25 July, 2009

शब्दजाल -------कहानी
------- गताँक से आगे

बैंगलोर आये हुये मुझे 4--5 दिन हो गये थे । पहुँच कर इन्हें फोन कर दिया था । कि ठीक ठाक पहुँच गयी हूँ------- उसके बाद चार पाँच दिन से कोई बात नहीं हुई।मन मे चिन्ता भी थी कि पता नहीं कैसे खाते पीते होंगे----- अकेले कैसे रहते होंगे------ सोचा आज फोन करती हूँ । फोन मिलाया--
*हेलो !* फोन उठाते ही इनकी आवाज़ आई
*हेलो ! कौन\ कृष्णा ! कैसी हो तुम । *
*मैं ठीक हूँ आप कैसे हैं----- खाना वगैहरा कैसे चल रहा है \* मन मे था कि अभी कहंगे कि तुम्हारे बिना कुछ अच्छा नहीं चल रहा।
*बहुत बढिया चल रहा है--- काम वाली है ना वो बना देती है ।*
*चलो फिर ठीक है ।*-------- सुनते ही मुझे पता नहीं एक दम क्या हुया मैने फोन ही रख दिया क्या इत्ना भी नहीं कह सकते थे कि तुम्हारे बिन अच्छा नहीं लग रहा-----दिल नहीं लग रहा---कभी दूर भी नहीं रहे थे----- फिर भी जनाब मजे मे हैं----- मन फिर उलझ गया इतने सालों बाद पहली बार घर से बाहर आयी हूँ---- इन्हें काम करने की आदत भी नहीं ह। एक् चाय का कप तो कभी बनाया नहीं फिर घर के और कितने काम होते हैं--।कैसे चलते होंगे। मुझे घर मे अपना वज़ूद ही नगण्य सा लगने लगा ।क्या मैने सारी उम्र घर को बनाते संवारते य़ूँ ही गवा। दी घर तो मेरे बिना भी बढिया चल रहा है ।क्या एक नौकरानी से काम नहीं चल सकता था । बस इस शब्द जाल मे ऐसा उलझी कि पता नहीं सोचें कहाँ कहाँ अपने को तलाश करने लगीं।
जितने दिन बैंगलौर रही मन उदास ही रहा-।सोचने लगी थी कि इन्हें शायद अब मेरी जरूरत ही नहीं है~ तो मैं क्यों घर जा रही हूँ।फिर भी बेटी के पास कब तक रहती। जाना ही था ।इन्हें फोन कर दिया था कि 9 बजे दिल्ली पहुँच कर बस लूँगी----और चार बजे तक घर पहुँच जाऊँगी
चार बजे बस से उतर कर आटो लिया और घर पहुँच गयी। मगर ये क्या ! घर मे ताला \ आज पता था कि चार बजे मैं आ रही हूँ तो भी चले गये । बस आधा घन्टा पहले पहुँच गयी थी । मन ही मन कुढते हुये पर्स मे से दूसरी चाबी निकाली क्यों की दोनो नौकरी मे थे तो दो चाबियाँ रखनी ही पडती थीं ।दरवाज़ा खोला सामान अन्दर पटक कर मै पँखे के नीचे लेट गयी । प्यास भी बहुत लगी थी मगर पानी भी नहीं पीया----बस एक ही बात मन पर हावी होने लगी कि इन्हें मेरी पर्वाह नहीं है । चंचल मन जिन्दगी भर की अच्छाईँयां भूल कर कुछ शब्दों के हेर फेर को ले कर उलझ गया था ।
पाँच मिन्ट बाद ही ये आ गये और आते ही रसोई मे घुस गये ।
यह क्या \ ना दुआ ना सलाम ---- हाल चाल भी नहीं पूछा और रसोई मे घुस गये जैसे रसोई इन के बिना उदास हो गयी हो। मेरी आँखें भर आयी ये आँसू तो हमेशा औरत की पलकों पर ही बैठे रहते हैं बस मौका देखते ही छलक आते हैं -----
*लो कृष्णा जूस पीयो ---मैने सोचा तुम इतनी गर्मी मे आओगी और बस के सफर मे तुम्हें वोमिट भी आती है मुँह का स्वाद भी खराब हो जाता है इस लिये मैं ताज़ा जूस लेने चला गया । रास्ते मे सकूटर खराब हो गया उसे मकेनिक के पास छोड कर पैदल ही भागा आया।* एक ही साँस मे कह रहे थे-----
*कैसी हो तुम्\*
आँखों मे आये आँसू बह गये---- मैं ठीक हूँ आप कैसे हैं। गुस्सा कुछ ठँडा हुया और मैने जूस का गिलास ले कर पी लिया ।
*आप तो पीछे से मज़े मे थे ना ! * दिल की बात ज़ुबान पर आ ही गयी------ ।
*अरे क्या खाक ठीक था\ तुम्हारे बिना घर घर ही नहीं लगता था-। इतने दिन ना ढंग से खाया ना पीय़ा । इस घर की खुशियाँ तो तुमसे ही हैं।*
ये क्या\ क्या उस दिन फोन पर ये सब नहीं कह सकते थे । बस इनकी यही बात मुझे अच्छी नहीं लगती थी--।शब्दों का मायाजाल देखिये इतने दिनों का गुस्सा परेशानी सब एक मिन्ट मे गायब----- अब अपने पर गुस्सा आने लगा---क्या मैं नहीं जानती थी कि ये मुझे कहें या ना कहें मगर मुझ से प्यार करते हैं। फिर क्यों पड जाती हूँ इस चक्कर मे। और इन्हें तो शब्दों का ये हेरफेर बिलकुल भी नहीं आता---मगर मेरे दिल की बात बिना कहे समझ लेते हैं---- और अब मैं क्या चाहती हूँ ये जान गये थे-----आपेक्षित शब्दों की फुहार तन मन भिगो गयी थी । वाह री पत्नि !
---------समाप्त्

24 comments:

दर्पण साह "दर्शन" said...

इन्हें तो शब्दों का ये हेरफेर बिलकुल भी नहीं आता---मगर मेरे दिल की बात बिना कहे समझ लेते हैं---- और अब मैं क्या चाहती हूँ ये जान गये थे-----आपेक्षित शब्दों की फुहार तन मन भिगो गयी थी ।

.....ACCHA PATAPEKSH . HAMESHA KI TARAH.....

विवेक सिंह said...

वाह शब्दों का मायाजाल !

मनोज गौतम said...

चाचा जी ने कुछ इस तरह अपनी भावनाओं को व्यक्त किये होगें ...........।

तुम्हारी हर साँस की आहट पहचान लेता हूँ ।
तुम कहो न कहो नजरों से जान लेता हूँ ।।

इन्हें तो शब्दोंं का हेर फेर विल्कुल भी नहीं आता मगर मेरे दिल की बात बिना कीे समझ लेते हैं और अब मैं क्या चाहती हूँ ये जान गये थे । अपेक्षित शब्दो की फुहार तनम न भीगो गयी थी । बहुत सुन्दर रचना एवं अभिव्यक्ति ।

विनोद कुमार पांडेय said...

यही होता है,जब जो सोचते है वैसा नही हो.कमी तो लोगो को महसूस होती है पर हर लोगों को बार बार बयाँ करना अच्छा नही लगता पर वक्त आने पर सब खुद ब खुद पता चल जाता है..
आज फुरसत मे बैठ कर आपकी सभी कहानी फिर से पूरी पढ़ी.बहुत बढ़िया लगा...

शब्दों का मायाजाल बेहतरीन है.

awaz do humko said...

इक बार फिर से बेहतरीन स्टोरी...

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

बहुत बहुत बहुत सुंदर कहानी। अधेड़ पति-पत्नी के बीच साहचर्य से उपजे स्वाभाविक और गहरे प्रेम को उकेरती यह कहानी लाजवाब है।
पहले से कहीं प्रकाशित नहीं हुई है तो इसे प्रकाशन के लिए अच्छे पत्र को भेजिएगा।

‘नज़र’ said...

शब्द दिल में तीर की तरह उतर जाते हैं
---
चाँद, बादल और शाम

अनिल कान्त : said...

बेहतरीन...बेहतरीन...बेहतरीन
शब्दों का मायाजाल बहुत बेहतरीन है...बहुत अच्छी लगी आपकी रचना

दिगम्बर नासवा said...

आपकी कहानी का प्रवाह बहा कर ले जाता है ............ ये अक्सर होता है प्यार करने वालों के बीच, पति पत्नी के बीच और आयी बात रिश्ते को और मजबूत करती है............

sada said...

बहुत ही बेहतरीन, आभार्

ओम आर्य said...

bahut hi sundar hai shabdo ke mayajal .........kaee baar aisaa bhi hota hoga.......bahut hi sundar samapti

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...
This comment has been removed by the author.
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

"इन्हें काम करने की आदत भी नहीं ह। एक् चाय का कप तो कभी बनाया नहीं फिर घर के और कितने काम होते हैं--।कैसे चलते होंगे।"

कहानी बहुत अच्छी लगी।
तारतम्य इतना बढ़िया था कि एक ही साँस में पढ़ गया।
बधाई!

Science Bloggers Association said...

लाजवाब कहानी। बधाई।

-Zakir Ali ‘Rajnish’
{ Secretary-TSALIIM & SBAI }

"अर्श" said...

इस घर की खुशियाँ तो तुम से ही है.. क्या यह बात वाकई कहने लायाक होती है क्या हर बात कहानी होती है जहां मोहब्बत में आत्मा मिला हुआ है ... मगर ये मानव मन है कभी स्थिर नहीं रह सकता... कितनी ऊँचाइयों पे ले जाकर अकेले छोड़ देता है अकेले गिरने के लिए और जब ये गिरता है तो आंसू टपक पड़ते है.... जो इस कहानी की महिला पात्र की हक़ अदा कर रही थी इनके साथ भी वही हुआ... बहोत ही खुबसूरत कहानी है ये ... बहोत पसंद आयी ... हालाकि आपकी लेखनी पे कोई टिपण्णी करूँ मेरे बस की बाहर की बात होती है इसलिए अक्सर सिर्फ पढ़ के ही चला जाता हूँ... सलाम आपकी लेखनी को...


अर्श

M.A.Sharma "सेहर" said...

निर्मला जी

सच में ये पत्नी मन ....कभी कभी लगता है ..हम ही शायद अपने आप को नहीं समझ पाते ...और आँखों में आंसू लिए सोच कहाँ तक पहुँचा देते हैं.....और अगले ही पल एक झटके में भावुक हो कर सब भूल भी जातें हैं.....

आप की कलम दिल के जज्बातों को अति स्वाभाविक व सुन्दरता से उकेर देती है...नमन है मेरा.

मैथली शरण गुप्त ने अद्भुत कहा -"औरत तेरी यही कहानी, आँचल में है दूध और आँखों में पानी "

काजल कुमार Kajal Kumar said...

बहुत बढ़िया.

ताऊ रामपुरिया said...

बहुत सुंदर और प्रवाहमान रचना.
शुभकामनाएं.

रामराम.

vandana said...

sabse pahle to nirmala ji itni sarthak kahaani ke liye badhayi.
pati patni ka rishta kaanch se bhi najuk hota hai aur usmein ye bhavbnayein,ye soch darar dalne ki jo koshish karte hain bas zindagi usi ke ird-gird ghoomti rah jati hai.........bhavnayein sabmein hoti hain bas koi vyakt kar pata hai aur koi nhi aur aurton ki ek hi problem hoti hai ki wo abhivyakti chahti hain .......us udhedbun ko bahut hi sundar dhang se ukera hai.

hem pandey said...

कहानी ने अपने शब्द जाल में गहरा उलझा दिया. पति पत्नी के संबंधों को ले कर इस उम्दा भावुक कहानी के लिए साधुवाद.आपके कहानीकार रूप का कायल हो गया हूँ.

Pt.डी.के.शर्मा"वत्स" said...

आपकी इस कहानी ने अन्त तक बाँधे रखा। बहुत ही बढिया!
आभार!

प्रवीण शुक्ल (प्रार्थी) said...

maa prnaam aap ki kahani ka prbaah yaisa hai ki yek baar padhna suru karne kaa baad jab tak ant nahi aajata hai chodne ka man nahi hota aap ki kahani ke agle ank ka intjaar rahta hai aur har baar badi besbri se mai uska intjaar karta rahta hun bus natmask hun aur kya kahun
mera prnaam swikaar kare
sadar
praveen pathik
9971969084

adwet said...

dad deni hogi apko, shabdon ko bhut achchi trah buna hai

शोभना चौरे said...

bhut sundar khani
pyar prkat krne ke liye shbdo ki jarurat nhi hoti .bhut sarlta se aapne kh diya .jeevan ko urja deti sashakt khani .
bdhai
aapki agli khani padhna baki hai .

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