सुखान्त दुखान्त --4
पिछली किश्त मे आपने पढा कि बाजी शुची को अपने अतीत की कहानी सुना रही थी कि किस तरह उसने किसी अमीर परिवार मे शादी के सपने देखे थी जब उसकी शादी अमीर परिवार मे हुयी तो उसे अमीरी का सच पता चला। जितना उजला अमीरी का उजाला बाहर से लगता है उतना ही अन्दर अन्धेरा होता है। उसके शराबी कबाबी पति को जब डाक्टर ने टी बी की बीमारी बताई तो घर के लोग तो खुश थे कि बला टली लेकिन बाजी को भविश्य की चिन्ता सताने लगी। बाजीपने पति के साथ सेनिटोरियम मे चली गयी वहीँ अपने जीजा की मदद से नर्स दाई की ट्रेनिन्ग लेने लगी । त्क़भी एक दिन उन्हें एक औरत मिली जिसने जो उनके ससुराल वालों का सच बताने आयी थी। कौन थी वो आगे पढें--- "हम दोनो एक पेड के नीचे बैठ गयी।
" अभी ये मत पूछिये कि मै कौन हूँ आपको बता दूँगी। मै कसौली मे बडे नवाब यानि आपके पति को देखने आयी थी।उनकी हालत देख कर मुझ से रहा नही गया। आप चाहे कुछ भी कहें लेकिन मेरी अन्तरात्मा से रहा नही गया कि आपको सच बताये बिना जाऊँ। बात ये है कि बडे नवाब की माँ और भाई नही चाहते कि वो ठीक हों\ वो लोग आपको बताये बिना उन्हें अफीम और शराब भेजते हैं जो वो आपके जाने के बाद छुप कर पीते हैं। चोरी से पैसे भी दे जाते हैं जिनसे वो नौकर से शराब मंगवा कर पीते हैं। बडे नवाब नशे के इतने अभ्यस्त हो गये हैं कि नशे के बिना रह नही सकते। वो आप से शर्मिन्दा भी हैं मगर अब बेबस हैं। इसी के कारण उनके भाई उन से कुछ जमीन के कागज़ों व कारोबार के कागज़ों पर उनके दस्तखत करवा कर ले जाते हैं। ताकि अगर बडे नवाब न भी रहें तो उनकी सम्पति मे आपका हक न रहे। इस तरह उन्होंने बडे नवाब को बर्बाद करने मे कोई कसर नही छोडी है। अगर आप चाहती हैं कि बडे नवाब ठीक हो जायें तो उन्हें कहीं और ले जायें और नौकर को वापिस भेज दें। धीरे धीरे डाक्टर से मश्विरा कर पहले इनका नशा छुडायें। दिल के अच्छे हैं मगर सौतेली माँ के दबाब और अवहेलना से दुखी रहे। पिता की मौत के बाद टूट से गये हैं तभी से अधिक नशा लेने की आदत हो गयी है।" कह कर वो चुप कर गयी
" मगर आपको कैसे पता चला ये सब।" मै उसकी बातों से हैरान परेशान थी।
"मुझे ये बताने मे कोई संकोच नही कि मै वही कोठेवाली हूँ जिसके पास वो रोज़ आते थे। हमारा पेशा है हर आने वाले का स्वागत करना पडता है। उन्हें कई बार समझाने की कोशिश भी की। उनका नमक वर्षौ खाया है तो उनका दुख देख कर मन दुखी हुया और आपको बताने का साहस भी जुटा पाई। शायद अपना फर्ज निभा कर मै बडे नवाब के लिये कुछ कर पाऊँ।" कह कर वो उठ खडी हुयी। मैं उसे जाते हुय्ते हैरानी से देखती रही। उस समय इतना ध्यान भी नही आया कि उसका धन्यवाद करूँ या उसे चाय के लिये ही पूछ लूँ।"
मै विस्मित सी इनके अतीत के कुहासे मे छिपे रहस्य, षड्यन्त्र, एकिन्सान की पीडा और भटकाव -- पता नही और क्या क्या देख रही थी। इसका कारण?--- पैसा। पैसे की चकाचौँध के पीछे का काला इतिहास ---। इन रिश्तों ,माँ भाईयों से अच्छी तो वो औरत ही निकली जिसे कम से कम इनकी दशा देख कर रहम तो आया? मन ही मन उस औरत का धन्यवाद किया और चल पडी।"
"मैं वहाँ से सीधी अस्पताल पहुँची।नौकर पता नही कहाँ था मैं अपलक उन्हें सोते हुये निहारती रही। बिलकुल किसी अबोध बालक की तरह उनका चेहरा था जैसे माँ की गोद के लिये रोते रोते सो गया हो। और अचानक मेरे अन्दर की औरत माँ बन गयी। कितनी देर सोचती, देखती रही। जब से मै कोर्स करने लगी थी तब से मेरे अन्दर जीवन के लिये एक दृष्टीकोण बन गया था एक आत्मविश्वास और अपने पाँव पर खडे होने का प्रयास। आज सोच लिया कि इन्हें उन दुष्टों से बचाऊँगी।"
" इस सप्ताह मेरी इम्तिहान था। अभी 15 बीस दिन मै कोई कदम नही उठाना चाहती थी। सिवा इसके कि नौकर को वापिस भेज दूँ। अब मै अधिक समय अस्पताल मे बिताने लगी। वहीं बैठ कर पढती रहती। खुद ही मिनकी देखभाल करती। मुझे अब पहले की तरह इन पर गुस्सा नही आता। समझ गयी थी कि मन से कमजोर आदमी कितना लाचार होता है। अफीम पूरी न मिलने से इनकी बेचैनी बढने लगी। नौकर चला गया था ला कर कौन देता? मैने इन्हें बताये बिना डाक्टर को पूरी बात बताई तो उन्हों ने मश्विरा दिया कि एक दम अफीम बन्द करने से भी इन्हें बेचैनी है। नशा एक दम से बन्द नही किया जा सकता। और उस दिन मैने इन्हें सब कुछ बता कर इनसे प्रण लिया कि ये आदत छुडवाने मे मुझ से सहयोग करेंगे तो समझूँगी कि मैने आपको पा लिया है। अब मैं अफीम कहाँ से लाती? नौकर को बुलाया उससे अफीम मंगवा कर अपने पास रख ली और नौकर को फिर भेज दिया। मै इन्हें अपने हाथ से कम डोज़ देती। इनकी बेबसी और शर्मिन्दगी देख कर दुख भी होता मगर इन्हें समझाती और कुछ पुस्तकें भी पढने के लिये प्रेरित करती। हर तरह से खुश रखने की भी कोशिश करती। इस तरह अब इनकी हालत मे एक महीने मे ही सुधार नजर आने लगा। शराब बिलकुल बन्द कर दी।"
"मेरी ट्रेनिंग समाप्त् होने के दो माह बाद ही मुझे शिमला के एक असपताल मे नौकरी मिल गयी । मै इन्हें लेकर शिमला आ गयी मगर ईलाज यहीँ का चलता रहा। अपनी माँ को अपने साथ ले आयी थी। अब मैने फैसला कर लिया था कि उनसे कोई आर्थिक सहायता भी नही लूँगी। बेशक मेरी बहन ने मेरी उस समय बहुत मदद की। इनकी दवाओं का और खुराक का ही बहुत खर्च था। अच्छी खुराक मे मीट अन्डे भी देने पडते। मैने कभी मीट को हाथ भी नही लगाया था ।ास्प्ताल के एक कर्मचारी को पैसे दे कर मीट और खरोडे बनवा लेती ।इनकी हालत मे बहुत सुधार होने लगा था फिर भी इनके अन्दर एक गम और हीन भावना सी रहती।कितना मुश्किल था एक करोड पति नवाब के लिये अपने एक नौकर की हैसीयत जितनी पत्नी पर निर्भर करना। आठ साल हो--- क्रमश:
31 comments:
कहानी ने एक सुन्दर मोड़ लिया है ... औरत के अंदर हिम्मत जाग उठी है ... अच्छा लग रहा है ... आगे क्या होता है जानना चाहता हूँ ...
nauker si haisiyat ! per hausla usika
लग रहा है कि साहिब बीबी और गुलाम को पढ रहे हैं। अच्छी प्रस्तुति।
कहानी काफ़ी रोचक चल रही है …………आगे का इन्तज़ार है।
sahbhaavi ban jaataa hai paathhak .maine to pahli martbaa bas prastut kisht padhi hai .lekhak aur paathaak ke beech kaa dvait mit rhaa hai .
veerubhai
Bahut achhee badh rahee hai kahani!Har baar agali kisht kaa intezaar rahta hai!
रोचक प्रस्तुति ..अच्छी चल रही है कहानी ...
bahut interesting lag rahi hai ..
कहानी को बहुत ही रोचक मोड़ पे रोका है आपने ...
नया मोड कहानी को और रोचक बना रहा है...परिवर्तन अच्छा लग रहा है...बधाई!
कोन कहता हे ऒरत कमजॊर हे, जब वो निशचय कर ले तो सब कुछ कर सकती हे कहानी के इस नये मोड से कहानी ओर रोचक बन गई धन्यवाद
badi rochakta se kahani aage badh rahi hai.... bahut achha lagta hai jab apne aas-paas ghatit ghatnaon ka sayong kahani mein milta hai...
..utsukta barkarar...aage kee kadi ka hai intzaar
प्रतीक्षा रहेगी आगे की कहानी की..
parivartan ka shankhnaad yun hi hota hai... aage ki pratiksha
कहानी काफ़ी रोचक चल रही है|धन्यवाद|
अच्छी कहानी के सभी गुण इसमें हैं. और क्या मोड़ आएँगे इसकी प्रतीक्षा रहेगी.
रोचक मोड़ पर है कहानी ... अगली कड़ी का इंतज़ार।
अंदाजा तो लग रहा था मगर कहानी इतने दिलचस्प व प्रेरक मोड़ से गुजरेगी इसका अनुमान न था।
कुछ दिन से ब्लोगिंग नहीं कर रहा था...आज कहानी का तीसरा और चौथा पार्ट पढ़ लिया...देखें अब आगे क्या होता है..
निर्मला जी कहानी बहुत interesting है। कृपया अगली कड़ी के लिए ज्यादा इंतज़ार न करवाएँ।
कथा बहुत अच्छी और प्रेरक है!
इस बार का अंक भी पिछले अंकों की तरह रोचकता बनाए हुई है अगली कड़ी का इन्तजार है !
-ज्ञानचंद मर्मज्ञ
... saath saath chal rahe hain !!!
साहस नहीं छोड़ना है किसी भी समय।
kahani bahut achchi lag rahi hai...aage ki kadi ka intzaar hai...
bahut rochak lag rahee hai kahanee.......agalee kadee ka intzar......
meree naee post kisee bhee blog par update bahee ho paee hai...... publish hone ke bavzood...lagta hai system naraz hai....
जीवन के परम सत्यों से दीदार करता यह सुखांत दुखांत।
हम पढ रहे हैं, लगातार।
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आपका सुनहरा भविष्यफल, सिर्फ आपके लिए।
खूबसूरत क्लियोपेट्रा के बारे में आप क्या जानते हैं?
आपकी रोचक लेखन शैली पढ़ने वाले को बांधे रखती है...........एक भाग ख़त्म होते ही अगले का इंतज़ार रहता है।
सुंदर और रोचक..!!
तपेदिक को इसी कारण,प्रारम्भ में,राजयक्ष्मा या राजरोग कहा करते थे। पैसों के बूते ऐशो आराम की ज़िन्दगी जीने की ख्वाहिश बहुत सारे रोगों का कारण बनती रही है।
यह कथा पत्नीधर्म के पालन पर ही केंद्रित नहीं है। इसमें समाज और व्यक्ति के अंतर्जगत का पूरा तानाबाना है।
सम्पत्ति का लालच व्यक्ति को कहीं का नहीं छोड़ता-न पाने वाले को,न खोने वाले को!
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