05 December, 2009

गुरू मन्त्र {कहानी}-------- गताँक से आगे
पिछली कडी मे आपने पढा कि मदन लाल जी अपनी पत्नि से बहुत प्रेम करते थे, उसने कभी अपने लिये उनसे कुछ नहीं माँगा था मगर आज कल उसे हरिदचार जा कर गुरू धारण करने की इच्छा थी जिसे मदन लाल जी ने पूरी करने के लिये अपना स्कूटर तक बेच दिया । बेशक उन्हें इन साधु सन्तों पर इतना विश्वास नहीं था मगर पत्नी के मन को ठेस पहुँचाना नहीं चाहते थे। वो उसे ले कर हरिदवार पहुँचे और आश्रम मे एक कमरा किराये पर ले लिया। अब आगे पढें-----

मई महीने की कड़कती गर्मी से बेहाल लोग आश्रम के प्रांगण में स्वामी जी का इन्तजार कर रहें थें । दोपहर का प्रचंड रूप भी आज संध्या को भला लग रहा था । आज उसकी बरसों की आशा पूर्ण होने जा रही थी । संध्या बड़ी श्रदा से गुरू दक्षिणा का सामान संभाले मदन लाल के साथ आश्रम के प्रांगण में एक पेड़ के नीचे आकर बैठ गई । वह ध्यान से आस पास के लोगों का निरीक्षण कर रही थी । लोग बड़े-2 उपहार फलों के टोकरे मिठाई मेवों के डिब्बे, कपडे और , बड़े-2 कंबलों के लिफाफे लिए बैठे थे । साथ ही एक परिवार की औरत दूसरी औरत को दिखा रही थी कि वो 50 ग्राम सोने की चेन, विदेशी घड़ी गुरू दक्षिणा के लिए लाई है । साथ ही बता रही थी कि यह तो कुछ भी नही लोग गुरू जी को लाखों रूपये चढ़ावा चढ़ाते है । सुनकर संध्या ने कुछ शर्मिदा सा हो लिफाफे को कसकर बगल में दबा लिया ताकि उसकी तुच्छ सी भेंट कोई देख न ले । उस गरीब के लिए तो यह भी बहुत बड़ा तोहफा था ।

मदन लाल जी का गर्मी से बहुत बुरा हाल था । पाँच बजने वाले थें मगर गुरू जी का कोई अता पता नही था । मदन लाल को गुस्सा भी आ रहा था । साधु सन्तों को लोगों की असुविधा, तकलीफ का कुछ तो एहसासा होना चाहिए । फिर सुध्या ने तो सुबह से कुछ खाया ही नही था । गुरू मन्त्र लेना है तो व्रत तो रखना  ही था।  । पवित्र काम के लिए शुद्धि आवश्यक होती है ।
‘‘देखो जी लोग गुरू दक्षिणा के लिए कितना कुछ ले कर आए है । मुझे तो अपनी छोटी सी भेंट पर शर्म आ रही है । क्योंं न कुछ रूपये और रख दें । ‘‘ संध्या तो बस एक ही बात सोच रही थी । मगर कह नहीं पा रही थी।
‘‘महाराज क्या आज गुरू जी के दर्शन  होंगे ?‘  मदन लाल ने वहाँ एक आश्रम के सेवक से पूछा  ‘हाँ- हाँ, बस आने वाले है ।‘‘ उसने जवाब दिया ।
"हमारा नंबर जल्दी लगवा दीजीए, दूर से आए हैं , थक भी गए है ।"
‘‘ठीक है, बैठो-2 ‘‘ उसका ध्यान मोटी आसामियों पर था ।

संध्या तो मगन थी मगर मदल लाल जी को झुंझलाहट हो रही था । वो सोच ही रहे थे  कि बाहर कहीं जाकर कुछ खा पी लिया जाए तभी उन्होंने देखा कि 4-5 गाड़ियों का काफिला आश्रम के प्रांगण में आकर रूका । गाड़ियों में से गुरू जी तथा कुछ उनके शिश्य   उतरे और गुरू जी के कमरे में चले गए । सँत जी ने बाहर बैठे, सुबह से इन्तजार करते भक्तों की तरफ आँख उठा कर भी नहीं देखा । लोग जय जय कार करते रहे । संध्या कितनी श्रद्धा से आँख  बन्द कर हाथ जोड़ कर खड़ी थी । मदन लाल का मन क्षोभ से भर गया मगर बोले कुछ नहीं ।

सात बजे एक सेवक  अन्दर से आया । उसने लोगों को बताया कि गुरू जी थक गए है । सुबह आठ बजे सबको गुरू मन्त्र मिलेगा । जो लोग यहाँ ठहरना चाहते है उनके लिए हाल में दरियां विछा दी है । सब को खाना भी मिल जाएगा वहीं भजन कीर्तन करें । संध्या बहुत खुश  थी । वह सोच रही थी कि गुरू आश्रम मेंं सतसंग कीर्तन का आनन्द उठाएंगे, ऐसा सौभाग्य कहा रोज -2 मिलता है । मगर मदन लाल जी मन ही मन कुढ़ कर रह गए । - गुरू जी कौन सा हल जोत कर आए हैं जो थक गए है । ।महंगी ए- सी- गाड़ी में आए है। उन्हें क्यों ध्यान नही आया कि लोग सुबह से भूखे प्यासे कड़कती धूप में उनका इन्तजार कर रहे है । यह कैसे सन्त है जिन्हें अपने भक्तों की असुविधा, दुख दर्द का एहसास नही । उन्हेे तो पहले ही ऐसे साधु सन्तों पर विश्वास नही है जो वातानुकूल गाड़ियों में धूमते तथा महलनुमा वातानुकूल आश्रमों में आराम दायक जीवन जीते है । उनका मन हुआ कि यहा से भाग जाए । मगर वह संध्या के मन को चोट पहुचाना नही चाहते थे ।

दोनो ने कमरे में आकर कुछ आराम किया । फिर 8-30 बजे खाना खाकर वो सतसंग भवन में आकर बैठ गए जहाँ कीर्तन भजन चल रहा था । मदन लाल धीरे से ‘अभी आया‘ कहकर उठ गया । मन का विषाद भगाने के लिए वह खुली हवा में टहलना चाहते थे ।  वह आश्रम के पिछली तरफ बगीचे में निकल गया । सोचने लगा कि उनका क्षोभ अनुचित तो नही ? गुरू जी के मन का क्रोध उन्हें पाप का भागी तो नही बना रहा ------------ इन्ही सोचों में चलते हुए उसकी नजर आश्रम के एक बड़े कमरे के दरवाजे पर पड़ी । शायद वह गुरू जी के कमरे को पिछला दरवाजा था । दरवाजे पर गुरू जी का एक सेवक् 2-3 परिवारों के साथ खड़ा था । तभी अन्दर से एक आदमी तथा एक औरत बाहर निकले । सेवक  ने तभी एक और  परिवार को अन्दर भेज दिया । अब मदन लाल जी की समझ में सारा माजरा आ गया । मालदार लोगों के लिए यह चोर दरवाजा था , जहा से गुरू जी तक चाँदी की चाबी से पहूंचा जा सकता था । यह धर्म का कैसा रूप है ? यह साधु-सन्त है या व्यवसाई? उन्हें नही चाहिए ऐसे संतों का गुरूमन्त्र ! वह वापिस जाना चाहते थे मगर संध्या की आस्था का तोड़ उनके पास नही था । वह अनमने से संध्या के पास जाकर बैठ गए ।

कीर्तन के बाद कमरे में आकर उन्होंने संध्या को सब कुछ बताया मगर वह तो अपनी ही रौ में थी , ‘‘ आप भी बस जरा-2 सी बात में दोष ढूंढने लगते है । क्या सतसंग में सुना नही छोटे महात्मा जी क्या कह रहे थे ? हमें दूसरों के दोष ढूंढने से पहले अपने दोष देखने चाहिए । मगर तुम्हें तो साधु सन्तों पर विवास ही नही रहा । संध्या की आस्था के आगे उसके तर्क का सवाल ही नही उठता था । वह चुपचाप करवट लेकर सो गया ।

सुबह पाँच   बजे उठे नहा धोकर तैयार हुए और छ: बजे आरती में भाग लेने पहूंच गए । यहाँ भी गुरू जी के शिश्य  ही आरती कर रहे थे । संध्या ने व्रत रखा था । वह शुद मुख से मंत्र लेना चाहती थी । वह आठ बजे ही प्रांगण में जाकर बैठ गई और आस पास के लोगों से बातचीत द्वारा गुरू जी के बारे में अपना ज्ञान बांटने लगी । मदन लाल जी 9 बजे बाहर से नाश्ता करके उसके पास आकर बैठ गए । आठ बजे की बजाए गुरू जी 10 बजे आए और अपने आसन पर विराजमान हो गए । आस पास उनके सेवक  खड़े थे और कुछ सेवक  लोगों को कतार में आने का आग्रह कर रहे थे ।

गुरू जी ने पहले गुरू-शिष्य  परंपरा की व्याख्या जोरदार शब्दों में की । लोगों को मोह  माया त्यागने का उपदेश  दिया फिर बारी बारी एक-2 परिवार को बुलाने लगे । उन्हें धीरे से नाम देते फिर आाीर्वाद देते । लोगों की दान दक्षिणा लेकर ाष्यों को सपुर्द कर देते । जिनकी दान दक्षिणा अक्ष्छी होती उन्हें फल मिठाई को प्रसाद अधिक मिल जाता । उनको हंस कर आशीर्वाद देते, कुछ बातें भी करते । मदन लाल ने कई बार उठने की चेष्टा की मगरसेवक उन्हें हर बार बिठा देता । वह मालदार असामी को ताड़कार पहले भेज देता । मदन लाल मन मार कर बैठ जाते । उन्हें चिन्ता थी कि अगर दो बजे तक फारिग न हुए तो आज का दिन भी यहीं रहना पड़ेगा । चार पाच सौ रूपये और खर्च हो जाएगा ।

एक बजे तक बीस पचीस लोग ही गुरू मंत्र ले पाए थे । उनमें से कुछ पुराने भक्त भी थे । एक मास में केवल 3 दिन ही होते थे गुरू म्रत्र पाने के लिए । एक बजे गुरू जी उठ गए । भोजन का समय हो गया था । लोग मायूस होकर अपने’-2 कमरों में लौट गए । जिनके पास कमरे नहीं थे वो वृक्षों के नीचे बैठ गए । कई लोग तीसरी चौथी बार आए थें अभी उनहें गुरू मंत्र नही मिला था । चार बजे फिर गुरू जी ने मंत्र देना था । लोग इन्तजार कर रहें थे । पाँच बजे गंरू जी के सेवक  ने बड़े गर्व से लोगों को बताया कि अभी थोड़ी देर में एक मंत्री जी गुरू जी के दर्शन करने आने वाले है । इसलिए कल 10 बजे गुरू जी आपसे मिलेंगे । तभी चमचमाती कारों का काफिला प्रांगण में आकर रूका । मंत्री जी व उनके साथ आए लोग सीधे गुरू जी के कमरे में चले गए । चाय पानी के दौर के बाद गुरू जी मंत्री जी को आश्रम का दौरा करवाने निकले । इस काम में 7 बज गए । मंत्री जी आश्रम के लिए 50 हजार का चैक भी दे गए थे ।     
क्रमश:

03 December, 2009

गुरू मन्त्र
कहानी
मदन लाल ध्यान ने संध्या को टेलिवीजन के सामने बैठी देख रहें हैं । कितनी दुबली हो गई है । सारी उम्र अभावों में काट ली, कभी उफ तक नही की । वह तो जैसी बनी ही दूसरों के लिए थी । संयुक्त परिवार का बोझ ढोया, अपने बच्चों को पढ़ाया लिखाया और शादियां की और फिर सभी अपने-अपने परिवारों में व्यस्त हो गए । मदन लाल जी और संध्या को जैसे सभी भूल गये । मदन लाल जी क्लर्क के पद से रिटायर हाने के बाद अभी तक एक साहूकार के यहां मुनिमी कर रहे हैं । बच्चों की शादियों पर लिया कर्ज अभी बाकी है । फिर भी वे दोनों खुश  है । संध्या आजकल जब भी फुरस्त में होती है तो टेलिविजन के सामने बैठ जाती है , कोई धार्मिक चैनल लगाकर । साधु -संतों के प्रवचन सुनकर उसे भी गुरू धारण करने का भूत सवार हो गया है। मगर  मदन लाल को पता नही क्यां इन साधु संन्तों से चिढ़ है । संध्या कई बार कह चुकी है कि चलो हरिद्वार चलते हैं । पड़ोस वाली बसन्ती भी कह रही थी कि स्वामी श्रद्वा राम जी बड़े पहूंचे हुये महात्मा है । उनका हरिद्वार में आश्रम है । वो उन्हें ही गुरू धारण करना चाहती हैं ।
संध्या ने प्रवचन सुनते-सुनते एक लग्बी सास भरी । तो मदन लाल जी की तन्द्रा टूटी । जाने क्यों उन्हें संध्या पर रहम सा आ रहा था । उन्होंने मन में ठान लिया कि चाहे कही से भी पैसे का जुगाड़ करना करें, मगर संध्या को हरिद्वार जरूर लेकर जाएंगे । आखिर उस बेचारी ने जीवन में चाहा ही क्या है । एक ही तो उसकी इच्छा है ।
‘‘संध्या तुम कह रही थी हरिद्वार जाने के लिए, क्या चलोगी‘क्या,?"
 वह चौंक सी गई ------‘‘मेरी तकदीर में कहा जिन्दा जी जाना बदा है । अब एक ही बार जाना है हरिदुयार मेरी अस्थिया लेकर‘ । ‘‘ वह कुछ निराश् सी होकर बोली ।
‘‘ऐसा क्यों कहती हो ? मदन लाल के मन को ठेस सी लगी । अब बुढापे मे तो दोनो के केवल एक दूसरे का ही सहारा था।
‘‘सच ही तो कहती हूं । पैसे कहाँ से आऐंगे ? बच्चो की शादी का कर्ज तो अभी उतरा नही । बेटा भी कुछ नही भेजता । आज राशन वाला लाला भी आया था ।‘‘
‘‘ तुम चिन्ता मत करो । मैं सब कर लूंगा । बच्चों की तरफ से जी मैला क्यों करती हो । नइ -2 ग्‌ृहस्थी बसाने में क्या बचता होगा उनके पास । हम हरिद्वार जरूर जाएंगें ‘‘ कहते हुए वह बाहर निकल गया । मदन लाल भावुक होकर संध्या से कह तो बैठे, मगर अब उन्हें चिन्ता सता रही थी कि पैसे का इन्तजाम कैसे करें । मन में एकाएक विचार आया कि क्यों न अपना स्कूटर बेच दें । यूं भी बहुत पुराना हो गया है । हर तीसरे दिन ठीक करवाना पड़ता है । बाद में किश्तों  पर एक साईर्कल ले लेंगे । वैसे भी साईकिल चलाने से सेहत ठीक रहती है --उसने अपने दिल को दोलासा दिया।  हाँ, यह ठीक रहेगा । मन ही मन सोच कर इसी काम में जुट गए । चार-पाच दिन में ही उन्होने पाँच हजार में अपना स्कूटर बेच दिया । उन्हें स्कूटर बेचने का लेश  मात्र भी दुख न था । बेशक  उनका अपना मन हरिदार जाने का नही था मगर वह संध्या की  एक मात्र इच्छा पूरी करना चाहतें थें ।
संध्या बड़ी खुश थी । उसे मन चाही मुराद मिल रही थी । उसने धूमधम से हरिदार जाने की तैयारी शुरू कर ली । अब गुरू मन्त्र लेना है तो गुरू जी के लिए गुरू दक्षिणा भी चाहिए, कपड़े, फल, मिठाई आदि कुल मिलाकर दो ढाई हजार का खर्च । चलो यह सौभाग्य कौन सा रोज रोज मिलता है । जिस प्रभू ने इतना कुछ दिया उसके नाम पर इतना सा खर्च हो भी गया तो क्या ।
 हरिदार की धरती पर पाव रखते ही संध्या आत्म विभोर हो गई । मदन लाल जी गर्मी से वेहाल थे मगर संध्या का सारा ध्यान स्वामी जी पर ही टिका हुआ था । अब उसका जीवन सफल हो गया । गुरू मंत्र पाकर वो धन्य हो जायेगी। मदन लाल जी भी  नास्तिक तो नही थे मगर धर्म के बारे में उनका नजरिया अलग था । वो संध्या की आस्था को ठेस पहूंचाना नही चाहते थे ।
दोपहर बारह बजे वो आश्रम पहूंचे । आश्रम के प्रांगण में बहुत से लोग वृक्षों की छांव में बैठे थें । मदन लाल जी रात भर ट्रेन के सफर में थक गए थे । पहले वह नहा धोकर फ्रेश् होना चाहते थे । आश्रम के प्रबन्धक से ठहरने की व्यवस्था पूछी । तीन सौ रूपये किराए से कम कोई कमरा नहीं था । चलो एक दिन की बात है यह सोचकर उन्होंने एक कमरा किराए पर ले लिया । थोड़ा आराम करके नहा धोकर तैयार हुए । 2 बजे के बाद गुरू दीक्षा का समय था ।------ क्रमश

30 November, 2009

अच्छा लगता है (कविता )
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कभी कभी
क्यों रीता सा
हो जाता है मन
उदास सूना सा
बेचैन अनमना सा
अमावस के चाँद सी
धुँधला जाती रूह
सब के होते भी
किसी के ना होने का आभास
अजीब सी घुटन सन्नाटा
जब कुछ नहीं लुभाता
तब अच्छा लगता है
कुछ निर्जीव चीज़ों से बतियाना
अच्छा लगता है
आँसूओं से रिश्ता बनाना
बिस्तर की सलवटों मे
दिल के चिथडों को छुपाना
और
बहुत अच्छा लगता है
खुद का खुद के पास
लौट आना
मेरे ये आँसू मेरा ये बिस्तर
मेरी कलम और ये कागज़
और
मूक रेत के कणों जैसे
कुछ शब्द
पलको़ से ले कर
दो बूँद स्याही
बिखर जाते हैँ
कागज़ की सूनी पगडंडियों पर
मेरा साथ निभाने
हाँ कितना अच्छा लगता है
कभी खुद का
खुद के पास लौट आना

28 November, 2009


गज़ल
ये गज़ल भी प्राण भाई साहिब के आशीर्वाद और संवारने से
कहने लायक बनी है।

हौसला दिल में जगाना साथिया
देश दुश्मन से बचाना साथिया

जो करे बस सोच कर करना अभी
फिर न तू आँसू बहाना साथिया

क़ैद कर् पलकों में रखना हर घड़ी
यूँ बना काजल सजाना साथिया

जान हाल-ए- दिल न ले तेरा कहीं
चेहरा ऎसे छुपाना साथिया

कौन कहता है तुझे अब आदमी
भ्रूण मारे क्यों,बताना साथिया

रूप उसका जान का दुश्मन बना
प्रेम का जलवा दिखाना साथिया

छोड़ कर चल दे मुसीबत में कोई
दोस्त कैसा वो,बताना साथिया

दोस्ती निर्मल है "निर्मल" की सदा
जब जी चाहे आज़माना साथिया

26 November, 2009

मेरे ब्लाग की आज वर्षगाँठ है
कल मेरा जन्म दिन था । आप सब की इतनी शुभकामनायें पा कर अभिभूत हूँ। पता नहीं क्यों मेरी हर खुशी के साथ गम की कोई न कोई दास्ताँ क्यों जु ड जाती है। अब 26/11 की घट्ना को भी शायद कभी भूल नहीं पाऊँगी। इतनी खुश शायद मैं कभी नहीं हुई थी।

सुबह पोस्ट लिखी तो दिन मे ये घटना घट गयी। और दूसरी परेशानी, ये कि कल रात को जब पोस्ट लिखने लगी तो देखा टिप्पणी और पोस्ट वाला विजेट गलत सँख्या बता रहा था। बहुत परेशान हुई । कल दोपहर को 3500 तक टिप्पनी पहुँच गयी थी मगर रात को 405 दिखाने लगा। क्या कोई इसका कारण बता सकता है? खैर मैने फिर सभी पोस्ट और टिप्पनियाँ गिनी ।कुछ पोस्ट भी गायब लगती हैं । आज फिर देखती हूँ। खैर अब बात करती हूँ आज की। आज मेरे ब्लाग की पहली वर्षगाँठ है।
एक साल मे 172 -- प्रविष्टियाँ और 3510 कमेन्ट्स इस के अतिरिक्त मेरा दूसरा ब्लाग वीराँवल गाथा भी है जिस पर केवल 11 प्रविश्टियाँ ही डाल पाई वहाँ कमेन्ट्स पता नहीं कितने हुये । बहुत से फालोयर --- मुझ जैसी अल्पग्य के लिये बहुत बडी उपल्ब्धि है।
मेरे ब्लाग के जन्म की कहानी भी बहुत रोचक है।दिसम्बर 2007 मे रिटायर होने के बाद हम अपने नये घर मे आ गये नया मोहल्ला और नया घर यहाँ मन नहीं लगता था लोग तो नंगल के ही जाने पहचाने थे मगर जो घर जैसे सम्बन्ध पहले वाली जगह बन गये थे वैसे यहाँ नहीं थे। कुछ एक माह बाद छोटी बेटी की शादी तय हो गयी तो उसमे समय कैसे निकल गया पता ही नहीं चला। 1 नवम्नर 2009 मे बेटी की शादी की। अब ब्च्चों को भी चिन्ता हुई कि मम्मी पापा अकेले हैं दिल कैसे लगेगा। मेरे छोटे दामाद ललित जी से आप पहले भी मिल चुके हैं। शादी पर उनके दोस्त सिरिल जी [ब्लागवाणी वाले} ने उनके कान मे फूँक मार दी कि अगर पत्नि को खुश रखना है तो पहले सासू माँ को खुश करना होगा। बस जब पहली बार ललित शादी के बाद मेरे पास 25 नवम्बर को आये तो शाम को सिरिल जी को फोन लगा दिया कि यार अब कोई तरीका भी बताओ कि सासू माँ को कैसे खुश किया जाये। वो एक लेखिका हैं। बस फिर क्या था, सिरिल जी ने झट से ब्लाग बनाने का मश्विरा दे डाला। मैने कहा भी कि मुझे कम्पयूटर तो आता नहीं ब्लाग क्या खाक चलाऊँगी? मगर ललित ने मेरा ब्लाग उसी समय बना दिया और मुझे टाईप करना भी सिखा दिया। बाकी सब कुछ डेस्क टाप पर रख दिया कि यहाँ यहां कलिक करना है। बस फिर क्या था हम भी बन गये ब्लागर । अब हाल ये है कि ललित खुद तो दिल्ली मे बैठे मुस्कुरा रहे हैं और हमारे पास कहीं नज़र उठा कर देखने का समय नहीं है। 2-3 महीने तो इन्टरनेट का बिल 600 के आस पास आया मगर फिर 2000 से उपर जाने लगा तो पति देव भी कुछ कसमसाये। ये शौक तो बहुत मंहगा है। फिर बच्चों ने उनसे कहा कि आप अनलिमिटिड कनेक्शन ले लें।उसमे 750 रुपये लगेंगे बस फिर पति देव ने हिसान किताब लगाया कि अगर मैं सारा दिन खाली रहूँगी तो जरूर मेरा मन अपनी सहेलियों से मिलने को करेगा । अगर महीनी मे चार पाँच चक्कर भी शहर के लगाने गयी तो 500 का तो पट्रोल ही फूँक देगी { ये भी एक बहुत बडी बात है, नहीं तो भारतिय पति शराब पर तो खर्च कर सकते हैं मगर पत्नि के शौक के लिये हर माह इतना खर्च करना कहाँ सहन कर सकते हैं } इससे अच्छा ये कनेक्शन ही ले लेते हैं क्यों कि मुझ से अधिक उन्हें इस का फायदा था।वो तो अपनी किताबों मे इतने व्यस्त रहते हैं कि उनके पास बात करने का भी समय नहीं होता।चलो इसी बहाने वो अपनी शाँति तो बरकरार रख ही सकते हैं। कुछ सोशल सर्विस मे समय निकल जाता है। पहले हाल ये था कि मुझे बात करने के लिये देखना पडता कि कब किताब छोडें मैं बात करूँ । जैसे ही बात शुरू करती वो अपना काम करते हुये इधर उधर चले जाते और मुझे पूरी बात करने के लिये उनके पीछे पीछे जाना पडता कई बा्र इसी बात पर मैं नाराज़ हो जाती । यूँ भी मुझे हूँ हाँ मे ही निपटा देते । मुहल्ला पुराण न तो इन्हें अच्छा लगता है न मुझे।
जब से बलाग्गिंग शुरू की है मैं जरूरी बात करना भी भूल जाती हूँ और हाल ये है कि इन्हें बार बार मुझ से बात करने के लिये मेरे पास आना पडता है। अब मेरे पास टाईम नहीं होता मैं भी इन्हें हूँ हाँ मे ही निपटा देती हूँ। सब्जी की कडाही और कुकर कितनी बार जला चुकी हूँ। इन्हें पता है कि सब्जी गैस पर रख कर भूल जाऊँगी और जल जायेगी।अपने कमरे मे से आवाज़ लगा कर मुझे याद दिलाते रहते हैं।आगे कभी ये बाहर से देर से आते तो प्रश्नों की झडी लगा देती, अब कभी भी आयें मैं आराम से ब्लाग पर काम करती रहती हूँ। कई बार खुद आ कर कुछ बताने लगते हैं तो हूँ हाँ करती रहती हूँ मुझे लगता है ये सब अब गैर जरूरी बातें हैं । फिर इनके होते मैं बाहर की टेंशन क्यों लूँ?
तो है न सब के लिये फायदे का सौदा? मुझे शुरू से महमानवाज़ी बहुत पसंद है अब एक दो महमान आ जायें तो लगता है कि बहुत समय खराब हो गया। पहले मैं रोज़ पोस्ट लिखती थी फिर एक दिन छोड कर्। मगर पिछले कुछ दिनों बिमार हुई तो अब कई कई दिन बाद पोस्ट लिखने लगी हूँ दूसरा बेटी और नातिन साल बाद USA से आयी हैं उनके साथ भी मस्त हूँ। बस कुछ दिन मे ही पहले वाले रुटीन मे आ जाऊँ गी।
एक और बात ब्लागिन्ग ने मुझे बहुत से रिश्तों की खुशी दी है मेरे बेटे बेटियाँ भाई बहने इतना बडा परिवार है कि ये खुशी मुझ से सँभाले नहीं सम्भलती। और आप सब का प्यार और प्रोत्साहन पा कर अभिभूत हूँ। हाँ कुछ दिन से सभी ब्लाग पर नियमित रूप से नहीं जा पा रही हूँ मगर जल्दी सब की शिकायत दूर कर दूँगी। सिरिल जी का धन्यवाद करना चाहूँगी कि उन्हों ने ललित को ये मन्त्र दे कर सच मे मुझे ललित की प्रिय सासू जी बना दिया। ललित और सिरिल जी को बहुत बहुत धन्यवाद और ढेरों आशीर्वाद भी।
और आप सब का भी बहुत बहुत धन्यवाद। यहाँ अर्श बेटे का इस लिये जरूरी जिक्र करना चाहूँगी कि कम्प्यूटर की जानकारी न होने से जब शुरू मे मुझे मुश्किल आती तो अर्श ही मेरी मुश्किल दूर करते थे। उसे आशीर्वाद । एक नाम मेरे भानजे प्रदीप मेहता का जो मेरे कम्प्यूटर को टीम व्यूवर पर लगा कर ठीक करता रहता था मगर अब मैने पुराने की जगह नया कम्प्यूटर ले लिया है। प्रदीप अर्थात छोटू को बहुत बहुत आशीर्वाद। बस ये है कहानी मेरे एक साल के सफर की। अन्त मे ब्लागवाणी का धन्यवाद करना चाहूँगी जिन की वजह से मैं आज यहाँ हूँ। आशा है आप सब पहले की तरह आपना स्नेह और विश्वास बनाये रखेंगे। धन्यवाद।


24 November, 2009

गज़ल
इस गज़ल को भी आदरणीय प्राण भाई साहिब ने संवारा है ।तभी कहने लायक बनी है।

नज़र ज़रा सी उठा के तो देख्
अपनों से शरमाना कैसा?

चाहे भी शरमाये भी तू
अब नखरा यूँ दिखाना कैसा?

आते ही जाने की जिद्द?
पल दो पल का आना कैसा?

आईना तो सच बोले है
फिर खुद को भरमाना कैसा?



जलना है बस काम शमा का
जो न जले परवाना कैसा?

मतलव के तराजू मे तोले?
प्यार का ये पैमाना कैसा?

वो तोड गये दिल चुपके से
मुहबत का नज़राना कैसा?

तकरार से दूरी मिटती नहीं
इतनी बात बढाना कैसा?


23 November, 2009


गज़ल
ज़िन्दगी से मैने कहा कि मैं गज़ल सीखना चाहती हूँ तो उसने कहा कि तुम्हारे पास क्या है जो गज़ल लिखोगी? मैने कहा देखो इस मे काफिया भी है रदीफ भी है तो वो हंसी और बोली अरे! मूर्ख ये बहर मे नहीं है। और मैं इसे गज़ल न बना पाई। तो आप भी इस बेबहरी को ऐसे ही सुन लीजिये। आज पोस्ट करने के लिये और कुछ नहीं है न ।


चाहता हूँ खुद तेरी तकदीर लिख दूँ
खामोश होठौं पर एक तहरीर लिख दूँ

तू मिले या ना मिले कभी ज़ालिम्
दिल पर तेरे अपनी तस्वीर लिख दू

क्या दूँ तुझे इश्क मे इस के सिवा कि
तेरे नाम दिल की जागीर लिख दूँ

आओगी कभी तो कोई दुआ मांगने गर
खुद को इश्क ए फकीर लिख दूँ

मैं जानता हूँ अपनी हस्ती को ------
आ तेरे माथे की लकीर लिख दूँ

21 November, 2009

अस्तित्व [गताँक से आगे]

पिछले अंक मे आपने पढा कि रमा को अपने पति की अलमारी से एक वसीयत मिली जिसमे उनके पति ने अपने 2 बेटों के नाम सारी संपति कर दी और छोटे बेटे और रमा के नाम कुछ नहीं किया जिस से रमा के मन मे क्षोभ हुया कि उसे बिना बताये ये सब क्यों किया गया। क्या औरत केवल घर की नौकरानी है उसकी इस फैसले मे कोई अहमियत नहीं ? उसने घर छोडने का फैसला कर लियाेऔर पने पति नंद के नाम पत्र लिख कर अपनी सहेली के घर चली गयी आब आगे पढें -------
आशा के घर पहुँची1 मुझे देखते ही आशा ने सवालों की झडी लगा दी
"अखिर ऐसा क्या हो गया जो तुम्हें ऐसी नौकरी की जरूरत पड गयी1नंद जी कहाँ हैं?"
मुँह से कुछ ना बोल सकी,बस आँखें बरस रही थी महसूस् हुआ कि सब कुछ खत्म हो गया है1मगर मेरे अन्दर की औरत का स्वाभिमान मुझे जीने की प्रेरणा दे रहा था1आशा ने पानी का गिलास पिलाया,कुछ संभली अब तक वर्मा जी भी आ चुके थे1 मैने उन्हें पूरी बात बताई1 सुन कर वो भी सन्न रह गये
"देखो आशा ये प्रश्न सिर्फ मेरे आत्म सम्मान का नहीं है1बल्कि एक औरत के अस्तित्व का है क्या औरत् सिर्फ आदमी के भोगने की वस्तु है?क्या घर्, परिवार्,बच्चो पर् और घर से सम्बंधित फैसलों पर उसका कोई अधिकार नही है ! अगर आप लोग मेरी बात से सहमत हैं तो कृ्प्या मुझ से और कुछ ना पूछें। अगर आप नौकरी दे सकते हैं तो ठीक है वर्ना कही और देख लूँगी1
"नहीं नहीं भाभीजी आप ऐस क्यों सोचती हैं? नौकरी क्या ये स्कूल ही आपका है1मगर मैं चाहता था एक बार नंद से इस बारे में बात तो करनी चाहिये"
*नहीं आप ऐसा कुछ नहीं करेंगे1"
" खैर आपकी नौकरी पक्की है1"
दो तीन दिन में ही होस्टल वार्डन वाला घर मुझे सजा कर दे दिया गया 1वर्माजी ने फिर भी नंद को सब कुछ बता दिया था उनका फोन आया था1मुझे ही दोशी ठहरा रहे थे कि छोटे को तुम ने ही बिगाडा है अगर तुम चाह्ती हो कि कुछ तुम्हारे नाम कर दूँ 'तो कर सकता हूँ मगर बाद में ये दोनो बडे बेटों का होगा1मैने बिना जवाब दिये फोन काट दिया 1था वो अपने गरूर मे मेरे दिल की बात समझ ही नही पाये थे1मैं तो चाहती थी कि जो चोट उन्होंने मुझे पहुँचाई है उसे समझें1
बडे बेटे भी एक बार आये थे मगर औपचारिकता के लिये शायद उन्हें डर था कि माँ ने जिद की तो जमीन में से छोटे को हिस्सा देना पडेगा1 वर्मा जी ने नंद को समझाने की और मुझे मनाने की बहुत कोशिश की मगर नंद अपने फैसले पर अडे रहे। बडे बेटे भी एक बार आये फिर चुपी साध गय।
लगभग छ: महीने हो गये थे मुझे यहाँ आये हुये1घर से नाता टूट चुका था1बच्चों के बीच काफी व्यस्त रह्ती1फिर भी घर बच्चों की याद आती छोटे को तो शायद किसी ने बताया भी ना हो1नंद की भी बहुत याद आती--पता नहीं कोई उनका ध्यान रखता भी है या नहीं वर्मा जी ने कल बताया था कि दोनो कोठियाँ बन गयी हैं1नंद दो माह वहाँ रहे अब पुराने घर मे लौट आये हैं1ये भी कहा कि भाभी अब छोडिये गुस्सा नंद के पास चले जाईये1
अब औरत का मन--मुझे चिन्ता खाये जा रही थी-ेअकेले कैसे रहते होंगे--ठीक से खाते भी होंगे या नहीं--बेटों के पास क्यों नहीं रहते--शायद उनका व्यवहार बदल गया हो--मन पिघलने लगता मगर तभी वो कागज़ का टुकडा नाचते हुये आँखों के सामने आ जाता--मन फिर क्षोभ से भर जाता
चाय का कप ले कर लान मे आ बैठी1बच्चे लान मे खेल रहे थे मगर मेरा मन जाने क्यों उदास था छोटे की भी याद आ रही थी--चाय पीते लगा पीछे कोई है मुड कर देखा तो छोटा बेटा और बहू खडे थे1दोनो ने पाँव छूये1दोनो को गले लगाते ही आँखें बरसने लगी--
"माँ इतना कुछ हो गया मुझे खबर तक नही दी1क्या आपने भी मुझे मरा हुया समझ लिया था1" बेटे का शिकवा जायज़ था1
*नहीं बेटा मै तुम्हें न्याय नहीं दिला पाई तो तेरे सामने क्या मुँह ले कर जाती1फिर ये लडाई तो मेरी अपनी थी1"
"माँ मैं गरीब जरूर हूँ मगर दिल से इतना भी गरीब नहीं कि माँ के दिल को ना जान सकूँ1मैं कई बार घर गया मगर घर बंद मिला मैने सोचा आप बडे भईया के यहाँ चली गयी हैं1पिता जी के डर से वहाँ जाने की हिम्मत नहीं जुटा पाया
*अच्छा चलो बातें बाद मे होंगी पहले आप तैयार हो कर हमारे साथ चलो"
"मगर कहाँ?"
माँ अगर आपको मुझ पर विश्वास हैतो! ये समझो कि आपका बेटा आपके स्वाभिमान को ठेस नही लगने देगा1ना आपकी मर्जी के बिना कहीं लेकर जाऊँगा1बस अब कोई सवाल नहीं"
"पर् बहू पहली बार घर आई है कुछ तो इसकी आवभगत कर लूँ1" मन मे डर स लग रहा था कहीं नंद बिमार तो नहीं --कहीं कोइ बुरी खबर तो नहीं--या बेटा अपने घर तो नहीं ले जाना चाहता1मगर बेटे को इनकार भी नहीं कर सकी
"माँ अब आवभगत का समय नहीं है आप जलदी चलें"
अन्दर ही अन्दर मै और घबरा गयी1मन किया उड कर नंद के पास पहुँच जाऊँ वो ठीक तो हैं!मैं जल्दी से तयार हुई घर को ताला लगाया और आया से कह कर बेटे के साथ चल पडी
चलते चलते बेटा बोला-"माँ अगर जीवन में जाने अनजाने किसी से कोई गलती हो जाये तो क्या वो माफी का हकदार नहीं रहता? मान लो मैं गलती करता हूँ तो क्या आप मुझे माफ नहीं करेंगी?"
"क्यों नहीं बेटा अगर गलती करने वाला अपनी गलती मानता है तो माफ कर देना चाहिये1क्षमा तो सब से बडा दान है1बात ्रते करते हम गेट के पास पहूँच चुके थे
"तो फिर मैं क्षमा का हकदार क्यों नहीं1क्या मुझे क्षमा करोगी?"----!नंद ये तो नंद की आवाज है---एक दम दिल धडका---गेट की तरफ देखा तो गेट के बाहर खडी गाडी का दरवाजा खोल कर नंद बाहर निकले और मेरे सामने आ खडे हुये1उनके पीछे--पीछे वर्माजी और आशा थे1
"रमा आज मैं एक औरत को नहीं, अपनी अर्धांगिनी को लेने आया हूं1हमारे बीच की टूटी हुई कडियों को जोडने आया हूँ1तुम्हारा स्वाभिमान लौटाने आया हूँ1उमीद है आज मुझे निराश नहीं करोगी1शायद तुम्हारे कहने से मै अपनी गलती का अह्सास ना कर पाता मगर तुम्हारे जाने के बाद मै तुम्हारे वजूद को समझ पाया हूँ1मैं तुम्हे नज़रंदाज कर जिस मृ्गतृ्ष्णा के पीछे भागने लग था वो झूठी थी इस का पता तुम्हारे जाने के बाद जान पाया1जिसे मैं खोटा सिक्का समझता था उसने ही मुझे सहारा दिया है दो दिन पहले ये ना आया होता तो शायद तुम मुझे आज ना देख पाती1बडों के हाथ जमीन जायदाद लगते ही मुझे नज़र अंदाज करना शुरू कर दिया1मैं वापिस अपने पुराने घर आ गया वहाँ तुम बिन कैसे रह रहा था ये मैं ही जानता हूँ1तभी दो दिन पहले छोटा तुम्हें मिलने के लिये आया1 मैं बुखार से तप रहा था1 नौकर भी छुटी पर था तो इसने मुझे सम्भाला1 इसे मैने सब कुछ सच बता दिया1मैं शर्म् के मारे तुम्हारे सामने नहीं आ रहा था लेकिन वर्माजी और छोटे ने मेरी मुश्किल आसान कर दी1 चलो मेरे साथ"कहते हुये नंद ने मेरे हाथ को जोर से पकड लिया---मेरी आँखें भी सावन भादों सी बह रही थी और उन आँसूओं मे बह ्रहे थे वो गिले शिकवे जो जाने अनजाने रिश्तों के बीच आ जाते ``हैं। अपने जीवन की कडियों से बंधी मै नंद का हाथ स्वाभिमान से पकड कर अपने घर जा रही थी1-- समाप्त


19 November, 2009



अस्तित्व [गतांक से आगे]

पिछले अंक मे आपने पढा कि रमा को अपने पति की अलमारी से एक वसीयत मिली जिसमे उनके पति ने अपने 2 बेटों के नाम सारी संपति कर दी और छोटे बेटे और रमा के नाम कुछ नहीं किया जिस से रमा के मन मे क्षोभ हुया कि उसे बिना बताये ये सब क्यों किया गया। क्या औरत केवल घर की नौकरानी है उसकी इस फैसले मे कोई अहमियत नहीं ? अब आगे पढें---------------
*मालकिन खाना खा लें* नौकर की आवाज़ से वो अतीत से बाहर आयी
*मुझे भूख नहीं है1बकी सब को खिला दे"कह कर मै उठ कर बैठ गयी
नंद बाहर गये हुये थे1बहुयों बेटों के पास समय नही था कि मुझे पूछते कि खाना क्यों नही खाया1 नंद ने जो प्लाट बडे बेटौं के नाम किये थे उन पर उनकी कोठियां बन रही थी जिसकी निगरानी के लिये नंद ही जाते थे1इनका विचार था कि घर बन जाये हम सब लोग वहीं चले जायेंगे1
नींद नही आ रही थी लेटी रही, मैने सोच लिया था कि मैं अपने स्वाभिमान के साथ ही जीऊँगी मै नंद् के घर मे एक अवांछित सदस्य बन कर नहीं बल्कि उनक गृह्स्वामिनी बन् कर ही रह सकती थी1इस लिये मैने अपना रास्ता तलाश लिया था1
सुबह सभी अपने अपने काम पर जा चुके थे1मैं भी तैयार हो कर शिवालिक बोर्डिंग स्कूल के लिये निकल पडी1ये स्कूल मेरी सहेली के पती मि.वर्मा का था1मैं सीधी उनके सामने जा खडी हुई1
'"नमस्ते भाई सहिब"
*नमस्ते भाभीजी,अप ?यहाँ! कैसी हैं आप? बैठिये 1* वो हैरान हो कर खडे होते हुये बोले1
कुछ दिन पहलेआशा बता रही थीकि आपके स्कूल को एक वार्डन की जरूरत है1क्या मिल गई?"मैने बैठते हुये पूछा
"नहीं अभी तो नही मिली आप ही बताईये क्या है कोई नज़र मे1"
"तो फिर आप मेरे नाम का नियुक्ती पत्र तैयार करवाईये1"
"भाभीजी ये आप क्या कह रही हैं1आप वार्डन की नौकरी करेंगी?"उन्होंने हैरान होते हुये पूछा1
हाँागर आपको मेरी क्षमता पर भरोसा है तो1"
"क्या नंद इसके लिये मान गये हैांअपको तो पता है वार्डन को तो 24 घन्टे हास्टल मे रहना पडता हैआप नंद को छोड कर कैसे रहेंगी?"
*अभी ये सब मत पूछिये अगर आप मुझे इस काबिल मानते हैं तो नौकरी दे दीजिये1बाकी बातें मैं आपको बाद में बता दूँगी:।*
"आप पर अविश्वास का तो प्रश्न ही नही उठता आपकी काबलियत के तो हम पहले ही कायल हैं1ऐसा करें आप शाम को घर आ जायें आशा भी होगी1अपसे मिल कर खुश होगी अगर जरूरी हुआ तो आपको वहीं नियुक्ती पत्र मिल जायेगा।"
*ठीक है मगर अभी नंद से कुछ मत कहियेगा1"कहते हुये मै बाहर आ गयी
घर पहुँची एक अटैची मे अपने कपडे और जरूरी समान डाला और पत्र लिखने बैठ गयी--
नंदजी,
अंतिम नमस्कार्1
आज तक हमे एक दूसरे से क्भी कुछ कहने सुनने की जरूरत नहीं पडी1 आज शायद मैं कहना भी चाहूँ तो आपके रुबरु कह नहीं पाऊँगी1 आज आपकी अलमारी में झांकने की गलती कर बैठी1अपको कभी गलत पाऊँगी सोचा भी नहीं था आज मेरे स्वाभिमान को आपने चोट पहुँचाई है1जो इन्सान छोटी से छोटी बात भी मुझ से पूछ कर किया करता था वो आज जिन्दगी के अहम फैसले भी अकेले मुझ से छुपा कर लेने लगा है1मुझे लगता है कि उसे अब मेरी जरुरत नहीं है1आज ये भी लगा है कि शादी से पहले आप अकेले थे, एक जरुरत मंद आदमी थे जिन्हें घर बसाने के लिये सिर्फ एक औरत की जरूरत थी, अर्धांगिनी की नहीं1 ठीक है मैने आपका घर बसा दिया है1पर् आज मै जो एक भरे पूरे परिवार से आई थी, आपके घर में अकेली पड गयी हूँ1तीस वर्ष आपने जो रोटी कपडा और छत दी उसके लिये आभारी हूँ1किसी का विश्वास खो कर उसके घर मे अश्रित हो कर रहना मेरे स्वाभिमान को गवारा नही1मुझे वापिस बुलाने मत आईयेगा,मै अब वापिस नहीं आऊँगी1 अकारण आपका अपमान हो मुझ से अवमानना हो मुझे अच्छा नहीं लगेगा1इसे मेरी धृ्ष्ट्ता मत समझियेगा1ये मेरे वजूद और आत्मसम्मान क प्रश्न है1खुश रहियेगा अपने अहं अपनी धन संपत्ती और अपने बच्चों के साथ्1
जो कभी आपकी थी,
रमा1
मैने ये खत और वसीयत वाले कागज़ एक लिफाफे मे डाले और लिफाफा इनके बैड पर रख दिया1अपना अटैची उठाया और नौकर से ये कह कर निकल गयी कि जरूरी काम से जा रही हूँ1मुझे पता था कि नंद एक दो घन्टे मे आने वाले हैं फिर नहीं निकल पाऊँगी1 आटो ले कर आशा के घर निकल पडी----------क्रमश

18 November, 2009

अस्तित्व

कागज़ का एक टुकडा क्या इतना स़क्षम हो सकता है कि एक पल में किसी के जीवन भर की आस्था को खत्म कर दे1मेरे सामने पडे कागज़् की काली पगडँडियों से उठता धुआँ सा मेरे वजूद को अपने अन्धकार मे समेटे जा रहा था1 क्या नन्द ऐसा भी कर सकते हैं? मुझ से पूछे बिना अपनी वसीयत कर दी1 सब कुछ दो बडे बेटों के नाम कर दिया 1 अपने लिये मुझे रंज ना था, मैं जमीन जायदाद क्या करूँगी 1मेरी जायदाद तो नन्द,उनका प्यार और विश्वास था 1मगर उन्होंने तो मेरी ममता का ही बंटवारा कर दिया 1 उनके मन मे तीसरे बेटे के लिये लाख नाराज़गी सही पर एक बार माँ की ममता से तो पूछते1--काश मेरे जीते जी ये परदा ही रहता मेरे बाद चाहे कुछ भी करते1---बुरा हो उस पल का जब इनकी अलमारी में मैं राशन कार्ड ढुढने लगी थी1तभी मेरी नजर इनकी अलमारी मे रखी एक फाईल पर पडी1उत्सुकता वश कवर पलटा तो देखते ही जैसे आसमान से गिरी1 अगर मैं उनकी अर्धांगिनी थी तो जमीन जायदाद में मेरा भी बराबर हक था1 मन क्षोभ और पीडा से भर गया इस लिये नहीं कि मुझे कुछ नहीं दिया बल्कि इस लिये कि उन्होंने मुझे केवल घर चलाने वली एक औरत ही समझा अपनी अर्धांगिनी नहीं। यही तो इस समाज की विडंबना रही है1 तभी आज औरत आत्मनिर्भर बनने के लिये छटपटा रही है। मुझे आज उन बेटों पर आश्रित कर दिया जो मुझ पर 10 रुपये खर्च करने के लिये भी अपनी पत्नियौ क मुँह ताका करते हैं
भारी मन से उठी,ेअपने कमरे मे जा कर लेट गयी1 आज ये कमरा भी मुझे अपना नहीं लग रहा था1कमरे की दिवारें मुझे अपने उपर हंसती प्रतीत हो रही थी1छत पर लगे पंखे कि तरह दिमाग घूमने लगा1 30 वर्श पीछे लौत जाती हूं
"कमला,रमा के लिये एक लडका देखा है1 लडके के माँ-बाप नहीं हैं1मामा ने पाला पोसा है1जे.ई. के पद पर लग है1माँ-बाप की बनी कोठी है कुछ जमीन भी है1कोई ऐब नहीं है1लडका देख लो अगर पसंद हो तो बात पक्की कर लेते हैं"1 पिता जी कितने उत्साहित थे1
माँ को भी रिश्ता पसंद आगया 1मेरी और नंद की शादी धूम धाम से हो गयी1 हम दोनो बहुत खुश थे1
"रमा तुम्हें पा कर मैं धन्य हो गया मुझे तुम जैसी सुशील लड्की मिली है1तुमने मेरे अकांगी जीवन को खुशियों से भर दिया1" नंद अक्सर कहते1 खुशियों का ये दौर चलता रहा1 हम मे कभी लडाई झगडा नही हुआ1सभी लोग हमारे प्यार औरेक दूसरे पर ऐतबार की प्रशंसा करते1
देखते देखते तीन बेटे हो गये1 फिर नंद उनकी पढाई और मै घर के काम काज मे व्यस्त हो गये1
नंद को दफ्तर का काम भी बहुत रहता था बडे दोनो बेटों को वो खुद ही पढाते थे लेकिन सब से छोटे बेटे के लिये उन्हें समय नही मिलता था छोटा वैसे भी शरारती था ,लाड प्यार मे कोइ उसे कुछ कहता भी नहीं था ।स्कूल मे भी उसकी शरारतों की शिकायत आती रहती थी1उसके लिये ट्यूशन रखी थी,मगर आज कल ट्यूशन भी नाम की है1 कभी कभी नंद जब उसे पढाने बैठते तो देखते कि वो बहुत पीछे चल रहा है उसका ध्यान भी शरारतों मे लग जाता तो नंद को गुसा आ जाता और उसकी पिटाई हो जाती1 धीरे धीरे नंद का स्व्भाव भी चिड्चिदा सा हो गया। जब उसे पढाते तो और भी गुस्सा आता हर दम उसे कोसना उनका रोज़ का काम हो गया।
दोनो बदे भाई पढाई मे तेज थे क्यों कि उन्हें पहले से ही नंद खुद पढाते थे1 दोनो बडे डाक्टर् बन गये मगर छोटा मकैनिकल का डिपलोमा ही कर पाया1 वो घूमने फिरने का शौकीन तो था ही, खर्चीला भी बहुत था नंद अक्सर उससे नाराज ही रहते1कई कई दिन उससे बात भी नहीं करते थे। मैं कई बार समझाती कि पाँचो उंगलियाँ बराबर नही होती1 जवान बच्चों को हरदम कोसना ठीक नहीं तो मुझे झट से कह देते "ये तुम्हारे लाड प्यार का नतीजा है1" मुझे दुख होता कि जो अच्छा हो गया वो इनका जो बुरा हो गया वो मेर? औरत का काम तो किसी गिनती मे नहीं आता1इस तरह छोटे के कारण हम दोनो मे कई बार तकरार हो जाती1
दोनो बडे बेटों की शादी अच्छे घरों मे डाक्टर् लडकियों से हो गयी1नंद बडे गर्व से सब के सामने उन दोनो की प्रशंसा करते मगर साथ ही छोटे को भी कोस देते1धीरे धीरे दोनो में दूरि बढ गयी1 जब छोटे के विवाह की बारी आयी तो उसने अपनी पसंद की लडकी से शादी करने की जिद की मगर नंद सोचते थे कि उसका विवाह किसी बडे घर मे हो ताकि पहले समधियों मे और बिरादरी मे नाक ऊँची् रहे। छोटा जिस लडकी से शादी करना चाहता था उसका बाप नहीं था तीन बहिन भाईयों को मां ने बडी मुश्किल से अपने पाँव पर खडा किया था।जब नंद नहीं माने तो उसने कोर्ट मैरिज कर ली1 इससे खफा हो कर नंद ने उसे घर से निकल जाने का हुकम सुना दिया1
अब नंद पहले जैसे भावुक इन्सान नही थे1 वो अब अपनी प्रतिष्ठा के प्रती सचेत हो गये थे। प्यार व्यार उनके लिये कोई मायने नहीं रखता था 1छोटा उसी दिन घर छोड कर चला गया वो कभी कभी अपनी पत्नी के साथ मुझे मिलने आ जाता था1 नंद तो उन्हें बुलाते ही नहीं थे1 उन्हें मेरा भी उन से मिलना गवारा नहि था /मगर माँ की ममता बेटे की अमीरी गरीबी नही देखती ,बेटा बुरा भी हो तो भी उसे नहीं छोड सकती।
कहते हैँ बच्चे जीवन की वो कडी है जो माँ बाप को बान्धे रखती है पर यहाँ तो सब उल्टा हो गया था।हमारे जिस प्यार की लोग मसाल देते थे वो बिखर गया था मैं भी रिश्तों मे बंट गयी थी आज इस वसीयत ने मेरा अस्तित्व ही समाप्त कर दिया था---
"मालकिन खाना खा लो" नौकर की आवाज से मेरी तंद्रा टूटीऔर अतीत से बाहर आई\ क्रमश:

17 November, 2009

कविता

भेजी हैं नासा ने
मंगल से
कुछ तस्वीरें
कहा मंगल पर
कभी हुया करती थी नहरें
शायद कभी टकराया था केतू
कोई और कर दिया था
मंगल के दिल पर छेद्
मगर मैं जानती थी
बहुत पहले सुना भी था कि
मंगल का संबन्ध तुम से था
और मेरा वीनस {शुक्र} से
मुझे पता है वो नहर
मेरे आँसूओँ का समुद्र था
जो तुम्हारी कठौरता, निर्दयता पर
मैने ने बहाये थे
वो केतू और कोई नहीं
मेरी आहों का धूम केतू था
जिसने तुम पर बरसाये
तमाम उम्र आँसू
मगर तोड सकी न तेरा गरूर
और सूख गया वो दरिया भी
ज्यों ज्यों जली मेरे जज़्बातों की अर्थी
शाप दिया था मैने
नहीं पनपेगा ए मंगल
तुझ पर जीवन मेरे बाद
और आज भी तू पत्थर ही है
केवल पत्थर की चट्टान

-- निर्मला कपिला

14 November, 2009

गज़ल

इस गज़ल को सजाया संवारा मेरे बडे भाई साहिब श्री प्राण शर्मा जी ने
इस लिये ये कहने लायक हुई है । उनका आशीर्वाद ही मेरी प्रेरणा है



तराने प्यार के सबको ज़रा गा कर सुनाया कर
कि जैसे गुल लुभाते हैं तू वैसे ही लुभाया कर

ज़रा पहचान अपने को, खुदा का बंदा होकर भी
खुदा के नाम पर बन्दे न लोगों को लड़ाया कर

परिंदे देखकर उड़ते हुए आकाश में यूँ ही
करे तेरा कभी मन ओड़नी लेकर उडाया कर

करे मजबूर कहने को मुझे तेरे फसाने को
न दूरी के ये झूठे से बहाने अब बनाया कर

करे धोखा गरीबों से मिलावट कर कमाए नोट
कभी भगवान का बन्दे जरा तो खौफ खाया कर

विदेशी खाए,पहने भी विदेशी तू, बता क्योंकर
कभी पहचान अपने देश की भी तू दिखाया कर

10 November, 2009

गज़ल
दीपावली के शुभ अवसर पर गज़ल गुरू पंकज सुबीर जी ने एक तरही मुशायरे का आयोजन अपने ब्लाग पर किया। जिसमे देश विदेश के उस्ताद शायरों और उनके शिश्यों ने भाग लिया। कहते हैं न कि तू कौन ,मैं खामखाह। वही काम मैने किया। अपनी भी एक गज़ल ठेल दी।जिसे गज़ल उस्ताद श्री प्राण शर्मा जी ने संवारा । मगर सुबीर जी की दरियादिली थी कि उन्हों ने मुझे इस मे भाग लेने का सम्मान दिया।तरही का मिसरा था------ दीप जलते रहे झिलमिलाते रहे

शोखियाँ नाज़ नखरे उठाते रहे
वो हमे देख कर मुस्कुराते रहे

हम फकीरों से पूछो न हाले जहाँ
जो मिले भी हमे छोड जाते रहे

याद उसकी हमे यूँ परेशाँ करे
पाँव मेरे सदा डगमगाते रहे

हाथ से टूटती ही लकीरें रही
ये नसीबे हमे यूँ रुलाते रहे

वो वफा का सिला दे सके क्यों नहीं
बेवफा से वफा हम निभाते रहे

शाख से टूट कर हम जमीं पर गिरे
लोग आते रहे रोंद जाते रहे

जब चली तोप सीना तना ही रहा
लाज हम देश की यूँ बचाते रहे
[ये शेर मेजर गौतम राज रिशी जी के लिये लिखा था]


02 November, 2009

गज़ल

बहुत दिन से किसी के ब्लाग पर नहीं आ पायी जिस के लिये क्षमा चाहती हूँ।
कुछ दिन से अस्वस्थ हूँ। डा़ ने आराम करने की सलाह दी है। मगर 2-4 दिन मे ही लगने लगा है कि जैसे दुनिया से कट गयी हूँ।बच्चे मुझे नेट पर भी नहीं बैठने देते। ब्लोग नहीं लिखने देते तो सारा दिन बिस्तर पर पडा आदमी तो और बीमार हो जायेगा। कल अचानक शाम को 5 बजे एक फोन आया कि *मैं अकबर खान बोल रहा हूँ। [अकबर खान जी The NetPress.Com vaale] हम लोग नंगल आये थे तो सोचा कि आपसे भी मिलते चलें।* मैं उस समय सो रही थी। एक दम से पता नहीं कहाँ से इतनी फुर्ती आ गयी कि मुझे लगा ही नहीं कि बीमार हूँ। उनके आने की इतनी खुशी हुई कि बता नहीं सकती। काफी देर ब्लोगिन्ग के बारे मे बातें हुई। और इस पर भी चर्चा हुई कि एक ब्लागर्ज़ मीट नंगल् मे रखी जाये। सेहत ठीक होते ही इस पर विचार करेंगे । उनकी पत्नि हमारे शहर से है ये जान कर और भी खुशी हुई। दोनो पति पत्नि इस तरह मिले जैसे हम लोग कई वर्षों से जानते हों। जाते हुये मुझ से आशीर्वाद मांगा तो मन भीग सा गया। इस ब्लाग्गिंग ने मुझे कितने रिश्ते कितनी खुशियां दी हैं सोचती हूँ तो मन भर आता है। जीने के लिये और क्या चाहिये? ऐसा लगता है कि अब हर खुशी और हर गम मेरी ब्लागिन्ग से ही जुडा हुया है। कहते हैं कि जिस इन्सान का बुढापा सुखमय और खुशियों से भरा हो वो इन्सान खुशनसीब होता है। क्यों कि जवानी मे तो iइन्सान के पास हिम्मत होती है सहनशक्ति होती है मगर बुढापे मे दुख सहन करने की ताकत नहीं होती। इस हिसाब से मैं खुशनसीब हूँ उमर चाहे कम हो या अधिक क्या फर्क पडता है जितनी भी हो सुखमय हो बस । । अकबरखान जी का धन्यवाद कि उन्होंने मुझे याद रखा और मेरे घर आने का कष्ट किया।
एक छोटी सी गज़ल ठेल रही हूँ पता नहीं बहर मे है या नहीं। आप देखें।ये मिसरा अनुज सुबीर जी ने दीपावली पर तरही मुशायरे पर दिया था उसी पर ये एक और गज़ल है jजो वहाँ नहीं भेज पाई थी।

दीप जलते रहे झिलमिलाते रहे
दौर खुशियों के हम को लुभाते रहे

कौल करके निभाना न आया तुझे
यूँ निरे झूठ हम को बताते रहे

क्या गिला है मुझे कुछ बता तो सही
कौन से फासले बीच आते रहे

दूरियाँ यूँ बनी देखते ही गये
पास रहते हुये दूर जाते रहे

जश्न ऐसे मनाया तेरी मौत का
हम बने आग खुद को जलाते रहे

चाह कर भी भुला ना सकी मैं तुझे
रोज़ ही ख्वाब तेरे रुलाते रहे

खुर्सियाँ राजसी खून से हैं सनी
होलियाँ खून की वो मनाते रहे


28 October, 2009

गज़ल

यह गज़ल भी अपने बडे भाई साहिब आदरणीय प्राण शर्माजी के आशीर्वाद
और गलतियाँ निकालने के बाद ही सजी संवरी है ।
मैं उन की शुक्रगुज़ार हूँ कि अपना इतना कीमती समय निकाल कर
मुझे गज़ल सिखा रहे हैं।उनका धन्यवाद् कह कर इस ऋण से मुक्त
नहीं होना चाहती, उनकी चिरायू और सुख समृद्धि के लिये दुआ करती हूँ।
अपको कैसी लगी?



सुनहरे हर्फों को दिल पर मेरे आकर सजाये कौन
मेरी किस्मत मेरे माथे पे खुशियों की बनाये कौन

बहुत नाराज़ हो तुम भी बहुत नाराज़ मैं भी हूँ
चलो छोडो सभी शिकवे,मगर पहले मनाये कौन

उठे ऊपर अगरचे लौ बुझाने को लगे सब ही
मगर बढती हुई उसकी पिपासा को बुझाये कौन

बनाया स्वार्थ को तूने मुकाम अपना बता क्योंकर
दया, करुणा,मुहब्बत और सच्चाई पढाये कौन

कहे इन्सान खुद को तू मगर हैवान लगता है
बता इन्सानियत के गुर तुझे कुछ भी सिखाये कौन

चले बंदूक ले कर हाथ मे बेखौफ वो ऐसे
फिज़ा मे खौफ की फैली सदाओं को सुनाये कौन


जला तू आग सीने मे बने अँगार जज़्वा यूँ
सिवा तेरे बता तू देश तेरा अब बचाये कौन


26 October, 2009

बेटियों की माँ (कहानी )
सुनार के सामने बैठी हूं । भारी मन से गहनों की पोटली पर्स मे से निकाल कर कुछ देर हाथ में पकड़े रखती हूं । मन में बहुत कुछ उमड़ घमुड़ कर बाहर आने को आतुर है । कितन प्यार था इन जेवरों से । जब कभी किसी शादी व्याह पर पहनती तो देखने वाले देखते रह जाते । किसी राजकुमारी से कम नही लगती थी । खास कर लड़ियों वाला हार कालर सेट पहन कर गले से छाती तक सारा झिलमला उठता । मुझे इन्तजार रहता कि कब कोई शादी व्याह हो तो सारे जेवर पहून । मगर आज ये जेवर मेरे हाथ से निकले जा रहे थे । दिल में टीस उठती है ----- दबा लेती हू ---- लगता है आगे कभी व्याह शादियों का इन्तजार नही रहेगा -------- बनने संवरन की इच्छा इन गहनों के साथ ही पिघल जाएगी । सब हसरतें लम्बी सास खींचकर भावों को दबाने की कोशिश करती हू । सामने बेटी बैठी है -------- अपने जेवर तुड़वाकर उसके लिए जेवर बनवाने है ----- क्या सोचेगी बेटी ----- मा का दिल इतना छोटा है ? अब मा की कौन सी उम्र है इतने भारी जेवर पहनने की ------------- अपराधी की तरह नज़रें चुराते हुए सुनार से कहती हू ‘ देंखो जरा, कितना सोना है ? वो सारे जेवरों को हाथ में पकड़ता है - उल्ट-पल्ट कर देखता है - ‘इनमें से सारे नग निकालने पड़ेंगे तभी पता चलेगा ?‘‘
टीस और गहरी हो जाती है --------इतने सुन्दर नग टूट कर पत्थर हो जाएगे जो कभी मेरे गले में चमकते थे । शायद गले को भी यह आभास हो गया है -------बेटी फिर मेरी तरफ देखती है ----- गले से बड़ी मुकिल से धीमी सी आवाज़ निकलती है ---हा निकाल दो‘ ।
उसने पहला नग जमीन पर फेंका तो आखें भर आई । नग के आईने में स्मृतियां के कुछ रेषे दिखाई दिए । मा- पिता जी - कितने चाव से पिता जी ने आप सुनार के सामने बैठकर यह जेवर बनवाए थे । ‘ मेरी बेटी राजकुमारी इससे सुन्दर लगेगी । मा की आखें मे क्या था --- उस समय में मैं नही समझ पाई थी या अपने सपनों में खोई हुई मा की आखें में देखने का समय ही नही था । शायद उसकी आखों में वही कुछ था जो आज मेरी आखें में है, दिल में है ---- शरीर के रोम-रोम में है । अपनी मा का दर्द कहा जान पाई थी । सारी उम्र मा ने बिना जेवरों के काट दी । वो भी तीन बेटियों की शादी करते-करते बूढ़ी हो गई थी । अब बुढ़े आदमी की भी कुछ हसरतें होती हैं । बच्चे कहा समझ पाते हैं ---- मैं भी कहा समझ पाई--- इसी परंपरा में मेरी बारी है फिर कैसा दुख ----मा ने कभी किसी को आभास नहीं होने दिया, उन्हें शुरू से कानों में तरह-तरह के झूमके, टापस पहनने का शौक था मगर छोटी की शादी करते-करते सब कुछ बेटियों को दे दिया । फिर गृहस्थी के बोझ में फिर कभी बनवाने की हसरत घरी रह गई । किसी ने इस हसरत को जानने की चेष्टा भी नही की । औरत के दिल में गहनों की कितनी अहमियत होती है ---- यह तब जाना जब छोटी के बेटे की शादी पर उन्हें सोने के टापस मिले । मा के चेहरे का नूर देखते ही बनता था ‘देखा, मेरे दोहते ने नानी की इच्छा पूरी कर दी‘‘ वो सबसे कहती ।
धीरे-धीरे सब नग निकल गए थे । गहने बेजान से लग रहे थे । शायद अपनी दुर्दाशा पर रो रहे थे --------------‘ अभी इन्हें आग में गलाना पड़ेगा तभी पता चलेगा कि कितना सोना निकलेगा ।‘‘
‘हा,, गला दो‘ बचा हुआ साहस इकट्‌ठा कर, दो शब्द निकाल पाई ।
उसने गैस की फूकनी जलाई । एक छोटी सी कटोरी को गैस पर रखा, उसमें उसने गहने डाले और फूकनी से निकलती लपटों से गलाने लगा । लपलपाटी लपटों से सोना धधकने लगा । एक इतिहास जलने लगा ---- टीस और गहरी हुई । लगा जीवन में अब कोई चाव ----- नही रह गया है ---- एक मा‘-बाप के बेटी के लिए देखे सपनों का अन्त हो गया और मेरे मा- बाप के बीच उन प्यारी यादों का अन्त हो गया ----- भविष्य में अपने को बिना जेवरों के देखने की कल्पना करती हू तो ठेस लगती है । मेरी तीन समघनें और मैं एक तरफ खड़ी बातें कर रही है । इधर-उधर लोग खाने पीने में मस्त है । कुछ कुछ नज़रें मुझे ढूंढ रही है । थोड़ी दूर खड़ी औरतें बातें कर रही है । एक पूछती है ‘लड़की की मा कौन सी है ? ‘‘दूसरी कहती है ‘अरे वह जो पल्लू से अपने गले का आर्टीफिशल नेकलेस छुपाने की कोशिश कर रही है ।‘‘ सभी हस पड़ती हैं । समघनों ने शायद सुन लिया है ----- उनकी नज़रें मेरे गले की तरफ उठी --------- क्या है उन आखों में जो मुझे कचोट रहा है ---- हमदर्दी ----- दया--- नहीं--नहीं व्यंग है, बेटिया जन्मी हैं तो सजा तो मिलनी ही थी ----- उनके चेहरे पर लाली सी छा जाती है । बेटों का नूर उनके चेहरे से झलकने लगता है । अन्दर ही अन्दर ग‌र्म से गढ़ी जा रही हूं, क्यों ? क्या बेटियों की मा होना गुनाह है ---- सदियों से चली आ रही इस परंपरा से बाहर निकल पाना कठिन है । आखें भर आती हैं । साथ खड़ी औरत कहती है बेटियों को पराए घर भेजना बहुत कठिन है और मुझे अन्दर की टीस को बाहर निकालने का मौका मिल जाता है । एक दो औरतें और सात्वना देती है । ---- आसुयों को पोंछकर कल्पनाओं से बाहर आती हू । मैं भी क्या उट पटाग सोचने लगती हू --- अभी तो देखना है कि कितना सोना है । शायद उसमें थोड़ा सा मेरे लिये भी बच जाए । सुनार ने गहने गला कर सोने की छोटी सी डली मेरे हाथ पर रख दी । मुटठी में भींच कर अपने को ढाढस बंधाती हू । इतनी सी डली में इतने वर्षों का इतिहास समाया हुआ था । तोल कर हिसाब लगाती हू तो बेटी के जेवर भी इसमें पूरे नही पड़ते है ------ मेरा सैट कहा बनेगा । फिर सोचती हू सास का सैट रहने देती हू ---- बेटी को इतना पढ़ा लिखा दिया है एक महीने की पगार में सैट बनवा देगी । मुझे कौर बनावाएगा ? मगर दूसरे ही पल बेटी का चेहरा देखती हू । सारी उम्र उसे सास के ताने सुनने पड़ेंगे कि तुम्हारे मा-बाप ने दिया क्या है------ नहीं नही मन को समझाती ह अब जीवन बचा ही कितना है । बाद में भी इन बेटियों का ही तो है । एक चादी की झाझर बची थी । उस समय - समय भारी घुघरू वाली छन छन करती झाझरों का रिवाज था ----- नई बहू की झाझर से घर का कोना कोना झनझना उठता । साढ़े तीन सौ ग्राम की झाझर को पुरखों की विरासत समझ कर रखना चाहती थी मगर पैसे पूरे नही पड़ रहे थे दिल कड़ा कर उसे भी सुनार को दे दिया । सुनार के पास तो यू पुराने जेवर आधे रह जाते है ------- झाझर को एक बार पाव में डालती हू -------------- बहुत कुछ आखें में घूम जाता है । बरसों पहले सुनी झकार आज भी पाव में थिरकन भर देती है । मगर आज पहन कर भी इसकी आवाज बेसुरी लग रही है ---शायद आज मन ठीक नही है । उसे भी उतार कर सुनार को दे देती हू ।
सुनार से सारा हिसाब किताब लिखवाकर गहने बनने दे देती हू । उठ कर खड़ी होती हू तो लड़खडार जाती हू । जैसे किसी ने जान निकाल दी हो । बेटी बढ़कर हाथ पकड़ती है---- डर जाती हू कहीं बेटी मेरे मन के भाव ने जान ले । उससे कहती हू अधिक देर बैठने से पैर सो गए हैं । अैार क्या कहती ? कैसे बताती कि इन पावों की थिरकन समाज की परंपंराओं की भेंट चढ़ गई है ।
सुनार सात दिन बात जेवर ले जाने को कहता है । सात दिन कैसे बीते बता नहीं सकती--- हो सकता है मैं ही ऐसा सोचती हू । ाायद बाकी बेटियों की मायें भी ऐसा ही सोचती होंगी । आज पहली बार लगता है मेरी आधुनिक सोच कि बेटे-बेटी में कोई फरक नहीं है , चूर-चूर हो जाती है --- जो चाहते हैं कि समाज बदले बेटी को सम्मान मिले --- वो सिर्फ लड़की वाले हैं । कितने लड़के वाले जो कहते है दहेज नहीं लेंगे ? वल्कि वो तो दो चार नई रस्में और निकाल लेते है । उन्हें तो लेने का बहाना चाहिए । लगता है और कभी इस समस्या से मुक्त नही हो सकती ।------ औरत ही दहेज चाहती है । औरत ही दहेज चाहती है सास बनकर ------- औरत ही दहेज देती है, मा बनकर । लगता है तीसरी बेटी की शादी पर बहुत बूढ़ी हो गई हू ----- शादियों के बोझ से कमर झुक गई है ----- खैर अब जीवन बचा ही कितना है । आगे बेटियां कहती रहती थी ‘मा यह पहन लो, वो पहन लो---- ऐसे अच्छी लगती है -----‘अब बेटिया ही चली गई तो कौन कहेगा । कौन पूछेगा ----मन और भी उदास हो जाता है । रीता सा मन----रीता सा बदन- लिए हफते बाद सुनार के यहा फिर जाती हू ---- बेटी साथ है ---- बेटी के चेहरे पर चमक देखकर कुछ सकून मिलता है ।
जैसे ही सुनार ने गहने निकाल कर सामने रखे, बेटी का चेहरा खिल उठता है ---- उन्हें बड़ी हसरत से पहन-पहन कर देखती है और मेरी आखों के सामने 35 वर्ष पहले का दृष्य घूम गया--------मैं भी तो इतनी ही खु थी -----------मा की सोचों से अनजान -------लेकिन आज तो जान गई हू --- सदियों से यही परंपरा चली आज रही है -----मैं वही तो कर रही जो मेरी मा ने किया ---बेटी की तरफ देखती हू उसकी खूशी देखकर सब कुछ भूल जाती ---- अपनी प्यारी सी राजकुमारी बेटी से बढ़कर तो नहीं हैं मेरी खुायॉं -----मन को कुछ सकून मिलता है ----जेवर उठा कर चल पड़ती हॅ बेटी की ऑंखों के सपने देखते हुूए । काष ! मेरी बेटी को इतना सुख दे, इतनी शक्ति दे कि उसको इन परंपराओं को न निभाना पड़े ----- मेरी बेटी अब अबला नहीं रही, पढ़ी लिखी सबला नारी है, वो जरूर दहेज जैसे दानव से लड़ेगी ----- अपनी बेटी के लिए----मेरी ऑंखों में चमक लौट आती है -----पैरों की थिरकन मचलने लगती है --------------।


---निर्मला कपिला

23 October, 2009

क्यों दर्द होता है (कहानी )

एक बार पूछा था तुम ने ------- रुद्र तुम्हारी आँखों मे दर्द क्यों रहता है------ क्यो तुम्हारी आँखें बुझी बुझी सी रहती हैं------ तुम्हारी आवाज़ जैसे कहीं गहरे कूयें से आ रही हो ------ एक बार मे इतने सवाल ------ मै हमेशा की तरह चुप कर गया था------- अपने दर्द मे किसी को शामिल करना मुझे मँजूर नहीं था फिर उसे------- जिस की खुशी के लिये मैने इतने दर्द पाल लिये थे------- सोचा था कि तुम्हें कभी नहीं बताऊँगा-------- मगर ---- आज जरा स्वार्थी हो गया हूँ------- पता नहीं क्यों, शायद जानता हूँ कि अब जीवन के कुछ दिन ही बाकी हैं--- चाहता हूँ कि तुम्हें बताऊँ------ पर शायद ये मेरे पन्नों मे ही कैद रह जाये------ फिर भी बता दूँ------- मुझे कब दर्द होता है क्यों होता है--------
मुझे इन विरान दिवारों मे अकेले लेटे हुये दर्द नहीं होता------ ये रेत की दिवारें मेरे सारे गम सोख लेती हैं------- ये मेरा कमरा मेरे हर पल का साथी है-------- मैं जब इन दिवारों से बातें करता हूँ------ तो कहीं से एक तस्वीर इन पर उभरने लगती है------ एक सुन्दर सी छोटी सी लडकी------- धीरे धीरे वो मेरे पास आ कर खडी हो जाती है------ और मेरा हाथ पकड कर मुझे बाहर की ओर खींचती है मेरे बेजान शरीर मे पता नहीं कहाँ से इतनी ताकत आ जाती है कि मैं उसके पीछे पीछे चल पडता हूँ ------ इस आशा मे कि शायद अब ये मुझे कहेगी कि बाहर देखो जामुन का पेड जामुन से भरा पडा है मुझे तोड कर दो या फिर आम के लिये कहेगी------ फिर से एक सपना आँखों मे तैरने लगता है------- बाहर जाते ही पता नहीं मेरा हाथ छोड कर वो कहाँ गायब हो जाती है------ और मैं खुद को लम्बे लम्बे घने चीड के पेडों के बीच अकेले पाता हूँ जरा सी कसक होती है तो उसे दिल से बाहर फेंकने की कोशिश करता हूँ------- फिर मुझे लगता है कि शायद वो इन पेडों के पीछे छुप गयी है और छुपा छुपी खेलना चाहती है मैं---- इन पहाडों पर पेडों के बीच बनी पगडँडिओं पर चल पडता हूँ------ चलता जाता हूँ----- पहाडों का घना अँधेरा------ सर्द हवा------ मगर उसे ढूँढते हुये पसीन पसीना हो जाता हूँ------ नहीं ढूँढ पाता------ थक हार कर वहीं बैठ जाता हूँ कदम साथ नहीं देते------- दूर दूर तक एक अजीब सा सन्नाटा------ और तब दर्द होता है------- जब उसे ढूँढ नहीं पाता ----शायद तुम्हें इस मे कोई दर्द की वजह ना लगे पर मेरे दर्द की वजह वो छोटी सी मासूम लडकी है------ जिसे जितना भूलना चाहता हूँ उतना ही वो याद् आती है-----
फिर भी चलती जाती है ज़िन्दगी----- कहीं गहरे मे छुपा लेता हूँ अपना ये दर्द------ फिर कई बार इन दिवारों से भी तंग आ जाता हूँ तो बाहर बगीचे मे आ कर बैठ जाता हूँ------ अभी सूरज छिपा ही होता है----- फिर दूर कहीं लम्बे घने पेडों के पीछे से लगता है कि कोई साया सा मेरी तरफ चला आ रहा है------- ये तुम्हारा आँचल है शायद तुम कब बडी हो गयी जान ही नहीं पाया------- आज पहली बार देखा है दुपट्टा ओढे हुये या शायद आगे भी लिया हो मैं ही नहीं देखना चाहता था तुम्हें बडी होते हुये------ फिर कसक होती है हम बडे क्यों हो जाते हैं------- लगता है किसी ने मेरे कन्धे पर हाथ रखा है ------
आँखें बन्द कर लेता हूँ ------- सायँ सायँ की आवाज़ सुन रहा हूँ------- शायद तुम्हारी साँसों की आवाज़ है------- मगर ऐसी तो नहीं थी तुम्हारी साँसों की आवाज़ ---- दिल की धडकन सुनाई दे रही थी------ इतने ज़ोर से तो नहीं धडकता था तुम्हारा दिल------ और टीस उठती है जब देखता हूँ कि तुम नहीं हो ये तो पेडों की सरसराहट ह--- धडकन नहीं---- पत्तों की खडखडाहट है----- फिर उदास हो जाता हूँ----- याद आ जाता है वो दिन जब आखिरी बार तुम बैठी थी मेरे पास ------ तुम तब बडी हो गयी थी------- कितनी चमक थी तुम्हारी आँखों मे ये बताते हुये कि तुम्हारी शादी तय हो गयी है---- तब मैने ऐसी ही धडकन सुनी थी तुम्हारे दिल की------ और तुम्हारी ये धडकन मेरे लिये दर्द बन गयी थी ------ ये घाव इतना गहरा है कि इसे अभी नहीं दिखाऊँगा------ कभी दिखाऊँगा जरूर कि वो रात मेरे लिये कितनी दर्दनाक थी-- अब जब बताने पे आ ही गया हूँ तो सब कुछ धीरे धीरे एक एक कर के बताऊँगा ------ हाँ तो मै क्या बता रहा था---- हां उस दिन्-- तुम पर नहीं खुद पर क्रोध आ रहा था या शायद तरस आ रहा था कि ----- काश ये धडकन मेरे लिये होती ------ काश कि ये चमक मेरे लिये होती---- इसी का तो इन्तज़ार करता रहा था मै------ काश कि तुम्हें बता पाया होता------ क्यों नही बता पाया----- मुझे लगता था कि तुम्हें खुद समझ जाना चाहिये ------ मगर ये जानते हुये कि तुम बहुत नादान और मासूम हो------ बचपना नहीं छोड् पाइ हो------- मै तुम्हारे बडे होने का इन्तज़ार करता रहा------- उस दिन भी तुम्हारी ेआँखों मे खुशी की चमक देख कर मै हमेशा के लिये चुप रह गया------ तुम्हारे चेहरे पर उदासी देख ही नहीं सकता था------
मुझे वो दिन याद करके बहुत दर्द होता है बहुत्त पीडा होती है-------- तुम नहीं समझोगी------
फिर तब और भी दर्द होता है------ जब मैं अपनी किताबें ले कर बैठता हूँ------- तुम चुपके से स्लेट् ले कर मेरे सामने आ जाती हो सवाल पर सवाल पूछती रहती हो------ फिर मै एक बडा सा मुश्किल सवाल दे देता हूँ ताकि तुम्हें इसे हल करते हुये काफी समय लग जाये और मै उतनी देर तुम्हें देख सकूँ------ तुम्हारे चेहरे के एक एक रोम से मै वाकिफ था ----- मगर तुम जान ही नही पाई----- शायद तुम्हें डाँट देता था और तुम मुझ से डरती भी थी------ डाँट इस लिये देता कि तुम सिर उठा कर ना देख सको कि मैं तुम्हें देख रहा हूँ------- इस तरह मै तुम्हें हर पल अपनी आँखों मे बसाये रखता------ हम दूर दूर भी चले गये मगर मै तुम्हारा वो चेहरा नहीं भूल पाया ----- तुम्हें सब कुछ पढा कर भी जैसे कुछ नहीं पढा पाया ----- मेरा एक सवाल तुम कभी हल नहीं कर पाई---- या शायद उस सवाल की इबारत ही मैने गलत लिखी थी ----- ज़िन्दगी के सवाल को भी गणित के सवाल की तरह ही समझा था इस गलफहमी मे रहा कि आखिर तुम हल पूछने तो मेरे पास ही आयोगी-----
मगर अब तुम बडी हो गयी थी अपने सवाल खुद हल करने लगी थी------ और रोज़ जब भी कोई किताब ले कर बैठता हूं तो उन पन्नों पर तुम्हारी तस्वीर देखता हूँ------ और वही मेरे दर्द का कारण् बन जाती है। किस किस बात को कैसे भूलूँ------ मुझे दर्द तब होता है जब इन सब के लिये मै खुद को जिम्मेदार समझने लगता हूँ ----- क्यों नहीं बता पाया तुम्हें ------ कोई देखते देखते मुझ से मेरी जान छीन कर ले गया और मैं---- कुछ नहीं कर पाया मेरी बुजदिली मेरी व्यथा बन गयी-------- तब से आज तक तुम एक पल के लिये भी मुझ से दूर नहीं ----- अब भी कई बार लगता है कभी ना कभी शायद कोई ज़िन्दगी से जुडा सवाल ले कर तुम मेरे पास आओ------- और इसी इन्तज़ार मे जी रहा हूँ-------।
बाकी कल ------ अब कागज़ पर फिर तुम्हारी तस्वीर उभरने लगी है ----- इससे बातें करते करते सो जाऊँगा------ इस दर्द की इन्तहा तक पहुँच कर ही नींद आती है------ कल फिर सुनाऊँग कि मुझे दर्द क्यों होता है-------

21 October, 2009

गज़ल

ये गज़ल भी आदरणीय प्राण भाई साहिब के आशीर्वाद से और उनके हाथों सजी संवरी है। तो पढिये और बताईये कि मेरी ये कोशिश कैसी रही?

1222 1222 1222 1222



रहे तालिब सदा तेरे
दीदार-ए-नूर के जानम
न आया तू न कोई भी
पता तेरा मिला मुझ को

वफा को ही मिले धोखा
बता ऐसी रवायत क्यों
मैं हैराँ हूँ उजाले मे
भी अंधेरा मिला मुझ को

हज़ारों रोनकें होती रहें
होते रहें उत्सव्
उजडता सा सदा मेरा
जहाँ डेरा मिला मुझ को

सदा जीता रहा मर मर
के मैं यारो ख्यालों मे
मिला ये तोहफा देखो
जो गम तेरा मिला मुझ को

तिरे कन्धे पे सिर रख कर
लगा कोई मेरा भी है
चलो जीने को कोई साथ
ही मेरा मिला मुझ को

करे कोई गिला तो क्या?
बताओ तो सही *निर्मल*
मुहब्बत में बना बन कर
खुदा मेरा मिला मुझ को


19 October, 2009

गज़ल

गज़ल से पहले एक सूचना देना चाहती हूँ

क्यों सिर्फ दौलू है, हिन्दी विज्ञान कथा लेखक?


[कल्किआन् हिंदी मे प्रकाशित ] गॉवों में एक कहावत प्रचलित है, "माया तेरे तीन नाम, दौलू, दौलत, दौलत राम", यानि कि किसी के स्टेट्स के साथ उसका नाम भी बदलता जाता है। आज हिन्दी विज्ञान कथा के लेखकों पर विचार करते समय अनायास ही ये बात मुझे याद आई। ---डा. अरविन्द दुबे {पूरा आलेख हिन्दी कल्किआन ब्लोग पर पढें}

कल हिन्दी कल्कियान ब्लोग पर ये आलेख पढ रही थी तो विग्यान कथा मे रुची जागी। यहाँ तक मुझे लगता है कि बहु गिनती के लेखक इस बारे मे अधिक सचेत नहीं हैं । न ही पत्र पत्रिकाओं मे इसके बारे मे अधिक प्रचार प्रसार होता है। अगर कोई नया लेखक लिखने की कोशिश भी करता होगा तो पत्रिकाओं मे छपना बहुत कठिन है । अगर आप लोग विग्यान मे रुची रखते हैं और विग्यान पर साहित्य सृजन करना चाहते हैं तो आप कल्कियोन ब्लोग के लिये लिखें और वहाँ आपका मार्ग दर्शन करने के लिये और विग्यान साहित्य को नयी दिशा देने के लिये एक प्रयासरत टीम है। आप नीचे दिये गये लिन्क पर देख सकते हैं। और वहाँ से पूरी जानकारी ले सकते हैं।
इस आलेख को भी इसी ब्लोग पर पढें।

http://hindi.kalkion.com/articles




गज़ल

मेहरबानी का इजहार न कर
यूँ महफिल मे तु शर्मसार न कर

दोस्त को कुछ भी कह ले मगर
दोस्ती पर भूले से वार न कर

प्यार अगर तू जाने ही नहीं क्या है
यूँ बढ चढ के तो तकरार न कर्

जो *निर्मल * वक्त पे काम न आये
ऐसे दोस्त पर एतबार न कर

जो इन्साँ को हैवान बना दे खुद मे
तू आदत वो शुमार न कर

कौन किसी का साथ निभाए सदा
जाने वाले का इन्तज़ार न कर

इन्साँ है तो इन्सानियत निभा
महरूम वफा से संसार न कर

16 October, 2009

गज़ल

एक और कोशिश की है सही या गलत आप बतायें

सपने सुन्दर उजियारे देख
मौसम के अजब नज़ारे देख

देख घटा शरमाये उसको
नैना उस के कजरारे देख

चोर उच्चकों की दुनिया है
संसद के गलियारे देख

मजहब का ओढ नकाब रहे
मानवता के हत्यारे देख

जूतमजूत चले संसद मे
अब मुफतो मुफत नज़ारे देख

रक्षक,भक्षक जब बन बैठे
तो इन को कौन सुधारे देख

गीत गज़ल लिख वक्त गुजारें
सब तन्हाई के मारे देख

आँखों मे जिसको रखते थे
बह गए बन आँसू खारे देख

उसकी यादें रोज़ रुलायें बस
दर्द-ए-दिल के मारे देख

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