20 February, 2010

कविता पँखनुचा

कविता--- पंखनुचा

उसके अहं में छिपा विष
उसकी मैं में,
तू की अवहेलना,
शोषण की बुभुक्शा,
कामुक्ता कि लिप्सा,
अभिमान की पिपासा,
कर देती है आहत
तर्पिणी का अनुराग,
सहनशीलता,सहिश्णुता,त्याग
पंखनुचा की आहों से
सिसकता है
घर की दिवारों का
हर कण
क्योंकी
उन दिवारों ने
घुटते देखा है
उस आम औरत को
उस नाम की अर्धांगिनी को
जिसकी पहचान होती है
"बेवकूफ, गंवार औरत,
तुझे अकल कब आयेगी "
हाँ सच है,
उसे अभी अकल नही आयी
और सदियों से सहेजे खडी है
इस घर की चारदिवारी को
पर
जब कभी
अतुष्टी का भावोद्रेक
अत्याचार की अतिमा
हर लेगी
उसकी सहनशीलता
जगा देगी उस के
स्वाभिमान को
तो वो मीरा की तरह
इस विष को
अमृ्त नहीं बना पायेगी
सतयुग की सीता की तरह
धरती मे नहीं समायेगी
ये कलयुग है
क्या नहीं सुन रहा
दंडपाशक का अनुनाद
तडिताका निनाद
बनादेगी तुझे निरंश,पंगल
कर देगी सृ्ष्टी का विनाश
उस प्रलय से पहले
सहेज ले
घर की दिवारों को
अपना उसे
अर्धनारीश्वर की तरह
समझ उसे अर्धांगिनी

44 comments:

RaniVishal said...

Bahut hi sundar shabdo me sundar tarike se khub abivyakt kiya aapne strijaati ke dard ko ...Aabhar!
http://kavyamanjusha.blogspot.com/

देवेश प्रताप said...

बहेतरीन प्रस्तुति ....नारी कि व्यथा व्यक्त करती हुई ये ....खूबसूरत रचना .

Mithilesh dubey said...

बहुत खूब माँ जी , क्या कहूं , आज तो शब्द ही नहीं मिल रहें कुछ कहने को, बस लाजवाब ।

Suman said...

nice

ताऊ रामपुरिया said...

बहुत लाजवाब. शुभकामनाएं.

रामराम.

विनोद कुमार पांडेय said...

आज के समाज के दोहरे मापदंड के बीच से निकलती एक नारी की गाथा..बहुत बढ़िया भाव पिरोया है आपने और शब्द तो इतने बेहतरीन है की क्या कहने ...कुल मिलकर कविता लाज़वाब....प्रस्तुति के लिए बहुत बहुत धन्यवाद माता जी..

seema gupta said...

बेहद सुन्दर प्रस्तुती.....
regards

Kulwant Happy said...

सत्य वचन।

पी.सी.गोदियाल said...

Badhiyaa kavitaa Nirmalaji

आशुतोष दुबे 'सादिक' said...

bahut sundar rachna.
हिन्दीकुंज

Apanatva said...

bahut sunder sandesh detee rachana .
Badhai

संध्या आर्य said...

behad sundar bhaw .........badhaai

खुशदीप सहगल said...

नारी है इस देश की राष्ट्रपति.
क्या चंपा का घर में बंद अपमान हो गया है,
क्या आदमी वाकाई इनसान हो गया है...

जय हिंद...

महफूज़ अली said...

मम्मा....बहुत ही बेहतरीन प्रस्तुति..... बहुत अच्छी लगी यह कविता...

वन्दना said...

gazab ki prastuti.............kya kahun ..........nishabd hun.

डॉ टी एस दराल said...

नारी के भूत और भविष्य पर बढ़िया टिपण्णी करती रचना , निर्मला जी।
निसंदेह नारी अब जाग्रत हो रही है।

दीपक 'मशाल' said...

Nari tum kewal shraddha ho.. vishwas rajat pag tal me

राज भाटिय़ा said...

आज की कविता तो बहुत "नाईस" है जी, बहुत सुंदर.
धन्यवाद

sada said...

बहुत ही सुन्‍दर प्रस्‍तुति, आभार ।

सुरेन्द्र "मुल्हिद" said...

truely awesome.

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति है!

डॉ. मनोज मिश्र said...

सुन्‍दर प्रस्‍तुति..

प्रकाश पाखी said...

आदरणीय निर्मला दी,
अभी अभी आपकी सौंवी पोस्ट के लिंक को पढ़ आया हूँ...आपने आपनी ब्लॉग यात्रा कैसे आरम्भ की और अब कहाँ पहुँच गयी...आश्चर्य होता है..आपकी यह कविता मन में उथल पुथल मचा देती है...आप गजल में भी कमाल कर रही है..वाकई शक्ति की तरह से अपार उर्जा से ओत प्रोत है आप...बधाई!

दिगम्बर नासवा said...

स्पष्ट चेतावनी .. बहुत सार्थक लिखा है ... नारी का सम्मान सच में बहुत ज़रूरी है ... समय पर जागना बहुत ज़रूरी है अगर घर और अपने आने वाले कल की चिंता करनी है तो ...

Udan Tashtari said...

सटीक बात..सुन्दर अभिव्यक्ति!

भारतीय नागरिक - Indian Citizen said...

दुख तो यही है कि नवदुर्गा में जिसे पूजते हैं, बाकी दिनों उसी पर जुल्म ढ़ाते हैं.

sangeeta swarup said...

मन को झिंझोड़ने वाली रचना.... एक चेतावनी देती हुई...बहुत अच्छी लगी

कंचन सिंह चौहान said...

akath mohakata hai in panktiyo me

योगेश स्वप्न said...

ये कलयुग है
क्या नहीं सुन रहा
दंडपाशक का अनुनाद
तडिताका निनाद
बनादेगी तुझे निरंश,पंगल
कर देगी सृ्ष्टी का विनाश
उस प्रलय से पहले
सहेज ले
घर की दिवारों को
अपना उसे
अर्धनारीश्वर की तरह
समझ उसे अर्धांगिनी

bahut sunder abhivyakti, behatareen.

pragya pandey said...

आपने बहुत ही सुंदर लिखा है
अपना उसे
अर्धनारीश्वर की तरह
समझ उसे अर्धांगिनी

"अर्श" said...

कुछ भी कहना बहुत मुश्किल है , मगर ना कहना पाप...
एक शे'र
माँ मेरी जब से आगई घर में
पास मेरे गलतियां नहीं आती


आपका
अर्श

पं.डी.के.शर्मा"वत्स" said...

बहुत बढिया कविता!
आपने इस कविता में शब्दों का चयन बहुत खूब किया है!!!

मनोज कुमार said...

कविता इतनी मार्मिक है कि सीधे दिल तक उतर आती है।

M VERMA said...

नारी की वेदनाओं की पराकाष्ठा का परिणाम क्या होगा बखूबी भावपूर्ण और ओजपूर्ण ढंग से आपकी रचना में दिखलाई दे रहा है.
सुन्दर और सार्थक रचना

वाणी गीत said...

चारदीवारी में कैद नारी की व्यथा को खूब व्यक्त कर दिया है आपने ....
मुझे अपनी एक कविता याद आ रही है ...
स्त्रियाँ आज भी होती है सीता सी ..
महल के भोगविलास त्याग कर
वन गमन को तत्पर
मगर अब नहीं देती हैं
वे कोई अगिन परीक्षा
अब नहीं सजाती हैं
वे स्वयं अपनी चिता ...

Babli said...

बहुत सुन्दर और भावपूर्ण रचना! बधाई!

रचना दीक्षित said...

वाकई एक बेहतरीन प्रस्तुती, क्या शब्द, क्या शब्द संयोजन, भाव और उसकी अभिव्यक्ति सब बेमिसाल

हिमांशु । Himanshu said...

बेहतरीन शब्दों से सजी खूबसूरत कविता । आभार ।

KAVITA RAWAT said...

Naari man ke antardwand ki vyatha ko bahut gahre shabd sanyojan se prastut kiya hai aapne...
Bahut shubhkamnayne...

वन्दना अवस्थी दुबे said...

सुन्दर, अतिसुन्दर.

M.A.Sharma "सेहर" said...

Aap nari vyatha ko bahad bareekee se uker detin hain !!naman

श्रद्धा जैन said...

bahut adbhut kavita hai Nirmla di

naari ka sammaan bahut zaruri hai
ek ek shabad .........
meera ki tarah amrut nahi kar paayegi
kya kahun nishabd hun

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

सत्य वचन!

रंजना said...

वाह....इसे केवल सुन्दर गीत नहीं कह सकती...यह तो सोचने को विवश करती प्रेरनादायी सत्य का सुन्दर उद्घाटन है....

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