31 August, 2009

जीवन के कुछ संस्मरण ---- संवेदनाओं के झरोखे से

जैसे ही बरामदे मे कदम रखा लोगों की भीड देख कर डर गयी एमेरजेंसी रूम तक आते आते पता चला कि एक परिवार की गाडी दुर्घटना ग्रस्त होने से घर के तीन सदस्यों की मृत्यु हो गयी है और तीन लो ग बुरी तरह घायल हैं दो को कुछ कम चोट लगी है । मन दुखी हो गया। रूम मे तीन लाशें पडी थी घायलों को वार्ड मे शिफ्ट किया जा रहा था। सामने ही दूसरे कमरे मे से मेरी सीनियर जिसे मैं दीदी कहती थी उन्होंने मुझे देखा तो आवाज़ दी।
"जी दीदी " मेरी आवाज़ जैसे गले मे अटक रही थी। कभी ऐसा दृश्य देखा ही नहीं था । अभी अस्पताल मे मेरी नौकरी का ये तीसरा ही दिन था।

" मुन्नी,ऎसा करो वार्ड अटेँडेन्ट से कहो कि मरीज़ शिफ्ट करवा के इन शवों को बाहर रखवा दे और 4 कप चाय के ले आये। हाँ साथ मे कुछ खाने के लिये भी।" और डाक्टर ने भी उनकी हाँ मे हँ मिलाई। मैं नयी और उम्र मे उनसे बहुत छोटी थी इस लिये वो प्यार से मुझे मुन्नी कहने लगी थी यूँ भे मैं बहुत पतली दुबली थी और उम्र से छोटी लगती थी उनके बुलाने से अस्पताल के सभी लोग मुझे मुन्नी के नाम से ही बुलाने लगे थे मुझे अच्छा भी लगता था। आज 37 साल बाद भी { आज तक भी शहर मे अधिक लोग मुझे मुन्नी के नाम से जानते हैं किसी की मुन्नी दीदी किसी की मुन्नी आँटी , आगे उनके बच्चों की मुन्नी नानी बन गयी हूँ।} हाँ तो मैं बात कररही थी उस दिन की-----

मैं उनकी बात सुन कर सन्न रह गयी ऐसे मे दीदी यहां बैठ कर चाय कैसे पीयेंगी उनका मन कैसे कर रहा है चाय पीने के लिये \ वो मेरी सोच से बेखबर अपने रजिस्टर पर नज़रें गडाये काम कर रही थी डक्टर साहिब उनके मेडिकल रिपोर्ट तैयार कर रहे थे। वार्ड अटेण्डेण्ट अपना काम करने लगा और मैं बाहर जा कर बरामदे मे खडी हो गयी

वार्ड अटेन्डेंट ने चाय ला कर कप मे डाली और सब के सामने रख दी भीड वार्ड की ओर चली गयी मगर शवों के पास बरामदे मे अभी भी कई लोग खडे थे। एक औरत और एक लडकी बहुत जोरों से रो रही थी। मैं भी उन्हें चुप करवाने की बेकार कोशिश करने लगी और मेरे आँसू रुकने का नाम नहीं ले रहे थे।उस औरत का पति और जवान बेटा मारे गये थे साथ मे डराईवर मारा गया। ऐसा दृश्य देख कर कौन ना रो उठेगा। तभी अन्दर से दीदी की आवाज़ आयी । अंदर आयी तो चाय आ चुकी थी। "लो चाय पीओ" दीदी ने बिना नज़र उठाये कहा।
"दीदी मैं नहीं पीऊँगी।''दीदी ने नज़र उठा कर मुझे देखा---- ''अरे तुम रो रही हो ? अब ये तो रोज़ का काम रहेगा कब तक रोती रहिगी?न चलो चाय पीओ।
"अभी नयी है ना इसलिये अपने आप कुछ दिनो मे आदी हो जायेगी।" डाक्टर साहिब धीरे से मुस्कराये।
ये लोग इतने संवेदन हीन कैसे हो सकते हैं बाह्र तीन लाशें पडी हैं लोग रो रहे हैं और ये लोग मज़े से चाय पी रहे हैं। मन क्षुब्ध सा हो गया
'देखो मुन्नी हम लोग दस बजे से एक टाँग पर खडे हैं सुबह 8 बजे का एक कप चाय का पीया है उसके बाद समय ही नहीं मिला आब तो टाँगे भी काँप रही हैं अगर ये चाय ना पी तो घर तक भी नहीं पहुँचा जायेगा। फिर ये तो रोज़ का काम है ।हम भी अगर इसी तरह रोते रहे तो काम कौन करेगा \पता है जो जख्मी हैं उनकी हालत कैसी थी बहुत कोशिश के बाद उन्हें स्टबल कर पाये फिर खुद डाक्टर साहिब की तबीयत भी ठीक नहीं। चलो चाय पीओ देखना तुम भी एक दिन ऐसी ही हो जाओगी सी ? " खैर मैने चाय दूसरे कमरे मे जा कर वाशबेसिन मे फेंक दी।
मैं सोचने लगी कि सच मे आदमी इतना संवेदन्हीन हो सकता है? कुछ भी हो मैं ऐसी नहीं हो सकती।

बचपन खुशियों से भरा था। दुख क्या होता है जाना ही नहीं था तभी तो कहीं आस पडोस मे जरा सी दुख की बात हो, किसी को जरा सा दुख हो जाये तो आँसू थमने का नाम नहीं लेते थे। दिल पसीज उठता था।
जब अस्पताल मे मेरी नयी नयी नौकरी लगी तो बहुत खुश थी। मैने जिद करके मैडिकल मे दाखिला लिया था । एम बी बी एस मे तो दाखिला नहीं मिला मगर फार्मेसी मे दाखिला ले कर सोचा था कि इसके बाद बी फार्मेसी कर लूँगी। खैर हमेशा इन्सान के चाहने से क्या होता है । डिप्लोमा करते ही 2 माह मे नौकरी मिल गयी और घर वालों को शादी की चिन्ता थी इसलिये आगे ना पढ सकी। घर पर बी ए की तयारी करने लगी।

इस नौकरी को भी मैं अपने लिये वरदान समझती थी। पिता जी कहा करते थे कि वो लोग भाग्यवान होते हैं जिन्हें आजीविका कमाने के साथ साथ लोगों की सेवा करने का अवसर मिलता है। और मैं ये अवसर खोना नहीं चाहती थी इस लिये नौकरी join कर ली। नयी नयी नौकरी थी। बहुत खुश थी। मगर दो तीन दिन मे ही लगने लगा कि ये सफर इतना आसान नहीं है जितना मैने सोचा था।ास्पताल मे तो सब दुखी ही आते हैं । मैं उनके दुख देख कर द्रवित हो जाती और कई बार रोने लगती। अभी पहला दिन ही था मुझे इस अस्पताल मे आये कि एमरजेँसी विभाग मे एक मरीज़ की मौत हो गयी।उम्र कोई 40 वर्श के आस पास होगी।------ क्रमश:
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29 comments:

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

संवेदनहीनता यदि मानवीय हो तो उसे किसे तकलीफ होगी? वह काम करने के लिए जरूरी भी है। हाँ, इस के कारण दूसरों की संवेदनाओँ को चीन्हना छोड़ दे तो वह सही नहीं है।

विनोद कुमार पांडेय said...

मनुष्य चाहे जितना भी मजबूत हो जीवन मे कुछ दृश्य ऐसे आ ही जाते है जहाँ उसकी भावनाएँ प्रबल हो जाती है.

बढ़िया संस्मरण...

ताऊ रामपुरिया said...

बहुत लाजवाब लिखा आपने. शुभकामनाएं.

रामराम.

mehek said...

bahut sahi kaha,wo log bahut bhagyawan hote hai, jinko aajivika ke saath ,jansewa ka mauka mile..padh ke aisa laga jaise hum aapbiti hi padh rahe ho.aapke jaisa hi mehsus kiya tha hamne jab junior rahe.khair ab aadat ho gayi.aur sach kahen mann waqt ke saweganahin ho bhi gaya hai.aage intazaar rahega.

sada said...

बहुत ही अच्‍छा लिखा है आपने, मन को छूते शब्‍दों के साथ व्‍यक्‍त यह संस्‍मरण, आभार्

संगीता पुरी said...

घरेलू और पारिवारिक जीवन जीने में किसी प्रकार की घटना के प्रति हम जितने संवेदनशील होते हैं .. उतनी संवेदनशीलता प्रोफेशनल जीवन में उन मुद्दों के प्रति नहीं रहती .. यानि प्रतिदिन इस तरह के दृश्‍य देखने से हमारी प्रतिक्रिया कुछ कम तो अवश्‍य हो जाती है .. पर समाप्‍त नहीं होती .. बहुत सुंदर संस्‍मरण लिखा है आपने .. अगली कडी का इंतजार रहेगा !!

रंजना [रंजू भाटिया] said...

दिल को छु गया आपका लिखा यह संस्मरण ...बेहतरीन प्रस्तुती

सुरेन्द्र "मुल्हिद" said...

once again a very nice composition....
great work....

महफूज़ अली said...

bahut hi maarmik....... aur samvedna se bhara hua........

Pankaj Mishra said...

बहूत खूब लिखा है आपने

pankaj

विनय ‘नज़र’ said...

यादों को नया आयाम दिया है आपने
--->
गुलाबी कोंपलें · चाँद, बादल और शाम

आदित्य आफ़ताब "इश्क़" said...

मैं आपकी चर्चा और संस्मरण में शामिल हो गया हूँ क्रमशः ......................और हां मैं ही नहीं मेरी चेतना और संवेदना भी ........

AlbelaKhatri.com said...

बहुत उम्दा
बहुत उत्कृष्ट आलेख
बधाई !

परमजीत बाली said...

बहुत बढिया संस्मरण है।दिल को छु गया।बधाई\

ओम आर्य said...

एक बेहद शानदार और जानदार संस्मरण ......आपकी लेखनी का जादू हमेशा ही से सर चढकर बोलता है .....बधाई

अनिल कान्त : said...

इंसान को अपनी आजीविका के द्वारा सामजिक कार्य करने को भी मिले तो थोडा सुकून भी रहता है...ये मैंने भी महसूस किया है

Science Bloggers Association said...

Man bhaaree ho gaya.
-Zakir Ali ‘Rajnish’
{ Secretary-TSALIIM & SBAI }

Harkirat Haqeer said...

संस्मरण लिखना कोई आसान काम नहीं और आपने इसे बखूबी कर दिखाया है ....और लाजवाब लिखा है आपने ...अगले ansh के इन्तजार में ......!!

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

बहुत मार्मिक कथा है।
बधाई!

शरद कोकास said...

इन दिनों जब संवेदना गुम है मनुष्यता की पहचान कराने वाला यह संस्मरण सुकून देता है ।

vikram7 said...

आप का संस्‍मरण मन को छू गया,बधाई

Pt.डी.के.शर्मा"वत्स" said...

बहुत ही भावनात्मक संस्मरण प्रस्तुत किया आपने!!
बिल्कुल दिल को छू लेने वाला शब्द संयोजन।
धन्यवाद्!!

Mumukshh Ki Rachanain said...

मन को छूने वाला संस्‍मरण,
आभार.

अगली कडी का इंतजार............

चन्द्र मोहन गुप्त
जयपुर

Mithilesh dubey said...

क्या कहूँ निर्मला जी , मुझे पता नही कि आप कैसे लिख लेती हैं ये सब लाजवाब। निर्मला जी आपके लेख मे जो मैने इक खास चिज देखी वह यह कि आपके लेख को कोई बीच मे नही छोङ सकता, आपके लेख मे बाँधने की शक्ति लाजवाब है,।

राज भाटिय़ा said...

दिल को छु गया आपका लिखा यह लेख...

दर्पण साह "दर्शन" said...

@ dinesh dwivedi ji:
Samvedanhinta manivya kaise ho sakti hai....

,,,aapse jaana zarror chahoonga.

shayad aapne "manviya" ko normal sense main liya hai"psistive" sense main nahi...
...tab theek hai.


@maa ji....
ek din aapne chatting karte wqut likha tha ki aap kahani likhte wqut apne ko charita bana ke likhti hain....

....yahi baat kahani main aapke nai jaan daal deit hai.
aur yo\un lagta hai mano aap kahani keh nahi ji rahi hoon...

"Munni bhi aapke dwara ji liye"

Climax ka intzaar....

Pranam.

Mrs. Asha Joglekar said...

Doctor aur nurses ko to ye drushy roj hee dekhane padte hain aiseme khana peena chod den to kam kaisekaren par han shawon ko bahar le jane tak intjar kiya jana chhiye. aage ki kahanee ka intjar hai,

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` said...

बेहद संवेदनापूर्ण लेखन है ...
आगे भे लिखियेगा
- लावण्या

Sudhir (सुधीर) said...

मार्मिक और दिलचस्प...अगली कड़ी की प्रतीक्षा रहेगी

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