16 August, 2015

 ब्लाग की दुनिया
 
बहुत सन्नाटा है
बडी खामोशी है
कहां गये वो चहचहाते मंजए
कहां गये वो साथी
जो आवाज दे कर
पुकारते थे कि आओ
सच मे मेरी रूह
अब अपने ही शहर मे
आते हुये कांपती है
क्यों की उसे कदमों की लडखडाहत नही
दिल और कदमों की मजबूती चाहिये
उजडते हुई बस्ती को बसाने के लिये
नया जोश और कुछ वक्त चाहिये 
तो आओ करें एक कोशिश
फिर से इस रूह के शहर को बसाने की
ब्लाग की दुनिया को
 हसी खुशी से
फिर उसी मुकाम पर पहुंचाने की


2 comments:

रचना दीक्षित said...

बिना रूह का शहर भी बेगाना सा ही है.

सुंदर प्रस्तुति.

shikha varshney said...

एकला चलो रे ...धीरे धीरे कारवां बन ही जायेगा फिर से.

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