07 December, 2009

गुरू मन्त्र {कहानी}-------- गताँक से आगे

पिछली कडी मे आपने पढा कि मदन लाल ज अपनी पत्नि से बहुत प्रेम करते थे उसने कभी अपने लिये उनसे कुछ नहीं माँगा था मगर आज कल उसे हरिदचार जा कर गुरू धारण करने की इच्छा थी जिसे मदन लाल जी ने पूरी करने के लिये अपना स्कूटर तक बेच दिया । बेशक उन्हें इस दाधु सन्तों पर इतना विश्वास नहीं था मगर पत्नी के मन को ठेस पहुँचाना नहीं चाहते थे। वो उसे ले कर हरोदवार पहुँचे और आश्रम मे एक कमरा किराये पर ले लिया। और धर्म के नाम पर जो लूट और धर्मिक सन्तों का वैभव देखा उसने उसके मन मे इन बाबाओं के प्रति और भी नफरत भर दी। अगर वो अपनी पत्नि को घर बैठ कर ही सब कुछ बताते तो शायद वो उन्हें नास्तिक कहती मगर प्रत्यक्ष रूप मे सामने सब कुछ देख कर सन्ध्या पर क्या असर हुया ये पढिये आगे------

दन लाल जी बहुत परेशान हो गए थे । आज कमरे का किराया भी पड़  गया । अगर कल भी समय रहते काम न हुआ तो एक दिन का किराया और पड़ जायेगा । उनके पास एक हजार रू बचा था । 280 / रू जाने का किराया भी लग जायेगा । उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि क्या करें। मदन लाल जी कुछ सोच कर उठे और बाहर चल दिए । आज चाहे उन्हें कुछ भी करना पडे वह करेंगे । जब गंरू जी का काम चोर दरवाजे से चलता है तो वो भी थोड़ा झूठ बोलकर काम निकलवा लेंगे । सोचते हुए वो  पिछले दरवाजे की तरफ गए तो उन्हें गुरू जी का एक सेवक् मिल गया । पिछले दरवाजे पर अभी भी कुछ लोग अन्दर आ- जा रहें थे । मदन लाल जी आगे लपके ‘महाराज, देखिए मैं एक अखबार का प्रतिनिधि हू । मेरे पास छुटटी नही है अगर इन लोगों के साथ हमें भी गुरू जी के साथ मिलवा दें तो बड़ी कृपा होगी । अखबार में इस आश्रम के बारे में जो कहें लिख दूगा । नही तो निराश  होकर जाना पड़ेगा ।" मदन लाल जी ने झूठ का सहारा लिया।

 ‘‘ठीक है आप 15-20 मिनट बाद आना, मैं कुछ करता हूं ‘‘ वह कुछ सतर्क सा होकर बोला ।

मदन लाल जी मन ही मन खुश हो गए । उनका तीर ठिकाने पर लगा था । वह जल्दी से अपने कमरे कें गए और संध्या को साथ लेकर उसी जगह वापिस आ गए । संध्या के पांव धरती पर नहीं पड़ रहे थे । इस समय वह अपने को मंत्री जी से कम नहीं समझ रही थी । उसके चेहरे की गर्वोन्नति देख मदन लाल जी मन ही मन उसकी सादगी पर  मुरूकराए । वो सोच रही थी कि यह उसकी भक्ति और आस्था की ही चमत्कार है जो गुरू जी ने इस समय उन पर कृपा की है । उसने मदन लाल की तरफ देखा ‘‘ देखा गुरू जी की महानता ।‘‘ वो  हस पड़े ।


पाच मिनट में ही वो सेवक  उन्हें गुरू जी के कमरे में ले गया । संध्या ने दुआर पर नाक रगड़ कर माथा टेका । जैसे ही उसने अंदर कदम रखा उसे लगा वह स्वर्ग के किसी महल में आ गई है । ठंडी हवा के झोंके से वह आत्म विभोर हो गई । उसने पहली बार वातानुकूल कमरे को देखा था । उसके पाँव किसी नर्म चीज में धंसे  जा रहे थे । उसने नीचे देखा, सुन्दर रंगीन गलीचा बिछा था, इतना सुन्दर गलीचा उसने जीवन में पहली बार देखा था । कमरे में तीन तरफ बड़े- 2 गददेदार सोफे थे । छत पर बड़ा सा खूबसूरत फानूस लटक रहा  था । कमरे की सजावट देख कर लग रहा था कि वह किसी राजा के राजमहल का कमरा था । सामने गुरू जी का भव्य आसन था । और कमरे मे दो जवान सुन्दर परिचातिकायें सफेद साडियों मे  खडी थीं।वि आगे बढे और  दोनों ने गुरू जी के चरणों में माथा टेका । संध्या ने गुरू दक्षिणा भेंट की । गुरू जी ने आशीर्वाद दिया । वों दोनों आसन के सामने गलीचे पर बैठ गए ।

 

‘‘ देखो बच्चा, हमें किसी चीज का लोभ नही । मगर भक्तों की श्रद्धा का हमें सम्मान करना पड़ता है । उनकी आत्म संतुष्टी में ही हमारी खुशी है । बहुत दूर-2 से भक्त आते है । विदेशों में भी हमारे बहुत शिष्य  है । यह इतना बड़ा आश्रम भक्तों की श्रदा और दान से ही बना है ।‘‘ मदन ला जी मन ही मन समझ रहें थे कि गुरू जी उन्हें यह सब क्यों बता रहे है ।

‘‘स्वामी जी मेरी पत्नि टेलिविजन पर आपका प्रवचन सुनती रहती है । इसकी बड़ी इच्छा थी कि आपसे गुरू मंत्र ले । ‘‘ मदन लाल जी अपना काम जलदी करवाना चाहते थे । उन्हें डर था कि कहीं गुरु जी ने अखवार के बारे में पूछ लिया तो संध्या के सामने भेद खुल जाएगा ।

 ‘‘बेटी तुम राम-2 का जप करा करो यही तुम्हारा गुरू मंत्र है ।‘‘संध्या ने सिर झुकाया ‘‘पर गुरू जी मुझे पूजा -विधि बिधान नही आता । भगवान को कैसे पाया जा सकता है ? ‘‘ संध्या की बात पूरी नही हुई थी कि गुरु जी के टेलिफोन की घंटी बज गई । गुरू जी बात करते-2 उठ गए । पता नही किससे फोन पर बात हो रही थी कि। उन्हें गुस्सा आ गया और वो बात करते-2 दूसरे कमरे में चले गए ----- उन दोनों के कान में इतनी बात पड़ी ------ "उस साले की इतली हिम्मत ? मैं मंत्री जी से बात करता हू ------‘‘


मदन लाल और संध्या का मन कसैला सा हो गया । आधे धंटे बाद उनके एक सेवक  ने आकर बताया कि अब गुरू जी नही आ पाएगे । उनका मूड ठीक नही है, कोई समस्या आ गई है ।वो दोनो निराश  से बाहर आ गए ।

दोनो के मन मे एक ही सवाल था क्या संतों का मूड भी खराब होता है? अगर ये लोग अपने मन पर काबू नहीं पा सकते तो लोगों को क्या शिक्षा देते होंगे। क्या इन लोगों को भी क्रोध आता है? क्या ये लोग भी अपशब्द बोलते हैं -- ये लोग हम से अधिक भौतिक सुखों भोगते हैं। स्वामी जी के कमरे मे कितना बडा एल सी डी लगा था।----- ऐसे कई प्रश्न----

 ‘‘संध्या ! आने से पहले तुम्हारे मन में जो स्वामी जी की तस्वीर थी क्या अब भी वैसी ही है ?"

‘‘पता नही जी, मैंने तो सोचा भी नहीं था कि साधु संत इतने वैभव-ऐश्वर्य में रहते है । खैर ! वो गुरू जी हैं, अन्तर्यामी है उन्होने मेरी सच्ची आस्था को समझा तभी तो इतने लोगों को छोड़कर हम पर कृपा की ‘‘ संध्या अपनी आस्था को टूटने नहीं देना चाहती थी ।

‘‘तुम जैसे भोले लोग ही तो इनके वैभव का राज है । तुम जानती हो कि हम लोगों को क्यों पहले बुलाया ?"

‘‘क्यों?", संध्या हैरानी से मदन लाल को देख रही थी । मदन लाल ने उसे नूरी बात बताई कि किस तरह उन्होंने पत्रकार बनकर सेवक को पटाया था । क्योंकि उनके पास पैसे भी कम पड़ रहें थे । उधर मुनीम जी उनकी नौकरी से छुट्‌टी न कर दें ।‘‘

" पता नहीं जी यह सब क्या है ?" क्या सच? मैं तो समझी गुरू जी अन्तर्यामी हैं--वो मेरी आस्था को जान गये हैं इस लिये जल्दी बुलाया है?संध्या ने मदनला की ओरे देखा।

‘‘फिर तुमने देखा फोन पर बात करने का ढंग ? गाली देकर बात करना फिर मंत्री जी की धोंस दिखाना, क्रोध में आना क्या यह साधु संतों का काम है?"अगर साधू सन्तो मे धैर्य न हो तो वो भक्तों को क्या शिक्षा देंगे?क्या ये सब साधू संतों का आचरण है?: मदन लाल सन्ध्या की मृगत्रिष्णा मे सेंध लगाने की कोशिश कर रहे थे।

"फिर देखो साधू सन्तों का रहन सहन क्या इतना भैववशाली होना चाहिये?वातानुकूल महलनुमां कमरे,बडी बडी ए सी गाडियाँ अमीर गरीब मे भेद भाव। तुम ही बताओ क्या ये हम जैसे भोले भाले लोगों को गुमराह नहीं कर रहे?हमे कहते हैं भौतिक वस्तुयों से परहेज करो धन से प्यार न करो,और हम से धन ले कर उसका उपयोग अपने सुख भैवव के लिये कर रहे हैं।" मदन लाल ने एक और कील ठोंकी।

":देखो जी मुझे तो कुछ समझ नहीं आ रहा।फिर भी सब कुछ ठीक ठाक सा नहीं लगा।"

"संध्या आज वो साधू सन्त नहीं रहे जो लोगों को धर्म का मार्ग बताते थे। खुद झोंपडिओं मे रहकर लोगों को सुख त्याग करने का उदहारण पेश करते थे। आज धर्म के नाम पर केवल व्यापार हो रहा है। किसकी दुकान कितनी उँची है ये भक्त तय करते हैं। कुकरमुत्तोंकी तरह उगते ये आश्रम असल मे दुकानदारी है व्यापार है चोर बाज़ारी है जहाँ अपराधी लोग शरण पाते हैं और फिर कितना खून खराबा इन लोगों दुआरा करवाया जाता है लोगों की भावनायों को भडका कर राजनेताओं को लाभ पहुँचाना आदि काम भी यही लोग करते हैं। मैं ये नहीं कहता कि सब ऐसे होंगे अगर कोई अच्छा होगा भी तो लाखों मे एक जो सामने नहीं आते। लाखों रुपये खरच कर ये टी वी पर अपना प्रोग्राम दिखाते हैं जहाँ से तुम जैसे मूर्ख इन के साथ जुड जाते हैं। अगर इन्हें धर्म का प्रचार करना है तो गली गली घूम कर धर्मस्थानों पर जा कर करें वहाँ जो रूखा सूखा मिले उस खा कर  आगे च्लें मगर लालच वैभव और मुफ्त का माल छकने के लिये ये बाबा बन जाते हैं।" मदन लाल जी अपना काम कर चुके थे।

 चलो इसी बहाने तुम ने कुछ क्षण ही सही वातानुकूल कमरे.गद्देदार कालीन का आनन्द तो उठा लिया ? साधु-सन्तों का मायाजाल भी देख लिया, अपना मायाजाल तोड कर ।ऎसे साधुयों के काराण ही तो लोग धर्म विमुख हो रहे हैं।" मदन लाल को लगा कि अब वो सन्धया की मृग त्रिष्णा को भेद चुके हैं।

   सन्ध्या सब समझ गयी थी।वो मदन लाल से आँख नहीं मिला पा रही थी।उसकी आस्था ऐसे सन्तों से टूट चुकी थी।उसे आज मदन लाल जी इन सन्तों से महान नज़र आ रहे थे जिन्हों ने अपना स्कूटर बेच कर उसका मन रखने के लिये अपने सुख का त्याग किया था।अब उन्हें रोज़ पैदल ही दफ्तर जाना पडेगा। सच्चा मन्त्र तो ईश्वर की बताई राह पर चलना है। मगर मैं साधन को साध्य समझ कर भटक गयी थी

 प्रेम भाव और दूसरे की खुशी के लिये अपने सुख का त्याग करना---ओह्! यही तो है वो मन्त्र! इसे मैं पहले क्यों नहीं समझ पाई? आज इस आत्मबोध को सन्ध्या ने धारण कर लिया था -गुरू-मन्त्र की तरह । 

समाप्त







26 comments:

रज़िया "राज़" said...

वाह!!!सुंदर,सचोट मदनलालजी के चरित्र ने ख़ूब सिख़ाया। आपके बारे में अकबरख़ान से सुना है। आप दिल की बहोत प्यारी हैं। आज पढ भी लिया। कभी मौका मिला मिल भी लेंगे।

और हाँ मेरी हर पोस्ट पर कमेंट देने के लिये आभार।

पी.सी.गोदियाल said...

बेहद खूब ! लाजबाब कहानी अज के इन गुरुओ की असलियत को उजागर करती हुई !

अजय कुमार said...

’एक दूसरे की खुशी के लिये सुख का त्याग करना”
बहुत अच्छा संदेश

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

सुंदर कहानी! निर्गुणी संतों ने गुरू का महत्व स्थापित किया था। उसे भुनाने वाले दुकानदार रह गए हैं अब!

खुशदीप सहगल said...

तुम जैसे भोले लोग ही तो इनके वैभव का राज हैं...

और करोड़ों का चढ़ावा इनकी ऐश और अय्याशी का...

जय हिंद...

रंजना [रंजू भाटिया] said...

बहुत ही अदभुत रही यह कहानी ..अच्छा सन्देश और अंत तक बांधे रखा इस कहानी ने शुक्रिया

अनिल कान्त : said...

असलियत उजागर करती और एक अच्च्ची सीख देती रचना पढ़कर मान प्रसन्न हो गया .

दिगम्बर नासवा said...

निश्चल प्रेम ही परमात्मा को पाने का सीधा रास्ता है ......... जो संध्या ने मदन लाल में पा लिया ........
ऐसे ढोंगियों की पोल खोलती अच्छी कहानी .........

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

धरातल से जुड़ी यह कथा बहुत बढ़िया रही!

Kusum Thakur said...

इस अच्छी कहानी को हम तक पहुँचाने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद !

sada said...

सुन्‍दर संदेश के साथ बहुत ही अच्‍छी लगी कहानी, आभार ।

वाणी गीत said...

प्रेम भाव और दूसरों के सुख के लिए अपनी ख़ुशी का त्याग करना ...सच यही है सबसे बड़ा गुरुमंत्र ...जिसने यह मंत्र समझ लिया उसे किसी को गुरु बनाने कि आवश्यकता नहीं ....कम से कम ऐसे ढोंगी गुरुओंकी तो कत्तई नहीं ...!!

डॉ टी एस दराल said...

सार्थक रचना।
आज खुशदीप ने भी कुछ ऐसा ही लिखा है।
खुशी होती है ये जानकर की और लोग भी हमारी तरह सोचते हैं।

KAVITA RAWAT said...

Sachha sukh dusari ko apne sukh ka hisa dekar hi milta hai. Bahut hi acchi kahani lagi. Maaji or aapko bahut Bahut shubhkamnayne.

मनोज कुमार said...

कहानी बेहद पसंद आई।

AlbelaKhatri.com said...

एक घृणित सच की काली परछाइयों को निर्ममता पूर्वक नग्न करके वास्तविकता का साक्षात्कार कराती इस पोस्ट से कई लोगों की आँखें खुलेंगी...........ऐसा मेरा विश्वास है...........

आपका बारम्बार वन्दन !

अभिनन्दन !
अभिनन्दन !
अभिनन्दन !

पं.डी.के.शर्मा"वत्स" said...

ढोंगियों की बहुत अच्छे से पोल खोली आपने.....कहानी इतनी बढिया लगी कि क्या कहें...अन्त तक बाँधे रखा ।
"प्रेम भाव और दूसरे की खुशी के लिए अपने सुख का त्याग करना"...सचमुच यही सबसे बडा गुरूमन्त्र है, जिसने इतना समझ लिया, उसे फिर किसी गुरु की जरूरत भी नहीं ।

JHAROKHA said...

Adaraneeya Nirmala ji,
Apane aj ke samaj men in dhongee babaon dvara failaye gaye pakhand ko bahut badhiya dhang se prastut kiya hai.bahut badhiya lagee apakee yah kahanee.
shubhkamanayen.
Poonam

M.A.Sharma "सेहर" said...

Ant bhala so sab bhala....!!poora mayajaal hai ji...vaibhav va sabhee sadhno se bharpoor...

Akrosh bhee hota hai ...

udhar ka chalava dekhkar...

aur idhar kee agyaanta dekhkar..

sangeeta said...

nirmala ji,

sach is kahani ke madhyam se aapne guru mantr de diya hai ki doosaron ke liye prem aur khushi dena hi sachcha gurumantr hai....achchhi kahani ke liye bahut bahut badhai

rashmi ravija said...

आपके लिखने की शैली ने अंत तक रोचकता बनाए रखी...संध्या ने अपने आँखों से गुरु जी की असलियत देख ली और उसके आंख खुल गए...वरना कितना भी समझाने पर उसकी समझ में नहीं आता...बहुत ही शिक्षाप्रद और प्रेरणादायक कहानी है

वन्दना said...

ek achcha sandesh deti bahut hi badhiya kahani .

रंजना said...

IS SUNDAR PRERNAPRAD KATHA KE LIYE AAPKA BAHUT BAHUT AABHAR.....BAHUT SAHI KAHA AAPNE..DHARM KEE DUKAAN CHALANE WAALE IN LOGON NE DHARM KO VYAVSAAY BANA RAKHA HAI....

KAHTE HAIN N KI SADHU SANT JANGALON ME MILTE HAIN,SACHMUCH AAJ BHI SADHU SANT JANGALON ME HI MILTE HAIN JO SADA JEEVAN UCHCH VICHAAR ME AASTHA RAKHTE HUE LOGON KA HIT SAADHTE RAHTE HAIN...

ज्योति सिंह said...

kahani kafi rochak rahi ,aage ke kuchh bhag ke bhi ansh padhe ,gyanvardhak rachna ,sahi kaha dharam ke naam pe bahut dhong hote hai .

Jogi said...

:) ..What a guru mantra ..The only one line meaning of life ...maine bhi dhaaran kar liya hai :) ..Thanks

Mrs. Asha Joglekar said...

आपकी कहानी बहुत सुंदर है . अंत में जब संध्या को सच्चा गुरुमंत्र मिल जाता है और पति ही उसके सच्चे गुरु साबित होते हैं आपकी लेखन शैली पाठक को बांध कर रखती है । पीछे जाकर मैने पहले दोनो भाग भी पढे ।

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