वीर बहुटी--- कहानी
पहले तो आप सब से क्षमा चाहती हूँ कि 5-6 दिन से कम्प्यूटर खराब रहने की वजह से आप सब के ब्लोग्स पर नहीं आ पाई।अज एक कहानी ले कर उपस्थित हूँ।ये मेरी सब से पहली कहानी है जो कि वीरबहुटी कहानी संग्रह मे छप छुकी है
पंजाबी और हिन्दी की कई पत्र पत्रिकाओं मे भी प्रकाशित हो चुकी है
वीर बहुटी
वो मेरे साथ सट कर बैठी,धीरे धीरे मेरे हाथों को सहला रही थी।कभी हाथों की मेहँदी कोदेखती कभी चूडियों पर हाथ फेरती, और कभी घूँघट उठा कर मेरे कानों के झुमके नथ और टिक्का देखती।मैं घूँघट से अपल्क उसे निहार रही थी।उम्र मे 25--26 वर्ष की लगती थी।शायद पेट से भी थी।रंग गोरा,चेहरा गोल,गुलाब की पँखडिउओं जैसे लाल पतले होँठ और उसकी बडी बडी आंखों की मासूमियत उसकी खूब सूरती मे चार चाँद लगा रही थी।मगर इस मासूमियत मे भी मुझे लगा कि इन आंखों मे और बहुत कुछ है, कुछ अविश्वास ,कुछ सूनापन जाने क्या क्या जिसे मैं समझ नहीं पा रही थी। मेरी डोली ससुराल आये अभी दो तीन घन्टे ही हुये थे।मुझे पता नहीं था कि वो मेरी क्या लगती, है मेरा उससे क्या् रिश्ता है मगर वो मुझ से ऐसी व्यवहार कर रही थी जैसे मेरी और उसकी पुरानी जान पहचान है।पता नहीं क्यों, अबोध बालिका जैसा उसका प्यार मुझे अंदर तक प्रभावित कर रहा था।एक अनजान घर,अनजान लोग,ऎसे मे उसका प्यार मुझे साँत्वना दे रहा था, सहला रहा था ,------जैसे कह रही हो-----* मैं हूँ ना,क्यों घबराती हो?* मै कुछ आश्वस्त सी हुई। चलो कोई तो इस घर मे अपना हुआ।
*उस पगली को नई बहू के पास क्यों बिठा रखा है? पता नहीं क्या अनाप शनाप बक रही होगी?* बाहर से किसी पुरुष की आवाज़ आयी।
*बेटा तुम ही बुलाओ उसे,इतना काम पडा है, मेरा कहा कब मानती है?* ये किसी औरत की आवाज़ थी। शायद मेरी सासू जे की थी
वो जल्दी से उठ कर भागी, *ओह्! तुम्हें देख कर मै तो सब कुछ भूल गयी।*
मैं सोच मे पड गयी कि ये औरत कौन है? मुझे उस आदमी का उसे इस तरह कहना अच्छा नहीं लगा। पगली तो वो किसी तरह भी नहीं लगती थी----मासूम जरूर थी। आवाज़ सुनते ही कैसे भाग गयी फिर कहना कैसे नहीं मानती? घर मे काफी महमान आये थे---सब खाना खा रहे थे। और वो भाग भाग कर सब के खिलाने लगी किसी को पाने किसी को सब्जी तो किसी को चपाती पूछती और हंस हंस कर बातें भी कर रही थी।उसकी आवाज़ मे एक खुशी ,एक उमंग थी।
जेब सभी खाना खा चुके तो वो मेरे लिये भी एक थाली मे खाना ले आयी।मेरी निगाहें इन्हें ढूँढ रही थीं कि शायद इकठै खाना खायें गे। वैसे भी जब से यहाँ आयी थी उसके बाद इन्हें देखा ही नहीं था।ाइसा भी क्या काम? ---- शायद उसने मेरी निगाहों को पढ लिया था। वो हंसी---- पता नेहीं उसकी हंसी मे क्या था कि मन सहम सा गया---
*किसे ढूँढ रही हो ?ये तलाश तो सारी उम्र ही करती रहोगी!---चलो अब खाना खाओ--गाँव मे पति पत्नि साथ बैठ कर कहाँ खा पाते हैं---- दुल्हा दुल्हन तो बिलकुल नहीं । यहाँ ऐसे ही रिवाज़ है ।अज मैं तुम्हें अपने हाथ से खाना खिलाऊँगी।* मेरे ना ना करते भी उसने जल्दी से मेरे मुँह मे एक कौर डाल दिया। जाने क्यों मेरी आँख नम हो गयी।
*देखो मैं आज तक ऐसे एक कौर के लिये तरस रही हूँ।यहाँ कोई किसी को नहीं पूछता--ना कहता है कि खाना खा लो। खुद खा लिया तो खा लिया वर्ना भूखे सो जाओ।शिष्टाचार, भावनाये जानने का समय गाँव के लोगों के पास कम ही होता है। हाँ मै हूँ तो तुम्हारी जेठानी पर बहिन बन कर रहना चाहूँगी--- क्या इस पगली को बहिन बनायोगी?*
*दीदी,कैसी बात करती हैं आप?मुझे अनजान जगह मे एक बहिन मिल गयी और क्या चाहिये?* और हम दोनो ने इकठे खाना खाया।ापने हाथ से खिलाते हुये उसकी आँखो मे तृप्ति का एहसास--मेरे मन मे आशा के एक किरण जगा गया।
अब मुझे पता चल गया था कि वो मेरी जेठानी है।मैने सुना था कि उसे पागलपन के दौरे पडते हैं।ाब तो उसे पागल कह कर ही बुलाया जाता था।इलाज अब भी चल रहा था। सब तरह के पागलों का एक ही इलाज होता है दिमाग को गोलियाँ खिला खिला कर सुलाने का! किसी की उमँगों को किसी गोली से कहाँ सुलाया जा सकता है? गोली संवेदनायो को कैसी सुला सकती है बस पल भर के लिये जब नीन्द आती है तब तक----
मगर मुझे उसमे ऐसा कुछ नहीं लगा कि वो पागल है।मुझे लगा कि उसके अंदर कहीं गहरे मे कोई वेदना है कोई पीडा है, असुरक्षा और असमर्थता की भावना है। जो साथ पाते ही बाहर आना चाहती है।
*वर्षा {जेठानी का नाम} तो किसी से बात कम ही करती है।उदास, गुमसुम् सी रहती है उसे बोलते हुये कम ही सुना है।मगर आज तुम से खूब बतिया रही है। शायद पहली बार इसके चेहरे पर खुशी देखी है।*
पास बैठी औरत मुझे बता रही थी
अब मै जान गयी थी कि दीदी बहुत भावुक और संवेदनशील हैं। भावबायों को ना जाने कितने गहरे तक छुपाती रही हैं।ये भी सुना था कि जेठ जी बहुत गरम मिजाज और रूखे स्व्भाव के हैं।अखिर क्यों होती हैं ऐसी बेमेल शादियाँ! ग्रह और नक्षत्र मिलान किस काम का? क्यों उपर वाला उपर बैठा ये खेल खेल रहा है। औरत को अबला क्यों बनाया उसने? खुद ही उसकी इतनी बडी परीक्षा लेता है---- शायद भगवान भी पुरुष् है जो अपने मन बहलाने के लिये ही ऐसा करता है।-----
खाने के बाद सब बातें करते करते सोने लगे मैं जहाँ बैठी थी वहीं मेरा बिस्तर लगा दिया गया।पास मे ही 4-5 बिस्तर और थे जिन पर कुछ औरतें सो रही थीं। दीदी आईँ और
मेरी साथ बिस्तर पर बैठ गयी।मैं हैरान थी कि क्या मेरा बिस्तर यहीं लगेगा?क्या मेरा कमरा यहीं होगा? और मेरा नज़रें इन्हें ढूँढ रही थीं।
*बहू अब सो जाओ सुबह चार बजे उठना पडेगा।यहाँ शौचादि के लिये भी खेतों मे जाना पडता है। मैं तुम्हें ले जाऊँगी।-------क्रमश
