25 April, 2009

माँ की पुकार

बेटी जब से ससुराल गयी है
मेरी सुध ना किसी ने जानी ह
दिल मै उसकी यादें हैं
और आँखों मे पानी है
सुनसान है घर का कोना कोना
जहाँ गूंजते थे उसके कहकहे
ना घर की रोनक वही रही
ना दिवरों के रंग ही वो रहे
पापा तेरे इक कोने मे
चुपचाप से बैठे रहते हैं
याद तुझे कर कर के बेटी
उनकी आँख से आँसू बहते हैं
समाज बनाने वलों ने
ये कैसी रीत बनाई है
माँ के जिगर के टुकडों की
दुनिया दूर बसाई है
दिल करता है तुझे बुलाऊँ
पर तेरी भी है मजबूरी
पर तेरे बिन प्यारी बेटी
तेरी माँ है बडी अधूरी
जब भी घर के पिछवडे से
गाडी की सीटी सुनती हूँ
इक झूठी सी आशा मे बेटी
तेरे पाँव की आहट सुनती हूँ
आओ जीते जी कुछ बातें कर लो
फिर कौन तुझे बुलायेगा
आज इस घर मे मै रोती हूँ
फिर ये घर तुझे रुलायेगा
माँ बेटी के रिश्ते की
दर्द भरी कहानी है
माँ बिना फिर कैसा मायका
सब रिश्ते बेमानी हैं

23 comments:

श्यामल सुमन said...

घर की रौनक जो थी अबतक घर बसाने को चली।
जाते जाते उसके सर को चूमना अच्छा लगा।।

सादर
श्यामल सुमन
09955373288
मुश्किलों से भागने की अपनी फितरत है नहीं।
कोशिशें गर दिल से हो तो जल उठेगी खुद शमां।।
www.manoramsuman.blogspot.com
shyamalsuman@gmail.com

ajay kumar jha said...

kapila jee,
beti ke ghar se vidaa hone ke baad jo haal ghar kaa hota hai uskaa bada hee maarmik chitran kar diya aapne, ek maa aur beti ke beech kaa rishtaa to koi paribhashit nahin kar saktaa, yaadgaar rachnaa ..

ओम आर्य said...

आपकी पिछली कविता 'माँ' के क्रम में यह कविता एक नया परिप्रेक्ष्य पेश करती है.

mehek said...

marmik rachana,kahido boonde nikal aagayi,badhai.

विनय said...

सच, बहुत मार्मिक रचना है

संध्या आर्य said...

दिल मै उसकी यादें हैं
और आँखों मे पानी है
सुनसान है घर का कोना कोना

मेरी माँ भी यही बाते बोलती है तु तो मेरे दिल मे रहती है और मुझे कुछ भी पहले जैसा अच्छा नही लगता जबसे तु गयी है......अब मै भी दो प्यारी प्यारी बेटियो की माँ हुँतो ज्यादा समझ मे बात आती है........पर समाज की ऐसी रीति से मुझे एतराज होती है बेटियाँ पलती कही और है घर कही और निर्धारित कर दी जाती है..........ऐसी रीति किसने बनाई?बनानेवाले को कोई बेटी नही होगी और बनाने वाला जरुर कोई शैतान होगा मुझे बस यही लगता है.........बहुत ही मार्मिक कविता है आज मुझे सिर्फ आपनी माँ की याद आ रही है.....

"अर्श" said...

ek hi purn shabd hai duniya hai jahaan tak main maanta hun wo hai maa.. iski byathaa kaun samajhe yahi sawaal hai... bahot hi marmik rachanaa., bahot hi jam ke likhaa hai aapne..badhaayee..

arsh

शोभना चौरे said...

माना की बेटीया घरकी रोनक होती है किंतु ससुराल जाने पर वो ही उस घर को स्वर्ग बनाती है
आप निराश क्यो है बेटी तो स्माज की रीढ़ है स्तंभ है|उसी से सारी स्माज की रचना है आप भाग्यशाली है|
बेटी से इतना प्यार करने वाली मा को |प्रणाम|

शोभना चौरे said...

माना की बेटीया घरकी रोनक होती है किंतु ससुराल जाने पर वो ही उस घर को स्वर्ग बनाती है
आप निराश क्यो है बेटी तो स्माज की रीढ़ है स्तंभ है|उसी से सारी स्माज की रचना है आप भाग्यशाली है|
बेटी से इतना प्यार करने वाली मा को |प्रणाम|

The Pink Orchid said...

waaaah Nirmla ji.. aap to aankho mein aansu le aayi..

SWAPN said...

aapki kavita sunkar yahi sochta hun

KASH, KASH, KASH, MERE EK BETI HOTI.

Nirmla Kapila said...

आप सब का बहुत बहुत धन्यवाद ये केवल कहने के लिये कविता नही है जब से तीनों बेटियों कि शादी हो गयी है हम दोनो ही बहुत उदास रहते हैं किसके साथ दुख सुख बाँटें? मुश्किल मे कौन है हमरा?बस बेटी होने का यही दुख होता है बस इतना स्कून है कि मेरी तीनो बेटियाँ बहुत सुखी हैं आप सब का प्यार मुझे प्रेरित करता रहता है तो दो शब्द लिख लेती हूँ अप सब का बहुत बहुत धन्यवाद्

अनिल कान्त : said...

आपकी रचना में भावनाओं कि गहराई है ...ममत्व है ...एक आस है ....प्यार है ...दर्द है ....बेहतरीन

Harkirat Haqeer said...

माँ बेटी के रिश्ते की
दर्द भरी कहानी है
माँ बिना फिर कैसा मायका
सब रिश्ते बेमानी हैं

एक माँ का अद्भुत दर्द.....!!

क्यों यह रीत बनी ......?
किसने बनाई .......?
क्यों बेटी को ही घर छोड़ कर जाना पड़ता है....?
क्यों उसे दान में दी जाने वाली वास्तु समझा जाता है....??
ये बहुत सारे सवाल अक्सर मुझे कचोटते रहते हैं.......!!!

परमजीत बाली said...

बहुत भावपूर्ण रचना है।बहुत ही सही चित्रण किया है।बधाई ।

माँ बेटी के रिश्ते की
दर्द भरी कहानी है
माँ बिना फिर कैसा मायका
सब रिश्ते बेमानी हैं

kavi kulwant said...

bahut khoob..

अमिताभ श्रीवास्तव said...

beti ke baare me kuchh bhi esa sochna jisme ki vo apne se door hogi, dil bethne lagtaa he..aapki kavita vakai marmsparshi he..aapne maa hoke jaanaa, aap bhi beti rahi he, ab jaanaa hogaa maa ki haalat..
sach me sivaai 'naman'karne ke kuchh aour likh hi nahi sakta..'naman' aapke bhaav ko, 'naman' is aatmiya rishte ko...

ANAAM (WITHOUT A NAME) said...

APKI KALAM KO AADAR SAHIT PARNAAM HAI .MAn (MOTHER) SHABAD KE ARTH KYA HAIN AAPKI KALAM SE MALOOM HO JAATA HAI

M.A.Sharma "सेहर" said...

मार्मिक ,सुन्दर रचना..

पर जीवन की सच्चाई लिए हुवे ..
जिस से इक न इक दिन सभी को गुजरना है..

नमन है आपकी कलम को !!!

निर्झर'नीर said...

acche bhav..marmsparshii

Rajat Narula said...

बहुत उत्तम रचना है !

Abhishek Mishra said...

Bahut hi bhavpurn panktiyan.

Babli said...

आपकी कविता ने दिल को छू लिया! बहुत खूब!

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