03 July, 2017


 गज़ल

न समझे फलसफा इस ज़िन्दगी का
कभी तू ज़िन्दगी मुझ से मिली क्या?

गरीबी में मशक्कत और अजीयत
खुदा तकदीर तूने ही लिखी क्या।

न समझी फलसफा तेरा अभी तक
कभी तू जिंदगी मुझ से मिली क्या?

थपेडे वक्त के खाकर खडी हूँ
गिरी फिर सम्भली लेकिन डरी क्या?

जमाने हो गये हैं मुस्कुराये
कहीं पर मोल मिलती है हंसी क्या?

हकीकत कागज़ी जनता न चाहे
जमीनी तौर पर राहत हुयी क्या?


10 comments:

Kavita Rawat said...

न समझे फलसफा इस ज़िन्दगी का
कभी तू ज़िन्दगी मुझ से मिली क्या?
.. सच जिंदगी क्या है, इसे कोई परिभाषित नहीं सकता है
बहुत दिन बाद आपकी गजल पढ़ने को मिली, मन में ख़ुशी हुई

ताऊ रामपुरिया said...

जिंदगी भी अजीब है इसकी समझ आज तक किसी को नही आई, बहुत ही सुंदर गजल.

रामराम
#हिन्दी_ब्लॉगिंग

कृपया कैप्चा हटा दीजिये कमेंट बाक्स से.
सादर

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

बहुत सुन्दर और सटीक गज़ल

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (04-07-2017) को रविकर वो बरसात सी, लगी दिखाने दम्भ; चर्चामंच 2655 पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

Maheshwari kaneri said...

बहुत सुन्दर गजल

Satish Saxena said...

जमाने हो गए हैं मुस्कराये
वाह !!
बढ़िया रचना
हार्दिक मंगलकामनाएं !
#हिन्दी_ब्लॉगिंग

vandana gupta said...

ज़िन्दगी को चुनौती देती शानदार ग़ज़ल दी

राज भाटिय़ा said...

न समझे फलसफा इस ज़िन्दगी का
कभी तू ज़िन्दगी मुझ से मिली क्या?
आज कल मै इसे ही ढूंढ रहा हुं , पुछू तो सही इस से कि यह चाहती क्या हे...

देवेन्द्र पाण्डेय said...

बेहतरीन!

Digamber Naswa said...

समझ आ जाये तो फिर जिंदगी ही क्या ...
बाखूबी लिखा है फलसफा ...

पोस्ट ई मेल से प्रप्त करें}

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