहीं हुया था।उसके बाद काफी भाग दौड की मगर कुछ नहीं हुया---ाब तो ये भी पता नहीं कि वो जिन्दा है भी या नहीं\उस सदमे से इसके दिमाग पर असर हुया है--पगला गयी है। रोज़ बाट पूजती हैफिर चुपचाप अपने काम मे लगी कुछ गुनगुनाती रहती है।चाची बता रही थी और मै रो रही थी----- मै भारी कदमों से बुआ के पास गयी और उसके कन्धे पर हाथ रखा-----
**कौन \ देखते नहीं मैं बाट पूज रही हूँ--विघ्न पड जायेगा----।
**बुआ मैं आशू!* मुश्किल से गले से आवाज़ निकली------
** आशू\ तू\ एक साल बाद आई है तू। अरे कितनी बदल गयी है----- देख तेरी पूजा वाली चूडियाँ मैने संभाल कर रखी हैं--- तूने अपने फूफा से कहा था ना कि गौना जल्दी करवा लें\** एक साँस मे बुआ इतना कुछ बोल गयी जैसे मेरा हे इन्तज़ार कर रही हो----- बुआ के इन्तज़ार मे अभी भी आशा की एक किरण थी------ जब वक्त रुकता नहीं है तो बुआ का वक कैसे रुक गया था 25 साल को वो एक साल बता रही थी------ और मैं बूआ के गले लग कर खूब रोई----- । बूआ भी उस दिन खूब रोई। चाची ने बताया कि आज पहली बार रोई है ये सब ने कोशिश कर के देख ली है।
मुझे लगा कि अगर ये बेहडे की दिवारें ना होती तो कोई कन्धा उसका सहारा बन सकता था------ बेहडे मिट्टी के ना बने होते तो ये आँगन की मिट्टी उसके आँसू सोख लेती ।
इस तरह बूआ के वक्त के पाँव थम गये थेउन जालिमों ने उनके पाँव मे बेडियाँ डाल दी थी---- सरहदों के पार बूआ के सारे अरमान दफन हो गये थे----ये सरहदें भी कितनी बेरहम होती हैं--------
भारत आने का उत्साह ठँडा पड गया था।सुना था कि भारत पाक की कुछ सीमायें खुल रही हैं।कुछ लिग एक दूसरे को मिल भी सकेंगे ( शायद कुछ कैदियों को भी छोडा जा रहा था----ाब यहाँ नहीं रहेंगे ये हम ने सोच लिया था वापिस विदेश चले जायेंगे मगर जाने से पहले एक आशा मे रोज़ अखबार देखती कि शायद हुक्मरानों के दिल पसीज जायें---- बूआ के वक्त के पाँव की बेडियाँ खुल जायें--- आशा पर ही तो इन्सान का जीवन है और बूआ का भी-------

07 August, 2009

वक्त के पाँव (कहानी )


गाँव की मिट्टी की सोंधी खुश्बू मे जाने कैसी कशिश थी कि इस बार खुद को अपने गाँव भारत आने से रोक नहीं पाई।शादी के तुरँत बाद पति के साथ विदेश चली गयी थी दो साल बाद माँ और पिताजी एक दुर्घटना मे चल बसे थे। भाई बहन कोई था नहीं।इनका भी एक ही बडा भाई था। माँ बाप के बिना घर घर ही नहीं लगता ।जब भी कभी अवसर आता कि घर जायेँ - मैं घबरा जाती।कैसे देख पाऊँगी उस घर को\ बीस पच्चीस वर्ष से हम भारत नहीं आये थे।एक चाचा थे बस पहले उन से चिठी पत्री अब जब से टेलीफोन उनके लगा है तब से टेलीफोन पर ही कभी कभार बात हो जाती है। दस दिन बाद चाचा जी के बेटे की शादी है । उन्हों ने बहुत ताकीद की थी कि हम लोग जरूर आयें।वे बीमार भी रहते हैं।बस एक बार मुझे जरूर देखना मिलना चाहते हैं।अब बच्चे सेटल हो गये( मरा मन भी विदेश मे नहीं लगता था।हम लोग सोच रहे थे कि भारत जा कर ही बस जायें।
जहाज से भी तेज मन दौड रहा था।बचपन की यादें खेत ( खलिहान पास लगती] शिवालिक की पहाडियाँ(सत्लुज दरिया पर बना मंदिर] गुरदवारा( दरिया के किनारे वैसाखी का मेला( वो गाँव की रामलीला ( दशहरे पर निकलती सुन्दर भव्य झाँकियाँ( बचपन की सखियाँ] संगी- साथी( बेरी] आम] अमरूद के पेड(जहाँ एक दूसरे की पीठ पर खडे हो कर आम] अमरूद तोडते(गन्ने के खेतों से गन्ने चूपते(खेत मे लगे बेलन से गन्ने का रस पीते ] गरम गरम भट्टी से निकलता गुड खाते( । क्या बचपन था उडती फिरती तितली जैसा।अज के बच्चे तो उस बचपन की कल्पना भी नहीं कर सकते। तनाव मुक्त( स्वच्छ्न्द बचपन ।
फिर वो तालाब क्या वैसा ही होगा\ जहाँ हम घडे पर तैर कर उस पार निकल जाते।वो मेमणा जिसके पीछे भागते पर पकड ना पाते( वो मक्की के बडे बडे झुन्ड जिन के पीछेछुपा छुपी खेलते(वो सफेद गाय जिसके थन से दूध की धार दादी सीधे हमरे मुह मे डालती(और वो शीला बूआ और उनका भतीजा मनु हमारी पलटन का रिंग लीडार और उस आँगन मे तारों की छाँव मे( गरमी के दिनो मे बिछी 50 - 60 चारपाईयाँ( बारी बारी सब कथा कहानियाँ चुटकुले सुनाते एक दूसरे को छेडते( बातों का दौर चलता और लगता ही नहीं था कि ये सब अलग अलग परिवार हैं।
सब का एक साँझा आँगन और उसके आसपास सब घर। कुछ घर कच्चे होते थे ।सारे आँगन के लिये एक ही ढियोडी*दरवाजा* होता था। उस दरवाजे के अंदर के सभी दुख सुख साँझे होते थे।उस आँगन को बेहडा कहते थे हर बेहडे का अपना अपना नाम था।
पंजाब के चिभाजन के बाद हमारा गाँव रायपुर हिमाचल मे आ गया।जो ऊन्ना जिले मे पडता था।इस गांवँ का बचपन पंजाबी( और जवानी पहाडी है इस लिये रिती रिवाज़ भी मिले जुले हैं।इन बेहडों का प्यार पंजाबियों की दरिया दिली और पहाडों की सादगी और सुसंस्कृति की पहचान थी।
बेहडे की याद आते ही शीला बुआ की शादी की याद आ गयी।बुआ बहुत सुन्दर थी। लडका भी अच्छी घर से और सुन्दर था।बूआ को गहनों से लाद दिया था ससुराल वलों ने।उस जमाने मे लडका लडकी देखने का आम रिवाज़ नहीं था।माँ बाप (घर जमीन (और लडके की नौकरी या धन्धा देखा जाता था।
जैसे ही बुआ की बारात आयी थी( बुआ ने मुझे घूँघट निकाल कर अपनी जगह बिठा दिया था और अन्दर से कुन्डी लगाने की ताकीद कर खुद घूँघट मे और शाल मे चूडा कलीरे लपेट कर छत पर चढ गयी। दुल्हा देखने की बेचैनी वो रोक ना पाई। सभी बारात की अगवाई मे लगे थे ।किसी ने बुआ को नहीं देखा। जैसे ही बुआ ने दुल्हे को देखा खुशी से दिवानी सी हो गयी। और भाग कर नीचे आते ही मुझ से लिपट गयी
**अशू तुम्हारे फूफा बहुत सुन्दर हैं।बिलकुल राजकुमार्! हाँ देखो तुम उन्हें फूफा नहीं कहना( जीजा जी कहना और उनके कान मे मेरी तरफ से कहना कि जल्दी गौना करवा कर मुझे ले जायें । मैं इन्तज़ार करूँगी।**
तब रिवाज़ था कि गौना शादी के कुछ माह बाद ही होता था।उस समय का इन्तज़ार लडकियाँ एक उत्सव के रूप मे करती। नई नई शादी शुदा लडकियाँ जिन का गौना नहीं हुया होता वो अपने पति के जल्दी आने के लिये एक पूजा करती जिसे *बाट -पूजना* कहा जाता था \बाट कअर्थ है रास्ता ।
सुबह नहा धो कर सभी लडकियाँ अच्छे से तैयार हो कर बेहडे मे इकठी हो जाती।फिर गाय के गोबर से जमीन तीन छोटी छौटी गोलाकार जगह लीपती]धूप टिक्का[ चावल मौली से पूजा कर आटे के दिये मे दीप जलाती। पूजा के बाद कन्या पूजन मे सब लडकियों को सजाती चूडियां पहनाती नेल पोलिश मेहँदी लगाती। इस तरह ये पूरे बेहडे का उत्सव बन जाता। अगले दिन उस जगह से आगे फिर उसी क्रम मे पूजा करतीं।ये माना जाता था कि पूजा करते करते जब वो डियोडी तक पहुँच जायेंगी तो उनके पति उन्हें लेने जरूर आ जायेंगे। अगर तब तक गौना नहीं होता तो दोबारा फिर वहीं से शुरू कर देतीं कि शायद पूजा मे कोई विघ्न पड गया होगा।उस उत्सव को मै बहुत याद करती थी। बूआ से वैसी भी मेरा लगाव अधिक था इस लिये उसे मिलने को उतावली हो रही थी।---------------------------------------------क्रमश।

06 August, 2009

एक और पंजाबी गज़ल स. बल्बीर सैणी जी की [हिन्दी अनुवाद के साथ ।
अनुवाद गज़ल के रूप मे नहीं है ।


मै तां जीवी जाणा अपणी हिम्मत अपणे जेरे नाल
वरना इस दुनिया ने यारो की नहीं कीता मेरे नाल

[अर्थात-- मै तो जीए जाऊँगा अपनी हिम्मत और जोर के साथ
वरना इस दुनिया ने यारो क्या नहीं किया मेरे साथ}

इस ने दिल दा खून है पीता इस ने लुटिया मन दा चैन
हैरत है दिल रहिन्दा लोचे ताँ वी उसे लुटेरे नाल

[अर्थात-- इस ने दिल का खून है पीया इस ने लूटा मन का चैन
हैरत है दिल रहने को तडपे फिर भी उस लुटेरे के साथ]

मै जाणिया सी तेरे पिछों कल्ला रह जावाँगा पर
हँजू हौके चीसाँ पीडाँ किना कुझ सी मेरे नाल

[अर्थात-- मैने जाना था तेरे पीछे सेअकेला मैं रह जाऊँगा पर
आँसू आहें टीसें पीडा कितना कुछ था मेरे पास]

किने सालाँ तो बेशक तूँ आया नहीं बनेरे ते
फिर वी मेरी नीझ है लगी पौडी वाँग बनेरे ते

[अर्थात--कई सालों से बेशक तू आया नहीं बनेरे पर [बनेरे मतलव मँडेर]
फिर भी मेरी नजर है लगी सीढी की तरह बनेरे से]

की सची तूँ भुल गिया एँ या तैनू ने याद उवें
आये दिन जो सौ सौ वादे कीते सी तू मेरे नाल

[क्या सच तू भूल गया है? या तुझे है याद उसी तरह
आये दिन सौ सौ वादे किये थे जो मेरे साथ ]

इस दुनिया नू जे चाहो ताँ दूर सगों इह भजदी है
लेकिन जे इस नू दुतकारो लिपटे होर वधेरे नाल

[ अर्थात इस दुनिय को गर चाहो तो दूर बल्कि ये भागती है
लेकिन गर इस को दुतकारो लिपटे और बहुत ही साथ ]

तेरे नाल जे तुरदै जे कोई उस दा कोई मतलव है
मतलव नाल इह दुनिया सैणी तेरे नाल ना मेरे नाल

[अर्थात तेरे साथ अगर चलता है तो उसका कोई मतलव है
मतलव साथ ये सारी दुनिया सैणी तेरे साथ ना मेरे साथ्]

अनुवाद ---- निर्मला कपिला


03 August, 2009

गज़ल ------एक और सफर पर

पिछले दिनों मुझे द्विजेन्द्र "द्विज"जी ने अपनी पुस्तक गज़ल संग्रह `जन गण मन ` भेजी और उस पर अपनी प्रतिक्रिया करने को कहा । मै कई दिन बहुत तनाव मे रही कि मुझे तो गज़ल की ABC भी नहीं पता तो इतने बडे शायर की इतनी लाजवाब पुस्तक के बारे मे कैसे क्या कहूँ।अंत मे मैने उन से क्षमा प्रार्थना की कि इस पर कुछ भी कहना मेरे सामर्थ्य से बाहर है।इसके बाद एक बहुत बडे गज़लकार की गज़lल पर टिप्पणी दी और जो शेर मुझे बहुत अच्छा लगा उस पर लाजवाब लिख दिया फिर उनका मुझे ई मेल आया कि चलो अपको एक शेर तो पसंद आया धन्यवाद ।तब मुझे महसूस हुय कि अब मुझे गज़ल सीख लेनी चाहिये।
उसके बाद जब मैने अपने शहर के कवि सम्मेलन मे जाना शुरू किया तो कई बार सोचा कि गज़ल सीखूँ स. बलबीर सौणी जी की गज़लों से इतना प्रभावित हुई कि उनसे गज़ल सीखने का निर्णय लिया ।कल ही उन्हें गुरू जी के रूप मे माना और उन से पंजाबी गज़ल सीखनी शुरू कर दी। स. सैणी जी की लगभग 13 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं जिनमे अधिक गज़ल संग्रह हैं। हरियाणा अकेडमी दुआरा भी उनकी पुस्तक का प्रकाशन हुआ है और सम्मानित हुये हैं जालन्धर दूर दर्शन पर भी उनकी गज़लों का प्रसारण होता रहता है ।उनके पहले सबक मे एक पंजाबी गज़ल लिखी मगर उसे अभी पोस्ट नहीं कर सकती क्यों कि अभी पंजाबी मे टाईप करने मे अस्मर्थ हूँ उस सबक से एक हिन्दी गज़ल लिखने की कोशिश की है। उन्हीं के आशीर्वाद से उसे आपके सामने प्रस्तुत करूँगी।
। पहली कोशिशै है इस लिये आप सब का सहयोग चाहूँगी और गुरू जी का आशीर्वाद। वैसे तो वो मुझे गुरू जी नहीं कहने देना चाहते उनका कहना है कि तुम अपने शहर की बेटी हो और मेरी छोटी बहन की तरह हो इस लिये मुझे गुरू जी ना कहो । मगर बडे भाई भी गुरू समान होते हैं इस लिये उन्हें गुरू जी ही कहूंगी।हाँ अर्श का भी धन्यवाद करना चाहूँगी क्यों कि जहाँ मैं अटक गयी थी वहाँ उसने मेरी सहायता की। अभी भी उसकी तसल्ली नहीं थी इस गज़ल पर मगर पहले प्रयास पर कुछ तो रियायत होनी ही चाहिये ।मै यहाँ`` द्विजेन्द्र द्विज`` जी का भी धन्यवाद करना चाहूँगी कि उन की पुस्तक की वजह से मुझे गज़ल सीखने का ख्याल आया।
बह`र
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तेरे सपनों मे आऊँ तो कैसे
तुझ को मै पास बुलाऊँ तो कैसे

यूँ रूठा है वो रूठे हैं अरमाँ
कोई भी जश्न मनाऊँ तो कैसे

दीदार -ए-हसरत तो अपनी भी थी
चाँद न हो ईद मनाऊँ तो कैसे

तेरे आँसू ले लूँ तकदीर नहीं
अपने भी अश्क छुपाऊँ तो कैसे

लोग यकीं माने यूं अफसानो पर
अपना सच भी बतलाऊँ तो कैसे

किसने कैसे कब तोडा है हमको
मैं जख्मे दिल दिखलाऊँ तो कैसे

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