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25 October, 2011

हाज़िर जी

 बहुत दिन से अस्वस्थ रहने के कारण ब्लाग जगत से दूर रही। लेकिन ध्यान हर वक्त ब्लाग जगत मे ही रहा। 
आप सब की दुआ मेरे साथ थी, कितने लोगों के मेल और टेलिफोन आये सच कहूँ तो जब भी किसी का फोन आता तो आँखें नम हो जाती। सेहत की चिन्ता और चल फिर न पाने की वजह से शायद दिमाग मे कोई शब्द भी नही आता कि कुछ लिख सकूँ। बस समझ लीजिये कि आराम करते करते आलसी भी हो गयी हूँ लेकिन बैठे बैठे नाती नातिनों के स्वेटर खूब बना लिये, जिसमे कि मै खुद को बहुत माहिर समझती हूँ लेकिन कई सालों से अपनी इस कला को भुला दिया था।मै उन सब की बहुत बहुत आभारी हूँ जिनके मुझे फोन आये और जिन्हों ने मेरे बारे मे जानने के लिये पोस्ट तक लिखीं मेल किये, और मुझे नई ऊर्जा प्रदान की। विशेश रूप से सलिल वर्मा जी,इनके सात मेल मैने सहेज रखे हैं, भाई हो तो ऐसा हो, डा. दराल जिन्हों ने मुझे मेडिकल एडवाइज़ भी दी, खुशदीप सहगल और उनकी पत्नि यानि कि मेरी बहु, उसकी तो विशेष रूप से आभारी हूँ, स्मार्ट इन्डियन यानी अनुराग शर्मा जी संगीता पुरी जी, समीर लाल [उडन तश्तरी जी} सुरिन्दर मुहलिद, सेहर बेटी, सुबीर जी प्राण शर्मा जी,साधना वैद दिव्या, वाणी जी को भी जब पता चला तो मेरे लिये चिन्त व्यक्त की। कुछ नाम भूल भी गयी हूँ, शायद परेशानी मे यादाश्त भी कम हो गयी है। भेजी}उन सब से क्षमा चाहती हूँ। पूरे ब्लागजगत  की आभारी हूँ जिनके प्रेम और प्रेरणा ने मुझे फिर से सक्रिय होने के लिये उत्साहित किया। अभी भी बहुत देर तक बैठने के लिये मनाही है। अगर रोज़ सब के ब्लाग पर न भी आ सकी तो माफी चाहूँगी और आशा करती हूँ फिर से पहले की तरह आप सब के बीच होऊँगी।धन्यवाद।
दीपावली की आप सब को हार्दिक शुभकामनायें।

11 May, 2011

टिप्पणी व्यथा{ क्या व्यर्थ जा रहे हैं तारीफ मे लिखे कमेंन्ट}

इस से पहली पोस्ट मे मैने  ज़ाकिर अली रजनीश जी का टिप्पणियों के बारे मे आलेख  पोस्ट किया था और सब  के कमेन्ट पढ कर iइस नतीजे पर पहुँची कि एक तो सब ने एक स्वर मे कहा कि टिप्पणियाँ तो होनी चाहिये ।इससे लेखन क्षमता बढती है और उत्साह मिलता है। कुछ ने कहा कि अलोचना भी होनी चाहिये--- गलत को गलत और सही को सही। बात सही है लेकिन क्या हम समीक्षक हैं ---क्या क्या हम मे खुद मे इतनी प्रतिभा है कि हम उसकी गलतियाँ निकाल सकें? ये काम समीक्षकों का या आलोचकों का है। दूसरा अगर बहुत लोगों के ब्लाग पर जाना है तो संक्षिप्त टिप्पणी ही का जा सकती है। अब अपना पक्ष रखना चाहती हूँ
 मैने जब अपनी पहली पोस्ट लिखी थी तो उसमे कई गलतियाँ थी। आज जब वो पोस्ट पढ्ती हूँ तो खुद पर शर्म सी महसूस होती है जब्कि सभी ने प्रशंसात्मक टिप्पणियाँ ही दी थी। सब से पहली टिप्पणी श्री गिरिजेश राव जी ने की थी और मेरा उत्साह वर्द्धन किया था। उसके बाद नीरज जी प्रकाश सिंह अर्श डा. अनुराग अदि कई  टिप्पणियाँ आयी तो मेरी खुशी का ठिकाना नही रहा। फिर धीरे धीरे सब के ब्लाग पर जाना शुरू किया तोसब की टिप्पणियाँ प्रशंसा भरी ही होती{ लगभग}  ऐसा नही है कि मै किसी की पोस्ट बिना पढे टिप्पणी देती हूँ। अगर मुझे कुछ लगे तो बजाये ब्लाग पर टिप्पणी देने के उसे मेल कर देती हूँ ताकि वो निरुत्साहित न हो। दिव्या जी ने सही कहा कई लोग केवल अपनी भडास निकालने के लिये या खुद को सर्वश्रेष्ट दिखाने के लिये बिना बजह बहस करने लगते हैं  इसका कटु अनुभव हो चुका है। लेकिन कुछ ऐसे उदार लोग भी हैं जो मेल दुआरा अपनी बात या विरोध करते हैं।
 ब्लाग पढना भी मै जरूरी समझती हूँ क्यों कि इसी ब्लाग जग्त से मैने बहुत कुछ सीखा है। जब पढ ही लिया तो कमेन्ट देने मे क्या हर्ज़ है?ये भी जरूरी नही कि सब लोग टिप्पणियाँ जरूर करें।क्यों कि सब के पास इतना समय भी नही होता। लेकिन कुछ लोग खुद को वरिष्ट या श्रेष्ठ समझ कर ही टिप्पणी नही करते जब कि  इनका मार्ग दर्शन नये लेखकों के लिये बहुत जरूरी व उत्साहवर्द्धक होता है। एक बात ये भी है कि कुछ लोग अच्छे साहित्यकार हैं अच्छे ब्लागर हैं जो श्रम पूर्वक साहित्य साधना मे लगे हुये हैं उनके पास समय नही होता ब्लाग पढने का} लेकिन वो अपने मार्ग दर्शन से बहुत से नये साहित्यकारों को जन्म दे रहे हैं ऐसे लोगों के आगे नतमस्तक हूँ।  इसके लिये एक उदाहरण दूँगी-------
 सुबीर संवाद सेवा एक ऐसा ब्लाग है जिसके स्वामी श्री पंकज सुबीर जी हैं ।वो अपना व्यवसाय , घर चलाने के अतिरिक्त एक गुरूकुल चलाते हैं जिसमे गज़लें सिखाई जाती हैं मुशायरे करवाये जाते हैं फिर फिर उन्हें अपने शिष्यों  की गज़लों को दुरुस्त करना होता है। मैं हैरान हूँ कि वो अपना काम कब करते होंगे इसके अतिरिक साहित्य लेखन , काव्य मंचों मे उपस्थिती और पता नही कितने काम होते हैं। इनका समझ आता है कि वो टिप्पणी नही कर सकते ।ये सच्ची साहित्य साधना और साहित्य धर्म का का निर्वाह करते हुये सब का मार्ग दर्शन कर रहे हैं।  कुछ मेरे जैसे केवल टाइम पास होते हैं जो सिर्फ अपनी सुविधा के लिये ही लिखते है। अगर मैं सब ब्लाग्ज़ पर न जाती होती तो कैसे सब से परिचय होता?
लेकिन हम जैसे लोगों को टिप्पणी जरूर करनी चाहिये मेरा तो यही मानना है। सब से परिचय होने से उनसे बहुत कुछ सीखने को मिलता है। जब मै ब्लागजगत मे आयी थी तो मुझे कविता, गज़ल या नज़्म मे फर्क पता नही था।  लेकिन सुबीर जी से गज़ल सीखी नवीन जी से परिचय हुया तो दोहे सीखे, श्री रामेश्वर कम्बोज हिमाँशू जी से परिचय हुया तो हाईकु और आजकल ताँका गीत  सीख रही हूँ। । इतनी लम्बी चौडी बात का अर्थ   यही निकला कि टिप्पणी जरूर करनी चाहिये । जो गलती निकालने की सामर्थ्य रखते हैं जरूर संतुलित शब्दों मे निकालें, \ कम से कम मै आलोचक या समीक्षक नही हूँ। हाँ अगर लगे तो मेल जरूर करती हूँ। समयाभाव के कारण संक्षिप्त टिप्पणी ही हो पाती है। समीर लाल जी की तरह । वो सब को कमेन्ट देते हैं उत्साह वर्द्धन करते हैं तो अच्छा लगता है। वैसे भी बुढापे मे , बेटिओं के चले जाने से व्यस्त रहने का ये जरिया है समय बिताने के लिये। । कमेन्ट करती हूँ धर्म राजनिती बहस  से दूर रहती हूँ हाँ कई बार रोचक बहस हो तो हिस्सा भी बन जाती हूँ। मुझे मेल दुआरा प्रप्त पोस्ट पर टिप्पणी करने से गुरेज होता है जिन को सबस्क्राईब किया है उन्ही मेल वाली पोस्ट पर जाती हूँ या एक दो बार किसी की मेल मिले तो देख लेती हूँ लेकिन हर बार वो मेल करके ही कमेन्ट लें ये अच्छा नही लगता। मेल करने का ये तरीका कमेन्ट के लिये मुझे इसलिये अच्छा नही लगता कि कितना समय तो मेल बाक्स क्लीयर करने मे लग जाता है। ब्लाग का काम ब्लाग पर ही होना चाहिये। बेशक टिप्पणी लेन देन ही हो लेकिन ये दुनिया के किस रिश्ते या व्यवसाय मे नही होता? हम किसी के घर 4 बार जाते हैं लेकिन वो एक बार भी न आये तो कब तक आप जाते रहेंगी?टिप्पणी की परंपरा जीवित रहेगी तभी हम सब को समझ और पढ पायेंगे ।
डा, नलिन चक्रधर महोपाध्याय[ लखनऊ, उन्होंने मुझे कहानियाँ लिखने के लिये उत्साहित किया था। पत्रिका मे मेरा पता देख कर मुझे पत्र लिखा जब कि मै उन्हें जानती नही थी। जब मैने उन्हें धन्यवाद दिया [पत्र मे] तो उनका जवाब आया कि मै अपनी साहित्य धर्मिता का निर्वाह कर रहा हूँ। । उनकी वो बात आज भी मेरे जहन मे है\ इस लिये
टिप्पणी कीजिये लेकिन उत्साहवर्द्ध, अगर गलती निकालनी है तो बेहतर है मेल करें, नही तो विनम्र शब्दों मे गलत को गलत कहें और सही को सही।मेरा मानना है कि तारीफ मे लिखे कमेन्ट कभी व्यर्थ नही जाते बल्कि उत्साहित करते हैं और उत्साह ही आगे बढने के लिये प्रेरित करता है।जब आप खुद टिप्पणी का मोह रखते हैं तो फिर खुद टिप्पणी करने से परहेज क्यों? दूसरे भी आपसे यहीआअपेक्षा करें तो गलत क्या है?
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03 May, 2011

कुछ खट्टा कुछ मीठा ---
।।।।।।
दिल्ली जाना तो पहले केवल ब्लाग समारोह के लिये ही हुया था लेकिन 4-5 दिनों मे कुछ घटनाये ऐसी हुयी किदुख और खुशी दोनो तरह के अनुभव रहे।29 को मेरे दामद के भाई की बरसी थी 30 को नातिन के मुन्डन लेकिन 29 रात को दामाद के फूफा जी की मौत हो गयी जिससे मुन्डन स्थगित करने पडे। मूड खराब सा हो गया। इस लिये हम लोग पहली तारीख को वापिस आ गये। फिर भी ब्लागोत्सव समारोह सब दुखों पर भारी रहा। सब से मिलना एक सुखद अनुभूति हुई खास कर जिन लोगों से मिलने की कभी कल्पना भी नही की थी। उनमे बहुत से नाम हैं जैसे दिनेशराइ दुवेदी जी ,अवधिया जी, पावला जी ,अर्विन्द मिश्र जी, रश्मि जी ,संगीता जी शास्त्री जी , साहित्य शिल्पी[[ उम्र के लिहज से माफ करें नाम भूल गयी}और भी कई नाम हैं कुछ की मुझे जानकारी थी ,संगीता पुरी जी, डाक्टर दराल और सिरफिरा जी{ रमेश जी]} वन्दनाजी रेखा श्रीवास्तव। , खुशदीप , शहनवाज अजय जी ललित जी संजय, भास्कर केवल राम नीरज जाट। ,खुशी हुयी और कुछ से मिल कर हैरानी भी। हैरानी ब्लागप्रहरी के कनिष्क कश्यप को देख कर, लगा ये तो अभी छोटा सा बच्चा है, इतनी छोटी सी उम्र , प्रतीक महेशवरी। मै इन्हें उम्र मे कुछ बदा समझती थी। कनिष्क जी कई बार ब्लाग पर समस्या का हल भी बता देते हैं। और एक दो नाम भूल गयी क्षमा चाहती हूँ।खैर आपसब की शुभकामनाओं से जो पुरुस्कार मिला उसके लिये आपसब का धन्यवाद करना चाहूँगी। आज रिपोर्ट्स पढती हूँ।
 वापिस आते समय गाडी मे जो कटु अनुभव हुया वो आपसे साझा करना चाहती हूँ। रोज़ कितने जोर शोर से हम लोग भ्र्ष्टाव्चार आदि के बारे मे बडे बडे आलेख लिखते पढते हैं। मुझे कभी नही लगा कि हमारे समाज से ये कोढ कभी खत्म हो सकेगा। लेकिन  आशा ाउर विश्वास से अगर कुछ किया जायेगा तो शायद कुछ होगा। शायद अन्ना हजारे दुआरा जगायी गयी एक लौ हो। मुझे लगता है अब हम सब को मिल कर ही कुछ करना होगा। जब तक हम स्वंय नहीं उठेंगे तब तक कुछ नही हो सकता उसके लिये जहाँ भी हमे व्यवस्था मे कुछ खामी दिखे उसके खिलाफ अपनी आवाज़ बुलन्द करनी पडेगी। हुया यूँ कि हमने हिमाचल एक्सप्रेस मे टू टायर मे सीटें बुक करवाई थी जब डिब्बे मे चढे तो गन्दगी और बदबू देख कर मन खराब होने लगा औए सीट के सामने पर्दे भी नही थी उसी डिब्बे मे एक आर्मी के कर्नल साहिब भी अपने परिवार समेत यात्रा कर रहे थे । आपस मे सब लोग इस बारे मे बात करने लगे। मैने कहा कि ऐसा करते हैं कि इनकी कम्पलेन्ट बुक पर कम्पलेन्ट लिखते हैं कर्नल साहिन ने टी टी कोआवाज़ दी और उसे सारी समस्या बताई। लेकिन टी टी ने असमर्थता जताई कि इस समय कुछ नही हो सकता। सभी लोग डिब्बे मे इकट्ठे हो गये। कर्नल साहिब ने कहा कि तब तक गाडी नही चलेगी जब तक हमारी समस्या हल नही होती देखते देखते्रेलवे के बाकी कर्मचारी भी आ गये लोगों ने उन्को खूब खरी खोटी सुनाई आनन फानन मे उनलोगों परदे लगा दिये । फिर कर्नल साहिब ने बता कि हर सीट प धुले हुये हैंड टावल होते हैं आपके टावल कहाँ हैं। हमे हैरानी हुयी की हम लोग सैंकडों बार इसी कम्पार्टमेन्ट मे यात्रा कर चुके हैं लेकिन हमने कभी भी टावल नही देखे। फिर क्या था टावल भी आ गये बाथरूम भी साफ हो गये अय्र मच्छर के लिये दवा भी छिडक दी टायलेट मे साबुन भी रखवा दिया गया। । इसका अर्थ ये हुया कि सरकार ने सब कुछ मुहैया करवाया हुया है लेकिन कर्मचारी ही काम नही करना चाहते।सब कुछ होता है, सरकार देती है ,लेकिन् सब आपस मे मिल बाँट कर खा जाते हैं। आप सोचिये सालों से कितने टावल खरीदे गये होंगे वो सब कहाँ गये? या केवल मिली भगत से बिल ही बने होंगे। सब के मिल कर बोलने से फर्क तो पडता ही है। लेकिन लोग व्यवस्था के आगे हार मान कर चुप रह जाते हैं जिस से इनके मन मे किसी का डर नही  रहता। दो डिब्बों मे लगभग 10 करमचारी थे लेकिन जब काम ही नही करना तो सब कुछ कैसे सही चलेगा। टी टी कुछ बोल नही सकता उसने अपने नोट बनाने होते हैं। सब कुछ होने के बाद भी हमने कम्पलेन्ट बुक मे शिकायत दर्ज की उससे पहले भी अधी से अधिक कम्पलेन्ट बुक शिकायतों से भर चुकी थीऔर लोगों ने इतने तीखे कमेन्टस किये थे । शायद ये कम्पलेन्ट बुक भी बोगस हो ऊपर तक जाती ही न हो और दूसरी कोई मेन्टेन कर रखी हो जिसमे कुछ हल्का फुल्का खुद ही लिख लेते हों। काम न करने और सरकारी वस्तूयें जो यात्रियों की सुव्धा के लिये होती हैं उनकी चोरी के चलते लोगों को कितनी असुविधा होती है। जिसे नौकरी मिल जाती है वो इन सब बातों से बेफिक्र हो जाता है।शायद ये भ्रष्टाचार हमारी रग रग मे समा चुका है और जो नही करते वो बेबस चुप हैं अब ये चुपी तोडनी होगी तभी कुछ हो सकता है। जहाँ भी व्यवस्था मे कुछ गलत लगे अपनी आवाज़ जरूर बुलन्द करें, कुछ तो असर होगा।

27 October, 2010

यादें ।

 यादें
बीस वर्ष का समय किसी की ज़िन्दगी मे कम नही होता मगर फिर भी कुछ यादें ऐसी होती हैं जिन्हें इन्सान एक पल को भी नही भूल सकता। आज 20 वर्ष हो गये बेटे को भगवान के पास गये मगर शायद ही कभी ऐसा दिन आया हो कि उसकी याद किसी न किसी बहाने न आयी हो। आज करवा चौथ का व्रत उसी दिन आया जिस रात को उसकी मौत हुयी थी। सोचा था कि आज उसे बिलकुल याद नही करेंगे। सुबह से ही नेट पर बैठ गयी। बेशक दिल के किसी कोने मे वो रहा । शाम को इन्हें किसी से बात करते सुना तो बाद मे पूछ लिया कि किस से इतनी लम्बी देर बात कर रहे थे तो बोले कि 'अर्श' से,समझ गयी कि बेटे की याद आ रही है। मन उदास हो गया उसके बाद चाँद निकला अर्ध्य दे कर जैसे तैसे दो कौर नम आखों से खाये।आऔर फिर याद करने लगी उस रात को। हमे पता चल चुका था कि वो अपनी आखिरी साँसें ले रहा है फिर भी मै उसका हाथ जोर से पकडे बैठी थी और जोर जोर से रो रही थी--- काश आज भगवान सुन ले मेरी जान ले ले मगर इस होनहार बेटे को बचा ले मगर भगवान कहाँ सुनता है,बस अपनी मर्जी किये जाता है और वो हमारे देखते देखते हाथों से फिसल गया। 28 वर्ष का हृष्ट पुष्ट जवान बेटा। लगता है जैसे ये आज की ही बात हो। जयप्रकाश नारायण का वो वार्ड किसी नर्क से कम नही था गन्द और बदबू आज भी नथुनो मे जैसे समाई हो। सब से कचोटने वाली बात वहाँ के स्टाफ का अमानवीय,असंवेदनशील व्यवहार।त्यौहार आते रहेंगे मनाते भी रहेंगे मगर वो खुशी और वो उल्लास शायद जीवन मे कभी नही आयेंगे।

21 October, 2010

ापनी बात

सभी से क्षमा चाहती हूँ। लगभग एक सप्ताह से कम्प्यूटर खराब था। मोनीटर की सप्लाई जल गयी थी । किसी मेकेनिक से ठीक नही हुया। मुझे लगने लगा जैसे मै बीमार हो गयी हूँ। ये ब्लागिन्ग का बुखार था।मेरी परेशानी को देखते हुये मेरे छोटे दामाद प्रिय ललित सूरी को रहम आ गया और उसने ट्रेन के टी, टी के, हाथ मेरे लिये नई एल सी डी भेज दी। ललित जी का धन्यवाद करती हूँ भगवान ऐसे दामाद सब को दे। 8 बजे एल.सी डी मिला और 10 बजे आपके सामने हूँ। मेल बाक्स भरा पडा है। एक दो दिन मे सब कलीयर कर के सब के ब्लाग पर आती हूँ। इतने दिन मे बहुत से लोग मेरे ब्लाग पर आये उनका धन्यवाद करती हूँ। ललित को बहुत बहुत आशीर्वाद।

26 September, 2010

पा ती अडिये बाजरे दी मुठ

कृप्या मेरी आज की पोस्ट यहाँ पढें। मै अपने इस ब्लाग को अपडेट कर रही हूँ। धन्यवाद।http://veeranchalgatha.blogspot.com/
धन्यवाद्।

21 September, 2010

दहेज्-- अपनी बात।

क्या सामर्थ्यवान लोगों को दहेज देना चाहिये?
 मेरे ब्लाग www.veerbahuti.blogspot.com/ पर एक लघु कथा-- दो चेहरे पढ कर खुशदीप सहगल जी ने अपने ब्लाग http://deshnama.blogspot.com/ पर अपने विचार दिये और कई लोगों ने भी अपने अपने विचार दिये। आज उन से ही मन मे कुछ सवाल उठे।किसी का उन से सहमत होना न होना जरूरी नही जरूरी है हम फिर भी संवाद करें और अपने अपने विचार दें तो शायद कोई बीच का रास्ता हमे भी सूझ जाये।
मेरी लघु कथा का जिक्र हुया मुझे खुशी हुयी।लेकिन उस लघु कथा मे विषय ये नही था कि दहेज लिया दिया जाये य नही मै तो बस ये कहना चाहती थी कि लोग  दोहरी नीति अपनाते हैं, जब समाज की बात आती है तो ये कुरीति बन जाती है जब अपने घर की बात आती है तो ये जायज़ है। लेकिन दहेज के बारे मे आज कुछ बातें करना चाहूँगी। कुछ लोगों ने दहेज के लिये कहा कि अगर कोई व्यक्ति अपनी मर्जी से दहेज देना चाहता है तो उसमे कोई बुराई नही। इस बात पर मन मे कुछ सवाल और भ्रम से उत्पन हुये जिन्हें आपके साथ बाँटना चाहती हूँ। िस व्यवस्था के लचीले पन मे कुछ सवाल उभरते हैं।  जिस जगह भी कुछ लचीला पन रहा है वहाँ लोग अपने स्वार्थ के लिये राह तलाश लेते हैं। हर पक्ष के दो पहलू होते हैं,देखने वाली बात ये है कि दोनो मे कौन सा समाज के लिये हानिकारक है और कौन सा सिर्फ कुछ लोगों के खुद के लिये। जो समाज के लिये हनिकारक हो।
 सब से पहले तो हमे ये तय करना चाहिये कि क्या हम लडकियों को समान अधिकार देने के हक मे हैं या नही।
अगर हैं तो लडकी को जब लडकों की तरह पढाया लिखाया जाता है और पिता की सम्पति पर बेटी का भी बेटे के बराबर हक होता है तो फिर दहेज किस बात के लिये। उपर से लडकी ने अगर नौकरी करनी है तो उसकी पूरी कमाई ससुराल मे ही तो जायेगी। फिर भी लडकी वालों को ये मजबूरी क्यों कि वो दहेज दें। अगर सच कहें तो अधिकतर दहेज केवल मजबूरी मे दिया जाता है। वो मजबूरी चाहे समाज की रीत हो या फिर  अपने  मान सम्मान की। ये भावना दहेज की कुरीति से ही पनपी है कि इस पवित्र बन्धन को आज केवल पैसे से तौला जाने लगा है। इसे अपने सम्मान और प्रतिष्ठा से जोडा जाने लगा है।
दूसरी बात जो कुछ लोगों ने उठाई है वो है कि जो समर्थ है वो अगर अपनी मर्जी से अपनी बेटी को कुछ देता है तो उसमे कोई नुकसान नहीं। हाँ सही है, लेकिन इसी लेन देन से बाकी लोगों के लिये एक लकीर खींच दी जाती है कि उसने अपनी लडकी को इतना दिया और हम ने क्या दिया? या हमे क्या मिला?  फिर जब एक ही घर मे दो बहुयें आती हैं एक को माँ बाप ने कैश या दहेज दिया दूसरी बहु बिना कुछ लिये आयी तो घर मे ही दो लकीरें खिंच जाती हैं। हमारा समाज इतना भी उदार नही हुया कि ऐसी बहुयों मे फर्क करना छोड दे।  अपनी एक रिश्तेदारी की बात बताती हूँ।  उन्होंने जब लडकी का रिश्ता किया तो शादी से पहले ही बात हो गयी कि दहेज नही लेंगे। लडकी  बहुत अच्छी जाब कर  रही थी। एक महीने मे 60 हजार रुपये तन्ख्वाह लेती थी। शादी धूम धाम से हो गयी और उसके दो माह बाद ही दूसरे बेटे की शादी की तो उसके माँ बाप ने अपनी लडकी के नाम दहेज  के रूप मे 10 लाख रुपये जमा करवा दिये। अब धीरे धीरे छोटी बहु तो सब की आँखों का तारा बन गयी वो भी जाब करती थी, मगर घर का कोई काम काज आदि नही करती थी और ऐश से रहती। वहाँ दूसरी बहु को पूरा घर भी सम्भालना पडता, मगर घर के लोग दूसरी को कुछ नही कहते।अब बडी बहु के माँ बाप रिटायर हो चुके थे जो धन मिला उससे घर बनाया और तीनों बच्चों को अच्छी तालीम भी दी। कोई सरकारी नौकरी मे कितना धन जोड सकता है आखिर जब लडकी को ताने मिलने लगे तो उन्होंने कुछ राशी लडकी के नाम दे दी।। वो राशी ये सोच कर भी दी कि  दी कि उनके कोई बेटा नही मरने के बाद भी इसी का होगा। उसके बाद मजबूरी मे दूसरी लदकी को भी उतना ही देना पडा। और सारी जमा पूँजी समाप्त हो गयी।लेकिन कुछ समय बाद घर मे बीमारी ने ऐसे पाँव फैलाये कि वो लोग पैसे के अभाव मे आ गये।
आज वो उस की पूर्ती अपने खाने दाने मे और अपनी जरूरतों मे कटौती कर के कर रहे हैं जबकि ससुराल वाले उस बहु की इतनी बडी कमाई से शाही जीवन जी रहे हैं । ऐसे कितने उदाहरण अपने आस पास के दे सकती हूँ।
 अब अगर वो लाखों न दिया होता तो शायद अब उनके काम आता लडकियाँ चाहे कमाती हों मगर इतनी भी आज़ाद नही हुयी कि वो अपने माँ बाप पर अपनी मर्जी से कोई बडा खर्च कर सकें। फिर ऐसे हालात मे जहां बहु की कद्र सिर्फ पैसे से होती हो। इन्सान का मन बहुत विचित्र है। पैसा बडे बडों का ईमान गिरा देता है ये तो आपने देखा ही होगा जैसे इस परिवार का गिराया है। पहले चाहे उन्हों ने इसे कुरीति ही मान कर दहेज नही लिया मगर जब अपने आप आ गया तो लालच बढ गया। अगर आप गौर करें तो देहेज प्रथा मे  लचीलापन उन लोगों की सोच है जिनके लडके हैं। लडकी वालों मे बहुत कम लोग होंगे जो समर्थ होते हुये भी दहेज देना चाहेंगे। ये प्रथा है इस लिये उन्हें ये अपनी बेटी का मान सम्मान लगता है, तो इसे बुरा नही मानते। मगर ये बाकी समाज के असमर्थ लोगों के लिये मजबूरी बन जाता है।
मेरा मानना है कि जिस जगह लचीनापन होता है वहाँ अपने अपने स्वार्थ के लिये रास्ते जरूर खुल जाता हैं।  अगर यही लचीलापन हम केवल लडकियों को बराबरी का हिस्सा देने मे रखें तो शायद बाकी असमर्थ लोगों को कुछ राहत मिले।हिस्सा देने मे जो कुछ विसंगतियाँ आती हों उनके लिये हल खोजे जा सकते हैं।
एक सवाल और पूछना चाहती हूँ कि क्या जो लोग दहेज की हिमायत करते हैं वो इस बात की भी हिमायत करेंगे कि उनका बहु जो कमाती है उसमे से आधा अपने माँ बाप को दे कम से कम बुढापे मे उनके गुजर बसर का जिम्मा ले? कहने को तो हर कोई कह देगा लेकिन होगा नही। जिन के बेटे नही होते उन माँ बाप से तो लडके वालों की और भी आपेक्षायें बढ जाती हैं। कि बाद मे भी तो लडकी को ही मिलेगा इस लिये पहले ही उनकी आँखें लडकी वालों की सम्पति पर लग जाती हैं। इससे पहले कि वो अपना पैसा कहीं और न लुटा दें उन्हे मिल जाये। फिर हर तौहारों पर लेन देन केवल लडकी वालों की जिम्मेदारी होती है। इस प्रथा मे यही काफी नही कि दहेज दिया और छुट्टी मिल गयी। हर त्यौहार पर ससुराल वालों की आपेक्षायें बढती ही जाती हैं, जैसे बेटी को जन दे कर उन्हों ने कोई गुनाह किया है जिस की सजा उन्हें उम्र भर मिलती रहेगी।
 कुछ दिन पहले ही किसी के घर मे ऐसा वाक्या हुया कि लडकी को  अपने माँ बाप के पास जमीन खरीदने के लिये पैसे लेने भेजा गया।  लेकिन लडकी के बाप के पास जो था उसी मे से अपना गुजर बसर करते थे। जब इन्कार किया तो लडकी  को मायके भेजना बन्द कर दिया। अब मरता क्या न करता कुछ पैसे दे कर अपनी बेटी से मिलने का हक लिया।
  कि बाद मे भी तो लडकी को ही मिलेगा इस लिये पहले ही उनकी आँखें लडकी वालों की सम्पति पर लग जाती हैं।
 बहुत कुछ इस विषय पर लिखा जा सकता है। मगर पोस्ट बडी नही करना चाहती। बस एक बात कहना चाहती हूँ कि अपनी सामर्थ्य और अपने मान सम्मान के लिये दिया गया दहेज क्या असमर्थ लोगों के लिये मजबूरी तो नही बन रहा? क्योंकि कई बार ससुराल वाले ताने दे देते हैं देखों फलाँ के घर कितना कुछ आया और तुम्हारे माँ बाप ने क्या दिया। और दिये गये समान मे मीन मेख निकलनी शुरू हो जाती है जिस से सास बहु मे या बाकी सब के दिलों मे मन मुटाव शुरू हो जाता है।अगर ये सब जायज़ है तो समान अधिकारों की बात छोडो।ऎसे कानून का विरोध करो जो लडकी को समान अधिकार देता है।
आज जिस समाज मे लोगों की सोच ये है कि पडोसी को देख कर अपना रहन सहन उनसे ऊँचा रखने की रेस लग जाती है, उस समाज मे ये लचीलापन एक अभिशाप से कम नहीं। फिर भी ये सब होता रहेगा हम और आप केवल बहस करते रहेंगे। बस ।सब की अपनी अपनी भावनायें अपनी अपनी सोच है।
किसी व्यवस्था मे उसके प्रबन्धन मे लचीलापन उस व्यवस्था के लिये घातक होता है, जैसे एक बाप घर की व्यवस्था मे  कई बार सख्ती से काम लेता बच्चों की बेहतरी के लिये  लेकिन माँ का व्यवहार लचीला  होता है जब माँ बच्चों की गलतियाँ  बाप से छुपाती है तो बच्चों को मनमर्जी करने की आदत पड जाती है। और कई बार आपने सुना होगा अकसर ये कहा जाता है इसे माँ ने बिगाडा है। मेरे कहने का तात्पर्य है कि जहाँ लचीलपन होता है वहीं से लोग अपने स्वार्थ का रास्ता तलाश लेते हैं। इन्सान के आपसी व्यवहार  और रिश्तों मे लचीनापन उस व्यवस्था को मजबूत करता है, लेकिन बुनियादी ढाँचे मे हानिकारक होता है। घर की नींव मजबूत हो लेकिन उपर की सज्जा अपनी सामर्थ्य के अनुसार हो यहाँ लचीलापन चलेगा लेकिन नींव मे नही। । अगर आज हमारे संविधान मे लचीलापन न होता तो शायद आज देश का ये हाल न होता। स्वतन्त्रता जब अभिशाप बन जाये तो स्वतन्त्रता के क्या मायने? पंजाबी की कहावत है कि
"भट्ठ पिया सोना जेहडा कन्ना नूँ खावे"  अर्थात उस सोने का क्या फायदा जो कानो को नुकसान दे।
 एक बात और जैसा हमारी हिन्दू संस्कृ्ति व जीवन दर्शन मे[बाकी धर्मों मे भी}, हमारे लिये रहन सहन के नियम  तय किये गये हैं क्या हम उनके अनुसार अपना रहन सहन या व्यव्हार करते हैं। नही!  हम उन्हें रूढीवादी कह कर अपने हिसाब और सुविधा से जीते हैं। तो फिर उस समय के हिसाब से चली व्यवस्था अगर समाज को हानि पहुंचा रही है तो उसे बदलने की जरूरत क्यों नही। लेकिन होगा तब जब हम अपनी सोच को इस जमाने के हिसाब से बदलेंगे। न कि लडकी को अभी भी निरीह प्राणी समझेंगे । शादी सामाजिक व्यवस्था का एक   जरूरी अंग ,इसे सार्थक और सुन्दर बनाने के लिये हमे ऐसी कुरीतियों का विरोध करना ही होगा।  इसकुरीति के चलते  न तो भ्रूण हत्यायें रुकेंगी और न दहेज हत्यायें। धन्यवाद।

18 August, 2010

शोक समाचार्

शोक समाचार
दुखी हृदय से सूचित कर रही हूँ कि मेरे छोटे दामाद ललित सूरी के छोटे भाई अनूप सूरी का देहान्त हो गया है। वो टी सी एस कम्पनी मे इन्जनीयर थे और फरवरी 2010 से कम्पनी की तरफ से अमेरिका मे थे। वहाँ उनकी एक कार दुर्घटना मे मौत हो गयी उनके साथ भारत से अभी चार दिन पहले कम्पनी से एक दोस्त गया था, उसकी भी उसी के साथ मौत हो गयी। गाडी चलाने वाला लडका बच गया। हंसते खेलते परिवार की खुशियाँ भगवान ने छीन ली। दिसम्बर मे वापिस आने पर उसकी शादी करनी थी।ाभी दोनो की लाश भारत नही आयी, शायद शुक्रवार शाम तक पहुँच जायेगी।
कुछ दिन से पता नही क्यों मन बहुत उदास था, बिना किसी कारण के ।मुझे लग रहा था कि फिर से कुछ होने वाला है। मेरे साथ ऐसा ही होता है। हमारा तो पहले ही पोर पोर दुख से भरा हुया है, ऐसी मौतों की वजह से। मुझे बस सकून इस बात का था कि मेरी बेटियाँ अपने घरों मे बहुत खुश हैं। बस यही रहता मन मे कि ये घर यूँ ही हंसते खेलते रहें। मगर भगवान के आगे किस की चलती है। मेरी बेटी को वो अपनी माँ से भी अधिक सम्मान देता था। मेरे साथ हर दो तीन दिन बाद चैट पर बात होती तो यही कहता कि मैं तो आपका बेटा हूँ,ललित आपका दामाद है। शायद अच्छे लोगों की भगवान को हम से अधिक जरूरत है। उसके माँ बाप को अभी नही बताया हुया इस लिये हम भी अभी वहाँ नही गये।  मन कहीं टिक नही रहा तो आप सब से दुख बाँटने आ गयी। मेरे बच्चों को आशीर्वाद दें कि इस दुख की घडी मे भगवान उनको हौसला दे। बस यही विनती है । आज रात की गाडी से दिल्ली  जा रहे हैं। कुछ दिन फिर नेट से दूर रहूँगी।

28 July, 2010

मेरी हालत आप खुद देख लें

 आज कल मेरा क्या हाल है, ये आप तस्वीर देख कर ही समझ सकते हैं।  बहुत् दिन से नेट से दूर हूँ। , समय नही निकाल पा रही हूँ। कुछ दिन के लिये मेरे घर मे एक परी आयी हुयी है। । अब आप खुद देखिये क्या ऐसे मे मै इसे छोड कर आपके बीच आ सकती हूँ? ।मुझे तो कँघी भी करने की फुरसत नही अगर कर भी लूँ तो भी बाल इसके हाथ मे आये नही कि बस ये हालत हो जाती है। बस हर वक्त ये चाहती है कि नानी के पास ही रहूँ? और  कहती है कि क्या आपको ब्लागिन्ग मुझ से अधिक प्यारी है? मै लाजवाब हो जाती हूँ। शैतान इतनी है कि झट से आवाज पहचान लेती है। बस मेरी आवाज सुनी नही कि कहती है नानी उठा लो। मोबाईल मे गीत सुन कर तो दूध पीती है। या फिर मै इसे लोरी सुनाती हूँ।   इस परी का नाम सावी है। मेरी सब से छोटी नातिन अभी पौने दो माहीने की है मगर मेरे कान कतर दे-- इतनी चालाक है। आज कल के बच्चे भला इतने चुस्त दुरुस्त कैसे होते हैं? पहले तो बच्चे सवा माह मे मुठी नही खोलते थे-- आँखें नही खोलते थे-- और एक ये है कि मुझ से आँख मिला कर बात करती है। कोई अच्छी सी लोरी आप भी लिख दो इसे सुनाऊँगी।
कुछ दिन मे फिर आपसे रूबरू होती हूँ । तब तक इसे आशीर्वाद दें।
हाँ दो तीन दिन पहले राजीव भरोल जी मुझे से मिलने आये थे वो आज कल कैलिफोर्निया मे रहते हैं ,अपने वतन आये तो मुझ से मिले बिना कैसे जा सकते थे? बहुत अच्छा लगा । राजीव धन्यवाद । एक दिन नीरज जाट जी का फोन आया था कि मै श्री नैना देवी के दर्शन करने आ रहा हूँ जाते हुये आपसे मिल कर जाऊँगा। उनका इन्तजार कर रही हूँ। उनको भी धन्यवाद और शुभकामनायें। बस कुछ दिन के लिये क्षमा चाहती हूँ फिर मिलती हूँ। धन्यवाद। हैपी ब्लागिंग।

21 June, 2010

चटकों का एक सच ये भी है।

चटकों का एक सच ये भी है
अज मुझे अपनी कहानी बीच मे छोद कर ये पोस्ट डालनी पडी। जो मेरी आत्मा को कई दिन से मथ रही थी। जब से मुझे अपनी गलती का एहसास हुया तब से। मगर इस गलती को मै एक ही पोस्ट  मे कई बार नही कर सकती थी, तो क्या मेरे जैसी गलतियाँ करने वाले और लोग भी नही हो सकते ब्लागजगत मे?
आज कल चट्कों टिप्पणियों को लेकर कई ब्लाग्ज़ पर जोरदार चर्चा चल रही है। और हर बात के लिये ब्लागवाणी को दोश दिया जा रहा है। लेकिन हर वो सच सच नही होता जो दिखाई देता है। मै इसमे ब्लागवाणी की वकालत नही कर रही लेकिन । मुझे नही पता कि सच क्या है। लेकिन आज एक बात सब को बताना चाहती हूँ पसंद ना पसंद को ले कर चाहती तो चुप भी रहती लेकिन मुझे लगता है मेरी इस पोस्ट से सब को सच समझने मे कुछ सहायता मिल सकती है।
जब मै नई आयी थी तो मुझे कम्पयूटर की बिल कुल भी जानकारी नही थी अब भी नही है लेकिन फिर भी काम चला लेती हूँ। लगभग कोई पोस्ट पढ कर एक साल बाद मुझे पता चला कि लोग पसंद पर चटका क्यों लगाते हैं । तब से मैने भी कई लोगों की पोस्ट पर चटके लगाने शुरू कर दिये। फिर शायद ब्लागवाणी मे कुछ परिवर्तन हुया या मैने ही ध्यान नही दिया कि नापसन्द के भी चतके होते हैं । मै कम्प्यूटर पर वो काम नही करती जिस के बारे मे पता ना हो
 नीचे जो इन सब के लिये चिन्ह होते हैं उन्हें कभी देखने की कोशिश नही की। लेकिन पसंद पर चटका लगा देती। एक दिन किसी की पोस्ट पर एक चटका लगाया तो अँकडा नही बदला फिर मैने उपर के एरो पर लगाया फिर भी आँकडा नही बदला फिर मैने उपर नीचे कई चटके लगाये मगर वो आँकडा नही बदला । मै उसे छोड कर अगले ब्लाग पर गयी। जब कुछ देर बाद फिर पीछे मुडी तो देखा कि वहाँ आँकडा बदला हुया था। तभी मैने नीचे के चिन्ह भी क्लिक किये तो वहाँ देखा पसंद और ना पसंद के चिन्ह थे। फिर मुझे अपनी गलती का एहसास हुया कि शायद मैने नापसंद पर चटका तो नही लगा दिया। अब आप इसे मेरी नालायकी कह सकते हैं मगर मुझे अपनी गलती मानने मे कोई संकोच नही। अगर इस गलती की वजह से किसी का दिल दुखा हो तो माफी चाहती हूँ। हो  सकता है मेरी नासमझी से पहले भी कभी ऐसा हुया हो। अगर ये बवाल ना होता तो शायद अभी भी मुझे ये सब पता न चलता और ना कुछ सीखने का अवसर मिलता। कहते हैं न जो होता है अच्छे के लिये होता है। अगर मेरी नालायकी या भूलवश किसी के ब्लाग पर नापसंद का चटका लग गया हो तो माफी चाहती हूँ।
इस बात से क्या आपको नही लगता कि मेरे जैसे अनजान लोग और भी इस ब्लागजगत मे हो सकते हैं? या इस के इलावा शरारती तत्व किसी को भडकाने के लिये ऐसा कर सकते हैं? कौन किस के कन्धे पर बन्दूक चला रहा है? इस सारे सच पर सब को आत्म मन्थन करना चाहिये। आप कैसा लिखते हैं ये सभी जानते हैं फिर पसंद ना पसंद क्या मायने रखती है?इस बात पर बवाल मचाने की क्या बात है। एक दिन मेरी कहानी पर 4 चटके लगे थे पसंद के मुझे नही पता कौन मेरे शुभचिन्तक हैं मगर उस दिन भी मेरी पोस्ट ब्लागवानी की पसंद लिस्ट मे नही थी। कुछ भी कारण हो सकता है, मगर बिना सच जाने किसी को दोश देना कहाँ की समझदारी है? फिर मेरे जैसे लोगों ने तो अपनी सृजन यात्रा ही ब्लागवाणी से शुरू की है इसके आँचल मे ही अपनी आँखें खोल कर नई दुनिया मे प्रवेश किया।
 इस लिये सभी से एक निवेदन है कि हर दोश ब्लागवाणी पर थोपने से पहले सच जान लें। मेरे जैसे सच और भी हो सकते हैं।
 ब्लागवाणी आपसे अपनी सेवा के बदले कुछ लेती नही है। हम जैसे तकनीक से अनजान लोगों के लिये सब से आसान और अच्छा साधन है। कम से कम जो लोग ब्लागवाणी से जुडे रहना चाहते हैं उन पर रहम खाईये। अगर और कोई ब्लागवाणी की जगह लेना चाहता है तो उनकी तरह निश्काम भाव से काम कर के दिखाये उसका भी स्वागत होगा, मगर ब्लागजग्त का माहौल खराब कर के नहीं। और ब्लागवाणी को इन शरारती तत्वों की बातों मे आने की जरूरत नही । हम जैसे लोगों के जज़्बात का भी ध्यान रखें और जल्दी से जल्दी ब्लागवाणी शुरू करें। ये मैथिली जी और सिरिल जी से विनती है कि इन छोटी छोटी बातों पर गौर मत करें हिन्दी के उत्थान जैसे महाँ यग्य मे उनकी आहूति को कौन नही जानता फिर महानता किसी के दोश देखने मे नही उन्हें माफ करने मे या नज़र अन्दाज़ करने मे है।

13 June, 2010

apanee baat

अपनी बात 
पंजाबी मे एक कहावत है "जो सुख छजू दे चौबारे ओह[वो] न बल्ख ना बुखारे". कहीं भी घूम आओ मगर जो सुख अपने घर मे आ कर मिलता है वो कहीं नही।ापने वतन वापिस लौट आयी हूँ। एक बात बार बार मन मे आ रही है कि विदेश मे सब कुछ यहाँ से बडिया था मेरे बच्चे थे प्यारी प्यारी दो नातिनें थी जिन के साथ मन भी लगा हुया था मगर फिर भी अअने घर वापिस लौटने की जल्दी थी।क्या है इन दिवारों मे .इस मिट्टी मे जो गुरुत्व आकर्षण की तरह हमे खींचता है जब कि यहाँ हम दोनो बिलकुल अकेले हैं।अगर वहाँ का रहन सहन और वातावरण देखूँ तो वहाँ कई दर्जे अच्छा था।बच्चे चाहते थे कि हम और रहें मगर दिल्ली मे छोटी बेटी की डिलैवरी होने वाली थी और वहाँ भी एक और लक्षमी हमारा इन्तजार कर रही थी। 2 जून को हमारी फ्लाट थी 3 जून को हम दिल्ली पहुँचे और वहाँ 4 जून को मेरी छोटी बेटी के बेटी हुयी। तबीयत खराब होने की वजह से मै दिल्ली भी नही ठहर पाई और  5 रात को हम  देल्ही से ट्रेन दुआरा अपने घर नंगल पहुँच गये । मुझे शायद  अमेरिका का पानी माफिक नही बैठता पिछली बार भी मै वहाँ से बीमार हो कर आयी थी और इस बार भी।अभी आराम कर रही हूँ। बहुत दिनों से कुछ लिखा नही है वहाँ जा कर जैसे सब कुछ भूल गयी हूँ कोई कविता कहानी अभी मन मे नही आयी। अभी तो ऐसे लगता है जैसे अब कुछ लिख नही पाऊँगी। बहुत दिनो की अनुपस्थिती के चलते बस पोस्ट लिखनी है इस लिये ये कुछ शब्द लिख रही हूँ। अभी तबीयत ठीक होते ही छोटी बेटी के पास शायद दिल्ली जाना पडे। कुछ परेशानियों के चलते अभी कुछ दिन और शायद कुछ न लिख पाऊँ।एक तो गर्मी भी बहुत है, वहाँ बहुत ठंड थी इस लिये और भी मुश्किल लग रहा है। कुछ दिनो मे वहाँ के कुछ संस्मरण लिखूँगी अगर सेहत ठीक रही तो। ये चार शब्द केवल अपनी अनुपस्थिती को पूरा करने के लिये ही लिख रही हूँ। लिखने को बहुत कुछ है मगर शब्द और दिमाग साथ नही दे रहा।और फिर अपने दोस्त मित्र और रिश्तेदार मिलने के लिये आ रहे हैं उन सब के बीच भी लिखने का समय नही निकाल पा रही।आप सब को पढ कर शायद फिर से कलम चलने लगे।

19 May, 2010

कैलिफोर्निया ब्लागरज़ मीट

कैलिफोर्निया ब्लागर मीट
विदेश मे किसी हमवतन दोस्त मित्र् के मिलने पर जो खुशी  मिलती है वो शब्दों मे नहीं कही जा सकती। अमेरिका आने के बाद पता चला कि डा़ श्रीमती अजित गुप्ता जी भी अमेरिका आ रही हैं और वो भी जिस सिटी मे मै आयी हूँ वहाँ, तो खुशी का ठिकाना नही रहा। वो चार मई को कैलिफोर्निया आयी तो अगले दिन फोन पर बात हुयी। बस फिर क्या था ब्लागर मीट का स्थान और समय तय हो गया। स्थान था मैन्शन  ग्रोव  सान्टा क्लारा मेरी बेटी के घर पर , 11 मई को शाम 6 बजे । लेकिन वो आयी इन्डियन स्टैन्डर्ड टाईम पर मतलव 7 बजे।[ अजित जी मजाक कर रही हूँ बुरा न मानें]
मै अजित जी को बहुत पहले से जानती थी जब वो ब्लागर भी नही थी। जब वो मधुमती पत्रिका की सम्पादक बनी तब से और कुछ पढूँ या न पढूँ उनके सम्पादकीय जरूर पढती थी। उनसे मिलने की इच्छा जरूर थी मगर लगता नही था कि कभी मिलेंगे। फिर जब ुन्होंने अपना ब्लाग बनाया तो मुझे सब से अधिक खुशी हुयी। अब तक जो उनकी छवी उनकी तस्वीरें देख कर बनी थी लगता था कि उम्र मे मुझ से बडी होंगी लेकिन उस दिन देखा तो हैरान  रह गयी । वो तो मुझ से भी छोटी हैं। है तो दो साल छोटी मगर देखने मे कई साल छोटी लगती हैं उनकी भोली सी सूरत और सौम्य सा चेहरा देख कर मै तो मोहित हो गयी। उनके साथ उनके पति उनका बेटा और बहु भी थे। उनका बेटा यहाँ सिस्को कम्पनी मे कार्यरत है। हम भारतितों मे एक खासियत है कि हम चाहे किसी भी राज्य से सम्बन्धित हों मगर हम एक दूसरे से जब भी मिलते हैं कहीँ न कहीँ  अपनी जान पहचान निकल ही आती है। उस दिन भी अइसा ही हुया अजित जी ने बताया कि वो भारत विकास परिषद् संस्था की राष्ट्रीय चैयरपर्सन हैं, इस सिलसिले मे वो यहाँ आने से पहले  पठानकोट [पंजाब्] गयी थी। मेरे दामाद ने कहा कि पठानकोट तो मेरा घर है, आप वहाँ किसे जानती हैं उन्होंने बताया कि मेरे बेटे के बहुत पक्के  दोस्त वहाँ रहते हैं
 जब उन्होंने उसका नाम बताया तो वो मेरे दामाद के कजिन निकले बस फिर तो और कई सूत्र मिलते गये और कई यादें ताज़ा होती रही। उनके पति डाक्तर गुप्ता जी भी बहुत मृ्दु स्वभाव के हैं बेटा बहुत भी बहुत मिलनसार हैं। बहु ने यहाँ से डेण्टिस की डिग्री ली है उसी समारोह मे भाग लेने के लिये अजित जी अमेरिका आयी हैं। लगभग तीन घन्टे तक हम लोग खूब गप्पें लडाते रहे।जित जी मेरे लिये अपनी पुस्तक बौर आये बौराँऊँ नहीं{ सांस्कृतिक  निबन्ध] की पुस्तक उपहार सवरूप लाई थी मैने उन्हें अपनी कहानी पुस्तक प्रेम सेतु भेंट की। इस तरह खाते पीते हंसते बातें करते हमारा ब्लाग सम्मेलन समाप्त हुया। आज कल वो लास अन्ज्लेस गयी हैं उनके आने पर मै भी उनके घर जाऊँगी सब से बडी बात है कि मेरी बेटी के घर और उनके घर मे वाकिन्ग डिस्टेन्स है। पैदल सैर करते हुये निकल जायेंगे।   ब्लाग पर भी कुछ चर्चा हुयी मगर अधिक नही। की हाँ  बच्चों ने जरूर हमारी ब्लाग मीट पर फबतियाँ कसी। अब पते की बात ये है कि अगर हम दोनो ब्लागर न होती तो क्या अइसे विदेश मे मिल पाती? आखिर ब्लाग से ही एक दूसरे के इतना करीब आने का अवसर मिला। काश अइसी ब्लागमीट फिर से हो। तस्वीरें देखें और कामना करें कि एक ब्लागमीट यहाँ अइसी हो जिस मे बहुत बडी संख्या मे हम लोग{हिन्दी ब्लागर्ज़्} इकठे हों। क्या अइसा हो सकता है? आप लोग सोचें फिर मिलते हैं। हाँ 22 मई को यहां  एक कवि सम्मेलन है मगर बच्चे हमे लास एन्जलेस घुमाना चाहते हैं शायद वो कवि सम्मेलन मै न देख पाऊँ। अगर देखा तो जरूर रिपोर्ट लिखूँगी।पोस्ट बहुत जल्दी मे लिखी है किसी दिन दोबारा पूरा ब्योरा लिखूँगी।

04 May, 2010

पनी बात

अपनी बात
 आज कुछ समय मिला है। सोचा ब्लाग पर हाजरी लगा लूँ। भारत की बहुत याद आ रही है सच कहूँ अपने देश जैसा सुख कहीं नही है न ही अपने देश जैसी आजादी। विदेश मे तो हर काम को अपनी सीमा मे करना होता है ।सुबह से शाम तक जितने भी व्यक्तिगत काम से ले कर आफिस तक सब की सीमायें बाँध रखी हैं अब देखिये सुबह नित्यक्र्म से निव्रित होने से नहाने तक का समय मुझे अपने  लिये तो अभिशाप सा लगता है। मर्जी से अपने शरीर की सफाई भी नही कर सकते। एक कविन्टल शरीर पर फवारा चार बारिश की बून्दों जैसा आभास देता है। वहाँ अपने घर मे बडी सी बाल्टी और एक बडा सा लोटा जितने मर्जी भर भर के लोटे शरीर  पर डालो पता चलता था कि हम नहा कर आये हैं और अमेरिका मे एक तरफ से फवारे से नहा कर हटो तब तक दूसरी साईड सूख जाती है। बाथ टब मे बैठ कर नहा तो सकते हैं मगर वो इतना छोटा लगता है कि मेरा तो दम घुटने लगता है। उसके बाद किचन मे आओ तो बिजली के हीटर हैं जिन्हे न तो एक दम कम किया जा सकता है और न अधिक । आपकी कोई सबजी चाय आदि उबल रही है तो उसे कम गैस पर नही कर सकते बस बन्द करना होगा या किसी दूसरे चुल्हे पर रखें जो उससे कम बिजली वाला हो। उपार से पूरी हीट आपके मुँह पर लगती है। अपना गैस स्टोव तो है नही कि जरा सा परे सरका दिया, ये भी मुझे बहुत मुश्किल लगता है। मगर ये भारत तो है नही कि अपनी मर्जी से आप जिस तरह की चीज़ चाहिये ले लो। हमे गैस न अच्छी लगे तो स्टोव सही, नही तो अंगीठी है, चुल्हा है, मिट्टी के तेल का स्टोव है मतलव आपके पास बहुत सी आप्शन्ज़ हैं फिर गैस का चुलहा जितना मर्जी कम या अधिक पर चलाओ। हर काम के नियम आपको सडक पर चलना है तो नियम शापिन्ग के लिये जाना है तो नियम । अपनी काम वाली कितनी अच्छी होती है अगर कोई बर्तन अच्छा नही माँजा तो  उस बेचारी को हजार बातें सुना डालते हैं और यहाँ मशीन मे बर्तन मंजते हैं। हमारे भारतिय तडके से जले बरतन बेचारी मशीन के बस मे कहाँ? किसे कहें बस मन मसोस कर खुद ही रगडने पडते हैं । सफाई की छुट्टी ही रहती है। हफ्ते बाद वैक्यूम कलीनर से सफाई होती है वर्ना मैट पर किसी गन्दगी का क्या पता चलता है डुस्ट तो होती नही है। अगर देखा जाये तो यहाँ काम बहुत कम है अधी चीज़ें तो रेडीमेड ही होती हैं सब्जियाँ कटी हुयी ले लो चपाती भी अगर रेडीमेड लेनी है तो वो भी मिलती है मगर भारतिय लोग ताजी ही बनाते हैं। अपना तो भारत मे सारा दिन काम ही खत्म नही होता। बर्तन मशीन मे कपडे मशीन मे । प्रेस करने का झंझट कम सभी लोग यहाँ अइसे कपडे पहनते हैं जिन्हें प्रेस का झंझट न हो।मगर यहाँ की मशीन मे अपने  कपडे तो पोचे ही बन गये हैं।

अब असली बात पर आती हूँ। यहाँ आ कर एक बात का आभास हुया है कि इन काम वालियों ने हम ग्रहणियों को किस कदर बिमार बना डाला है। घर की सफाई और कई काम अब चाह कर भी हम से नही होते जब कि विदेश मे सभी काम खुद करने पडते हैं। कई लोग जो दोनो मियाँ बीवी यहाँ काम करते हैं उन्हें हफ्ते बाद भी अपने घर साफ करने का समय नही मिलता तो भी चलता रहता है। 2-4 माह बाद कभी वैक्यूम कलीनर चला लिया बस। मेरी बेटी को घर साफ रखने की बहुत बडी बीमारी है ओर मै तो कम से कम बीमारी ही कहूँगी जरूरी काम छोड देगी, मगर घर साफ करना नही। उसे पता है मुझ से अब अधिक काम नही होता। खुद उसका आपरेशन हुया है तो कुछ दिन बिस्तर पर लेटना पडा। मुझे डुस्टिन्ग का काम इसलिये मुश्किल लगता कि उसके लिये मुझे स्टेप स्टूल ले कर उपर चढना पडता और मुझे डर रहता कि कहीं गिर न जाऊँ दूसरा मुझे उन पर कहीं डस्ट नजर नही आती तो रहने देती। मगर बेटी को तो जैसे घर ही भूतों का डेरा लगने लगा उसे हर चीज़ अपनी जगह से हिली हुयी दिखाई देती  मुझे तो कुछ कह नही सकती थी और न ही खुद कर सकती थी इस लिये उसने एक काम वाली को बुलाया कि सफाई करनी है। मैने पूछा कि क्या यहाँ काम वाली मिल जाती है तो उसने बताया कि सफाई के लिये मिल जाती है वो पहली बार घर साफ करने का 100 डालर लेती है जिस मे वैक्यूम कलीनर और दुस्टिन्ग आदि तथा बाथरूम सब कुछ बहुत अच्छी तरह साफ करती हैं उसके बाद वो हर 3 हफ्ते बाद आती हैं और तब 60 डालर  एक विजिट के लेती । मुझे हैरानी हुयी मैने कहा इतने पैसे क्यों देने हम खुद साफ कर लेंगे। उसने कहा मम्मी आप एक बार देखना तो सही उनकी सफाई घर नया लगने लगता है। हम या आप जितना भी जोर लगा लें उन जैसा काम नही कर सकते।
बेटी ने मेरे मना करने के बावजूद भी उसे आने के लिये कह दिया। वो चार लोग आये एक माँ और तीन बहने। वो मैक्सीकन थी। यहाँ अधिकतर मैक्सीकन लोग ही सफाई आदि का काम करते हैं। उन्हों ने आते ही अपना अपना मोर्चा सम्भाल लिये एक ने किचन एक बाथरूम और दूसरी शीशे साफ करने लगी। उनकी माँ डुस्टिन्ग करने लगी । अपने हथियार वो साथ ले कर आयी थी
 पता नही कितनी तरह की सोल्यूशन्ज़ थी, टूल थे। सही मे  चार घन्टे मे घर एक दम नया लगने लगा था कहीं किसी दिवार पर या किसी जगह कोई दाग नही था। नातिन ने जगह जगह स्केच पेन से निशान डाल रखे थे सब गायब थे बाथ टुब और बाथरूम की दिवारें चमक रही थी एन्टेरटेनमेन्ट सेन्टर जैसे अभी नया खरीदा हो उसे सपिरिट से साफ किया था हर टेबल खुर्सी सपिरिट से चमका दी थीऔर इस हिसाब से 100 डालर बच्चों के लिये कोई बडी रकम नही थी । कुछ भी हो मै तो एक माह मे भी इतने पैसे अपने काम वाली को न दूँ वो चाहे अपनी जान भी लगा दे। यही तो फर्क है, यहाँ काम के पैसे मिलते हैं हमारे यहाँ कुर्सियाँ तोडने के पैसे मिलते हैं हड्डियाँ तोडने वाले को तो रोटी भी नसीब नहीं। इतने दिनो मे कहीं भी नही लगता कि सफाई की जरूरत है मगर बेटी को लगता है तो कल 3 हफ्ते हो जाने हैं कल वो फिर आयेंगी। इस लिये आज मैने कई सफाई के काम छोड दिये हैं और पोस्ट लिखने बैठ गयी वैसे आज कल बेटी भी काम करने लगी है मुझे तो बच्चों के साथ खेलने का काम होता है या फिर कहीं घूमने जाने का । इस लिये नेट पर नही आ पाती। \ आज बस इतना ही बाकी फिर सही । जल्दी जल्दी मे गलतियों की ओर ध्यान मत दें इसे दोबारा देख नही सकती। हाँ कल का उतसुकता से इन्तजार है यहाँ श्रीमति अजित गुपता जी आ रही हैं और खुशी की बात ये है कि वो स्थान मेरे पास ही है। दो दिन पहले श्री राकेश खन्डेलवाल जी से बात हुयी उन्हें भी मिलूँगी वो भी यहाँ किसी कवि सम्मेलन मे भाग लेने आ रही हैं मै भी सुनने जाऊँगी। भाग नही ले सकती क्यों कि उनका समय और कार्यक्रम पहले ही फिक्स हो चुका है। हाँ उनसे मिल जरूर सकूँगी।




06 April, 2010

खुशखबरी

मेरे घर आयी एक नन्ही परी
आप सब को ये जान कर खुशी होगी कि मेरी बेटी के बेटी हुयी है। 4 अप्रेल को सिजेरियन करवाना पडा जब कि अभी ड्यू डेट 30 अप्रेल थी । खैर दोनो माँ बेटी स्कुशल हैं।मगर अभी अस्पताल मे हैं ।मेरी व्यस्तता और बढ गयी है। बस आप सब को खुशखबरी सुनाने ही आयी थी। हाँ अगर कोई अच्छा सा नाम सुझा सकें तो जरूर सुझायें और बच्ची को आशीर्वाद दें। कुछ दिन और किसी भी ब्लाग पर नही आ पाऊँगी , क्षमा चाहती हूँ।

03 April, 2010

इधर उधर की

इधर उधर की
सोचा था अमेरिका जा कर रोज़ पोस्ट लिखा करूँगी, रोज़नामचे की तरह मगर कुछ दिन तो जेट लैग की वजह से नही लिख पाई फिर एक दो दिन घूमने चले गये और अब फ्लू ने घेर लिया। यहाँ फ्लू इतना भयानक फैला हुया है कि एक बार पकड ले तो छोडने का नाम नही लेता ।भारत की बहुत याद आ रही है। मेरे पतिदेव का तो बिलकुल मन नही लग रहा। कहाँ तो सारा दिन इतने लोगों से मिलना जुलना और कितनी जगह आना जाना कहाँ अब दिन भर कमरे मे बन्द रहना । शाम को चाहे रोज़ घूमने जाते हैं मगर ठंड इतनी पड रही है , बारिश दो दिन से लगातार हो रही है सैर करने भी अधिक देर नही जाया जाता। घर मे हीटर लगा कर बैठे हैं। नातिन स्कूल गयी है बेटी की डाक्टर के पास एपोईँटमेन्ट थी वो लोग भी गये है, तो सोचा 10 मिन आपलोगों से बात कर लूँ।सामने खिडकी मे से बहुत सुन्दर नज़ारा दिख रहा है, बहुत सुन्दर गार्डन पीछे पहाड सब कुछ उजला सा , सोचा शायद कोई कविता लिख पाऊँ मगर दिमाग मे एक शब्द भी नही आ रहा, पता नही क्यों लगता है कि कहीं कुछ मिस्सिन्ग है शायद हवा मे अपने देश की मिट्टी की खुश्बू नही है वो एहसास नही हैं, कुछ तो है जो कुछ भी लिख नही पा रही। नींद नही आती अपना बिस्तर और घर याद आता है। शायद उस बिस्तर की सलवटों मे कुछ लोरियाँ कुछ एहसास हैं जो मीठी नींद ले आते हैं। बेशक यहाँ बहुत कुछ अपने देश से अच्छा भी है मगर अपने देश जैसा प्यार और मेल जोल नही है। इस मैंशन मे भारत्तीय लोगों ने आपस मे बहुत अच्छे सम्बन्ध बना रखे हैं, मुश्किल मे एक दूसरे का साथ भी देते हैं। कितने दिन से मेरी बेटी बहुत बिमार थी तो उसकी सहेलियाँ ही बारी बारी से खाना बना कर भेजती रही और उसे पूछती रही। हम लोग आये तो मिलने भी आयी। और हमे अपने घर भी बुलाया है। छुट्टी के दिन जायेंगे।एक दिन सैनफ्राँसिसको घूमने गये तो पतिदेव की तबीयत खराब हो गयी । सफर मे मन खराब होने लगता है।इस हफ्ते लास एन्जलेस् जाने का विचार था मगर कपिला साहिब मान नही रहे। देखते हैं अगर सब की तबीयत ठीक हुयी तो जायेंगे। सैन्फ्रांम्सिसको के भ्रमण का हाल फिर लिखूँगी। ये पोस्ट इस लिये लिख रही हूँ कि कहीँ आपलोग मुझे भूल ही न जायें।


17 February, 2010

रिटायरी कालोनी {अपनी बात}

रिटायरी कालोनी
शायद अपना घर सब का ही सपना होता है। फिर जब आदमी अपने जीवन का सुनहरी समय सरकारी मकान मे रह कर गुज़ार दे तो उसके लिए तो अपना घर और भी अहम बात हो जाती है। फिर जब आदमी रिटायर होने के करीब आता है तो लोग अक्सर ये सवाल करने लगते हैं * अपना घर बना लिया *--- कहाँ बना रहे हैं अपना घर?* आदि आदि
मुझे भी जब एक साल रिटायर होने मे रह गया तो हम ने भी अपना घर बनाने की सोची। नंगल शहर मे तकरीबन पूरी जमीन भाखडा ब्यास मैनेजमेन्ट बोर्ड ने आकुपाई कर रखी है ,बस एक आध प्राईवेट आबादी है| बाकी प्राईवेट आबादियां साथ लगते गाँवों से जमीन ले कर बनाई जा रही हैं साथ ही नया नंगल की पूरी जमीन नेशनल फर्टेलाईजेशन कम्पनी ने ले रखी है। वहां भी आस पास के गाँवों से जमीन ले कर ही आबादियां बन रही हैं। नंगल मे जो कुछ वर्ष रह लिया उसका नंगल से जाने का मन नही होता। हम ने भी सोच लिया कि नया नंगल के पास जो कालोनी बनी है,वहीं घर बनायेंगे बडी साफ सुथरी है और रेल्वे स्टेशन , बस स्टैंड आदि की बडी सुविधा है।
 जब मुझ से कोई पूछता कि घर कहाँ बना रहे हो तो मैं बडे गर्व से  कहती शिवालिक एवन्यू मे। क्यों की वहाँ घर बहुत अच्छे बने हुये हैं। सुनते ही उनके चेहरे का रंग बदल जाता * अच्छा वो रिटायरी कालोनी मे* और मुस्कुरा देते, कई तो यहाँ तक कह देते वहाँ मत बनाओ आपका दिल नही लगेगा।। मुझे समझ नही आती कि उस कालोनी मे ऐसा क्या है? आखिर रिटायर हुये लोग भी कहीं तो रहेंगे ही। भाखडा डैम  से और एन. एफ. एल. से ही रिटायर लोग वहाँ अधिकतर रहते हैं। रिटायर होते होते बच्चे पढने या नौकरी करने बाहर निकल जाते हैं। बहुत तो अभी कही पर्मानेन्ट सेट नही हुये होते इस लिये माँ बाप को अपना बसेरा बनाना ही पडता है। खैर मैने किसी की बात पर कभी अधिक ध्यान नही दिया। जब अपना घर बन गया तो वहाँ शिफ्ट हो गये। नंगल मे अपना पास पडोस बहुत अच्छा था। लगभग हर उम्र के लोग उस कालोनी मे थे। ाक्सर ही किसी न किसी के घर कोई न कोई उत्सव आदि होते रहते। बच्चों  के जन्म दिन ,किसी की शादी की वर्षगाँठ, किसी के मुन्डन, कभी किट्टी पार्टी कुछ न कुछ चला ही रहता।अगर और कुछ नही तो सब मिल कर पिकनिक का  प्रोग्राम  बना लेते।     इस कालोनी मे जब आये तो सभी लगभग अकेले पति पत्नि किसी किसी के साथ बच्चे रहते थे। यहाँ हाल ये है कि आये दिन  किसी की मौत हो गयी, किसी की बारखी है किसी के चवर्ख है ,कोई बिमार है। मतलव कहीं न कहीं अफसोस पर जाना ही पडता है। या अधिक से अधिक हुया तो कीर्तन आदि होता है। इन लोगों के लिये मनोरंजन केवल कीर्तन या धार्मिक उत्सव ही है। हर घर का एक अलग गुरू है मतलव बाबाओं की खूब चाँदी है। उन मे से कुछ एक दो ऐसे बाबा हैं जिनकी बाबा बनने से पहले की कुछ करतूतें  अस्पताल मे नौकरी के दौरान देख चुकी थी। इन के बारे मे एक अलग पोस्ट मे लिखूँगी।बहुत लम्बी लिस्ट है। 2 साल से उपर हो गये केवल गली मे एक समारोह, हमारी बेटी की शादी हुयी। मगर पुराने शहर से अब भी शादी व्याह आदि के बहुत निमन्त्रण आते हैं।
अब मुझे पता चला है कि लोग इसे रिटायरी कालोनी कह कर क्यों नाक मुँह चढाते थे। दूसरा सभी उम्र के आखिरी पडाव पर हैं अपना खाना ही मुश्किल से बनता है अगर पडोसी बिमार हो जाये तो कौन उसकी मदद करे। वहां जरा सा बुखार भी हुया कि सभी देख भाल मे लग जाते थे। आपस मे मिलने जुलने का भी कम ही रिवाज है, किसी के घुटने दर्द कर रहे हैं तो किसी को कोई न कोई बिमारी है। वैसे सभी एक ही शहर के होने के नाते एक दूसरे को जानते हैं। भगवान का शुक्र है कि मेरा पडोस बहुत अच्छा है। आस पास दोनो घरों मे बेटे बहुयें हैं उनकी। बाकी पूरी दोनो गलियों मे केवल बूढे पति पत्नि रहते हैं । ये तो भला हो इस ब्लागिन्ग का कि मुझे व्यस्त रहने के लिये एक काम मिल गया है । खूब दिल लगा हुया  है । अगर रिटायरी कालोनी मे बिना ब्लागिन्ग के रहना पडता तो शायद मैं भी अब तक बिमार हो जाती। वैसे मेरी कालोनी बहुत अच्छी है। हर जगह का अपना अपना महत्व होता है। सोच मे पड जाती हूँ कि कैसा समय आ रहा है जहाँ आज माँ बाप को अकेले रहने को मजबूर होना पड रहा है । शायद हर छोटे शहरों मे जहाँ बच्चों के लिये अच्छी नौकरियाँ नहीं हैं वहाँ ऐसी ही रिटायरी कालोनीस जगह जगह बन जायेंगी।  तो ब्लागवुड  की जय बोलिये। कहीं यहाँ ही कोई रिटायरी कालोनी तो नही़ बन जायेगी? हम बुढों के ब्लाग जरूर देख लिया कीजिये उत्साह बना रहता है। कम से कम ये तो नही लगेगा कि हम रिटायरी कालोनी मे रहते हैं।

13 January, 2010

क्या ये नशा है?
सब ओर एक अजीब सा सन्नाटा। अभी बच्चों के जाने के बाद 2-3 दिन मे सब कुछ ठीक हो गया था फिर आज क्या हुया? समझ नहीं आ रही थी। घर की हर चीज़ जैसे मायूस सी थी । घर की हर चीज़ जैसे मुझ से नज़रें चुरा रही थी। सब कुछ अजनबी सा लग रहा था सोचा चलो आज फ्री हूँ कुछ सफाई कर लेती हूँ। तस्वीरें उठा कर साफ करने लगी तो वो भी उदास । नातिन की एक गुडिया यहाँ रह गयी थी उसे साफ करने लगी तो वो जैसे रोने लगी कि उसके जाने के बाद मैने उसे भी नहीं पूछा। खैर किसी तरह सब काम निपटाया। नाश्ता किया । काम खत्म । अब  क्या किया जाये? बस घए मे एक मात्र प्राणे हमारे पति देव मन्द मन्द ,मुस्कुराते नज़र आये तो इनसे कहा कि चलो आज किसी के घर हो आते हैं बहुत दिन हो गये तो व्यंग से मुस्कुराये --हाँ आज तुम फ्री  हो न मगर मुझे बहुत काम है। बस आ कर अपने बिस्तर मे बैठ गयी । जनाब एक बजे तक 3 गज़लें तडा तड लिख लीं-- है न चमत्कार? फिर खाना बनाया। आराम किया । शाम को इन से कहा कि चलो अब एक ताश की बजी लगाते हैं मगर जनाब ऐसे नाराज़ कि कहते मुझे खेलना  भूल गया।शायद मुझे इस ब्लाग के नशे के बिना जीना सिखा रहे थे। मैं तो तंग आ गयी अब समय कैसे बिताया जाये फिर उठा ली कलम कागज़ दो गज़लें और लिख ली। खुद भी हैरान हूँ। बहुत मुश्किल से वो दिन बिताया आगले दिन फिर वही हाल अब तो कलम उठाने को भी मन नहीं किया।
 बस सोचती रही कि इतनी उदास क्यों हूँ। क्या आप सब को समझ आया? नहीं न तो बताये देती हूँ दो दिन से कम्पयूटर खराब था ब्लाग पर जो नहीं आ पाई थीूअपने ब्लाग परिवार से दूर रही तो उदास तो होना ही था । या ये नशा था ब्लाग का? या आप सब का स्नेह? आप बतायें। आज लिखने को कुछ नहीं वो गज़लें अभी पास होने के लिये भेजनी हैं।अज एक पुरानी कविता से काम चला लेते हैं। कल मिलते हैं एक नई रचना के साथ । नमस्कार ।
कविता
सतलुज की लहरों ने
जीवन का सार बताया
सीमा मे बन्ध कर रहने का
गौरव उसने समझाया
कहा! उन्मुक्त बहूँ तो
सिर्फ उत्पात मचाती हूँ
भाखडा बान्ध मे हो सीमित
गोबिन्द सागर कहलाती हूँ
देती हूँ बिजली घर घर
फस्लों को पानी पहुँचाते हूँ
पीने को पानी देती हूँ
सब को सुख पहुँचाती हूँ
जो समाज के नियम मे जीयेगा
वही इन्सान कहायेगा
जो तोडेगा इस के नियम
वो उपद्रवी कहलायेगा
तुम भी अनुशास्न मे रहना सीखो
मानव धर्म कमाओ
सतलुज की लहरों की मानिंद


30 December, 2009

सन 2009  तेरा शुक्रिया

वर्ष 2009 का जाते हुये धन्यवाद न करूँ तो ये कृ्त्घ्नता होगी। अगर मैं कहूँ कि ये साल मेरी ज़िन्दगी का सब से खूबसूरत और खुशियाँ देने वाला साल रहा तो गलत न होगा। प्यार रिश्तों का मोहताज़ नहीं होता। अन्तर्ज़ाल जैसी आभासी दुनिया मे भी रिश्ते कैसे फलते फूलते हैं ये महसूस कर अभिभूत हूँ।
जो प्यार और सम्मान मुझे इस साल मे मिला है उसकी तुलना  दुनिया की किसी भी दौलत से नहीं की जा सकती ।। इस ब्लाग जगत ने मुझे अथाह प्यार दिया है, जिस मे अपने सब दुख तकलीफें अकेलापन यहाँ तक कि अपनी बिमारी भी भूल गयी हूँ। सब से बडी उपल्ब्धि मुझे दो भाईयों का प्यार बहुत मिला है। बडे भाई साहिब श्री प्राण शर्मा जी ने जो स्नेह और आशीर्वाद मुझे दिया है उससे मेरी ऊर्जा कई गुना बढ गयी है । आज कल किस के पास इतना समय है। वो मुझे गज़ल ही नहीं सिखाते और भी बहुत अच्छी अच्छी बातें सिखाते  हैं । उनसे बात करके हमेशा खुद को पहले से सबल पाया है। जब मैने गज़ल सीखनी शुरू की तो मैं कहती थी कि मुझे कभी भी गज़ल लिखनी नहीं आ सकती मगर उन्होंने मुझे हमेशा उत्साहित किया। बेशक अभी अधिक अच्छी गज़ल कह नहीं पाती मगर गज़ल के गुर सीख रही हूँ। जब ब्लागिन्ग शुरू की थी तब मुझे कविता और गज़ल मे अन्तर नहीं पता था मगर भाई साहिब के स्नेह, पेशैंस और आशीर्वाद ने सीखने की राह आसान कर दी। उनकी ऋणी हूँ। उसके बाद छोटे भाई श्री पंकज सुबीर जी 01 ने मुझे *दी* कह कर अपने स्नेह मे बाँध लिया है। 1973 और 1983 मे दो भाई खोये थे और 2009 मे दोनो को पा लिया इससे बडी उपल्ब्धि और क्या हो सकती है। इसके बाद राज भाटिया जी ने भी यही सम्मान मुझे दिया। यूँ तो और बहुत से नाम हैं मगर इन से जो प्यार और सहयोग मिला उस की मिसाल नहीं है। दूसरी सब से बडी उपल्ब्धि है मुझे अर्श { प्रकाश सिंह अर्श} जैसा बेटा मिला इस के बारे मे इतना ही कहूँगी कि वो मेरी हर मुश्किल का हल है और मेरे हर सवाल का जवाब है,  हर दुख ,सुख उस से कह लेती हूँ। फिर अच्छे बच्चों की तरह मुझे मश्विरा देता है ।हाँ मेरी गलती पर मुझे डाँट भी देता है।--- मुझे शब्द नहीं सूझ रहे कि उसके लिये क्या कहूँ। इसके बाद दीपक मशाल ने मुझे बहुत सम्मान दिया। यहाँ तक कि वो मुझ से मिलने मेरे पास नंगल भी आये। उसका प्यार और सम्मान पा कर अभिभूत हूँैआज के युग मे ऐसे बच्चे मिलना सच मे बहुत मुश्किल है। इसके बाद मुझे  प्रकाश  गोविन्द जी मिले उनकी क्या कहूँ बस निशब्द हू। इन बच्चों के संस्कार देख कर इनके माँ बाप को सलाम करती हूँ। प्रकाश गोविन्द जी ने मुझे बहुत कुछ सिखाया और हमेशा बहुत कुछ करने की प्रेरणा भी दी मगर मैं ही नालाय्क हूँ अभी तक उन  आपेक्षाओं पर खरी नहीं उतर सकी।इसके अतिरिक्त दर्पण शाह , ने भी बहुत सम्मान दिया है। एक नाम जो मैं बडे गर्व के साथ लेना चाहूँगी वो गौतम राज रिशी जी का है उनके सम्मान और प्यार के लिये भी उनकी ऋणी हूँ। मिथिलेश दुबे छोटे बच्चों की तरह मुझ से बहुत प्यार करता है। कुलवन्त हैपी, लोकेन्द्र विक्रम सिंह  अर्विन्द, धीरज शाह  महफूज़,प्रवीण पथिक, रविन्द्र्,    इम सब ने मुझे बेटोंजैसा प्यार और सम्मान दिया। एक नाम जिस ने एक दम मेरे सामने उपस्थित हो कर मुझे हैरान कर दिया वो थे श्री अकबर खान राणा जी ।मुझे कहते कि आपका आशीर्वाद लेने आया हूँ सोचिये उस समय मेरी खुशी का कोई ठिकाना था?। आज कह सकती हूँ प्यार रिश्तों का मोहताज नहीं होता मुझे ये सभी बेटे अपनी लगते हैं। शायद अपना होता तो कभी पूछता भी नहीं। इसके बाद अपनी बेटियों का नाम भी लेना चहूँगी। एडी सेहर, विनीता यशस्वी, कविता रावत , रश्मि रविज़ा,कविता राजपूत वाणी जी । लडकियाँ मा के लिये इतनी चिन्तित रहती हैं कि अगर दो तीन दिन नेट पर नज़र न आऊँ तो लम्बी सी मेल आ जाती है। इन सभी बच्चों को बहुत बहुत आशीर्वाद
       एक उल्लेखनीय नाम और लेना चाहूँगे जिस से मुझे कुछ और अधिक काम  करने की प्रेरणा मिलती है वो है अनुज खुशदीप सहगल कभी मिली नहीं मगर मिलूँगी जरूर रिश्ता पता नहीं मगर मेरे मन से हर वक्त आशीर्वाद निकलता है उन के लिये, तो लगता है मेरे बेटे जैसे ही हैं। मुफ्लिस जी, दिगम्बर नास्वा जी पंकज मिश्रा जी , श्रीश पाठक जी, स्वपनिल भारतीयम् .निशू तिवारी,अनिल कान्त जी , ओम आर्यजी इन सब की भी आभारी हूँ कि समय समय पर मुझे अपने स्नेह से उत्साहित करते हैं। नीरज गोस्वामी जी ,दिनेश राय दिवेदी जी  की भी आभारी हूँ। स. पावला जी की बहुत आभारी हूँ मुझे पंजाबी लिखने मे जो समस्या आती है उसका हल उनके पास होता है। अगर श्री आशीश खन्डेलवाल जी का नाम न लूँ तो शायद सब से बडी भूल हो जायेगी। मुझे ब्लाग के बारे मे बहुत कुछ उन्होंने सिखाया है। चाहे वो व्यस्त भी रहे हों मै झट से उन्हें बज़ कर देती और चुटकी मे मेरी समस्या हल कर देते।
उपर तो उन लोगों की बात हो रही थी जिन से मेल या चैट दुआरा सम्पर्क मे रहती हूँ । इसके अतिरिक्त मेरे पाठक  जो मुझे अपनी प्रतिक्रियाओं से उतसाहित करते हैं उनकी बहुत बहुत आभारी हूँ। मैं अलपग्य कुछ भी नहीं थी मगर मेरे पाठकों ने मुझे सिर आँखों पर बिठाया। श्री रविन्द्र प्रभात जी के ब्लाग *परिकल्पना* से जब पता चला कि मेरा नाम उन नौं देवियों मे है जिनके ब्लाग इस साल चर्चा मे रहे और आगे रहे। इस से मेरा उत्साह बढा है। उनका आभार ।
   ये सब लिखने का मेरा एक मकसद ये भी है कि प्रोत्साहन इन्सान को आगे बढने की शक्ति देता है । आओ सब पिछले सब झगडे भूल कर नये साल मे ब्लाग जगत मे प्रेम की परिभाषा  सीखें और नये आने वाले शब्दशिलपियों को प्रोत्साहित करेंमैने अपने शहर से भी दो नये ब्लागर्ज़ बनाये हैं। एक राकेश वर्मा जी{ http://akhrandavanzara.blogspot.com/} aur doosare Sanjeev kuraalia jee{ http://kalamkakarz.blogspot.com/}  }इन्हें भी अपना आशीर्वाद दें। ये मेरे इस साल का लेखा जोखा है। मेरी उपल्ब्धियों का और जो प्यार मैने ब्लाग जगत से पाया है। सभी का धन्यवाद।ये  सब मेरे दामाद ललित सूरी  जी की वजह से हुया है। उसे भी बहुत बहुत आशीर्वाद ।
  नये साल की सब को बहुत बहुत बधाई और शुभकामनायें। मेरे बच्चों को आशीर्वाद। दो तीन दिन ब्लाग से दूर रहूँगी। चार पँक्तियाँ नये साल के लिये

नये साल ऐसे तराने सुनाओ
लुटाओ खुशी के खज़ाने लुटाओ

चलो अब मिटा दें गिले सब पुराने
मिलन के कोई तो बहाने बनाओ

न जात और धर्मों का बन्धन रहे
उठो नफरतों के ठिकाने मिटाओ

कहो बात वो प्यार बढता रहे
अंधेरे घरों मे दिये से जलाओ

26 November, 2009

मेरे ब्लाग की आज वर्षगाँठ है
कल मेरा जन्म दिन था । आप सब की इतनी शुभकामनायें पा कर अभिभूत हूँ। पता नहीं क्यों मेरी हर खुशी के साथ गम की कोई न कोई दास्ताँ क्यों जु ड जाती है। अब 26/11 की घट्ना को भी शायद कभी भूल नहीं पाऊँगी। इतनी खुश शायद मैं कभी नहीं हुई थी।

सुबह पोस्ट लिखी तो दिन मे ये घटना घट गयी। और दूसरी परेशानी, ये कि कल रात को जब पोस्ट लिखने लगी तो देखा टिप्पणी और पोस्ट वाला विजेट गलत सँख्या बता रहा था। बहुत परेशान हुई । कल दोपहर को 3500 तक टिप्पनी पहुँच गयी थी मगर रात को 405 दिखाने लगा। क्या कोई इसका कारण बता सकता है? खैर मैने फिर सभी पोस्ट और टिप्पनियाँ गिनी ।कुछ पोस्ट भी गायब लगती हैं । आज फिर देखती हूँ। खैर अब बात करती हूँ आज की। आज मेरे ब्लाग की पहली वर्षगाँठ है।
एक साल मे 172 -- प्रविष्टियाँ और 3510 कमेन्ट्स इस के अतिरिक्त मेरा दूसरा ब्लाग वीराँवल गाथा भी है जिस पर केवल 11 प्रविश्टियाँ ही डाल पाई वहाँ कमेन्ट्स पता नहीं कितने हुये । बहुत से फालोयर --- मुझ जैसी अल्पग्य के लिये बहुत बडी उपल्ब्धि है।
मेरे ब्लाग के जन्म की कहानी भी बहुत रोचक है।दिसम्बर 2007 मे रिटायर होने के बाद हम अपने नये घर मे आ गये नया मोहल्ला और नया घर यहाँ मन नहीं लगता था लोग तो नंगल के ही जाने पहचाने थे मगर जो घर जैसे सम्बन्ध पहले वाली जगह बन गये थे वैसे यहाँ नहीं थे। कुछ एक माह बाद छोटी बेटी की शादी तय हो गयी तो उसमे समय कैसे निकल गया पता ही नहीं चला। 1 नवम्नर 2009 मे बेटी की शादी की। अब ब्च्चों को भी चिन्ता हुई कि मम्मी पापा अकेले हैं दिल कैसे लगेगा। मेरे छोटे दामाद ललित जी से आप पहले भी मिल चुके हैं। शादी पर उनके दोस्त सिरिल जी [ब्लागवाणी वाले} ने उनके कान मे फूँक मार दी कि अगर पत्नि को खुश रखना है तो पहले सासू माँ को खुश करना होगा। बस जब पहली बार ललित शादी के बाद मेरे पास 25 नवम्बर को आये तो शाम को सिरिल जी को फोन लगा दिया कि यार अब कोई तरीका भी बताओ कि सासू माँ को कैसे खुश किया जाये। वो एक लेखिका हैं। बस फिर क्या था, सिरिल जी ने झट से ब्लाग बनाने का मश्विरा दे डाला। मैने कहा भी कि मुझे कम्पयूटर तो आता नहीं ब्लाग क्या खाक चलाऊँगी? मगर ललित ने मेरा ब्लाग उसी समय बना दिया और मुझे टाईप करना भी सिखा दिया। बाकी सब कुछ डेस्क टाप पर रख दिया कि यहाँ यहां कलिक करना है। बस फिर क्या था हम भी बन गये ब्लागर । अब हाल ये है कि ललित खुद तो दिल्ली मे बैठे मुस्कुरा रहे हैं और हमारे पास कहीं नज़र उठा कर देखने का समय नहीं है। 2-3 महीने तो इन्टरनेट का बिल 600 के आस पास आया मगर फिर 2000 से उपर जाने लगा तो पति देव भी कुछ कसमसाये। ये शौक तो बहुत मंहगा है। फिर बच्चों ने उनसे कहा कि आप अनलिमिटिड कनेक्शन ले लें।उसमे 750 रुपये लगेंगे बस फिर पति देव ने हिसान किताब लगाया कि अगर मैं सारा दिन खाली रहूँगी तो जरूर मेरा मन अपनी सहेलियों से मिलने को करेगा । अगर महीनी मे चार पाँच चक्कर भी शहर के लगाने गयी तो 500 का तो पट्रोल ही फूँक देगी { ये भी एक बहुत बडी बात है, नहीं तो भारतिय पति शराब पर तो खर्च कर सकते हैं मगर पत्नि के शौक के लिये हर माह इतना खर्च करना कहाँ सहन कर सकते हैं } इससे अच्छा ये कनेक्शन ही ले लेते हैं क्यों कि मुझ से अधिक उन्हें इस का फायदा था।वो तो अपनी किताबों मे इतने व्यस्त रहते हैं कि उनके पास बात करने का भी समय नहीं होता।चलो इसी बहाने वो अपनी शाँति तो बरकरार रख ही सकते हैं। कुछ सोशल सर्विस मे समय निकल जाता है। पहले हाल ये था कि मुझे बात करने के लिये देखना पडता कि कब किताब छोडें मैं बात करूँ । जैसे ही बात शुरू करती वो अपना काम करते हुये इधर उधर चले जाते और मुझे पूरी बात करने के लिये उनके पीछे पीछे जाना पडता कई बा्र इसी बात पर मैं नाराज़ हो जाती । यूँ भी मुझे हूँ हाँ मे ही निपटा देते । मुहल्ला पुराण न तो इन्हें अच्छा लगता है न मुझे।
जब से बलाग्गिंग शुरू की है मैं जरूरी बात करना भी भूल जाती हूँ और हाल ये है कि इन्हें बार बार मुझ से बात करने के लिये मेरे पास आना पडता है। अब मेरे पास टाईम नहीं होता मैं भी इन्हें हूँ हाँ मे ही निपटा देती हूँ। सब्जी की कडाही और कुकर कितनी बार जला चुकी हूँ। इन्हें पता है कि सब्जी गैस पर रख कर भूल जाऊँगी और जल जायेगी।अपने कमरे मे से आवाज़ लगा कर मुझे याद दिलाते रहते हैं।आगे कभी ये बाहर से देर से आते तो प्रश्नों की झडी लगा देती, अब कभी भी आयें मैं आराम से ब्लाग पर काम करती रहती हूँ। कई बार खुद आ कर कुछ बताने लगते हैं तो हूँ हाँ करती रहती हूँ मुझे लगता है ये सब अब गैर जरूरी बातें हैं । फिर इनके होते मैं बाहर की टेंशन क्यों लूँ?
तो है न सब के लिये फायदे का सौदा? मुझे शुरू से महमानवाज़ी बहुत पसंद है अब एक दो महमान आ जायें तो लगता है कि बहुत समय खराब हो गया। पहले मैं रोज़ पोस्ट लिखती थी फिर एक दिन छोड कर्। मगर पिछले कुछ दिनों बिमार हुई तो अब कई कई दिन बाद पोस्ट लिखने लगी हूँ दूसरा बेटी और नातिन साल बाद USA से आयी हैं उनके साथ भी मस्त हूँ। बस कुछ दिन मे ही पहले वाले रुटीन मे आ जाऊँ गी।
एक और बात ब्लागिन्ग ने मुझे बहुत से रिश्तों की खुशी दी है मेरे बेटे बेटियाँ भाई बहने इतना बडा परिवार है कि ये खुशी मुझ से सँभाले नहीं सम्भलती। और आप सब का प्यार और प्रोत्साहन पा कर अभिभूत हूँ। हाँ कुछ दिन से सभी ब्लाग पर नियमित रूप से नहीं जा पा रही हूँ मगर जल्दी सब की शिकायत दूर कर दूँगी। सिरिल जी का धन्यवाद करना चाहूँगी कि उन्हों ने ललित को ये मन्त्र दे कर सच मे मुझे ललित की प्रिय सासू जी बना दिया। ललित और सिरिल जी को बहुत बहुत धन्यवाद और ढेरों आशीर्वाद भी।
और आप सब का भी बहुत बहुत धन्यवाद। यहाँ अर्श बेटे का इस लिये जरूरी जिक्र करना चाहूँगी कि कम्प्यूटर की जानकारी न होने से जब शुरू मे मुझे मुश्किल आती तो अर्श ही मेरी मुश्किल दूर करते थे। उसे आशीर्वाद । एक नाम मेरे भानजे प्रदीप मेहता का जो मेरे कम्प्यूटर को टीम व्यूवर पर लगा कर ठीक करता रहता था मगर अब मैने पुराने की जगह नया कम्प्यूटर ले लिया है। प्रदीप अर्थात छोटू को बहुत बहुत आशीर्वाद। बस ये है कहानी मेरे एक साल के सफर की। अन्त मे ब्लागवाणी का धन्यवाद करना चाहूँगी जिन की वजह से मैं आज यहाँ हूँ। आशा है आप सब पहले की तरह आपना स्नेह और विश्वास बनाये रखेंगे। धन्यवाद।


28 June, 2009


100 th post

सब से पहले मै आप सब से इस बात के लिये क्षम माँगना चाहती हूँ कि मै कई दिन से नियमित रूप से आपके ब्लोग पर नहीं आ पा रही हूँ1बस एक दो दिन बाद मै नियमित हो जाऊँगी1आज ये मेरी 100 वीं पोस्ट है और मै ये पोस्ट अपने छोटे दामाद श्री ललित सूरी को समर्पित करना चाहती हूँ1बेशक आप सब के लिये ये एक मामूली बात हो मगर मेरे लिये ये बहुत अहम है क्योंकि जिन प्रिस्थितियों से हमारा परिवार गुजरा है उसमे ऐसी कलपना करना ही मुमकिन नहीं फिर भी मेरे पति की कर्मनिष्ठा और बच्चों की मेहनत ने आज मेरी बेटियौ को इस ऊँचे मुम्काम पर पहुँचाया है और अपने परिवार की प्रेरणा से मैं भी कलम पकडने की हिम्मत जुटा पायी हूँ1

बेटियों का होना अभी भी समाज मे जिस नजर से देखा जाता है उस से मैँ भी अछूति नहीं थीबहुत कुछ देख सुन और भुगत कर कई बार मन बहुत दुखी हो जाता1 मगर भगवान की दया से मुझे दामाद बहुत अच्छे मिले 1

नवम्बर्2008 मे मेरी छोटी बेटी की शादी श्री ललित सूरी से हुई थी ललित एम बी ए के बाद सैम सँग कम्पनी मे एरिया मैनेजर हैं और मेरी बेटी भारत बिजली मे सेल्ज मैनेजर है बडी दोनो बेटियों के ससुराल जाने पहचाने परिवार थे बडी बेटी ने एम एस सी मैथ और उससे छोटी ने एम सी ए की है दोनो के पती सोफ्ट वे. इजनियर हैं मगर ललित का परिवार दिल्ली मे था हमारी कोई जानपहचान नहीं थी एक अनजाना सा डर कि पता नहीं बाद मे क्या होगा ? फिर भी दोनो परिवारों मे एक बार मिलने से ही लगने लगा कि जैसे बहुत पुरानी जान पहचान हो1 रिश्ता और फिर 7माह बाद शादी हो गयी 1जब ललित शादी के बाद पहली बार मेरे घर आये तो मुझे एक पल को भी नहीं लगा घर मे नये दामाद आये हैं बच्चों की तरह मेरे आगे पीछे जहाँ तक कि रसोई मे भी मेरे पास खडे रहना मा ये बनाओ--- मा वो बनाओ--- और मेरे पति तो जैसे ललित को पा कर फूले नहीं समाते हैं----उनको भी पूरी हिदायतें कि पापा आप धूप मे ना घूम करो आप ऐसे किया करो वैसे किया करो----कहने का भाव ये कि अपना बेटा भी शायाद इतना ध्यान ना रखता हो जितना ललित को हमारी चिन्ता रहती है रोज फोन पर भी बडी देर तक बात करना उसकी हमारे प्रति निष्ठा का परिचायक है1 रिश्तों के प्रति बहुत संवेदन्शील हूँ1 बहुत रिश्ते खोये हैं भगवान के हाथों--बस इन बच्चों ने सब कुछ भुला दिया है 1

हाँ अब असली बात तो आज की पोस्ट की हो रही थी 1ललित जब पहली बार मेरे पास नन्गल आये थे तो मैने इन से ब्लोग्गि की चर्चा की बस एक घँटे बाद मेरा ब्लोग बन कर तयार हो गया था 1 25 नव.को मुझे मेरा बर्थडे गिफ्ट दिया था ललित ने1

पर मुझे तो कम्पयूटर की ए बी सी भी नहीं आती थी मगर ललित ने एक दिन मे मुझे गुजारे लायक सिखा दिया मेरा काम शुरू हो गया जो नहीं पता लगता था वो मैं फोन करके पूछ लेती थी नहीं तो मेरे घर मे कम्पयूटेर का इतना ही काम था के अमेरिका मे रह रही बेती से याहू मेसेन्जर पर बाते करती थी वो भी बच्चों ने डेस्क टाप पर सब कुछ रख छोडा था मुझे क्लिक करना सिखा दिया था1

अब धीरे धीरे आप सब के और आशीश खण्डेलवाल जी के सहयोग से कई कुछ सीख गयी हूँ1

आज ललित ने टिकटें ही कटा कर भेज दी थी सो दिल्ली आना पडा मेरी बेटी का जन्म दिन था इस लिये आज ये पोस्ट भी दिल्ली से ही लिख रही हूँ अभी अभी बाहर से डिनर कर के लौटे हैं बच्चों के साथ खुश हूँ 1

आज ललित की वजह से ही मुझे इतना बडा ब्लोग जगत का परिवार मिला है आप सब का स्नेह पा कर भी अभिभूत हूँ शायद इस काबिल नहीं थी जितना आप सब से प्यार और सहयोग मिला है सब से अधिक जिन लोगों ने मुझे सहयोग दिया उनमे श्री प्रकाश सिह अर्श श्री आशीश ख्ण्डेलवालजी नीरज गोस्वामी जी राज भाटिया जी दिगम्बर नास्वाजी जिन्हो ने समय समय पर मुझे सहयोग दिया और मेरा उत्साह वर्धन किया मै उन सभी की धन्यवादी हूँ-- ( सब का नाम ले कर लेख को बडा नही करना चाहती )जो रोज मुझ पर अपना स्नेह बरसाते हैं और मेरा उत्साहवर्धन भी करते हैं1

आज अर्श से माफी चाहती हूँ कि मैने उस से वादा किया था कि मै दिल्ली आ रही हू और उस से मिलूँगी मगर गर्मी और समयाभाव के कारण मिल नहीं पाई 1जल्दी जल्दी मे लेख को अच्छे ढंग से लिख नहीं पायी इस समय रात के दो बजने वाले हैं जाते जाते आप सब का एक बार तहे दिल से धन्यवाद करती हूँ और अपने बच्चों के लिये आपका आशीर्वाद चाहती हूँ1ौर चाहती हूँ कि ललित जैसा दामाद हर बेटी वाले को मिले और इनके परिवार जैसा हर परिवार हो

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