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12 December, 2009

कथित बाबा सचिदानन्द का कच्चा चिट्ठा और कुछ सवाल --गताँक से आगे
नवांशहर  पंजाब के बाबा सचिदानन्द को पुलिस् ने कविता के कत्ल के जुर्म  मे गिरफ्तार कर लिया तो कविता की माँ के हाथ एस एस पी राकेश अग्रवाल के लिये दुआ देने को उठे कि बाकी लोगों को तो कम से कम उसके चँगुल से छुडा लिया।वो खुद को रिटायर्ड जज और अपनी मुँह बोली बेटी को को आई,  पी, एस. अधिकारी बताता था। जब कि हकीकत मे वो 10वीं पास था।अपने श्रद्धालुयों की संख्या बढाने के लिये बाबा साधना चैनल पर प्रवचन भी देता था। अब सवाल ये है कि क्या ये धार्मिक चैनल हिन्दु धर्म का कुछ भला कर रहे हैं या उन्हें ऐसे ढोंगी बाबाओं के चँगुल मे फसाने का साधन बन रहे हैं। वो साधना चैनल को एक प्रवचन का ढेड लाख रुपया देता था। अनपढ लोगों को क्या पता कि चैनल पर आने वाले उन श्रद्धालूयों के पैसे खर्च करके ही प्रवचन देते हैं। मैने एक-दो गली की औरतों से  पूछा कि क्या उन्हेंसे पता है कि चैनल पर बाबा कैसे प्रवचन करने पहुँचते हैं तो उसे नहीं पता था। उसने कहा कि वो पहुँचे हुये बाबा होंगे तभी तो चैनल पर आते हैं।
हम लोग ब्लाग्स पर रोज़ धर्म के लिये लडते झगडते हैं लेकिन ऐसे ढोंगी बाबाओं के खिलाफ क्यों नहीं कुछ बोलते?  ऐसे धार्मिक चैनलों के खिलाफ क्यों नहीं कुछ कहते जिन को देख कर लोग इन के झाँसे मे आ जाते हैं। दो साल पहले मैं नये घर मे आयी थी। यहाँ प्राईवेट कालोनी है पहले हम जहाँ रहते थे वहाँ सभी नौकरी पेशा लोग थे औरतें भी अधिकतर नौकरी पेशा थी । हम मे धर्म पर बहुत कम बात होती थी। लेकिन इस कालोनी मे 70% लोग रिटायरी हैं और साथ ही आस पास ग्रामिण इलाका भी लगता है। मेरी अपनी गली मे 20 के आस पास घर हैं जहाँ हर घर किसी न किसी बाबा को मानता ह। और हर आये दिन किसी न किसी बाबा का कीर्तन प्रवचन होता है। बहुत अच्छी बात हैलेकिन मन तब और दुखी होता है जब आर्ती के समय केवल उस बाबा की ही आरती होती है। हरेक बाबा ने अपनी अलग अलग आरती लिख रखी है, उसे या उसकी तस्वीर को ही भोग  लगाया जाता है। उसकी बहुत बडी तस्वीर होती है और उसके नीचे छोटी छोटी तस्वीरें हिन्दू देवी देवतायों की रखी होती हैं जैसे वो बेचारे इनके दास हों। अब आस पडोस की बात है ऐसे समारोह मे जाना भी पड्ता था। लेकिन अब मैने ऐसे घरों मे जाना बन्द कर दिया है जो बाबा संस्कृ्ति को बढावा देते हैं। मगर मन मे क्षोभ होता है कि आखिर ये हो क्या रहा है।उनमे तो कई बाबा अनपढ ही हैं बस कथा कहानिया सुना कर चले जाते हैं। उनके प्रवचनों  मे एक बात पर ही बल दिया जाता है कि गुरू के बिना गति नहीं। बस गुरू ही आपका भगवान है। सही बात है मगर क्या गुरू के मायने भी उन्हें बताते हैं कि गुरू मे क्या विशेशतायें होनी चाहिये।
अब मेरा सवाल ये है कि आज के इस युग मे जहाँ हम ये तय नहीं कर सकते कि कौन सच्चा है कौन झूठा तो धर्म के नाम पर ऐसे आश्रम और बाबाओं की जरूरत है? 
क्या इन बाबाओं के बिना लोग धर्म का ग्यान नहीं ले सकते?
धार्मिक चैनल क्या ऐसे लोगों को बढावा नहीं देते? ये दोनो की दुकानदारी मिली भगत नहीं है?
दूसरा इन धार्मिक चैनलों का अगर फायदा है तो क्या हानि नहीं है? ऐसे लोगों को दिखा कर ये धर्म को हानि नहीं पहुँचा रहे? ऐसे ढोंगी बाबाओं के रोज़ प्रवचम सुन कर ही लोग इनके चंगुल मे नहीं फसते? क्या धार्मिक चैनलों पर कुछ प्रतिबन्ध नहीं लगने चाहिये? ये इन दुकानों के व्यापार मे साझीदार हैं।
क्या सरकार को इस मामले मे हस्तक्षेप करना चाहिये?
आज पंजाब इन्हीं बाबाओं की वजह से जल रहा है लुधिआना मे दो दिन कर्फ्यू और बन्द रहाुआये दिन कोई न कोई शहर इस आग की लपेट मे आ जाता है।
क्या साधु सन्तों को ए.सी गाडियाँ,एसी आश्रम और सुख सुविधा के साधन रखने चाहिये? अगर नहीं तो आपमे से कितने हैं जो ऎसे गुरुओं का वहिष्कार   करते हैंजो भौतिक वस्तुयों का उपयोग कर रहे हैं?


आखिर धर्म के ठेकेदार क्यों नहीं कुछ करते। मेरे हिसाब से तो सभी आश्रम बन्द होने चाहिये जिसे धर्म का प्रचार करना है वो साधु बन कर रहे और केवल धार्मिक स्थान मन्दिर आदि मे ही प्रवचन दे और लोगों से कोई धन न ले। खुद सादा जीवन व्यतीत कर वैभव  और भौतिक साधनों का मोह छोड कर एक छोटी सी कुटी मे रहे जहाँ किसी को भी आने की अनुमति न हो बस प्रवचन के लिये शहर का मंदिर  या  कोई सार्वजनिक स्थान चुन सकते हैं। । जगह जगह मन्दिर अपने- अपने नाम से बनवाये जा रहे हैं, जिन की न तो सफाई का उचित प्रबन्ध है न ही और रखरखाव का। बस चढावे के रूप मे धन इकट्ठा करना ही इनका मकसद है। क्या लाभ है ऐसे मन्दिर निर्माण करने का जहाँ भगवान उपेक्षित होते हों?  क्या एक छोटे शहर मे एक मन्दिर काफी नहीं? आज इस बाबा संस्कृ्ति पर लगाम कसने की जरूरत है। नहीं तो एक दिन लोग ये भूल जायेंगे कि हिन्दु देवी देवता कौन हैं उनकी जगह इन बाबाओं के नाम ही होंगे। ये सिर्फ हिन्दु धर्म की बात नहीं है किसी भी धर्म मे ये बाबा लोग दीमक की तरह उसे चाट जायेंगे। आईये हम सब मिल कर इस बाबा संस्कृ्ति से लडें। जब लोग समझ जायेंगे तो फिर अपने आप ये दुकाने बन्द हो जायेंगी । इन  आश्रमों मे होने वाले कुकर्मों और शोषण के विरुध आवाज़ उठायें। इस मे सब का भला है। ये लोग एक नाम दे देते हैं और लोग इसी को बस धर्म समझ कर जपते रहते हैं मगर धर्म के मर्म तक कम ही लोग जाते हैं, अगर जाते तो आज दुनिया मे इतने अपराध न होते।   आज हम केवल धार्मिक बन रहें अध्यात्म क्या है इसे जानते ही नहीं।  आओ लोगों को बाबा संस्कृ्ति का सच बतायें और इन के चंगुल से लोगों को बचायें। मैं तो जहाँ भी जाती हूँ जम कर इन लोगों के खिलाफ बोलती हूँ। बोलती रहूँगी। हम लोग धर्म के नाम पर ब्लाग्स पर भी आपस मे लडते रहते हैं लेकिन इन असली गुनहगारों के खिलाफ एक शब्द भी क्यों नहीं कहते?

10 December, 2009

ढोंगी बाबा सचिदानन्द निकला कातिल

  ये खबर कल दैनिक जागरण  अखबार मे थी। नंवाशहर, पंजाब मे कुछ दिन पहले कविता नाम की एक महिला का कत्ल हुया था। तब से पुलिस कातिल  की तलाश मे थी। अखबार के अनुसार ये बाबा लोगों को बहला फुसला कर उन से धन सम्पति एंठता था। बाबा उर्फ सतिन्दर कुमार् ही कविता का कातिल निकला। पोलिस ने सोमवार रात को उसे गिरफ्तार कर लिया।बाबा ने गला घोंट कर उसकी हत्या की थी।वो कई लोगों को अपने झाँसे मे ले कर बर्बाद कर चुका था। कविता भी इस के झाँसे मे आ गयी।करीब 4 साल मे वो बाबा पर 4--5 लाख लुटा चुकी थी। विदेश से उसके बेटे जो पैसे भेजते वो बाबा के चरणो मे अर्पित कर देती। इसी दौरान कविता को बाबा के ढोंगी पहरावे की भनक लगी तो वो अपना पैसा वपिस मांगने लगी। कविता को पता चला कि बाबा सचिदानन्द पर गुरदासपुर के कस्बे कादियाँ मे धोखा धडी के कई केस दर्ज हैं और पोलिस रिकार्ड मे भगौडा है। पोल खुलने पर उसने बाबा से अपने पैसे लौटाने के लिये कहा और वापिस न करने पर पोल खोल देने की धमकी दी।


28 नवम्बर की रात करीब 11 बजे बाबा कविता के घर पहुँचा और उसे समझाया। कविता के बार बार अपनी बात पर अडे रहने के बाबा ने पजले उसके सिर पर जोर से घूँसा जडा और बाद मे उसी की चुन्नी से उसका गला घोंट दिया।हत्या को लूट का मामला बनाने के लिये उसने उस के बाल बिखेर दिये और घर का सारा सामान भी बिखेर दिया।ुसके 2 मोबाईल फोन भी नष्ट कर दिये।। फिर कमरे को ताला लगा कर दूसरे दरवाजे से चला गया ।अगली सुबह छ: बजे बाबा अपने चेलों को साथ ले कर गाडी से कुरुक्षेत्र चला गया। इसके बाद वो जालन्धर और अमृतसर मे भी घूमा।। 7 दिस्मबर को जब वो नवां शहर लौटा तो पोलिस ने उसे दबोच लिया।जाँच के दौरान पोलिस लो पता चला कि  कविता का उस बाबा के पास काफी आना जाना था। बाबा कविता का भाई बना हुया था। पोलिस ने जब सबूत जुटाने शुरु किये तो सभी कडियाँ खुलती चली गयी।

पोलिस को पता चला कि बाबा लोगों को सम्मोहित करने की क्रिया जानता था।बस बात यहीं तक नहीं थी जो लोई भी उसके पास आता वो उसी का हो कर रह जाता। 1990 मे खुद को बाबा कह कर प्रचार करने वाले बाबा पर ठगी धोखाधडी अवैध हथियार रखने, हत्या का प्रयास करने के चार केस दर्ज हुये। वो उसके बाद अपने परिवार को वहीं छोड कर दिल्ली के गनेश नगर मे चमन लाल मूँगा के घर पहुँचा।। वहाँ उन्को उनके बेटे की मौत का वहम डाल कर उन से लाखों रुपये ठग लिये यही नहीं मूँगा परिवार की लडकी नेहा को भी अपने जाल मे फंसा लिया और उसे अपने साथ ही नवांशहर ले गया। नेहा इस कदर बाबा के चंगुल मे फसी कि उसने अपने ही पिता समेत 11 लोगों पर बलात्कार का केस दर्ज करवा दिया। इस के इलावा कई पोलिस वाले भी बाबा के सम्मोहन मे थे। पोलिस जब पूछताछ करती तो बाबा अपने सम्मोहन और प्रवचनों से सम्म्मोहित कर लेता।
फिर एस एस पी श्री राकेश अग्रवाल ने खुद पूछताछ शुरू की तो वो टूट गया और सारी कडियाँ खुल गयी। 
ये खबर तो अखबार की है बाकी खबर कल और फिर इसी को ले कर मेरे  कुछ सवाल होंगे। बाकी कल ।
क्रमश:



18 July, 2009

अपनी बात

मै जब भी कोई कहानी लिखती हूँ तो अक्सर मुझे मेल आती हैं कि ये कहनी मेरे जीवन से सम्बन्धित तो नहीं मैने आज तक लगभग 70 कहानियाँ लिखी हैं क्या 70 ही मेरी हो सकती हैं तो मैं स्पश्ट करना चाहूँगी कि मैं अधिकतर आत्मकथानक मे कहानी लिखती हूँ वो मेरी कहनी नहीं होती मेरे दुआरा लिखित जरूर होती है क्यों कि मैने अस्पताल जैसे स्थान पर नौकरी की है जहाँ ज़िन्दगी को बहुत ही करीब से देखने का अवसर मिला है और मुझे जिस जीवन मे कुछ लिखने योग्य मिला उस पात्र के बहुत करीब गयी हूँ उसे दिल से महसूस किया और उनकी भावनाओं को कागज़ पर उतारा मात्र है इनमे बहुत से पात्र मेरे दिल के करीब अब भी हैं जानती हूँ उनके दुख सुख बाँटती हूँ जिसमे फिर से एक नयी कहानी मिल जाती है इस लिये जिसके साथ कहानी लिखा हो वो केवल कहानी होती है ----हाँ अपने जीवन से संमबन्धित कुछ प्रसंगों को भी कहानी का रूप दिया है उन्हें भी आपके सामने रखूँगी और जरूर बताऊँगी कि ये मेरी कहानी है
अपने बारे मे --अपनी रचनाओं के बारे मे स्वयं कुछ लिखना कठिन भी है और रोचक भी कारण कि अपनी निन्दा करना खुद को बुरा लगता है और प्रशंसा करना पाठक को------ वास्तव मे अपनी निगाह मे अपने को देखना असम्भव जैसा है क्यों कि हम उसे केवल अपने नज़रिये से देखते हैं लेकिन भावुक और संवेदनशील व्यक्ति स्वयं को अभिव्यक्त किये बगैर रह भी नहीं सकता
साहित्य हृदय की पुकार है--मनुष्य के आन्तरिक मनोभावों का बाह्म चित्रण है --साहित्यकाए समाज के आन्दर निवास करता है और समाज के अन्याय और् प्रिस्थितियों से प्रभावित होता है इस लिये वो समय की धारा और परिवेशगत प्रभावों से अछूता नहीं रहता--कहना ना होगा कि साहित्य का मूल तत्व जीवन हैऔर उसे साकार करने वाली शक्तियाँ प्रिस्थितियों मे होती हैं कोई भी रचना बादल से गिरी हुई बून्द नहीं होती रचना तो हृदय की उर्वर्क भूमि मे ही अँकुरित होती है और बुद्धि इस की परवरिश करती हैमेरा मानना है कि मनुष्य़ अपने सुख दुख से ही प्रभावित नहीं होता दूसरों के दुख सुख भी उसे प्रभावित करते हैंइस निगूढ्रहस्य को हृदयंगम कर कोई भी रचनाकार कल्पना के सहारेअपने भावों को प्रकट कर सकता हैसंवेदना ही इस कल्पना की जननी है लेकिन कल्पना भी एक शक्तिशाली सत्य होती है क्यों की ये मानसिक अनुभूतियों वेदनाओं और रंग विरंगेसामाजिक और परिवेशगत प्रभावों का अद्भुत प्रतिफल है चूँकि मैअपने पारिवारिक और सामाजिक परिवेश एवं उसके प्रभावों की साक्षी रही हूँ जिसे मैने अन्य लोगों के साथ अपनी रचना प्रक्रिया के जरिये बाँटना चाहा है कहानी किसी की भी हो मगर जो बात ज़िन्दगी की रेत पर कई सवाल छोड जाये वो कहानी समाज की कहानी बन जाती है सो मेरी कहानियां समाज की कहानियां हैं मुझे ज़िन्दगी के बारे मे लिखना पढना जानना और चिन्तन करना बहुत अच्छा है

17 July, 2009

खुशखबरी खुशखबरी

17 जुलाई 2009 को हिन्दीअजित समाचार मे श्री बद्रीनारायण तिवारी जी का एक आलेख छपा है जिसमे उन्होंने लिखा है कि------- राष्ट्र भाषा हिन्दी भाषियों को ये जान कर खुशी होगी कि आप हिन्दी मे बोलते जायेंगे और कम्प्यूटर आपका आग्याकादी बन कर हिन्दी मे लिखता जायेगा हिन्दी प्रेमी वैग्यानिक दिल्ली महनगर स्थित भारतीय आई टी सोहाईटी सेंटर फार दिवेलप्मेन्ट आफ एडवाँस कम्प्यूटरिँग सीडैक मे ये साफ्ट्वेयर तैयार किया जा रहा हैविगत 10 महीनो से इस पर् 35 वैग्यानिक काम कर रहे हैंशब्द सुन कर टाईप किया जाने वल ईन्जन तैयार किया जा चुका हैइन दिनो हिन्दी बोलने की विभिन्न शैलियों और शब्दों का डाता बेस तैयार किया जा रहा है जिसके लिये 5000 लोगों की आवाज़ के नमूने लिये गये हैंजो लिखेंगे कम्प्यूटर हिन्द मे बोल कर बतायेगा कि आपने क्या लिखा है यही नही इसकी विशेशता ये भी है किये हिन्दी का अंग्रेजी मे और अंग्रेजी का हिन्दी मे अनुवाद भी करेगा इसके अतिरिक्त आठ और देशों की भाशा मे भी अनुवाद करेगाइससे संब्न्धित अधिकारियों ने बताया कि ये तीन चरणो मे हिन्दी भाशा को इन देशों की भाशा मे अनुवाद कर सकेगा प्रारम्भ मे ये साफ्टवेयर लोगों को निशुल्क उपलब्ध करवाया जायेगा ताकिफीडबैक से इसकी त्रुटियों को सुधारा जा सके इसे तकनीक ढंग से मोबाईल पर् काम करने के लिये तैयार किया जायेगा विशेशता ये होगी कि इन देशों मे होने वाली परस्पर वार्ता को नौ भाशाओं मे अनुवाद कर के बोलेगा राष्ट्र भाषा हिन्दी के क्षेत्र मे ये एक क्राँतीकारी उपलब्धी है
है ना ये खुशखबरी सभी हिन्दी भाषियों को बधाई

11 July, 2009

एक कवि दरबार ऐसा भी

कल यू के के एक रेडिओ चैनल् के लिये एक आन लाईन कवि दरबार हमारे शहर नंगल टाउन शिप मे आयोजित किया गया इस रेडिओ चैनल को य़ू के की एक एन जी ओ हर माह पंजाब के किसी ना किसी शहर मे आयोजित करती है इस बार इसे लंदन के प्रवासी पंजाबी स दलजीत सिंह कालडा जी ने सपाँसर किया था इसके आयोजन की रूप रेखा तो नौ जून को ही निश्चित हो गयी थी मगर इसका आयोहन करने वाले साहित्यकार अचानक बीमार हो गये मुझे नौ जुलाई रात को मिसज किरन राय जी का फोन आया कि हमारी कुछ सहायता करें ताकि इसका आयोजन समय पर किया जा सके इतने अल्प समय मे साहित्य प्रचार मंच और अखर चेतना मंच ने मिल कर सभी कवियों से संपर्क किया मुश्किल इस लिये था कि इसका समय बहुत औड था 10 और 11 की रात को तीन बजे से सुबह 6-30 तक फिर भी हमारे कविओं ने साथ दिया औरतों के लिये समय 4-30 बजे रखा गया इस प्रोग्राम की एनाउँसर मिसेज किरन रइ जी थी जो सुबह 2-30 पर ही तयार हो कर आ गयी थी- किरन जी अभी एम एस सी आई टी की पढाई कर रही हैं और इस एन गी ओ के साथ मिल कर पंजाब मे उनकी ओर से चलाये जा रहे लोक भलाई के कार्य भी देखती हैं हर माह कवि दरबार भी आयोजित करती है वो एनाउँसर हैं और इसके हेड श्री हरबँस हीओन जी हैं
ये कवि दरबार इनका अठाहरवाँ कवि दरबार था इसमे कुल बीस लोगों ने भाग लिया जिनमे चार औरतें एक दस साल का लडका जिसने अपनी लिखी कविता पढी और बाकी पुरुष थे हम लोग मोबाईल पर कविता पढते जो साथ साथ यू के के इस चैनल पर प्रसारित हो रही थी ये चेनल एक सौ अठतालीस देशों मे चलता है सब इतने उत्साहित थे कि किसी को ये आभास तक नहीं हुआ कि हम लोग आधी रात से जाग रहे हैं चाय आदि का प्रबँध भी उन लोगों ने हमे नहीं करने दिया और कवि सम्मेलन समाप्त होने पर सब को एक एक लिफाफा दिया घर आ कर देखा तो उसमे पाँच सौ रुपये थे यहाँ ये रुपये मायने नहीं रखते जो कवि दरबार मे आनन्द आया उसके आगे कितने भी पैसे बेकार होते इसका पूरा विवरण मैं अपने पँजाबी ब्लाग पंजाब दी खुश्बू मे दूँगी मुझे इस बात का दुख रहा कि इसकवि दरबार मे कोई गौतम राज रिशी जी जैसे सज्जन नहीं थे जो इस की पूरी रेकार्डिँग कर सकते वैसे बाद मे वो इसकी पूरी सी डी बनवायेंगे और हमे भी देंगे तब तक आपलोग भी इन्तज़ार करें हां ये बताना भूल गयी कि ये पंजाबी कविता गज़ल के लिये ही आयोजित किया जाता है
is chennel kaa adress--- www.panjab radio.com.uk

01 June, 2009

काश्! कि ये मेरी कहानी होती

समीर जी की पोस्ट पढी तो घबरा गयी कि कहीं हमारी पोस्ट भी पहेली तो नहीं बन गयी बस फटा फट खुद ही जवाब देने चले आये 1कहीं समीर जी को भनक लग गयी तो कहीं अपनी पोस्ट ही ना हटानी पड जाये1
कल किसी ने मेरी पिछली पोस्ट् (एक हवा का झोंका( पर् एक सवाल पूछा था कि ये कहानी मेरी कहानी तो नहीं!पढ कर अच्छा लगा पता नहीं क्यों1मगर वो शायद इस कहानी की नायिका को भूल गये कि उसने तो शादी ही नहीं की 1 मेरा भगवन की दया से एक हँसता खेलता परिवार है मेरे पती-तीन बेटियां तीन दामाद दो नाती और एक नातिन1 मेरे मन मे तब एक ख्याल आया कि क्या हर अभिव्यक्ति लेखक की अपनी ज़िन्दगी की होती है 1ागर ऐसा है तो वो इतनी रचनायें लिखता है हर रँग कि हर विषय पर वो केसे लिख लेता है !

मैं किसी की बात नहीं करूँगी अपनी बात पर आती हूँ मेरी अधिकतर रचनायें औरत पर हैं उसकी ज़िन्दगी के हर सुख दुख हर संवेदना पर है क्या मै इतने जीवन एक जनम मे जी सकती हूँ1 मेरे दो कहानी संग्रह छप चुके हैं उनमे तकरीबन् पचास कहानियाँ होंगी तो क्या मेरी हैं1 नहीं न ! लेखक वो लिखता है जो समाज मे रोज़ देखता है1 उसे वो किस नज़र से देखता है वो उसकी अभिव्यक्ति है उसकी अपनी संवेदना है1 कई बार वो जो देखता है उसे उसका रूप सही नहीं लगता उसे वो अपने नज़रिये से एक रूप देता है कि इस भाव को वो कैसे देखना चाहता है बस अपनी रचना मे वो उस भाव की छाप छोडना चाहता है1 उसका लिखना भी तभी सार्थक है अगर उसकी रचना समाज को कोई संदेश देती हो1 जीने का ढंग सिखाती हो1 यूँ तो लेखक कई रचनायें लिखता है लेकिन कालजयी वही रचनायें होती हैंजिनमे वो जीने के मायने देता है1 हम रोज़ देखते हैं कि लोग प्यार पर कितना कुछ लिखते हैं जिसमे काफी तो रोना धोना ही रहता है जो शायद मेरी भी बह्त सी रचनायों मे है वो हर आदमी की कहानी है1 मगर कुछ किरदार आम जीवन से हट कर होते हैं मै बस उन किरदारों की कलपना करती हूँ----दुनियाँ से हट् कर कुछ देखती हूँ समझती हूँ और चाहती हूँ कि समाज ऐसा ही हो मेरे सपनों जेसा !

मैने ऐसे लोग देखे हैं जो भ्रश्टाचार पर डट कर लिखते हैं मगर खुद पैसे के लिये कुछ भी करते हैं1 कुछ लोग जात् पात पर डट कर लिखते हैं जब अपनी बेटी प्रेमविवह दूसरी जाति मे करना चाहती है तो घोर विरोध करते हैं कुछ ऐसे लोग जो प्यार पर लिखते हैं मगर जीवन मे पता नहीं कितने साथी बनाते हैं ऐसे लोग जो मा पर बडी बडी कवितायें लिखते हैं मगर मा को अनाथ आश्रम मे छोड् आते है1प्यार पर बहुत लोग लिखते हैं1 मगर क्या सभी प्यार के सही मायने को जीते हैं1 जीते ना सही हों मगर क्या प्यार के रूप को सही जानते हैं1 मेरा मनना है कि नहीं1ा दिन पर दिन प्यार के मायने बदल रहे हैं1 तो मुझे लगता है कि इन बदलते हुये मूल्यों को आगे बदलने से रोकना चाहिये1 जब ये विचार आया तो ऐसी रचना रच पाना आसान हो गया !

हाँ बहुत सी रचनायं लेखक की अपनी ज़िन्दगी से जुडी हो सकती हैं मगर हर रचना नहीं मेरी कुछ कहानियां ऐसी हैं जिन्हें लिखते हुये मै कई कई दिन रोती रही हूँ1रचना लिखते हुये उसके किरदार को खुद अपनीआस्था और सोच के अनुरूप अपनी कलपनाओं मे जीना पडता है1पाठ्कों के रहन सहन और आज के परिवेश का भी ध्यान रखना पडता है1 इस लिये मैने इसमे ब्लोग्गिं का जिक्र किया है1 प्रश्न करता को तभी पता चल सकता है अगर वो लेखक् को व्यक्तिगत रूप से जानता है1 या फिर कहानी विधा को जानता है1 1इस रचना के लिये मै इतना कह सकती हूँ काश! कि मुझे ये किरदार जीने का अवसर मिल पाता और मै शान से कह सकती कि हाँ ये मेरी कहानी है !

03 April, 2009


व्यक्तित्व
या समाज सेवा से संबंधित कोई भी काम है वो इन सज्ज्न के बिन नहीं होता कोई प्रवासी भरतीय आपको आज एक ऐसे शख्स से मिलवाने जा रही हूँ जो कि हमारे नगल शहर की शान है1 आज इस शहर मे जितनी भी सहित्यिक गतिविधियाँ नगल मे आ जाये, ये महाशय उन को किसीै न किसी स्छूल मे ले जाते हैं1 उन से वहाँ के बच्चों को वर्दी या किताबें कापियां दिलवा कर ही छोडते हैं1 परियावरण के लिये शहर के लोगों को पेड लगाने के लिये पता नहीं कहाँ कहाँ से पकड कर ले आते हैं1 आज शहर कि हरियाली और खुशमिज़ाजी इनकी वज़ह से ही है1 हर फंक्शन मे स्टेज सैक्रेटरी का काम इन्हीं का होता है1पता नहीं कितने लोग इन की प्रेरणा से लेखक बने हैं1 इसका एक उदाहरण तो मैं आपके सामने हूँ1इनका नाम है गुरप्रीत गरेवाल इनकी निज़ी ज़िंन्दगी के बारे मे मैं सिर्फ इतना ही जानती हूँ कि इनके माँ बाप भगवान को प्यारे हो गये हैं[बचपन मे] चाचा चाची ने पालन पोशण किया है1 वो भी अब शायद कैनेडा मे रहते हैं1 उम्र कोई 30--32 के आस पास होगी1शादी अभी तक नहीं की1 बस लोगों, दोसतों, मित्रों के लिये ही जी रहे हैं1 आजकल अजीत समाचार के संवाददाता हैं1 लोगों के जीवन को, उनकी बातचीत को बहुत ही तन्मयता से सुनते और समझते ह और कोई गलत बात किसी के मुंह से निकली नहीं कि इनकी डायरी मे नोट हो जाती है1 और अगली बार किसी समारोह मे वो चुटकुला बन कर सब का मनोरंजन करती है1 उनकी आलेख कई पत्र पत्रिकाओं मे आते रहते हैं1उनका एक बडा मज़ेदार लेख जो 13 . 2002 मे छपा था आज मेरी फाईल मे मुझे मिला 1इनकेेआलेख की खासियत ये होती है कि उसमे मनोरन्जन की भी भरपूर सामग्री होती है1इनके इस लेख को आपके सामने प्रस्तुत करना चाहती हूं1इस छोटी सी उम्र मे समाज सेवा की इतनी लगन के लिये सारा शहर इनका ऋणी है1 इन के बारे मे एक महत्वपूर्ण बात ये है कि इन्होंने नगल मे कला रंग मंच की स्थापना की और कई अंतर्राजीय मुकाबलों मे पंजाब की ओर से भाग लिया और पदक जीते1
बातचीत करने की कला
सर्दियों की गुनगुनी धूप 1 एक मित्र के घर के खुले प्रांगण मे बैठ कर मै भारतीय् सागर तटों के बारे मैं लिख रहा था1दूरभाश की घंटी बजीरिसीवर दो घंटे कान से लगा रहा1शानिया का फोन जब भी आता है, ऐसा ही होता है1शानिया मेरी अत्यंत समझदार मित्र है1 मै हैरान हूँ कि इस कालेज छात्रा ने इतनी अल्प आयु मे जिण्दगी को इतनी नज़दीक से कैसे देख लिया!बातचीत करने की कला मे परिपक्व शानिया मेरे साथ सी.टी.बी.टी,हिन्द-पाक संबंध इज़राईल फलस्तीन् टकराव इत्यादि महत्वपूर्ण अन्तर्राष्ट्रिय मुद्दों पर बात करती हैवह ज़िन्दगी के प्रत्येक पक्ष के बारे मे तर्कपूर्ण ढंग से बात कहती है कि आज भी भ्रतीय नारी लगाने, पाने, और दिखाने तक सीमित है1खूबसूरत देश मारिशियस के सौंदर्य भरपूर तटों की बात करते करते अचानक वो मेरी दुखती रग पर हाथ रख देती है1 वो मालविका जेतली का चर्चा छेड देती है मालविका मुझ से नफरत करती है1 मैने कुछ साल पहले एक धार्मिक उत्सव के दौरान उसके साथ अभद्र व्यवहार किया था1 जेतली परिवार की नफरत आज भी बरकरार है1यद्यपि मेरे प्रति उनका व्यवहार सदा ही गाँधीवादी रहा है1शानियां अंत मे ये कहते हुये फोन रख देती है किमालविका को भूल कर नयी ज़िन्दगी शुरू करो1 उसकी नफरत कभी समाप्त नहीं हो सकती.... आयु के अंतर ,मानसिक स्तर को तो देखो... और् शीघ्र करो अपने जुनून का इलाज
भले ही मालविका को भूलना असम्भव है मगर फिर मै शानिया की एक एक बात को ध्यान से सुनता हूँ1 बातचीत करना भी एक कला है हर व्यक्ती मे अपनी बात तर्कपूर्ण ढंग कहने की क्षमता नहीं होती1 ये हर कोई व्यक्ती नहीं जानता कि कौन सी बात किस से कब और कहाँ कहनी है1हार तो फूलों के भी होते हैं और जूतों के भी1अपके मुख से निकले शभ्द ही तय करते हैं कि कौन सा हार आपके गले का शिंगार बने1 बातचीत करने का ढंग आदमी उस माहौल से सीखता है जिस मे उसका पालनपोशण हुआ है1कुछ लोगों को बोलने की तह्ज़ीब नहीं होती1ाइससे सज्जनों को अपने शब्दों की वजह से कई बार शर्मिंदा होना पडता है1
रंगकर्मी फुलवंत मनोचा एक बार किसी वस्त्र विक्रेता के घर अफ्सोस प्रकट करने जा रह थे1 वस्त्र विक्रेता के युवा पुत्र की सडक दुर्घटना मे मृ्त्यु हो गयी थी रास्ते मे उनको शिमलापुरी मिल गये1 लाल कोट सफेद दाढी व भूरे दाँतों वाले शिमलापुरी जरूरत से अधिक गप्पें हांकते हैँ1 मृ्त्य वाले घर मे शमशान की सी खामोशी थी 1घर के बाहर असंख्य लोग बैठे अफसोस कर रहे थे 1शिमलापुरी 4-7 मिन्ट तो चुप रहे 1मगर चुप रहना उनके लिये असह हो गया,'' इतने मे कोई दम्पती पास से गुज़रे1 शिमलापुरी ने उन्हे देखा और कहा फुलवंत देखना"महिला लम्बी है या पुरुश?' फुलवत ने धीरे से उनके कान मे कहा महिला लम्बी है..प्लीज़ अब कुछ ना बोलना1'' पर उनसे रहा ना गया उन्होंने पास बैठै ऎक अन्य स्ज्जन से यही सवाल कर दिया1 उनकी इस बात का कोई उतर तो नहीं मिला मगर उनकी असमय ये मूर्खता पूर्ण बात कई कानों मे पड गयी1
कुछ लोग इतने सीधे होते हैंकि समाज मे लतीफा बन जाते हैं1ऐसे सज्जन भी समाज के लिये जरुरी हैं1क्यों कि ये लोग फिज़ा मे हंसी की फुहार फेंकते हैं1 मेरे एक मित्र्1सुगन चंद धीमान आई.टी़.आई मे अध्यापक हैं1एक बार एक लडकी वहाँ दाखिला लेने आई1सुगन ने आवेदन पत्र देख कर कहा 'बेटा इसमे आपका चरित्र प्रमाण पत्र तो है नहीं?'लडकी ने झट से जवाब दिया 'सर मेरी तो शादी हो चुकी है!'बेचारे चुप कर गये1
अनाप शनाप जवाब झगडा करवा देता है जबकि सोच समझ कर दिया गया जवाब क्रोधित व्यक्ति को भी शाँत कर देत है1मेहतपुर {उनाःहि.प.]से एक युवा धर्म संस्कृ्ति के लेखक बहुत लिखते हैँ1वे धडाधड छपते भी हैं1एक बार उनका लेख निश्चित तिथी को प्रकाशित होने से रह गया1 गुस्साये लेखक समाचार पत्र् की सम्पादिका से झगडने पहुँच गये सम्पादिका की एक टिप्पणी ने उन्हें ये कह कर शाँत कर दिया1' आपके दर्जनों लेख छपे आप कभी धन्यवाद करने नहीं आये अगर आपका एक लेख नहीं छपा तो इतना गुस्सा क्यों?' वो चुपचाप चले गये1
कुछ सज्जन इतने तेज़ दिमाग होते हैं कि बात बात पर शगूफा छोडते रहते हैं कि दूसरा व्यक्ती उम्र भ्रर नहीं भूलता1 एक बार की बात है कि नगल शहर के किलन एरिया मे एक छोटा सा खूबसूरत घर था[ अब् भी है घर के बाहर लिखा था 'भगवत कुटीर' उन दिनो उस मकान मे मेरे एक मित्र प्रोफेसर रविन्दर गर्ग रहा करते थे1 एक बार वो एक माह की छुटी पर चले गये और घर की चाबी मुझे सौंप गये1 चोरी की सम्भावना शून्य थी क्यों की मेरी मित्र मंडली रात भर महफिल सजाये रखती1 प्राँगण् मे गीत संगीत का प्रोग्राम होता1 सुरिन्दर शर्मा जब हारमोनियम पर गज़ल गायन करते तो पडोसी भी मुंडेर पर आ जाते1 खाली मकान और हमारी महफिल का चर्चा मित्रों के मित्रों तक भी जा पहुंचा1 शाकाहारी रसोई मे मीट मछली पकने लगा1 सिगरेट के छ्ल्ले तो मैने किसी तरह बर्दाश्त कर लिये मगर उस दिन मेरे भी होश उड गये जब मंडली ने प्रांगण मे'पटियाला पेग' सजा दिये1 जब गर्ग साहिब लौटे तो संयोग से घर साफ था1 उन्हें एक दो शिकायतें भी मिली मगर उन्हों ने मुझ से कुछ नहीं कहा1 मुझे अचानक पटियाला जाना पडा 1एक सप्ताह बाद जब मैं घर लौटा तो ये शगूफा नगल मे काफी मकबूल हो चुका था'बाहर से' भगवत कुटीर अन्दर बन रहा मीट मछ्ली'1ये शगूफा मेरे ही एक मित्र ने छोडा था1 उसके बाद वो मुझे कभी चाबी दे कर नहीं गये1
बात करने की कला मे परिपक्व सज्जन तभी बोलते हैं जब जरूरी हो 1 वो अंदाज़ा लगा लेते हैं कि लोग क्या सुनना चाहते हैं1 वो उस विशय के बारे मे ही बोलते हैं जिनकी उन्हें जानकारी होती है1वो अच्छे श्रोता भी होते हैं उनके ज़ेहन में अंग्रेजी लेखक ए.जी.गारडिनर के ये शब्द हमेशा ही रहते है';किसी को सभी बातों का ग्यान् नहीं होता और कोई ऐसा भी नहीं होता जिसे कुछ्ह भी मालूम ना हो1'[NO ONE IS THE MASTER OF ALL THE ITEMS AT THE SAME TIME NO ONE IS THE SO POOR AS NOT TO KNOW ANY THING]बातचीत करने के माहिर अगर मूर्खों की महफिल मे फंस जायें तो मुह पर पट्टी बांध लेते हैं1 एक बार विचार गोष्ठी के बाद प्रबंधकों ने तीन बुद्धिजीविओं को एक बातूनी अमीर आदमी के घर ठहरा दिया1 अमीर आदमी उत्तर प्रदेश के तराई क्षेत्र मे खासी भूमी का मालिक था1 वो रात भर मे बुद्धिजीविओं का दिमाग चाट गया1 सुबह-सुबह वो लोग नाश्ता लिये बिना ही चले गये1इतने वर्षों बाद भी वो बुद्धिजीवी उस बातूनी आदमी के ये संवाद और असमय पर अप्रसांगिक विशय को ले कर हंसते -2 लोट पोट हो जाते हैं 'एक बार तराई मे हमार भूमी पर् गुँडे काबिज़ हो गये... कोई प्रशासनिक अधिकारी बात ही ना सुने....मरते क्या ना करते1पंचायत प्रधान संतोखा सिंह पहुंच गया दिल्ली इन्दिरा{ पूर्व प्रधान मंत्री] के घर वो पिछले कमरे मे आराम फरमा रही थी...संतोखे ने कमरे मे जा कर हंगामा वरपा दिया...बीबी ने झट से दूरभाष की घंटी बजाई .....प्रसाशन मे भगदड मच गयी1'
जरूरी नहीं कि शिक्षित व्यक्ति ही तर्कसंगत बात करे कई शिक्षित व्यक्ति भी ऐसी बात करते हैं कि उनकी बुद्धि पर तरस आने लगता है1 इंडियन ऐक्सप्रेस चन्डीगढ के पूर्व संपादक ऋ. प्रेम कुमार विभिन्न नगरों व वहाँ के निवासियों के बारे मे एक बहुत ही दिलचस्प कालम[ OF PEOPLE AND PLACES] लिखते थे1 मै आज भी उनका प्रशंसक हूँ 1 एक दिन हमारे इंजीनियर मित्र हमारे घर आये1बातों बातों मे उन्होंने प्रेम कुमार का वेतन पूछ लिया मैने अनुमान से ही कह दिया कि आठ दस हजार होगा उन दिनों चम्पक नाम के एक युवक ने भैंसों की डायरी खोली थी1इंजीनियर मित्र जो चम्पक के पडोसी थे झट से बोले ' इस से अच्छा तो चम्पक है दस हजार तो वो भी नहीं छोडता1'
व्यक्ति बातचीत से ही पहचाना जाता है1भाषा की उपयुक्त जानकारी व सही उच्चारण ही बातचीत की कला मे परिपक्व होने का आधार है1भाषा का उच्चारण ठीक ना होने से कई बार बडे-2 लोगों को शर्मिंदा होना पडता है1 शिक्षा संस्थानों मे कई अच्छे -2 अध्यापक भी मात्र् इस लिये लतीफा बन जाते हैं क्यों कि उनका उच्चारण सही नहीं होता1 भारतीयों के मन मे एक बडा भ्रम् ये भी है कि ेअंग्रेजी दुनिया की सर्वश्रेष्ट भाषा है1यही वजह है कि भ्ररतीय भाषाओं के अच्छे जानकार भी अंग्रेजी मे बात करने को प्राथमिकता देते हैं1आज़ादी के इतने साल बाद भी् राष्ट्र भाषा के बजाये अंग्रेजी का ही बोलबाला है कोई भाषा अच्छी या बुरी नहीं है1 भाषा तो चुपी तोडने का माध्यम है1 बातचीत करते हुये दूसरी भाषा के शब्द प्रयोग करने मे भी बुराई नही है पर ऐसी खिचडी नही पकानी चाहिये जो आपका जलूस निकाल दे
किसी पार्टी मे मेरे जानपहचान वाली युवति ने मेरे समक्ष पकौडों की प्लेट रखते हुये कहा ;एक फरिटर [FRITTER] तो ले लो भईया'1 बात बात मे उसने पूछा ; कहाँ -2 घूम चुके हो?'मैने अभी उसे जगहों के बारे मे बताना शुरू ही किया था कि वो बोली ''भैया देखा चंडीगढ के चौक कितने समार्ट् हैं1''भले ही मैने उस से उसके अंग्रेजी प्राध्यापक का नाम भी पूछा पर उसकी समझ मे कुछ नहीं आया1 ऐसे ही एक भईया का संवाद मुझे आज भी याद है1 वो अपनी प्रेमिका से दूरभाश पर बात करते हुये पूछ रहा था ''उस दिन तुम ने फील तो नहीं किया जब मैंने मधुबन पार्क मे तुम्हारी बाँह[ बाजू] पर चूँडी बडी[चिकोटी भरी]?''
शब्द तो वही होते है1शब्दों को हम सभी लिखते, बोलते हैं1वारिसशाह.मुंशी प्रेमचंद.शिवकुमार बटालवी ने भी वही शब्द् इस्तेमाल किय मगर वो अमर हो गये1संवाद ही फिल्मों को डाइमड-जुबली बना देते हैं1जार्ज बर्नार्ड शाह,मिर्ज़ा गालिब बेशक आज जहां-ए-फानी को अलविदा कह गये हैं मगर उनकी बातें आज भी जिन्दा हैंकिसी ने उनका कलाम पढा हो या ना मगर उनकी हाज़िर जवाबी के किस्से जरूर सुने होंगे1भारत का बच्चा -2 सम्राट अकबर के दरबारी बीरबल के किस्से पढता सुनताहै1बातचीत की कला तभी सार्थक है अगर उसका प्रयोग मानवता के हित मे हो1मंदिर मस्ज़िद गुरद्वारा गिर्ज़ा सभी मह्फूज़ हैं मगर ये बडे बडे नेताओं व धर्म गुरूऔं के भाशण ही हैं जो लोगों मे जनून भर देते हैं और मानवता शर्मसार हो उठती है
गुरप्रीत गरेवाल
सम्पर्क--17 मेन मार्कीट
नगल डैम 140124
Email ---grewal.dam@gmail.com

01 January, 2009


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नववर्ष की मंगलकामनायें
नववर्ष् पर आप सब के ढैर सारीशुभ कामनायें
भगवान आप सब को वो हर खुशी व सम्पदा दे
जो भी उसके खजाने मैं है
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आज लिखना तो बहुत कुछ चाहती हूं मगर कुछ व्यस्तता के कारण लिख नहीं पाई.
फिर भी 2008 को धन्यबाद देना जरूरी समझती हूं. क्योंकि ये वर्ष मेरे जीवन का
सर्वोत्तम वर्ष है ! मेरी बेटियां ,योगिता हितेशिता मुदिता तथा दो अनमोल दामादोँ
धीरज शर्मा व सन्दीप रिखी के रूप मे पाँच हीरे पहले ही मौजूद थे पर भगवान
की कृ्पा से 2008 मे एक और नायाब हीरा ललित ,सूरी दामाद के रूप मे मिला,
जिसने मुझे आसमान पर बिठा दिया,जिसके फलसवरूप आप सब के सामने
बैठी हूँ, नहीं तो ,उपले झाड-झंखाड से चुल्हा जलाने वाली और घूँघट निकाल कर
नौकरी पर जाने वाली ओरत कहाँ इतनी हिम्मत कर पाती.

ये आज के दो शब्द् मेरे इन इन बच्चों तथा अक्षत, अगम [नाती] व अर्शिया
[नातिन] जिसने मुझे अमेरिका की सैर ,करवाई इन सब को समर्पित है.
आप सब का भी धन्यवाद मेरी खुशियों में शामिल हैं.

भगवान आप सब को भी ढेर सारी खुशियां दे !

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नववर्ष मंगलमय हो
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