08 October, 2009

दोहरे माप दंड ---कहानी [गताँक से आगे

पिछली बार आपने पढा
कि रिचा और रिया दोनो स्कूल मे इकठी पढती थीं । दोनो सहेलियाँ थी। रिया शहर मे और रिचा साथ लगते गाँव मे रहती थी। जिस दिन स्कूल मे छुटियाँ हुई उस दिन जब रिचा स्कूल से घर नहीं पहुँची तो उसके घर वालों को चिन्ता हुई। उसके पिता पोलिस मे केस दर्ज नहीं करवाना चाहते थे। सभी इसी सोच मे थे कि क्या किया जाये उसे कहाँ ढूँढा जाये। tतभी पता चला कि वो खून् से लथपथ खेत मे पडी है उसे असपताल लाया गया। पोलिस मे केस दर्ज हुया मगर रिचा के पिता ने उसे मना कर दिया कि किसी का नाम मत बताये क्योंकि उन्हें रिचा ने बता दिया था कि वो साथ के गाँव के ्रपंच का बेटा था रिचा घर आ गयी। मगर उसे किसी से बात करने की इजाजत नहीं थी वो अकेली अन्दर बैठी आँसू बहाती रहती उसकी सहेली रिया उससे मिलने आती है। रिचा रिया को बताती है कि कैसे उसके दिल मे एक लावा सा फूट रहा है घर वालों .समाज और उन दरिन्दों के लिये। औसके पढने पर भी प्रतिबँध लग जाता है रिया उसे आश्वासन देती है कि वो अपने माँ बाप को कह कर उसके घर वालों को समझायेगी। ्रिया के पिता के समझाने पर रिचा के पिता उसे घर मे ही पढने की इजाजत दे देते हैं उसकी शादी के लिये भी कोशिश शुरु हो जाती है रिया के पिता उसका रिश्ता अपने पडोसी रवि से करवा देते हैं जिसकी पत्नि की मौत हो चुकी हओ रवि अच्छा लडका है मगर उसकी माँ इस रिश्ते से खुश नेहीं थी और रिचा को तंग करती रहती थी। अब आगे पढिये-------



घर आ कर मै अपनी माँ की गोद मे सिर रख कर खूब रोई। क्या सच मे एक लडकी इतनी कमज़ोर और बेबस होती है?बिना किसी कसूर के हर तरफ से उसे ही सज़ा? मैने माँ और पिता जी को सारी बातें बतायी।फिर माँ और पिता जे के साथ दो तीन बार उनके घर गयी । पिताजी ने धीरे धीरी उसके पिता से उसके बारे मे बात की कि इसे अब स्कूल भेजना चाहिये मगर वो स्कूल भेजने के लिये किसी तरह भी राज़ी ना हुये।मगर पिता जी के बहुत समझाने पर उसके पिता उसे घर रह कर पढाने के लिये मान गये। उसने अब घर रह कर पढना शुरू कर दिया मै हर दूसरे तीसरे दिन उसके घर चली जाती । उसने पलस टू के बाद घर मे ही बी.ए करनी शुरू कर दी और मैने इन्जनीरिन्ग मे प्रवेश ले लिया। उसके माँ बाप उसके लिये लडका ढूँढने लगे। वो जल्दी से उसकी शादी कर देना चाहते थे ।अभी 18 साल की भी पूरी नहीं हुई थी। वो जहाँ भी बात चलाते, वहीं उसके अतीत की परछाई पहले पहुँच जाती। अब तो हम लोग भी चाहते थे कि उसकी शादी हो ही जाये तो सही रहेगा ।इन हालात मे वो अच्छी तरह पढ भी नहीं पा रही थी।

हमारे पडोस मे धर्मपाल जी रहते थे।उनके एक बेटा और दो बेटियां थी।उनका लडका रवि जिस कीदो वर्श पहले शादी हो चुकी थी,मगर शादी के बाद बहुएक बेटे को जन देते ही दुनिया से विदा ले गयी। छोटा सा बच्चा अपनी दादी के पास पलने लगा।रवि की नौकरी दिल्ली मे थी । उसके माँ बाप चाहते थे कि उसकी दोबारा शादी कर दें तो बच्चे को माँ मिल जायेगी ।एक दिन मेरी मम्मी ने ये रिश्ता सुझाया मेरे पिता जी ने रिचा के पिता से बात की। उन्हें क्या आपति हो सकती थी जानते थे कि उनकी बेटी को अब इस से अच्छा घर और लडका नहीं मिल सकता। उसे जो दाग लग गया है इस के साथ इसे कौन स्वीकार करेगा वही जिसमे खुद मे कोई कमी होगी। मगर रवि बहुत अच्छा लडका था पडोस मे होने के कारण हम लोग इकठे खेला भी करते थे मेर अच्छा दोस्त था वो। पिता जे ने और मैने रवि को समझाया तो वो भी मान गया।उसके घर मे सभी मान गये मगर उसकी माँ कुछ असमजस मे थी। रवि की हाँपर उसे भी मानना पडा। उसकी मां को भी यही बात सता रही थी कि लोग क्या कहेंगे कि ऐसी लडकी ही मिली थी इनके लडके को क्योंकि लडके की कोई भी कमी समाज को कमी नहीं लगती।मगर लडकी बेकसूर होते हुये भी अपराधी बन जाती है।लडके मे चाहे लाख अवगुण हों मगर लडकी 16 कला सम्पूर्ण चाहिये होती है। उनको ये भी था कि अभी अपनी लडकियों की शादियाँ करनी हैं तो उनके रिश्ते करने मे इस लडकी के कारण अडचने आयेंगी। लेकिन रवि के समझाने से उन्हें झुकना पडा।मै बहुत खुश थी इस रिश्ते से चाहे रवि एक बच्चे का बाप था मगर फिर भी हर तरह से रिचा के लिये अच्छा पति साबित होगा ये मुझे विश्वास था। वो बहुत संवेदन शील और सनझदार लडका था।वैसे भी उससे अच्छा लडका उसे और कोई मिल नहीं सकता था। शादी हो गयी और रिचा हमारे शहर मे आ गयी पडोस मे होने से मुझे तो खुशी थी ही मगर वो भी खुश थी ।

रवि ने दो महीने की चुटी ले रखी थी। उन दो महीनों मे रिचा के मुँह पर् रोनक लौटने लगी थी।ब्च्चे को वो ऐसे सम्भालती जैसे उसकी सगी माँ हो। शायद उसे ये भी एहसास हो गया था कि रवि एक अच्छा पति है जो उसकी भावनाओं का ध्यान रखता है तो उसे भी अपना ्र्तव्य अच्छी तरह से निभाना है।रवि ने उसे पूरा प्यार दिया उससे कभी उस हादसे का ज़िक्र नहीं किया ना ही उसे एहसास होने दिया कि उसमे कोई दोश है। समाज मे विरले ही ऐसे लोग होते हैं। अब रिचा को भी विश्वास होने लगा कि पाँचों उँगलियाँ बराबर नहीं होती समाज मे अच्छे बुरे सब तरह के लोग होते हैं। दो महीने की छुट्टी के बाद रवि दिल्ली चला गया अपनी ड्यूटी पर।उसका विचार था कि दिल्ली मे मकान ढूँढ कर फिर रिचा को साथ ले जायेगा। दूसरी बात कि रिचा तब तक बच्चे को सम्भालना नहलाना भी सीख लेगी। रवि की माँ पुराने विचारों की औरत थी। र्वि के कारण चाहे उसने शादी की रज़ामंदी दे दी थी मगर अन्दर ही अन्दर उसे रिचा का अतीत कचोटता रहता । आस पडोस की कोई औरत कभी सहानुभूति जताने के बहाने बात छेड लेती तो वो तिलमिला उठती। उसे रिचा का बन ठन कर रहना भी अच्छा न लगता था।बेटियों के रिश्ते की बात कहीं नहीं बनती तो रिचा के सिर भँडा फोड देती।* मै पहले ही कहती थीहमारी बेटियों को कोई अपनी बहु नहीं बनायेगा इस कुलटा के कारण । रवि के जाने के बाद वो उसे काफी रोकने टोकने लगी थी।,पर रिचा कोई जवाब न देती। कई बार मैं उसे बाज़ार ले जाती तो आते ही उसे ताने सुनाने लगती।---* मुझे तुम्हारा कहीं जाना अच्छा नहीं लगता।कहीं पहले जैसी कोई बात हो गयी तो हमारी भी नाक कटवायेगी।* रिचा अन्दर ही अन्दर आहत हो जाती।रवो को पत्र लिखती या फोन करती तो भी माँ की बातें न बताती। वो रवि की एहसान मंद थी कि कम से कम उसने उसका हाथ थामने की हिम्मत तो की।

रवि के कहने पर उसने आगे पढाई भी शुरू कर दी। रिचा उस दिन सारी रात सो न पाई थी।सुबह देर से आंम्ख खुली तो सास गर्म हो गयी।मगर वो कुछ न बोली।सरा काम जल्दी से खत्म किया। आज वो बाज़ार जाना चाहती थी।ागले हफ्ते रवि का जन्म दिन था उसके लिये कोई तोह्फा खरीदना चाह्ती थी।उसने अपनी ननद को साथ चलने के लिये कहा तो उसने मना कर दिया।------ * न बाबा न तेरे साथ नहीं जा सकती।मैं ही ला देती हूँ जो मंगवाना है।* *नहीं दीदी मैं अपनी पसंद से लेना चाहती हूँ।* उधर उसकी सास सुन रही थी ,बोल पडी * हाँ हँ इसे तो बाहर घूमने के लिये बहाना चाहिये। मायके मे भी तो ऐसे ही घूमती थी तभी तो बदमाश उठा कर ले गये।* *माँ क्या ऐसा खतरामुझे ही है भगवान से डरिये,अप बेटियों की मा होकर भी ऐसी बातें करती हैं। * कह कर रिचा अंदर चली गयी और रोने लगी।

आज मेरी दादी ने उसकी यही बात सुनी थी सास ने क्या कहा ये उन्होंने ध्यान नहीं दिया। जिस से दादी पर मुझे भी गुस्सा आ गया था। अपना गुस्सा शाँत होने पर मैने दादी को सारी बात बताई।कि उसकी सास किस तरह के ताने उसे देती है ।तब दादी को भी बुरा लगा। क्रमश: अगले दिन मैं अभी सोयी हुई थी कि पिता जी के कमरे से कुछ आवाज़ें आ राही थी मै उठ खडी हुई । उनके कमरे मे जा कर देखा तो रिचा की सास रो रही थी और रिचा सकते की हालत मे खडी थी। उनकी छोटी बेटी घर से गायब थी।जब वो सुबह पाँच बजे उठे तो आशा उनकी बेटी अपने बेड पर नहीं थी।इस लिये वो पिता जी के पास सहायता के लिये आयी थी। मैं जानती थी कि उसका किसी लडके के साथ अफेयर चल रहा है वो जरूर उसके साथ भाग गयी होगी।एक बार तो मन मे आया कि चुप रहूँ इसकी भी बदनामी हो तो रिचा का दर्द ये समझे। लेकिन मैं ऐसा न कर सकी। बदले की भावना से एक लडकी की ज़िन्दगी क्यों बर्बाद होने दूंम फिर रवि को कितना दुख होगा जब उसे पता चलेगा। मैने अपना शक पिता जी को बताया।पिता जी भी समझ गये। उन्होंने उन्हें समझा कर घर भेज दिया कि मैं देखता हूँ।अप वो रिचा के ससुर को ले कर थाने चले गये।थाने के एस़ एच़ औ पिता जी के दोस्त थे।उन्हों ने सारी बात सुन कर तुरन्त गुप चुप तरीके से कार्यवाई की और -23 घन्टे मे लडकी बरामद कर ली।मामला लडकी की इज़्जत का था सो केस दर्ज नहीं करवाया। लडकी घर वापिस आ गयी।

रिचा के घर मे आज सुबह से ही शाँति थी नहीं तो सुबह उठते ही रिचा के पीछे पड जाती थी। रवि को रात ही फोन कर दिया था।दोपहर तक वो पहुँचने वाला था। आज मुझे भी मौका मुल गया था और मैने सोच लिया था कि अब रिचा के दुखों का अन्त कर दूँगी। उसे सब कुछ बता दूँगी। दोपहर को वो घ आया मैने सोचा अभी खा पी ले बाद मे शाम को बात करूँगी। सारे शहर मी बात फैल गयी थी। शाम को पाँच बजे मैं रिचा के घर पहुँची। सभी एक कमरे मे बैठे थे।रवि अपनी बहन को डाँट रहा था मुझ से कोई लुकाव छुपाव तो था नहीं इस लिये बात चलती रही।थोडी देर बाद मैने अपनी बात शुरू की * देखो माँ जी जो हुया बहुत बुरा हुया।मगर सच पूछो तो रिचा के कारण आपकी कुछ इज़्जत बच गयी।क्यों कि पिता जी रिचा को अपनी बेटी मानते हैं।अज आपसे एक सवाल जरूर पूछना चाहूँगी कि आपने आज तक रिचा को इतना बुरा भला कहा रोज़ दिन मे सौ बार उसे आप उस बात का ताना देती मगर रिचा ने कभी उफ तक न की क्या उस बात मे रिचा का कोई कसूर था?। नहीं ना? आज आपकी बेटी के साथ जो हुया उसमे आपकी बेटी का कसूर है।

मुझे ये समझ नहीं आता कि एक औरत दूसरी औरत का दर्द क्यों नहीं समझती? क्यों उसके दुखों का कारण बन जाती है?* रवि हैरान सा मेरे मुँह की तरफ देख रहा था उसे तो कुछ पता नहीं था कि माँ रिचा के साथ कैसा सलूक करती है। *रवि,मैं जानती हूँ कि आप एक अच्छे इन्सान हैं। आपने रिचा को बहुत सम्मन और प्यार दिया मगर आपके जाने के बाद जो उसे सहना पडा वो अगर मैं होती तो कब की घर चोड कर चली जाती।ाब कहीं ऐसा न हो कि उसकी सहनशक्ति जवाब दे जाये इस लिये मैं एक बहन और दोस्त के नाते चाहती हूँ कि तुम रिचा को अपने साथ ले जाओ।* * नहीं नहीं बेटा मुझे माफ कर दो। मैं रिचा के पाँव पकड कर माफी माँगती हूँ कि मैने उसका दिल दुखाया है।* वो सच मुच रिचा के पाँ पकडने लगी। * नहीं नहीं मा जी मुझ पर पाप मत चढायें* वो पीछे हट गयी। रवि कब से सब कुछ सिन रहा था एक दम से उठा *रिचा चलो सामान बान्धो, हमे आज ही निकलना है।* * सुनो कोई मेरी भी सुनो।* रिचा जोर से बोली देखो रवि मुझे किसी से कोई शिकायत नहीं है। माँ जी ने मुझे जो भी कहा वो अपनी तरफ से सही हैं जो समाज से इन्होंने लिया सीखा वही कहा । वो समाज का हिस्सा हैं और समाज्के लोग दूसरों की इज़्जत को इज़्जत नहीं समझते झट से दूसरे की तरफ उँगली उठा देते हैं ये नहीं सोचते कि एक उंगली दूसरे की तरफ उठी है तो चार अपनी तरफ भी उठी हैं। फिर जब तक अपना हाथ न जले जलन का एहसास कैसे हो सकता है?

मुझे इतना ही बहुत है कि आपने कम से कम समाज की परवाह न करते हुये मुझे अपनाया,मेरे अतीत के साथ और अपने मन से।इसलिये आज मैं इस घर को अपने मन से अपनाना चाहती हूँ।माँ और पिताजी की बेटी बनना चाहती हूँ। आज किसी से कोई गिला शिकवा नहीं है।* कह कर वो चुप हो गयी मुझे लगा कि आज उसके अन्दर का सारा लावा बह गया है। आज वो बिलकुल शाँत और दृ्ढ लग रही थी। आज उसकी सास भी समझ गयी थी लेकिन तब जब अपनी इज़्जत पर बन आयी। *आज तक जिसने जो कहा मैं मानती रह, मगर आज आप सब को मेरी बात माननी होगी ।मैं अभी तक यहीं अपने घर मे ही रहूँगी।जब तक ये बच्चा भी कुछ बडा नहीं हो जाता और दोनो बहनों की शादी नहीं हो जाती।* रवि माँ की ओरे देख रहा था कि अब बताऔ रिचा अभागिन है या हम लोग? * माँ देखा हम कितने भाग्यवान हैं जो हमे रिचा जैसी लडकी मिली?।* आज रिचा के चेहरे पर फिर से वही विश्वास लौट आया था जिसने उसके अतीत को भगा दिया था। और र्मैं सोच रही थी कि काश ये समाज नारी के प्रति कुछ संवेदन शील हो सके कम से कम नारी तो नारी की भावनाओं को समझे।उसके साथ हो रहे अन्याय से लडे न कि खुद ही उससे अन्याय करने लगे। अपनी और पराई बेटी के लिये समाज के दोहरे मापदंड क्यों, अखिर क्यों।

समाप्त

32 comments:

मुकेश कुमार तिवारी said...

निर्मला जी,

एक ऐसी कहानी जो कहानी होते हुये भी आस-पास की घटित सत्यता सी प्रतीत होती हैं। घटनाक्रम पूरे ताने-बाने में इस तरह कसा हुआ है कि पाठक हट नही सकता।

रिचा ने जिस दृढता के साथ स्थिती का सामना किया वह प्रेरणादायक है क्योंकि समाज अपने अधोपतन के इस दौर में बलात्कार, जबर्दस्ती जैसी अनेकों बीमारियों से ग्रसित है।

रवि, रिया और उसके माता-पिता ने भी रिचा के जीवन को खुशहाल बनाने के लिये समझदारी का परिचय दिया।

सादर,

मुकेश कुमार तिवारी

खुशदीप सहगल said...

निर्मला जी,
रिचा जैसी बेटियों पर हिंद को नाज़ है...
जिस समाज में रिचा जैसी बेटियों का दिल दुखाया जाए, उस समाज को ही बदल डालो...

जय हिंद...

lalit sharma said...

आज आपसे एक सवाल जरूर पूछना चाहूँगी कि आपने आज तक रिचा को इतना बुरा भला कहा रोज़ दिन मे सौ बार उसे आप उस बात का ताना देती मगर रिचा ने कभी उफ तक न की क्या उस बात मे रिचा का कोई कसूर था?। नहीं ना?
एक अन्जाम की ओर बढती हुयी कहानी,
बधाई,

mehek said...

ek bahut hi achhi kahani,samaj ka nazariya badalne ki o koshish is mein huyi hai,wo achhi lagi,satya mein bhi jamana badlega,dhire dhire,aur badal bhi raha hai.

Mithilesh dubey said...

बहुत खुब माँ जी आपकी लेखनी को सलाम। आप ने जो कुछ भी लिखा अगर देखा जाये तो हमारे आसपास की व्यथिथ घटना है। आप ने बड़ी ही सुन्दरता से समाज में फैले कूरीतियो को अपनी रचना के माध्यम से दर्शाया। कहानी का अन्त काफी सूखद रहा। और रिचा की व्यक्तित्व समाज के प्रेरणा स्रतोत है।

विनोद कुमार पांडेय said...

निर्मला जी,
कहानी बहुत संवेदनशील और सामाजिक थी, थोड़ी बहुत उतार चढ़ाव के साथ चलती हुई बहुत सुंदर अंत को प्राप्त हुई..मुझे रिचा का पात्र बहुत पसंद आया..समाज,परिवार सबके बीच सबकी सुनती हुई फिर भी अंत में जीत प्रेम की ही हुई....

बहुत बहुत बधाई!!!

sada said...

बहुत ही सुन्‍दर एवं रिचा का पात्र जो आपने गढ़ा अपनी कहानी में बहुत ही अच्‍छा लगा बधाई के साथ आभार ।

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

संवेदनाओं से भरी कहानी के लिए बधाई!

Pankaj Mishra said...

कहानी अच्छी लगी ,
आपका प्रयास अच्छा है

वन्दना said...

jis mudde ko aapne uthaya hai wo bahut hi samvedansheel hai aur aaj samaj ke har insaan ko ye samajhna hoga.........beti aur bahoo ke antar ko mitana hoga sath hi doosre ke dard ko apna samajhna hoga tabhi jagriti aayegi...........badhayi itne sundar lekhan ke liye.

दर्पण साह "दर्शन" said...

badi der main aaya last part...

...der aaiyed durust aaiyed !!

'Richa' ko meri taraf se shubh kamnaayien dijiyega.
Jaanta hoon ki wo patr hai vastvikta nahi...

...par agar jeevan ki bhaag daud main kahin koi richa mile to .....

पं.डी.के.शर्मा"वत्स" said...

निर्मला जी, आपकी ये कहानी,कहानी से अधिक एक सत्य घटना ही प्रतीत हुई......कारण कि ऎसे घटनाक्रम अपने आसपास के माहौल में यदा कदा देखने सुनने को मिल ही जाते हैं.....लेकिन आपकी प्रस्तुतिकरण ने इस कहानी के साथ अन्त तक जोडे रखा ।
आभार्!

अनिल कान्त : said...

सत्य सी प्रतीत होती है
और यही आपकी लेखनी की खासियत है

arvind said...

bahut achhi kahaani hai,vastavikta ke dharatal par likhi gayee aisee kahanee jo samaj ke galat soch par chot karti hai, kash ouratoM per atyaachar---ouraten nahi karti.shyad nadii fir se daasee bannebalee hai.

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

निर्मला जी, कहानी कई कड़ियों में पूरी हुई। दूसरी कड़ी से ही बहुत गुस्सा आ रहा है आप पर। कहानी का कथानक इतना अच्छा है कि इस पर पूरा उपन्यास लिखा जा सकता है। आप ने उसे कहानी में समेट दिया। इस कथानक में अनेक कहानियाँ बनती हैं और एक पूरा उपन्यास। उस से कथानक के चरित्र खुल कर सामने आते। न तो रिया का न रिचा का न रवि का न उस की माँ का और न ही समाज का चरित्र खुल कर सामने आया। बस उन का जिक्र हो कर रह गया। इन सब के मन में कब कब क्या क्या चलता रहा। यह सब लिखतीं तो जो बात आपने कही उस का असर कई गुना हो जाता।
मुझे लगता है आप को उपन्यास पर कलम चलाना चाहिए।

रंजना [रंजू भाटिया] said...

बहुत रोचक लगी यह कहानी ऋचा का पात्र आकर्षित करता है .सत्य के करीब है यह ..आप बहुत अच्छा लिखती है ..अंत तक रोचकता बनी रहती है शुक्रिया

rashmi ravija said...

बहुत ही सुन्दर कहानी ,वास्तविकता के करीब और एक सुखद अंत के साथ.सबसे अच्छा चरित्र मुझे रिया का लगा,ऐसी लड़कियां समाज में हो ,जो दुसरे के सुख-दुःख को अपना समझें,उनकी सहायता करने को हमेशा तत्पर रहें तो समाज का नक्शा ही बदल जाए. इश्वर करे जुल्म की शिकार हर रिचा को रिया जैसी सहेली मिले.

M.A.Sharma "सेहर" said...

उपन्यास का रूप दिया जा सकता है इस सुन्दर कथा को ......रिचा ने साबित कर दिया की नारी धैर्य, जोश, सामर्थ्य, सहनशीलता सभी गुणों से परिपूर्ण है.

अति बारीकी से उकेरा आपने रिचा के चरित्र को ...समाज के ये दोहरे मापदंड वेदना दे जातें है ...
और मैं भी (रिया) थी न कहानी में निर्मला जी ...??:)))

राज भाटिय़ा said...

बहुत ही सुंदर, लगता है हमारे आस पास ही कही इस कहानी के पात्र घुम फ़िर रहे है, ओर हम भी इन मै से एक है किसी ना किसी रुप मै.
धन्यवाद

आशुतोष दुबे 'सादिक' said...

कहानी अच्छी लगी. बहुत ही सुन्दर लिखा है आपने !
हिन्दीकुंज

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

निर्मला जी,
बहुत अच्छी कहानी. अंत भला तो सब भला. समय बदलता रहा है और आगे भी बदलेगा. अपराधियों को सज़ा मिले, बल्कि ऐसी सज़ा मिले की लोग अपराध करने से पहले ही सहम जाएँ. और इसके साथ ही बेकसूरों पर लांछन न लगे, ऐसा होने के लिए समाज में सत्यनिष्ठा के साथ साहस भी लाना पडेगा.

Udan Tashtari said...

बीच में एकाएक क्रमशः ने ध्यान बंटाया...बहुत उम्दा कहानी. बाँध कर रखा पूरे समय.

वाणी गीत said...

रिचा की हिम्मत और जीवता को नमन ...अंत भला तो सब भला...समाज के दोहरेपन को इंगित अच्छी रोचक कथा..आभार ..!!

Nirmla Kapila said...

आदर्णीय दिवेदी जी और सेहर जी आपका बहुत बहुत धन्यवाद मुझे प्रेरित करने के लिये अब इस पर जरूर उपन्यास लिखूँगी। आपने सही कहा है मगर उप्न्यास लिखने के लिये समय नहीं निकाल पा रही हूँ अभी एक उपन्यास लिखना शुरू किया है अधूरा पडा है। इसे भी जरूर पूरा करूँगी। बाकी सब का भी धन्यवाद जो समय समय पर मुझे उत्साहित करते हैं अपनी प्रतिक्रिया दे कर।

महफूज़ अली said...

Richa ko salam......... bahut hi samvedansheel kahani hai........

सर्वत एम० said...

महिला साहस, महिला अत्याचार, समाज का महिलाओं के प्रति नजरिया, यह सभी कुछ बहुत अच्छी तरह निभाया आपने. एक चीज़ जरूर कहना चाहूँगा, कहानियों में भी महिला पात्र को महिला रचनाकार भी आदर्शवादी बनाकर क्यों पेश करती हैं. जब सास क्रूर थी तो उसकी आक्रामकता का जवाब इतने शालीन ढंग से, पति के घर से चलने के मामले में भी, नहीं मैं अभी नहीं जाऊंगी....महिला पात्रों को मजबूती आप नहीं देंगी तो कौन देगा. जो जिस भाषा का जानकार है, उसे उसे उसी भाषा में जवाब मिलना चाहिए. क्या आप मुझसे सहमत हैं?

दिगम्बर नासवा said...

आज ही वापस अपने शहर पहुँचने पर आपकी इस कहानी को पूरा पढा ......बहुत ही मार्मिक पर आशा का संचार भी करती है आपकी कहानी ........कमाल का लिखा है आपने ......... रिया के माध्यम से समाज के दोहरे मापदंड को लजवाब और प्रभावी तरीके से लिखा है .........

JHAROKHA said...

Adaraneeya Nirmala ji,
itanee achchhee tarah rachee huyee,bhavanaon aura samvedanaon se paripoorna kahanee padhvane ke liye abhar.
Poonam

Nirmla Kapila said...

सर्वत जी आपकी बात से पूरी तरह सहमत नहीं हूँ। हर इन्सान को एक अवसर देना चाहिये कि वो प्यार से मान जाये। जरूरी नहीं कि हमेशा पत्थर का जवा पत्थर से दिया जाये फिर ये कहानियाँ समाज मे कुछ मुल्य स्थापित करने के लिये लिखी जाती हैं। अगर बदले की भावना से लिखें तो संदेश सही नहीं जायेगा। फिर एक अनपढ और पुराने विचारों की महिला से एक पढी लिखी महिला का अन्तर कैसे दिखेगा। नई पीढी जरूरी नहीं कि टकराव का रास्ता अपनाये। मेरा तो यही मानना है। आभार आपके सुझाव के लिये भी मगर ये मेरी मान्यता है जिसे मैने कहनी मे उकेरा है। मुख्यमुदा दोहरे माप दंड का था सो उसे जब उसके साथ घटना हुई तो समझ आ गया।

Babli said...

निर्मला जी बहुत ही सुंदर कहानी लिखा है आपने! काश की सभी रिचा जैसी लड़की को समझ पाते और ऐसी लड़की पर तो फक्र होना चाहिए !

विनीता यशस्वी said...

kahani ki saari kisht aaj ek sath hi pari hai...bahut achhi kahani hai...

Jogi said...

aaj pehli baar hi padh rha tha aur bahut khushi hui ki maine poori khani padhi... :) agar pehle padhta to ek -ek karke padhna padta aur itni achhi kahani ke liye intajar nahi kar sakta main ..Its a great motivational story...Thanks !!!

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