05 September, 2009

संवेदनाओं के झरोखे से--संस्मरण गताँक से आगे

उस दिन हम मौसम का आनन्द लेते हुये लेडी डाक्टर से गीत सुन रहे थे।अचानक बडे जोर से हवा चलनी शुरू हो गयी। देखते देखते बदे तूफान का रूप धारण कर गयी सब ओर अन्धेरा छा गया हम सब कमरे मे बन्द हो गए। इतना भयंकर तूफान पहली बार देखा था। अब याद नहीं कि कितनी देर इसका ताँडव चला मगर जैसे ही क्छ थमा हम लोग एमर्जेन्सी मे आ गये। पता था कि इस से बहुत बडी तबाही हुयी होगी। हम लोग एमर्जेन्सी मे सामान तैयार करने लगे । 10 मिनट भी नहीं बीते थे तूफान थमे हुये, कि घायल लोग आने शुरू हो गये। एक घन्टे मे एमर्जेन्सी के अंदर बाहर भीड ही भीड जमा हो गयी आसपास के हिमाचल और पंजाब के गाँव इसी अस्पताल पर निर्भर थे। जो मरीज सब से अधिग गन्भीर हालत मे थे पहले उन सब को अंदर रखा गया सारे स्टाफ को डय़ूटी पर बुला लिया गया। ैतना चीख चिहाडा था कि एक दूसरे की बात सुनना भी मुश्किल था। देखते देखते उन घायलों मे 10 --12 मरीज़ अपना दम तोड चुके थे। बाकी गम्भीर चोटों से चीख रहे थे कुल मिला कर वो दृष्य किसी भी इन्सान को हिला देने के लिये काफी था।

उस समय हमे ये होश नही रही कि हमारे घरों का बच्चों का क्या हुया होगा। मैं तो जैसे जड हो गयी थी मगर उस समय ना जाने कहाँ से इतना साहस आ गया कि झट से हम मरीज़ों को संभालने लगे। उस दिन पहली बार मैने घावों पर टाँके लगाये वो भी पूरे 30। मुझे जरा भी डर नहीं लगा । हाथ कपडे सारा दिन खून से लथपथ रहे 100 से उपर मरीज़ों को राहत दी गयी थी। जो निस्सँदेह स्टाफ की मेहनत के कारण ही हुया था । और मैं खुद को उस दिन धन्य समझ रही थी कि आज मुझ मे सेवा भाव जगा था और उस दिन सोच लिया था कि अब ये नौकरी कभी नहीं छोडूँगी। नहीं तो मैं सोचा करती कि मैं ये काम नहीं कर सकूँगी। मरीज़ के सूई चुभेगी तो दर्द मेरे होगा। उस दिन मैने जाना कि हमारी संवेदनायें मरती नहीं बल्कि दूसरों को राहत पहुँचाने मे हमे शक्ति देती हैं।

हमारे भी घर का बहुत नुक्सान हुया था ।सभी स्टाफ कर्मचारियों के कुछ ना कुछ हुया ही था मगर उन्हें समय नहीं था कि अपने घरों की सुध ले सकते।देखने वाले को जरूर लगता है कि ये लोग पत्थर दिल हैं। और दीदी की वो बात धीरे धीरे वाली याद आ गयी। किसी को देख कर ही संवेदन हीन कह देना कितना आसान होता है। मैं भी तो पहले दीदी को ऐसे ही समझती थी। उस तूफान मे क्या क्या हुया ये बहुत बडी कहानी हो जायेगी। इस लिये इसे यहीं विराम देती हूँ मगर ये बता दूँ कि उस दिन सारा दिन हम लोगों ने कुछ भी खाया पीया नहीं । सुबह आठ बजे से रात के आठ बज गये थे मगर अभी पोस्टमार्टम भी सब का नहीं हुया था लगता था कि आज शायद सारी रात यहीं लगेगी। सारा शहर इन मरीज़ों की सहायता के लिये इकठा हो गया था । मुझे तो अब चक्कर आने लगा था । इतना काम कभी किया ही नहीं था । अब भूख भी बहुत जोरों से लगी थी। हम लोगों ने चाय मगवाई और सुबह के जो समोसे मंगवाये थे वही खाने लगे। बाहर अभी भी 5 लाशें पडी थीं। उस दिन फिर मुझे अपनी वो बात याद हो आयी।जब मैं दीदी को पोस्टमार्टम से आते ही चाय पीते देखा था कि दीदी आप ऐसे कैसे चाय पी लेती हो । मुझे समझ आया कि जिसे मैं संवेदन्हीनता समझ रही थी वो मजबूरी थी ,समय की माँग थी। कितना आसान होता है दूसरों की संवेदनहीनता को चिन्हित करना समझ तभी आती जब खुद उनमे से गुज़रना पडता है।---

फिर भी लोगों मे गुस्सा था कि सब को पूरी सहायता नहीं मिली जब कि सारा स्टाफ अपने घर की परवाह किये बिना काम कर रहा था। अगले दिन अस्पताल के खिलाफ नारे भी लगे। मैं ये नहीं कहती कि अस्पताल मे लापरवाही नहीं होती मगर हर बार उन्हें ही दोशी ठहरा देना सही नहीं है। आप लोगों से भी यही प्रार्थना है कि जब भी आपको ऐसा लगे तो नारेबाजी करने से पहले तथ्य जरूर देख लें कहींिस तरह आरोप लगा कर आप कर्मनिष्ठ कर्मचारियों के साथ अन्याय तो नहीं कर रहे और फिर कई बार क्षुब्ध हो कर कर्मचारी काम के प्रति उदासीन होने लगते हैं।

कुछ दिनो मे ही मुझे महसूस होने लगा कि मैं पहले से भी अधिक संवेदनशील हो गयी हूँ । काम से जब भी समय मिलता किसी ना किसी मरीज के दुख दर्द जरूर सुनती। मेरी ये कहानियां उसी संवेदना की देन है। अभी भी बहुत से पात्र मेरे दिल मे हैं जिन्हें लिखना है। कुल मिला कर कहूँ कि जितनी मुश्किल मेरी ज़िन्दगी रही थी मायके ससुराल मे जवान मौतों के कारण जिम्मेदारियां बढी थी उनका मुकावला शायद मैं इन्हीं संवेदनाओं के कारण कर सकी। ये मरीज़ मेरे दुख सुख के साथी रहे। और मेरे पिताजी मेरे पथप्रदर्श क जिन्होंने कभी मेरे साहस को ढ्हने ना दिया।इसी लिये मेरी सारी रचनायें संवेदनाओं और जीवन के बारे मे ही होती हैं। बस यही है मेरे पास। और भी बहुत से संस्मरण ऐसे हैं जिनसे मैने बहुत कुछ सीखा है फिर कभी कहूँगी।

समाप्त ।

24 comments:

ताऊ रामपुरिया said...

बहुत संवेदनशील कहानी रही. आपकी अन्य कहानियों का भी इंतजार रहेगा.

रामराम.

AlbelaKhatri.com said...

भाव विभोर कर दिया आपने............
बहा दिया आपने...........
आपको
आपके जज़्बे को नमन !

अनिल कान्त : said...

आपके संस्मरण से और आपके लिखे हुए से काफी सीखने को मिलता है....आप यूँ ही अपनी जिंदगी के पन्ने खोलती रहे

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

संवेदना के विकास की यह कथा अविस्मरणीय है और हिन्दी कथा के इतिहास में दर्ज करने लायक है।

mehek said...

har bhag padha,socha tippani aakhari bhag par hi karenge,ab tak aapke saare alekhon mein ye saare sawedanawala sara aalekh dil tak utar gaya,lajawab,behtarin.

aur haan hame ye baat bahut achhi lagi ,koi tho hospital ki staff ke aur se bola.varna roz naa jane kitne log ilzam hi laga dete hai. hum ghanto ghanto bina khaye piye kabhi kabhi 10 se upar operatiion emergency mein kiye jaate hai, karte rehte hai,uski kisine tho dakhal li.
sach hai sawedna aur badh jaati hai.

Mithilesh dubey said...

बहुत संवेदनशील कहानी रही.......दिल को छु गयी आपकी ये रचना, भाव विभोर कर दिया आपने....

Pankaj Mishra said...

बहुत संवेदनशील कहानी.
अन्य कहानियों का भी इंतजार

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

"संवेदनाओं के झरोखे से"
यथा नाम, तथा गुण।
बहुत मर्मस्पर्शी संस्मरण रहा।
बधाई!

sada said...

इतने संवेदित संस्‍मरण आपके व्‍यक्तिगत अनुभवों की सीख और उनको शब्‍दों में पिरोना बहुत ही भावपूर्ण क्षण होता है जब यह रचनायें जन्‍म लेती हैं,और हमें अवसर देती हैं ऐसे पलों का हम उन्‍हें पढ़ पायें, बहुत-बहुत आभार आपको एवं आपकी लेखनी को ।

राज भाटिय़ा said...

निर्मला जी आप की यह कहानी जीवन का एक सच दरशाति है, ओर उन लोगो को जो किसी काम को करने से डरते है उन मै हिम्मत का संचार करती है, बहुत अच्छा लगा.
धन्यवाद

ओम आर्य said...

बेहद सम्वेदनशील रचना........संस्मरण हमे बहुत कुछ सिखा गई ......सम्वेदनाये अवश्य ही हमे कमजोर नही बल्कि समय आने पर मजबूत भी करती है ..........बहुत ही खुब .....आपाइसे ही अपनी यात्राओ की संसार से रुबरु करवाते रहे ....बहुत बहुत आभार

दिगम्बर नासवा said...

निर्मला जी ........... बहुत ही संवेदनशील हैं आपके संस्मरण .......... ये बात सच है की दुःख, पीडा इंसान को और दुःख सहने की शक्ति देती है .... संवेदना अक्सर दुगनी शक्ति से कार्य करने की प्रेरणा देती है ........ और ऐसे में कार्य की सफलता ह्रदय को और प्रेरित करती है ........ जीवन जीना, दूसरों के दुक्खों को समझना भी तो बस संवेदनशील मन के हो बस की बात है .....

kshama said...

एक संस्मरण (इस मालिका में से ) पढ़ना बाकी है ..लेकिन comment पहले दे रही हूँ ..मुग्ध होके पढ़ रही थी ..कहीं हम दोनोका जीवन समांतर लगा ....आप उम्र में बड़ी हैं , फिरभी ....इसलिए शायद इस मलिका ने मोह लिया ..

दर्पण साह "दर्शन" said...

behtarin kahani(sansmaran ya dastaveez)

poori kahani padhne ke baad hi chain aaya.
aapse ke din kaha tha ki aapki kahani ka ek bhaag sabse bura lagta hai...

...kramsh !! is baar samapt dekh ke tassali hui.
:)

नीरज गोस्वामी said...

अति सुन्दर रचना...
नीरज

विनय ‘नज़र’ said...

संवेदनशील

अर्शिया said...

संवदेनाओं की इंतेहा।
{ Treasurer-S, T }

vikram7 said...

संवेदनशील,मर्मस्पर्शी संस्मरण

Pt.डी.के.शर्मा"वत्स" said...

निर्मला जी, आपका ये संस्मरण आपकी संवेदनशीलता का बाखूबी परिचय दे रहा है!!
बहुत ही बढिया!!

शरद कोकास said...

आपकी सम्वेदना के धरातल को छूने की कोशिश कर रहे हैं - शरद कोकास

Mrs. Asha Joglekar said...

सही कहा आपने । इतने सारे मरीज़ और लगातार सेवा मे लगे हुए डॉक्टर नर्सेज़ और परिचारिकाएं इमर्जेन्सी में तो किसी भगवान से कम नही होते ।

कुलवंत हैप्पी said...

आपकी ये पोस्ट जहां एक तरफ मन को झिंझोड़ती है, वहीं दूसरी तरफ समाज सेवा का जज्बा भी पैदा करती है।

hem pandey said...

इस समापन किश्त को पढ़ कर पूरी किश्तें पढ़ने को मजबूर होना पड़ा.आपके पिताजी ने ठीक कहा- कुछ पेशे आजीविका के साथ सेवा का भी अवसर देते हैं. इनमें स्वास्थ्य और शिक्षा से सम्बंधित पेशे भी हैं.

Sudhir (सुधीर) said...

कुछ दिनों की छुट्टियाँ लेकर घूमने गया हुआ था... आपका संस्मरण आज ही पूरा पढ़ा....आपका अति संवेदनशीलता के सहजता (संवेदना शुन्य या हीन तो कह ही नहीं सकता ) तक का सफ़र हमारी संवेदनाओ को छू गया ....सिक्के का दूसरा पहलु समझ पाना कई बार मुश्किल होता हैं पर आपके लेख ने हमे उससे भी अवगत कराया ....

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