19 July, 2009

तुम ज़िन्दा हो------- कहानी

जाने क्यों इस सुरमई शाम का अब भी मुझे इन्तज़ार रहता है--- जब सूर्य देवता दूसरी दुनिया को रोशन करने चल पडते हैं तो इस दुनिया को अलविदा कहती किरणों की विरह से आत्मसात होना एक सकून देता है-------- देखती रहती हूँ तब तक --- जब तक कि आखिरी किरण विदा नहीं ले लेती------- फिर सुबह की पहली किरण का इन्तज़ार ------- तो और भी------ अच्छा लगता------ सतलुज दरिया पर जैसे ही सुबह की पहली किरन अपनी झलक दिखाती-----शांन्त बहते दरिया मे लहरें मचलने लगती------ शोख किरणो की सरगम पर अठखेलियाँ करती लहरों का नृत्य देखते ही बनता था------- सारा दिन किरणो और लहरों की आँख मिचौली चलती रहती------ शाम होते ही लहरें शाँत हो दरिया मे समा जाती------- बिलकुल मेरी तरह-----उदास---जीवन है तो बस जीना है------ सुमित के बिना---- जीवन की उमँग के बिना-------झरों की तो अगली सुबह फिर आयेगी------- कहीँ और--- पर मैं------- बस यादें ही तो रह गयी हैं-------- प्यार और आदर्शों से सनी इस घर की एक एक ईँट ----इस सुर्मई शाम मे उदास हो उठती है-----अब सुमित के ठहाके जो नहीं गूँजते------- जब पूरा परिवार शाम को इस लान मे चाय पीता तो सुमित की हँसी शरारतों से लहरें भी मचलने लगती आसपास के पेद पौधेलहरा कर उसे और बहका देते----- सुमित की आँखों की चमक तब देखते ही बनती थी------ीनहीं आँखों की दिवानी थी मैं--------- एक अजीब कशिश थी उन आँखों मे---
छ्ह वर्ष हुये थे मुझे व्याह कर इस घर मे आये ---- मैं सुमित के साथ इस परिवार को पा कर धन्य हो गयी थी--- इन के पापा एस डी ओ रिटायर हुये थे और मम्मी सुघड गृहणी थी------ एक बहन थी जिसकी शादी हो चुकी थी ----- छोटा सा पढा लिखा परिवार था सुमित डेफेंस मे थे ----- जब हमारी शादी हुई तो सुमित अम्बाला मे थे------ शादी के 6 माह् के अन्दर ही इन्हे परिवार को साथ रखने की स्वीकृती मिल गयी थी------ सुजान इनका बचपन का सब से प्यारा दोस्त था सगे भाईयों से भी बढ कर प्रेम था दोनो मे------- सुजान की पोस्टिँग भी अम्बाला मे इनकी युनिट मे ही थी------ दोनो गाते बहुत अच्छा थे और सारी युनिट के चहेते थे------- संयोगवश दोनो की पोस्टिंम्ग एक साल बाद लखनऊ हो गयी-------- दोनो कैप्टन बन गयी थे------- एक माह बाद सुमित मुझे भी साथ ले गये -----मौज मस्ती मे ढाई साल कैसे गुजर गये पता हे नहीं चला------- घूमना फिरना ----पार्टियाँ क्लब क्या जीवन था सुजान भी अकसर रोज़ आ जाता था--------
शायद हमारी खुशियों को किसी की नज़र लग गयी थी------- सुजान की ट्राँसफर काश्मीर हो गयी------- सुमित कई दिन उदास रहे-------- उसके बिना पार्टियों मे भी इनका दिल ना लगता था------ तीन महीने बाद ही मनहूस खबर आ गयी कि सुजान उग्रवादियों के साथ मुठभेद मे घायल हो गया है--------ये सुन कर सुमित घबरा गये------- मुझे नंगल भेज कर खुद छुट्टी ले कर काश्मीर चले गये--- पूरा एक महीना सुजान के पास रहे----- इस हादसे मे सुजान की आँखें चली गयी थी--- सरी युनिट के लोग ही क्या सरा शह्र उदास था सुमित का और हम सब का बुरा हाल था सुमित अपनी मा का अकेला बेटा था पिता छोटी उम्र मे छोड कर चले गये थे ----- उसकी मा को हम लोग अपने घर ले आये थे------- सुमित तो जैसे सुजान की परछाई बन गये थे इनके चार दोस्तों ने प्रतिग्याली कि अगर किसी हादसे मे इनकी आँखें चली जायें तो मरणोपरान्त उनकी आँखे सुजान को लगा दी जायें------- सुजान तो अभी चाहते थे कि उसकी एक आंम्ख उसे लगा दें मगर किसी ने इस की इज़ाजत ना दी------- इसी दौरान सुमित की गुहार और दोनो की दोस्ती और सुजान की लाचारी को देखते हुये सुमित की ट्रांम्सफर भी काश्मीर मे हो गयी ---कश्मीर फैमिली स्टेशन नहीं था------ वैसे भी मै माँ बनने वाली थी------ इस लिये मुझे घर ही रहना पडा------ मैने चान्द से बेटे को जन्म दिया था------ लेकिन अभी सुजान अस्पताल मे थे इसलिये सुमित आ नहीं सके थे------ तीन माह बाद जब उसको अस्पताल से छुट्टी मिली तब् उसे घर ले कर ही आये ----- सुजान का गाँव भी नंगल से दो कि मी पर था मगर इन्होंने फैसला किया कि सुजान नंगल मे हमारे घर ही रहेगा और उसके मम्मी को भी अपने घर ले आये------ गाँव मे सुजान खुश ना रह सकेगा -----मगर उसके मम्मी ने केवल एक हफ्ता तक उसे यहाँ रखा छुटी खत्म होते ही ये चले गये-- और मुझे और पापा को कह कर गये कि कभी क्भी सुजान को घर ले आया करें------ मुझे कहते----अनु तुम जानती हो सुजान मेरी जान है------- उसे कभी उदास ना होने देना------ मैं जल्दी ही उसकी आँखों का प्रबन्ध करूँगा--------
सुमित चले गये------- सब उदास थे इन दोनो की वजह से------ कश्मीर की सीमा पर भी हालात खराब थे अखबारों से ही कुछ पता चलता था------ किसी को घर मे कुछ बता नहीं सकते थे------- और एक दिन-----क्रमश:

24 comments:

डॉ. मनोज मिश्र said...

बहुत उत्क्रिस्ट,जारी रहे .

mehek said...

bhawnao ka bahut achha sangam liye hai kahani,aage intazaar hai...

‘नज़र’ said...

बहुत ख़ूब, उत्कृष्ट!!
---
पढ़िए: सबसे दूर स्थित सुपरनोवा खोजा गया

P.N. Subramanian said...

फिर एक अति विशिस्ट कहानी. पठन जारी है

सैयद | Syed said...

बढ़िया कहानी.... आगली कड़ी का इंतज़ार है.

vandana said...

agli kadi ka intzaar hai..........

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

सुन्दर कहानी, अगली कड़ी की प्रतीक्षा।

ताऊ रामपुरिया said...

बहुत बढिया कहानी..आगे का ईंतजार करते हैं.

रामराम.

संजीव गौतम said...

बहुत शानदार अगली कडी जल्दी ही दें.

awaz do humko said...

बढ़िया कहानी.... आगली कड़ी का इंतज़ार है.

विनोद कुमार पांडेय said...

भाव और सवेदना से भरा उत्कृष्ट रचना..
बहुत धन्यवाद..
आगे के लिए उत्सुकता बढ़ा गयी है...
धन्यवाद..इस कड़ी के लिए..

अजय कुमार झा said...

सिर्फ इतना की अगली कड़ी कब लिखेंगी..इन्तजार रहेगा..आपकी लेखनी की सबसे प्रभावी बात उसमें एक प्रवाह का होना है...बहुत ही बढ़िया..

rohitler said...

लाजवाब

अगले क्रम का इन्तज़ार है

विवेक सिंह said...

जारी रहे !

काजल कुमार Kajal Kumar said...

इंतज़ार रहेगा...

अनिल कान्त : said...

अच्छी कहानी चल रही है

Nirmla Kapila said...

आप सब का बहुत बहुत धन्यवाद असल मे इस कहानी को लिखने का मकसद था कि एक दिन मै कल्पना कर रही थि कि अगर किसे की आँखे दूसरे को लगती हैं तो मानसिक रूप से दोनो पर क्या असर होता है वैसे तो मुझे पता है कि आंम्खें तो एक बल्व का काम करती हैं ऐर दिमग बैटरी का जिस बैटरी से इसका कनेक्शन होगा वही काम करेगा मगर कल्पनाओं के पँख इतने बडे होते हैं कि वो आसमान से भी आगे तक उड जाती हैं---- और तब उन कल्पनाओं मे इस कहानी का जन्म हुआ आपके उत्साह के लिये आभारी हूँ

दर्पण साह "दर्शन" said...

aadrniya kapila ji ...

pranam.

aap bahut accha likhti hain aur hamare jaise yuva lekhkoon ke liye prerna kshrot.

aapki taarif karna bhi chota muh badi baat hogi...
Post ke baare main kuch nahi kahoonga...

kramsh ! ke intzeer main...

Darpan Sah

दर्पण साह "दर्शन" said...

Apki pustak mujhe zarror bhejiyega...
..main atyant aabhari hoon aapka comment padhkar.

apki pustak ki samikhsha mujhse nahi ho paaiyegi...
koshish zaaror karoonga.

..par padhan zarror chahoonga.

to tay raha ki aaj se aap darpan ke aage ji nahi lagayiege...

sirf darpan , Bhai ya Beta ....
kaisa rahega?

Nirmla Kapila said...

दर्पण बेटा जी बेटा बहुत बडिया रहेगा ये बलागिँग तो मेरे लिये वरदान साबित हो रही है बहुत बहुत आशीर्वाद्

दर्पण साह "दर्शन" said...

aap e mail dekhein address post kiya hai...

Babli said...

बहुत ही अच्छी कहानी है और दिलचस्प भी!

अल्पना वर्मा said...

der se pahunchi hun...is liye dono bhaag dikhe....pahla bhaag padha...bahut achchee lagi kahani.
agla bhaag bhi padh kar comment likhti hun.

गौतम राजरिशी said...

आपका मेल मिला...नेट साथ नहीं दे रहा और कुछ छुटकी बिटिया के संग बीतता वक्त मौका नहीं देता ज्यादा ब्लौग के लिये...
कहानी के पहली किश्त अभी तक बाँधे रखती है। वैसे सुमित का सुजान के हास्पिटल में भरती हो जाने पर उसे भी उतनी लंबी छुट्टी का मिल जाना थोड़ा हैरान करता है...अमूमन ऐसा संभव नहीं।
और कहीं-कहीं शाय्द जल्दबाजी में टाइप करने की वजह से कुछ चरित्र आपस में गड्ड-मड्ड हो गये हैं...लेकिन कहानी का फ्लो अभी तक खूब अच्छा बन पड़ा है तो पाठक समझ जाता है\
अगली किश्त पर जा रहा हूँ...

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