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07 February, 2011

ग़ज़ल -  प्राण शर्मा

घर में किसी के धूम मचाती  है ज़िन्दगी
जब  पहली बार  रूप  दिखाती है  ज़िन्दगी

रोती  है कभी हँसती - हँसाती है ज़िन्दगी
क्या - क्या तमाशे  जग को दिखाती है ज़िन्दगी

कोई  भले  ही कोसे उसे दुःख में बार -  बार
हर  शख्स  को ए  दोस्तो  भाती   है  ज़िन्दगी

दुःख  का  पहाड़  उस पे न टूटे   ए  राम  जी
इन्सां   की   जान   रोज़  ही  खाती है ज़िन्दगी

खुशियो ,  न जाओ  छोड़के  उसको कभी भी तुम
घर - घर   में   हाहाकार   मचाती   है   ज़िन्दगी

हमने   हज़ार  मिन्नतें  माँगी   तो   ये    मिली
मुश्किल   से   कभी  हाथ  में  आती  है  ज़िन्दगी

ए " प्राण "  कितना खाली सा लगता है आसपास
जब    आदमी    को    छोड़के  जाती  है  ज़िन्दगी
 
कुछ लोगों ने मुझसे हाइकु के बारे मे पूछा है। मैं खुद को अभी इस काबिल नही मानती कि हाईकु का व्याकरण बता सकूँ लेकिन आप इस विषय पर यहाँ सम्पर्क कर सकते हैं__--
http://hindihaiku.wordpress.com/author/rkamboj/
hindihaiku@gmail.com
  rdkamboj@gmail.com
  
 

01 November, 2010

गज़ल ------

ग़ज़ल -- प्राण शर्मा
 
उड़ते   हैं   हज़ारों   आकाश   में   पंछी
ऊँची  नहीं  होती  परवाज़ हरिक   की
 
होना था असर कुछ इस शहर भी उसका
माना कि अँधेरी उस शहर  चली   थी
 
इक   डूबता बच्चा   कैसे   वो    बचाता
इन्सान  था  लेकिन  हिम्मत की कमी थी
 
क्या दोस्ती   उससे   क्या दुश्मनी उससे
उस शख्स  की नीयत बिलकुल नहीं अच्छी
 
सूखी जो  वो होती जल जाती ही पल में
कैसे भला जलती गीली   कोई   तीली
 
इक शोर सुना तो डर कर   सभी   भागे
कुछ मेघ थे  गरजे बस बात थी इतनी
 
दुनिया   को समझना अपने नहीं बस में
दुनिया  तो  है   प्यारे   अनबूझ   पहेली
 
बरसी तो यूँ बरसी आँगन भी न भीगा
सावन  की घटा थी खुल कर तो बरसती
 
यारी  की ही खातिर  तू   पूछता   आ कर
क्या हाल  है  मेरा  ,  क्या   चाल   है   मेरी
 
फुर्सत   जो   मिले   तो  तू   देखने    आना
इस  दिल  की हवेली अब तक है नवेली
 
पुरज़ोर   हवा  में गिरना  ही था  उनको
ए   "  प्राण  "  घरों की दीवारें थी कच्ची

06 October, 2010

गज़ल

आदरणीय प्राण भाई साहिब ने आपकी खिदमत मे ये गज़ल भेजी है पढिये और दाद दीजिये। धन्यवाद।
माना कि आदमी को हँसाता  है आदमी
इतना नहीं कि जितना रुलाता है आदमी

माना  गले से सबको लगाता  है आदमी
दिल में किसी- किसी को बिठाता है आदमी

कैसा सुनहरा  स्वांग  रचाता है आदमी
खामी को अपनी खूबी बताता है आदमी

सुख में लिहाफ़ ओढ़ के सोता है चैन से
दुःख में हमेशा शोर  मचाता है आदमी

हर आदमी की  ज़ात  अजीबोगरीब  है
कब आदमी को दोस्तो भाता  है आदमी

आक्रोश, प्यार, लालसा  नफ़रत, जलन, दया
क्या - क्या न जाने दिलमें जगाता है आदमी


दिल का अमीर हो तो कभी  देखिए  उसे
क्या  क्या  खजाने सुख के लुटाता है आदमी
 
दुनिया से खाली हाथ कभी लौटता  नहीं
कुछ राज़ अपने साथ ले जाता है आदमी

अपने को खुद ही दोस्त उठाने का यत्न कर
मुश्किल से आदमी  को उठाता  है आदमी

23 September, 2010

गज़ल्

आज गज़ल उसताद श्री प्राण शर्मा जी की एक गज़ल पढिये

ग़ज़ल - प्राण शर्मा

क्यों न हो मायूस मेरे राम जी अब आदमी
इक सुई की ही तरह है लापता उसकी खुशी

माना कि पहले कभी इतनी नहीं ग़मगीन थी
गीत दुःख के गा रही है हर घड़ी अब ज़िन्दगी

कितना है बेचैन हर इक चीज़ पाने के  लिए
आदमी को  चाहिए अब चार घड़ियाँ चैन की

झंझटों में कौन पड़ता है जहां में  आजकल
क़त्ल होते देख कर छुप जाते हैं घर में सभी

बात मन की क्या सुनायी जान कर अपना उसे
बात जैसे पर लगाकर हर तरफ उड़ने   लगी

दोस्ती हो दुश्मनी ये बात मुमकिन है मगर
बात ये मुमकिन नहीं कि दुश्मनी हो स्ती

दिन  में चाहे बंद कर लो खिड़कियाँ ,दरवाज़े तुम
कुछ न कुछ तो रहती ही है सारे घर  में रोशनी

कोई कितना भी  हो  अभ्यासी मगर ए दोस्तो
रह ही जाती है सदा अभ्यास में थोड़ी   कमी

हमने सोचा था  करेंगे काम अच्छा रोज़  हम 
सोच इन्सां की ए यारो एक सी कब है  रही

गर कहीं मिल जाए तुमको मुझसे मिलवाना  ज़रूर
एक मुद्दत से नहीं देखी  है  मैंने  सादगी

हो भले ही शहर कोई " प्राण "  लोगों से भरा
सैंकड़ों में मिलता  है पर संत जैसा आदमी 


05 September, 2010

   बहुत दिन से कुछ अच्छा लिखा नही गया। मूड बनाने के लिये कुछ यत्न करते हैं। चलो आज आपको प्राण भाई साहिब के साथ मेले मे घुमाते हैं। पढिये उनकी गज़ल मेले मे।
मेले में -- प्राण शर्मा
                  
घर वापस जाने की सुधबुध बिसराता है मेले में
लोगों की रौनक में जो भी   खो   जाता है मेले में
 
किसको याद  आते हैं घर के दुखड़े,झंझट और झगड़े
हर कोई खुशियों में खोया   मदमाता    है   मेले में
 
नीले -  पीले लाल- गुलाबी   पहनावे   हैं   लोगों     के
इन्द्रधनुष   का  सागर    जैसे   लहराता    है   मेले   में
 
सजी   -  सजाई    हाट - दुकानें   खेल - तमाशे  और झूले
कैसा  -  कैसा   रंग    सभी   का भरमाता  है   मेले   में
 
कहीं  पकौड़े  , कहीं   समोसे ,  कहीं   जलेबी   की महकें
मुँह   में   पानी   हर   इक  के  ही भर आता है मेले   में
 
जेबें   खाली  कर   जाते हैं   क्या   बच्चे   और क्या  बूढ़े
शायद    ही    कोई      कंजूसी      दिखलाता   है मेले   में
 
तन    तो क्या मन भी मस्ती में झूम उठता है हर इक का
जब   बचपन    का   दोस्त अचानक मिल जाता है मेले में
 
जाने  -  अनजाने   लोगों   में   फर्क   नहीं    दिखता    कोई
जिससे     बोलो    वो    अपनापन    दिखलाता   है   मेले  में
 
डर  कर   हाथ   पकड़   लेती   है हर माँ अपने   बच्चे    का
ज्यों    ही    कोई    बिछुड़ा   बच्चा   चिल्लाता   है   मेले में
 
ये दुनिया   और   दुनियादारी    एक    तमाशा    है     भाई
हर    बंजारा    भेद     जगत   के     समझाता    है    मेले   में
 
रब    न   करे    कोई    बेचारा    मुँह   लटकाए    घर     लौटे
जेब    अपनी   कटवाने    वाला     पछताता     है     मेले    में
 
राम   करे  ,  हर   गाँव -  नगर   में   मेला  नित दिन लगता हो
निर्धन   और  धनी   का    अंतर    मिट  जाता    है   मेले    में
 
 

13 July, 2010

गज़ल

कुछ दिन से मेरे ब्लाग पर पूरे कमेन्ट पोस्ट नही होते --मुझे मेल आती है कि कमेन्ट किया था मगर पोस्ट पर नही दिखा। और मैं भी कई बार  किसी की पोस्ट पर कमेन्ट करती हूँ तो दोबारा देखती हूँ तो कमेन्ट वहाँ नही होता। क्या और भी किसी के ब्लाग पर ये प्राबलम है। अगर नही तो मेरे ब्लाग पर क्यों है क्या कोई बता सकता है? देखिये और साथ ही श्री प्राण शर्मा जी की एक प्यारी से गज़ल पढिये------

गज़ल।
कैसे कैसे शौक मन मे मै जगाया करता हूँ
कागज़ों की कश्तियाँ जल मे बहाया करता हूँ

जानता हूँ मै हवा के सरफिरे झोंके मगर
ताश के पत्तों के फिर भी घर बनाया करता हूँ

थोडी है सादा दिली और थोडी है मुझ मे अदा
इसलिए मै ज़िन्दगी को रास आया करता हूँ

क्यों न ओढूँ नित सच्चाई को सवेरा होते ही
रात भर माना कि मैं सपने सजाया करता हूँ।

काम कानों का भी करते हैं नयन ए दोस्तो
इस लिए मैं गीत बहरों को सुनाया करता हूँ

प्राण कंजूसी दिखाऊँ ये कभी मुमकिन नहीं
मैं खजाने प्यार के खुल कर लुटाया करता हूँ

29 June, 2010

श्री प्राण शर्मा जी की गज़लें
 बहुत दिन हुये प्राण भाई साहिब की पुस्तक "गज़ल कहता हूँ" मिली। मगर कुछ पारिवारिक व्यस्तताओं के चलते उस पर कुछ कह नही सकी। गज़ल के बारे मे कुछ कहने लायक भी नहीं हूँ, मगर जो गज़लें मुझे दिल के करीब लगीं उन्हें आपको पढवाना  चाहती हूँ। उनका परिचय किन्हीं शब्दों का मुहताज़ नही है। वो कई सालों से यू. के. मे रह कर हिन्दी की सेवा कर रहे हैं, मगर उनका अपनी माटी से प्र्यार और उसे छोड कर विदेश जाने का दर्द्, उनकी साफ गोई इस शेर मे देखिये
कहीं  धरती खुले  नीले गगन को  छोड आया हूँ।
कि कुछ सिक्कों की खातिर मैं वतन छोड आया हूँ
 एक  उस्ताद शायर की शायरी मे क्या है? लीजिये उनकी पहली गज़ल का लुत्फ उठाईये----
 गज़ल

आपको  रोका है कब  मेरे जनाब
शौक़ से पढ़िए मेरे दिल की किताब

बात सोने पर  सुहागा सी   लगे
सादगी के साथ हो कुछ तो हिजाब

साथ दुःख के होता है सुख कुछ न कुछ
कब जुदा  रहता है  कांटे   से  गुलाब

छोड़ अब दिन- रात का  गुस्सा   सभी
कम  न पड़  जाए  तेरे चेहरे की  आब

वास्ता  दुक्खों   से पड़ता  है    हजूर
कौन  रखता  है  मगर उनका   हिसाब

धुंध   पस्ती  की हटे  तो   बात   हो
कुछ नज़र  आये   दिलों के  आफताब

रोज़  ही   इक  ख्वाब से   आये  है तंग
" प्राण"   परियों   वालों  हो कोई तो ख्वाब

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