04 May, 2010

पनी बात

अपनी बात
 आज कुछ समय मिला है। सोचा ब्लाग पर हाजरी लगा लूँ। भारत की बहुत याद आ रही है सच कहूँ अपने देश जैसा सुख कहीं नही है न ही अपने देश जैसी आजादी। विदेश मे तो हर काम को अपनी सीमा मे करना होता है ।सुबह से शाम तक जितने भी व्यक्तिगत काम से ले कर आफिस तक सब की सीमायें बाँध रखी हैं अब देखिये सुबह नित्यक्र्म से निव्रित होने से नहाने तक का समय मुझे अपने  लिये तो अभिशाप सा लगता है। मर्जी से अपने शरीर की सफाई भी नही कर सकते। एक कविन्टल शरीर पर फवारा चार बारिश की बून्दों जैसा आभास देता है। वहाँ अपने घर मे बडी सी बाल्टी और एक बडा सा लोटा जितने मर्जी भर भर के लोटे शरीर  पर डालो पता चलता था कि हम नहा कर आये हैं और अमेरिका मे एक तरफ से फवारे से नहा कर हटो तब तक दूसरी साईड सूख जाती है। बाथ टब मे बैठ कर नहा तो सकते हैं मगर वो इतना छोटा लगता है कि मेरा तो दम घुटने लगता है। उसके बाद किचन मे आओ तो बिजली के हीटर हैं जिन्हे न तो एक दम कम किया जा सकता है और न अधिक । आपकी कोई सबजी चाय आदि उबल रही है तो उसे कम गैस पर नही कर सकते बस बन्द करना होगा या किसी दूसरे चुल्हे पर रखें जो उससे कम बिजली वाला हो। उपार से पूरी हीट आपके मुँह पर लगती है। अपना गैस स्टोव तो है नही कि जरा सा परे सरका दिया, ये भी मुझे बहुत मुश्किल लगता है। मगर ये भारत तो है नही कि अपनी मर्जी से आप जिस तरह की चीज़ चाहिये ले लो। हमे गैस न अच्छी लगे तो स्टोव सही, नही तो अंगीठी है, चुल्हा है, मिट्टी के तेल का स्टोव है मतलव आपके पास बहुत सी आप्शन्ज़ हैं फिर गैस का चुलहा जितना मर्जी कम या अधिक पर चलाओ। हर काम के नियम आपको सडक पर चलना है तो नियम शापिन्ग के लिये जाना है तो नियम । अपनी काम वाली कितनी अच्छी होती है अगर कोई बर्तन अच्छा नही माँजा तो  उस बेचारी को हजार बातें सुना डालते हैं और यहाँ मशीन मे बर्तन मंजते हैं। हमारे भारतिय तडके से जले बरतन बेचारी मशीन के बस मे कहाँ? किसे कहें बस मन मसोस कर खुद ही रगडने पडते हैं । सफाई की छुट्टी ही रहती है। हफ्ते बाद वैक्यूम कलीनर से सफाई होती है वर्ना मैट पर किसी गन्दगी का क्या पता चलता है डुस्ट तो होती नही है। अगर देखा जाये तो यहाँ काम बहुत कम है अधी चीज़ें तो रेडीमेड ही होती हैं सब्जियाँ कटी हुयी ले लो चपाती भी अगर रेडीमेड लेनी है तो वो भी मिलती है मगर भारतिय लोग ताजी ही बनाते हैं। अपना तो भारत मे सारा दिन काम ही खत्म नही होता। बर्तन मशीन मे कपडे मशीन मे । प्रेस करने का झंझट कम सभी लोग यहाँ अइसे कपडे पहनते हैं जिन्हें प्रेस का झंझट न हो।मगर यहाँ की मशीन मे अपने  कपडे तो पोचे ही बन गये हैं।

अब असली बात पर आती हूँ। यहाँ आ कर एक बात का आभास हुया है कि इन काम वालियों ने हम ग्रहणियों को किस कदर बिमार बना डाला है। घर की सफाई और कई काम अब चाह कर भी हम से नही होते जब कि विदेश मे सभी काम खुद करने पडते हैं। कई लोग जो दोनो मियाँ बीवी यहाँ काम करते हैं उन्हें हफ्ते बाद भी अपने घर साफ करने का समय नही मिलता तो भी चलता रहता है। 2-4 माह बाद कभी वैक्यूम कलीनर चला लिया बस। मेरी बेटी को घर साफ रखने की बहुत बडी बीमारी है ओर मै तो कम से कम बीमारी ही कहूँगी जरूरी काम छोड देगी, मगर घर साफ करना नही। उसे पता है मुझ से अब अधिक काम नही होता। खुद उसका आपरेशन हुया है तो कुछ दिन बिस्तर पर लेटना पडा। मुझे डुस्टिन्ग का काम इसलिये मुश्किल लगता कि उसके लिये मुझे स्टेप स्टूल ले कर उपर चढना पडता और मुझे डर रहता कि कहीं गिर न जाऊँ दूसरा मुझे उन पर कहीं डस्ट नजर नही आती तो रहने देती। मगर बेटी को तो जैसे घर ही भूतों का डेरा लगने लगा उसे हर चीज़ अपनी जगह से हिली हुयी दिखाई देती  मुझे तो कुछ कह नही सकती थी और न ही खुद कर सकती थी इस लिये उसने एक काम वाली को बुलाया कि सफाई करनी है। मैने पूछा कि क्या यहाँ काम वाली मिल जाती है तो उसने बताया कि सफाई के लिये मिल जाती है वो पहली बार घर साफ करने का 100 डालर लेती है जिस मे वैक्यूम कलीनर और दुस्टिन्ग आदि तथा बाथरूम सब कुछ बहुत अच्छी तरह साफ करती हैं उसके बाद वो हर 3 हफ्ते बाद आती हैं और तब 60 डालर  एक विजिट के लेती । मुझे हैरानी हुयी मैने कहा इतने पैसे क्यों देने हम खुद साफ कर लेंगे। उसने कहा मम्मी आप एक बार देखना तो सही उनकी सफाई घर नया लगने लगता है। हम या आप जितना भी जोर लगा लें उन जैसा काम नही कर सकते।
बेटी ने मेरे मना करने के बावजूद भी उसे आने के लिये कह दिया। वो चार लोग आये एक माँ और तीन बहने। वो मैक्सीकन थी। यहाँ अधिकतर मैक्सीकन लोग ही सफाई आदि का काम करते हैं। उन्हों ने आते ही अपना अपना मोर्चा सम्भाल लिये एक ने किचन एक बाथरूम और दूसरी शीशे साफ करने लगी। उनकी माँ डुस्टिन्ग करने लगी । अपने हथियार वो साथ ले कर आयी थी
 पता नही कितनी तरह की सोल्यूशन्ज़ थी, टूल थे। सही मे  चार घन्टे मे घर एक दम नया लगने लगा था कहीं किसी दिवार पर या किसी जगह कोई दाग नही था। नातिन ने जगह जगह स्केच पेन से निशान डाल रखे थे सब गायब थे बाथ टुब और बाथरूम की दिवारें चमक रही थी एन्टेरटेनमेन्ट सेन्टर जैसे अभी नया खरीदा हो उसे सपिरिट से साफ किया था हर टेबल खुर्सी सपिरिट से चमका दी थीऔर इस हिसाब से 100 डालर बच्चों के लिये कोई बडी रकम नही थी । कुछ भी हो मै तो एक माह मे भी इतने पैसे अपने काम वाली को न दूँ वो चाहे अपनी जान भी लगा दे। यही तो फर्क है, यहाँ काम के पैसे मिलते हैं हमारे यहाँ कुर्सियाँ तोडने के पैसे मिलते हैं हड्डियाँ तोडने वाले को तो रोटी भी नसीब नहीं। इतने दिनो मे कहीं भी नही लगता कि सफाई की जरूरत है मगर बेटी को लगता है तो कल 3 हफ्ते हो जाने हैं कल वो फिर आयेंगी। इस लिये आज मैने कई सफाई के काम छोड दिये हैं और पोस्ट लिखने बैठ गयी वैसे आज कल बेटी भी काम करने लगी है मुझे तो बच्चों के साथ खेलने का काम होता है या फिर कहीं घूमने जाने का । इस लिये नेट पर नही आ पाती। \ आज बस इतना ही बाकी फिर सही । जल्दी जल्दी मे गलतियों की ओर ध्यान मत दें इसे दोबारा देख नही सकती। हाँ कल का उतसुकता से इन्तजार है यहाँ श्रीमति अजित गुपता जी आ रही हैं और खुशी की बात ये है कि वो स्थान मेरे पास ही है। दो दिन पहले श्री राकेश खन्डेलवाल जी से बात हुयी उन्हें भी मिलूँगी वो भी यहाँ किसी कवि सम्मेलन मे भाग लेने आ रही हैं मै भी सुनने जाऊँगी। भाग नही ले सकती क्यों कि उनका समय और कार्यक्रम पहले ही फिक्स हो चुका है। हाँ उनसे मिल जरूर सकूँगी।




06 April, 2010

खुशखबरी

मेरे घर आयी एक नन्ही परी
आप सब को ये जान कर खुशी होगी कि मेरी बेटी के बेटी हुयी है। 4 अप्रेल को सिजेरियन करवाना पडा जब कि अभी ड्यू डेट 30 अप्रेल थी । खैर दोनो माँ बेटी स्कुशल हैं।मगर अभी अस्पताल मे हैं ।मेरी व्यस्तता और बढ गयी है। बस आप सब को खुशखबरी सुनाने ही आयी थी। हाँ अगर कोई अच्छा सा नाम सुझा सकें तो जरूर सुझायें और बच्ची को आशीर्वाद दें। कुछ दिन और किसी भी ब्लाग पर नही आ पाऊँगी , क्षमा चाहती हूँ।

03 April, 2010

इधर उधर की

इधर उधर की
सोचा था अमेरिका जा कर रोज़ पोस्ट लिखा करूँगी, रोज़नामचे की तरह मगर कुछ दिन तो जेट लैग की वजह से नही लिख पाई फिर एक दो दिन घूमने चले गये और अब फ्लू ने घेर लिया। यहाँ फ्लू इतना भयानक फैला हुया है कि एक बार पकड ले तो छोडने का नाम नही लेता ।भारत की बहुत याद आ रही है। मेरे पतिदेव का तो बिलकुल मन नही लग रहा। कहाँ तो सारा दिन इतने लोगों से मिलना जुलना और कितनी जगह आना जाना कहाँ अब दिन भर कमरे मे बन्द रहना । शाम को चाहे रोज़ घूमने जाते हैं मगर ठंड इतनी पड रही है , बारिश दो दिन से लगातार हो रही है सैर करने भी अधिक देर नही जाया जाता। घर मे हीटर लगा कर बैठे हैं। नातिन स्कूल गयी है बेटी की डाक्टर के पास एपोईँटमेन्ट थी वो लोग भी गये है, तो सोचा 10 मिन आपलोगों से बात कर लूँ।सामने खिडकी मे से बहुत सुन्दर नज़ारा दिख रहा है, बहुत सुन्दर गार्डन पीछे पहाड सब कुछ उजला सा , सोचा शायद कोई कविता लिख पाऊँ मगर दिमाग मे एक शब्द भी नही आ रहा, पता नही क्यों लगता है कि कहीं कुछ मिस्सिन्ग है शायद हवा मे अपने देश की मिट्टी की खुश्बू नही है वो एहसास नही हैं, कुछ तो है जो कुछ भी लिख नही पा रही। नींद नही आती अपना बिस्तर और घर याद आता है। शायद उस बिस्तर की सलवटों मे कुछ लोरियाँ कुछ एहसास हैं जो मीठी नींद ले आते हैं। बेशक यहाँ बहुत कुछ अपने देश से अच्छा भी है मगर अपने देश जैसा प्यार और मेल जोल नही है। इस मैंशन मे भारत्तीय लोगों ने आपस मे बहुत अच्छे सम्बन्ध बना रखे हैं, मुश्किल मे एक दूसरे का साथ भी देते हैं। कितने दिन से मेरी बेटी बहुत बिमार थी तो उसकी सहेलियाँ ही बारी बारी से खाना बना कर भेजती रही और उसे पूछती रही। हम लोग आये तो मिलने भी आयी। और हमे अपने घर भी बुलाया है। छुट्टी के दिन जायेंगे।एक दिन सैनफ्राँसिसको घूमने गये तो पतिदेव की तबीयत खराब हो गयी । सफर मे मन खराब होने लगता है।इस हफ्ते लास एन्जलेस् जाने का विचार था मगर कपिला साहिब मान नही रहे। देखते हैं अगर सब की तबीयत ठीक हुयी तो जायेंगे। सैन्फ्रांम्सिसको के भ्रमण का हाल फिर लिखूँगी। ये पोस्ट इस लिये लिख रही हूँ कि कहीँ आपलोग मुझे भूल ही न जायें।


19 March, 2010

सुखदा ----कहानी---अन्तिम किश्त्

सुखदा-----कहानी भाग --4
बेशक माँ के कपडों से बू आ रही थी मगर आज सुखदा को वह भी भली लग रही थी। आखिर खून अपनी महक दे रहा था। उसे अभी भी याद है जिस दिन वो शारदा देवी के साथ जा रही थी माँ कितना रोई थी,तडपी थी उसे किस तरह जोर से सीने से लगाया था मगर पिता ने एक झटके से छुडा कर उसे अलग कर दिया था। आज भी माँ के सीने मे उसे वही तडप महसूस हुयी थी।
*मईया तुम्हें बुखार है?* उसने माँ के आँसू पोँछ करुसे बिस्तर पर लिटा दिया।उमेश और शारदा पास पडी टूटी सी धूल से भरी कुर्सियों पर बैठ गये।शारदा सोच रही थी कि माँ बेटी के ये आँसू अतीत की कितनी धूल समेट रहे थे।
मईया बाकी लोग कहाँ गये?*सुखदा ने इधर उधर नज़र दौडाई
*बेटी क्या बताऊँ? तेरे जाने के बाद छोटा घर छोड कर चला गया था।एक माह बाद तेरे पिता भी चल बसे। दादी भी भगवान को प्यारी हो गयी। बडा राजा वहीं रेहडी लगाता था उसे भी नशे की लत लग गयी। 15 20 दिन हो गये मुझ से झगडा कर के गया तो आज तक नही लौटा। बस मुझे ही मौत नही आयी शायद तुझे देखने की हसरत मन मे थी।
*बेटी मै जानती थी कि अभागिन तू नही हम लोग हैं सुखदा से ही घर सुखी था मगर मेरी किसी ने नही सुनी। शार्दा देवी तेरे लिये भगवान बन कर आयी। बस मुझे यही संतोश है।*
*इतना कुछ घट गया माँ , मुझे खबर तक नही दी?* सुखदा रोष से बोली
* बेटी मै तुझ पर इस घर की काली परछाई नही पडने देना चाहती थी तुझे फिर से इस नर्क मे घसीटना नही चाहती थी। तू अपने इन माँ बाप के साथ सुखी रहे यही चाहती थी। अच्छा पहले चाय बनाती हूँ।*
*नही मईया आप लेटी रहिये , मै बनाती हूँ।* सुखदा उठने को हुयी तो माँ ने उसे जबर्दस्ती बिठा दिया। और खुद चाय बनाने लगी ।
*शारदा देवी भगवान आपका भला करे। मेरी बेटी आपके हाथों मे सुरक्षित और सुखी है< अब मै चैन से मर सकूँगी।*
* अरे बहिन आप ऐसा क्यों कहती हैं।अपको पता है हमारी बेटी अब डाक्टर बन गयी है,ये भला आपको मरने देगी? * शारदा देवी ने वतावरण को कुछ हलका करने की कोशिश की।
* आपको बहुत बहुत बधाई । बहुत भाग्यशाली है आपकी बेटी जो आप जैसे माँ बाप मिले।* कहते हुये वो चाय बनाने चली गयी।
* सुखदा, तुम्हारी मईया को साथ ले चलते हैं। अकेली है बिमार है कैसे रहेगी। फिर तुम्हें अलग से चिन्ता रहेगी। बेटा जब तक तुम नही मिली थी बात और थी। वो अब भी तुम्हारी माँ है तो तुम्हारा फर्ज है कि उसकी देख भाल करो। जब तक हमे डर था कि कहीं तुम अपनी माँ को देख कर हमे छोड ना दो तो हमने तुम्हें रोके रखा अब हमे पता है कि हमारी बेटी हमे छोड नही सकती तो क्यों ना माँ को भी साथ ही रख लें भगवान की दया से हमारे पास किसी चीज़ की कमी नही है।* उमेश ने सुखदा की ओर देख कर कहा।
* पापा आप महान हैं।* कह कर सुखदा उमेश के गले से लग गयी।
बडी मुश्किल से उन लोगों ने सुखदा की माँ को मनाया। भगवान की दया से उनके पास बहुत कुछ था और उन्हें सुखदा की माँ को अपने साथ रखना मुश्किल नही था। सुखदा सोच रही थी कि क्या आज के जमाने मे उसके मम्मी पापा जैसे लोग मिल सकते है? मईया तो जैसे अपनी आँखें नही उठा पा रही थी। काश कि आज सुखदा के पिता जिन्दा होते तो देखते कि जिसे अभागी कह कर घर से निकाल दिया था , वही उसकी भाग्य विधाता बन कर आयी है।कितनी सौभाग्यशाली है उसकी सुखदा! -- समाप्त

आप सब को बता दूँ कि आज के बाद कुछ दिन किसी भी ब्लाग पर नही आ पाऊँगी। मै 23 मार्च को USA जा रही हूँ, वहाँ जा कर जब समय मिलेगा तो जरूर आऊँगी। आप लोग भूल मत जाईयेगा। 

16 March, 2010

सुखदा ----कहानी---भाग --3

सुखदा    कहानी-- भाग ------ 3
पिछले भाग मे आपने पढा कि कैसे सुखदा
के पिता के बीमार होने पर उसे एक ओझा के पास ले गये उस ओझा ने सुखदा को घर के लिये मनहूस बताया और एक आश्रम का पता दिया कि इसे वहाँ छोड दें। मगर उसकी माँ नही मानी और उसे नानी के घर भेज दिया। जहाँ स्कूल की एक टीचर शारदा देवी और उसके पति उमेश ने उसे गोद ले लिया। अब आगे पढें----

दिन साल बीते सुखदा ने कभी पीछे मुड कर नही देखा और एक दिन वो डाक्टर बन गयी। वो बहुत खुश थी मगर कभी कभी जब उसे अपनी माँ का चेहरा याद आता तो बहुत उदास हो जाती। उस चेहरे को उसने हर दिन याद किया है। कई बार उसका मन तडप उठता-- पता नही कैसे होंगे वो सब छोटा भाई कैसा होगा वो भी तो बहुत रिया था उसके आने पर। मगर वो लोग उसे ऐसे भूले कि किसी ने कभी जरूरत नही समझी उसकी सुध लेने की। पता नही कहाँ होंगे? आज वो अपने बाप को बताना चाहती थी कि वो अभागिन नही है।
उमेश और शारदा ने उसके डाक्टर बनने की खुशी मे घर मे एक पार्टी रखी थी। वो दोनो बहुत खुश थे मगर कई बार सुखदा को उदास होते देख कर वो उसकी हालत समझते थे। अब तक तो उसे यही कहते रहे थे कि बस पढाई की ओर ध्यान दो पिछली बातें भूल जाओ। अपने पिता को दिखा दो कि तुम अभागिन नही हो। और वो उसका ध्यान इधर उधर लगा देते।  वो उसकी उदासी से कभी अनजान नही रहे। उन्हें एहसास था कि सुखदा की उदासी अस्वाभाविक नही है।
आज दोपहर का खाना खा कर सुखदा अपने कमरे मे जा कर लेट गयी। वो कोशिश करती थी कि कभी अपने इन माँ बाप को अपने मन की उदासी का पता न चलने दे मगर शारदा देवी की आँखों से ये छुप नही पता। कुछ देर बाद शारदा ने कमरे मे जा कर झाँका तो सुखदा किसी सोच मे डूबी थी। वो उसके सिरहाने जा कर बैठ गयी
* क्या बात है आज मेरी बेटी कुछ उदास लग रही है।*
कुछ नही माँ क्या कोई काम था?* मै तो ऐसे ही लेटी थी। भला मैं उदास क्यों होने लगी। पार्टी के बारे मे ही सोच रही थी।*
*हाँ मै समझ सकती हूँ । बेटा मैने चाहे कभी तुम से पुरानी बातों का जिक्र नही किया बस मन मे एक ही बात थी कि तुम किसी मुकाम पर पहुंच जाओ। कहीं वो बातें तुम्हें अपनी मंजिल से दूर न कर दें। मगर आज मन मे एक बात है।* कह कर शारदा देवी सुखदा की तरफ देखने लगी।
*हाँ हाँ कहो माँ?*
बेटी मै चाहती हूँ कि एक निमन्त्रण पत्र तुम अपने माँ बाप को भी दो। बेशक मैने कभी तुम से उनका जिक्र नही किया मगर जानती थी कि तुम्हें उनकी याद अकसर आती है। मै नही चाहती थी कि तुम उनके विषय मे सोच कर पढाई से दूर न हो जाओ। आज तुम ने अपने आप को साबित कर दिया है।ाब मुझे कोई डर नही क्योंकि मुझे पता है तुम हमारी बेटी हो और हमे तुम पर पूरा विश्वास है। इसलिये हम तुम्हे उदास भी नही देख सकते। मैं चाहती हूँ कि तुम अपने माँबाप से अब मिल लो।।*
*नही माँ मै इस लिये उदास नही कि मै उनके पास जाना चाहती हूँ । अब तो केवल आप ही मेरे माँ बाप हैं और मुझे आपकी बेटी होने पर गर्व है। आपने मेरे जीवन को एक अर्थ दिया है। आपके सिवा कोई नही मेरा। फिर भी कई बार  माँ का चेहरा और छोटे भाई का रुदन याद आता है तो दिल तडप सा उठता है दोनो की बेबसी याद आती है बस।* सुखदा ने शारदा देवी के गले मे बाहें डालते हुये कहा।
*अच्छा चलो,उठो कुछ कार्ड खुद जा कर देने हैं कल तेरे शहर चलेंगे। कहते हुये शारदा देवी उठ गयी।
अगले दिन अपने घर जाते हुये--- वो सोच रही थी अपना कौन सा घर अपना घर तो उसका वो है जहाँ अब रह रही है।-- वो ति किसी के घर बस कार्ड देने जा रही है। एक अभिलाशा लिये , अपनी सगी माँ से मिलने
की चाह लिये बस कार्ड देना तो एक बहाना था।
सुभ 10 बजे जैसे ही गाडी सुखदा के घर के आगे रुकी मोहल्ले के बच्चे गाडी के आस पास इकट्ठे हो गये। गरीब बस्तियों मे भला कभी कुछ बदलता है? इन लोगों के लिये आज भी गाडी एक दुर्लभ वस्तु है। वो भी तो इतनी उत्सुकता से मोहल्ले मे आने वाली गाडी को देखा करती थी। जैसे ही ये लोग गाडी से बाहर निकले सब इनकी ओर देखने लगे। सामने कुछ लडके जमीन पर बैठे ताश खेल रहे थे औरतें नल से पानी भर रही थी-- बच्चे नंग धडंग खेल रहे थे। मोहल्ले मे कुछ घर नये बन गये थे।उन्हों ने किसी से सुखदा के बाप का नाम ले कर घर पूछा सुखदा को कुछ कुछ याद था । एक लडके ने इशारे से एक घर की ओर उँगली की।
 दरवाजा टूट गया था।सुखदा ने जैसे ही दरवाजे पर हाथ रखा दरवाज चरमराहट से खुल गया। इतनी गंदगी? उसका घर तो जहाँ तक उसे याद है साफ सुथरा हुया करता था। कुछ और आगे बढी तो कंपकंपाती क्षीण सी आवाज़ आयी।
*कौन? अन्दर आ जाओ।*
बरसों बाद माँ की आवाज़ सुनी थी।   दिल धडका और आँख भर आयी। शारदा देवी ने हल्के से उसका कन्धा दबाया और आगे बढने का इशारा किया। वो लोग अन्दर आ गये। कमरे के एक तरफ मैले कुचैले बिस्तर पर उसकी माँ लेटी थी दूसरी तरफ दो टूटी फूटी कुर्सियाँ एक स्टूल पडा था। सुखदा तेजी से माँ की तरफ लपकी
*मईया?* बडी मुश्किल से सुखदा के मुँह से आवाज़ निकली बचपन मे वो ऐसे ही अपनी माँ को बुलाया करती थी। सब की जैसे साँसें रुक गयी थी आँखें सब की नम ---- सुन कर माँ एक झटके से उठ कर बैठ गयी। ऐसे तो सुखदा ही पुकारा करती थी ।इतने बर्षौ बाद किसी ने मईया कहा था। उसे लगा जैसे किसी ने उसके दिल की तपती रेत पर ठंडे पानी की बौछार कर दी हो।
*सुखदा?*
एक झटके से खडी हो गयी उसे छुआ और फफक कर रो पडी। शाय्द गले लगाने से हिचक रही थी उनलोगों के साफ सुथरे कपडे देख कर।
*माँ!* सुखदा झट से उसके गले लग गयी। सब की आँखें सावन भादों सी बह रही थीं।
बेशक माँ के कपडों से बू आ रही थी----- क्रमश"

14 March, 2010

सुखदा --- कहानी -भाग -2

 पिछले भाग मे आपने पढा कि सुखद के पिता को इलाज के लिये एक ओझा के पास ले जाया गया। कहा जाता था कि वि ओझा बिना चीर फाड किये कैंसर के मरीज का आप्रेशन करता था। वहाँ उस ओझा ने कहा कि सुखदा उनके घर का काल बन कर आयी है इस लिये इसे घर से दूर किसी आश्रम मे भेज दें। ये सुन कर सब डर गये। और बाबा के आश्रम से आप्रेशन के बाद घर आ गये। अब आगे पढिये--------
सुखदा-- भाग -2
सुखदा डर के मारे माँ को छोड नही रही थी।उसके पिता उसे गैर की तरह गुस्से मे देख रहे थे।माँ तो जैसे काठ की मूर्ती बन गयी थी। उसे विश्वास नही हो रहा था कि उसकी इतनी प्यारी बेटी अभागी हो सकती है।
घर पहुँचते ही दादी और पिता ने उसे आश्रम भेजने की जिद पकड ली दादी को सुखदा से अधिक अपने बेटे की जान की चिन्ता थी।उसके भाई उसे भेजने के हक मे नही थे मगर वो अभी छोटे थे उनकी कौन सुनता? बाप को तो सिर्फ अपनी चिन्ता थी।खुदगर्ज़ी इन्सान को कितना नीचे गिरा देती है कि वो अपना जीवन बचाने के लिये मासूम बच्ची के जीवन से खेलने मे भी संकोच नही करता।बाप की खुदगर्ज़ी और अन्धविश्वास की भेंत चढने जा रही थी सुखदा।
माँ जानती थी कि उसका भी बस नही चलेगा।कहीं ये लोग सच मे उसे बाबा के बताये आश्रम मे छोड आये तो सुखदा का क्या होगा---- फिर वो कभी अपनी बच्ची को देख भी पायेगी या नही! इससे अच्छा होगा यदि मै इसे इसकी नानी के घर भेज दूँ।कम से कम उसे कभी देख तो सकती हूँ। बडी मुश्किल से वो अपने पति और सास को मना पाई। सुखदा भी सब कुछ समझ रही थी उसे याद आ रहा था कि जब कभी वो रोते हुये पापा की गोद मे समा जाती तो वो एक दम परेशान हो उठते। उनसे उसका रोना देखा नही जाता था। आज जैसे ही वो पापा के पास गयी उन्होंने उसे डाँट कर भगा दिया। दादी तो उसे खा जाने वाली नजरों से देख रही थी। बडा भाई अपने काम काज मे व्यस्त था। छोटा रात भर सुखदा और माँ के पास सुखदा का हाथ पकडे रहा । और माँउसे सीने से चिपकाये आँसू बहाती रही।उसके कलेजे का टुकडा जिसे देख कर वो अपना सारा गम भूल जाती थी अब् उससे दूर जा रहा था। कैसे रहेगी अकेली नानी के पास? माँ के बिना तो उसे नीँद भी नही आती थी। सुखदा की नींद तो जाने कहाँ उड गयी थी।उस मासूम को तो ये भी पता नही था कि अभागिन क्या होती है। क्यों उसे घर से दूर भेजा जा रहा है।
अगले दिन माँ उसे नानी के घर छोड आयी। कितना रोयी तडपी थी घर से चलते वक्त। बाप ने तो उसकी ओर नजर भर कर देखा भी नही।बस माँ और छोटा भाई रो रहे थे। जाने कितने दिन माँ रोती रही होगी। उसे छोड कर जाते हुये बार बार माँ का आँसोयों से भरा चेहरा उसे याद आता जिसे वो पूरी उम्र नही भूल पाई थी। नानी के पास दो दिन उसने एक दाना भी नही खाया था। नानी गाँव मे अकेली रहती थी। मामू अपनी पत्नि और बच्चों के साथ शहर मे रहते थे।बूढी नानी सुखदा को बहलाने की भरसक कोशिश करती थी पर सुखदा तो जैसे पत्थर बन गयी थी। गुम सुम सी सारा दिन रोती रहती थी।
कुछ दिन बाद गाँव के एक सकूल मे उसका दाखिला करवा दिया गया। मगर स्कूल मे भी उसका मन नही लगता था। वो चुप चुप सी सहमी हुयी कलास के एक कोने मे बैठी रहती थी।उसकी भोली सी सूरत देख कर उसकी क्लास टीचर शारदा देवी को उसकी ये उदासी समझ नही आती थी। बहुत बार उसने उसे समझाने की कोशिश भी की मगर वो चुप रही। पता नही क्यों शार्दा देवी को उस लडकी से कुछ लगाव सा हो गया। उसकी अपनी कोई संतान न थी। उसे समझ नही आता था कि इतनी छोटी सी उम्र मे उसे कौन सा दुख सालता रहता है। वो निराश सी क्यों रहती है।
एक दिन आधी छुट्टी मे उसने सुखदा को अपने पास बुलाया।--
*सुखदा, क्या बात है बेटा तुम इतनी उदास और डरी सी क्यों रहती हो?*
वो चुपचाप अपने नाखूनों से अपनी किताब खरोंचती रही।जैसे डर रही हो कि उसे अभागी जान कर कहीं स्कूल से भी ना निकाल दें।
*अच्छा ये बताओ कि तुम अपने माँ बाप के पास क्यों नही रहती नानी के पास क्यों रहती हो?* सहानुभूति के दो शब्दों से सुखदा के सब्र का बान्ध टूट गया। उसके दिल के फफोलों से एक टीस उठी।
*मैं अभागी हूँ मेरे कारण मेरे घर पर विपत्ति आ गयी। पिता मेरे कारण बिमार हो गये। इस लिये मुझे घर से निकाल दिया गया।*
 सुनते ही शारदा देवी का दिमाग   सुन्न हो गया। इस इकीसवीं सदी मे ऐसा अन्ध विश्वास? इतनी छोटी सी बच्ची के साथ ऐसा अन्याय? जिसकी सूरत देख कर मन को सकून मिलता हो वो भोली सी बच्ची अभागी कैसे हो सकती है?कुछ पल मे अपने आप को संयत कर उसने सुखदा को गोद मे ले कर भीँच लिया।
*अच्छा बताओ क्या मेरी बेटी बनोगी?*  शारदा देवी ने उसके आँसू पोंछते हुये पूछा।
* नही,कहीं आप पर भी कोई मुसीबत आ जायेगी।* सुखदा ने सुबकते हुये कहा।
*अरे नही मेरा तो घर महक उठेगा। मैं तुम्हारी टीचर हूँ ना तो टीचर कभी बच्चों से झूठ नही बोलते। एक बात याद रखना,अभागी तू नही अभागे वो लोग हैं जिन्होंने तुझे त्याग दिया। देखना एक दिन तुम साबित कर दोगी। मै कल ही तुम्हारी नानी से मिलती हूँ। अब तुम अपने आँसू पोंछ दो । और क्लास मे जाओ।*
अगले दिन शारदा देवी और उसके पति उमेश सुखदा की नानी के पास गये। पहले तो उन्होंने उसे समझाया कि ये सब अन्ध विश्वास है। मगर नानी इसमे क्या कर सकती थी। फिर उन्होंने उसकी नानी को अपनी इच्छा बताई कि अगर आप इसे हमे गोद दे दें तो इसका भविश्य संवर सकता है। हमारे कोई संतान नही है। आप इसके माँ बाप को बुला कर बात करें। हम अगले इतवार को फिर आयेंगे।
सुखदा की माँ का कलेजा मुँह को आ रहा था ये सुन कर,मगर बाप खुश हो गया कि चलो बला टलेगी। नानी भी कब तक जिन्दा रहेगी कहीं ये मुसीबत फिर गले ना पड जाये। उमेश ने सारी कानूनी औपचारिकतायें पूरी कर ली और उसके पिता को इलाज के लिये कुछ धन भी दिया। इस तरह सुखदा अब शारदा और उमेश की बेटी बन गयी।
उनदोनो के पाँव जमीन पर नही पड रहे थे। मगर सुखदा को रह रह कर अपनी माँ का आँसूयों से भीगा चेहरा याद आ रहा था भाई की कातर निगाहें उसका पीछा कर रही थीं। मगर उन दोनो के प्यार ने उसे कुछ सकून दिया। उसका कमरा सजा दिया गया। वहाँ का माहौल देख कर वो हैरान थी इस तरह के खिलौने और खान पान तो उसने सपने मे भी नही सोचा था! घर मे रोनक हो गयी थी अब वो अपने माँ बाप की लाडली बेटी जो बन गयी थी धीरे धीरे वो माँ के सिवा सब कुछ भूल कर उनके प्यार मे रंगने लगी। उमेश और शारदा ने अपनी बदली कहीं दूर करवा ली । वो सुखदा को सभी यादों से दूर लेजाना चाहते थे।
नया शहर नया स्कूल और नया घर देख कर सुखदा भी खुश थी। बाल मन जल्दी ही उन खुशियों मे रम गया।
वर्षों की सीढियाँ फलांगते सुखदा कहीं की कहीं पहुंच गयी थी मगर नही भूली तो उस बाबा की दहशत और माँ का आँसूयों से भीगा चेहरा।-------  क्रमश

12 March, 2010

कहानी---- सुखदा

इस कहानी मे कुछ घटनायें सत्य हैं मगर पात्र आदि बदल दिये गये है। ओझा वाली घटना एक पढे लिखे और मेडिकल प्रोफेशन मे काम करने वाले आदमी के साथ घट चुकी है। मगर उसने जिस मरीज का ईलाज करवाया था वो 3-4 माह बाद ही मर गया था। उस बाबा का जम्मू मे आज भी लाखों का कारोबार है। उसके बारे मे फिर अलग पोस्ट से कभी बताऊँगी। जो सुखदा नाम का पात्र है इसे इस घटना से जोडा गया है और सुखदा नाम का पात्र भी सत्य घटना पर आधारित है। उसे भी उसके माँ बाप ने अभागा समझ कर त्याग दिया था। दोनो अलग अलग घटनाओं को ले कर इसे एक कहानी के कथानक को बुना  गया है। शायद पहला भाग आपको बोर लगे मगर इस कहानी को बहुत लोगों ने सराहा है। और मुझे भी अपनी अच्छी कहानियों मे ये एक अच्छी कहानी लगती है।
सुखदा
गोरा रंग, लाल गाल,छोटे छोटे घुँघराले बाल,गोल मटोल ठुमक ठुमक कर चलती तो उसके पाँव की झाँझर से सारा घर आंम्गन नाच उठता। शरारत भरी हंसी औत तुतली जुबान से सब का मन मोह लेती,घर के सब लोग उसके आगे पीछे घूमते।इतनी प्यारी बेटी थी, तभी तो उसका नाम सुखदा रखा था उसके पिता ने।
जब सुखदा का जन्म हुया था तोबडा भाई राजा पाँचवीं और छोटा भाईरवि चैथी कक्षा मे पढते थे।उसके पिता चने भटूरे की रेहडी लगाते थे।बाज़ार के बीच रेहडी होने से काम बहुत अच्छा था।कुछ घर मे सामान तैयार करने मे उसकी माँ सहायता कर देती थी।कुल मिला कर घर का गुजर बसर बहुत अच्छी तरह हो रहा था।
वो अभी चार वर्श की हुयी थी कि उसके पिता बीमार रहने लगे।चर्ष भर तो इधर उधर इलाज चलता रहा, पर पेटदर्द था कि बढता ही जा रहा था। जान पहचान वालों के जोर देने पर उन्हें पी.जी.आई चन्डीगढ ।मे दिखा कर ईलाज शुरू करवाया।वहाँ आने जाने का खर्च और ऊपर से टेस्ट इतने मंहगे दवायौ का खर्च भी बहुत हो जाता। इस तरह पी.जी.अई के चक्कर मे जो घर मे जमा पूँजी थी वो 1 माह मे ही समाप्त हो गयी।ऊपर से डाक्टर ने कैंसर बता दिया।जिगर का कैंसर अभी पहली स्टेज पर था।डाक्टर ने बताया कि हर माह कीमो थैरापी करवानी पडेगी-- मतलव हर माह 15--20 हजार का खर्च होगा ऊपर से दवाओं का खर्च अलग।इतना मंहगा ईलाज करवाना अब उनके बस मे नही था।इसलिये फिर से नीम हकीमौ के चक्कर मे पड गये।
सुखदा की दादी को किसी ने बताया कि एक ओझा है जो बिना चीर फाड के आप्रेशन कर देता है बहुत से मरीज उसने ठीक किये हैं अगर वहाँ दिखा लें तो ठीक हो जायेंगे।
उस ओझा के पास जाना मजबूरी सी बन गया था। वहाँ गये तो ओझा के चेले ने ऐसा चक्कर चलाया कि दादी तो क्या सुखदा के माँ बाप भी उस से प्रभावित हुये बिना न रह सके।
यूँ भी अनपढता गरीबी औरन्ध विश्वास का जन जन्म का साथ है।जो थोडी सी बुद्धि विवेक होते हैं वो भी अन्धविश्वास के अंधेरे मे अपनी रोशनी खो देते हैं।फिर वो दो वर्ष मे डाकटरी ईलाज मे बिलकुल जेब से खाली भी हो चुके थे।ाब तो सुखदा के पिता काम भी नही कर पाते। बडा लडका अब नौवी की पढाई छोड कर् रेहडी का काम सम्भाल रहा था। मगर बच्चा ही तो था उतनी अच्छी तरह काम नही कर पाता था तो आय भी कम हो गयी थी। ईलाज तो दूर घर का खर्च चलाना मुश्किल हो गया था।मगर किसी तरह जुगाड कर के ओझा के पास जाने का फैसला किया गया। सुखदा की माँ की कानों की वालियाँ और सुखदा की झाँझर बेच कर जम्मू जाने के लिये कुछ पैसे जुटाये गये।
सुखदा तब  बेशक अभी पाँच वर्ष की ही थी मगर तब से अब तक वो काला दिन नही भूल पाई थी।क्यों कि उस अन्ध विश्वास की त्रास्दी और भयानक क्षन ने उसके दिल मे गहरे तक पैठ बना ली थी।, जिस ने हंसती खेलती सुखदा को दुखदा बना दिया था।
तब उसे पूरी बात तो समझ नही आयी थी मगर जो उसने देखा था वो अब भी याद है और उसी से अब सब कुछ समझती है। उसे याद आया----- जब वो आश्रम पहुँचे थे तो उस ओझा के आश्रम मे बहुत भीड थी।सन्त बाबा बारी बारी से मरीजों को बुलाते, जन्त्र मन्त्र करते और्भेज देते । जिनके आप्रेशन होने होते वो वहीं रह जाते वहाँ ऐसे तीन चार मरीज थे। आज उसे लगता है कि वो जरूर बाबा के एजेन्ट होंगे। सब यही कह रहे थे कि जिसकी किस्मत अच्छी हो उसी का आप्रेशन करते हैं बाबा जी।्रात को उनका आप्रेशन होना था।
दोपहर के बैठे थे वो अन्धेरा अपने पाँव पसारने लगा था। तभी दो चोगाधारी बाबा के चेले आये और सुखदा के पिता को चारपाई पर डाल कर ले गये। ये आश्रम एक पहाडी पर था और नीचे एक दरिया बह रहा था।बाकी सभी लोगों को पहाडी पर एक जगह बैठने का निर्देश दे कर मरीज को अप्रेशन के कमरे मे , जो दरिया के किनारे था ले गये।बाकी के बैठे हुये लोगों को अन्धेरे के कारण कुछ दिखाई नही दे रहा था।सुखदा बच्ची थी वैसे भी सहमी सी बैठी थी।कुछ देर बाद किसी जानवर जैसी दहाडने की आवाज़ आयी सुखदा और बाकी लोग डर से काँपने लगे।उसकी माँ ने उसे अपनी छाती से चिपका लिया। तभी  ओझा का एक  चेला हाथ मे मास का एक लोथडा सा ले कर आया।---* ये देखो मरीज के जिगर से कैंसर वाला मास निकाल कर लाया हूँ ताकि आप अपनी आँखों से देख लो इसे बिना आप्रेशन के निकाला है। ये देख कर सभी लोग हैरान हो गये और बाबा की जै जै कार करने लगे। करीब आधे घन्टे बाद वो मरीज को वापिस ले कर आये।मरीज के कपडों पर खून के छीँटे तो थे मगर चीर फाड,बेहोशी का नामोनिशान नही था मरीज सन्तुष्ट लग रहा थ। बाकी दो मरीजों का आप्रेशन कर के बाबा जीवापिस अपने कमरे मे आ गये। फिर मरीज और रिश्तेदारों को बारी बारी अन्दर बुलाने लगे।
सुखदा के परिवार की बारी आयी तो सभी बाबा के सामने जा कर बैठ गये। चढावा चढाया,ाउर बाबा के चरणो मे माथा टेका।
*बम--बम-भोले नाथ--- ये कन्या कौन है?* बाबा ने ऊँची आवाज़ मे पूछा।
सुखदा तो पहले ही दरी हुयी थी और भी सहम गयी।
जी ये मेरी पोती है और जिसका आपने आप्रेशन किया वो मेरा बेटा है उसी की पुत्री है सुख्दा।* दादी ने सुखदा का परिचय दिया
**सुखदा? सुखदा नही दुखदा कहो इसे। माई ये कन्या नही विष कन्या है-- ये बाप के लिये मौत का पैगाम ले कर आयी है।जितनी जल्दी हो सके इसे घर से दूर भेज दो।*
बाबा ऐसा कैसे हो सकता है?ये मेरी बेटी है इस मासूम को कहाँ भेजूँगी?* सुखदा की माँ ने उसे और जोर से छाती से चिपका लिया।
*माई आप घर की सलामती चाहती हैं तो इसे घर से भेजना ही होगा। मै एक आश्रम का पता बता सकता हूँ, वहाँ इसे छोड दें नही तो सारा घर तबाह हो जायेगा।इसके माथे पर शनि और राहू की काली छाया देख रहा हूँ। अभागी है ये लडकी---  अभागी।* कहते हुये बाबा ने एक आश्रम का पता एक कागज़ पर लिख कर दिया। और कहा कि उसे बता दें जब ये वहाँ चली जाये। मैं वहाँ बोल दूँगा कि इसका अच्छा ध्यान रखें।
*बाबा जैसा आप कहते हैं वैसा ही होगा। हमे दो दिन की मोहलत दो।* दादी ने विनीत भाव से बाबा को भरोसा दिलाया।माथा टेक कर सभी बाहर आ गये।
सुखदा दर के मारे माँ को छोड नही रही थी, कुछ कुछ उसको समझ आ गया था कि उसे घर से बाहर भेजने को कहा गया है। उसके लाड प्यार करने वाले उसके पिता उसे गुस्से से देख रहे थे। माँ तो जैसे काठ की मूर्ती बन गयी थी। उसे विश्वास नही हो रहा था कि उसकी इतनी प्यारी बेटी अभागी हो सकती है।---- क्रमश:

10 March, 2010

व्यंग-- बुढापे की चिन्ता समाप्त

व्यंग -- बुढापे की चिन्ता समाप्त
आज कल मुझे अपने भविष्य की चिन्ता फिर से सताने लगी है। पहले 20 के बाद माँ बाप ने कहा अब जाओ ससुराल। हम आ गये। फिर 58 साल के हुये तो सरकार ने कहा अब जाओ अपने घर । हम फिर आ गये। फिर दामाद जी ने सोचा सासू मां अकेले मे हमे पुकारती रहेगी तो पहुँचा दिया ब्लागवुड मे। हम फिर आ गये। अब लगता है आँखें ,कमर ,बाजू अधिक दिन तक यहाँ भी साथ नही देंगे  तो कहाँ जायेंगे? मगर भगवान हमेशा अपनी सुनता है जब पता चला कि महिला आरक्षण  विधेयक पास हो रहा है तो अपनी तो बाँछें खिल गयी। बडी बेसब्री से आठ मार्च के एतिहासिक दिन का इन्तज़ार किया। क्यों कि हम जानते हैं नकारा,बिमार आदमी और कहीं चले न चले मगर राजनिती मे खूब चलता है। चलता ही नही भागता है< आस पास चमचे, विदेश मे बिमारी का ईलाज क्या क्या सहुलतें नही मिलती और फिर पैसा?___ उसे अभी राज़ ही रखेंगे  और हम ने सोच लिया था कि जैसे तैसे इस बार जिस किसी भी पार्टी का टिकेट मिले ले लेंगे।पार्टी न भी हो आज़ाद खडे हो जायेंगे। मगर आठ तारीख ऐसी मनहूस निकली कि संसद मे हंगामा हो गया उस दिन तो आलू टमाटर ही हाथ लगे। अब देखिये न अगर औरत ही औरत के खिलाफ खडी न हो तो किसी भी काम का क्या मज़ा रह जायेगा । ये अपनी ममत दी अपनी ही बहनों के खिलाफ खडी हो गयी। अब इन्हें कौन समझाये कि अभी रोटी हाथ मे तो आने दो बाद मे छीनाझपटी कर लेने फिर चाहे हमारी चोटी ही हाथ मे पकड कर घुमा देना। मगर नही।  धडकते दिल से अगले दिन यानी 9 मार्च का इन्तज़ार किया था मगर दी के तेवर देख कर दिल और धडक गया।,-- शाम होते होते अपना तो हाल बेहाल था-- डर था कि कहीं बिल पास होते होते रह गया तो अपना भविष्य तो चौपट हो जायेगा। भगवान ने सुन ली सारा दिन पता नही कितने देवी देवताओं को मनाया। जैसे ही बिल पास होने की घोषणा हुयी अपनी तो मारे खुशी के जमीं पर पाँव नही पड रहे थी । बेशक अभी रोटी तवे पर है पता नही कहीं लोक सभा मे पकते पकते जल गयी तो क्या होगा? मगर अपने हौसले बुलन्दी पर हैं---- बार बार अपनी एक गज़ल का शेर मन मे घूम रहा था--

जमीँ पर पाँव रखती हूँ ,नज़र पर आसमा उपर
नही रोके रुकूँगी अब कि ठोकर पर जमाना है
कहाँ अबला रही औरत कहाँ बेबस ही लगती है
पहुँची है वो संसद तक सभी को ये दिखाना है

  रात को खूब लज़ीज़ खाना बनाया और पति को खिलाया। आखिर मुर्गा हलाल करने से पहले पेट भर खिलाना तो चाहिये ही। बस फिर क्या सो गये। तो क्या देखते हैं कि जो टिकेट हमारे पति को मिली थी वो कट कर हमे मिल गयी। पहले तो घर मे ही विरोधी दल खडा हो गया। मायके वाले मेरे साथ और ससुराल वाले इनके साथ मगर जीत तो अपनी होनी ही थी। पार्टी को इस बिल को भुनाने का अवसर तो नही खो सकती थी। पतिदेव सिर पीट रहे थे कि क्यों उन्होंने इस बिल के हक मे वोट डाला। मगर अब बात हाथ से निकल चुकी थी। खैर मानमनौवत  से विरोधियों को शान्त किया। टिकेट तो मुझे मिलना ही था मिल गया। अब एलेक्शन कम्पेन मे देख रही हूँ बेचारे पति घर मे इलेक्शन आफिस सम्भाल रहे हैं और मै बाहर गलियों मे घूम रही हूँ। जैसे तैसे इलेशन  हो गया और मै जीत गयी। क्या देखती हूँ कि लोगों की भीड मुझे हार डालने के लिये उतावली हो रही है। इनके दोस्त तो और भी उतावले बडी मुश्किल से मुझे हार डालने का उन्हे अवसर मिला था तो कैसे हाथ से जाने देते? जिन्हों ने नही भी वोट डाला वो भी मेरे मुँह मे काजू की कतली डालना चाह रहे थे और मेरी नजरें इन्हें ढूँढ रही थी--- दूर गेट के पास ये भीड मे उलझ्गे हुये नज़र आये--- शायद दोस्तों ने ही शरारत से वहाँ उलझा रखा था इन्हें भीड मे से निकलने ही नही दिया और जब सभी हार डाल कर चले गये तो बेचारे पतिदेव हार ले कर आये। सारे फूल भीड मे झड चुके थे, हमने अवसर की नज़ाकत को समझ कर सभी हार अपने गले से उतार कर इनके गले मे डाल दिये -- और मुस्कुरा कर इनकी तरफ देखा बेचारे मेरे हार डालना ही भूल गये। चलो अच्छा हुया एक बार का डाला हार आज तक गले से नही उतर है।आधी रात तक जश्न चलता रहा।
अगले दिन से घर का इतिहास,भुगोल,गणित सब बदल चुका था। आज इनके दफ्तर मे मेरा राज था । इन्हें मैने रसोई का दरवाजा दिखा दिया था। आने जाने वालों के लिये चाय-नाश्ता,खाना जैसे मै बना कर देती थी अब इनके जिम्मे हो गया। फिर देखती हूँ । रात को जैसे ही फारिग हुयी पतिदेव भोजन की थाली ले कर खडे हैं। मैने थाली के लिये हाथ बढाया ही था कि जोर जोर से मेरा हाथ हिला--- ये क्या--- ये सपना था?--- मेरे पति जोर से मेरा हाथ पकड कर हिला रहे थी * आज क्या सोती रहोगी? सुबह के 7 बज गये? नाश्ता पानी मिलेगा कि नही? वाह रे किस्मत! क्या बदला? एक दिन सपना भी नही लेने दिया। खैर अब भी आशा की किरण बची है--टिकेट तो हम ही लेंगे। बस दुख इस बात का है कि तब आप लोगों से दूर जाना पडेगा । या फिर राज निती मे रह कर अमर सिन्ह की तरह कुछ लिख पाऊँ। मगर एक बात की आप सब से उमीद करती हूँ मेरे ईलेक्शन कम्पेन मे बढ चढ कर हिस्सा लें। धन्यवाद {अग्रिम}। जय  नारी जय  भारत ।

08 March, 2010

कविता--व्यंग महिला दिवस

दो दिन दिल्ली गयी थी इस लिये किसी ब्लाग पर नही आ सकी और न ही कुछ नया लिख सकी। फिर भी महिला दिवस हो तो सोचा कुछ तो लिखना ही चाहिये। इस लिये एक पुरानी कविता ठेळ रही हूँ। कल दिल्ली मे रंजू भाटिया जी और बेटे प्रकाश सिंह अर्श से मिली बहुत अच्छा लगा। मिलना तो बहुत से लोगों से चाहती थी मगर समय की कमी से मिल नही पाई। रंजू जी और अर्श का धन्यवाद अर्श तो गाज़ियाबाद से मुझे मिलने के लिये आया। अभोभूत हूँ।
अन्तर्राष्टिय महिला दिवस
(व्यंग कविता)

आज महिला दिवस उस पर ये छुट्टी
हमने भी इसे मनाने की हठ कर ली
सोच लिया कि अपना अधिकार जताना है
हमे महिला मीटिंग मे जाना है
सुबह उठते ही हमने किया ऎलान्
हमारे तेवर देख कर पती थे हैरान
आज गर्व से अपना चेहरा था तमतमाया
उस पर महिला दिवस का था रंग छाया
पती से कहा उँची आवाज़ मे
आज से हम महिला मीटिंग मे जायँगे
एक सप्ताह तक आप घर चलायेंगे।
आज का विषेश दिन हम अपनी
आज़ादी से शुरु करते हैं
आप सम्भालो घर की चारदिवारी
हम महिला मीटिंग मे चलते हैं
तुम बच्चों को खिला पिला कर
स्कूल पहुँचा देना
घर के काम काज से निपट
माँ की टाँग दबा देना
बर्तन चौका सब निपटाना समय पर
हम रात को देर से लौटेंगे घर
बस फिर हफ्ता भर हमने
पती को खूब नचाया
महिलायों के जीवन का
वास्तविक दृ्ष्य दिखलाया
हमने अपन अधिकार दिखा
कर धूम मचा दी
सदियों से चली आ रही
पती प्रथा की नींव हिला दी
तब सोचा ना था कि
ये महिला दिवस
इतना रंग लायेगा
कि अपने घर का
इतिहास बदल जायेगा

05 March, 2010

गज़ल कविता नज़्म

इसे गज़ल कविता नज्म कुछ भी कह लीजिये बस मेरा मन्तव आज के ज्वलन्त मुद्दे पर कुछ कहने का है। आज कल टी वी पर आप देख रहे हैं इन साधू सन्तों की करतूतें अभी पता नही और कितने भेडिये साधुयों की खाल मे छुपे बैठे हैं हम केवल अपनी आस्था के चलते आस्तीन मे साँ पाल रहे हैं जो हमे धर्म से कोसों दूर ले जा रहे हैं। खुद को भगवान कह कर और खुद के नाम की आर्तियाँ गवा कर हमे भगवान से दूर ही नही ले जा रहे बल्कि धर्म का विनाश भी कर रहे हैं। मै यहाँ किसी की भावनाओं को ठेस नही पहुँचाना चाहती मगर इस कडवे सच पर चुप रहूँ तो भगवान की अपराधी भी हूँ। चन्द पँक्तियाँ रात की खबरें सुन कर लिखी थी हाजिर हैं ।--

धर्म कैसी आस्था है जो लडाये आदमी को
तू बुरा है और अच्छा मैं बताये आदमी को

सादगी से दूर करते ऐश और आराम साधू
मोह माया है बुरी फिर क्यों बताये आदमी को

हो शनाख्त साधू की जो ए.सी  कार से जब
ये तरीका साधुयों का क्या सिखाये आदमी को

सोच कर देखो जरा यह  धर्म का है रूप कैसा
खुद को कह भगवान अपना नाम रटवाए आदमी को

04 March, 2010

गज़ल

इस गज़ल को भी प्राण भाई साहिब ने संवारा है।उनके आशीर्वाद के लिये धन्यवादी हूँ। इसे होली के दिन पोस्ट नही कर सकी। सोचा होली का महौल कुछ दिन और चलता रहे तो अच्छा है।
गज़ल 
आज होली के बहाने से बुलाया था मुझे
गाल छू मेरा गुलाबी सा बनाया था मुझे

भाभियाँ क्या सालियाँ सब ढूँढती इनको फिरें
रंग मेरे साजना ने पर लगाया था मुझे

खूब खेले रंग होली के हमारे सामने
देख सखियाँ शोख मेरी फिर भुलाया था मुझे

काश होली पे न जाते उस गली हम शान से
उस फरेबी ने वहाँ जोकर बनाया था मुझे

उड रहे थे लाल पीले रंग चारों ओर ही
दिन ये खुशियों से भरा उसने दिखाया था मुझे

चाहते थे रंगना हम रंग मे अपने उसे
फेंक कर तीरे नज़र पर बुत बनाया था मुझे

02 March, 2010

सच्ची साधना
{आखिरी किश्त }
pपिछली किश्तों मे आपने पढा कि शिव दास कैसे साधू बना और उसे फिर भी सँतुष्टी नही मिली तो वापिस अपने गाँव लौटा। जहाँ उसे राम किशन { अपने बचपन के दोस्त} का जीवन और लोक सेवा देख कर उसे कैसे बोध हुया कि सच्ची साधना वो नही जो वो कर रहा था सच्ची साधना तो वो है जो रामकिशन कर रहा है। वो ध्यान से देख रहा है रामकिशन की दिनचर्या को अब  आगे पढिये-------

शिवदास तुम हाथ मूंह धोलो तुम्हारा खाना आता ही होगा ।‘‘रामकिशन बोले

आठ बजे वही लडका  कर्ण खाना लेकर आ गया । वह बर्तन उठा कर खाना डालने लगा था कि रामकिशन ने रोक दिया ।

‘‘ तुम जाओ मैं डाल लूँगा । रामकिशन ने उसे जाने के लिये कहा।

‘‘ गुरू जी, माँ ने कहा है कि आप भी खीर जरूर खाना, हवन का प्रसाद है । कर्ण ने जाते हुए कहा ।

‘‘ठीक है, खा लँूगा । वो हंस पड़े । हर बार जब खीर भेजती है तो यही कहती है ताकि मैं खा लूँ ।

रामकिशन ने नीचे दरी के उपर एक और चटाई बिछाई, दो पानी के गिलास रखें और दो थालियों में खाना डाल दिया। एक मे  सब्जी, दाल, दही तथा खीर थी  दूसरी मे खिचडी । शिवदास चटाई पर आकर बैठ गए तो राम किषन ने बड़ी थाली उसके आगे सरका दी ।

‘‘ यह क्या ? तुम केवल खिचड़ी खाओगे ?‘‘

‘‘ हाँ, में रात को फीकी खिचड़ी खाता हूँ। ‘‘

‘‘ मैं भी यही खिचड़ी खा लेता ।‘‘

‘‘ अरे नहीं .... बड़े-बडे भक्तों के यहाँ स्वादिष्ट भोजन कर तुम्हें खिचड़ी कहाँ स्वादिष्ट लगेगी । फिर मैं किसी के हाथ से खाना बनवा कर नही खाता । अपना खाना खुद बनाता हूँ । मगर क्या तुम अपनी पत्नि के हाथ का बना खाना नही खाओगे ?‘‘

‘‘ पत्नी के हाथ का ?‘‘

‘‘ हां, जब भी मेरा कोई मेहमान आता है तो भाभी ही खाना बनाकर भेजती है ।‘‘

शिवदास के मन में बहुत कुछ उमड़ घुमड़ कर बह जाने को आतुर था । क्या पाया उसने घर बार छोड़कर ? शायद इससे अधिक साधना वह घर की जिम्मेदारी निभाते हुए कर लेता या फिर शादी ही न करता .... एक आह निकली । पत्नी के हाथ का खाना खाने का मोह त्याग न पाया .....वर्षों बाद इस खाने की मिठास का आनन्द लेने लगा ।

खाना खाने के बाद दोनों बाहर टहलने निकल गए । रामकिशन ने उसे सारा आश्रम दिखाया । रात के नौ बज चुके थे । बहुत से बच्चे अभी लाईब्रेरी में पढ रहें थे । दूसरे कमरे में कुछ बच्चों को एक अध्यापक पढा रहे थे । वास्तव में रामकिशन ने बच्चों व युवकों के सर्वांगीण विकास व कर्मशीलता का विकास किया है। वह प्रशसनीय कार्य है।

साढे नौ बजे दोनो कमरे में वापिस आ गए । रामकिशन ने अपना बिस्तर नीचे फर्ष पर लगाया और पुस्तक पढने बैठ गए ।

‘‘तुम उपर बैड पर सो जाओ, मैं नीचे सो जाता हूंँ ।‘‘ रामकिशन  बोले,
" नहीं नहीं, मैं नीचे सो जाता हूँ" शिवदास ने कहा
" नही शिवदास मैं रोज़ नीचे ही सोता हूँ। तुम्हें आदत नही होगी आश्रम मे तो गद्देदार बिस्तर होंगे।" 

सच में रामकिशन हर बात में उससे अधिक सादा व त्यागमय जीवन जी रहा है । मैने तो भगवें चोले के अंदर अपनी इच्छाओं को दबाया हुआ है मगर रामकिशन ने सफेद उज्जवल पोषाक की तरह अपनी आत्मा को ही उज्जवल कर लिया है ।

‘‘ अब तुम्हारा क्या प्रोग्राम है ?‘‘

‘‘प्रोग्राम?‘‘ वह सोच से उभरा.....‘‘ कुछ नही। कल चला जाऊँगा ।‘‘

‘यहीं क्यों नही रह जाते ? मिल कर काम करेंगे ।‘‘

‘‘ नही दोस्त, मैं अपने परिवार को कुछ दे तो न सका अब उन्हेने  स्वयं अर्जित सुख का सासँ लिया है उसमें खलल नहीं डालूँगा, उनकी शाँति भंग नही करूँगा । किस मुँह से जाऊँगा उनके सामने? जाने -अनजाने किए पापों का प्रायष्चित  करना चाहता हूँ । याद है मैने तुमसे कहा था कि जब जीवन को समझ  न पाऊँगा तो तुम्हारे पास ही आऊँगा । जो कुछ मैं इतने वर्षों मे न  सीख पाया वह आत्मबोध वो ग्यान  मुझे तुम्हारा जीवन देखकर मिला है । मैं तो योगी बनने का कर भगवान को याद करता रहा मगर उनके उद्देश्य को भूल गया और साधु वाद के मायाजाल में फँसा रहा या यूँ कहें कि जहाँ से चला था वहीं खडा हूँ।

‘‘लेकिन तुम जाओगे कहाँ ? आश्रम भी तुमने छोड़ दिया है ? जीवन - यापन के लिए भी तुम्हारे पास कुछ नही ।‘‘

‘‘ तुम से जो कर्मशीलता और आत्मबल की सम्पति लेकर जा रहा हूँ उसी से तुम्हारे अभियान को आगे ले जाऊँगा । इस दुनियाँ में अभी बहुत अच्छे लोग है जो मानवता के लिए कुछ करना चाहते हैं, उनकी सहायता लँूगा ।‘‘

बातें करते-करते दोनो कुछ देर बाद सो गए । सुबह तीन बजे ही शिवदास की आँख खुली । वह चुपके से उठा नहा-धोकर तैयार होता तो राम किशन की आँख खुल जाती । वह रामकिशन के उठने से पहले निकल जाना चाहता था । एक बार उसका मन  हुआ कि अगर आज रूक जाए तो किसी बहाने अपनी पत्नि और छोटे बेटे को भी देख लेता ...... मगर उसने विचार त्याग दिया... यह तड़प ही उसकी सजा है.... । उसने चुपके से अपना सामान उठाया और धीरे से दरवाज़ा खोलकर बाहर निकल गया ।

बाहर खुले आसमान चाँद तारों की -झिलमिल रोशनी में वह पगडण्डी पर बढा जा रहा था । पाँव के नीचे पेड़ों के -झडे सूखे  पत्तों की आवाज आज उसे संगीतमय लगी । इस धुन से उसके पैरों में गति आ गई ... और वह अपने साधना के उज्जवल भविष्य के कर्तव्य-बोध से भरा हुआ चला जा रहा था  ..... सच्चा साधू बनने ---- सच्ची साधना के लिये।-------- समाप्त

28 February, 2010

हज़ल

हज़ल
होली की आप सब को हार्दिक शुभकामनायें
आज कहानी की आखिरी किश्त  बीच मे रोक कर  अपने छोटे भाई पंकज सुबीर के आदेश पर ये हज़ल पेश कर रही हूँ आप जानते हैं कि रिटायरी कालोनी मे तो होली मनाई नही जाती, तो हमने सोचा कि  पंकज सुबीर के मुशायरे मे चलते हैं लेकिन वहाँ जा कर क्या हाल हुया ये आप सब देख लें । इस भाई ने तो मुझे वो जूते पडवाये कि बस पूछो न। लेने के देने पड गये । कहते कि हज़ल लिखो बाप रे इतनी मुश्किल बहर दे दी मगर हम भी कहाँ कम थे---दे तडा तड वो जूते बरसाये कि होली का आनन्द आ गया हमे कहा कि खूब गोबर जूतों का इस्तेमाल करो। तो आप देखिये कैसे खेली हम ने होली।  पहली बार हज़ल लिखी है बुरा न मानो होली है। मिसरा था-----

उतारो जूतों से आरती अब सनम जी आये गली हमारी
छोटे भाई  ने पता नही किस जन्म का बदला लिया। पतिदेव ने पढ कर हमारे जूते से ही हमारी होली मना दी--- हा हा हा।और सब से बडी खुशखबरी कि उन्हें  उनके उपन्यास  पर नवलेखन ग्यान पीठ पुरुस्कार मिला है जिस के लिये उन्हें बहुत बहुत बधाई।
हज़ल
बहार ले कर है आयी होली खुशी मनाये गली हमारी
उतारो जूते से आर्ती अब सजन हैं आये गली हमारी

सखी ले आना तगारी गोबर गुलाल ले कर उसे सजाना
करो सुवागत जु शान से वो ठहर न पाये गली हमारी

अबीर कीचड मिला बनायें जरा सा उबटन लगे सजीला
खिलाऊं घी गुड चुरी उसे जो पकड के लाये गली हमारी

बना सखी  हार चप्पलों से सडे टमाटर पिरोना उपले
है चाहता तो गधे पे चढ कर चला वो आये गली हमारी

निगाह उसकी मुझे है ढँढे मै बचती छुप छुप सखी के पीछे
बने वो छैला कहे है लैला मुझे सताये गली हमारी

करूँ विनय लो न भाँग धतूरा अभी है मेरी नज़र शराबी
सजी धजी सजनी ले के डंडा तुझे बुलाये गली हमारी

बहुत सताया मुझे है पर अब मै गिन के बदले करूँगी पूरे
बुरा न मानो शुगल करें जो होली मनाये गली हमारी

मुझे सताये बना बहाने बता भला ये उमर है कोई
चखाऊँ उसको बना के भुर्ता मजे से खाये गली हमारी

हैं दाँद नकली चढा है चश्मा झुकी कमर है बने जवाँ वो
ले धूल मिर्ची बुरक उसे जो ये छब बनाये गली हमारी

करो पिटाई करो ठुकाई बुढू को देखो बना मजाजी
मजा चखाऊँ उसे बताऊँ कभी जु आये गली हमारी

निरा ही लम्पट न शक्ल सूरत मलो तो चून औ चाक मुँह पर
बना के जोकर नमूना उसको उठा दिखाये  गली हमारी

ये ब्लाग दुनिया हुयी चकाचक बिखर रही है खुशी जहाँ मे
सुबीर लाये रंगीन होली हसे हसाये गली हमारी

सजे ये होली सजें नशिश्तें सभी तरफ हो खुशी मुहब्बत
मुबारकें है सलाम भी है यूँ खिलखिलाये गली हमारी।

26 February, 2010

सच्ची साधना [कहानी]

सच्ची साधना

कल आपने पढा कि शिवदास अपनी जिम्मेदारियों से भाग कर साधु बन गया और 20-25 साल बाद वो साधु के वेश मे अपने गाँव लौटता है। उसका मन साधु के रूप मे भी अब नही लगता था।  eएक दिन उसका मन बहुत उदास हुया तो उसे अपने घर की याद आयी।वो अपने गाँव लौटता है और अपने दोस्त्राम किशन से मिलता है अब आगे पढिये --------


‘पहले यह बताओ कि तुम बीस--पचीस वर्ष कहाँ रहे ? राम किशन शिवदास के बारे में जानने के उत्सुक थे ।


‘यहां से मैं सीधा उसी बाबा के आश्रम में गया जो हमारे गाँव आए थे । दो वर्ष उनके पास रहा मगर वहाँ मुझे कुछ अच्छा नही लगा । वहां साधु संतों के वेश  में निटठले, लोग अधिक थे । मुझे लगा लोग जिस आस्था से साधू संतों के पास आते हैं उस आस्था के बदले उन्हें रोज-रोज़  वही साधारण से प्रवचन, कथाएं आदि सुनाकर भेज दिया जाता है । उन्हें अपने ही आश्रम से बांधे रखने के लिए कई तरह के प्रलोभन, मायाजाल विछाए जाते हैं । मैं भक्ति की जिस पराकाष्टा पर पहूँचना चाहता था उसका मार्गदर्षन नही मिल पा रहा था । साधू महात्मों की सेवा करते करते करते मेरा परिचय कुछ और साधुओं से हो गया । एक दिन चुपके से मैं किसी और संत के आश्रम में चला गया ।
वहां कुछ वेद पुराण आदि पढे महात्मा जी से बहुत कुछ सीखा भी। वो बहुत अच्छे थे। वहाँ मुझे 4-5 साल हो गये थे। माहौल तो इस आश्रम में भी कुछ अलग नही था मगर वहां से एक वृद्ध संत मुझ पर बहुत आसक्ति रखते थे । उन्हें वेदों का अच्छा ज्ञान था मगर आश्रम की राजनीति के चलते ऐसे ज्ञानवान सच्चे संत के पास भी स्वार्थी लोगों की भीड जमा हो जाती है जो उनकी अच्छाई का फायदा उठा कर अश्रम का संचालन करने लगती है। उन्होंने मुझे समझाया कि तुम अपने सच्चे मार्ग पर चलते रहो बाकी भगवान पर छोड़ दो । हर क्षेत्र में तरह-तरह के लोग हं। आश्रम की व्यवस्था को बनाए रखने के लिए कई बार अपने आप से समझौता करना पड़ता है । मैंने बड़ी मेहनत से यह आश्रम बनाया है । मैं चाहता हूं कि अपनी गददी उस इन्सान को दूं जो सच्चाई, ईमानदारी से इसका विस्तार कर सके । मैं चाहता हँ, कि तुम इतने ज्ञानवान हो जाओं कि मैं निष्चिंत होकर प्रभू भक्ति में लीन हो जाऊं । और इसका सारा प्रबन्ध तुम्हारे हाथों सौंप दूँ

उन्होंने मुझे कथा वाचन में प्रवीन किया । मैं कई शहरों में कथा के लिए जाने लगा । मेरे सतसंग में काफी भीड़ जुटने लगी । आश्रम में षिष्य बड़ी गिनती में आने लगे । दान- दक्षिणा में कई गुणा वृद्धि हुई । महात्मा जी नेअपने आश्रम की बागडोर मेरे हाथ मे सौंप दी,  और मैं उनकी छत्रछाया मे आश्रम का विस्तार करने लगा।  भक्तों में कई दानी लोगों की सहायता से मैंने उस आश्रम में बीस कमरे और बनवा दिए । कुछ कमरे साधू संतों के लिए और कुछ कमरे आश्रम में आने वाले भक्तों के लिए । बड़े महात्मा जी ने मुझे अपना उत्राधिकारी घोषित कर दिया था । धीरे-धीरे आश्रम में सुख सुविधाएं भी बढने लगी  । कुछ कमरे वातानुकूल बन गए । आश्रम के लिए दो गाड़ियां तथा दो ट्रक आ गए । अब कई और साधू इस आश्रम की ओर आकर्षित होने लगे । सुख सुविधओं का लाभ उठाने के लिए कई धीरे- धीरे मुझे से गददी हथियाने के षडयन्त्र रचे जाने लगे, बड़े महात्मा जी के कान भरे जाने लगे । कई बातों में बडे़ महात्मा जी और मुझ में टकराव की स्थिती बनने लगी मुझे लगता था कि बीस वर्ष की मेहनत से जो आश्रम मैंने बनाया वह नकारा लोगों की आरामगाह बनने लगा है । मगर महात्मा जी ये सब देख नही पाते लोगों की चाल को समझ नही पाते।
मेरा मन वहां से भी उचाट होना शुरू हो गया । मुझे लगा कि यह आश्रम व्यवस्था धर्म के नाम पर व्यवसाय बनने लगा है । मेरा मन मुझ से सवाल करने लगा कि तू साधु किस लिए बना ? ये कैसी साधना करने लगा ? भौतिक सुखों, वातानुकूल कमरे और गाड़ी से एक संत का क्या मेल जोल है ? चार पुस्तकेंे पढ कर लोगों को आश्रम के माया जाल में बाँध लेते है और कितने निटठले लोग उनकी खून पसीने की कमाई से अपनी रोजी रोटी चलाते है लोग  संतों के प्रवचन सुनते है बाहर जाते ही सब भूल जाते है । मैं जितना आत्म चिंतन करता उतना ही उदास हो जाता । मुझे समझ नहीं आता खोट कहाँ है मुझ मे या धर्म की व्यवस्था में । इन आश्रमों को सराय न होकर अध्यात्मिक संस्कारों के स्कूल होना चाहिए था ।

एक दिन अचानक आश्रम में कुछ साधुओं का आपत्तिजनक व्यवहार मेरे सामने आया । जिस साधू का ये कृत्य था वो भी महात्मा जी का खास शिष्य था। अगर मैं शिकायत करता तो भी शायद उन्हें विश्वास न आता। इस लिये मैने वहाँ से चले जाने का मन बना लिया। मैंने उसी समय महात्मा जी के नाम चिटठी लिखकर उनके कमरे में भेज दी जिसमें आश्रम में चल रही विसंगतियों का उल्लेख कर अपने आश्रम से चले जाने के लिए क्षमा माँगी थी । उसी समय मैं अपने दो चार कपड़े लेकर वहाँ आया । अचानक लिए फैसले से मैं ये यह निष्चय नही कर पा रहा था कि मैं कहाँ जाऊं । आखिर रहने के लिए कोई तो स्थान चाहिए ही था । मैं वहां से सीधे अपने एक प्रेमी भक्त के घर चला गया । वो बहुत बड़ा व्यवसायी था । मेरे ठहरने का बडिया प्रबन्ध हो गया । अब मैं सोचने लगा कि आगे क्या करना चाहिए । आश्रमों के माया जाल में फँसने का मन नहीं था । अगर कहीं कोई भक्त एक कमरा भी बनवा दे तो लोगों का तांता लगने लगेगा । और मैं फिर उसी चक्कर मे फंस जाऊँगा--- लोगों के अन्धविश्वासऔर धर्म पर आस्था   मुझे फिर एक और आश्रम मे तबदील कर देंगे।  दुनियाँ से मन विरक्त हो गया है । मेरे भक्त आजीवन मुझे अपने पास रखने के लिए तैयार है । अभी कुछ तय नही कर पाया हूँ । बस एक बार तुमसे मिलने की इच्छा हुई, घर की बच्चों की याद आयी तो चला आया । यहाँ जाकर सोचँूगां कि आगे कहाँ जाना है  ये कहकर शिवदास चुप हो गया ।
‘‘इसका अर्थ हुआ जहाँ  से चले थें वही हो । न मोह माया छूटी और न दुनिया के कर्मकाण्ड । अपने परिवार को छोड़कर दूसरों को आसरा देने चले थे उसमें भी दुनिया के जाल में फंस गए । तुमने वेद पुराण पढे वो सब व्यर्थ हो गए । आदमी यहीं तो मात खा जाता है । वह धर्म के रूप को जान लेता है मगर उसके गुणों को नही अपनाता । साधन को साध्य मान लेता है । धर्म के नाम पर चलने वाले जिन आश्रमों के साधु संँतों में भी राजनीति, वैर विरोध गददी के लिए लड़ाई, जमीन के लिए लड़ाई, अपने वर्चस्व के लिए षडयन्त्र, अकर्मण्यता का बोल बाला हो, वह लोगों को क्या शिक्षा दे सकते है ? आए दिन धार्मिक स्थानों पर दुराचार की खबरें, आपस में खूनी लड़ाई के समाचार पढने को मिल रहे हैं । मैं यह नही कहता कि अच्छे साधु सँत नही हैं बहुत होंगे  मगर इस व्यवसाय मे सभी मजबूर होंगे । । ऐसे लोगों के कारण ही धर्म का विनाश, हो रहा है । लोगों की आस्था पर कुठाराघात हो रहा है ....।."-- रामकिशन बोल  रहे थें ।

‘अच्छा छोड़ो यह विषय । अब अपने बारे में बताओ । तुम भी तो आश्रम चला रहे हो ? शिवदास ने पूछा ।

सच्ची साधना ---4

‘‘ यह आश्रम नही बल्कि एक स्कूल है जहाँ बच्चों को उनके खाली समय में सुसंस्कार तथा राष्ट्र प्रेम की षिक्षा दी जाती है । किसी को इस आश्रम के किसी कमरे में ठहरने की अनुमति नहीं है । मुझे भी नही । मेरी यह कोठरी मेरी अपनी जमीन में है । मेरा रहन--सहन तुम देख ही रहे हो । गाड़ी तो दूर मेरे पास साइकिल भी नही है ।‘‘

‘" तुम तो जानते हो स्वतंत्रता संग्राम में मन कुछ ऐसा विरक्त हुआ, शादी की ही नहीं । आजा़दी के बाद कुछ वर्ष राजनीति में रहा । पद प्रतिष्ठा की चाह नही थी । कुछ प्रलोभन भी मिले मगर मैं कुछ ऐसा करना चाहता था जिससे लोंगों में राष्ट्र प्रेम और भारतीय संस्कारों की भावना जिन्दा रहे । इसके लिए मुझे लगा कि आने वाली पीढियों की जड़ें मजबूत होगी, संस्कार अच्छे होंगे तभी भारत को दुनिया के शिखर पर  देखने का सपना पूरा होगा । इस सपने को पूरा करने के लिए मैंने सबसे पहले अपने गाँव को चुना । अगर मेरा यह प्रयोग सफल हुआ तो और जगहों पर भी लोगों द्वारा ऐसे प्रयास करवाए जा सकते हैं ।"

"मेरे पास मेरी - इस झोंपडी  के अतिरिक्त पँद्रह कनाल जमीन और थी जो मेरे बाप दादा मेरे नाम पर छोड़ गए थे । मैंने दो कनाल जमीन बेचकर कुछ पैसा जुटाया और आठ कनाल जमीन पंचायत के नाम कर दी । पंचायत की सहायता से एक कनाल जमीन पर चार हाल कमरे बनवाए । वहाँ मैं सुबह शाम गाँव के बच्चों को इक्ट्ठा करता । गाँव के कुछ युवकों की एक संस्था बना दी जो बच्चों को सुबह व्यायाम, प्रार्थना, खेलकूद तथा राष्ट्र प्रेम और सुसंस्कारों की षिक्षा दें । धीर धीरे यह सिलसिला आगे बढा। गाँव के लोग बच्चों की दिनचर्या और आचरण देखकर इतने प्रभावित हुए कि बड़े छोटे सब ने उत्साह पूर्वक इसमें सहयोग किया । बच्चों को हर अपना कार्य स्वयं करने का प्रषिक्षण दिया जाता । आश्रम की बाकी जमीन में फल-सब्जियाँ उगाए जाते इसके लिए बच्चों में  सब को  एक-एक क्यारी बाँट दी जाती । जिस बच्चे की क्यारी सब से अधिक फलती फूलती उसे ईनाम दिया जाता । इससे बच्चों में खेती बाड़ी के प्रति रूची बढती और मेहनत करने का जज्बा भी बना रहता । फसल से आश्रम की आमदन भी होती जो बच्चों पर ही खर्च की जाती । आश्रम मे पाँच दुधारू पशू भी है जिनका दूध बच्चों को ही दिया जाता है । पूरा गांव इस आश्रम को किसी मंदिर से कम नही समझता । गाँव के ही शिक्षित युवा बच्चों को मुफ्त टयूषन पढाते हैं। खास बात यह है कि इस आश्रम में न कोई प्रधान है न नेता, न कोई बड़ा न छोटा । सभी को बराबर सम्मान दिया जाता है । इसके अन्दर बने मंदिर में जरूर एक विद्धान पुजारी जी रहते हैं जो बच्चों को वेदों व शास्त्रों का ज्ञान देते है । हर धर्म में उनका ज्ञान बंदनीय है । जब तक ज्ञान के साथ कर्म नहीं होगा तब तक लोगों पर प्रभाव नहीं पडता, सुधार नही होता । इसलिए अध्यात्म, योग, संस्कार ज्ञान विज्ञान की शिक्षा के साथ साथ कठिन परिश्रम करवाया जाता है ।"

पाँच छः वर्षों में इस आश्रम की ख्याति बढने लगी । सरकारी स्कीमों का लाभ बच्चों व गाँव वालों को मिलने लगा । आस पास के गाँव भी इस आश्रम की तर्ज पर काम करने लगे हैं इस गाँव का अब कोई युवा अनपढ नही है, नशाखोरी से मुक्त है । इन पच्चीस वर्षों में कितने युवक -युवतियाँ पढ लिखकर अच्छे पदों पर ईमानदारी से काम तो कर ही रहें हैं । साथ-साथ जहाँ भी वो कार्यरत है वहीं ऐसे आश्रमों की स्थापना मे भी कार्यरत हैं । अगर हर गाँव -ेऔर शहर  में कुछ अच्छे लोग मिलकर ऐसे समाज सुधारक काम करें तो भारत की तसवीर बदल सकते है ं । आज बदलते समय के साथ कर्मयोग की षिक्षा का महत्व है । अगर शुरू से ही चरित्र निर्माण के लिए युद्धस्तर पर काम होता तो आज भारत विष्व गुरू होता । जरूरत है उत्साह, प्रेरणा और दृढ निष्चय की । बस मुझे इस मशाल को जलाए रखना  है, जब तक जिन्दा हूँ । इसके लिए हर विधा में अन्तर्राजीय प्रतिस्पर्धाएँ हर वर्ष करवाई जाती हैं जिसका खर्च लोग, पंचायतें व सरकार के अनुदान से होता है ।" राम किषन की क्राँति गाथा को शिवदास ध्यान से सुन रहे थें ।

शाम के  पाँच बज गए थे । रामकिशन उठे  "शिवदास तुम आराम करो मैं बच्चों को देखकर और मंदिर होकर आता हूं । शिवदास ने दूध का गिलास गर्म करके उसे दिया और अपना गिलास खाली कर आश्रम की तरफ चले गए । शिवदास के आगे रखी फलों की प्लेट वैसे की वसे पड़ी थी । राम किशन के जोर देने पर उन्होंने दो केले खाए और लेट गए ।

लेटे-लेटे शिवदास आत्म चिंतन करने लगा । उन्हें लगा कि साधु बन कर उन्होंने जो साधना की है उसका लाभ लोगों को उतना नही मिला जितना रामकिशन की साधना का फल लोगों को मिला है । रामकिशन के व्यक्तित्व के आगे उन्हें अपना आकार बौना लगने लगा ।म न अशाँत हो गया । दोनों ने त्याग किया मगर रामकिशन का त्याग, कर्मठता, मानवतावादी आदर्ष उन्हें साधु-संतों के आचरण से ऊँचे लगे । वो तो मोह माया के त्याग की केवल  शिक्षा ही  देते हैं  और खुद भक्तों के धन से अपने भौतिक प्रसार में ही लगे रहे । आत्मचिन्तन में एक घंटा कैसे बीत गया उल्हें पता ही नही चला । तभी रामकिशन लौट आए । आते ही उन्होंने रसोई में गैस जलाई और पतीली में खिचड़ी पकने के लिए रख दी ।

24 February, 2010

सच्ची साधना--- कहानी
कल आपने पढा कि शिवदास अपनी जिम्मेदारियों से भाग कर साधु बन गया और 20-25 साल बाद वो साधु के वेश मे अपने गाँव लौटता है। उसका मन साधु के रूप मे भी अब नही लगता था।  आगे पढिये\---------
शिवदास मेहनती नही था । बी.ए. करने के बाद उसने कई जगह हाथ पाँव मारे मगर उसका मन किसी काम में न लगता । तो माँ-बाप ने उसकी शादी कर दी । दो--तीन साल  बाद पिता जी के साथ दुकान पर बैठने लगा । उसके दो बेटे भी हो गये मगर उसका मन स्थिर न था न ही उसे कठिन परिश्रम की आदत थी । अब दुकान से भी उसका मन उचाट होने लगा ।

उन्ही दिनों गाँव के मंदिर में एक साधु आकर ठहरे । शिवदास रोज िआश्रम को उनकी सेवा के लिए जाने लगा । घर वाले भी कुछ न कहते । उन्हें लगता शायद साधु बाबा ही उसे कोई बुद्धि दे दें । संयुक्त परिवार में अभी तो सब ठीक-- ठाक चल रहा था मगर शिवदास के काम न करने से भाई भी खर्च को लेकर अलग होने की बात करने लगे थे ।

साधु बाबा की सेवा करते--करते वह उनका दास बन गया । अब उसका सारा दिन मंदिर में ही व्यतीत हो जाता । अब घर वालों को चिन्ता होने लगी । पत्नि भी दुखीः थी । वह पत्नि से भी दूर-दूर रहने लगा । वह साधु लगभग छः माह उस गाँव में रहे । उसके बाद अचानक एक दिन चले गए । उन्हें अपने कुछ और भक्त बनाने थे सो बनाकर चल दिए । अब शिवदास उदास रहने लगा । काम धन्धे पर भी नही जाता । उसके भाईयों ने रामकिषन से विनती की कि शिवदास को कुछ समझायें क्योंकि रामकिशन उसका दोस्त था, शायद उसके समझाने से समझ जाए । एक दिन रामकिशन उसके घर पहूँच गया । शिव्वदास अभी मंदिर से आया था । शिवदास ने उसे बैठक में बिठाया और अंदर चाय के लिए आवाज लगाई ।

‘कहो भई शिवदास कैसे हो । सुबह  दस बजे तक तुम्हारी पूजा चलती है ?

‘पूजा कैसे, बस जिसने यह जीवन दिया है उसके प्रति अपना फर्ज निभा रहा हूं ।‘

‘वो तो ठीक है मगर मा-बाप,, पत्नि  और बच्चों के प्रति भी तो तुम्हारा कर्तव्य है उसके बारे में क्यों नही सोचते ?‘

‘प्रभू है । उसने जन्म दिया है वही पालेगा भी ।‘

‘ शिवदास जो लोग जीवन में संघर्ष नहीं करना चाहते, वही जीवन से भागते है । हमारे शास्त्रों में अनेक ऋषी--मुनि हुए है जिन्होंने अपने पारिवारिक जीवन का निर्वाह करते हुए भगवान को पाया है । कर्म से, कर्तव्य से भागने की शिक्षा कोई धर्म नही देता ।‘

‘देख रामकिशन तू मेरा दोस्त है, तू ही मुझे सच्चे मार्ग से खींच कर मोह माया के -झूठे जाल में फँसाना चाहता है । धर्म का मार्ग ही सत्य है ।‘‘

‘धर्म ? धर्म का अर्थ भी जानता है ?‘

‘वही तो जानना चाहता हूं । यह मेरा जीवन है । मैं अपने ढंग से इसे जीना चाहता हूँ जब मुझे  लगेगा कि मैं भटक रहा हूं तो सबसे पहले तेरे पास ही आऊंगा । बस, अब दोस्ती का वास्ता है, मुझे परेशान मत करो ।‘

‘ठीक है भई, तुम्हारी इच्छा, मगर याद रखना भटकने वालों को कभी मंजिल नही मिलती ।" कहकर रामकिशन चले गए ।

इस बात के अगले दिन ही शिवदास घर छोड़कर चला गया था । बहुत जगह उसे खोजा गया मगर कही उसका पता नही चला । तब से शिवदास को भी कुछ पता नही था कि उसके परिवार का क्या हुआ । पच्चीस वर्ष बाद लौटा है । क्यो ? ... वह नही जानता ।

इन्ही सोचों में डूबा शिवदास पगडंडी पर चला जा रहा था कि सामने से एक 25-28 वर्ष का युवक आता दिखाई दिया..... उसका दिल धड़का .... उसका बेटा भी तो इतना बड़ा हो गया होगा .....

‘बेटा क्या बता सकते हो कि रामकिशन जो स्वतंत्रता सैनानी थे उनका घर कौन सा है ? शिवदास ने पूछा ।

‘रामकिशन ? आप कही गुरू जी की बात तो नही कर रहे ?‘

‘शायद तुम्हारे गुरू हों । उन्होंने शादी नही की, देश सेवा में ही सक्रिय रहे ।‘‘ शिवदास ने कुछ और स्पष्ट किया

‘हां गुरू जी आश्रम में हैं । वहांँ राष्ट्रभक्ति दीक्षाँत समारोह चल रहा है । दाएँ मुड़ जाइए सामने ही आश्रम है । आईए मैं आपको छोड़ देता हूं ।" लड़के ने मुड़ते हुए कहा ।

‘ नही- नही बेटा मैं चला जाऊंगा ।" वह आगे बढ गए और लड़का अपने रास्ते चला दिया । लड़के के शिष्टाचार से शिवदास प्रभावित हुआ । गांँव का लड़का इतना सुसंस्कृ्रत: ....... कैसे हाथ जोड़कर बात कर रहा था । ... यह रामकिशन मुझे नसीहत देता था और खुद गुरू बन गया । क्या इसने भी सन्यास ले लिया ? .... शायद......

जैसे ही शिवदास दाएं मुड़ा सामने आश्रम के प्रांगण में भीड़ जुटी थी । सामने मंच पर रामकिशन के साथ कई लोग बैठे थे । एक दो को वह पहचान पाया । आंगन के एक तरफ लाल बत्ती वाली दो गाड़ियांँ व अन्य वाहन खड़े थे । शिवदास असमंजस की स्थिति में था कि आगे जाए या न जाए----- ,तभी वन्देमातरम के लिए सब लोग खड़े हो गए । वन्देमातरम के बाद लोग बाहर निकलने लगे । शिवदास एक तरफ हट कर खड़ा हो गया । उसने देखा, दो सूटड--यबूटड युवकों ने रामकिशन के पांव छूए और लाल बत्ती वाली गाड़ियों में बैठकर चल दिए । धीरे --धीरे वाकी सब लोग भी चले गए । तभी वो लड़का, जिससे रास्ता पूछा था आ गया ‘ बाबा जी, आप गुरू जी से नही मिले ? वो सामने है , चलो मैं मिलवाता हँ । ‘‘ शिवदास उस लड़के के पीछे--पीछे चल पड़े । रामकिशन कुछ युवकों को काम के लिए निर्देष दे रहे थे । लड़के ने रामकिशन के पाँव छूए ....

"गुरूदेव महात्मा जी आपसे मिलना चाहते है ।" लड़के ने षिवदास की ओर संकेत किया ।‘‘

‘ प्रणाम महाराज ,आईए अन्दर चलते है ।‘‘ रामकिशन उसे आश्रम के एक कमरे में ले गए । ‘‘ काम बताईए ।‘‘

‘यहां नही आपके घर चलते है। ‘‘ शिवदास ने कहा ।

‘कोई बात नही चलो ।‘ कहते हुए वह शिवदास को साथ ले कर आश्रम के पीछे की ओर चल दिए ।

आश्रम के पीछे एक छोटा सा साफ सुथरा कमरा था । कमरे में एक तरफ बिस्तर लगा हुआ था । दूसरी तरफ  पुस्तकों की अलमारी थी । बाकी कमरे में साफ सुथरी दरी विछी हुई थी । कमरे के आगे एक छोटी सी रसोई और पीछे एक टायलेट था । शिवदास हैरान था कि जिस आदमी को सारा गाँव गुरू जी मानता था और बड़े--बड़े प्रषासनिक अधिकारी जिसके पांँव छूते हैं और जिसके नाम पर इतना बड़ा आश्रम बना हो वह इस छोटे से कमरे में रहता हो ? इससे बडिया तो उसका आश्रम था । जिसमें भक्तों की दया से आराम की हर चीज व वातानुकूल कमरे थे । उसके पास भक्तों द्वारा दान दी गई गाड़ी भी थी । इतना सादा जीवन तो साधू होते हुए भी उसने नही व्यतीत किया । अंतस में कही कुछ विचार उठा जो उसे विचलित कर गया ................... आत्मग्लानि का भाव । वह साधू हो कर भी भौतिक पदार्थों का मोह त्याग नही पाया और रामकिशन साधारण लोक जीवन में भी मोह माया ये दूर है .... वो ही सच्चा आत्म ज्ञानी है ।

‘महाराज बैठिए, आपकी क्या सेवा कर सकता हूं ‘‘ उन्होंने बिस्तर पर बैठने का संकेत किया ।

‘मुझे पहचाना नही केशी? ‘‘ शिवदास ने धीरे से पूछा । वो रामकिशन को केशी कह कर ही पुकारा करता था ।

‘‘ बूढा हो गया हूँ । यादाश्त भी कमजोर हो गई है । मगर तुम शिवदास तो नही हो ? रामकिशन ने आश्चर्य से पूछा

‘हां, शिववदास  हूँ तेरा दोस्त‘‘ कहते हुए शिवदास की आँखें भर आई

‘शिववदास तुम,?" उन्होंने शिवदास को गले लगा लिया

‘अभी इस राज को राज ही रखना । ‘ शिवदास घीरे से फुसफुसाया

‘‘ठीक है, तुम आराम से बैठो ।‘

‘गुरूदेव, पानी । ‘ उसी लड़के ने अन्दर आते हुए कहा और पानी पिलाकर चला गया ।

‘ ये लड़का बड़ा भला है । सेवादार है ?‘‘ शिवदास से उत्सुकता से पूछा ।

‘यहां मेरे समेत सभी सेवादार है । तुम भी कितने अभागे हो । जिसे बचपन में ही अनाथ कर गए थे ये वही तुम्हारा बेटा कर्ण है ।‘‘

‘क्या ?‘ शिवदास झटका सा लगा । खून  में तरंग सी उठी । उसका जी चाहा कर्ण को आवाज देकर बुला ले और गले से लगा ले । उसका दिल अंदर से रो उठा ।

‘ तुम्हारे जाने के बाद तुम्हारे परिवार ने बहुत मुसीबतें झेली हैं। मगर तुम्हारी पत्नि ने साहस नही छोड़ा । कड़ी मेहनत करके बच्चों को पढाया लिखाया और काम पर लगाया। काम अच्छा चल निकला है । रामकिशन उन्हें बच्चों और उनके काम काज के बारे में बताते रहे । पर षिवदास का मन बेचैन सा हो रहा था कि पत्नि कैसी है -वो कैसे इतना कुछ अकेले कर पाई होगी---- मगर पूछने का साहस नही हो रहा था । पूछें तो भी किस मुंह से ...... उस बेचारी को वेसहारा छोड़कर चले गए थे । आज वो फेसला नही कर पर रहा था कि उसने अपना रास्ता चुनकर ठीक किया या गलत और माँ बेचारी---- उसे एक बार देखने का सपना लिए संसार से विदा हो गई..............।



‘पहले यह बताओ कि तुम बीस--पचीस वर्ष कहाँ रहे ? राम किशन शिवदास के बारे में जानने के उत्सुक थे ।क्रमश:

22 February, 2010

सच्ची साधना [कहानी]

सच्ची साधना {कहानी}

बस से उतर कर शिवदास को समझ नहीं आ रहा था कि उसके गांव को कौन सा रास्ता  मुड़ता है । पच्चीस वर्ष बाद वह अपने गाँव आ रहा था । जीवन के इतने वर्ष उसने जीवन को जानने के लिए लगा दिए, प्रभु को पाने के लिए लगा दिए । क्या जान पाया वह ? वह सोच रहा था कि अगर कोई उससे पूछे कि इतने समय में तुमने क्या पाया तो शायद उसके पास कोई जवाब नही । यूँ तो वह संत  बन गया है, लोगों में उसका मान सम्मान भी है, उसके हजारों शिष्य भी है फिर भी वह जीवन से संतुष्ट नहीं है । क्या वह भौतिक पदार्थों के मोह से ऊपर उठ चुका है ? शायद नही ...... आश्रम में उसका वातानुकूल कमरा, हर सुख सुविधा से परिपूर्ण था । क्या काम, कोध्र, लोभ, मोह व अहंकार से ऊपर उठ चुका है ? ... नहीं...नहीं...अगर ऐसा होता तो आज घर आने की लालसा क्यों होती ? आज गांव क्यों आया है ? उसे अपना आकार बौना सा प्रतीत होने लगा । पच्चीस वर्ष पहले जहां से चला गया था वहीं तो खड़ा है । अपना घर, परिवार ..... गांव.... एक नज़र देखने का मोह नही छोड़ पाया है.... आखिर चला ही आया । बच्चों की याद, पत्नि का चेहरा, माँ की सूनी आंखे, पिता की  कमजोर काया ..... सब उसके मन में हलचल मचाने लगे थे । आज उसके प्रभू भी उसके मन के आवेग को रोक नही पा रहे थे ....

जहाँ बस से उतरा था वहाँ सड़क के दोनो ओर आधा किलामीटर तक बड़ी-ंउचयबड़ी दुकानें थीं । जब वो वहां से गया था तो यहाँ दो चार कच्ची पक्की दुकानें थी । अब आसपास के गांवों के लिए इस बाजार में से होकर सड़क निकलती थी । 8--10 दुकानों के बाद एक कच्ची सड़क थी ।--- पता नही कहाँ गयी---- किसी से पूछना ही ठीक रहेगा ..... सोचते हुये वो एक दुकान की तरफ बढा---

‘भईया, मेहतपुर गांव को कौन सी सड़क जाती है ? ‘शिवदास ने एक हलवाई की दुकान पर खड़े होकर पूछा । वह पहचान गया था-- कि यह उसका सहपाठी वीरू था । मगर शिवदास अपनी पहचान नही बताना चाहता था । साधु के वेष में लम्बी दाढी, जटाएं कन्धे तक -झूलती हुई , हाथ में कमण्डल .... लामबा सा साधुयों वाला चोला

‘‘वो सामने है बाबा जी ।‘‘ वीरू ने सड़क की तरफ इशारा किया । ‘‘ बाबा कुछ चाय पानी पी लीजिए ।‘‘ वीरू ने सेवा भाव से कहा ‘‘ धन्यवाद भाई, कुछ इच्छा नही ।‘‘ पहचाने जाने के डर से वह आगे बढ गया । मन फिर कसमसाने लगा .... उसे डर किस बात का है ? क्या वह कोई अपराध करके गया है ? ....... शायद चोरी से बुजदिल की तरह घर से भाग गया ...... बीबी, बच्चों का बोझ नही उठा पाया ।

सडक़ पर चलते हुए उसके पाँव भारी पड़ रहे थें । वह किसी भी जगह जीवन से संतुष्ट क्यों नही हो पाता । क्यों भटक रहा है? ... यह तो उसने सोच लिया था कि वह अपने घर नही जाएगा । पहले राम किशन के पास जाएगा, उसके बाद सोचेगा । राम किशन उसका बचपन का दोस्त था। यदि रामकिशन न मिला तो मंदिर में ठहर जाएगा ।

आज यह साँप की तरह बल खाती सड़क खत्म होने को नाम नही ले रही थी । वह अपनी सोच में चला जा रहा था । सड़क खत्म होती ही एक बड़ी सी हवेली थी । वह पहचान गया -\---  ये तो ठाकुर शमशेर  सिंह की हवेली है-- .... समय के साथ हवेली भी अपनी जीवन सँध्या में पहँच चुकी थी । आगे बड़े-बड़े, ऊँचे  पक्के मकान बन गए थे । गाँव का नक्शा  ही बदल गया था । न तालाब .... न पेड़ों के -झुरमुट, न पीपल के आस-ऊँचे से  बने चबूतरे .... । गाँव में जिन घने पेड़ों के नीचे चबूतरों पर सारा दिन यार दोस्त इकटठे होते तो कहकहों के स्वर गूँजते , राजनीति पर चर्चा होती । कही ताश के पत्तों के साथ गम बांटा जाता । ऐसा लगता सारा गांव एक ही खुशहाल परिवार है, जैसे इनकी जिन्दगी में कोई चिन्ता ही नहीं---- कि उपर भी जाना है कुछ भगवान का नाम ले लें मगर आज सब कुछ बेजान है ।

उसे रामकिशन  का ध्यान आया क्या फक्कड़ आदमी था । आज़ादी के आँदोलन में ऐसा बावरा हुआ न शादी की न घर बार बसाया .... न अपना मकान बनाया बस एक  टूटी सी -झोँपड़ी मे ही प्रसन्न रहता । घर रहता ही कितने दिन .... आज़ादी के आँदोलन में कभी जेल तो कभी कहीं चला रहता था । उसे आज भी उसकी दिवानगी याद है ... वह कुछ माह भगत सिंह से साथ भी जेल में रहा था । जब भगत सिंह को फाँसी हुई तों रामकिशन रिहा हो चुका था । भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरू की फाँसी का उसने इतना दुखः मनाया कि तीन--चार दिन उसने कुछ नही खाया । इस दर्दनाक शहादत ने रामकिशन को अन्दर तक -झकझोर कर रख दिया था । वह अपनी -झोँपड़ी के बाहर चारपाई पर पड़ा, आजादी के, भगत सिंह के गीत गाता रहता । गाँव के लोगों को बच्चों को इकट्ठा कर देश भक्तों की कहानियाँ सुनाता, उनके उपर ढाए गए कहर की गाथाएं सुन के लोग अपने आँसू नही रोक पाते । समय के साथ वह फिर उठा और आंदोलन में सक्रिय हो गया । आज़ादी से संबंधित साहित्य छपवा कर लोगों में बांटता तथा आज़ादी के परवानों के साथ काम करता ।
इस सारे काम के लिए धन अपनी जेब से खर्च करता । काम धन्धा तो कुछ था नहीं, पुरखों की जमीन जो उसके हिस्से में आई थी, उसी को बेचकर रामकिषन अपना खर्च चलाता । देष आजा़द हुआ । रामकिषन की खुषी का ठिकाना नहीं था । अब वह राजनिती में भी सक्रिय हो गया था । उसने उसे भी कई बार अपने साथ जोड़ने का प्रयत्न किया मगर षिवदास का मन कुछ दिन में ही उचाट हो जाता । क्रमश:

20 February, 2010

कविता पँखनुचा

कविता--- पंखनुचा

उसके अहं में छिपा विष
उसकी मैं में,
तू की अवहेलना,
शोषण की बुभुक्शा,
कामुक्ता कि लिप्सा,
अभिमान की पिपासा,
कर देती है आहत
तर्पिणी का अनुराग,
सहनशीलता,सहिश्णुता,त्याग
पंखनुचा की आहों से
सिसकता है
घर की दिवारों का
हर कण
क्योंकी
उन दिवारों ने
घुटते देखा है
उस आम औरत को
उस नाम की अर्धांगिनी को
जिसकी पहचान होती है
"बेवकूफ, गंवार औरत,
तुझे अकल कब आयेगी "
हाँ सच है,
उसे अभी अकल नही आयी
और सदियों से सहेजे खडी है
इस घर की चारदिवारी को
पर
जब कभी
अतुष्टी का भावोद्रेक
अत्याचार की अतिमा
हर लेगी
उसकी सहनशीलता
जगा देगी उस के
स्वाभिमान को
तो वो मीरा की तरह
इस विष को
अमृ्त नहीं बना पायेगी
सतयुग की सीता की तरह
धरती मे नहीं समायेगी
ये कलयुग है
क्या नहीं सुन रहा
दंडपाशक का अनुनाद
तडिताका निनाद
बनादेगी तुझे निरंश,पंगल
कर देगी सृ्ष्टी का विनाश
उस प्रलय से पहले
सहेज ले
घर की दिवारों को
अपना उसे
अर्धनारीश्वर की तरह
समझ उसे अर्धांगिनी

17 February, 2010

रिटायरी कालोनी {अपनी बात}

रिटायरी कालोनी
शायद अपना घर सब का ही सपना होता है। फिर जब आदमी अपने जीवन का सुनहरी समय सरकारी मकान मे रह कर गुज़ार दे तो उसके लिए तो अपना घर और भी अहम बात हो जाती है। फिर जब आदमी रिटायर होने के करीब आता है तो लोग अक्सर ये सवाल करने लगते हैं * अपना घर बना लिया *--- कहाँ बना रहे हैं अपना घर?* आदि आदि
मुझे भी जब एक साल रिटायर होने मे रह गया तो हम ने भी अपना घर बनाने की सोची। नंगल शहर मे तकरीबन पूरी जमीन भाखडा ब्यास मैनेजमेन्ट बोर्ड ने आकुपाई कर रखी है ,बस एक आध प्राईवेट आबादी है| बाकी प्राईवेट आबादियां साथ लगते गाँवों से जमीन ले कर बनाई जा रही हैं साथ ही नया नंगल की पूरी जमीन नेशनल फर्टेलाईजेशन कम्पनी ने ले रखी है। वहां भी आस पास के गाँवों से जमीन ले कर ही आबादियां बन रही हैं। नंगल मे जो कुछ वर्ष रह लिया उसका नंगल से जाने का मन नही होता। हम ने भी सोच लिया कि नया नंगल के पास जो कालोनी बनी है,वहीं घर बनायेंगे बडी साफ सुथरी है और रेल्वे स्टेशन , बस स्टैंड आदि की बडी सुविधा है।
 जब मुझ से कोई पूछता कि घर कहाँ बना रहे हो तो मैं बडे गर्व से  कहती शिवालिक एवन्यू मे। क्यों की वहाँ घर बहुत अच्छे बने हुये हैं। सुनते ही उनके चेहरे का रंग बदल जाता * अच्छा वो रिटायरी कालोनी मे* और मुस्कुरा देते, कई तो यहाँ तक कह देते वहाँ मत बनाओ आपका दिल नही लगेगा।। मुझे समझ नही आती कि उस कालोनी मे ऐसा क्या है? आखिर रिटायर हुये लोग भी कहीं तो रहेंगे ही। भाखडा डैम  से और एन. एफ. एल. से ही रिटायर लोग वहाँ अधिकतर रहते हैं। रिटायर होते होते बच्चे पढने या नौकरी करने बाहर निकल जाते हैं। बहुत तो अभी कही पर्मानेन्ट सेट नही हुये होते इस लिये माँ बाप को अपना बसेरा बनाना ही पडता है। खैर मैने किसी की बात पर कभी अधिक ध्यान नही दिया। जब अपना घर बन गया तो वहाँ शिफ्ट हो गये। नंगल मे अपना पास पडोस बहुत अच्छा था। लगभग हर उम्र के लोग उस कालोनी मे थे। ाक्सर ही किसी न किसी के घर कोई न कोई उत्सव आदि होते रहते। बच्चों  के जन्म दिन ,किसी की शादी की वर्षगाँठ, किसी के मुन्डन, कभी किट्टी पार्टी कुछ न कुछ चला ही रहता।अगर और कुछ नही तो सब मिल कर पिकनिक का  प्रोग्राम  बना लेते।     इस कालोनी मे जब आये तो सभी लगभग अकेले पति पत्नि किसी किसी के साथ बच्चे रहते थे। यहाँ हाल ये है कि आये दिन  किसी की मौत हो गयी, किसी की बारखी है किसी के चवर्ख है ,कोई बिमार है। मतलव कहीं न कहीं अफसोस पर जाना ही पडता है। या अधिक से अधिक हुया तो कीर्तन आदि होता है। इन लोगों के लिये मनोरंजन केवल कीर्तन या धार्मिक उत्सव ही है। हर घर का एक अलग गुरू है मतलव बाबाओं की खूब चाँदी है। उन मे से कुछ एक दो ऐसे बाबा हैं जिनकी बाबा बनने से पहले की कुछ करतूतें  अस्पताल मे नौकरी के दौरान देख चुकी थी। इन के बारे मे एक अलग पोस्ट मे लिखूँगी।बहुत लम्बी लिस्ट है। 2 साल से उपर हो गये केवल गली मे एक समारोह, हमारी बेटी की शादी हुयी। मगर पुराने शहर से अब भी शादी व्याह आदि के बहुत निमन्त्रण आते हैं।
अब मुझे पता चला है कि लोग इसे रिटायरी कालोनी कह कर क्यों नाक मुँह चढाते थे। दूसरा सभी उम्र के आखिरी पडाव पर हैं अपना खाना ही मुश्किल से बनता है अगर पडोसी बिमार हो जाये तो कौन उसकी मदद करे। वहां जरा सा बुखार भी हुया कि सभी देख भाल मे लग जाते थे। आपस मे मिलने जुलने का भी कम ही रिवाज है, किसी के घुटने दर्द कर रहे हैं तो किसी को कोई न कोई बिमारी है। वैसे सभी एक ही शहर के होने के नाते एक दूसरे को जानते हैं। भगवान का शुक्र है कि मेरा पडोस बहुत अच्छा है। आस पास दोनो घरों मे बेटे बहुयें हैं उनकी। बाकी पूरी दोनो गलियों मे केवल बूढे पति पत्नि रहते हैं । ये तो भला हो इस ब्लागिन्ग का कि मुझे व्यस्त रहने के लिये एक काम मिल गया है । खूब दिल लगा हुया  है । अगर रिटायरी कालोनी मे बिना ब्लागिन्ग के रहना पडता तो शायद मैं भी अब तक बिमार हो जाती। वैसे मेरी कालोनी बहुत अच्छी है। हर जगह का अपना अपना महत्व होता है। सोच मे पड जाती हूँ कि कैसा समय आ रहा है जहाँ आज माँ बाप को अकेले रहने को मजबूर होना पड रहा है । शायद हर छोटे शहरों मे जहाँ बच्चों के लिये अच्छी नौकरियाँ नहीं हैं वहाँ ऐसी ही रिटायरी कालोनीस जगह जगह बन जायेंगी।  तो ब्लागवुड  की जय बोलिये। कहीं यहाँ ही कोई रिटायरी कालोनी तो नही़ बन जायेगी? हम बुढों के ब्लाग जरूर देख लिया कीजिये उत्साह बना रहता है। कम से कम ये तो नही लगेगा कि हम रिटायरी कालोनी मे रहते हैं।

14 February, 2010

गज़ल

इस गज़ल को भी आदरणीय प्राण भाई साहिब ने संवारा है। उन का बहुत बहुत धन्यवाद ।

गज़ल 

ज़ख़्मी हैं चाहतें, खार सी ज़िन्दगी
क्यों लगे मुझको दुश्वार सी ज़िन्दगी

लाल रुखसार पर प्यारा सा काला तिल
और है प्यारी गुलनार सी ज़िन्दगी

सांवला  चेहरा  मुस्कराते हैं लब
मांग ले आज उपहार सी ज़िन्दगी

बच के रहना सदा तेज तुम धार से
दोस्तो,ये है तलवार सी ज़िन्दगी

चांदनी रात है मस्तियों से भरी
आज दो एक पल उधार सी ज़िन्दगी



सोएँ फूटपाथ पर जब ठिकाना नही
बद नसीबी भी बेकार सी जिन्दगी

छेद दे नाव को  लोग जो  हास में
जी रहें सब वे मझधार सी ज़िन्दगी

12 February, 2010

नई सुबह-- कहानी ]-

नई सुबह-- कहानी ]-- अगली कडी
पिछली कडी मे आपने पढा कि नीतू घर परिवार ्र नैकरी के दो पाटौ मे पिस कर परेशान थी । एक दिन वो दफ्टर से लेट हो जाने पर कि बास की डाँट न खानी पडे अपनी एक आँटी के घर चली जाती है और उस से अपनी परेशानी बताती है। उसकी आँटी उसे समझाती है------ आगे पढिये--
*बेटी ये समस्या केवल तुम्हारी ही नही ,हर कामकाजी महिला की है। अब यहाँ दो बातें आती हैं-- एक तो येकि वो बीसवीं सदी की औरत की तरह वो पूरी तरह अपने परिवार के लिये समर्पित हो कर जीये मगर किसी की ज्यादतियों के खिलाफ मुंह न खोले । अपनी छोटी छोटी जरूरतों के लियेभी दूसरों पर निर्भर रहे अगर तो पति अच्छा आदमी है तब तो ठीक है नही तो आदमी दुआरा शोशित होती रहे ,प्रताडना सहती रहे। अपना आत्मसम्मान अपने सपने भूल जाये।
 दूसरा पहलु है कि शोशित होने की बजाये आतम निर्भर बने और एक संतुलित समाज की संरचना करे। अभी ये काम इस लिये मुश्किल लग रहा है कि सदिओं से जिस तरह पुरुष के हाथ मे औरत की लगाम रही है वो इतनी आसानी से और जल्दी छूटने वाली नही हैुसके लिये समय लगेगा।इस आदिम समाज मे औरत की प्रतिभा और सम्मान को स्थापित करने  के लिये आज की नारी को कुछ तो बलिदान करना ही पडेगा।देखा गया है कि जब भी कोई क्राँति आयी उसके लिये किसी न किसी ने संघर्ष किया और कठिनाईयाँ झेली हैं तभी आने वाली पीढियों ने उसका स्वाद चखा है।
सब से बडी खुशी की बात ये है कि पहले समय से अब तक बहुत बदलाव आया है कोई समय था जब औरत को घूँघट के बिना बाहर नही निकलने दिया जाता थ पढने नही दिया जाता था,  एक आज है जब् औरत आदमी के कन्धे से कन्धा मिला कर चल रही है।ाउत कुछ तो इतना आगे बढ गयी हैं कि समाज की मर्यादाओं को भी भूल गयी हैं जो गलत है।
आज के बच्चे इस बदलाव को समझ भी रहे हैं। किसी स्क़मय मे आदमी ने कभी रसोई की दहलीज़ नही लाँघी थी, आज वो पत्नि के लिये बेड टी बनाने लगा है, दोनो नौकरी पेशा पति पत्नि मिल जुल कर घर चलाने लगे हैं।*
*पर आँटी , विकास के पास तो समय ही नही है अगर कभी हो भी तो कहते हैं मुझे आराम भी करने दिया करो। और सास ससुर जी को तो जैसे भूल ही गया है कि घर कैसे चलता है।*
* बेटी यहाँ भी एक बात तो ये है कि समाज की प्रथानुसार सास अपना एकाधिकार समझती है कि जब बहु आ गयी तो उसे काम की क्या जरूरत है दूसरी जो सब से बडी बात है वो आजकल के बच्चों की बडों से बढती दूरी। बच्चे अपने दुख सुख तकलीफें खुशियाँ केवल अपने तक ही रखते हैं । पार्टी सिनेमा के लिये समय है मगर ,कभी समय नही निकालते कि दो घडी बडों के पास बैठ कर उनसे दो प्यार भरी बातें कर लें या उनके दुख सुख सुन लें फिर बताओ आपस मे सामंजस्य कैसे स्थापित हो पायेगा। ये सब से अहम बात है जो परिवार मे सन्तुलन कायम करती है। क्या तुम ने कभी सास के गले मै वैसे बाहें डाली जैसे अपनी माँ के गले मे डालती थी?*
*आँटी मुझे फुरसत ही कहाँ मिलती है। क्या उन्हें खुद नही ये देखना चाहिये कि मुझे कितना काम करना पडता है?*
*नही बेटा उन्होंने अपने जमाने मे जितना काम किया है आज के बच्चे उतना नही कर सकते। क्या उन्होंने कभी तुम्हें काम के लिये टोका है? या किसी और बात के लिये?*
नही तो वो तो सब से मेरी प्रशंसा ही करती हैं कि बहु बहुत अच्छी है सारा काम करती है मुझे हाथ नही लगाने देती। पहले पहले तो मैं खुशी से फूल कर कुप्पा होती और भाग भाग कर काम करती मग अब बच्चों के होने के बाद मुश्किल हो गयी है।*
तो बेटा तुम्हारी समस्या तो कुछ भी नही है बस तुम्हे जरा सा प्रयास करने की जरूरत है अपनी सास को अपनी सहेली बना लो। उन्हें समझा कर एक नौकरानी रख लो या दोनो मिल कर घर चलाओ अपने पति को भी अपनी समस्या प्यार से बताओ। आधी मुश्किल तो किसी समस्या को अच्छे से न समझ पाने और गलत दृिष्टीकोन अपनाने से होती है। ये शुक्र करो कि तुम अपने परिवार के साथ हो अकेले रहने वाले लोग किस मुश्किल से बच्चे पाल रहे हैं ये तुम्हें अभी पता नही है।एक बार अच्छी तरह सोचो कि क्या तुम पहले रास्ते पर चल कर अपना वजूद कायम रख सकती हों ? या फिर एक नई सुबह के लिये संघर्ष करना चाहती हो।*
ये कह कर आंम्टी चाय के बरतन ले कर उठ गयी और मैं सोच मे पड गयी। आस पास देखा अपनी सहेलियों की बातों पर गौर किया तो लगा कि आँटी की बात मे दम है। अगर हम परिवार मे अपने रिश्तों को  सहेज कर रखें तो जीवन की आधी मुश्किलें तो आसानी से हल हो सकती हैं । मगर हम अपने अहं या तृ्ष्णाओं के भ्रमजाल मे बहुत कुछ अनदे4खा कर देते हैं जिसे समय रहते न देखा जाये तो कई भ्रामक स्थितियाँ पैदा हो जाती हैं।
मुझे शायद अपनी समस्या का समाधान मिल गया था । एक तो ये कि मेरे उपर अगर संघर्ष का दायित्व है तो निभाऊँगी,कुछ पाने के लिये कुछ खोना तो पडेगा ही। और दूसरे ापने रिश्तों को आँटी की तरह एक नई दृष्टी से देखूँगी।अँटी ने ठीक कहा है मैं घर मे माँजी और बाऊ जी से अपनी तकलीफ भी कहूँगी और उनकी भी सुनुंगी। हो सकता है वो मेरी मनोस्थिती जानते ही न हों। मैने कब कभी उनकी तकलीफ जानने की कोशिश की है। अगर समय निकक़लना हो तो बडों के लिये निकाला जा सकता है। जब माँ बिमार होती थी तो मै उनके सिरहाने से उठती नही थी मगर यहाँ आ कर कभी समय ही नही निकाला कि मैं अपनी सास के साथ भी कुछ पल बिताऊँ। पहले पहले जब कभी वो रसोई मे आती तो मैं ही उन्हें हटा देती शायद एक अच्छी बहु साबित करने के लिये । इसके बाद शायद उन्हें भी आदत पड गयी हों और भी बहुत से ख्याल इस नई सोच के साथ मेरे मन मे आने लगे। मुझे लगने लगा था कि कहीं न कहीं मेरी भी गलती जरूर है। एक आशा की किरण लिये मैं उठ खडी हुयी।
*अच्छा आँटी अब मैं चलती हूँ आपसे बात करके मन का बोझ हल्का हो गया है। मै नये सिरे से इस समस्या पर सोचूँगी। नमस्ते आँटी।*
*ठीक है बेटा, सदा सुखी रहो। आती रहा करो *
घर पहुँची तो विकास घर आ चुके थे। माँ जी और बाऊ जी के साथ ही ड्राईँग रूम मे बैठे थे। मुझे जल्दी आये देख कर माँजी ने पूछा कि क्या बात है आज जल्दी घर आ गयी? मैं पहले त चुप रही मेरी आँखों मे आँसू आ गये । जब माँजी ने सिर पर हाथ रखा कि बताओ तो सही क्या हुया है? सभी घबरा भी गये थे। मैने उसी समय माँजी की गोदी मे सिर रख दिया--
*माँजी, बात कुछ नही है मैं बहुत थक गयी हूँ* नुझ से अब नौकरी और घर दोनो काम नही होते।*
अरे बेटी पहले चुप करो। तुम इतनी बहादुर बेटी हो मै तो सब से तुम्हारी तारीफ करते नही थकती। तुम ने कभी बताया क्यों नही कि तुम इतनी परेशान हो?*
* मैने विकास से कहा था कि नौकरी छोड देती हूँ मगर विकास नही माने।*
*वाह बेटी बात यहाँ तक हो गयी और तुम ने अपने माँ बाऊजी को इस काबिल ही नही समझा कि हम से बात करो। असल मे मैं अपने सास होने के गर्व मे तुम्हारी तकलीफ न देख सकी और तुम बहु होने के डर से मुझ से कुछ कह न सकी बस बात इतनी सी थी और् तुम कितनी देर इसी तकलीफ को सहती रही। फिर मैं डरती भी थी कि मेरा रसोई मे दखल तुम्हें कहीं ये एहसास न दिलाये कि मुझे तुम्हारी काबलियत पर भरोसा नही या मुझे तुम्हारा काम पसंद नही। चलो आज से रात का खाना मैं बनाया करूँगी।*
*नीतू तुम खुद ही तो कहा करती थी कि विकास तुम बच्चों को पढाते हुये डाँटते बहुत हो आगे से4 मैं पढाया करूँगी। तो मुझे क्या चाहिये था। मै निश्चिन्त हो गया।* विकास के स्वर मे रोष था
सही है कुछ समस्यायें हम खुद सहेज लेते हैं। हमे लगता है कि हम दूसरे से अच्छा काम कर सकते हैं। यही बात शायद यहाँ हुयी थी।
*देखो बेटा जब तक बच्चा रोये नही माँ भी कई बार दूध नही देती। वैसे अच्छा हुया अगर तुम यही बात सीधी तरह इनसे कहती तो शायद इन पर असर न होता। आज तुम्हारे आँसूओं से देखो तुम्हारी माँ भी पिघल गयी और विकास की क्या मजाल जो अब तुम्हें अनदेखा कर दे।* कह कर बाऊ जी हंस दिये
चलो बटा मेरा आशीर्वाद ले लो इसी बहाने  हमे भी कई साल बाद पत्नि के हाथ का भोजन नसीब होगा जो हमे शिकायत रहती थी।*
-----* तो क्या इसी खुशी मे एक एक कप तुलसी वाली चाय हो जाए, बहु के हाथ की? * माँजी चहकी
शायद आज माँजी को पहली बार इतने खुश देखा था। मुझे लगा सम्स्या का समाधान हमारे आस पास ही कहीं होता है मगर कई बार नासमझी मे हम उसे देख नही पाते जिस से और कई समस्यायें पैदा कर लेते हैं।
 मैं झट से चाये बनाने चली गयी। सुबह इसी तुलसी वाली चाय ने ही तो मुझे नई राह दिखाई थी।मैने कप उठाने के लिये हाथ बढाया तो विकास ने मेरा हाथ पकड लिया बडे प्यार से दबा कर बोले लाओ तुम चलो अगला काम मेरा है।  और विकास कपौ मे चाय डाल रहे थे। मुझे लगा नई सुबह का आगाज़ हो चुका है।इस लिये नही कि विकास काम कर रहे हैं बल्कि इस लिये कि मेरी तकलीफ मे मेरा साथ निभाने का जिम्मा ले रहे हैं। समाप्त ।

पोस्ट ई मेल से प्रप्त करें}

Enter your email address:

Delivered by FeedBurner