13 August, 2010

कसौटी रिश्ते की--- कहानी

कसौटी रिश्ते की
अगली कडी
अब तक आपने पडा कि दोनो पति पत्नि बैठे हुये हैं और पति रो रहे हैं। उनके भाईयों ने उन्हें घर मे से हिस्सा नही दिया था---- पत्नि उन्हें और रुलाना चाहती थी---- पिछली बातें याद कर के ताकि बाद मे रोने के लिये कुछ न बचे।-------
अगली कडी


"ये तो बहुत बडी बडी बातें थी हमे तो एक छोटी सी खुशी भी नसीब नही होती थी। याद है रिश्तेदारी मे एक शादी पर जब मुझे भी सब के साथ जाने का सौभाग्य प्राप्त हुया था। अपनी शादी के कुछ दिनो बाद ही मैं सजना संवरना भूल गयी थी। उस दिन मुझे अवसर मिला था। जब तैयार हो कर आपके सामने आयी तो आपने शायद पहली बार इतने गौर से देखा था--- न जाने कहाँ से एक ावारा सा अरमान आपके दिल मे उठा था अवारा इस लिये कि ऐसे अरमान आपके दिल मे उठते ही नही थे अगर उठते थे तो आप छिपा लेते थे---- तभी आप बोले--
"अज हम सब से पहले घर आ जायेंगे। कुछ पल अकेले मे बितायेंगे।"
"क्या सच????"  मेरी आवाज़ मे छिपा व्यंग इन्हें अन्दर तक कचोट गया था-- चाहे बोले कुछ नही मगर आँखों मे बेबसी के भाव मैने पढ लिये थे। एक दर्द की परछाई इनके चेहरे पर सिमट आयी थी।
मुझे पता था कि मुश्किल है हमे माँजी अकेले मे भेजें। वो नही चाहती थी कि हम दोनो कभी अकेले मे बैठें। मुझे पता नही क्यों उन पर कभी गुस्सा नही आता था उन्हों ने बचपन मे सौतेली माँ के हाथों इतने दुख झेले थे। मेरे ससुर जी की पकिस्तान मे अच्छी नौकरी थी वो पटवारी थी मगर आज़ादी के बाद दंगों मे उ7न्हें सब कुछ वहीं छोड कर भारत आना पडा कुछ अपनी जमीन यहां थी तो नौकरी भी फिर से यहीं मिल गयी । यहाँ भी संयुक्त परिवार था साथ भाईयों का तो मेरी सासू जी सब से छोटी थी इस लिये यहाँ भी उन्हें बहुत दुख झेलने पडे। शायद अब भी उनके मन मे एक असुरक्षा की भावना थी। मुझे कभी कुछ कहती भी नही थी। अपनी बीमारी से भी दुखी थी। इस लिये मुझे उन पर गुस्सा नही आता।  उन्हें डर था कि अगर हम मे प्यार बढ गया तो मैं इन्हें शहर न ले जाऊँ।  और उस दिन भी यही हुया जैसे ही हम खाना खाने के बाद चलने को हुये तो िन्हों ने कहा कि आपने तो रात को आना है हम लोग घर चलते हैं पशुयों को चारा भी डालना है-- तो माँजी एक दम से बोल पडी----" बच्चों को भी साथ ले जाओ।" और मैं एक अनजान पीडा से तिलमिला गयी। फिर अकेले कुछ समय साथ बिताने का सपना चूर चूर हो चुका था।
 इनका रोना रुकने की बजाये बढ गया था यही तो मैं चाक़्हती थी----
" आपको याद है मुझे अपने मायके के सुख दुख मे भी शामिल होना नसीब नही था।मेरे जवान भाई की मौत आपकी भाभी  के बाद 6-8 माह मे ही हो गयी थी---तो संस्कार के तुरन्त बाद ही आप मुझे घर ले आये थे--- मुझे अपनी माँ के आँसू भी पोंछने नही दिये थे--- आप मुझे रोने भी नही देते झट से डांट देते---" रो कर क्या भाई वापिस आ जायेगा?"---- ओह! किस तरह टुकडे टुकडे मेरे दिल को पत्थर बनाया था----: आज तक न कभी हँस पाई न रो पाई। लाडकी को ही क्यों हक नही होता कि वो अपने माँ बाप के सुख दुख मे काम आये जैसे कि आप अपने माँ बाप के काम आ रहे थे।
रगर  एक एक दिन और रात का आपको हिसाब दूँ तो शायद आज आप भी सकते मे आ जायेंगे। आपने केवल अपनी नज़र से ज़िन्दगी को देखा है आज मेरी नज़रों से देखोगे तो आपका दर्द बह जायेगा और मुझे भी शायद कुछ सकून मिलेगा।
इसी लिये मैं आपको रो लेने देना चाहती हूँ। आपको रोने से नही रोकूँगी--- आपको पत्थर नही बनने दूँगी--- भुक्तभोगी हूँ--- जानती हूँ पत्थर बना हुया दिल ज़िन्दगी पर बोझ बन जाता है--- दुनिया के लिये अपने लिये निर्दयी हो जाता है।
राम सीता के लिये कठोर हो सकते हैं मगर दुनिया के लिये तो भगवान ही हैं क्या राम के बिना दुनिया की कल्पना की जा सकती है? मैं सीता कि तरह उदार तो नही हो सकती कि आपको माफ कर दूँ मगर फिर भी चाहती हूँ कि आप दुनिया के लिये ही जीयें_। मैं दुनिया को एक कर्तव्यनिष्ठ इन्सान से वंचित नही करना चाहती।काश भगवान मुझे भी आप जैसाबनाता कामनाओं से मुक्त--- स्वार्थ से परे--- मेरा अपने सुख के लिये शायद स्वार्थ ही था जो आपको कभी माफ नही कर पाई। हाँ लेकिन एक बात का स्कून ज़िन्दगी भर रहा कि मैने वो किया है जो शायद आज तक किसी ने नही किया। अपना दर्द तब भूल जाती हूँ जब गाँव के लोग कहते हैं कि ऐसी बहु न कभी आयी थी न शायद आयेगी। बस इसी एक बात ने मुझे विद्रोह करने से रोके रखा। हाँ जमीन बाँटे जाने तक सब के लिये मैं महान थी मगर जब अपना घर बनाने की बारी आयी तो मैं बुरी हो गयी। जो औरत शादी के पच्चीस  साल तक घर मे सब के लिये वरदान थी वो  बाद मे कैसे बुरी हो गयी? शायद मतलव निकल जाने के बाद ऐसे ही होता है। मुझे हमेशा बहला फुसला कर ही सब ने अपना मतलव निकाला और मै अपने सभी दुख इसी लिये भूल जाती थी।
मेरे वो पल जब मैं अपने पँखों से दूर आकाश तक उडना चाहती थी आपके संग हवाओं फूलों,पत्तियों से ओस की बूँदों तितली के पँखों से रिमझिम कणियों सेआपके संग भीगना चाहती थी लेकिन भीगने के लिये क्या मिला उम्र भर आँसू!--- अपके दिल की धुन से मधुर संगीत सुनना चाहती थी--- आपकी आँखों मे डूब जाना चाहती थी आपकी छाती पर सिर रख कर सपने बुनना चाहती थी--पता नहीं कितने अरमान पाल रखे थे दिल मे क्या मेरे वो सपने कोई लौटा सकता है? आप? आपके भाई? या फिर वो बच्छे जिन्हें अंगुली पकड कर चलना सिखाया। 2 साल का था सब से छोटा --- 9 साल का सब से बडा। क्या कभी उन्हों ने आ कर पूछा है आपका हाल बल्कि सारी उम्र मेरे पास रहे और जब नौकरियां लग गयी शादियाँ हो गयी तो अपने बाप के पास चले गये। अब रास्ते मे देख कर मुँह फेर लेते है।
कैर हम दिल का रिश्ता तो कभी बना नही पाये। सपने जो दिल के रिश्तों के साक्षी थी कब के टूट गये हैं रिश्ता केवल आपने रखा अपने पति होने का। बिस्तर तक सिमटे रिश्ते की उम्र दूध के उफान की तरह होती है बिस्तर छोड और रिश्ता खत्म। एक अभिशाप की तरह था मेरे लिये वो रिश्ता। मगर आज सब कुछ भूल कर हम एक नया रिश्ता तो कायम कर सकते हैं--- एक दूसरे के आँसू पोंछने का रिश्ता---- सुख के साथी तो सभी बन जाते हैं मगर सच्चा रिश्ता तो वही है जो दुख मे काम आये--- निभे-- । और मैने उनका आखिरी आँसू अपनी हथेली पर समेट लिया एक नये अटूट रिश्ते को सींचने के लिये। समाप्त।

43 comments:

Udan Tashtari said...

एक रिश्ता ऐसा भी...


बहुत बढ़िया कहानी रही, बधाई.

काजल कुमार Kajal Kumar said...

अंतर्मन व रिश्ते कैसे भी हो सकते हैं...सुंदर भावाभिव्यक्ति.

राणा प्रताप सिंह (Rana Pratap Singh) said...

रिश्तो के डोर में गुत्थम गुत्था जिंदगी में ऐसे भी क्षण कई बार आते है.....कहानी दिल को छू गई

सुरेन्द्र "मुल्हिद" said...

rishton ki udhed bun ko darshaai aapki kahaani bahut achhi lagi!

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

मार्मिक कथा!

P.N. Subramanian said...

उम्र के उस पड़ाव में आंसू पोछने के सिवा बचा क्या था! सुन्दर कहानी.

M.A.Sharma "सेहर" said...

Aurat main hoti hai ye kar dikhane kee himmat .. sab kuch bhula kar bhee naya rishta kaayam kar sakne kee samrthy.

"Naaree tum kewal shraddha ho"

Naman aapko, aapke jajbe ko Nirmala ji .

Kahani pravahpurn aur lagbhag har strii kee gathaa..strii hridayi ko aap bakhubi samajh pate hain

saadr

sada said...

बहुत ही अच्‍छी लगी कहानी, आभार ।

वन्दना said...

एक बार पहल फिर औरत को ही करनी पडी ना……………पुरुष ऐसा कभी नही कर पाता है……………कभी उसके अंतस मे ना उतर पाता है शायद जानता सब है मगर उसका अहम कभी आगे नही आने देता उसके जज़्बातों को और रिश्ता बिस्तर तक ही सिमट कर रह जाता है। आपने जिस तरह से भावों को समेटा है उसके लिये शब्द नही हैं मेरे पास बस उसे महसूस कर सकती हूँ क्यूँकि दर्द की अपनी जुबान होती है।

Coral said...

bahut achhe

kshama said...

Uf! Kitna dard hai isme! Na jane kis kis ke aise naseeb hote honge! Kamse kam man kaa thoda bojh halka hua yah jaanke ki,kathanayika apne dard ko derse sahi vacha to de saki!

Arvind Mishra said...

अटूट रिश्ता ! सुन्दर कहानी !

arvind said...

बहुत ही सुन्दर कहानी...मनोभाव और अंतर्मन की ब्यथा को काफी खुब्सुरती से प्रगट किया है ....बधाइ.

वाणी गीत said...

रिश्तों की पड़ताल करती अच्छी कहानी ...!

चला बिहारी ब्लॉगर बनने said...

निर्मला जी, परिबारिक समबंधों को उजागर करता हुआ एगो सम्वेदनशील कथा... ऊ रिश्ता का सार्थकता को भी रेखांकित करता है जिसमें स्वार्थ का कोनो जगह नहीं. बेहद स्पष्ट!!

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

सुन्दर शब्दों में लिखी कथा बहुत बढ़िया रही!

nirmla.kapila said...

mera gmail nahin khul raha kya koI batayega ki kyaa problem hai?

nirmla.kapila said...

मैने कल जी मेल का पास वर्ड बदला था आज सुबह लागिन हो गया मगर शाम को नही हो रहा। क्या कोई बतायेगा कि क्या प्राबलेम है?

ताऊ रामपुरिया said...

मन और रिश्तों की सुंदर कहानी, बहुत ही सशक्त, नमन है आपको.

रामराम.

ताऊ रामपुरिया said...

आपका जीमेल नही खुल रहा है तो देखिये आपने कहीं Caps Lock आन करके तो पासवर्ड नही डाल रही हैं? ये सही है तो अपने ब्राऊजर की cookies डिलीट करके देखियेगा.

रामराम.

प्रवीण पाण्डेय said...

बड़ी ही सुन्दर कहानी। बीच में कुछ कड़ियाँ छूटी अवश्य हैं पर लय वापस आ गयी।

महफूज़ अली said...

बहुत ही सुन्दर कहानी...

JHAROKHA said...

aadarniya mam ,
aapki pahali kahani to nahi padh paai thi par aapne jo
purvaansh likha usase saari kahani
spashht ho gai.
bahut hi marm-sparshi kahaani,
poonam

डा. अरुणा कपूर. said...

रिश्तों की अहमियत पर आपने प्रकाश डाला है.... कहानी दिल को छू रही है...बधाई!

पं.डी.के.शर्मा"वत्स" said...
This comment has been removed by the author.
पं.डी.के.शर्मा"वत्स" said...

बेहतरीन कथा! सच कहूँ तो पूरी तरह से समझने के लिए पहले पिछली कडी दोबारा से पढनी पडी. क्यों कि कई दिन बीतने के कारण इसका पिछला भाग दिमाग से निकल चुका था....

Mrs. Asha Joglekar said...

बढिया कहानी है निर्मला जी । कितना दर्द है इसमें पर अंत पसंद आया एक दूसरे का साथ हो तो दर्द भी बंट जाता है छट जाता है ।

राज भाटिय़ा said...

बहुत सुंदर कहानी, लेकिन हमारी टिपण्णी नही दिखाई दी पहले वाली. धन्यवाद

अनामिका की सदायें ...... said...

हमेशा की तरह बहुत सुंदर लगी आपकी ये कहानी भी बिलकुल सच की जिंदगी का पहलु पकडे हुए. ये कहानी है, लेकिन अगर ये किसी की सच्ची कहानी होती तो कुछ बाते जो सवाल बन कर उठ जाती है वो ये हैं की...
क्या एक दुब्ब्ली पतली सी २२-२३ साल की लड़की गृहस्थ का, नौकरी का, सौतेले बच्चो का, मुर्गीखाने का ये सब एक दम आते ही उठा सकती है ?

दूसरा जब सास ने अपने बचपन में खुद इतने दुःख देखे थे तो वो बेटे बहु को सुख से वंचित कैसे रख सकती है इतनी भावुक होने के बावजूद.

तीसरी बात ये की जो बहु तमाम उर्म सब की नज़रों में अच्छी बनी रही तो सिर्फ एक आखिर में हक मांगने से बुरी कैसे बन गयी...क्या लोगो की सोच शक्ति एक दम कुंद हो जाती है , उन्हें उसके त्याग दिखाई नहीं देते ?

ये सिर्फ कहानी पढ़ कर मन की कश्मोकाश है ...जिसे मैंने आपके साथ शेयर किया...

आपकी कहानिया ऐसी नहीं जो भुलाई जा सके...काफी लंबे समय तक याद रहती हैं.
बधाई.

राजभाषा हिंदी said...

आपको और आपके परिवार के सभी सदस्यों को स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं और बधाई।

राजभाषा हिंदी said...

आपको और आपके परिवार के सभी सदस्यों को स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं और बधाई।

देवेश प्रताप said...

देर से आने के लिए माफ़ी चाहता हूँ ......दोनों कड़ी पढ़ कर टिपण्णी करूँगा ......आपको स्वतंत्रता दिवस कि ढेर सारी शुभकामनाएं .

निर्मला कपिला said...

अनामिका जी यही तो सवाल हैं जो उस नायिका के मन मे अब उठते हैं लेकिन जब वो दुनिया के दस्तूर से अनजान थी तो उसके मन मे कुछ अच्छा आदर्शवादी दिखाने की ललक थी उसी उत्साह से उसमे इतना साहस आया कि सब कुछ कर सके। सासू जी ने बहुत सुख झेले थे इसी लिये उसे दुनिया का दस्तूर पता था और उसे चिन्ता थी बिन माँ के बच्चों की--- इस लिये उसने अपना सारा ध्यान उन बच्चों के लिये लगा दिया। क्यों कि उसने खुद बिन माँ के बच्चों का संताप झेला था। उसने नायिका से कभी लडाई झगडा नही किया बस मीठी बन कर अन्दर खाते उन बच्चों के लिये ही जीती रही शायद इस मे उसे दूसरों के जज़्वात समझने का अवसर नही मिला फिर नायिका ने भी तो अच्छी बनने की धुन मे कभी प्रतिकार नही किया। आपने कहानी इतनी अच्छी तरह पढी इसके लिये धन्यवाद। सभी पठकों का भी धन्यवाद। स्वतन्त्रता दिवस की सभी को शुभकामनायें

कविता रावत said...

Rishton kee dor mein bandhi apke gahre anubhav se darshati jiwan ke kahani dil mein gahre utar kar dil chhu gayee...
स्वतन्त्रता दिवस की सभी को शुभकामनायें

वन्दना अवस्थी दुबे said...

स्वाधीनता दिवस की अनन्त शुभकामनाएं.

रचना दीक्षित said...

निर्मला जी,

बहुत सुंदर कहानी जीवन मूल्यों और रोजकी कि जिन्दगी कि उठापटक. कहानी कि रोचकता समग्र बरक़रार रही है, बहुत बहुत बधाई. एवं आपको स्वतंत्रता दिवस पर ढेरों शुभकामनाएं.

'उदय' said...

... behatreen ....svatantrataa divas kee badhaai va shubhakaamanaayen !!!

आशीष खण्डेलवाल (Ashish Khandelwal) said...

रोचक कहानी

स्वतंत्रता दिवस की शुभकामनाएं

हैपी ब्लॉगिंग

Pran Sharma said...

kahani kee samaapti aapne aapne
badee khoobsoortee se kee hai.
Badhaaee aur shubh kamna.

Babli said...

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स्वतंत्रता दिवस के मौके पर आप एवं आपके परिवार का हार्दिक अभिनन्दन एवं शुभकामनाएँ !

ज्योति सिंह said...

swantrata divas ki anant shubhkaamnaye .kahani achhi lagi kai baate man ko chhoo gayi magar jaldi me padhne ki vajah se abhi is vishya par nahi kah paa rahi ,main bahar se lauti hoon abhi swantrata diwas ki badhai de doo didi sabko ,phir aaungi itminaan se padhne .jai hind

Vaishnavi Vandana said...

कपिलाजी बहूत दिनों बाद किसी कहानी ने अंतर्मन को छूआ है बहुत-बहुत बधाई

क्रिएटिव मंच-Creative Manch said...

रिश्तों की अहमियत और जीवन मूल्यों पर आधारित
सुंदर कहानी दिल को छू गई
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यादगार कहानी है लम्बे समय तक याद रहेगी
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बहुत आभार एवं शुभ कामनाएं

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