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22 December, 2010

सुखान्त दुखान्त--- आखिरी कडी { story}

सुखान्त दुखान्त -- आखिरी कडी

पिछली किश्त मे आपने पढा कि बाजी शुची को अपने अतीत की कहानी सुना रही थी कि किस तरह उसने किसी अमीर परिवार मे शादी के सपने देखे थी जब उसकी शादी अमीर परिवार मे हुयी तो उसे अमीरी का सच पता चला। जितना उजला अमीरी का उजाला बाहर से लगता है उतना ही अन्दर अन्धेरा होता है। उसके शराबी कबाबी पति को जब डाक्टर ने टी बी की बीमारी बताई तो घर के लोग तो खुश थे कि बला टली लेकिन बाजी को भविश्य की चिन्ता सताने लगी। बाजीपने पति के साथ सेनिटोरियम मे चली गयी वहीँ अपने जीजा की मदद से नर्स दाई की ट्रेनिन्ग लेने लगी । त्क़भी एक दिन उन्हें एक औरत मिली जिसने जो उनके ससुराल वालों का सच बताने आयी थी। उस औरत ने  बाजी बताया कि कैसे उसके पति की सौतेली माँ और सास उसके पति के खिलाफ षड्यन्त्र  रच रहे हैं।
 जिसे सुन कर उसने पति की देख भाल का पूरा जिमा खुद पर ले लिया और उसे घर ले आयी। अब बाजी की नौकरी भी लग गयी थी। अब आगे पढें------

" इनकी हालत मे बहुत सुधार होने लगा था फिर भी इनके अन्दर एक गम और हीन भावना सी रहती।कितना मुश्किल था एक करोड पति  नवाब के लिये अपने एक नौकर की हैसीयत जितनी पत्नी पर निर्भर करना। आठ वर्ष हो गये थे शादी को हमारा बच्चा भी नही हुया था। यूँ भी कोठों की रोनक बढाने वालों के अपने आँगन सूने ही रहते है।"
 "इस बीच अस्पताले मे एक औरत बच्चे को जन्म दे कर भाग गयी। मैने वो बच्चा गोद ले लिया। बेटा दो साल का हुया था कि एक दिन मेरे पति अपने भाईयों से मिलने और अपनी जमीन जायदाद का प्ता लेने अपने घर गये मगर वहाँ से उनकी मौत की खबर ही आयी। उनकी मौत भी मेरे लिये राज़ ही रही जबकि उनकी हालत पहले से बहुत अच्छी थी।  घर वालों ने बताया कि उन्हें सोते हुये अपने कमरे मे मृ्त पाया गया और मेरे पहुँचने से पहले लाश का दाह संस्कार कर दिया ग्या था। मेरा 10 साल का संघर्ष एक पल मे राख हो गया। सपनो का ऐसा ही अन्त होता है जब हम अपने पँखों के आकार से बडे सपने देखने लगते हैं।। मेरे बेटे के सिर से बाप का साया उठ गया था बेशक ये साया अपनी छाँव उसे नही दे सका था। मुझे जमीन जायदाद मे से कुछ नही मिला बोले की उसने सब कुछ बेच कर खा लिया है।  अब तो मुझे दुख झेलने की आदत सी पड चुकी थी।"
बिना पँख आकाश पर उदने का सपना लिये मैं जमीन पर भी कोई सुख नही भोग पाई।कितना अच्छा होता मै बचपन से ही अपने पाँव पर खडे होने का सपना पालती।ये टीस आज तक मुझे सालती है। शुचि, अपनी कहानी आज इस लिये तुम्हें बताई कि मै नही चाहती कि मेरी तरह कल को तुम भी धन दौलत के लालच मे अपने पाँव के नीचे की जमीन खो दो।।"
" बाजी जरूरी तो नही कि सब लोग एक जैसे होते हैं?" मैने आशंका जताई।
" हाँ , लेकिन धन दौलत की मोटी परत मे उनके जीवन मे झाँकना , उसे भेदना किसी गरीब आदमी के लिये सम्भव नही होता। रिश्ते हमेशा बराबरी मे ही सुखमय होते हैं, प्रेम प्यार मान सम्मान पाते हैं।"
बाजी कुछ देर चुप रही -- हाँ तुम कुछ बताने आयी थी मगर मैं आपनी कहानी ले कर ही बैठ गयी।" बाजी ने मेरी तरफ देख कर पूछा।
 बाजी मेरी एक सहेली है क्लासमेट मै अक्सर उसके घर जाती हूँ। उसकी माँ मुझे बहुत प्यार करती है। उसका भाई बी.य़े  के बाद पढाई छोड कर पिता के साथ अपना बिज़नेस सम्भाल रहा है। वो मुझ मे बहुत दिलचस्पी लेता है। जब भी उसके घर जाऊँ वो आस पास मँडराता रहता है।मगर मैने कभी उस से खुल कर बात नही की। 2-3 दिन पहले उसकी मम्मी ने हंसते हुये मुझसे कहा था कि क्या मेरी बहु बनोगी? मैं हंस दी थी तब उन्होंने कहा था कि सोच कर बताना। मगर आपको पता है कि मैं आपसे पूछे बिना साँस भी नही लेती। मगर मुझे भी वो लडका अच्छा लगता है। यही मन की बात आपसे करने आयी थी।" कह कर मै नज़र नीची कर के बाजी की प्रतिक्रिया सुनने को उतावली थी।
" शुचि सब से पहले तो उस औरत की बेवाकूफी  कहूँगी कि उसने बिना सोचे समझे तुम्हारे हाथ ,मे एक ख्वाव पकडा दिया। अगर उसे तुम पसंद भी हो तो उसे तुम से नही पहले तुम्हारे घर वालों से बात करनी चाहिये थी। मगर ये तो बताओ कि वो है कौन?।"
"वो वर्मा जी का बेटा जिनके तीन पैट्रोल पँप हैं।"
"ओह वो?"
"हाँ , क्या आप जानती हैं उन्हें?"
बहुत अच्छी तरह। एक बार यही लडका मेरे पास किसी लडकी को ले कर आया था उसकी एबार्शन करवाने लेकिन मैने फटकार कर भगा दिया था।"
 "क्या?" मै हैरान थी "उपर से भोला भाला और अन्दर से शैत? मुझे फंसाने की कोशिश? पर क्या उसके माँ-बाप को पता है उसके बारे मे?"
" बेटा माँ बाप को सब पता है सारा शहर जानता है उस बिगडैल लडके को। वो उस लडके की माँ है तेरी माँ नही। अगर तुझे बेटी समझती तो कभी तुम से ऐसा नही कहती। अपने स्वार्थ मे अन्धी हो कर तेरा जीवन दाँव पर लगाने की बात नही सोचती। उसने ही तो बाप से बेटे की बातें छिपा कर उसे इतना बिगडैल बनाया कि अब बाप की भी नही मानता।"
" देख शुचि इस उम्र मे प्यार महज एक स्वाभाविक आकर्षण है।इसमे उलझ कर लडके लडकियाँ अपना जीवन बर्बाद कर लेते हैं, अपने पथ से दूर हो जाते हैं। तुम एक मेधावी लडकी हो और मैने तुम्हारी जिम्मेदारी के लिये तुम्हारी माँ को वचन दिया है। जैसे मैने अपने बेटे  यानी तुम्हारे भाई को पढाया है वैसे ही मै चाहती होऔँ कि तुम भी आगे बढो। अगर तुम्हारे दिल मे  मेरा जरा भी सम्मान है तो मुझे एक वचन दो।"
'क्यों नही बाजी! आपने तो माँ से बढ कर मुझे प्यार दिया है कहें क्या वचन दूँ?"
आज के बाद तुम उनके घर नही जाओगी ।
" बाजी मै वचन देती होऔँ आपकी कहानी सुन कर मुझे ज़िन्दगी के मायने समझ मे आगये हैं। मै खूब पढूँगी और अपनी योग्यता के बल पर अपनी मंजिल पाऊँगी।" बाजी की कहानी ने मुझे अन्दर तक हिला दिया था। मैं बाजी वाला इतिहास दोहराना नही चाहती थी। पहले भी बाजी के पथप्रदर्शन मे ही पढ रही थी। मैने खूब मेहनत की और बाजी की प्रेरण से मै डाक्टरी के अन्तिम वर्ष मे पहुँच गयी थी। उस दिन मै और बाजी बहुत खुश थी, आज नतीजा आने वाला था ।र पिता जी और भईया अखबार जल्दी लेने चले गये थे।
 बाहर की आवाजें सुन कर हम दोनो की तन्द्रा भंग हुयी।---
" बाजी< बाहर  पिता जी और भाईया आये है।" हम दोनो बाहर गयी।  मैने पूरी यूनिवर्सिटी मे टाप किया था। देखते देखते आस पडोस की भीड बधाई देने के लिये जमा हो गयी थी। झो भी मुझे बधाई देता मैं बाजी की ओर इशारा कर देती। वही तो हकदार थी इसकी। उनके जीवन के सुखान्त दुखान्त ही मेरे लिये प्रेरणा  और सफलता के क्षितिज बने थे। बाजी के चेहरे का सकूँ और चमक बता रही थी कि अब उनके पँख कितने बडे हो गये थे और आकाश छूने को आतुर। समाप्त।

19 December, 2010

सुखान्त दुखान्त ----4-- story

सुखान्त दुखान्त --4
 पिछली किश्त मे आपने पढा कि बाजी शुची को अपने अतीत की कहानी सुना रही थी कि किस तरह उसने किसी अमीर परिवार मे शादी के सपने देखे थी जब उसकी शादी अमीर परिवार मे हुयी तो उसे अमीरी का सच पता चला। जितना उजला अमीरी का उजाला बाहर से लगता है उतना ही अन्दर अन्धेरा होता है। उसके शराबी कबाबी पति को जब डाक्टर ने टी बी की बीमारी बताई तो घर के लोग तो खुश थे कि बला टली लेकिन बाजी को भविश्य की चिन्ता सताने लगी। बाजीपने पति के साथ सेनिटोरियम मे चली गयी वहीँ अपने जीजा की मदद से नर्स दाई की ट्रेनिन्ग लेने लगी । त्क़भी एक दिन उन्हें एक औरत मिली जिसने जो उनके ससुराल वालों का सच बताने आयी थी। कौन थी वो आगे पढें---

"हम दोनो एक पेड के नीचे बैठ गयी।
" अभी ये मत पूछिये कि मै कौन हूँ आपको बता दूँगी। मै कसौली मे बडे नवाब यानि आपके पति को देखने आयी थी।उनकी हालत देख कर मुझ से रहा नही गया। आप चाहे कुछ भी कहें लेकिन मेरी अन्तरात्मा से रहा नही गया कि आपको सच बताये बिना जाऊँ। बात ये है कि बडे नवाब की माँ और भाई नही चाहते कि वो ठीक हों\ वो लोग आपको बताये बिना उन्हें अफीम और शराब भेजते हैं जो वो आपके जाने के बाद छुप कर पीते हैं। चोरी से पैसे भी दे जाते हैं जिनसे वो नौकर से शराब मंगवा कर पीते हैं। बडे नवाब नशे के इतने अभ्यस्त हो गये हैं कि नशे के बिना रह नही सकते। वो आप से शर्मिन्दा भी हैं मगर अब बेबस हैं। इसी के कारण उनके भाई उन से कुछ जमीन के कागज़ों व कारोबार के कागज़ों पर उनके दस्तखत करवा कर ले जाते हैं। ताकि अगर बडे नवाब न भी रहें तो उनकी सम्पति मे आपका हक न रहे। इस तरह उन्होंने बडे नवाब को बर्बाद करने मे कोई कसर नही छोडी है। अगर आप चाहती हैं कि बडे नवाब ठीक हो जायें तो उन्हें कहीं और ले जायें और नौकर को वापिस भेज दें। धीरे धीरे डाक्टर से मश्विरा कर पहले इनका नशा छुडायें। दिल के अच्छे हैं मगर सौतेली माँ के  दबाब और अवहेलना से दुखी रहे। पिता की मौत के बाद टूट से गये हैं तभी से अधिक नशा लेने की आदत हो गयी है।" कह कर वो चुप कर गयी
" मगर आपको कैसे पता चला ये सब।" मै उसकी बातों से हैरान परेशान थी।
"मुझे ये बताने मे कोई संकोच नही कि मै वही कोठेवाली हूँ जिसके पास वो रोज़ आते थे। हमारा पेशा है हर आने वाले का स्वागत करना पडता है। उन्हें कई बार समझाने की कोशिश भी की। उनका नमक वर्षौ खाया है तो उनका दुख देख कर मन दुखी हुया और आपको बताने का साहस भी जुटा पाई। शायद अपना फर्ज निभा कर मै बडे नवाब के लिये कुछ कर पाऊँ।" कह कर वो उठ खडी हुयी। मैं उसे जाते हुय्ते हैरानी से देखती रही। उस समय इतना ध्यान भी नही आया कि उसका धन्यवाद करूँ या उसे चाय के लिये ही पूछ लूँ।"
मै विस्मित सी इनके अतीत के कुहासे मे छिपे रहस्य, षड्यन्त्र, एकिन्सान की पीडा और भटकाव -- पता नही और क्या क्या देख रही थी। इसका कारण?--- पैसा। पैसे की चकाचौँध के पीछे का काला इतिहास ---। इन रिश्तों ,माँ भाईयों से अच्छी तो वो औरत ही निकली जिसे कम से कम इनकी दशा देख कर रहम तो आया? मन ही मन उस औरत का धन्यवाद किया और चल पडी।"
"मैं वहाँ से सीधी अस्पताल पहुँची।नौकर पता नही कहाँ था मैं अपलक उन्हें सोते हुये निहारती रही। बिलकुल किसी अबोध बालक की तरह उनका चेहरा था जैसे माँ की गोद  के लिये रोते रोते सो गया हो। और अचानक मेरे अन्दर की औरत माँ बन गयी। कितनी देर सोचती, देखती रही।  जब से मै कोर्स करने लगी थी तब से मेरे अन्दर जीवन के लिये एक दृष्टीकोण बन गया था एक आत्मविश्वास और अपने पाँव पर खडे होने का प्रयास। आज सोच लिया कि इन्हें उन दुष्टों से बचाऊँगी।"
" इस सप्ताह मेरी इम्तिहान था। अभी 15 बीस दिन मै कोई कदम नही उठाना चाहती थी। सिवा इसके कि नौकर को वापिस भेज दूँ। अब मै अधिक समय अस्पताल मे बिताने लगी। वहीं बैठ कर पढती रहती। खुद ही मिनकी देखभाल करती। मुझे अब पहले की तरह इन पर गुस्सा नही आता। समझ गयी थी कि मन से कमजोर आदमी कितना लाचार होता है। अफीम पूरी न मिलने से इनकी बेचैनी बढने लगी। नौकर चला गया था ला कर कौन देता? मैने इन्हें बताये बिना डाक्टर को पूरी बात बताई तो उन्हों ने मश्विरा दिया कि एक दम अफीम बन्द करने से भी इन्हें बेचैनी है। नशा एक दम से बन्द नही किया जा सकता। और उस दिन मैने इन्हें सब कुछ बता कर इनसे प्रण लिया कि ये आदत छुडवाने मे मुझ से सहयोग करेंगे तो समझूँगी कि मैने आपको पा लिया है। अब मैं अफीम कहाँ से लाती? नौकर को बुलाया उससे अफीम मंगवा कर अपने पास रख ली और नौकर को फिर भेज दिया। मै इन्हें अपने हाथ से कम डोज़ देती। इनकी बेबसी और शर्मिन्दगी देख कर दुख भी होता मगर इन्हें समझाती और कुछ पुस्तकें भी पढने के लिये प्रेरित करती। हर तरह से खुश रखने की भी कोशिश करती। इस तरह अब इनकी हालत मे एक महीने मे ही सुधार नजर आने लगा। शराब बिलकुल बन्द कर दी।"
 "मेरी ट्रेनिंग समाप्त् होने के दो माह बाद ही मुझे शिमला के एक असपताल मे नौकरी मिल गयी । मै इन्हें लेकर शिमला आ गयी मगर ईलाज यहीँ का चलता रहा। अपनी माँ को अपने साथ ले आयी थी। अब मैने फैसला कर लिया था कि उनसे कोई आर्थिक सहायता भी नही लूँगी। बेशक मेरी बहन ने मेरी उस समय बहुत मदद की। इनकी दवाओं का और खुराक का ही बहुत खर्च था। अच्छी खुराक मे मीट अन्डे भी देने पडते। मैने कभी मीट को हाथ भी नही लगाया था ।ास्प्ताल के एक कर्मचारी को पैसे दे कर मीट और खरोडे बनवा लेती ।इनकी हालत मे बहुत सुधार होने लगा था फिर भी इनके अन्दर एक गम और हीन भावना सी रहती।कितना मुश्किल था एक करोड पति  नवाब के लिये अपने एक नौकर की हैसीयत जितनी पत्नी पर निर्भर करना। आठ  साल हो---    क्रमश:

16 December, 2010

sukhaant dukhaant --- 3

सुखान्त दुखान्त --3
 पिछली किश्त मे आपने पढा कि बाजी शुची को अपने अतीत की कहानी सुना रही थी कि किस तरह उसने किसी अमीर परिवार मे शादी के सपने देखे थी जब उसकी शादी अमीर परिवार मे हुयी तो उसे अमीरी का सच पता चला। जितना उजला अमीरी का उजाला बाहर से लगता है उतना ही अन्दर अन्धेरा होता है। उसके शराबी कबाबी पति को जब डाक्टर ने टी बी की बीमारी बताई तो घर के लोग तो खुश थे कि बला टली लेकिन बाजी को भविश्य की चिन्ता सताने लगी।-- अब आगे

"सच कहूँ शुचि मुझे अपने भविश्य की चिन्ता थी। पति से वो दिल का रिश्ता तो जुड नही पाया था लेकिन फिर भी पति धर्म निभाने को मैने खुद को कभी पीछे नही रखा। मुझे तो जीने की भी चाह नही थी लेकिन जीवन दर्शन के कुछ सूत्र सहेज रखे थे। मेरे पिता जी कहा करते थे "-बेटा जब कभी सब ओर से निराश हो जाओ तो सब कुछ प्रभु पर छोड दो\ मन मे एक विश्वास रखो कि वो जो भी करेगा तुम्हारे भले के लिये करेगा।" वो  तो हमे राह दिखाता है मगर हम ही अपने स्वार्थ और कामनाओं की पूर्ती के लिये आँखें मूँद रखते हैं।। आज रह रह कर मन मे एक ही बात आ रही थी कि मेरी ज़िन्दगी मे कोई नया मोड आने वाला है। एक बात की मुझे मन ही मन खुशी भी थी कि मै इन्हें सेनिटोरियम ले जाने के बहाने कम से कम इस नर्क से दूर तो रहूँगी। अपने बारे मे नये सिरे से सोचने का एक अवसर मिलेगा।  जब अचानक कोई मुसीबत आती है तो आदमी सोचता है  कि भगवान मुझे ही क्यों दुख देता है लेकिन वही दुख हमारे लिये जीनी की राह तलाशता है,जीना सिखाता है।
" मुझे पति के साथ कसौली भेज दिया गया।साथ मे इनका निज़ी नौकर भी भेजा था।मेरे कसौली जाने पर ही मेरे माँ बाप को मेरी व्यथा का पता चला था। मेरी दीदी के पति शिमला के एक सकूल मे अध्यापक थे। वो सब लोग कसौली आ गये थे। वहीं एक घर किराये पर ले लिया था। नौकर जा कर कुछ जरूरी सामान ले आया था। इलाज शुरू हो गया। धीरे धीरे मेरे जीजा जी ने मेरे पति को समझाया कि , अपनी पत्नि के भविश्य के बारे मे सोचो। भगवान न करे अगर उस पर कोई विपत्ति आ गयी तो उसे कौन रोटी देगा? उसे अपने पाँव पर खडा होने की अनुमति दो। मेरे पति की आधी अधूरी स्वीकृति मे ही मुझे से मेरे जीजा जी ने नर्स दाई की ट्रेनिन्ग के फार्म भरवा लिये तब नर्स दाई की नौकरी बहुत आसानी से मिलती थी वो चाहते थी कि अगर इन लोगों ने नौकरी न भी करने दी तो हाथ मे ऐसा हुनर तो होगा कि मुश्किल मे घर बैठे भी चार पैसे कमा सकोगी। मेरे पिता तो वापिस चले गये लेकिन माँ मेरे पास रही।"
: मेरी धन दौलत की मृग त्रिष्णा तो टूट चुकी थी।सोने चाँदी के ताले तोड कर मैं आत्मनिर्भर बन अपने पँखों परआअपने आसमां पर उडना चाहती थी। दो माह बाद मुझे दाखिला मिल गया और पढाई भी शुरू हो गयी।रोज़ इनको नहलाने धुलाने और  दवाई आदि देने के बाद मै अपनी क्लास एटेन्ड करने चली जाती थी। इनके भाई हर महीने इन्हें आ कर पैसे आदि दे जाते। वैसे मेरी पढाई से वो अन्दर ही अन्दर इस लिये खुश थे कि चलो एक जिम्मेदारी और टलेगी। इस लिये पैसे की उन्होंने कभी कमी नही होने दी। वैसे भी 6 महीनी इनका यहाँ ईलाज चलना था। नौकर सारा दिन इन्बके पास ही रहता।"
एक दिन डाक्टर ने कहा कि मुझे एक बात की समझ नही आयी कि पाँच महीने के ईलाज मे उतना फर्क नही पडा जितना पडना चाहिये था।इनके साथ के बाकी मरी इनसे स्वस्थ हो गये थे। उन्होंन्बे अभी छ: महीने और रखने के लिये कहा।"
मै भी चि9न्तित थी कि फर्क क्यों नही पड रहा। ये भेद खुला जा कर 8-9 महीने बाद । वो भी एक दिन एक औरत के कारण।
" एक दिन मै जैसे ही क्लास से बाहर आयी तो एक औरत को अपने इन्तजार मे खडे पाया।
"कृष्णा बहन ये बहिन जी आपसे मिलने आयी हैं।: बूढी चपडासिन ने उस औरत की ओर इशारा किया।
"नमस्ते।" वो औरत मेरे पास आते हुइये बोली।
:" नमस्ते। मैने आपको पहचाना नही?"
" आप मुझे नही जानती लेकिन मै आपको पहचानती हूँ। मैं आपसे एक जरूरी बात करने आयी हूँ। क्या हम कहीं अकेले मे बैठ सकते हैं?"
क्यों नही , चलो।" मै उसे बाहर ग्राऊँड मे ले गयी। हम दोनो एक बृक्ष के नीचे छाँव मे एक बैंच पर बैठ गयी। मैं हैरान थी कि ये औरत कौन है और मुझ से क्या जरूरी बात करना चाहती हैं? वो लगभग मेरी उम्र की सुन्दर औरत थी। उसका सादा लिबास और आवाज मे शह्द जैसी मिठास थी जिसने मुझे प्रभावित किया।
"आप हैरान मत होईये। मै आपको सब कुछ बता दूँगी। मुझे कुछ दिन से ही महसूस हो रहा था कि मुझे आपसे मिलना चाहिये और आपको एक सच बताना चाहिये। ैसी लिये आज चली आयी।"   क्रमश:

12 December, 2010

सुखान्त दुखान्त ---2

 सुखान्त दुखान्त --2
कल आपने पढा शुची ने अपने मन की बात अपनी बाजी से करने के लिये जैसे ही भूमिका बाँधनी चाही तो बाजी की शादी की बात जानने के लिये उसकी उत्सुकता बढ गयी। और बाजी उसे अपने अतीत मे ले चली थी- उस अतीत मे जहाँ उसके अमीरी के लिये देखे गये सब सपने बिखर गये थे।  ----- अब आगे पढें-0-

" हमारे पडोस मे एक शादी थी। उस शादी मे मेरे ससुराल वालों ने मुझे देखा तो मै उनको भा गयी। उन्होंने अपने इसी पडोसी के दुआरा मेरे रिश्ते की बात चलाई। मेरा हाथ माँगते हुये उन्होंने कहा था कि उनके पास धन दौलत की कमी नही है, बस उन्हें सुन्दर और सुशील कन्या चाहिये।माँ और मेरे जीजा जी ने इस शादी का विरोध भी किया ये कह कर कि अभी इसकी उम्र 16 साल हुयी है-- इसे आगे पढाना चाहिये। मगर पिता जी का मानना था कि घर बैठे इतना अच्छा रिश्ता आ रहा है तो हाथ से क्यों जाने दें।फिर पढ कर ये कौन सी लाट साहिब बन जायेगी? सच कहूँ तो इस रिश्ते की बात सुन कर मैं भी खुश हो गयी थी। मेरे सपने भी ऐसे ही थे जैसे आज तुम्हारे हैं।एक मध्यम परिवार की लडकी किसी रईस खानदान की बहु बन जाये तो और क्या चाहिये उसे। पति सुन्दर और खानदानी रईस थे-- मै तो जैसे आसमान पर उडने को आतुर थी। मुझे लगा मुझ जैसा खुशनसीब इन्सान इस दुनिया मे नही।
" शुची एक बात बताऊँ? इस रईसी की दहलीज के बाहर  जितनी रोशनी होती है, अन्दर उतना ही अन्धेरा होता है।मेरे पिता ने भी दहलीज ही देखी थी। अन्दर जा कर पता चला कि कि मैं एक घनघोर अन्धेरे मे आ गयी हूँ।जहाँ न तो संवेदनायें थी न प्यार न रिश्तों की गरिमा थी। शादी के दो चार दिन की गहिमा गहिमी के बाद जब सभी महमान चले गये तो मै दिन भर अकेली दीवारों का मुँह ताका करती। मेरे पति सुबह घर से जाते तो रात को देर गये घर आते। बाकी लोग अपने अपने कमरों मे अपनी अपनी ज़िन्दगी मे मस्त रहते। रातों मे अपने सपनो का आसमां ढूँढती और दिन मे खुद को यथार्थ की कठोर, पथरीली जमींन पर खडे पाती। मेरे सपने किसी रैन के कोठे की रौनक थे और मेरा यथार्थ   लाचार आँसू बहाने के लिये। किस से कहती और क्या कहती? मेरे सपनों का राज कुमार तो शराब और शबाब मे मस्त था। रात को देर से शराब के नशे मे आना कई बार तो किसी कोठे पर ही रात कटती थी।ऊपर से जूए की लत। मुझे शादी के कुछ दिन बाद ही पता चला कि उनकी पहले भी शादी हो चुकी थी पर एक साल बाद ही पत्नी ने आत्महत्या कर ली थी।मेरे पति की माँ सौतेली थी। इनकी पहली शादी के बाद इनके पिता भी चल बसे थे। उनके बाद सौतेली माँ का व्यवहार भी इनके साथ अच्छा नही था । उसके अपने भी दो बेटे थे।

" मैं धीरे धीरे महसूस कर रही थी कि वो इनकी ऎयाशी को और भी हवा देती थी। सारा कारोबार इनके अपने बेटों ने सम्भाल रखा था ये तो बस नाममात्र ही वहां जाते थे। मेरे कई बार कहने पर भी वो इन्हें कभी समझाती नही थी बल्कि उलटा कहती कि" किसी से माँग कर ऎयाशी नही करता, ये रईसी शौक ऐसे ही होते हैं। उसे क्या कमी है?"
मै बेबस न तो अपने माँ बाप को दुखी करना चाहती थी और न इस घर मे मेरी कोई सुनने वाला था। घर मे बेशक नौकर चाकर थे मगर मन लगाने के लिये किचन का काफी काम मै उनके साथ कर लेती। माँ तो सीधे मुंह बात नही करती थी देवरानियाँ भी अपनी अमीरी के दर्प मे मुझे सुना कर ताने से कसती रहती। हर बात के लिये मुझे ये एहसास करवाया जाता कि जैसे मैने जिन्दगी मे अच्छा खाया पहना ही नही। गरीब घर से जो आयी थी। मगर अब सहन करने के सिवा कोई चारा नही था।

"मुझे नही लगता कि शादी के कुछ दिन छोड कर मैने उन्हें दिन के उजाले मे कभी देखा हो।देर रात गये घर आना कभी दिल किया तो पति का हक जता कर शरीर से खेल लेना--- बस इतना ही सम्बन्ध था हमारा। शादी के बाद  5--6 साल बाद ही शराब और शबाब ने इन्हें खोखला कर दिया। बुखार खाँसी रहने लगा। डाक्टर ने जाँच कर के बताया कि इन्हें टी.बी. है, इन्हें घर मे रखना ठीक नही। किसी सेनिटोरियम मे भेज दें। माँ और भाईयों के चेहरों पर एक सकून सा था कि चलो बला टली। लेकिन मेरा तो कलेजा मुँह को आ गया? अगर इन्हें भी कुछ हो गया तो मेरा क्या होगा? जो लोग इनके जीते जी ही मेरी इतनी अवहेलना कर रहे हैं वो बाद मे मेरे साथ क्या करेंगे? क्रमश:
 

10 December, 2010

दुखान्त सुखान ---

दुखान्त-- सुखान्त

उस दिन सोच कर आयी थी --- बाजी को बता दूँगी कि मै अमन से प्यार करती  हूँ और उससे शादी करना चाहती हूँ अमन की मम्मी भी मुझ से कितना प्यार करती है और मुझे बहु बनाने के लिये कितनी उतावली हैं।
घर पहुँचते पहुँचते ख्यालों के पुलाव बनाये जा रही थी---- ये उतावलापन भी दूध के उफान सा होता है बिना सोचे समझे सब कुछ उगल देने को आतुर-----। समझ नही आ रहा था कि बात कैसे शुरू करूँ? क्या बाजी मान जायेंगी? बस फिर उफान नीचे सरक जाता---- अगर मान भी गयी तो क्या पापा को मना पायेंगी?----- कुछ आशा की झाग समेटे घर मे दाखिल हुयी। बाजी ड्राईंग रूम मे बैठी कोई किताब पढ रही थीं। कितना ओज़ था उनके चेहरे पर आत्मविश्वास के रुपहली पर्त ---- । सामने दीवार पर उनकी आदमकद फ्रेम मे जडी फोटो लगी थी। बाजी कभी अपनी शादी की कोई बात नही करती थी।मुझे उनके पति के बारे मे कुछ पता नही था बस इतना पता था कि वो विधवा हैं। मै उनकी फोटो के पास जा कर खडी हो गयी----
"बाजी मुझे आपकी ये फोटो बहुत अच्छी लगती है---- जैसे कोई महारानी खडी हो। इतनी भारी साढी और जेबर क्या ये जेबर असली हैं?" --- बात शुरू करने से पहले मैं उन्हें टटोलना चाहती थी।
"खाइस सोने और हीरे के"
"फिर तो बहुत मंहगे होंगे? कितनी कीमत होगी इनकी?"
"बेटी इनकी कीमत मत पूछ । इन जेबरों की ऋण मै आज तक नही चुका पाई।" बाजी ने ठँडी साँस भरते हुये कहा।
"ऋण? क्या ये आपने खुद बनवाये थे?" मैने हैरानी से पूछा।
" नही ससुराल वालों ने शादी मे पहनाये थे और बदले मे मेरे सारे सपने गिरवीं रख लिये थे।"
" वो कैसे?" मै विस्मित सी उनकी तरफ देख रही थी।
न जाने कितनी पीडा कितने अतीत के साये उनकी आँखों मे बदली बन कर छा गये थे। आँखों की नमी बता रही थी कि उन्होंने बहुत दुख झेले हैं।
"क्या करोगी जान कर ? जाओ अपनी पढाई करो।" बाजी जरा सोचते हुये बोली।
"बाजी आज मै जानकर ही रहूँगी। आज आपसे अपने मन की बात करने आयी थी। आपकी तस्वीर देख कर मुझे भी लगता है कि मै अपनी शादी किसी अमीर परिवार मे ही करूँगी जहाँ महाराणी की तरह राज करूँ धन दौलत बढिया कपडे,जेबर ,ऎश आराम गाडी बंगला सब कुछ हो और नौकर चाकर आगे पीछे हों------"
"अच्छा अब जमीन पर आ जाओ। जितने पँख फैला सको उतनी ऊँचाई तक ही उडान भरनी चाहिये। मगर तुम ऐसी बातें कैसे सोचने लगी?पहले खुद को इस काबिल बनाओ कि खुद इतना धन कमा सको। आत्मनिर्भरता का सुख और खुशी दुनिया की किसी भी दौलत से बडी होती है। फिर तेरे मध्यम परिवार के माँ बाप कहाँ से ऐसा घर ढूँढेंगे?"
" बाजी मेरी बात छोडो पहले आप बताओ कि  जब आपके ससुराल वाले इतने आमीर थे तो आपने इतनी छोटी सी नौकरी क्यों की और इस छोटे से घर मे क्यों रह रही हैं?"  आज उनके आतीत को जानने की उत्सुकता बढ गयी थी। हम दो साल पहले ही इस घर मे, उनके पडोस मे आये थे बस इतना ही जानती हूँ कि वो विधवा हैं और उनका एक बेटा है जो डाक्टरी की पढाई कर रहा है। दो साल मे ही बाजी हमारे घर की सदस्य जैसी हो गयी थी।
" शुची आज तुम्हें ये सब बताना जरूरी हो गया है। क्योंकि जिस आसमान के तुम सपने ले रही होउसके मैने भी सपने देखे थे। बिना पँख ऊदने की कोशिश की लेकिन धडाम से नीचे जमीन पर आ गिरी।" बाजी ने अपनी कहानी शुरू की और मैं उनका बाजू पकड कर उनसे सट कर बैठ गयी।
" हमारे पडोस मे एक शादी थी। उस शादी मे मेरे ससुराल वालों ने मुझे देखा तो मै उनको भा गयी। उन्होंने अपने इसी पडोसी के दुआरा मेरे रिश्ते की बात चलाई।------ क्रमश:

16 September, 2010

दो चेहरे- लघु कथा

दो चेहरे
"पापा आज  आप स्टेज पर हीर राँझा गाते हुये रो क्यों पडे थे?"
"समझाईये न पापा"
'तुम नहीं समझोगी"
"समझाईये न पापा"
रनबीर की सात साल की बेटी अचानक अपनी नौकरानी के बेटे गोलू के साथ  खेलती हुयी पापा से आ कर पूछने लगी।
'नहीं पापा मुझे बताओ ना" वैसे ये हीर राँझा क्या होते हैं?"
रनबीर ने बेटी की तरफ देखा और उसे बताने लगा
'बेटी हीर राँझा दो प्रेमी थे दोनो एक दूसरे से बहुत प्यार करते थे मगर दोनो की शादी नहीं हुयी और और दोनो एक दूसरे के लिये तडपते रहे" ये गीत ये गीत हीर राँझा की प्रेम कथा  है, उसका दर्द देख कर किसी के भी आँसू निकल जाते हैं। बहुत दर्दनाक प्रेम कहानी है।' रनबीर सिंह अपने ही ख्याल मे डूबा हुया बेटी को बता रहा था।
"पापा उनके माँ बाप कितने बुरे थे?"
'हाँ बेटी बहुत बुरे"। रनबीर ने बेध्यानी मे जवाब दिया
" पापा1 मेरे पापा तो बहुत अच्छे हैं जब मैं गोलू से शादी करूँगी तो आप हमे कुछ नहीं कहेंगे ना?" बेटी ने भोलेपन से कहा
'चटाक' तभी उसके गाल पर एक ज़ोर से चाँटा पडा और बेटी अवाक पिता की तरफ देख रही थी।
उसे क्या पता था कि इन्सान के दो चेहरे होते हैं एक घर मे एक बाहर।

10 September, 2010

अति अन्त है-- बोध कथा---

अति अन्त है
एक नदिया का पानी रोज़ अपनी रवानगी मे बहता, किनारों की तरफ भागने की कोशिश करता मगर नदी से बाहर नही निकल पाता। उसके मन मे बहुत क्षोभ था कि वो स्वतन्त्र क्यों नही। सामने ऊँचे हिम शिखरों के देख कर उसका मन ललचाता कि काश वो उस शिखर पर पहुँच जाये और दुनिया के नज़ारे देखे। उसने सूरज की किरण से कहा
 "तुम मुझे भाप बना दो ताकि मैं उस हिम शिखर तक पहुँच जाऊँ।"
 किरण ने उसे समझाया " तुम पानी हो नदिया मे ही रहो यही तुम्हारी तकदीर है। दूर की चमक दमक देख कर अपने पाँव के नीचे की जमी मत छोडो"
मगर पानी नही माना। उसने कहा कि --
" ये तुम इसलिये कह रही हो कि मैं कहीं बडा न बन जाऊँ मुझ मे भी पहाड जितनी शक्ती न आ जाये।"
नही मैं इस लिये कह रही हूँ कि तुम जितनी शक्ती किसी मे नही। झुकने मे जो ताकत है वो ऊँचा सिर करने मे नही। तुम खुद को जैसे चाहो ढाल सकती हो। मगर पर्बत की तकदीर देखो वो अपना सर भी नही हिला सकता। कहीं मर्जीसे आ जा नही सकता वो भी तो अपनी सीमाओं मे से बन्धा हुआ है! रोज़ सूरज का इतना ताप सहता है फिर भी अडिग है। क्या तुम उसकी तरह सभी कष्ट सह सकती हो? तभी तो वो पर्बत है। क्या तुम उसकी तरह सभी कष्ट सह सकती हो?भगवान ने सब को कुछ न खुछ काम दे कर संसार मे भेजा है इस लिये जिसको जिस हाल मे भगवान ने रखा है उसे खुशी से स्वीकार कर सब का भला करते रहना चाहिये। तुम भी अपनी सीमा मे बन्ध कर रहना सीखो और सब की प्यास बुझा कर मानवता की सेवा करो। अगर कोई एक बार राह भटक गया तो न घर का रहता है न घाट का।"
मगर पानी ने उसकी एक नही सुनी तो सूरज की किरण कहा कि चलो मैं तुम्हें भाप बना देती हूँ तुम शिखर पर चली जाओ। पानी भाप बन कर पर्बत  पर चला गया और ठंड से बर्फ बन कर चोटी पर जम गया। वो बहुत खुश हुया कि यहाँ से खडे हो कर वो दुनिया के नज़ारे देख सकता है। आज वो भी कितना ऊँचा उठ गया है नदिया यूँ ही नाज़ करती थी कि उसने मुझे पनाह दे रखी है। सूरज की किरण रोज़ उससे मिलने आती तो झूम कर कहता कि देखों आज मैं भी पर्वत हूँ। वो मुस्कुराती और अपनी राह चल देती। मगर एक दिन  पानी का घमंड देख कर उसने कहा कि कुछ दिन ठहरो अब गर्मी आने वाली है। अभी सूरज देवता का ताप इतना बढ जायेगा कि तुम सह न पाओगी। मगर पानी तो अपनी इस सफलता पर झूम रहा था उसे किसी चीज़ की परवाह नही थी। कुछ दिनो बाद गर्मी का मौसम आया।  वहाँ रोज़ सूरज की तपता तो पानी पिघलने लगता। धीरे धीरे पानी पिघलता तो कभी किसी तालाब मे तो कभी कहीं जमीन पर बूँद बूँद टपक जाता। उसे नदिया तक जाने का रास्ता भी नही पता था वो तो सपनों के पंख लगा मदहोश हो  कर पहाड पर आया था। वैसे भी पानी के पहाड पर चले जाने के बाद नदी सूख गयी थी और अब वहां बडी बडी इमारतें खडी हो गयी थीं। पानी के लिये जगह ही कहाँ बची थी? इस तरह कुछ हिस्सा कहीं तो कुछ कहीं गया। जैसे किसी शरीर के टुकडे करके अलग अलग जगह फेंक दिये गये हों। एक दिन किरण को पानी का धडकता हुया दिल एक नाले मे दिखा तो उसने कटा़क्ष किया---
" क्या तुम्हारा दिल पर्बत पर नहीं लगा?"
 पानी दुखी मन से बोला "तुम ने सही कहा था हम दूसरों को ऊँचे उड कर देखते हैं तो सामर्थ्य ना होते हुयी भी वहाँ तक पहुँच जाना चाहते हैं। मगर जिस परिश्रम और कष्ट को उन्होंने सहा है वो सह नही सकते। मुझे आज ये शिक्षा मिली है कि दूसरों को देख कर अपनी सीमायें मत तोडो नहीं तो न घर के रहोगे न घाट के। अगर तुम मानवता की सेवा करना चाहते हो तो खुद को सीमा में बान्धना सीखो। नहीं तो बिखर जाओगे और मेरी तरह  किसी के काम के नही रहोगे।" आखिर हर चीज़ की हर ख्वाहिश की कोई न कोई तो सीमा तो होनी ही चाहिये। अति अन्त है।


13 August, 2010

कसौटी रिश्ते की--- कहानी

कसौटी रिश्ते की
अगली कडी
अब तक आपने पडा कि दोनो पति पत्नि बैठे हुये हैं और पति रो रहे हैं। उनके भाईयों ने उन्हें घर मे से हिस्सा नही दिया था---- पत्नि उन्हें और रुलाना चाहती थी---- पिछली बातें याद कर के ताकि बाद मे रोने के लिये कुछ न बचे।-------
अगली कडी


"ये तो बहुत बडी बडी बातें थी हमे तो एक छोटी सी खुशी भी नसीब नही होती थी। याद है रिश्तेदारी मे एक शादी पर जब मुझे भी सब के साथ जाने का सौभाग्य प्राप्त हुया था। अपनी शादी के कुछ दिनो बाद ही मैं सजना संवरना भूल गयी थी। उस दिन मुझे अवसर मिला था। जब तैयार हो कर आपके सामने आयी तो आपने शायद पहली बार इतने गौर से देखा था--- न जाने कहाँ से एक ावारा सा अरमान आपके दिल मे उठा था अवारा इस लिये कि ऐसे अरमान आपके दिल मे उठते ही नही थे अगर उठते थे तो आप छिपा लेते थे---- तभी आप बोले--
"अज हम सब से पहले घर आ जायेंगे। कुछ पल अकेले मे बितायेंगे।"
"क्या सच????"  मेरी आवाज़ मे छिपा व्यंग इन्हें अन्दर तक कचोट गया था-- चाहे बोले कुछ नही मगर आँखों मे बेबसी के भाव मैने पढ लिये थे। एक दर्द की परछाई इनके चेहरे पर सिमट आयी थी।
मुझे पता था कि मुश्किल है हमे माँजी अकेले मे भेजें। वो नही चाहती थी कि हम दोनो कभी अकेले मे बैठें। मुझे पता नही क्यों उन पर कभी गुस्सा नही आता था उन्हों ने बचपन मे सौतेली माँ के हाथों इतने दुख झेले थे। मेरे ससुर जी की पकिस्तान मे अच्छी नौकरी थी वो पटवारी थी मगर आज़ादी के बाद दंगों मे उ7न्हें सब कुछ वहीं छोड कर भारत आना पडा कुछ अपनी जमीन यहां थी तो नौकरी भी फिर से यहीं मिल गयी । यहाँ भी संयुक्त परिवार था साथ भाईयों का तो मेरी सासू जी सब से छोटी थी इस लिये यहाँ भी उन्हें बहुत दुख झेलने पडे। शायद अब भी उनके मन मे एक असुरक्षा की भावना थी। मुझे कभी कुछ कहती भी नही थी। अपनी बीमारी से भी दुखी थी। इस लिये मुझे उन पर गुस्सा नही आता।  उन्हें डर था कि अगर हम मे प्यार बढ गया तो मैं इन्हें शहर न ले जाऊँ।  और उस दिन भी यही हुया जैसे ही हम खाना खाने के बाद चलने को हुये तो िन्हों ने कहा कि आपने तो रात को आना है हम लोग घर चलते हैं पशुयों को चारा भी डालना है-- तो माँजी एक दम से बोल पडी----" बच्चों को भी साथ ले जाओ।" और मैं एक अनजान पीडा से तिलमिला गयी। फिर अकेले कुछ समय साथ बिताने का सपना चूर चूर हो चुका था।
 इनका रोना रुकने की बजाये बढ गया था यही तो मैं चाक़्हती थी----
" आपको याद है मुझे अपने मायके के सुख दुख मे भी शामिल होना नसीब नही था।मेरे जवान भाई की मौत आपकी भाभी  के बाद 6-8 माह मे ही हो गयी थी---तो संस्कार के तुरन्त बाद ही आप मुझे घर ले आये थे--- मुझे अपनी माँ के आँसू भी पोंछने नही दिये थे--- आप मुझे रोने भी नही देते झट से डांट देते---" रो कर क्या भाई वापिस आ जायेगा?"---- ओह! किस तरह टुकडे टुकडे मेरे दिल को पत्थर बनाया था----: आज तक न कभी हँस पाई न रो पाई। लाडकी को ही क्यों हक नही होता कि वो अपने माँ बाप के सुख दुख मे काम आये जैसे कि आप अपने माँ बाप के काम आ रहे थे।
रगर  एक एक दिन और रात का आपको हिसाब दूँ तो शायद आज आप भी सकते मे आ जायेंगे। आपने केवल अपनी नज़र से ज़िन्दगी को देखा है आज मेरी नज़रों से देखोगे तो आपका दर्द बह जायेगा और मुझे भी शायद कुछ सकून मिलेगा।
इसी लिये मैं आपको रो लेने देना चाहती हूँ। आपको रोने से नही रोकूँगी--- आपको पत्थर नही बनने दूँगी--- भुक्तभोगी हूँ--- जानती हूँ पत्थर बना हुया दिल ज़िन्दगी पर बोझ बन जाता है--- दुनिया के लिये अपने लिये निर्दयी हो जाता है।
राम सीता के लिये कठोर हो सकते हैं मगर दुनिया के लिये तो भगवान ही हैं क्या राम के बिना दुनिया की कल्पना की जा सकती है? मैं सीता कि तरह उदार तो नही हो सकती कि आपको माफ कर दूँ मगर फिर भी चाहती हूँ कि आप दुनिया के लिये ही जीयें_। मैं दुनिया को एक कर्तव्यनिष्ठ इन्सान से वंचित नही करना चाहती।काश भगवान मुझे भी आप जैसाबनाता कामनाओं से मुक्त--- स्वार्थ से परे--- मेरा अपने सुख के लिये शायद स्वार्थ ही था जो आपको कभी माफ नही कर पाई। हाँ लेकिन एक बात का स्कून ज़िन्दगी भर रहा कि मैने वो किया है जो शायद आज तक किसी ने नही किया। अपना दर्द तब भूल जाती हूँ जब गाँव के लोग कहते हैं कि ऐसी बहु न कभी आयी थी न शायद आयेगी। बस इसी एक बात ने मुझे विद्रोह करने से रोके रखा। हाँ जमीन बाँटे जाने तक सब के लिये मैं महान थी मगर जब अपना घर बनाने की बारी आयी तो मैं बुरी हो गयी। जो औरत शादी के पच्चीस  साल तक घर मे सब के लिये वरदान थी वो  बाद मे कैसे बुरी हो गयी? शायद मतलव निकल जाने के बाद ऐसे ही होता है। मुझे हमेशा बहला फुसला कर ही सब ने अपना मतलव निकाला और मै अपने सभी दुख इसी लिये भूल जाती थी।
मेरे वो पल जब मैं अपने पँखों से दूर आकाश तक उडना चाहती थी आपके संग हवाओं फूलों,पत्तियों से ओस की बूँदों तितली के पँखों से रिमझिम कणियों सेआपके संग भीगना चाहती थी लेकिन भीगने के लिये क्या मिला उम्र भर आँसू!--- अपके दिल की धुन से मधुर संगीत सुनना चाहती थी--- आपकी आँखों मे डूब जाना चाहती थी आपकी छाती पर सिर रख कर सपने बुनना चाहती थी--पता नहीं कितने अरमान पाल रखे थे दिल मे क्या मेरे वो सपने कोई लौटा सकता है? आप? आपके भाई? या फिर वो बच्छे जिन्हें अंगुली पकड कर चलना सिखाया। 2 साल का था सब से छोटा --- 9 साल का सब से बडा। क्या कभी उन्हों ने आ कर पूछा है आपका हाल बल्कि सारी उम्र मेरे पास रहे और जब नौकरियां लग गयी शादियाँ हो गयी तो अपने बाप के पास चले गये। अब रास्ते मे देख कर मुँह फेर लेते है।
कैर हम दिल का रिश्ता तो कभी बना नही पाये। सपने जो दिल के रिश्तों के साक्षी थी कब के टूट गये हैं रिश्ता केवल आपने रखा अपने पति होने का। बिस्तर तक सिमटे रिश्ते की उम्र दूध के उफान की तरह होती है बिस्तर छोड और रिश्ता खत्म। एक अभिशाप की तरह था मेरे लिये वो रिश्ता। मगर आज सब कुछ भूल कर हम एक नया रिश्ता तो कायम कर सकते हैं--- एक दूसरे के आँसू पोंछने का रिश्ता---- सुख के साथी तो सभी बन जाते हैं मगर सच्चा रिश्ता तो वही है जो दुख मे काम आये--- निभे-- । और मैने उनका आखिरी आँसू अपनी हथेली पर समेट लिया एक नये अटूट रिश्ते को सींचने के लिये। समाप्त।

11 August, 2010

कसौटी रिश्ते की

कसौटी रिश्ते की --कहानी
उनकी आँखों से आँसूओं का सैलाब थमने का नाम ही नही ले रहा था।मै उनको रोकना भी नही चाहती थी------- आज उनके दर्द को बह जाने देना चाहती थी। ., मैने तो एक दर्द के लिये भी सैंकडों आँसू बहाये हैं, पर इस कर्मनिष्ठ इन्सान ने सैंकडों दर्द सह कर भी कभी एक आँसू नही बहाया-----दर्द का एक एक टुकडा परत दर परत दिल मे दबाते रहे---पर आज एक टुकडा नही पूरा दिल ही जैसे पिघल कर बाहर आने को था--- और जब तक दर्द बाहर न आये उसकी टीस सालती रहती है। इनका दर्द उन अपनो के कारण था जिन के सर पर इन्होंने अपने वज़ूद का आस्मां ताने रखा-- जिस घर की मिट्टी से लेकर इन्सानो तक को इन्होंने प्यार और कुर्बानी के तकाज़ों से संवारा था। अपने अरमान, अपनी ज़िन्दगी के सुनहरी पल ,जवानी के सपने सब उन्हें सौंप दिये थे। आज उन्हीं भाईयों ने इन्हें बाहर का रास्ता दिखा दिया था। जिन भाईयों पर अपना सब कुछ लुटाया उन्हीं ने इन्हें लूट लिया था। जमीन के एक टुकडे के लिये कोई इतना खुद गर्ज़ हो सकता है सोचा नही था। हमे घर जमीन  मे से हिस्सा देना उन्हें गवारा नही था।
मैने उनकी जिम्मेदारिओं को कभी दिल से और कभी मजबूरी मे बाँटा था दिल से इसलिये कि परिवार के लिये हमारा जो फर्ज होता है उसे करना ही चाहिये। मजबूरी मे इस लिये कि कुछ बातें ऐसी होती हैं जिन्हे करने से अगर अपने सभी सपने जल कर खाक हो जायें और वो काम फिर भी करना पडे तो वो मजबूरी मे होता है। जब हम घर के ्रिश्तों मे संतुलन नही रख पाते तो ये स्थिती आ ही जाती है। आखिर मैं भी इन्सान ही थी।
मगर आज अपनी जिम्मेदारी दिल से निभाना चाहती थी उन्हें रुला कर ------क्यों कि मैं जानती थी इन आँसों के साथ बहुत कुछ बह जायेगा--- टीस कुछ कम हो जायेगी-----। आँसू कहीं थम न जायें---- मैने बात शुरू की
"अपको याद है अपनी ज़िन्दगी मे पहली तीन रातें ही अपनी थी। उसके बाद जो तूफान आये उसी मे सब कुछ बह गया।और  जो बचा वो आपके भाई साहिब के पाँच बच्चे--- जो हमारे साथ बन्ध गये--- कोई कैसे सोच सकता है कि नई दुलहन के साथ तीन तीन बच्चे सोयें और दूसरे दो साथ ही दूसरी चारपाई पर ? और उन तीन दिन के बाद ही मेरे सपने जो न जाने कितनी कुवाँरी रातों ने हसरत से संजोये थे,टूट गये। उस दिन मैं भी ऐसे ही रोयी थी,--- आपके और बच्चों के सो जाने के बाद खिडकी मे खडी  हो कर चाँद को देखती---- अपने सपने ढूँढती मगर न उनको आना था और न आये---।"  और दोनो की आँखें निरन्तर बरस रही थीं।
शादी के तीन दिन बाद् ये टूर पर चले गये फिर इनके एग्ज़ाम थे और मैं मायके चली गयी थी। अभी मै दोबारा ससुराल आने ही वाली थी कि अचानक मेरी जेठानी की मौत हो गयी। और उसकी चिता के साथ ही जल गये मेरे सारे सपने। उनके पाँच बच्चे थे। घर मे सास ससुर जेठ जी और एक देवर-- सब इकठे रहते थे। माँ जी अस्थमा की मरीज थी। घर का सारा बोझ एक दम मेरे ऊपर आ गया। जिस  लडकी ने मायके मे कभी रसोई मे कदम नही रखा था उसके लिये ये कितनी बडी परिक्षा थी? मायके मे भाभियाँ बहुत अच्छी थीं हमे अपने बच्चों की तरह प्यार करती थी-- काम को हाथ नही लगाने देती। बस शादी से पहले थोडा बहुत सीखा था।
जेठ जी ने जीते जी कभी पत्नि की परवाह नही की--- उसे मारते पीटते भी थे और वो इसी गम मे पागल हो गयी। लेकिन उसके मरने के बाद उसके गम मे डूबे रहते या शायद उसका गम नही बच्चों को पालने की चिन्ता थी मगर राम सरीखा भाई हो तो क्या मुश्किल है? घर के बाहर के बाकी सब कामों की जिम्मेदारी इन्होंने अपने कन्धों पर ले ली। घर मे एक मुर्गीखाना जिस मे 100 से अधिक मुर्गियाँ थीं अपना इन्कुबेटर था घर मे दो भैंसें एक गाय भी थी कोई सोच सकता है कि कितना काम होता होगा। फिर साथ मे नौकरी भी करनी ।जब कि माँजी अस्थमा के कारण अधिक काम नहीं कर पाती थी।
एक 20-22 वर्ष की दुबली पतली लडकी माँ बाप की राजकुमारी, शाही ज़िन्दगी से निकल कर एक छोटे से गाँव के अस्तव्यस्त घर मे जीने की कल्पना भी नही कर सकती। उस समय तो पिता जी ने सिर्फ लडके की नौकरी ,उनका भविष्य और जमीन जायदाद देख कर रिश्ता किया था मगर होनी को कुछ और ही मंजूर था।
मुझे आज भी याद है वो रात जब मुझे डोली से निकाल कर एक कमरे मे बिठाया गया। उस कमरे के एक कोने मे बाण की चारपाई पडी हुयी थी-- जिसमे से बाण की रस्सियाँ टूट टूट कर लटक रही थीं----- देखते ही मुझे लगा जैसे ये साँप लटक रहे हैं जो मुझे डस जायेंगे --- ज़िन्दगी भर उनका भय मेरे मानस पट पर छाया रहा। दूसरे कोने मे एक चक्की पडी हुयी थी--- मुझे आभास हो गया कि मेरी ज़िन्दगी इस चक्की के दोनो पाटों मे पिसने वाली है------। उस चक्की के पास चप्पलों के चार पाँच जोडे पडे थे उन्हें इतनी बेरहमी से रोंदा गया था कि उनमे छेद हो गये थे---- और ऐसे ही छेद मेरे दिल मे भी हो गये थे ----। कुछ दृ्ष्य पहले ही ज़िन्दगी का आईना बन जाते हैं----- मेरा भी यही ह्श्र होने वाला था। सब ने इन जूतों की तरह मेरे दिल मे छेद किये,खुशियों को डसा, और मेरे अधिकारों और कर्तव्यों के बीच ज़िन्दगी पिस कर रह गयी। भाई साहिब को दूसरी शादी इस लिये नही करने दी ताकि इन बच्चों का भविष्य सौतेली माँ के हाथों खराब न हो। मुझे ही सौतेली बना दिया।--- क्या पाँच बच्चों का बोझ एक 22--23 साल की कुंवारी लडकी उठा सकेगी ? ये क्यों नही सोचा?
खयालों को झटका लगा---,शायद इनके आँसू थमने लगे थे--- शायद उन्हें मेरे अन्दर चल रहे चलचित्र का आभास हो गया था फिर भी मर्द अपने उपर इल्जाम कब लेता है अपनी सफाई के लिये कुछ शब्द ढूँढ रहे थे---- मगर आज मुझे कोई सफाई नही चाहिये थी मै सिर्फ उन्हें रुलाना चाहती थी--- इसलिये नही कि मैं उनसे बदला लेना चाहती थी बल्कि इसलिये कि दोबारा रोने के लिये आँसू न बचें और उनका दर्द , नामोशी, पश्ताताप सब कुछ बह जाये।---
"अपको याद है आप और आपके घर वाले अपना बच्चा ही नही चाहते थे---- और माँ जी भी कहती ये बच्चे भी तो अब आपके ही हैं---- पालने वाले भी तो माँ बाप ही होते हैं अगर चाहो तो यशोदा जैसा प्यार मिल सकता है--- मगर एक औरत के अन्दर की माँ को किसी ने नही देखा। जब गलती से प्रेगनेंसी हुयी तो आप बच्चा गिराने पर जोर देने लगे।अपका तर्क था कि जिस माह बच्चे का जन्म होगा उस माह इन बच्चों के पेपर होंगे--- घर कौन सम्भालेगा? माँ जी बीमार रहती हैं?
और आपने अपने परिवार के प्रति निषठा निभाने के लिये मेरे ममत्व का खून करवा दिया---- दूसरों के बच्चों की खातिर मेरे बच्चे की बलि????????  ओह! आप  इतने कठोर हो सकते हैं?  मै विश्वास नही कर पाई मगर सच मेरे सामने था और उस दिन के बाद मैं पत्थर बन गयी। औरत सब कुछ सह सकती है मगर किसी की खातिर अपने बच्चे की बलि -- ये नही सह सकती और उस दिन से मैं पत्थर बन गयी। माँ बाप के संस्कार थे। सब कुछ सहन करने की शिक्षा मिली थी---- उनको लाज लगवाना नही चाहती थी मगर उस दिन के बाद ज़िन्दगी को एक लाश की तरह ढोया--- उस दिन के बाद मेरा दिल आपके लिये नही धडका----- बस अन्दर ही अन्दर जीने के लिये साँस लेता रहा---- नारी और क्या कर सकती है? समाज मे रहने के लिये उसे अपनी इच्छाओं का बलिदान देना ही पडता है। लेकिन आज कोई आपका भतीजा भतीजी किसी का एक ही बच्चा पाल कर दिखा दे तो समझूँगी कि मैने कोई बडा काम नहीं किया।" मैं बोले जा रही थी----
   मुझे नही याद कि कभी हम एक दूसरे से कभी दिल की कोई बात भी कर पाये कभी इकठे एक जगह अकेले मे बैठ  पाये । सिवा इसके कि आप अपना पति का हक नही भूले---- मगर फर्ज  जरूर भूल गये थे। आपके साथ लिपटे बच्चों को सोये देख कर न जाने कितने खून के आँसू पीती रही हूँ --- कई बार मन करता आप और मैं सिर्फ दोनों हो मगर कहाँ---- " बच्चों को आपसे लिपटे देख कर टीस उठती--- गुस्सा आता मगर बेबस थी आपसे कुछ कहती भी तो किस समय? मेरे लिये तो आपके पास वक्त ही नही था।
" फिर तीन साल बाद अपनी बेटी हुयी। शायद उसकी भी बलि दे दी जाती मगर मैने बताया बहुत देर से। नौकरी और घर परिवार के कामौ मे मेरे लिये उसे पालना मुश्किल हो गया। मै उसके साथ ये जिम्मेदारी नही निभा सकती थी इस लिये उसे मायके मे छोड दिया। किसी ने भी तीन साल मे उसकी सुध नही ली । छुट्टी वाले दिन उसे साईकिल की टोकरी मे आगे बिठा कर गाँव ले आती मगर आपने कभी उसे गोद मे उठा कर नही देखा होगा।हैरान हूँ कभी किसी ने उसके लिये एक खिलौना तक ला कर नही दिया। बस हफ्ते मे एक दिन मेरा उसके लिये नसीब होता था। कौन माँ अपने बच्चों को छोड कर दूसरों के बच्चे पालती है?अपको खेतों से नौकरी से मुर्गीखाने से और उन बच्चों की पढाई से समय मिलता तो कभी देखते कि मैं कैसे तिल तिल कर मर रही हूँ, बेमौत,--- मै भी अपने अधिकार चाहती थी। मानती हूँ कि हमे संयुक्त परिवार मे बहुत कुछ दूसरों के लिये करना पडता है--- अपने सुख छोडने पडते हैं मगर उनकी भी कोई तो हद होती होगी? लेकिन मेरे लिये कोई नही जिस हद तक मुझे सहन करना पडा उसे शायद ही कोई कर पाये।
 आज मै जब उन दिनो के बारे मे सोचती हूँ तो सिहर जाती हूँ। बिमार हूँ या ठीक काम करना ही होता था--- इतनी दुबली पतली लडकी पर कभी किसी ने रहम नही किया। सुबह चार बजे उठना पूरे परिवार का नाश्ता और दोपहर का खाना भी बना कर रखना पडता था । मेरे पडोसी मेरे बरतनों की खनखनाहट सुन कर जान जाते कि चार बज गये हैं। साईकिल चला कर नौकरी पर जाना। दोपहर को वहाँ से बच्चे को देखने जाना और फिर शाम को ड्यूटी के बाद साईकिल चला कर गाँव आना। दिन भर के बर्तन माँजने फिर रात के खाने के लिये जुट जाना। 11 बजे तक काम निपटा कर थकान से बुरा हाल होता, लेकिन इस बात की किसे परवाह थी। बदन दुखा तो अपने आप दर्द की गोली खा कर सो जाना। "
"ये तो बहुत बडी बडी बातें थी हमे तो एक छोटी सी खुशी भी नसीब नही होती थी। याद है रिश्तेदारी मे एक शादी पर जब मुझे भी सब के साथ जाने का सौभाग्य प्राप्त हुया था।"------ क्रमश

10 July, 2010

अनन्त आकाश्


अनन्त आकाश-- भाग-- 4
पिछली कडी मे आपने पढाकि मेरे घर के आँगन मे पेड पर कैसे चिडिया और चिडे का परिवार बढा और कैसे उन्हों ने अपने बच्चों के अंडों से निकलने से ले कर उनके बडे होने तक देख भाल की---- पक्षिओं मे भी बच्चों के लिये इस अनूठे प्यार को देख कर मुझे अपना अतीत याद आने लगता है। ब्च्चों को कैसे पढाया लिखाया ।वो विदेश चले गयी बडे ने वहीं शादी कर ली पिता पुत्र की नाराज़गी मे माँ कैसे पिस रही है--| बडे बेटे के बेटा हुया तो उसने कहा माँ आ जाओ हमे आपकी जरूरत है। मगर तब भी ये जाने को तैयार नही हुये। मन उदास रहने लगा।-- अब आगे पढें-----

"राधा ऐसा करो तुम बेटे के पास हो आओ मै टिकेट बुक करवा देता हूँ। तुम्हारा मन बहल जायेगा। मगर मैं नही जाऊँगा।" 

" अकेली? मै आपके बिना क्यों जाऊँ? नही नहीं।"
 "मै मन से कह रहा हूँ। गुस्सा नही हूँ। बस मेरा मोह टूट चुका है और तुम अभी मोह त्याग नही पा रही हो। जानता हूँ वहाँ विदेशी बहु के पास भी अधिक दिन टिक नही पाओगी।इस लिये नही चाहता था कि तुम जाओ।।"
"सोचूँगी।" कह कर मै काम मे लग गयी।
रात भर सोचती रही-- इनकी बातें भी सही थी-- फिर क्या करूँ यही सोचते नींद आ गयी। कुछ दिन इसी तरह निकल गये। मगर कुछ भी निर्णय नही ले पाई। कई बार इन्हों ने पूछा भी मगर चुप रही 

उस दिन  ये सुबह काम पर चले गये और मै चाय का कप ले कर बरामदे मै बैठ गयी। चिडिया के बच्चे अब चिडिया के बच्चे उडने लगे थे मगर दूर तक नही जाते। चिडिया उनके पास रहती और चिदा अकेला दाना चुगने जाता था।  कितना खुश है ये परिवार फिर अपना ही क्यों बिखर गया। सोचते हुये आँख भर आयी।्रात को ये खाना खा रहे थे---
"देखो राधा मै मन से कह रहा हूँ तुम चली जाओ। मेरी चिन्ता मत करो। मै कोई न कोई इन्तजाम कर लूँगा। न हुया तो कुछ दिन की बात है मै़ ढाबे मे खा लूँगा। आज सोच कर मुझे बता देना कल टिकेट बुक करवा दूँगा।"
मै फिर कुछ न बोली। रात भर सोचती रही। सोच मे चिडिया का घोंसला आ जाता--  चिडिया कैसे घोंसले के पास बैठी रहती--- देखते देखते बच्चे फुदकने लगे हैं---चिडिया उन्हें चोंच मारना खाना और उडना सिखाती----धीरे धीरे जब वो पँख फैलाते तो चिडिया खुश होती--- हम भी ऐसे ही उनको बढते पढते देख कर खुश होते थे----- अब मुझे लगता कि चिडिया की खुशी मे एक पीडा भी थी-- अब उडने लगे हैं --- हमे छोड कर चले जायेंगे-----
आज वही पीडा सामने आ रही थी---
आज मैने देखा चिडा चिडिया और बच्चे इकट्ठे बैठे हुये हैं----चोंच से चोंच मिला कर बात कर रहे हैं--- "चीँ  चेँ चीं" चिडिया चिडे की आवाज़ मे उदासी थी।
" चीं  चेँ  चेँ" मगर बच्चों की आवाज मे जोश था--और उसी जोश से वो उड गये दूर गगन मे---
"चाँ चाँ चाँ----- बच्चो हम इन्तजार करेंगे लौट आना।" चिडिया की आवाज़ रुँध गयी थी। दोनो उदास ,सारा दिन कुछ नही खाया।मौसम बदल गया था प्रवासी पक्षियों का आना भी  सतलुज के किनारे होने लगा था। गोविन्द सागर झील के किनारों पर रोनक बढ गयी थी।
थोडी देर बाद चिडा चिडिया की चोंच से चोंच मिला कर चीँ चेँ चेँ कर रहा था---
"चीँ चीं चीं --रानी ऐसा कब तक चलेगा?बच्चे कब तक हमसे चिपके रहते? आखिर हम भी तो ऐसे ही उड आये थे। उनका अपना संसार है उन्हें भी हमारी तरह अपना घर बसाना है-- जो सब के साथ होता है वही अपने साथ हुया है। चलो सतलुज के किनारे चलते हैं। दूर दूर से हमारे भाई बहिन आये हैं उनका दुख सुख सुनते है।।" चिडे ने प्यार से चिडीया के परों को चोंच से सहलाया और दोनो सागर किनारे उड गये।
 हाँ ठीक ही बात है-- सारा देश अपना है लोग अपने हैं बस सोच कर उन्हें प्यार से अपनाने की बात है---
  मेरे भी आँसू निकल गये थे पोंछ् कर  सोचा कि यही संसार का नियम है तो फिर क्यों इतना मोह? आखिर कब तक बच्चे हमारे पल्लू से बन्धे रहेगे। आज कल नौकरियाँ भी ऐसी हैं कहां कहाँ उनके साथ भागते फिरेंगे?। चिडे चिडिया ने जीवन का सच सिखा दिया था।मुझे भी रिटायरमेन्ट के बाद जीने का रास्ता मिल गया था।
 सुबह जब नाश्ता कर के बस्ती मे जाने के लिये तैयार हुये तो मैं बोल पडी--
" मुझे भी अपने साथ ले चलें।"
"क्या सच?" इन्हें सहज ही विश्वास नहीं हुया। इनकी खुशी का ठिकाना नही था। इनकी आँखों मे संतोश की झलक देख कर खुशी से हुयी । बच्चों के मोह मे हम दोनो के बीच एक दूरी सी आ गयी थी -- आज उस दूरी को पाट कर हम दोनो एक हो गये थे---  मैं भी चिडिया की तरह उडी जा रही थी इनके साथ अनन्त आकाश की ओर---। समाप्त




08 July, 2010

आनन्त आकाश

अनन्त आकाश--भाग -3
पिछली कडी मे आपने पढाकि मेरे घर के आँगन मे पेड पर कैसे चिडिया और चिडे का परिवार बढा और कैसे उन्हों ने अपने बच्चों के अंडों से निकलने से ले कर उनके बडे होने तक देख भाल की---- पक्षिओं मे भी बच्चों के लिये इस अनूठे प्यार को देख कर मुझे अपना अतीत याद आने लगता है। ब्च्चों को कैसे पढाया लिखाया ।वो विदेश चले गयी बडे ने वहीं शादी कर ली पिता पुत्र की नाराज़गी मे माँ कैसे पिस रही है-- अब आगे पढें-----

बेटे के बेटा होने की खुशखबरी जब इन्हें सुनाई इनके चेहरे पर खुशी की एक किरण भी दिखाई नही दी--- मैने बात आगे बढाने की कोशिश की---
:" देखिये बहु भी अभी बच्ची ही है वो अकेली कैसे बच्चे को सम्भालेगी? इस समय उन्हें हमारी जरूरत है हमे जाना चाहिये"। मैने डरते हुये इनसे कहा। मगर वही बात हुये इनको गुस्सा आ गया--
"हाँ आज उन्हें हमारी जरूरत है तो हम जायें मगर बहन की शादी पर हमे भी तो उसकी जरूरत थी तब क्यों नही आया था।"
तब उसे गये समय ही कितना हुया था हो सकता है कि उसके पास तब इतने पैसे ही न हों फिर उसने कहा भी था कि इतनी जल्दी मै नही आ सकता आप शादी की तारीख छ: आठ माह आगे कर लें मजबूरी थी उसकी।" मैने बेटे का पक्ष लेने की कोशिश की।
"देखो मै तुम्हें नही रोकता तुम्हें जाना है तो जाओ मगर मैं अभी नही जा सकता। तुम देख रही हो मै बीमार हूँ बी पी कितना बढ रहा है। फिर वहाँ कुछ हो गया तो उनके लिये मुसीबत हो जायेगी। मुझे फिर कभी कहना भी नही मैने मन को पक्का कर लिया है । उनके बिना भी जी लूँगा ।वो वहीं मौज करें।"
गुस्सा इनका भी सही था। मगर माँ का दिल अपनी जगह सही था। माँ भी किस तरह कई बार बाप और बच्चों के बीच किस को चुने वाली स्थिती मे आ जाती है
 पति की बात जितनी सही लगती है बच्चों की नादानी उतनी ही छुपाने की कोशिश मे खुद पिस जाती है। भारतीय नारी के लिये पति के उसूल बच्चों की मोह ममता पर भारी पड जाते हैं। मै भी मन मसूस कर रह गयी । समझ गयी कि अब बेटा हाथ से गया। अगर अब हम चले जाते तो भविष्य मे आशा बची रहती कि वो कभी लौट आयेगा। अब शायद वो भी नाराज़ हो जाये।

मन आज कल उदास रहने लगा था। जब से रिटायर हुयी हूँ तब से तो बहुत अकेली सी पड गयी हूँ।पहले तो स्कूल मे फिर भी दिल लगा रहता था। चार लोगों मे उठना, बैठना, दुख सुख बँट जाते थे। अब घर मे अकेलापन सालता रहता है बच्चों की याद आती है छुप कर रो लेती हूँ। मगर ये जब से रिटायर हुये हैं इन्हों ने एक नियम सा बना लिया है-- सुबह उठ कर सैर को जाना,नहा धो कर पूजा पाठ करना ,फिर नाश्ता कर के किसी गरीब बस्ती की ओर निकल जाना। वहाँ गरीब बच्चों को इक्ट्ठा कर के पढाना और सब की तकलीफें सुनना ,ागर किसी के काम आ सके तो आना।दोपहर को आराम करना फिर शाम को सैर,पूजा पाठ, खबरें सुनना खाना खा कर टहलना और सो जाना। मगर मै कुछ आलसी सी हो गयी थी। मै अभी अकेलेपन की ज़िन्दगी और बच्चों के मोह से अपने आप को एडजस्ट नही कर पा रही थी।---
" क्या बात है आज नाश्ता पानी मिलेगा कि नहीं।"इनकी आवाज़ सुन कर मै वर्तमान मे लौटी। पक्षी अभी भी चहचहा रहे थे।
नाश्ता बना कर इनके सामने रखा और खुद भी वहीं बैठ गयी।
"ापना नाश्ता नही लाई क्या आज नाश्ता नही करना है।"
"कर लूँगी, अभी भूख नही।"
ये कुछ देर सोचते रहे फिर बोले--
"राधा,तुम सारा दिन घर मे अकेली रहती हो-- मेरे साथ चला करो। तुम्हारा समय भी पास हो जायेगा और लोक सेवा भी।"
" सोचूँगी--- अपने बच्चों के लिये तो कुछ कर नही पाई, बेचारों को मेरी जरूरत थी। आखिर मे कन्धे पर तो वो ही उठा कर ले जायेंगे।" मन का आक्रोश फूटने को था।
मुझे किसी से उमीद नही जो देखना है जिन्दा रहते ही देख लिया मर कर कौन देखता है। बाके कन्धे की बात  तो जब मर ही गये तो कोई भी उठाये नही उठायेंगे तो जब पडौसियों को दुर्गन्ध आयेगी तो अप-ाने आप उठायेंगे। मै इन बातों मे विश्वास नही करता।"
मेरी आँखें बरसने लगी और मै उठ कर अन्दर चली गयी। ये नाश्ता कर के अपने काम पर चले गये।"
रात को जब खाना खाने बैठे तो बोले---
"राधा ऐसा करो तुम बेटे के पास हो आओ मै टिकेट बुक करवा देता हूँ। तुम्हारा मन बहल जायेगा। मगर मैं नही जाऊँगा।"  क्रमश:

05 July, 2010

अनन्त आकाश भाग --2

अनन्त आकाश भाग-- 2

 पिछली  किशत मे आपने पढा कि मेरे घर के आँगन मे पेड पर कैसे चिडिया और चिडे का परिवार बढा और कैसे उन्हों ने अपने बच्चों के अंडों से निकलने से ले कर उनके बडे होने तक देख भाल की---- पक्षिओं मे भी बच्चों के लिये इस अनूठे प्यार को देख कर मुझे अपना अतीत याद आने लगता है। अब आगे पढें------
इधर उधर से पक्षी आते और छत पर पडा लड्डूओं का चूरा खाते और उड जाते। आज चिडिया के बच्चों के जन्म के साथ आँगन मे कितनी रौनक आ गयी थी।
ऐसी ही रौनक अपने घर मे भी थी जब हमारे बडा बेटा हुया था। मेरी नौकरी के कारण मेरे सासू जी भी यहीं आ गये थे। स्कूल से आते ही बस व्यस्त हो जाती। हम उसे पा कर फूले नही समा रहे थे अभी से कई सपने उसके लिये देखने लगे थे। इसके बाद दूसरा बेटा और फिर एक बेटी हुयी। तीन बच्चे पालने मे कितने कष्ट उठाने पडे ,ये सोच कर ही अब आँखें भर आती कभी कोई बच्चा बीमार तो कभी कोई प्राबलेम । जब कभी सासू जी गाँव चली जाते तो कभी छुट्टियाँ ले कर तो कभी किसी काम वाले के जिम्मे छोड कर इन्हें जाना पडता ।  अभी बेटी 6 माह की हुयी थी कि सासू जी भी चल बसीं। बच्चों की खातिर मुझे नौकरी छोडनी पडी।उस दिन मुझे बहुत दुख हुया था। मेरी बचपन से ही इच्छा थी कि मै स्वावलम्बी बनूँगी-- मगर हर इच्छा कहाँ पूरी होती है! इनका कहना था कि आदमी अपने परिवार के लिये इतने कष्ट उठाता है अगर अच्छी देख भाल के बिना बच्चे ही बिगड गये तो नौकरी का क्या फायदा । मुझे भी इनकी इस बात मे दम लगा। मगर  बच्चे कहाँ समझते हैं माँ बाप की कुर्बानियाँ  ।उन्हें लगता है कि ये माँ बाप का फर्ज़् है बस। मै नौकरों के भरोसे बच्चों को छोडना नही चाहती थी। हम जो आज़ाद पँछी की तरह हर वक्त उडान पर रहते अब बच्चों के कारण घर के हो कर रह गये।

बच्चे स्कूल जाने लगे ।छोटी बेटी भी जब पाँचवीं मे हो गयी तो लगा कि अब समय है बच्चे स्कूल चले जाते हैं और मै नौकरी कर सकती हूँ। वैसे भी तीन बच्चों के पढाई एक तन्ख्वाह मे क्या बनता है। भगवान की दया से एक अच्छी नौकरानी भी मिल गयी। मैने भाग दौड कर एक नौकरी ढूँढ ली। पता था कि मुश्किलें आयेंगी-- घर परिवार-- और-- नौकरी -- बहुत मुश्किल काम है। मगर मैने साहस नही छोडा बच्चों को अगर उच्चशिक्षा देनी है तो पैसा तो चाहिये ही था।

बच्चे पढ लिख गये बडा साफट वेयर इन्ज्नीयर बना और अमेरिका चला गया दूसरा भी स्टडी विज़ा पर आस्ट्रेलिया चला गया। बेटी की शादी कर दी।हम दोनो बच्चों के विदेश जाने के हक मे नही थे मगर ये विदेशी आँधी ऐसी चली है कि बच्चे पीछे मुड कर देखते ही नही जिसे देखो विदेश जाने की फिराक मे है। बच्चे एक पल भी नही सोचते कि बूढे माँ बाप कैसे अकेले  रहेंगे-- कौन उनकी देखभाल करेगा।कितना खुश रहते हम बच्चों को देख कर। घर मे चहल पहल रहती। कितना भी थकी होती मगर बच्चों के खान पान मे कभी कमी नहीं रहने देती। खुद हम दोनो चाहे अपना मन मार लें मगर बच्चों को उनके पसंद की चीज़ जरूर ले कर देनी होती थी। छोटे को विदेश भेजने पर इनको जो रिटायरमेन्ट के पैसे मिले थे लग गयी ।कुछ बेटी की शादी कर दी। घर बनाया तो लोन ले कर अब उसकी किश्त कटती थी ले दे कर बहुत मुश्किल से साधारण रोटी ही नसीब हो रही थी।
मगर बच्चों को इस बात की कोई चिन्ता नही थी।बच्चों के जाने से मन दुखी था। मुझे ये भी चिन्ता रहती कि वहाँ पता नही खाना भी अच्छा मिलता है या नही-- कभी दुख सुख मे कौन है उनका वहाँ दिल भी लगता होगा कि नही। जब तक उनका फोन नही आता मुझे चैन नही पडती। हफते मे दो तीन बार फोन कर लेते।
बडे बेटे के जाने पर ये उससे नाराज़ थे। हमारी अक्सर इस बात पर बहस हो जाती। इनका मानना था कि बच्चे जब हमारा नही सोचते तो हम क्यों उनकी चिन्ता करें। जिन माँ बाप ने तन मन धन लगा कर बच्चों को इस मुकाम पर पहुँचाया है उनके लिये भी तो बच्चों का कुछ फर्ज़ बनता है। वैसे भी बच्चों को अपनी काबलीयत का लाभ अपने देश को देना चाहिये। मगर मेरा मानना था कि हमे बच्चों के पैरों की बेडियाँ नही बनना चाहिये। बडा बेटा कहता कि आप यहाँ आ जाओ -- मगर ये नही माने--- हम लोग वहाँ के माहौल मे नही एडजस्ट कर सकते।

 बडे बेटे ने वहाँ एक लडकी पसंद कर ली और हमे कहा कि मै इसी से शादी करूँगा। आप लोग कुछ दिन के लिये ही सही यहाँ आ जाओ। मगर ये नही माने। उसे कह दिया कि जैसे तुम्हारी मर्जी हो कर लो। दोनो पिता पुत्र के बीच मेरी हालत खराब थी किसे क्या कहूँ? दोनो ही शायद अपनी अपनी जगह सही थे। उस दिन हमारी जम कर बहस हुयी।---

"मै कहती हूँ कि हमे जाना चाहिये। अब जमाना हमारे वाला नही रहा। बच्चे क्यों हाथ से जायें?"

" वैसे भी कौन सा अपने हाथ मे हैं-- अगर होते तो लडकी पसंद करने से पहले कम से कम हमे
पूछते तो ?बस कह दिया कि मैने इसी से शादी करनी है आप आ जाओ। ये क्या बात हुयी?"

" देखो अब समय की नज़ाकत को समझो। जब हम अपने आप को नही बदल सकते , वहाँ एडजस्ट नही कर सकते तो बच्चों से क्या आपेक्षा कर सकते हैं फिर हमने अपनी तरह से जी लिया उन्हें उनकी मर्ज़ी से जीने दो। फिर हम भी तो माँ बाप को छोड कर इस शहर मे आये ही थे!"

" पर अपने देश मे तो थे।जब मर्जी हर एक के दुख दुख मे आ जा सकते थे। वहाँ न मर्जी से कहीं आ जा सकते हैं न ही वहाँ कोई अपना है।"

कई बार मुझे इनकी बातों मे दम लगता । हम बुज़ुर्गों का मन अपने घर के सिवा कहाँ लगता है? जो सुख छजू दे चौबारे वो न बल्ख न बुखारे। मै फिर उदास हो जाती । बात वहीं खत्म हो जाती।
एक दिन इन्हों ने बेटे से कह दिया कि हम लोग नही आ सकेंगे  तुम्हें जैसे अच्छा लगता है कर लो हमे कोई एतराज़ नही।  मै जानती थी कि ये बात इन्होंने दुखी मन से कही है।
बेटे ने वहीं शादी कर ली। और हमे कहा कि आपको एक बार तो यहाँ आना ही पडेगा। इन्हों ने कहा कि मेरी तबीयत ठीक नहीं वहाँ तुम मेडिकल का खर्च भी नही उठा पाओगे, आयेंगे जब तबीयत ठीक होगी। बेटा चुप रह गया। मगर मै उदास रहती । एक माँ का दिल बच्चों के बिना कहाँ मानता है? छोटे को अभी दो तीन वर्ष और लगने थे पढाई मे उसका भी क्या भरोसा कि वो भी यहाँ वापिस आये या न।
एक साल और इसी तरह निकल गया। बेटे के बेटा हुया। उसका फोन आया तो मारे खुशी के मेरे आँसू निकल गये।उसने कहा कि माँ हमे जरूरत है आपकी आप कुछ दिन के लिये आ जाओ।
इन्हें खुशखबरी सुनाई मगर इन के चेहरे पर खुशी की एक किरण भी दिखाई नही दी।----- क्रमश:

03 July, 2010

अनन्त आखाश--

 कहानी 
ये कहानी भी मेर पहले कहानी संग्रह् वीरबहुटी मे से है कई पत्रिकाओंओं मे छप चुकी है और आकाशवाणी जालन्धर पर भी मेरी आवाज मे प्रसारित हो चुकी है। जिस कहानी का पिछली पोस्ट मे वायदा किया था, उसे अभी टाईप नही कर सकी ।तब तक इसे पढिये।
अगर आप आदरणीय श्री प्रान शर्मा जी गज़लें पढना चाहते हैं तो यहाँ पढें।
http://www.mahavirsharma.blogspot.com/
अनन्त आकाश--  भाग- 1
मेरे देखते ही बना था ये घोंसला, मेरे आँगन मे आम के पेड पर---चिडिया कितनी खुश रहती थी और चिडा तो हर वक्त जैसी उस पर जाँनिस्सार हुया जाता था। कितना प्यार था दोनो मे! जब भी वो इक्कठे बैठते ,मै उन को गौर से देखती और उनकी चीँ चीँ से बात ,उनके जज़्बात समझने की कोशिश करती।--
"चीँ--चीँ चीँ---ाजी सुनते हो? खुश हो क्या?"
"चीँ चीँ चेँ-- बहुत खुश देखो रानी अब हमारा गुलशन महकेगा जब हमारे नन्हें नन्हें बच्चे चहचहायेंगे।"" चिडा चिडिया की चोंच से चोंच मिला कर कहता ।
"चीँ चीँ चीँ-- तब हमारे घर बहारें ही बहारें होंगी।" चिडिया उल्लास से भर जाती।
  दोनो प्यार मे चहचहाते दूर गगन मे इक्कठे दाना चुगने के लिये उड जाते। फिर शाम गये अपने घोंसले मे लौट आते।मक़ि सुबह उठ कर जब बाहर आती हूँ दोनोउडने के लिये तैयार होते हैं ।उनको पता होता है कि मैं उन्हेंदाना डालूँगी ,शायद इसी इन्तज़ार मे बैठे रहते हों। इसके बाद मैं काम काज मे व्यस्त रहती और शाम को ज्क़ब चाय पी रही होती तो लौट आते।
  बरसों पहले कुछ ऐसा ही था हमारा घर और हम।37 वर्ष पहले शादी हुयी ,फिर साल बाद ही भरा पूरा परिवार छोड कर हम शहर मे आ बसे। इस शहर मे इनकी नौकरी थी। घर सजा बना लिया। दो लोगों का काम ही कितना होता है। ये सुबह ड्यूटी पर चले जाते मै सारा दिन घर मे अकेली उदास परेशान हो जाती। 3-4 महीने बाद मुझे भी एक स्कूल मे नौकरी मिल गयी। फिर तो जैसे पलों को पँख लग गये----समय का पता ही नही चलता। सुबह जाते हुये मुझे स्कूल छोड देते और लँच टाईम मे ले आते। बाकी समय घर के काम काज मे निकल जाता। रोज़ कहीँ न कहीं घूमने, कभी फिल्म देखने तो कभीबाजार तो कभी किसी दोस्त मित्र के घर चल जाते--- चिडे चिडी की तरह बेपरवाह----। अतीत के पन्नो मे खोई कब सो गयी पता ही नही चला

सुबह उठी तो देखा कि चिडिया दाना चुगने नही गयी चिडा भी आस पास ही फुदक रहा था। पास से ही कभी कोई दाना उठा कर लाता और उस की चोंच मे डाल देता। कुछ सोच कर मैं अन्दर गयी और काफी सारा बाजरा पेड के पास डाल दिया। तकि उन्हें दाना चुगने दूर न जाना पडे।उसके बाद मैं स्कूल चली गयीजब आयी तो देखा चिडिया अकेली वहीं घोंसले अन्दर बैठी थी।मुझे चिन्ता हुयी कि कहीं दोनो मे कुछ अनबन तो नही हो गयी? तभी चिडा आ गया और जब दोनो ने चोँच से चोँच मिलायी तो मुझे सकून हुया। देखा कि चिडा घोंसले के अन्दर जाने की कोशिश करता तो चिडिया उसे घुसने नही देती मगर वो फिर भी चिडिया के सामने बैठा कभी कभी उसे कुछ खिलाता रहता।मै उन दोनो की परेशानी समझ गयी चिडिया अपने अन्डौं को से रही थी दोनो अन्डों को ले कर चिन्तित थे। माँ का ये रूप पशु पक्षिओं मे भी इतना ममतामयी होता है देख कर मन भर आया।
कुछ दिन ऐसे ही निकल गयी मैं रोज बाजरा आदि छत पर डाल देती एक दोने मे पानी रख दिया था ताकि उन्हें दूर न जाना पडे।
उस दिन रात जल्दी नीँद नहीं आयी।सुबह समय पर आँख नहीं खुली, वैसे भी छुट्टी थी। चिडियों का चहचहाना सुन कर बाहर निकली तो देखा धूप निकल आयी थीपेड पर नज़र गयी तो वहाँ चिडियी के घोंसले मे छोटे छोटे बच्चे धीमे से चिं चिं कर रहे थी।चिडिया अन्दर ही उनके पास थी।चिडा बाहर डाल पर बैठ कर चिल्ला रहा था जैसे सब को बता रहा हो और् आस पास पक्षिओं को न्यौता दे रहा हो कि उसके घर बच्चे हुये हैं। मै झट से अन्दर गयी और घर मे पडे हुये लड्डू उठा लाई उनका चूरा कर छत पर डाल दिया--। इधर उधर से पक्षी आते अपना अपना राग सुनाते और लड्डूऔं खाते और चीँ चेँ करते उड जाते। आज आँगन मे कितनी रौनक थी--- ।
   ऐसी ही रौनक अपने घर मे भी थी जब मेरा बडा बेटा हुया था।---  क्रमश:

27 June, 2010

कर्ज़दार  अन्तिम  कडी।
अपने पति की मौत के बाद कितने कष्ट उठा कर बच्चों को पढाया प्रभात की शादी मीरा से होने के बाद प्रभात ने सोचा कि अब माँ के कन्धे से जिम्मेदारियों का बोझ उतारना चाहिये। इस लिये उसने अपनी पत्नि को घर चलाने के लिये कहा और अपनी तन्ख्वाह उसे दे दी। मगर माँ के विरोध करने पर तन्ख्वाह पत्नि से ले कर माँ को दे दी । बस यहीँ से सास बहु के रिश्ते मे दरार का सूत्रपात हो चुका था। अब छोटी बातें भी मन मुटाव के कारण बडी लगने लगी थी जिस से प्रभात और मीरा के रिश्ते मे भी दरार आने लगी------- अब आगे पढें------
माँ और पत्नि एक नदी के दो किनारे थे और वो इन दोनो के बीच एक सेतु था जो ममता की डोरियों पर झूल रहा था।सेतु के धरातल का कण- कण माँ के दूध का कर्ज़दार था। मगर पत्नी जो उसके लिये अपना सब कुछ छोद कर आयी थी उसके प्रति अपने फर्ज़ को भी जानता था। मगर उसे समझ नही आ रहा था कि करे तो क्या करेिसी लिये कभी जब पत्नि सेतु के एक छोर पर आ खडी होती और दूसरे पर माँ तो वो डर से थरथराने लगता। वो पत्नी के कदम वहीं रोक देता। वो ये भी जानता था कि वो पत्नी से अन्याय कर रहा है। पत्नी भी उस के प्यार और अधिकार की उतनी ही हकदार है जितनी माँ मगर अपनी बेबसी किस से कहे। दोनो पाटों की बीच वो छटपटा रहा था। उसे समझ नही आ रहा था कि क्या करे़? किसे नाराज करे और किसे खुश करे।
और उधर मीरा? उसने ससुराल मे आते ही सब को कितना प्यार दिया घर की जिम्मेदारी को सम्भाला। सास को कभी काम नही करने दिया। मगर अब जब उसे जरूरत है तो कोई उसकी तरफ ध्यान नही देता। उसके भी कुछ सपने थे। मगर घर की जिम्मेदारियों के बीच उसने अपने मन को मार लिया था। लेकिन अब हद हो चुकी है ।प्रभात को भी हर बात मे मेरा ही कसूर नज़र आता है। । तो फिर जीना किस के लिये । माँ बाप को भी क्या बताये? वो उसे यही कहेंगे कि जिस तरह भी हो एडजस्ट करो। फिर माँ और बाप खुद  अपने बेटे पर आश्रित हैं भाभियों के ताने सुनने से अच्छा है वो उनको कुछ भी न बताये। दो दिन दोनो की बोलचाल बन्द रही। वो जान चुकी थी कि इस एक छत्र साम्राज्य मे उसका पति  उसके साथ न्याय नही कर सकता।वो घुट घुट कर जीना नहीं चाहती थी।
दूसरे दिन रात को मीरा ने कीडे मारने की दवा खा कर अपना जीवन समाप्त कर लिया।

प्रभात उसकी माँ बहन पर केस बन गया मगर सभी से ये ब्यान दिलवा दिये कि माँ और बहन उस दिन घर मे नहीं थी प्रभात ने भी यही ब्यान दिये। दूसरे दिन रात को मीरा ने कीडे मारने की दवा खा कर अपना जीवन समाप्त कर लिया। प्रभात ने किसी तरह माँ और बहन को बचा कर शायद दूध का कर्ज़ उतार दिया था।
 वो पोलिस वैने मे बैठे हुये सिर्फ मीरा के बारे मे सोच रहा था।जो उसके प्यार मे बन्धी अपने माँ बाप अपनाघर छोड ल्कर उसके पास आयी थी --- उसके भरोसे एक निस्सहाय गाय की तरह। उसने उसकी कितनी इच्छाओं का गला घोंटा था ताकि माँ नाराज़ न हो।, जहाँ तक कि कितनी बार उसे डाँटा फटकारा भी था। क्यों वो माँ को कभी कुछ नही कह सका। आज इसी कारण वो मीरा की मौत का कारण बन बैठा।
वो सोच रहा था----  अब वो अपनी पत्नि का कर्ज़दार है। माँ का कर्ज़ तो उसने चुका दिया है।उसका एक छत्र राज्य बचा कर । अब वो जैसे चाहे रह सकती है। कोई उससे उसका कुछ नही छीनेगा।
 और अचानक उसने अपने साथ बैठे सिपाही की पिस्तौल छीनी और खुद को गोली मार ली------ "मीरा मैं आ रहा हूँ तुम से अपने गुनाहों की माफी माँगने।"
क्या आदमी की ऐसी  ज़िन्दगी औरत के दुख से भी दर्दनाक नही? क्यों वो खुद को माँ और पत्नी के बीच  असहाय पाता है? आप सब क्या सोचते हैं इस समस्या के बारे मे।

और सब सोच रहे थे कि एक माँ बेटे  के लिये जो संघर्ष करती है उसका खामिआज़ा अपनी बहु से क्यों बसूलना चाहती है। अगर बेटों की माँयें इतनी बात समझ जायें तो कितने ही घर तबाह होने से बच जायें। समाप्त।
नोट-- ये कहानी मैने वीर बहुटी पुस्तक मे इसी रूप मे छपवाई थी मगर एक बार दैनिक जागरण को भेजी तो उसके सम्पादके श्री अजय शर्मा जी ने इसका अन्त बदल दिया कि इसका अन्त प्रभात की मौत नही बल्कि सजा तक ही सीमित रहना चाहिये। ये 2006 की बात है मै उन दिनो अमेरिका मे थी और मैने उनसे कह दिया कि जैसे वो चाहें अन्त कर दें। आज मुझे वो अखबार नही मिला ,इस लिये जस की तस यहाँ लिख दी। मगर इसमे अन्त जो भी हो दुखद ही रहेगा। ये असल मे भी इसी तरह थी कहानी केवल पात्र और कुछ घटनायें बदली हैं।
अगली कहानी दहेज हत्या मे वकीलों की भूमिका पर होगी। धन्यवाद।

24 June, 2010

कर्ज़दार्

कर्ज़दार अगली कडी 3


अपने पति की मौत के बाद कितने कष्ट उठा कर बच्चों को पढाया प्रभात की शादी मीरा से होने के बाद प्रभात ने सोचा कि अब माँ के कन्धे से जिम्मेदारियों का बोझ उतारना चाहिये। इस लिये उसने अपनी पत्नि को घर चलाने के लिये कहा और अपनी तन्ख्वाह उसे दे दी। मगर माँ के विरोध करने पर तन्ख्वाह पत्नि से ले कर माँ को दे दी । बस यहीँ से सास बहु के रिश्ते मे दरार का सूत्रपात हो चुका था। अब छोटी बातें भी मन मुटाव के कारण बडी लगने लगी थी।-- अब आगे पढें------

छोटी छोटी बातों से घर मे कडुवाहत सी पसरने लगी। कभी खाने पीने को ले कर कभी घर के रख रखाव पर तो कभी मीरा के जेब खर्च और कपडों आदि पर खर्च को ले कर। नौकरी से पहले मीरा ने कभी नये कपडों की जिद्द नही की क्यों कि घर मे रहती थी और शादी के अभी बहुत कपडे थी मगर अब नौकरी करती थी रोज उसे बाहर जाना पडता तो ढंग के कपडे पहनने पडते फिर उसे ये भी था कि अगर वो कमाती है तो क्या अपनी मर्जी के कपडे भी नही पहन सकती? उसकी देखा देखी ननद भी जिद्द पर उतर आती। कभी मायके जाने को कहती तो झगडा। कभी मायके मे शादी व्याह पर किये जाने वाले खर्च को ले कर झगडा। मतलव कुछ न कुछ घर मे चलता ही रहता।
 मीरा प्रभात से शिकायत करती मगर मीरा के सही होने पर भी प्रभात माँ को कुछ नही कह पाता। जब कभी रोज़ रोज़ के झगडे से तंग आ जाता तो मीरा को ही डाँट देता। प्रभात की असमर्थता, घर का काम दफ्तर की चिन्तायें इन सब से मीरा चिडचिडी सी हो गयीसोचती कल को बच्चा होगा तो कैसे सब कुछ सम्भाल पायेगी? प्रभात से भी अधिक सहयोग की आशा नही थी घर मे पहले ही उसे जोरू का गुलाम समझा जाता था कि उसी ने मीरा को सिर चढा रखा है।फिजूल खर्ची करती है आदि। सब से अधिक बात जो उसे कचोटती वो सास का ताना ---- दो साल से उपर हो गये शादी को मगर अभी तक मुझे पोटा नही दे पाई।---
एक दिन सास ने फिर यही ताना दे दिया --
"बहु दो साल हो गये अभी कुछ नही हुया आपनी जाँच करवाओ।"
"माँ जी पहले अपने बेटे की जाँच करवायें"आक्रोश से  मीरा की जुबान भी चल निकली।
रात प्रभात घर आया  तो माँ ने खूब नमक मिर्च लगा कर उसे सारी बात बताई।
प्रभात ने मीरा की पूरी बात सुने बिना मीरा को माँ के सामने ही  डाँट दिया।
" तुम मा का अनादर करो या उनके साथ बहस करो ये मै कभी भी बर्दाश्त नही कर सकता।" तुम्हें पता नही माँ ने हमे किन मुसीबतों से पाला है।"पर प्रभात इसका खामियाजा क्या मुझे ही भुगतना पडेगा? तुम मेरी बात सुने बिना ही क्यों मुझे डाँटने लगते हो? आखिर कब तक मै ये बर्दाश्त करती रहूँगी? मेरे माँ बाप ने भी मुझे इसी तरह पाला है। तो क्या वो मुझ से कोई प्रतिकार माँगते हैं । तुम्हें कितना प्यार देते हैं क्या उन्हों ने कभी कुछ कहा है तुम्हें जबकि तुम उनके कई महत्वपूर्ण समारोहों मे भी शामिल नही हुये, मेरी बहन के विवाह पर दो घन्टे के लिये आये थे। क्या सब फर्ज  लडकी के लिये है? फिर भी मैने हर कोशिश की है इस घर को चलाने के लिये मगर मुझे आज तक तुम्हारी माँ ने अपनी बेटी की तरह नही समझा। हद हो चुकी है। अब इस तरह मै और नहीं जी सकती---  माँ के सामने माँ के दोश पर भी उसे ही डाँटा गया बस यही उसे सहन नही हुया।
"देखो मै रोज़ की इस किच किच से तंग आ चुका हूँ। अगर तुम मेरी माँ और बहन से एडजस्ट नही कर सकती तो अपने मायके चली जाओ।"
प्रभात ने ना चाहते हुये भी कह दिया। वो जानता था कि इसमे इतना दोश मीरा का नही । माँ को ऐसी कडवी बात इस तरह नही कहनी चाहिये थी मगर वो माँ के आगे बोल नही सका। उसे दुख हुया वो रात भर सो नही पाया मीराको मनाना चाहता था मगर उसे पता था कि वो पनी इस ज्यादती का क्या जवाब देगा।---- क्या माँ को समझाये? मगर नही माँ तो मीरा से भी अधिक गुस्सा करेगी वो माँ को भी दुखी नहीं करना चाहता था।। माँ और पत्नि एक नदी के दो किनारे थे और वो इन दोनो के बीच एक सेतु था मगर ममता की डोरियों से बन्धा।------ क्रमश:


18 June, 2010

कर्ज़दार---2

कर्ज़दार
पिछली कडी मे आपने पढा कि प्रभात की माँ ने अपने पति की मौत के बाद कितने कष्ट उठा कर बच्चों को पढाया प्रभात की शादी मीरा से होने के बाद प्रभात ने सोचा कि अब माँ के कन्धे से जिम्मेदारियों का बोझ उतारना चाहिये। इस लिये उसने अपनी पत्नि को घर चलाने के लिये कहा और अपनी तन्ख्वाह उसे दे दी। ------अब आगे पढें----

प्रभात ने सोचा कि माँ खुश हो जायेगी कि उसके बहु बेटे उसका कितना ध्यान रखते हैं।-------
मगर माँ सुन कर सन्न रह गयी--
: बेता तेरी पत्नि आ गयी तो क्या घर मे मेरी कोई अहमियत नही रह गयी? अभी बेटी की शादी करनी है घर के और कितने काम है क्या अब इस उम्र मे बहु के आगे हाथ फैलाऊँगी?" माँ गुस्से मे भर गयी।
प्रभात एक दम सावधान हो गया वो समझ गया कि माँ अपने साम्राज्य पर किसी का अधिकार नही चाहती। आखिर कितने यत्न से उन्हों ने अपने इस साम्राज्य को संजोया था। इसकी एक एक ईँट उनके खून पसीने से सनी है।वो कैसे भूल गया कि माँ को ये स्वीकार नही होगा। ये घर उनका आत्मसम्मान , गर्व और जीवन था। शायद  माँ ठीक ही तो कह रही है वो क्यों मीरा के आगे हाथ फैलाये । शायद प्रभात ने फैसला लेने से पहले इस दृष्टीकोण से सोचा ही नही था। एक अच्छे और आग्याकारी पुत्र होने के प्रयास मे वो कितनी बडी भूल कर गया था। उसने जल्दी से तन्खवाह रमा के हाथ से ले कर माँ के हाथों मे सौंप दी। वो माँ की भावनाओं और एकाधिकार को चोट नही पहुँचाना चाहता था।
 मीरा को भी एक झटका लगा। उसने तो समर्पित भाव से इस जिम्मेदारी को सम्भालने के लिये इसमे हामी भरी थी न कि माँ के अधिकार छीनने के लिये। फिर भी उसे माँ की ये बात अच्छी नही लगी कि वो बहु के आगे हाथ फैलायेगी। मीरा ने सोचा अब वो भी तो अपनी जरूरतों के लिये माँ से ही माँगती है जब कि उसका पति कमाता है। फिर भी वो चुप रही और तन्खवाह माँ जी को दे दी।लेकिन अनजाने मे ही उसने सास बहु के रिश्ते मे एक दरार का सूत्रपात हो चुका था।
मीरा पहले अपनी जिस् इच्छा को मन मे दबा लिया करती थी धीरे धीरे वो उसके होठों तक आने लगी। माँ से जेब खर्च के लिये पैसे माँगते उसे अब बुरा लगने लगा। जब उसे माँ बेगाना समझती है तो वो क्यों इस घर की परवाह करे। शादी के बाद उसका कितना मन था कि वो दोनो कहीं घूमने जायें मगर माँ के सामने बोलने की कभी हिम्मत नही हुयी। माँ हमेशा सुनाती रहती थी बडी मुश्किल से घर चल रहा है। एक दिन उसने प्रभात से कहा
:"प्रभात एक वर्ष हो गया हमारी शादी को हम कहीं घूमने नही गये।चलो कुछ दिन कहीं घूम आते हैं।:
:"मैं मा से बात करूँगा।अगर मान गयी तो  चलेंगे।"
मीरा को उसका ये जवाब अच्छा नही लगा। क्या हमारा इतना भी हक नही़ कि कही घूम आयें।
अगले दिन प्रभात ने माँ से बात की तो माँ ने" देखूँगी" कह कर  टाल दिया। माँ को चिन्ता थी कि अगले महीने बेटी की M.B.A. की फीस जमा करवानी है। लोन की किश्त देनी है। जितना पैसा था छोटे को विदेश भेजने मे लगा दिया। फिर अभी बेटी की शादी भी करनी है। इस तरह की फिजूलखर्ची के लिये कहाँ पैसा है। यूँ भी माँ कुछ सचेत हो गयी थी। उसे लगा मीरा इसी लिये चाहती थी कि खर्च उसके हाथ मी आये तो वो अपनी फिजूलखर्ची करे। कहीं उसने बेटे को पूरी तरह वश मे कर लिया तो तो घर उजड जायेगा इस लिये उन्हें बाहर अकेले घूमने की आज़ादी देना नही चाहती थी अब उसे मीरा का समर्पणभाव झूठा लगने लगा था।
प्रभात ने मीरा से  दो तीन महीने बाद जाने का वायदा कर लिया
धीरे धीरे सास बहु के बीच शीत युद्ध् सा चल पडा अविश्वास की नींव बनने लगी थी।और् दो तीन माह मे ही ये तल्खी पकडने लगा। मीरा को अपने लिये जब भी कोई चीज लेनी होती तो सास से पैसे माँगने पडते थे।कहीं किसी सहेली के घर जाना तो भी आग्या ले कर कभी दोनो को पिक्चर देखने जाना होता तो माँ की इजाजत लेकर वो भी कई मार माँ टाल देती कि खर्च बहुत हो गया है। फिर कभी देख लेना। मीरा ने चाहे कभी माँ को किसी बात के लिये जवाब नही दिया कभी ऊँचे मे बात नही की अनादर नही किया। मगर सास बहु की अस्तित्व की लडाई शुरू हो चुकी थी।
अब मीरा को नौकरी मिल गयी थी मीरा खुश थी मगर माँ चिन्तित। अब घर मे काम काज की भी समस्या आने लगी प्रभात ने कहा भी कि नौकर रख लेते हैं मगर माँ ने कहा
"क्या नौकरों के सिर पर भी कभी घर चलते हैं? सफाइयों वाली लगा लो बाकी काम के लिये नही। मैने भी तो इतने साल नौकरी की 3-3 बच्चे पाले मगर किसी काम के लिये कोई नौकरानी नही लगायी। माँ ने गर्व से सिर उठया मगर प्रभात को वो गर्व से अधिक दर्प लगा मगर वो कुछ नही बोला और मीरा भी पैर पटकती हुयी अन्दर चली गयी।
प्रभात महसूस कर रहा था कि माँ नाज़ायज ही मीरा पर दबाव बना रही है। अपने जमाने से तुलना करना कितना सही है ? उसे माँ का ये व्यवहार अच्छा नही लगा। आजकल और पुराने रहन सहन मे कितना अन्तर है? आज सफाई.बर्तन खाना पीना कितना बदल गया है पिछले जमाने मे एक कमरे मे लोग गुजारा कर लेते थी आज सब को अलग बेड रूम चाहिये। घर बडा सामान अधिक तो देखभाल भी उतनी ही बढ गयी है खाना पीना् रहन सहन उतना ही हाई फाई होगया है।
मीरा नौकरी के साथ साथ घर का पूरा काम सम्भाल रही थी सफाई वाली लगा ली थी मगर बर्तन कपडे सब उसे ही करने पडते थे। कई बार मीरा की तबीयत सही नही होती तो माँ को या प्रभात की बहन को काम करना पडता तो घर मे तूफान आ जाता बहन के पास पढने का बहाना और माँ के पास बुढापे का। मीरा सोचती कि कभी तो आराम उसे भी चाहिये फिर क्या मेरी कमाई का आनन्द ये लोग भी तो उठा रहे हैं।--- क्रमश:

16 June, 2010

karzdar

जब तक नया कुछ लिख नही पाती तब तक अपनी पुस्तक मे से कहानियां  ही पोस्ट कर रही हूँ। ये कहानी मेरी पुस्तक  वीर्बहुटी मे से है और दैनिक जागरण समाचार पत्र मे भी छप चुकी है।

कर्ज़दार--कहानी

"माँ मैने तुम्हारे साम्राज्य पर किसी का भी अधिकार नही होने दिया इस तरह से शायद मैने दूध का कर्ज़ चुका दिया है"---- प्रभात ने नम आँखों से माँ की तरफ देखा और जा कर  पुलिस वैन मे बैठ गया।
अभी वो दुनिया को पहचान भी नही पाया था कि उसके पिता एक दुर्घटना मे मारे गये। माँ पर तो जैसे दुखों का पहाड टूट पडा। घर मे कोई कमाने वाला नही था मगर उसके मामा की कोशिशों से उसकी माँ को पिता की जगह दर्जा चार की नौकरी मिल गयी। प्रभाट का एक भाई और एक बहन थे। प्रभात सब से बडा था। उसकी माँ ने इतनी कम तनख्वाह मे भी तीनो भाई बहनों को उच्च शिक्षा दिलवाई। प्रभात को वकालत छोटे को इन्जनीयर और बेटी को बी एड करवाई। छोटा तो पढाई के बाद विदेश चला गया आगे पढने के लिये बहन ससुराल चली गयी। उसके बाद प्रभात की शादी मीरा से बडी धूम धाम से कर दी।
 मीरा एक पढी लिखी सुन्दर और सुशील लडकी थी। उसने आते ही घर का सारा काम सम्भाल लिया मगर घर की व्यवस्था बाजार का काम लेन देन आदि सब माँ ही देखती थी आज घर मे कौन सी सब्जी बनेगी क्या चीज़ आयेगी आदि सब  माँ के हुक्म से चलता था। वो अब रिटायर भी हो चुकी थी और जब शादी के बाद बीमार हुयी तब से कुछ कमजोर भी हो गयी थी। बाजार आते जाते ही थक जाती थी। घर का काम तो बहु के आते ही छोड दिया था। शायद ये सास का जन्म सिद्ध अधिकार होता है कि काम ना करे मगर घर मे हुक्म उसी का चले।
प्रभात ने सोचा कि माँ को घर चलाते हुये सारी उम्र बीत गयी अब उन्हें इस भार से मुक्ति मिलनी चाहिये। फिर उनकी सेहत भी ठीक नही रहती। उसने अकेले मे मीरा से बात की
"मीरा बेचारी माँ अकेले मे घर का बोझ ढोते थक गयी है। अब तुम आ गयी हो तो उन्हें आराम देना चाहिये।घर का काम तो तुम ने सम्भाल लिया है बाज़ार का काम हम दोनो मिल कर कर लिया करेंगे। आखिर ये घर अब तुम्हारा ही है।"
मीरा सुशील लडकी थी। उसने हाँ मे हाँ मिलाई तो प्रभात खुश हो गया।
अगले दिन वो शाम को दफ्तर से आ कर माँ के पास बैठ गया--
"माँ अपने बडे कष्ट झेल लिये अब तुम्हारी बहु आ गयी है,अब घर का सारा भार ये सम्भालेगी मै अपनी तन्ख्वाह इसे दे देता हूँ। बाजार का काम भी ये देख लेगी। आपको जो कुछ भी चाहिये बैठे बैठे हुक्म करें हाजिर हो जायेगा।अब आपके आराम के दिन हैं।"और उसने अपनी तन्ख्वाह मीरा के हाथ पर रख दी। प्रभात ने सोचा कि माँ खुश हो जायेगी कि उसके बहु बेटे उसका कितना ध्यान रखते हैं।------- क्रमश:

19 March, 2010

सुखदा ----कहानी---अन्तिम किश्त्

सुखदा-----कहानी भाग --4
बेशक माँ के कपडों से बू आ रही थी मगर आज सुखदा को वह भी भली लग रही थी। आखिर खून अपनी महक दे रहा था। उसे अभी भी याद है जिस दिन वो शारदा देवी के साथ जा रही थी माँ कितना रोई थी,तडपी थी उसे किस तरह जोर से सीने से लगाया था मगर पिता ने एक झटके से छुडा कर उसे अलग कर दिया था। आज भी माँ के सीने मे उसे वही तडप महसूस हुयी थी।
*मईया तुम्हें बुखार है?* उसने माँ के आँसू पोँछ करुसे बिस्तर पर लिटा दिया।उमेश और शारदा पास पडी टूटी सी धूल से भरी कुर्सियों पर बैठ गये।शारदा सोच रही थी कि माँ बेटी के ये आँसू अतीत की कितनी धूल समेट रहे थे।
मईया बाकी लोग कहाँ गये?*सुखदा ने इधर उधर नज़र दौडाई
*बेटी क्या बताऊँ? तेरे जाने के बाद छोटा घर छोड कर चला गया था।एक माह बाद तेरे पिता भी चल बसे। दादी भी भगवान को प्यारी हो गयी। बडा राजा वहीं रेहडी लगाता था उसे भी नशे की लत लग गयी। 15 20 दिन हो गये मुझ से झगडा कर के गया तो आज तक नही लौटा। बस मुझे ही मौत नही आयी शायद तुझे देखने की हसरत मन मे थी।
*बेटी मै जानती थी कि अभागिन तू नही हम लोग हैं सुखदा से ही घर सुखी था मगर मेरी किसी ने नही सुनी। शार्दा देवी तेरे लिये भगवान बन कर आयी। बस मुझे यही संतोश है।*
*इतना कुछ घट गया माँ , मुझे खबर तक नही दी?* सुखदा रोष से बोली
* बेटी मै तुझ पर इस घर की काली परछाई नही पडने देना चाहती थी तुझे फिर से इस नर्क मे घसीटना नही चाहती थी। तू अपने इन माँ बाप के साथ सुखी रहे यही चाहती थी। अच्छा पहले चाय बनाती हूँ।*
*नही मईया आप लेटी रहिये , मै बनाती हूँ।* सुखदा उठने को हुयी तो माँ ने उसे जबर्दस्ती बिठा दिया। और खुद चाय बनाने लगी ।
*शारदा देवी भगवान आपका भला करे। मेरी बेटी आपके हाथों मे सुरक्षित और सुखी है< अब मै चैन से मर सकूँगी।*
* अरे बहिन आप ऐसा क्यों कहती हैं।अपको पता है हमारी बेटी अब डाक्टर बन गयी है,ये भला आपको मरने देगी? * शारदा देवी ने वतावरण को कुछ हलका करने की कोशिश की।
* आपको बहुत बहुत बधाई । बहुत भाग्यशाली है आपकी बेटी जो आप जैसे माँ बाप मिले।* कहते हुये वो चाय बनाने चली गयी।
* सुखदा, तुम्हारी मईया को साथ ले चलते हैं। अकेली है बिमार है कैसे रहेगी। फिर तुम्हें अलग से चिन्ता रहेगी। बेटा जब तक तुम नही मिली थी बात और थी। वो अब भी तुम्हारी माँ है तो तुम्हारा फर्ज है कि उसकी देख भाल करो। जब तक हमे डर था कि कहीं तुम अपनी माँ को देख कर हमे छोड ना दो तो हमने तुम्हें रोके रखा अब हमे पता है कि हमारी बेटी हमे छोड नही सकती तो क्यों ना माँ को भी साथ ही रख लें भगवान की दया से हमारे पास किसी चीज़ की कमी नही है।* उमेश ने सुखदा की ओर देख कर कहा।
* पापा आप महान हैं।* कह कर सुखदा उमेश के गले से लग गयी।
बडी मुश्किल से उन लोगों ने सुखदा की माँ को मनाया। भगवान की दया से उनके पास बहुत कुछ था और उन्हें सुखदा की माँ को अपने साथ रखना मुश्किल नही था। सुखदा सोच रही थी कि क्या आज के जमाने मे उसके मम्मी पापा जैसे लोग मिल सकते है? मईया तो जैसे अपनी आँखें नही उठा पा रही थी। काश कि आज सुखदा के पिता जिन्दा होते तो देखते कि जिसे अभागी कह कर घर से निकाल दिया था , वही उसकी भाग्य विधाता बन कर आयी है।कितनी सौभाग्यशाली है उसकी सुखदा! -- समाप्त

आप सब को बता दूँ कि आज के बाद कुछ दिन किसी भी ब्लाग पर नही आ पाऊँगी। मै 23 मार्च को USA जा रही हूँ, वहाँ जा कर जब समय मिलेगा तो जरूर आऊँगी। आप लोग भूल मत जाईयेगा। 

16 March, 2010

सुखदा ----कहानी---भाग --3

सुखदा    कहानी-- भाग ------ 3
पिछले भाग मे आपने पढा कि कैसे सुखदा
के पिता के बीमार होने पर उसे एक ओझा के पास ले गये उस ओझा ने सुखदा को घर के लिये मनहूस बताया और एक आश्रम का पता दिया कि इसे वहाँ छोड दें। मगर उसकी माँ नही मानी और उसे नानी के घर भेज दिया। जहाँ स्कूल की एक टीचर शारदा देवी और उसके पति उमेश ने उसे गोद ले लिया। अब आगे पढें----

दिन साल बीते सुखदा ने कभी पीछे मुड कर नही देखा और एक दिन वो डाक्टर बन गयी। वो बहुत खुश थी मगर कभी कभी जब उसे अपनी माँ का चेहरा याद आता तो बहुत उदास हो जाती। उस चेहरे को उसने हर दिन याद किया है। कई बार उसका मन तडप उठता-- पता नही कैसे होंगे वो सब छोटा भाई कैसा होगा वो भी तो बहुत रिया था उसके आने पर। मगर वो लोग उसे ऐसे भूले कि किसी ने कभी जरूरत नही समझी उसकी सुध लेने की। पता नही कहाँ होंगे? आज वो अपने बाप को बताना चाहती थी कि वो अभागिन नही है।
उमेश और शारदा ने उसके डाक्टर बनने की खुशी मे घर मे एक पार्टी रखी थी। वो दोनो बहुत खुश थे मगर कई बार सुखदा को उदास होते देख कर वो उसकी हालत समझते थे। अब तक तो उसे यही कहते रहे थे कि बस पढाई की ओर ध्यान दो पिछली बातें भूल जाओ। अपने पिता को दिखा दो कि तुम अभागिन नही हो। और वो उसका ध्यान इधर उधर लगा देते।  वो उसकी उदासी से कभी अनजान नही रहे। उन्हें एहसास था कि सुखदा की उदासी अस्वाभाविक नही है।
आज दोपहर का खाना खा कर सुखदा अपने कमरे मे जा कर लेट गयी। वो कोशिश करती थी कि कभी अपने इन माँ बाप को अपने मन की उदासी का पता न चलने दे मगर शारदा देवी की आँखों से ये छुप नही पता। कुछ देर बाद शारदा ने कमरे मे जा कर झाँका तो सुखदा किसी सोच मे डूबी थी। वो उसके सिरहाने जा कर बैठ गयी
* क्या बात है आज मेरी बेटी कुछ उदास लग रही है।*
कुछ नही माँ क्या कोई काम था?* मै तो ऐसे ही लेटी थी। भला मैं उदास क्यों होने लगी। पार्टी के बारे मे ही सोच रही थी।*
*हाँ मै समझ सकती हूँ । बेटा मैने चाहे कभी तुम से पुरानी बातों का जिक्र नही किया बस मन मे एक ही बात थी कि तुम किसी मुकाम पर पहुंच जाओ। कहीं वो बातें तुम्हें अपनी मंजिल से दूर न कर दें। मगर आज मन मे एक बात है।* कह कर शारदा देवी सुखदा की तरफ देखने लगी।
*हाँ हाँ कहो माँ?*
बेटी मै चाहती हूँ कि एक निमन्त्रण पत्र तुम अपने माँ बाप को भी दो। बेशक मैने कभी तुम से उनका जिक्र नही किया मगर जानती थी कि तुम्हें उनकी याद अकसर आती है। मै नही चाहती थी कि तुम उनके विषय मे सोच कर पढाई से दूर न हो जाओ। आज तुम ने अपने आप को साबित कर दिया है।ाब मुझे कोई डर नही क्योंकि मुझे पता है तुम हमारी बेटी हो और हमे तुम पर पूरा विश्वास है। इसलिये हम तुम्हे उदास भी नही देख सकते। मैं चाहती हूँ कि तुम अपने माँबाप से अब मिल लो।।*
*नही माँ मै इस लिये उदास नही कि मै उनके पास जाना चाहती हूँ । अब तो केवल आप ही मेरे माँ बाप हैं और मुझे आपकी बेटी होने पर गर्व है। आपने मेरे जीवन को एक अर्थ दिया है। आपके सिवा कोई नही मेरा। फिर भी कई बार  माँ का चेहरा और छोटे भाई का रुदन याद आता है तो दिल तडप सा उठता है दोनो की बेबसी याद आती है बस।* सुखदा ने शारदा देवी के गले मे बाहें डालते हुये कहा।
*अच्छा चलो,उठो कुछ कार्ड खुद जा कर देने हैं कल तेरे शहर चलेंगे। कहते हुये शारदा देवी उठ गयी।
अगले दिन अपने घर जाते हुये--- वो सोच रही थी अपना कौन सा घर अपना घर तो उसका वो है जहाँ अब रह रही है।-- वो ति किसी के घर बस कार्ड देने जा रही है। एक अभिलाशा लिये , अपनी सगी माँ से मिलने
की चाह लिये बस कार्ड देना तो एक बहाना था।
सुभ 10 बजे जैसे ही गाडी सुखदा के घर के आगे रुकी मोहल्ले के बच्चे गाडी के आस पास इकट्ठे हो गये। गरीब बस्तियों मे भला कभी कुछ बदलता है? इन लोगों के लिये आज भी गाडी एक दुर्लभ वस्तु है। वो भी तो इतनी उत्सुकता से मोहल्ले मे आने वाली गाडी को देखा करती थी। जैसे ही ये लोग गाडी से बाहर निकले सब इनकी ओर देखने लगे। सामने कुछ लडके जमीन पर बैठे ताश खेल रहे थे औरतें नल से पानी भर रही थी-- बच्चे नंग धडंग खेल रहे थे। मोहल्ले मे कुछ घर नये बन गये थे।उन्हों ने किसी से सुखदा के बाप का नाम ले कर घर पूछा सुखदा को कुछ कुछ याद था । एक लडके ने इशारे से एक घर की ओर उँगली की।
 दरवाजा टूट गया था।सुखदा ने जैसे ही दरवाजे पर हाथ रखा दरवाज चरमराहट से खुल गया। इतनी गंदगी? उसका घर तो जहाँ तक उसे याद है साफ सुथरा हुया करता था। कुछ और आगे बढी तो कंपकंपाती क्षीण सी आवाज़ आयी।
*कौन? अन्दर आ जाओ।*
बरसों बाद माँ की आवाज़ सुनी थी।   दिल धडका और आँख भर आयी। शारदा देवी ने हल्के से उसका कन्धा दबाया और आगे बढने का इशारा किया। वो लोग अन्दर आ गये। कमरे के एक तरफ मैले कुचैले बिस्तर पर उसकी माँ लेटी थी दूसरी तरफ दो टूटी फूटी कुर्सियाँ एक स्टूल पडा था। सुखदा तेजी से माँ की तरफ लपकी
*मईया?* बडी मुश्किल से सुखदा के मुँह से आवाज़ निकली बचपन मे वो ऐसे ही अपनी माँ को बुलाया करती थी। सब की जैसे साँसें रुक गयी थी आँखें सब की नम ---- सुन कर माँ एक झटके से उठ कर बैठ गयी। ऐसे तो सुखदा ही पुकारा करती थी ।इतने बर्षौ बाद किसी ने मईया कहा था। उसे लगा जैसे किसी ने उसके दिल की तपती रेत पर ठंडे पानी की बौछार कर दी हो।
*सुखदा?*
एक झटके से खडी हो गयी उसे छुआ और फफक कर रो पडी। शाय्द गले लगाने से हिचक रही थी उनलोगों के साफ सुथरे कपडे देख कर।
*माँ!* सुखदा झट से उसके गले लग गयी। सब की आँखें सावन भादों सी बह रही थीं।
बेशक माँ के कपडों से बू आ रही थी----- क्रमश"

14 March, 2010

सुखदा --- कहानी -भाग -2

 पिछले भाग मे आपने पढा कि सुखद के पिता को इलाज के लिये एक ओझा के पास ले जाया गया। कहा जाता था कि वि ओझा बिना चीर फाड किये कैंसर के मरीज का आप्रेशन करता था। वहाँ उस ओझा ने कहा कि सुखदा उनके घर का काल बन कर आयी है इस लिये इसे घर से दूर किसी आश्रम मे भेज दें। ये सुन कर सब डर गये। और बाबा के आश्रम से आप्रेशन के बाद घर आ गये। अब आगे पढिये--------
सुखदा-- भाग -2
सुखदा डर के मारे माँ को छोड नही रही थी।उसके पिता उसे गैर की तरह गुस्से मे देख रहे थे।माँ तो जैसे काठ की मूर्ती बन गयी थी। उसे विश्वास नही हो रहा था कि उसकी इतनी प्यारी बेटी अभागी हो सकती है।
घर पहुँचते ही दादी और पिता ने उसे आश्रम भेजने की जिद पकड ली दादी को सुखदा से अधिक अपने बेटे की जान की चिन्ता थी।उसके भाई उसे भेजने के हक मे नही थे मगर वो अभी छोटे थे उनकी कौन सुनता? बाप को तो सिर्फ अपनी चिन्ता थी।खुदगर्ज़ी इन्सान को कितना नीचे गिरा देती है कि वो अपना जीवन बचाने के लिये मासूम बच्ची के जीवन से खेलने मे भी संकोच नही करता।बाप की खुदगर्ज़ी और अन्धविश्वास की भेंत चढने जा रही थी सुखदा।
माँ जानती थी कि उसका भी बस नही चलेगा।कहीं ये लोग सच मे उसे बाबा के बताये आश्रम मे छोड आये तो सुखदा का क्या होगा---- फिर वो कभी अपनी बच्ची को देख भी पायेगी या नही! इससे अच्छा होगा यदि मै इसे इसकी नानी के घर भेज दूँ।कम से कम उसे कभी देख तो सकती हूँ। बडी मुश्किल से वो अपने पति और सास को मना पाई। सुखदा भी सब कुछ समझ रही थी उसे याद आ रहा था कि जब कभी वो रोते हुये पापा की गोद मे समा जाती तो वो एक दम परेशान हो उठते। उनसे उसका रोना देखा नही जाता था। आज जैसे ही वो पापा के पास गयी उन्होंने उसे डाँट कर भगा दिया। दादी तो उसे खा जाने वाली नजरों से देख रही थी। बडा भाई अपने काम काज मे व्यस्त था। छोटा रात भर सुखदा और माँ के पास सुखदा का हाथ पकडे रहा । और माँउसे सीने से चिपकाये आँसू बहाती रही।उसके कलेजे का टुकडा जिसे देख कर वो अपना सारा गम भूल जाती थी अब् उससे दूर जा रहा था। कैसे रहेगी अकेली नानी के पास? माँ के बिना तो उसे नीँद भी नही आती थी। सुखदा की नींद तो जाने कहाँ उड गयी थी।उस मासूम को तो ये भी पता नही था कि अभागिन क्या होती है। क्यों उसे घर से दूर भेजा जा रहा है।
अगले दिन माँ उसे नानी के घर छोड आयी। कितना रोयी तडपी थी घर से चलते वक्त। बाप ने तो उसकी ओर नजर भर कर देखा भी नही।बस माँ और छोटा भाई रो रहे थे। जाने कितने दिन माँ रोती रही होगी। उसे छोड कर जाते हुये बार बार माँ का आँसोयों से भरा चेहरा उसे याद आता जिसे वो पूरी उम्र नही भूल पाई थी। नानी के पास दो दिन उसने एक दाना भी नही खाया था। नानी गाँव मे अकेली रहती थी। मामू अपनी पत्नि और बच्चों के साथ शहर मे रहते थे।बूढी नानी सुखदा को बहलाने की भरसक कोशिश करती थी पर सुखदा तो जैसे पत्थर बन गयी थी। गुम सुम सी सारा दिन रोती रहती थी।
कुछ दिन बाद गाँव के एक सकूल मे उसका दाखिला करवा दिया गया। मगर स्कूल मे भी उसका मन नही लगता था। वो चुप चुप सी सहमी हुयी कलास के एक कोने मे बैठी रहती थी।उसकी भोली सी सूरत देख कर उसकी क्लास टीचर शारदा देवी को उसकी ये उदासी समझ नही आती थी। बहुत बार उसने उसे समझाने की कोशिश भी की मगर वो चुप रही। पता नही क्यों शार्दा देवी को उस लडकी से कुछ लगाव सा हो गया। उसकी अपनी कोई संतान न थी। उसे समझ नही आता था कि इतनी छोटी सी उम्र मे उसे कौन सा दुख सालता रहता है। वो निराश सी क्यों रहती है।
एक दिन आधी छुट्टी मे उसने सुखदा को अपने पास बुलाया।--
*सुखदा, क्या बात है बेटा तुम इतनी उदास और डरी सी क्यों रहती हो?*
वो चुपचाप अपने नाखूनों से अपनी किताब खरोंचती रही।जैसे डर रही हो कि उसे अभागी जान कर कहीं स्कूल से भी ना निकाल दें।
*अच्छा ये बताओ कि तुम अपने माँ बाप के पास क्यों नही रहती नानी के पास क्यों रहती हो?* सहानुभूति के दो शब्दों से सुखदा के सब्र का बान्ध टूट गया। उसके दिल के फफोलों से एक टीस उठी।
*मैं अभागी हूँ मेरे कारण मेरे घर पर विपत्ति आ गयी। पिता मेरे कारण बिमार हो गये। इस लिये मुझे घर से निकाल दिया गया।*
 सुनते ही शारदा देवी का दिमाग   सुन्न हो गया। इस इकीसवीं सदी मे ऐसा अन्ध विश्वास? इतनी छोटी सी बच्ची के साथ ऐसा अन्याय? जिसकी सूरत देख कर मन को सकून मिलता हो वो भोली सी बच्ची अभागी कैसे हो सकती है?कुछ पल मे अपने आप को संयत कर उसने सुखदा को गोद मे ले कर भीँच लिया।
*अच्छा बताओ क्या मेरी बेटी बनोगी?*  शारदा देवी ने उसके आँसू पोंछते हुये पूछा।
* नही,कहीं आप पर भी कोई मुसीबत आ जायेगी।* सुखदा ने सुबकते हुये कहा।
*अरे नही मेरा तो घर महक उठेगा। मैं तुम्हारी टीचर हूँ ना तो टीचर कभी बच्चों से झूठ नही बोलते। एक बात याद रखना,अभागी तू नही अभागे वो लोग हैं जिन्होंने तुझे त्याग दिया। देखना एक दिन तुम साबित कर दोगी। मै कल ही तुम्हारी नानी से मिलती हूँ। अब तुम अपने आँसू पोंछ दो । और क्लास मे जाओ।*
अगले दिन शारदा देवी और उसके पति उमेश सुखदा की नानी के पास गये। पहले तो उन्होंने उसे समझाया कि ये सब अन्ध विश्वास है। मगर नानी इसमे क्या कर सकती थी। फिर उन्होंने उसकी नानी को अपनी इच्छा बताई कि अगर आप इसे हमे गोद दे दें तो इसका भविश्य संवर सकता है। हमारे कोई संतान नही है। आप इसके माँ बाप को बुला कर बात करें। हम अगले इतवार को फिर आयेंगे।
सुखदा की माँ का कलेजा मुँह को आ रहा था ये सुन कर,मगर बाप खुश हो गया कि चलो बला टलेगी। नानी भी कब तक जिन्दा रहेगी कहीं ये मुसीबत फिर गले ना पड जाये। उमेश ने सारी कानूनी औपचारिकतायें पूरी कर ली और उसके पिता को इलाज के लिये कुछ धन भी दिया। इस तरह सुखदा अब शारदा और उमेश की बेटी बन गयी।
उनदोनो के पाँव जमीन पर नही पड रहे थे। मगर सुखदा को रह रह कर अपनी माँ का आँसूयों से भीगा चेहरा याद आ रहा था भाई की कातर निगाहें उसका पीछा कर रही थीं। मगर उन दोनो के प्यार ने उसे कुछ सकून दिया। उसका कमरा सजा दिया गया। वहाँ का माहौल देख कर वो हैरान थी इस तरह के खिलौने और खान पान तो उसने सपने मे भी नही सोचा था! घर मे रोनक हो गयी थी अब वो अपने माँ बाप की लाडली बेटी जो बन गयी थी धीरे धीरे वो माँ के सिवा सब कुछ भूल कर उनके प्यार मे रंगने लगी। उमेश और शारदा ने अपनी बदली कहीं दूर करवा ली । वो सुखदा को सभी यादों से दूर लेजाना चाहते थे।
नया शहर नया स्कूल और नया घर देख कर सुखदा भी खुश थी। बाल मन जल्दी ही उन खुशियों मे रम गया।
वर्षों की सीढियाँ फलांगते सुखदा कहीं की कहीं पहुंच गयी थी मगर नही भूली तो उस बाबा की दहशत और माँ का आँसूयों से भीगा चेहरा।-------  क्रमश

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