18 November, 2009

अस्तित्व

कागज़ का एक टुकडा क्या इतना स़क्षम हो सकता है कि एक पल में किसी के जीवन भर की आस्था को खत्म कर दे1मेरे सामने पडे कागज़् की काली पगडँडियों से उठता धुआँ सा मेरे वजूद को अपने अन्धकार मे समेटे जा रहा था1 क्या नन्द ऐसा भी कर सकते हैं? मुझ से पूछे बिना अपनी वसीयत कर दी1 सब कुछ दो बडे बेटों के नाम कर दिया 1 अपने लिये मुझे रंज ना था, मैं जमीन जायदाद क्या करूँगी 1मेरी जायदाद तो नन्द,उनका प्यार और विश्वास था 1मगर उन्होंने तो मेरी ममता का ही बंटवारा कर दिया 1 उनके मन मे तीसरे बेटे के लिये लाख नाराज़गी सही पर एक बार माँ की ममता से तो पूछते1--काश मेरे जीते जी ये परदा ही रहता मेरे बाद चाहे कुछ भी करते1---बुरा हो उस पल का जब इनकी अलमारी में मैं राशन कार्ड ढुढने लगी थी1तभी मेरी नजर इनकी अलमारी मे रखी एक फाईल पर पडी1उत्सुकता वश कवर पलटा तो देखते ही जैसे आसमान से गिरी1 अगर मैं उनकी अर्धांगिनी थी तो जमीन जायदाद में मेरा भी बराबर हक था1 मन क्षोभ और पीडा से भर गया इस लिये नहीं कि मुझे कुछ नहीं दिया बल्कि इस लिये कि उन्होंने मुझे केवल घर चलाने वली एक औरत ही समझा अपनी अर्धांगिनी नहीं। यही तो इस समाज की विडंबना रही है1 तभी आज औरत आत्मनिर्भर बनने के लिये छटपटा रही है। मुझे आज उन बेटों पर आश्रित कर दिया जो मुझ पर 10 रुपये खर्च करने के लिये भी अपनी पत्नियौ क मुँह ताका करते हैं
भारी मन से उठी,ेअपने कमरे मे जा कर लेट गयी1 आज ये कमरा भी मुझे अपना नहीं लग रहा था1कमरे की दिवारें मुझे अपने उपर हंसती प्रतीत हो रही थी1छत पर लगे पंखे कि तरह दिमाग घूमने लगा1 30 वर्श पीछे लौत जाती हूं
"कमला,रमा के लिये एक लडका देखा है1 लडके के माँ-बाप नहीं हैं1मामा ने पाला पोसा है1जे.ई. के पद पर लग है1माँ-बाप की बनी कोठी है कुछ जमीन भी है1कोई ऐब नहीं है1लडका देख लो अगर पसंद हो तो बात पक्की कर लेते हैं"1 पिता जी कितने उत्साहित थे1
माँ को भी रिश्ता पसंद आगया 1मेरी और नंद की शादी धूम धाम से हो गयी1 हम दोनो बहुत खुश थे1
"रमा तुम्हें पा कर मैं धन्य हो गया मुझे तुम जैसी सुशील लड्की मिली है1तुमने मेरे अकांगी जीवन को खुशियों से भर दिया1" नंद अक्सर कहते1 खुशियों का ये दौर चलता रहा1 हम मे कभी लडाई झगडा नही हुआ1सभी लोग हमारे प्यार औरेक दूसरे पर ऐतबार की प्रशंसा करते1
देखते देखते तीन बेटे हो गये1 फिर नंद उनकी पढाई और मै घर के काम काज मे व्यस्त हो गये1
नंद को दफ्तर का काम भी बहुत रहता था बडे दोनो बेटों को वो खुद ही पढाते थे लेकिन सब से छोटे बेटे के लिये उन्हें समय नही मिलता था छोटा वैसे भी शरारती था ,लाड प्यार मे कोइ उसे कुछ कहता भी नहीं था ।स्कूल मे भी उसकी शरारतों की शिकायत आती रहती थी1उसके लिये ट्यूशन रखी थी,मगर आज कल ट्यूशन भी नाम की है1 कभी कभी नंद जब उसे पढाने बैठते तो देखते कि वो बहुत पीछे चल रहा है उसका ध्यान भी शरारतों मे लग जाता तो नंद को गुसा आ जाता और उसकी पिटाई हो जाती1 धीरे धीरे नंद का स्व्भाव भी चिड्चिदा सा हो गया। जब उसे पढाते तो और भी गुस्सा आता हर दम उसे कोसना उनका रोज़ का काम हो गया।
दोनो बदे भाई पढाई मे तेज थे क्यों कि उन्हें पहले से ही नंद खुद पढाते थे1 दोनो बडे डाक्टर् बन गये मगर छोटा मकैनिकल का डिपलोमा ही कर पाया1 वो घूमने फिरने का शौकीन तो था ही, खर्चीला भी बहुत था नंद अक्सर उससे नाराज ही रहते1कई कई दिन उससे बात भी नहीं करते थे। मैं कई बार समझाती कि पाँचो उंगलियाँ बराबर नही होती1 जवान बच्चों को हरदम कोसना ठीक नहीं तो मुझे झट से कह देते "ये तुम्हारे लाड प्यार का नतीजा है1" मुझे दुख होता कि जो अच्छा हो गया वो इनका जो बुरा हो गया वो मेर? औरत का काम तो किसी गिनती मे नहीं आता1इस तरह छोटे के कारण हम दोनो मे कई बार तकरार हो जाती1
दोनो बडे बेटों की शादी अच्छे घरों मे डाक्टर् लडकियों से हो गयी1नंद बडे गर्व से सब के सामने उन दोनो की प्रशंसा करते मगर साथ ही छोटे को भी कोस देते1धीरे धीरे दोनो में दूरि बढ गयी1 जब छोटे के विवाह की बारी आयी तो उसने अपनी पसंद की लडकी से शादी करने की जिद की मगर नंद सोचते थे कि उसका विवाह किसी बडे घर मे हो ताकि पहले समधियों मे और बिरादरी मे नाक ऊँची् रहे। छोटा जिस लडकी से शादी करना चाहता था उसका बाप नहीं था तीन बहिन भाईयों को मां ने बडी मुश्किल से अपने पाँव पर खडा किया था।जब नंद नहीं माने तो उसने कोर्ट मैरिज कर ली1 इससे खफा हो कर नंद ने उसे घर से निकल जाने का हुकम सुना दिया1
अब नंद पहले जैसे भावुक इन्सान नही थे1 वो अब अपनी प्रतिष्ठा के प्रती सचेत हो गये थे। प्यार व्यार उनके लिये कोई मायने नहीं रखता था 1छोटा उसी दिन घर छोड कर चला गया वो कभी कभी अपनी पत्नी के साथ मुझे मिलने आ जाता था1 नंद तो उन्हें बुलाते ही नहीं थे1 उन्हें मेरा भी उन से मिलना गवारा नहि था /मगर माँ की ममता बेटे की अमीरी गरीबी नही देखती ,बेटा बुरा भी हो तो भी उसे नहीं छोड सकती।
कहते हैँ बच्चे जीवन की वो कडी है जो माँ बाप को बान्धे रखती है पर यहाँ तो सब उल्टा हो गया था।हमारे जिस प्यार की लोग मसाल देते थे वो बिखर गया था मैं भी रिश्तों मे बंट गयी थी आज इस वसीयत ने मेरा अस्तित्व ही समाप्त कर दिया था---
"मालकिन खाना खा लो" नौकर की आवाज से मेरी तंद्रा टूटीऔर अतीत से बाहर आई\ क्रमश:

20 comments:

पी.सी.गोदियाल said...

जरुरत संजो के रखने की होती है निर्मला जी ! कहानी के माध्यम से सुन्दर सन्देश ! माँ-बाप के लिए पांचो उंगलिया बराबर होनी चाहिए, लेकिन अफ़सोस की इस कलयुग में काफी हद तक ऐसा नहीं है !

Mithilesh dubey said...

बात तो आपकी बिल्कुल सही है कि माँ अपने बेटे को हमेशा प्यार करती है, वह चाहे बुरा हो या भला । लेकिन माँ जी मुझे एक बात जो हमेशा तंग करती है वह यह कि आखिर कैसे, कोई चन्द दिनों के प्यार के लिए उस माँ बाप को भुला देता है । वही माँ बाप जिन्होनें दिंन रात मेहनत करके उसे पढ़ाया और लायक बनाया, वही माँ जिसने अपने पेट में नौ महिनें तक उसे रखा, क्या इससे बड़ा कोई प्यार हो सकता है ? क्या कोई इससे बड़ा भी प्यार हो सकता है ? क्या कोई ऐसा प्यार भी है जिस पर माँ और बाप के प्यार को दाव पर लगाया जा सकता है। मुझे तो नहीं लगता कि माँ और बाप से बढ़कर दुनियाँ मे किसी का प्यार होता है। लेकिन तब पर भी सब माँ और बाप के सपनो को तोड़कर आगे निकल लेते है, बहुत दुःख होता है जब ऐसी घटनायें सुनता हूँ, ।

खुशदीप सहगल said...

निर्मला जी,
भारत में ये देखा जाता है कि किसी घर में एक बच्चे को इतना डामिनेंट कर दिया जाता है कि बाकी सभी का डवलपमेंट प्रभावित हो जाता है...हर बात पर उसी की तारीफ की जाती है....ऐसे में वो लाडला बच्चा खुद को दूसरों से श्रेष्ठ मानने लगता है...दूसरे बच्चे या तो कुढ़ते रहते हैं या फिर बागी बन जाते हैं...ये नज़रिया आगे चलकर परिवार के टूटने का सबब बन जाता है....आपने बड़े मर्म के साथ इस समस्या को उकेरा है....

(आपकी पिछली पोस्ट पर भी आज ही कमेंट कर पाया हूं...)

जय हिंद...

दिगम्बर नासवा said...

BAHUT MAARMI LIHA HAI .... AAPKI RACHNA BAHUT SE PARIVAARON SE MEL KHAATI HAI ... AKSAR PITA KA KISI EK KE PRATI JHUKAAV HO JAANA BAHUT HI SAHAJ HOTA HAI .... AUR MAA KO MAJBOORAN PITA KE FAINSLE KO MANNA PADHTA HAI ...

EK MA KI PEEDA KO BAAKHOOBI UTAARA HAI AAPNE APNI KAHAANI MEIN ....

sada said...

बहुत ही भावपूर्ण लगी आपकी यह पोस्‍ट, सच कहा आपने मां की ममता को किसी चीज से वास्‍ता नहीं होता, वह तो ममता के आगे बेबस हो जाती है,बहुत-बहुत आभार ।

रंजना [रंजू भाटिया] said...

माँ की ममता ऐसी ही होती है ..बहुत भावपूर्ण लफ़्ज़ों में लिखा है आपने ..

नीरज गोस्वामी said...

मार्मिक लेकिन सत्य से पर्दा उठती ये कहानी बहुत अच्छी लगी...प्रवाह पूर्ण शैली और अद्भुत भाव समेटना आपकी कहानी की विशेषताएं हैं...लिखती रहें...
नीरज

वन्दना said...

bahut hi marmik chitran kiya hai us vyatha ka jo jyadatar ya shayad har ghar ki hai..........dil ko chhoo gayi kahani.........badhayi.

rashmi ravija said...

बहुत ही मर्मस्पर्शी है ये कहानी....आपने एक अनछुए पहलु को बखूबी उभरा है.....पिता अनजाने में ही अक्सर ऐसी गलतियाँ कर बैठते हैं...और परिणाम भयंकर होते हैं...या तो उस बच्चे का व्यक्तित्व बिलकुल दब जाता है या फिर वह विद्रोही हो जाता है...नारी के मन की किसने कब समझी है??....मन को झकझोर गयी ये कहानी.

क्रिएटिव मंच said...

बहुत ही भावपूर्ण और मर्मस्पर्शी कहानी
बहुत अच्छी लगी

बहुत-बहुत आभार

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क्रियेटिव मंच

पं.डी.के.शर्मा"वत्स" said...

बेहद ह्र्दयस्पर्शी रचना....जिसकी जितनी तारीफ की जाए, कम है ।
माँ से बडा इस जग में कुछ भी नहीं....

Nirmla Kapila said...

ये कहानी अभी शुरू हुई है मैं पहले इस मे- क्रमश-लिखना भूल गयी थी। आपसब का धन्यवाद इसे सराहने के लिये। अगली कडियाँ भी जरूर देखें

MANOJ KUMAR said...

रचना मर्मस्पर्शी है। यथार्थबोध के साथ कलात्मक जागरूकता भी स्पष्ट है।

Dipak 'Mashal' said...

Kahani ko reshmi(sukh), sooti(dukh) taane se ek sath mila ke bunne me aapka koi saani nahin Maasi...
agli kadi ke intezaar me...
Jai Hind...

डॉ टी एस दराल said...

समय को देखते हुए बहुत सार्थक कहानी, निर्मालाजी.
माँ बाप को बच्चों मे भेद भाव नही करना चाहिए.

अनिल कान्त : said...

achchha sandesh deti rachna

अल्पना वर्मा said...

aap bahut achcha likhti hain..

aur to sach mein behad bhaavpurn likha hai.
agli kadi ki prateeksha rahegi..

राज भाटिय़ा said...

आप की यह कहानी बहुत मर्म स्पर्सी लगी, नंद ने बहुत गलती की,आगली कडी का इतजार है--
वेसे हमारे के रिशते मै उन के दो बच्चे थे, बाप का प्यार लडकी मै ज्यदा था, बेटा डा० था, लेकिन बाप ने उसे अपनी हराम की कमाई ज्यादाद मै से कुछ भी नही दिया, ओर उसे घर से निकाल दिया..... जब बाप मरा तो बेटे ने भी आने से मना कर दिया, तो चिता बेटी ने दी, जब की ्बेटा उसी शहर मै रहताथा.

वाणी गीत said...

मार्मिक कहानी ...
माँ अपने बच्चों में भेद नहीं करती ...मुझे लगता है ज़माने की बदलाहट का असर माँ की ममता पर भी होता है ...घर में कमाने वाले और कुंवारे बच्चों की क़द्र ज्यादा होती है ...
किसी घर में एक बच्चे को इतना डामिनेंट कर दिया जाता है कि बाकी सभी का डवलपमेंट प्रभावित हो जाता है....खुशदीप जी के इस कथन से पूरा इत्तिफाक रखती हूँ ...!!

मनोज गौतम said...

आपकी कहानियों में गज़ब का ठहराव होता है जो पाठक को बाधे रहता है

और आपकी गजलें भी कुछ बातें करती हैं । मैं समयाभाव के चलते ब्लॉग

पर नहीं आ पा रहा हंूं आज जैसे ही थोड़ा सा समय मिला मैं ब्लाग पर

आया । मैं इस समय अपने संग्रहालय में कुछ नया करने के प्रयास में लगा

हूं जो अन्तिम दौर में है ।

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