13 August, 2009

शहर की खुश नसीब औरत


वो हंसती है
मुस्कराती है और
शहर की सबसे
खुशनसीब, खुशहाल
और समझदार्
औरत कहलाती है
लोगों ने देखे हैं
उसके चमकते
मोती जैसे दाँत
शायद नहीं देख पाये
कि इनके पीछे
बिन्धी है उसकी जीभ
हर एक आन्त क्योंकि
वो हादसे, दुख, दर्द
सब की गोलियाँ बना
निगल जाती है
बिना दाँतों से छूआये
वो जानती है
एक कटु सत्य
कि सब सुख के साथी हैं
उसके दुख की गठरी
कोई नहीं उठायेगा
उसके जख्म कुरेदेगा
अपनी राह चला जायेगा
इस लिये वो हंसती है
खिलखिलाती है
और शहर की
खुशनसीब, खुशहाल
औरत् कहलाती है
वो नहीं जानते
एक बार समर्पण कर
किसी को दे दिये थे
अपने सब हक
उसके त्याग ने
निगल लिये थे सब सपने
और उसके फर्ज़ों ने
लील लिया था उसका वज़ूद
मगर अब तन मन
सब छलनी हो गया है
उसके पास बचा ही क्या है
पीडा टीस दर्द
और रिश्तों की
कुछ बची खुची किचरें
कहीं कोई घाव
रिसने ना लगे घाव
वो पी जाती है
इस दर्द से उपजे आँसू
और जोर से
ह्सती है मुस्कराती है
तभी तो शहर की
समझदार ,खुशनसीब
खुशहाल
औरत कहलाती है
मगर कितना महंगा पडता है
खुशनसीब कहलाना
ये सिर्फ वही जानती है


11 August, 2009

ये गज़ल मैने पंजाबी मे लिखी थी अपने गुरुजी स. बलबीर सैणी जी के आशीर्वाद से और इसे हिन्दी मे भी लिखा है। इसे अर्श जी से पास करवाया है । अर्श को धन्यवाद नहीं आशीर्वाद है कि मेरा बेटा अब मुझे राह दिखाने के कबिल हो गया है।


अपना कोई हाल नहीं
साँसों मे सुरताल नहीं

मार गयी मंहगाई जब्
रोटी है तो दाल नहींAlign Centre
बेटों ने खुद बांटा घर
माँ का हल फिलहाल नही

गीत गज़ल सब झूठे हैं
जिसमे बह* र् ख्याल नहीं

जेब भले ही खाली हो
दिल का पर कँगाल नहीं

नेतायों पे फंदे हो
काम दिखें करताल नहीं

जो नेता ना खेल सके
ऐसी कोई चाल नहीं

तेरे झूठ बना दूँ सच
बद नीयत बदहाल नहीं

बात जमीनी संसद मे
लेकिन  रोज  बवाल नहीं

निर्मल जीवन *निर्मल* है
कोई और सवाल नहीं

08 August, 2009

वक्त के पाँव -----गताँक से आगे -(कहानी)


ये रोज़ का उत्सव मै बहुत याद करती थी।
यासों से बाहर आयीजहाज एयरपोर्ट पर उतरने वाला था।उसके बाद बाहर निकलते एक घन्टा लग गया ।जैसी ही बाहर निकले सामने चाचाजी दिखाई दिये।आँखें बरस पडी----- माँ पिता जी सब याद आ गये।इतने सालों बाद भी चाचा बिलकुल वैसे ही लगे बस जरा कमजोर हो गये थे।चाचा जी के गले लग कर खूब रोई।टैक्सी ले कर घर की ओर चल पडे । कितना रास्ता चुपी मे निकल गया ---क्या पूछूँ--------

```**चाचा जी घर मे सब कैसे हैं\** मैने चुपी तोडी ।
**सब ठीक हैं बेटी तेरा इन्तज़ार कर रहे हैं।**
**शीला बुआ कैसी हैं।**
**क्या येहीं सब कुछ पूछ लेगी\खुद अपनी आँखों से देख लेना।**
**क्या आई हुई हैं ।**
**हा**
मुझे लगा चाचाजी कुछ उदास से हो गये हैं। तभी चाचा इनके साथ बातें करने लगे (कारोबार और बच्चों के बारे मे।4-5 घन्टे का सफर जैसे 4 दिन मे पूरा हुआ हो।
रास्ते मे देखती आ रही थी। इतने सालों मे जैसे भारत का नक्शा ही बदल गया था।शहर गाँव काफी विकसित हो गये थे।
**लो अपने गाँव की सडक शुरू हो गयी।** चाचाजी ने बताया।मैं हैरान ये मेरा गाँव्\ मुझे खुद पर हंसी आयी* इतने सालों बाद भी मै उस पुराने गाँव की कल्पना कर रही थी।कहते हैं वक्त के पाँव कभी रुकते नहीं। ना कभी पीछे मुडते हैं।फिर वक्त के पाँव पर खडा मेरा गाँव कैसे पीछे रह सकता है। कच्चे घरों की जगह पक्के बहु मंजिले मकान । छोटा स एक बाजार भे बन गया था कूँयें की जगह ट्यूबेल जब हम लोग यहाँ थे तो इतनी लम्बी लज्ज**रस्सी** से बालटी बान्ध कर कूयें से पानी निकाला करते थे और घडे भर कर सिर पर उठा कर घर लाते थे।मैं तो बडी उत्सुकता से देख रही थी कि कोई ताई चाची भाभी लम्बा सा घूँघट निकालेसिर पर घडा उठाये जाती मिलेगी। पर ना कोई घूँघट वली ना घडे वाली मिली।प्रिधानों मे पश्चिमी साये जरूर नज़र आये।
जिस गाँव मे साईकिल भी किसी किसी के पास होती थी ाब वहाँ गाडियाँ नज़र आ रही थी।स्कूटर मोटर साईकिल तो आम थे। तालाब की जगह पंचायत घर बन गया था।
एक चौडी सी गली मे हमारी गाडी दाखिल हुई।मै हैरान उस वेहडे के इतने दरवाजे\यहां तो एक ही दरवाज सारे घरों के लिये था जैसे किसी किले मे होता है।चाचा ने एक गेट के आगे गाडी रुकवाई।
चाचीजी और बच्चे भागे आये---- मैं तो सोच रही थी कि सारा वेहडा इकठा हुया होगा----- बचपन मे देखा था कि जब भी कोई लडकी मायके आती तो सारा बेहडा क्या गांम्व ही इकठा हो जाता था ।
आज कुछ अच्छा सा नहीं लगा------ क्या घर पक्के बन जाने से दिल भी पत्थर हो गये हैं\( चारदिवारियोँ से शर्मा कर दिल भीमास के लोथदे मे सिकुड गयी हैं\ दिल को झटका लगा----- जिस प्यार संस्कृति की गाथायें सुन कर बाहर के लोग हैरान होते थे( वह सब कहाँ खो गया\15 बीस घरों मे हमारा और शीला बुआ का बेहडा ही साँझा रह गया था।पहले गाँव सरहदों मे बँटे(ाब बेहडे दिवारों से बँट गयेऔर दिल स्वार्थ से(।
जैसे ही बेहडे मे कदम रखा सामने एक 40-- 45 साल की औरत पीठ किये कुछ कर रही थी।बराबर पहुँची तो धक से रह गयी शीला बुआ\ हाँ वो शीला बुआ थी ।बूढी लग रही थी उम्र से 10 साल आगे----- पास ही उनका भतीजा नवी खडा था----- कुछ कह नहीं पाई उसे जाने क्यों उन दिनों को याद कर आँखें भर आयी---- मैने देखा बुआ बाट पूज रही थी मै सन्न रह गयी------ मैने नवी की ओरे देखा वि भी आँसूपोँछते हुये अन्दर चला गया।मैने प्रश्नवाचक नज़रों से चाची की तरफ देखा---
** बेटी इसका पति फौज मे था भारत के लिये जासूसी करते हुये पकडा गया था अभी गौना भी नहीं हुया था।उसके बाद काफी भाग दौड की मगर कुछ नहीं हुया---ाब तो ये भी पता नहीं कि वो जिन्दा है भी या नहीं\उस सदमे से इसके दिमाग पर असर हुया है--पगला गयी है। रोज़ बाट पूजती हैफिर चुपचाप अपने काम मे लगी कुछ गुनगुनाती रहती है।चाची बता रही थी और मै रो रही थी----- मै भारी कदमों से बुआ के पास गयी और उसके कन्धे पर हाथ रखा-----
**कौन \ देखते नहीं मैं बाट पूज रही हूँ--विघ्न पड जायेगा----।
**बुआ मैं आशू!* मुश्किल से गले से आवाज़ निकली------
** आशू\ तू\ एक साल बाद आई है तू। अरे कितनी बदल गयी है----- देख तेरी पूजा वाली चूडियाँ मैने संभाल कर रखी हैं--- तूने अपने फूफा से कहा था ना कि गौना जल्दी करवा लें\** एक साँस मे बुआ इतना कुछ बोल गयी जैसे मेरा हे इन्तज़ार कर रही हो----- बुआ के इन्तज़ार मे अभी भी आशा की एक किरण थी------ जब वक्त रुकता नहीं है तो बुआ का वक कैसे रुक गया था 25 साल को वो एक साल बता रही थी------ और मैं बूआ के गले लग कर खूब रोई----- । बूआ भी उस दिन खूब रोई। चाची ने बताया कि आज पहली बार रोई है ये सब ने कोशिश कर के देख ली है।
मुझे लगा कि अगर ये बेहडे की दिवारें ना होती तो कोई कन्धा उसका सहारा बन सकता था------ बेहडे मिट्टी के ना बने होते तो ये आँगन की मिट्टी उसके आँसू सोख लेती ।
इस तरह बूआ के वक्त के पाँव थम गये थेउन जालिमों ने उनके पाँव मे बेडियाँ डाल दी थी---- सरहदों के पार बूआ के सारे अरमान दफन हो गये थे----ये सरहदें भी कितनी बेरहम होती हैं--------
भारत आने का उत्साह ठँडा पड गया था।सुना था कि भारत पाक की कुछ सीमायें खुल रही हैं।कुछ लिग एक दूसरे को मिल भी सकेंगे ( शायद कुछ कैदियों को भी छोडा जा रहा था----ाब यहाँ नहीं रहेंगे ये हम ने सोच लिया था वापिस विदेश चले जायेंगे मगर जाने से पहले एक आशा मे रोज़ अखबार देखती कि शायद हुक्मरानों के दिल पसीज जायें---- बूआ के वक्त के पाँव की बेडियाँ खुल जायें--- आशा पर ही तो इन्सान का जीवन है और बूआ का भी-------

07 August, 2009

वक्त के पाँव (कहानी )


गाँव की मिट्टी की सोंधी खुश्बू मे जाने कैसी कशिश थी कि इस बार खुद को अपने गाँव भारत आने से रोक नहीं पाई।शादी के तुरँत बाद पति के साथ विदेश चली गयी थी दो साल बाद माँ और पिताजी एक दुर्घटना मे चल बसे थे। भाई बहन कोई था नहीं।इनका भी एक ही बडा भाई था। माँ बाप के बिना घर घर ही नहीं लगता ।जब भी कभी अवसर आता कि घर जायेँ - मैं घबरा जाती।कैसे देख पाऊँगी उस घर को\ बीस पच्चीस वर्ष से हम भारत नहीं आये थे।एक चाचा थे बस पहले उन से चिठी पत्री अब जब से टेलीफोन उनके लगा है तब से टेलीफोन पर ही कभी कभार बात हो जाती है। दस दिन बाद चाचा जी के बेटे की शादी है । उन्हों ने बहुत ताकीद की थी कि हम लोग जरूर आयें।वे बीमार भी रहते हैं।बस एक बार मुझे जरूर देखना मिलना चाहते हैं।अब बच्चे सेटल हो गये( मरा मन भी विदेश मे नहीं लगता था।हम लोग सोच रहे थे कि भारत जा कर ही बस जायें।
जहाज से भी तेज मन दौड रहा था।बचपन की यादें खेत ( खलिहान पास लगती] शिवालिक की पहाडियाँ(सत्लुज दरिया पर बना मंदिर] गुरदवारा( दरिया के किनारे वैसाखी का मेला( वो गाँव की रामलीला ( दशहरे पर निकलती सुन्दर भव्य झाँकियाँ( बचपन की सखियाँ] संगी- साथी( बेरी] आम] अमरूद के पेड(जहाँ एक दूसरे की पीठ पर खडे हो कर आम] अमरूद तोडते(गन्ने के खेतों से गन्ने चूपते(खेत मे लगे बेलन से गन्ने का रस पीते ] गरम गरम भट्टी से निकलता गुड खाते( । क्या बचपन था उडती फिरती तितली जैसा।अज के बच्चे तो उस बचपन की कल्पना भी नहीं कर सकते। तनाव मुक्त( स्वच्छ्न्द बचपन ।
फिर वो तालाब क्या वैसा ही होगा\ जहाँ हम घडे पर तैर कर उस पार निकल जाते।वो मेमणा जिसके पीछे भागते पर पकड ना पाते( वो मक्की के बडे बडे झुन्ड जिन के पीछेछुपा छुपी खेलते(वो सफेद गाय जिसके थन से दूध की धार दादी सीधे हमरे मुह मे डालती(और वो शीला बूआ और उनका भतीजा मनु हमारी पलटन का रिंग लीडार और उस आँगन मे तारों की छाँव मे( गरमी के दिनो मे बिछी 50 - 60 चारपाईयाँ( बारी बारी सब कथा कहानियाँ चुटकुले सुनाते एक दूसरे को छेडते( बातों का दौर चलता और लगता ही नहीं था कि ये सब अलग अलग परिवार हैं।
सब का एक साँझा आँगन और उसके आसपास सब घर। कुछ घर कच्चे होते थे ।सारे आँगन के लिये एक ही ढियोडी*दरवाजा* होता था। उस दरवाजे के अंदर के सभी दुख सुख साँझे होते थे।उस आँगन को बेहडा कहते थे हर बेहडे का अपना अपना नाम था।
पंजाब के चिभाजन के बाद हमारा गाँव रायपुर हिमाचल मे आ गया।जो ऊन्ना जिले मे पडता था।इस गांवँ का बचपन पंजाबी( और जवानी पहाडी है इस लिये रिती रिवाज़ भी मिले जुले हैं।इन बेहडों का प्यार पंजाबियों की दरिया दिली और पहाडों की सादगी और सुसंस्कृति की पहचान थी।
बेहडे की याद आते ही शीला बुआ की शादी की याद आ गयी।बुआ बहुत सुन्दर थी। लडका भी अच्छी घर से और सुन्दर था।बूआ को गहनों से लाद दिया था ससुराल वलों ने।उस जमाने मे लडका लडकी देखने का आम रिवाज़ नहीं था।माँ बाप (घर जमीन (और लडके की नौकरी या धन्धा देखा जाता था।
जैसे ही बुआ की बारात आयी थी( बुआ ने मुझे घूँघट निकाल कर अपनी जगह बिठा दिया था और अन्दर से कुन्डी लगाने की ताकीद कर खुद घूँघट मे और शाल मे चूडा कलीरे लपेट कर छत पर चढ गयी। दुल्हा देखने की बेचैनी वो रोक ना पाई। सभी बारात की अगवाई मे लगे थे ।किसी ने बुआ को नहीं देखा। जैसे ही बुआ ने दुल्हे को देखा खुशी से दिवानी सी हो गयी। और भाग कर नीचे आते ही मुझ से लिपट गयी
**अशू तुम्हारे फूफा बहुत सुन्दर हैं।बिलकुल राजकुमार्! हाँ देखो तुम उन्हें फूफा नहीं कहना( जीजा जी कहना और उनके कान मे मेरी तरफ से कहना कि जल्दी गौना करवा कर मुझे ले जायें । मैं इन्तज़ार करूँगी।**
तब रिवाज़ था कि गौना शादी के कुछ माह बाद ही होता था।उस समय का इन्तज़ार लडकियाँ एक उत्सव के रूप मे करती। नई नई शादी शुदा लडकियाँ जिन का गौना नहीं हुया होता वो अपने पति के जल्दी आने के लिये एक पूजा करती जिसे *बाट -पूजना* कहा जाता था \बाट कअर्थ है रास्ता ।
सुबह नहा धो कर सभी लडकियाँ अच्छे से तैयार हो कर बेहडे मे इकठी हो जाती।फिर गाय के गोबर से जमीन तीन छोटी छौटी गोलाकार जगह लीपती]धूप टिक्का[ चावल मौली से पूजा कर आटे के दिये मे दीप जलाती। पूजा के बाद कन्या पूजन मे सब लडकियों को सजाती चूडियां पहनाती नेल पोलिश मेहँदी लगाती। इस तरह ये पूरे बेहडे का उत्सव बन जाता। अगले दिन उस जगह से आगे फिर उसी क्रम मे पूजा करतीं।ये माना जाता था कि पूजा करते करते जब वो डियोडी तक पहुँच जायेंगी तो उनके पति उन्हें लेने जरूर आ जायेंगे। अगर तब तक गौना नहीं होता तो दोबारा फिर वहीं से शुरू कर देतीं कि शायद पूजा मे कोई विघ्न पड गया होगा।उस उत्सव को मै बहुत याद करती थी। बूआ से वैसी भी मेरा लगाव अधिक था इस लिये उसे मिलने को उतावली हो रही थी।---------------------------------------------क्रमश।

06 August, 2009

एक और पंजाबी गज़ल स. बल्बीर सैणी जी की [हिन्दी अनुवाद के साथ ।
अनुवाद गज़ल के रूप मे नहीं है ।


मै तां जीवी जाणा अपणी हिम्मत अपणे जेरे नाल
वरना इस दुनिया ने यारो की नहीं कीता मेरे नाल

[अर्थात-- मै तो जीए जाऊँगा अपनी हिम्मत और जोर के साथ
वरना इस दुनिया ने यारो क्या नहीं किया मेरे साथ}

इस ने दिल दा खून है पीता इस ने लुटिया मन दा चैन
हैरत है दिल रहिन्दा लोचे ताँ वी उसे लुटेरे नाल

[अर्थात-- इस ने दिल का खून है पीया इस ने लूटा मन का चैन
हैरत है दिल रहने को तडपे फिर भी उस लुटेरे के साथ]

मै जाणिया सी तेरे पिछों कल्ला रह जावाँगा पर
हँजू हौके चीसाँ पीडाँ किना कुझ सी मेरे नाल

[अर्थात-- मैने जाना था तेरे पीछे सेअकेला मैं रह जाऊँगा पर
आँसू आहें टीसें पीडा कितना कुछ था मेरे पास]

किने सालाँ तो बेशक तूँ आया नहीं बनेरे ते
फिर वी मेरी नीझ है लगी पौडी वाँग बनेरे ते

[अर्थात--कई सालों से बेशक तू आया नहीं बनेरे पर [बनेरे मतलव मँडेर]
फिर भी मेरी नजर है लगी सीढी की तरह बनेरे से]

की सची तूँ भुल गिया एँ या तैनू ने याद उवें
आये दिन जो सौ सौ वादे कीते सी तू मेरे नाल

[क्या सच तू भूल गया है? या तुझे है याद उसी तरह
आये दिन सौ सौ वादे किये थे जो मेरे साथ ]

इस दुनिया नू जे चाहो ताँ दूर सगों इह भजदी है
लेकिन जे इस नू दुतकारो लिपटे होर वधेरे नाल

[ अर्थात इस दुनिय को गर चाहो तो दूर बल्कि ये भागती है
लेकिन गर इस को दुतकारो लिपटे और बहुत ही साथ ]

तेरे नाल जे तुरदै जे कोई उस दा कोई मतलव है
मतलव नाल इह दुनिया सैणी तेरे नाल ना मेरे नाल

[अर्थात तेरे साथ अगर चलता है तो उसका कोई मतलव है
मतलव साथ ये सारी दुनिया सैणी तेरे साथ ना मेरे साथ्]

अनुवाद ---- निर्मला कपिला


03 August, 2009

गज़ल ------एक और सफर पर

पिछले दिनों मुझे द्विजेन्द्र "द्विज"जी ने अपनी पुस्तक गज़ल संग्रह `जन गण मन ` भेजी और उस पर अपनी प्रतिक्रिया करने को कहा । मै कई दिन बहुत तनाव मे रही कि मुझे तो गज़ल की ABC भी नहीं पता तो इतने बडे शायर की इतनी लाजवाब पुस्तक के बारे मे कैसे क्या कहूँ।अंत मे मैने उन से क्षमा प्रार्थना की कि इस पर कुछ भी कहना मेरे सामर्थ्य से बाहर है।इसके बाद एक बहुत बडे गज़लकार की गज़lल पर टिप्पणी दी और जो शेर मुझे बहुत अच्छा लगा उस पर लाजवाब लिख दिया फिर उनका मुझे ई मेल आया कि चलो अपको एक शेर तो पसंद आया धन्यवाद ।तब मुझे महसूस हुय कि अब मुझे गज़ल सीख लेनी चाहिये।
उसके बाद जब मैने अपने शहर के कवि सम्मेलन मे जाना शुरू किया तो कई बार सोचा कि गज़ल सीखूँ स. बलबीर सौणी जी की गज़लों से इतना प्रभावित हुई कि उनसे गज़ल सीखने का निर्णय लिया ।कल ही उन्हें गुरू जी के रूप मे माना और उन से पंजाबी गज़ल सीखनी शुरू कर दी। स. सैणी जी की लगभग 13 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं जिनमे अधिक गज़ल संग्रह हैं। हरियाणा अकेडमी दुआरा भी उनकी पुस्तक का प्रकाशन हुआ है और सम्मानित हुये हैं जालन्धर दूर दर्शन पर भी उनकी गज़लों का प्रसारण होता रहता है ।उनके पहले सबक मे एक पंजाबी गज़ल लिखी मगर उसे अभी पोस्ट नहीं कर सकती क्यों कि अभी पंजाबी मे टाईप करने मे अस्मर्थ हूँ उस सबक से एक हिन्दी गज़ल लिखने की कोशिश की है। उन्हीं के आशीर्वाद से उसे आपके सामने प्रस्तुत करूँगी।
। पहली कोशिशै है इस लिये आप सब का सहयोग चाहूँगी और गुरू जी का आशीर्वाद। वैसे तो वो मुझे गुरू जी नहीं कहने देना चाहते उनका कहना है कि तुम अपने शहर की बेटी हो और मेरी छोटी बहन की तरह हो इस लिये मुझे गुरू जी ना कहो । मगर बडे भाई भी गुरू समान होते हैं इस लिये उन्हें गुरू जी ही कहूंगी।हाँ अर्श का भी धन्यवाद करना चाहूँगी क्यों कि जहाँ मैं अटक गयी थी वहाँ उसने मेरी सहायता की। अभी भी उसकी तसल्ली नहीं थी इस गज़ल पर मगर पहले प्रयास पर कुछ तो रियायत होनी ही चाहिये ।मै यहाँ`` द्विजेन्द्र द्विज`` जी का भी धन्यवाद करना चाहूँगी कि उन की पुस्तक की वजह से मुझे गज़ल सीखने का ख्याल आया।
बह`र
ss ss ss ss ss

तेरे सपनों मे आऊँ तो कैसे
तुझ को मै पास बुलाऊँ तो कैसे

यूँ रूठा है वो रूठे हैं अरमाँ
कोई भी जश्न मनाऊँ तो कैसे

दीदार -ए-हसरत तो अपनी भी थी
चाँद न हो ईद मनाऊँ तो कैसे

तेरे आँसू ले लूँ तकदीर नहीं
अपने भी अश्क छुपाऊँ तो कैसे

लोग यकीं माने यूं अफसानो पर
अपना सच भी बतलाऊँ तो कैसे

किसने कैसे कब तोडा है हमको
मैं जख्मे दिल दिखलाऊँ तो कैसे

01 August, 2009

ये गज़ल स,बलबीर सैनी जी की है जो उन्हों नेनंगल मे पिछेले दिनोंहुये साहित्यक प्रोग्राम मे सुनाई ये गज़ल पंजाबी मे है मगर हिन्दी प्रेमियों के लिये उसका अनुवाद साथ मे दे रही हूँ जो कि गज़ल के रूप मे नहीं हैइस गज़ल को भी हिन्दी मे टाईप करने से शायद इस मे मात्राओं का संयोजन सही ना हो पाये मगर पंजाबी मे ये एक मुकम्मल गज़ल है।

मैथों हसिया नहीं जाणा, मैथों रोया वी नहीं जाणा
हँजू पलकाँ ते आया ताँ लकोईया वी नहीं जाणा
अर्थात
{मुझ से हंसा भी नहीं जायेगा, मुझ से रोया भी नहीं जायेगा
आँसू पलकों पे आया तो छुपाया भे नहीं जायेगा}

जद किते रसते च ओहदे नाल हो गया जे सामणा
ओहनू मिल वी नहीं होणा ,पासे होईया वी नहीं जाणा
अर्थात
{ागर कही कभी रास्ते मे उससे सामना हो गया
उस से मिला भी नहीं जायेगा,परे हुया भी नहीं जायेगा}

साडी गली विच ,साडे घर मुहरे,मिल पिया जे ओह्
आजा कह वी नहीं होणा,बूहा ढोया वी नहीं जाणा
अर्थात
{ अगर हमारी गली मे मेरे घर के आगे वो मिल भी गया
आजा कहा भी नहीं जायेगा दरवाज़ा बन्द किया भी नहीं जायेगा}

ओहदा चन्दरा विछोडा,जिवें जढाँ वाला फोडा
ओहने जीण नहीं देणा, साथों मरिया वी नहीं जाणा
अर्थात
{उसका वियोग दुखदायी है जैसे जद वाला फोडा
उसने जीने भी नहीं देना और हम से मरा भी नहीं जायेगा}

ओहदे दीद वाला लोभ ते साडी लगणी नहीं अख
ओहतों आ वी नहीं होणा साथों जाया वी नहीं जाणा
अर्थात
{उसके दिदार के लोभ मे हमे नीन्द नहीं आयेगी
उससे आया नहीं जायेगा और हमसे जाया नहीं जायेगा}

खुशी आण दी तों वीवध झट जाण वाला दुख्
हौके भरने बरूहाँ म तेल चोया वी नहीं जाणा
अर्थात
{ने की खुशी से उसके जाने का गम अधिक होगा
दहलीज आहें भरेगी तेल चोया भी नहीं जायेगा}

31 July, 2009

कवि राज्विन्दर से रुबरू
पंजाबी लिखारी सभा नंगल, पंजाबी रंग मंच नंगल एवं अक्षर चेतना मंच नया नंगल दुआरा संयुक्त रूप से एक भव्य साहित्यक समारोह का आयोजन नया नंगल केआनंद भवन क्लब के सभागार मे 29 जुलाई की शाम को किया गया।इसका प्रयोजन जर्मनी से पधारे वहाँ के राज कवि {पोईट लोरियल} श्री राजविन्दर का सम्मान् एवं रुबरू था।समारोह का शुभारम्भ मुख्य अतिथी स. लखबीर सिह जी{S.D.M.}एवं स.हरनीत सिंह हुन्दल{D.S.P} स.निरलेप सिंह {मुख्य अभियंता } N.F.L.nangal unit श्री राकेश नैयर प्रमुख व्यवसायी, स़ हरफूल सिंह नामवर कवि.श्री ग्यान चंद {तहसीलदार} दुआरा शमा रोशन कर के किया गया।श्री संजीव कुरालिया दुआरा कार्यक्रम की संक्षिप्त रूप रेखा बताने के बाद टी. वी.कलाकार नंगल के श्री. पम्मी हंसपाल ने श्री राजविन्दर की गज़ल गा कर महौल को शायराना बना दिया। श्री.मति अरुणा वालिया ने मधुर आवाज़ मे दो गज़लें ,`राजस्थानी मांड` एवं पंजबी गीत `सौण दा महीना` और बुल्लेशाह गा कर श्रोताओं को मन्त्र मुग्ध कर दिया।तदोपराँत सुनील डोगरा जी ने शिव बटालवी की रचना` `कुझ रुख मैनू` गा कर हाजिरी लगवाई।
इस संगीतमय महफिल के बाद स्थानीय कवियों दुआरा कवि दरबार सजाया गया।जिसमे श्री.देवेन्द्र शर्मा प्रधान अक्षर चेतना मंच ने राजनीति पर कटाक्ष करती नज़्म `लोक तन्त्र` श्री बलबीर सैणी ने गज़ल `मैथों हस्या नी जाणा ते रोया वी नी जाणा,हन्जू पलकाँ ते आया ते लुकोया वी नी जाणा। स, अमरजीत बेदाग ने हास्य कविता`` आई पी सी 377 ने पनाह दी ,मोहन ने सोहन से शादी बना ली`` अजय शर्मा ने ``पीडाँ दा वोगनविलिया ,श्री.मतिसविता शर्मा ने``कालख गोरे रंग दी``सुनाई । अक्षर् चेतना मंच के सचिव श्री राकेश वर्मा ने वियना की घटना के बाद पंजाब मे हुये प्रति क्रम पर केन्द्रित नज़म ``हालात सुखन साज़ करां तां किन्झ करां``सुना कर श्रोताओं को सोचने पर मजबूर कर दिया। इसके बाद अशोक राही,ने चन्द शेर एवं संजीव कुरालिया ने ``मैं पंजाब बोलदां``सुना कर तालियाँ बटोरी। निर्मला कपिला जी ने गला खराब होने के कारण अपनी असमर्थता प्रकट की।
मंच सं चालक श्री गुरप्रीत गरेवाल {पत्रकार अजीत समाचार}ने कपूरथला से पधारे स.हरफूल सिंह जी को राज कवि श्री.राजविन्दर जी का परिचय करवाने के लिये आमंत्रित किया। स़ हरफूल सिंह जी ने राजविन्दर जी की संक्षिप्त जानकारी देने के साथ साथ नंगल शहर के बारे मे लिखी अपनी कविता``रोशनियाँ दे शहर् ``सुना कर नंगल से जुडी यादें ताज़ा की।
इसके बाद तीनों संस्थाओं के पदाधिकारियों दुआरा श्री राजविन्दर को दोशाला एवं समृ्ति चिन्ह भेंट कर सम्मानित किया गया।
श्री राजविन्दर जी ने आत्म कथन करते हुये बताया कि वे वार्तालाप के कवि है ।उनकी पहली पुस्तक 19 वर्ष की आयु मे छपी थी।वो अब जर्मन भाषा मे लिखते हैं।वर्लिन युनिवर्सिटी मे पढाने के बाद 1991 मे वो स्वतंत्र कवि बने।1997 मे उन्हें प्रथम बार पोइट लोरीयट का खिताब मिला। वे प्रथम अनिवासी भारतीय हैं जिन्हें इस खिताब के फलस्वरूप किंग फेड्रिक्स के महल मे ठहरने का सम्मान मिला। उनके 10 काव्य संग्रह व एक लघु कथा संग्रह जर्मन भाषा मे छप छुका है।वे 2004 मे वर्लिन के, 2006 मे वेस्ट्फेलिया,एवं 2007 मे त्रियर के पोइट् लोरीयल {राज कवि} बने।उनकी नज़्मों को स्कूल की पाठ्य् पुस्तकों मे शामिल किया गया।एवं कुछ नज़्मे पत्थरों पर उकेर कर त्रियर शहर मे लगाया गया है ।पंजाबी मे उन की एक पुस्तक मे से तरन्नुम मे अपनी चंद गज़लें गाकर सुनाई। जिनके बोल थे--
1 ऐंवें कदे जे शौक विच सागर नूँ तर गये
अज्ज रेत दे सुक्के होये दरिया तों डर गये
2 मैं झुण्ड दरख्ताँ दा बण जावाँ
तू बण के पवन मुड मुड आवीं
3 अक्स तेरा लीकणा सी अखियाँ `च अज़ल तक
गज़ल ताहियों ना पिया ऐ बेबसी विच हिरन दा
इस अवसर पर बी बी एम बी के पूर्व मुख्य अभियंता श्री के के खोसला जी चित्रकार श्री देशरंजन शर्मा,ईज.संज्य सनन.सुरजीत गग्ग .श्रीमति निर्मला कपिला.राजी खन्ना.राकेश शर्मा पिंकी.फुलवन्त मनोचा. डाक्टर पी पी सिन्ह ..डाक्टर चट्ठा ,प्रभात भट्टी,अमर पोसवाल,अमृत सैणी, अमृत पाल धीमान, कंवर पोसवाल विजय कुमार,भोला नाथ कश्यप {स्म्पादक समाज धर्म पत्रिका },अम्बिका दत्त प्रोफेसर योगेश सूद ,इँज दर्शन कुमार,इँज.राजेश वासुदेव इंज गुलशन नैयर व श्रीमति नैयर ,अदि गणमान्य लोग उपस्थित थे।200 से उपर श्रोताओं ने इस कार्यक्रम मे भाग लिया।। देर रात 11-30 बजे तक चला ये साहित्यक समारोह शहर की संस्कृ्तिक गतिविधिउओं का एक मील पत्थर साबित हुया।

30 July, 2009

एक कतरा बचपन चाहिये (कहानी )

मेरा बचपन बहुत सुखमय रहा किसी राज कुमारी कि तरह घर मे किसी चीज़ की कमी नहीं थी ।सब की लाडली थी। मगर बचपन कितनी जल्दी बीत जाता है ।जवानी मे तो इन्सन के पास फुर्सत ही नहीं होती कि अपने बारे मे कुछ सोच सके। ये सफर तो हर इन्सान के लिये कठिनाईयों से भरा रहता है।ाउर जब होश आता है तो बारबार बचपन याद आता है बचपन से जुडी यादें फिर से अपनी ओर खींचने लगती हैं--- लगता है बहुत थक गयी हूँ । क्यों ना कुछ बचपना कर लिया जाये---- क्यों ना कुछ पल फिर से जी लिया जाये ----- जब इस तरह सोचती हूं तो----- उदास हो जाती हूँ------- बात बात पर परेशान होना ---- जीवन से निराश होना ----- उससे तो अच्छा है बच्ची ही बन जाऊँ------- मगर ----- सब ने मिल कर मुझे इतनी बडी बना दिया है कि अब कभी बच्ची नहीं बन पाऊँगी----- नहीं जी पाऊँगी उन गलियों मे जहाँ कोई चिन्ता दुख नहीं था ---- नहीं मिल पाऊँगी उन सखियों सहेलियों से जो मेरी जान हुया करती थी------ नहीं बना पाऊँगी रेत के घर] नहीं खेल पाऊँगी लुकन मीटी----- नहीं तोड पाऊँगे जामुन अमरूद बेर और शह्तूत ----कैसे हो गयी बडी ----- मैने तो कभी नहीं चाहा था---- मुझे तो बच्ची सी बने रहना अच्छा लगता था---- जहाँ ना कोई रोक ना टोक------ ना बन्धन------ बस एक निश्छल प्यार---- प्रेम---- खेल--- हंसी----- मुक्त आकाश की उडान ।----- मै कभी बडी होना नहीं चाहती थी ------
अब समझ आता है कि अपने आप नहीं हुई मुझे बडा बनाया गया है। पहले मेरे पिता जी ने फिर पति ने फिर मेरे बच्चों ने ------उन लोगों ने मै जिन के दिल के बहुत करीब थी------ खुद बडा कहलाने के लिये मुझे मोहरा बनाया गया शायद----- जिम के नाम के साथ मेरा नाम जुडा था । पल पल मुझे ये एहसास करवाया गया कि अब मैं बच्ची नहीं हूँ।-- मगर शायद अंदर से वो मेरे दिल को बदल नहीं पाये अब तक भी बच्ची बनी रहने की एक छोटी सी अभिलाशा कहीं जिन्दा है।
जीवन मे हर आदमी के सामने चुनौतियाँ तो आती ही रहती हैं मगर हर कोई उनका सामना अपने ही बलबूते पर करे ये हर किसी के लिये शायद सँभव नहीं होता।कुछ जीवन के किरदार दिल के इतने करीब होते हैं कि चाहे वो दुनिया मे ना भी हों तो भी हर पल दिल मे रहते हैं। मगर उनका नाम लेते इस लिये डरती हूँ कि कहीं नाम लेते ही वो जुबान के रास्ते बाहर ना निकल जायें।
बचपन से एक आदत सी पड गयी थी कि कोई ना कोई मेरे सवाल के जवाब के लिये मौज़ूद रहता। और मै बडी होने तक भी बच्ची ही बनी रही। उसके बाद जीवन शुरू हुया तो अचानक मुसीबतों ने घेर लिया। मगर तब भी मेरी हर मुसीबत मे जो मेरे प्रेरणा स्त्रोत और मुझे चुनौतियों से जूझना सिखाया वो मेरे पिता जी थे।जब तक जिन्दा रहे मैं कभी जीवन से घबराई नहीं। बाकी सब रिश्ते तो आपेक्षाओं से ही जुडे होते हैं।और फिर उन रिश्तों से मिली परेशानियों का समाधान तो कोई और ही कर सकता है।
मैं जब भी परेशान होती या किसी मुसीबत मे होती तो झट से उनके पास चली जाती। और जाते ही उनके कन्धे पर अपना सिर रख देती । उन्हों ने कभी मुझ से ये नहीं पूछा था कि मेरी लाडाली बेटी किस बात से परेशान है। शायद मेरा आँसू जब उनके कन्धे पर गिरता तो वो उसकी जलन से मेरे दुख का अंदाज़ लगा लेते---- हकीम थे ---मर्ज ढूँढना उन्हें अच्छी तरह आता था। बस वो मेरे सिर पर हाथ फेरते अगर उन्हें लगता कि समस्या बडी है तो मेरे सिर को उठा कर ध्यान से मेरा चेहरा देखते और मुस्करा देते तो ~--- तो आज मेरी मेरी बेटी फिर से छोटी सी बच्ची बन गयी है\------- अच्छा तो चलो अब बडी बन जाओ------ ।और फिर कोई ना कोई बोध कथा या जीवन दर्शन से कुछ बातें बताने लगते । और इतना ही कहते कि मैं तुम्हें कमज़ोर नहीं देखना चाहता । तुम्हें पता है कि तुम्हारे दोनो भाईयों की मौत के बाद तुम ही मेरा बेटा हो और तुम्हें देख कर ही मै जी रहा हूँ । क्या मेरा सहारा नहीं बनोगी\-- और मै झट से बडी हो जाती \ मुझे लगता कि क्या इस इन्सान के दुख से भी बडा है मेरा दुख \ जीवन मे दुख सुख तो आते ही रहते हैं फिर वो मुझे याद दिलाते कि अपना सब से बडा दुख याद करो जब वो नहीं रहा तो ये भी नहीं रहेगा ! और उनकी बात गाँठ बान्ध लेती । सच मे जब कोई परेशानी आती है तो हमे वही बडी लगती है जैसे जीवन इसके बाद रुक जायेगा । आज लगता है कि उन्होंने ही मुझे बडा बना दिया। मै तो बचपन मे ही रहना चाहती थी।
उनकी मौत के बाद भी उन्हीं के सूत्र गाँठ बान्ध कर चलती रही हूँ । वो बडी बना गये थे सो बडी बनी रही मगर अब भी कहीं एक इच्छा जरूर थी कि कभी एक बार बच्ची जरूर बनुंम्गी जिमेदारियों से मुक्त हो कर अपना बचपन एक बार वापिस लाऊँगी शरीर से क्या होता है-----बूढा है तो--- रहे दिल मे तो बचपन बचा के रखा है ना------ इस उम्र मे श्रीर से यूँ भी मोह नहीं रहता बस आत्मा से दिल से जीने की तमन्ना रहती है।
पिता के बाद पति --- फिर तो दिल जिस्म दिमाग कुछ भी मेरा नहीं रहा------ सब पर उनका ही हक था ---- क्यों कि वो भी मेरे दिल के करीब थे इस लिये उन्हों ने भी सदा यही एहसास करवाया कि तुम अब बच्ची नहीं हो उनकी मर्यादा अनुसार----- उनकी जरूरत मुताबिक बडी बनो---और तब तो पिता की तरह कोई सिर पर हाथ फेरने वाला भी नहीं होता। उनके बाद बच्चे बच्चों के लिये तो तब तक बडे बने रहना पडता है जब तक वो जवान नहीं हो जाते----- उनके जवान होते ही वो अपने अपने जीवन मे व्यस्त हो गये ----- अब जब भी अकेली होती तो बचपन फिर याद आता मन होता बचपन मे लौट जाऊँ------ बिलकुल अब बच्चों की तरह व्यव्हार करने लग जाती------- फिर कभी परेशान होती तो पिता की जगह बेटे का कन्धा तलाश करने लगती------।कुछ दिन से पता नहीं क्यों मन परेशान सा रहता था । अपने किसी बच्चे से कहा तो उसने जवाब दिया कि----- माँ तुम्हें क्या हो गया है क्यों बच्चों जैसी बातें करने लगी हो\ वो भी सही था अब बच्चे तो माँ को सदा महान या बडी ही देखना चाहते हैं न। वो कैसे समझ सकते हैं कि इस उम्र मे अक्सर बूढे बच्चे बन जाते हैं। शायद बच्चों मे रह कर---- और उस दिन मुझे लगा कि आज सच मुच मेरे पिता जी चले गये हैं।सदा के लिये बडी बना कर् । क्या बच्चे अपने माँ बाप को थोडा सा बचपन भी उधार नहीं दे सकते\ आज मन फिर से बचपन मे लौट जाने को है ---- मगर जा नहीं सकती पहले पिता जी ने नहीं जाने दिया अब बच्चे भी मेरे पिता का किरदार निभा रहे हैं । काश कि जीवन के कुछ क्षण उस बचपन के लिये मिल जायें ------ तो शायद जीवन संध्या शाँति से निकल जाये। बस कुछ दिन बचपन के उधार चाहिये------ मैं बडी नहीं बनी रहना चाहती अब --- शायद इसका जवाब भी पिता जी के पास था मगर अब वो लौट कर नहीं आयेंगे ------- तब उनके पास जाने की जल्दी लग जाती है । क्यों कि अब मुझे फिर से बचपन चाहिये--------

29 July, 2009

माँ की पहचान ---गतान्क से आगे ---कहानी

``देखिये जिस लडके की शिनाख्त के लिये आपको बुलाया है पता नेहीं कि वो आपका बेटा है या नहीं मगर हमारी जानकारी के अनुसार ये आपका बेटा ही लगता है।इसे किसी आतंकवादी घटना के जुर्म मे पकडा गया है ।अजकलातंकवादी और नशों के सौदागरऐसे भोले भाले लडकों को अपने जाल मे फंसा लेते हैं। एक मुठ्भेड मे उसे गोली लगी है।
``नहीं नहीं ---अपको कोई गलत फैहमी हुई है---मेरा बेटा ऐसा हो ही नहीं सकता। वो बहुत भोला है।``
``आज कल इन संगठ्नों का निशाना ये भोले भाले बच्चे ही हैं।यह सब काम इतने गुपचुप तरीके से होता है किकिसी को कानो कान खबर भी नहीं होती।अपका बेटा भी आर्थिक तंगी का शिकार था पकले नशे मे लगाया फिर संगठन के लिये उससे काम लेने लगे।अज भी एक वारदात को अंजाम देते हुये पोलिस की गोली लगी है।अप जाईये उसे पहचान लीजिये।``
ये मेरे साथ क्या हो गया?क्या माँ इतनी गयी गुजरी चीज़ हो गयी कि उसने एक बार भी उसके बारे मे नहीं सोचा माँ के दिये संस्कार भूल कर वोकिसी बेगाने के पीछे लग गया! मैं उसकी खातिर इतना संघर्ष करती रही वो क्या खुद के लिये भी जरा सा संघर्षना कर सका?
जो ढंग से अपने जीवन को ना संवार सकावो आतंकवादी बन कर किसी कौम,या महजब के लिये क्या कर सकता है? मन क्षोभ और दुख से भर गया।ान्दर से घृणा का एक लावा स उठा। तभी खून से लथपथ उसका शरीर आँखों के सामने घूम गया।खून ने खून को आवाज़ दी,उसे देखने को बेताब हो उठी एक पल के लिये घृणा का स्थान ममता ने ले लिया।ये ममता भी क्या चीज़ है?मगर कदम क्यों नहीं उठ रहे थे?-----
लडखडाते कदम,दम तोडती ममता, अपने माँ होने पर पश्चाताप करते आँसू,लोगों की भेदती नज़रों से झुकी गर्दन लिये चल पडी एक आशा लिये --शायद वो मेरा बेटा ना हो!
उसके साथ वाले बेड के पासेक औरत विलाप कर रही थी। किसी ने उसके बेटे को गोली मार दी थी। मैं धक से रह गयी--- कहीं ये मेरा बेटा हे तो नहीं था जिसने गोली मारी? मन और भी क्रोध से भर गया--।
सामने बेड पर लेटा था-- मेरा बेटा-- कलेजा मुँह को आ गया।अँखों पर सिर और टागों पर पट्टियाँ बन्धी थी। देखते ही मन छटपटा गया--- तडप उठी-- कितना खून बह गया था? चेहरा जर्द पड गया था ।अपने हाथ मे उसका हाथ पकडा---- काँपती थरथराती--- ममता कहाँ मानती है?--उसका हाथ जरा सा हिला शायद उसने मुझे पहचान लिया था--माँ थी ना! बिना देखे उसका एक सपर्श ही काफी होता है-- मगर कुछ बोल ना सका ।
अच्छा है नहीं देख सका नहीं तो उसकी याचना भरी निगाहें देख कर मैं और भी पिघल जाती---- माफ कर देती?---अगर वो आतंकवादी है तो मै भी उसकी माँ हूँ मुझे भी उसकी तरह कठोर बनना आता है---
``अच्छा हुया तेरी आँखों पर पट्टी बन्धी हैवर्ना जब तू मेरी तरफ देखता तो मैं शर्म से तुझ से नज़रें ना मिला पाती। क्यों कि मैने तुम्हें सिर्फ ममता प्यार दिया है धन दौलत ऐशो आराम ना दे पाई।``
``बेटा!जब तू इस दुनिया मे आया था तो मैने अपने ऐशो आराम और धन दौलत की बजाये तुम्हें ही अपनी दौलत और खुशी समझ लिया था। तुझी डाक्टर बनने भेजा तो तेरी माँ होने पर मैं गर्व करने लगी थी।पर आज मेरा सिर शर्म से झुक गया है क्यो?``
``तेरे नन्हें नन्हें कोमल हाथों को अपने हाथों मे ले कर ऐसे सहलाती तो अपने सारे दुख दर्द भूल जाती पर आज तेरे ये हाथ मुझे काटों की तरह जलन दे रहे हैं। मेरी टीस बढ गयी है।``
``और जब् तुमने आँखें खोल कर मुझे देखना शुरू किया था तो वारी न्यारी हो जाती---इनमे सपनों के रंग भरने लग जाती कि तू एक बडा आदमी बनेगा।राज करेगा दुनिया पर--ाउर तू बन्दूक के बल पर दुनिया पर राज करने चला है--- लानत है तेरे इस राज पर।
``जानता है तू पहला शब्द क्या बोला था?,'माँ``। मैं सुन कर धन्य हो गयी थी। तेरे तुतले स्वरों से ताल बनाती सुर सजाती और उन्हीं सुरों की सरगम पर लोरियाँ सुनाती।--ापनी बाहों के झूले झुला कर तुम्हें सुलाती-- तेरी ऊआँ ऊआँ सुनने के लिये अकेली ही तुझ से बतियाती रहती।तेरे स्वर मेरे कानों मे शह्द घोल देते। मुझ पर सू सू करते छी छी करते मैं हँस कर लँगोती पहनाती रहती तेरा गँद प्रसाद समझ कर कबूल करती ।तुम्हें सुन्दर कपडे पहनाती और तुम्हारी छोटी 2 शरारतों पर बलिहारी जाती भरी जवानी मे विधवा होने का गम तेरी हंसी मे भूल जाती
``तेरा एक एक पल खुद जी कर तुझीतना बडा किया।तू चाहे सो भी रहा होता मेरे कदमों की आहट से पहचान लेता आज तू इतना निष्ठुर हो गया कि माँ को ही भूल गया? क्यों पहचानेगा तू मुझे! अब तो तू आतँकवादी है एक बेटा नहीं--- कठोर,भावना रहित,जिसकी कोई माँ नहीं होती--कोई रिश्तेदार नहीं होता,बेत! जो दिल्दुख दर्द से ना पिघले,जो रिश्तों की पहचान भूल जाये,उसका धडकना किस काम का?
``तुम जानते हो कितुम्हें जरा सी तकलीफ होती,मैं तडप उठती।याद है एक दिन्तुम्हारी उँगकी मे चाकू लग गया था। मैने जल्दी से पट्टी बान्धी और रो पडी थी ।क्या तब भी तुम्हें समझ नहीं आयी कि मा को खून बहना बहाना अच्छा नहीं लगता!मैने तुम्हें केवल प्यार करना ही सिखाया था--पए उन जालिमों दुआरा सिखाई गयी नफरत क्या माँ के प्यार से बडी हो गयी?़``
``तू छोटे होते मेरी आँखों मे आँसू नहीं देख सकता था।अज कितनी माँओंकी कोख सूनी कर तू चुपचाप पडा है! माँ तो माँ ही होती है,तेरी हो या किसी और की--किसी भी देश जाती और मजह्ब की हो माँ --माँ ही होती है। माँ की पहचान प्यार और ममता है ।प्यार बिना मजहब देश जाति या धर्म कैसा?``
``जो बेटा माँ की कोख की रक्षा नहीं कर सकता वो किसी देश जाति या मजह्ब की क्या रक्षा कर सकता है?नफरतों के सौदागार तो सब के दुश्मन होते हैं।``बेटा जब से तुम ने मुझे पहचानना शुरू किया था मै अपनी पहचान भूल गयी थी।जीवन के हर लम्हें पर तेरा ही नाम लिख लिया था।मगर आज मैं तुम्हें अपने जीवन से अलग करती हूँअज तू मेरा बेटा नहीं है मै फिर से अपनी पहचान पा गयी हूँ।``
``जानते हो मेरी पहचान क्या है?मेरा कर्म क्या है़?````मेरी पहचान है
'माँ' 'वात्सल्य की देवी'। मेरा कर्म है 'सृ्ष्टी- सृजन' । जीवन देना मेरी 'पहचान' है फिर मैं जीवन लेने वाले को कैसे बेटा मान सकती हूँ-- कैसे अपना सकती हूँ?
तू मुझे चुनौती देने चला है़?तू एक माँ के सृजन का संहार करने चला है? ऐसे बेटे को जन्म देने वाली माँ के मुँह पर संसार थूकेगा।मुझे देख कर कोई भी माँ बेटे को जन्म देते हुये डर से काँप जायेगी।````जा भगवान के पास अपने गुनाहों की सजा पाने।``
``मैं एक मा--सृ्ष्टि की सृजन कर्ता किसी हत्यारे को माफ नहीं कर सकती। मेरे आँ सू भी अब तेरे लिये नहीं बल्कि उन निर्दोश लोगों के लिये हैं जोतेरी बन्दूक से मारे गये।--- कह कर मैने आँखें पोँछी और बाहर आ गयी।
``एस पी साहिब ! वो मेरा बेटा नहीं है।! बाहर आ कर मैने कहा और दृ्ढ कदमों से अस्पताल से बाहर निकल गयी।-----
समाप्त

28 July, 2009

माँ की पहचान ---- गताँक से आगे ---कहानी

``माँ मै जिले भर मे फर्स्ट आया हूँ।``कहते हुये मेरे गले लग गया था।खुशी के मारे आँखें छलछला आईं थी।
``ये क्या माँ! खुशी मे भी रो रही हो? मुझे मालूम है तुम्हें अब ये दुख है कि मैं तुम से दूर चला जाऊँग। तो ठीक है मै पढने ही नहीं जाऊँगा। मेरी माँ की आँखों मे आँसू आयें मै ऐसा कोई काम नहीं करूँगा।``
```न--न-- बेटा ऐसा मत बोल । तुम्हारा जीवन संवारने के लिये मैं कुछ भी करूँगी।``
और वही बेटा आज मुझे छोड कर कैसे जा सकता है। जरूर उसके साथ कोई अनहोनी हो गयी होगी।
उसे एम -ब- बी- एस् मे दाखिला मिला तो मेरी खुशी का ठिकाना ना रहा था।मै ही नहीं सारा मोहल्ला खुश था।इस गरीब आबादी मे कोई डाक्टर तो क्या दसवीं बाहरवीँ से आगे कोई पढ ही नही पाया था।मोहल्ले मे जो मुझे मेरे नाम से जानते थे वो मुझे अब नीरज की माँ से जानने लग गये थे।
मेरा बेटा मेरी पहचान बन गया था।
जब से वो लापता हुया है मोहल्ले मे सन्नाटा सा पसरा रहता है। हर कोई खौफ ज़दा है कि कहीं कोई हादसा ना हो गया हो उसके साथ। उसके ख्यालों मे गुम पता नहीं कब नीद आ गयी। रोज़ का यही तो नियम था चारपाई पर पडे रहना और उसे याद करना।
हफ्ता हो गया था एस पी से मिले। आज सोच ही रही थी कि एक बार फिर मिल आऊँ , बेटे के लिये तडप अब सहन नहीं होती थी।। तभी बाहर घन्टी की आवाज़ सुन कर उठी ,दरवाज़ा खोला ----
``नमस्ते बहिन जी! मैं पोलिस स्टेशन से आया हूँ एस -पी साहिब ने आपको बुलाया है। आपके गुमशुदा बेटे की शिनाख्त करने के लिये।``
``क्या हुया उसे?`` मेरे तो जैसे प्राण ही निकल गये थे।
``घबराईये नहीं कुछ चोटें आयी हैं ,अप सरकारी अस्पताल पहुँच जाईये।`` कह कर वो चला गया।
मैं मा को घर मे ही ठहरने को कह कर अस्पताल के लिये चल पडी।ास्पताल ढेड दो कि मी था।अटो से निकल कर गेट के अँदर पहुँची तो सामने एस पी साहिब ,जाँच अधिकारी और कुछ सिपाही खडे देख मैं उनकी तरफ बढ गयी--
``कहाँ है मेरा बेटा ?क्या हुया है उसे?`` मै बेटे को देखने के लिये बैचैन थी।
``बहिन जी धीरज रखिये। अभी अपको कुछ देर इन्तज़ार करना पडेगा। डाक्टर उसे चैक कर रहे हैं।`` कहते हुये उन्हों ने अस्पताल के ग्राऊँड की ओरिशारा करते हुये मुझे वहां आने को कहा। मन अग्यात भय से काँप उठा मगर उनके पीछे पीछे चल पडी।
``सर मुझे ये बताईये कि कहाँ से मिला मेरा बेटा ? आखिर बात क्या है? मेरी बेचैनी बढ रही थी मैने बेसब्री से पूछा।
``घबराईये नही मुझे मुझे कुछ बातों का जवाब दीजिये । क्या आपका बेटा कोई नशा भी करता था?इससे पहले भी वो घर से गायब हो जाता थ?`` एस पी ने बडी गौर से मेरी तरफ देखते हुये पूछा।
``नहीं मैने उसे कभी नशे मे नहीं देखावो हास्टल मे रहता था।वहाँ से कहीं आता जाता हो ये मुझे पता नहीं मगर उसकी ऐसी शिकायत कभी नहीं मिली।``
``क्या हास्टल जाने के बाद आपने उसमे कोई बदलाव देखा?``
मैं सोच मे पड गयी। ओह मै इतनी ना समझ कैसे हो गयी? मैने इस बात को क्यों गम्भीरता से नहीं लिया कि एक ढेड वर्श से उसमे काफी बदलाव आने लगा था। मै इसे उम्र के साथ और पढाई के बोझ के कारण स्वाभाविक समझने लगी थी।
``साहिब नीरज बचपन भावुक शरारती लडका था मगर बहुत भोला भी था।कालेज जाने के बाद लगभग वो एक साल ऐसा ही रहा। हर हफ्ते घर आता। सब से मिलता जुलता। उसे खाने का बहुत शौक था।छुट्टियों मेउसकी खाने की फरमाईश पूरी करते करते मैं थक जाया करती थी। धीरे धीरे उसका घर आना कम होता गया। आता भी तो कमरे मे घुसा रहता था। अब कोई शरारत भी नहीं करता था। या तो सोता रहता या फिर किताब ले कर बैठ जाता था। खामोश सा रहता मैं पूछती तो झुँझला ऊठता---- एक दिन मैने फिर बडे प्यार से पूछा तो उसने बताया----
``माँ, तुम्हें पता नहीं कि पढाई कितनी मुश्किल है!पैसों की तंगी के चलते मै पूरी किताबें भी नहीं खरीद सकता अच्छा खा पहन नहीं सकता,यहाँ तक कि कालेज और अस्पताल भी पैदल ही जाना पडता है। कह कर वो उठा और दराज से कोई दवा निकाल कर खाई मैने पूछा तो बोला कि पेट दर्द है डाक्टर से ले कर आया था।
मैं उसकी बातें सुन कर चिन्तित हो गयी थी। मैने उस से कहा कि मै बैंक से कर्जा ले लूँगी तुम्हें बाईक भी ले दूँगी और बाकी खर्च के लिये भी दूँगी। मगर उस ने मना कर दिया था।उसने कहा कि मै खुद ही इन्तजाम कर लूँगा।यह छ: महीने पहले की बात है। तब से वो घर नहीं आया। जितने पैसे मै भेजती थी भेजती रही उसने बताया था कि एक दोस्त ने उसकी मदद की है। हाँ उसका कभी कभी टेलिफोन पडोसियों के घर आ जाता तब उस से बात हो जाती थी।
``देखिये जिस लडके की शिनाख्त के लिये आपको बुलाया गया है पता नहीं वो आपका बेटा है भी या नहीं।``
क्रमश:

27 July, 2009

माँ की पहचान
(कहानी )
चपरासी ने अंदर जाने की अनुमति दी।मन मे एक आशा लिये मै एस-पी साहिब के सामने जा खडी हुई।
```बैठिये।``एस पी साहिब की शाँत आवाज़ सुन कर उनके सामने पडी कुर्सी पर बैठ गयी और अपना परिचय दिया।
``सर् मैं आपके पास बडी उमीद ले कर आयी हूँ। तीन महीने हो गये हैं मेरे बेटे का कोई सुराग नहीं मिला। हर तरफ से निराश हो चुकी हूँ। अब आप पर ही आखिरी उमीद टिकी है।`` आँसू बरबस बहने लगे।
``रोईये मत मैने आपका केस अपने सब् से काबिल अफसर को सौँप दिया है। हम बहुत जलदी आपके बेटे का पता लगा लेंगे।``
सुना था कि एस पी साहिब बहुत अच्छे इन्सान हैं।अज बडी कोशिश से उन्हें मिल पाई थी। उनके आश्वासन से टाँगों को खडे होने की ताकत मिल गयी थी। आशा की एक किरण लिये घर तक पहुँची। आते ही औँधे मुँह चारपाई पर गिर गयी। माँ पानी का गिलास ले कर आयी।
``बेटी सुबह से मारी मारी फिर रही हो एसे कब तक भटकती रहोगी? अपनी सेहत का भी थोडा ध्यान रखो। कुछ खा पी लो। भगवान के घर देर है अँधेर नहीं है- हमारा नीरज जरूर लौटेगा। माँ पास बैठ कर मेरा माथा सहलाने लगी।
``माँ।`` मैं माँ से लिपट कर रो पडी। एक माँ का आँचल ही तो है जो दुनिया भर के गम समेटने की सामर्थय रखता है।
``मैं थोडा आराम करना चाहती हूँ। ठहर कर खाती हूँ । आप खा लो।`` मैं लेट गयी और माँ खाली गिलास ले कर चली गयी।
मेरी कितनी चिन्ता करता था नीरज्!उस दिन मैं सिले हुये कपडे धूप मे ग्राहक के घर देने गयी थी ---घर आ कर चार्पाई पर लेटी ही थी कि नीरज आ गया था। आते ही मेरे माथे पर हाथ रखा-
``माँ अपको तो बुखार है?``और भाग कर दवा ले आया। मेरे माथे पर ठँडी पट्टी करता रहा।
``माँ मैं अपनी पढाई छोड दूँ? मेरे कारण आपको इतना काम करना पडता है,लोगों की बातें सुननी पडती हैं। जरा सा काम खराब हो जाये तो ये पैसे वाले लोग कैसे आपकी बेईज़ती करते हैं। मुझे ये सब अच्छा नहीं लगता।``
``ना बेटा ना ऐसी बात भूल कर भी नहीं करना।ामीर के नखरे सहना गरीब की नियति है।तभी तो मैं चाहती हूँ कि तू खूब पढे-- अच्छा डाक्टर बने तो ये सब कष्ट कट जायेंगे।``
``डाक्टर बन कर भी आज नौकरी कहाँ मिलती है। स्पैशलाईजेशन करनी पडती है। पढाई का खर्च भी इतना बढ गया है तुम कैसे चला पाओगी।``उसके मन मे निराशा से थी।
``मैं सब कर लूँगी तू चिन्ता मत कर ।ाइसी निराशा भरी बातें मत किया कर।चल जा कर पढ।`` मैने उसके सि्र पर हाथा फेरते हुये कहा।
नीरज एक बरस का ही था कि सडक हादसे मे उसके पिता की मौत हो गयी थी। बेटे के सिर से बाप का साया उठ गया । ससुराल वालों के लिये अब मैं मनहूस हो गयी थी।पति प्राईवेट फैक्टरी मे मकैनिक थे। कोई पैसा धेला भी नहीं मिला था। ससुराल वलों के ताने सुनने की ताकत ना रही तो मायके आ गयी। घर मे एक माँ और पोलियो ग्रस्त भाई था। जो चल फिर नहीं सकता था। माँ एक स्कूल मे आया थी उपर से मेरा बोझ पड गया । रिश्तेदारों ने सलाह दी कि मेरी दूसरी शादी कर दी जाये। मगर मै जानती थी कि एक विधवा को कैसा पति मिल सकता है । मै अपने बेटे की ज़िन्दगी बरबाद नहीं करना चाहती थी। इस लिये शादी के लिये मना कर दिया। उसके भविश्य को ध्यान मे रखते हुये मैने किसी की नहीं सुनी। मैं सिर्फ दसवीं पास थी ऐसे मे नौकरी कहाँ मिलती? मैने सिलाई कढाई सीख ली और लोगों के कपडे सीने लगी। काम ठीक चल पडा था।
बेटा स्कूल जाने लायक हुया तो उसे एक प्राईवेट स्कूल मे दाखिल करवा दिया। बेटा मेधावी था ज़िन्दगी ढर्रे पर चलने लगी थी। वो हर जमात मे प्रथम ही आता था।इस लिये मैं भी उसके जीवन के लिये बडे बडे सपने देखने लगी थी।कैसे भी हो उसे डाक्टर बनाऊँगी। मैं उसे घर से बाहर अकेले नहीं जाने देती ताकि वो कोई बुरी आदत ना सीख ले। इस लिये वो बहुत भोला भाला था। दुनियादारी से कोसों दूर । मैने कभी सोचा ही नहीं कि कल जब वो बाहर पढने जायेगा तो अच्छे बुरे की पहचान कैसे करेगा ! उसके भोले पन के कारण उसे कोई फुसला सकता था।माँ की आवाज़ सुन कर ख्यालों से निकली।
``बेटी ! एस -पी साहिब ने क्या कहा?`` माँ काम निपटा कर मेरे पास आ कर बैठ गयी थी
कहते तो हैं कि सब से काबिल अफ्सर को नीरज का केस सौंपा है। आगे भगवान जाने ! मेरा बात करने का मन ना देख कर माँ चुप कर गयी और फिर खाना ले कर आ गयी ।
मैने खाना खाया और् फिर लेट गयी। जीवन थम सा गया था। जब से नीरज गया था मैने कपडे सिलने बन्द कर दिये थे। हिम्मत ही नहीं थी। बस उसकी यादों मे खोई रहती। पता नहीं मेरे बेटे के साथ कैसा हादसा हुया था ।वो ऐसे मुझे छोड कर जा ही नहीं सकता था। मुझे याद है जिस दिन उसका बाहरवीं का नतीजा निकला था वो सुबह सात बजे गज़ट देखने गया था और बारह बजे घर आया था।मेरे तो प्राण सूखे जा रहे थे। इतनी देर भी बेटे को आँखों से दूर देखना भारी पड रहा था --लेकिन जब वो शहर पढने जायेगा तो कैसे रह पाऊँगी? पर अब तो दिल पर पत्थर रखना ही पडेगा।
क्रमश:

25 July, 2009

शब्दजाल -------कहानी
------- गताँक से आगे

बैंगलोर आये हुये मुझे 4--5 दिन हो गये थे । पहुँच कर इन्हें फोन कर दिया था । कि ठीक ठाक पहुँच गयी हूँ------- उसके बाद चार पाँच दिन से कोई बात नहीं हुई।मन मे चिन्ता भी थी कि पता नहीं कैसे खाते पीते होंगे----- अकेले कैसे रहते होंगे------ सोचा आज फोन करती हूँ । फोन मिलाया--
*हेलो !* फोन उठाते ही इनकी आवाज़ आई
*हेलो ! कौन\ कृष्णा ! कैसी हो तुम । *
*मैं ठीक हूँ आप कैसे हैं----- खाना वगैहरा कैसे चल रहा है \* मन मे था कि अभी कहंगे कि तुम्हारे बिना कुछ अच्छा नहीं चल रहा।
*बहुत बढिया चल रहा है--- काम वाली है ना वो बना देती है ।*
*चलो फिर ठीक है ।*-------- सुनते ही मुझे पता नहीं एक दम क्या हुया मैने फोन ही रख दिया क्या इत्ना भी नहीं कह सकते थे कि तुम्हारे बिन अच्छा नहीं लग रहा-----दिल नहीं लग रहा---कभी दूर भी नहीं रहे थे----- फिर भी जनाब मजे मे हैं----- मन फिर उलझ गया इतने सालों बाद पहली बार घर से बाहर आयी हूँ---- इन्हें काम करने की आदत भी नहीं ह। एक् चाय का कप तो कभी बनाया नहीं फिर घर के और कितने काम होते हैं--।कैसे चलते होंगे। मुझे घर मे अपना वज़ूद ही नगण्य सा लगने लगा ।क्या मैने सारी उम्र घर को बनाते संवारते य़ूँ ही गवा। दी घर तो मेरे बिना भी बढिया चल रहा है ।क्या एक नौकरानी से काम नहीं चल सकता था । बस इस शब्द जाल मे ऐसा उलझी कि पता नहीं सोचें कहाँ कहाँ अपने को तलाश करने लगीं।
जितने दिन बैंगलौर रही मन उदास ही रहा-।सोचने लगी थी कि इन्हें शायद अब मेरी जरूरत ही नहीं है~ तो मैं क्यों घर जा रही हूँ।फिर भी बेटी के पास कब तक रहती। जाना ही था ।इन्हें फोन कर दिया था कि 9 बजे दिल्ली पहुँच कर बस लूँगी----और चार बजे तक घर पहुँच जाऊँगी
चार बजे बस से उतर कर आटो लिया और घर पहुँच गयी। मगर ये क्या ! घर मे ताला \ आज पता था कि चार बजे मैं आ रही हूँ तो भी चले गये । बस आधा घन्टा पहले पहुँच गयी थी । मन ही मन कुढते हुये पर्स मे से दूसरी चाबी निकाली क्यों की दोनो नौकरी मे थे तो दो चाबियाँ रखनी ही पडती थीं ।दरवाज़ा खोला सामान अन्दर पटक कर मै पँखे के नीचे लेट गयी । प्यास भी बहुत लगी थी मगर पानी भी नहीं पीया----बस एक ही बात मन पर हावी होने लगी कि इन्हें मेरी पर्वाह नहीं है । चंचल मन जिन्दगी भर की अच्छाईँयां भूल कर कुछ शब्दों के हेर फेर को ले कर उलझ गया था ।
पाँच मिन्ट बाद ही ये आ गये और आते ही रसोई मे घुस गये ।
यह क्या \ ना दुआ ना सलाम ---- हाल चाल भी नहीं पूछा और रसोई मे घुस गये जैसे रसोई इन के बिना उदास हो गयी हो। मेरी आँखें भर आयी ये आँसू तो हमेशा औरत की पलकों पर ही बैठे रहते हैं बस मौका देखते ही छलक आते हैं -----
*लो कृष्णा जूस पीयो ---मैने सोचा तुम इतनी गर्मी मे आओगी और बस के सफर मे तुम्हें वोमिट भी आती है मुँह का स्वाद भी खराब हो जाता है इस लिये मैं ताज़ा जूस लेने चला गया । रास्ते मे सकूटर खराब हो गया उसे मकेनिक के पास छोड कर पैदल ही भागा आया।* एक ही साँस मे कह रहे थे-----
*कैसी हो तुम्\*
आँखों मे आये आँसू बह गये---- मैं ठीक हूँ आप कैसे हैं। गुस्सा कुछ ठँडा हुया और मैने जूस का गिलास ले कर पी लिया ।
*आप तो पीछे से मज़े मे थे ना ! * दिल की बात ज़ुबान पर आ ही गयी------ ।
*अरे क्या खाक ठीक था\ तुम्हारे बिना घर घर ही नहीं लगता था-। इतने दिन ना ढंग से खाया ना पीय़ा । इस घर की खुशियाँ तो तुमसे ही हैं।*
ये क्या\ क्या उस दिन फोन पर ये सब नहीं कह सकते थे । बस इनकी यही बात मुझे अच्छी नहीं लगती थी--।शब्दों का मायाजाल देखिये इतने दिनों का गुस्सा परेशानी सब एक मिन्ट मे गायब----- अब अपने पर गुस्सा आने लगा---क्या मैं नहीं जानती थी कि ये मुझे कहें या ना कहें मगर मुझ से प्यार करते हैं। फिर क्यों पड जाती हूँ इस चक्कर मे। और इन्हें तो शब्दों का ये हेरफेर बिलकुल भी नहीं आता---मगर मेरे दिल की बात बिना कहे समझ लेते हैं---- और अब मैं क्या चाहती हूँ ये जान गये थे-----आपेक्षित शब्दों की फुहार तन मन भिगो गयी थी । वाह री पत्नि !
---------समाप्त्

24 July, 2009

शब्दजाल (कहानी )

पति का व्यक्तित्व कितना ही सश्क्त हो़- वो कितना ही कर्तव्य़ निष्ठ हो- मगर पत्नि सुलभ मन फिर भी कुछ लुभावने- आपेक्षित शब्दों का मेहताज़ रहता है।और फिर सम्बन्धों को मजबूत बनाने के लिये ये शब्द सेतु का काम करते हैं-जिन्हें गुनगुनते हुये- दिन भर याद करते- हुये पत्नि एक नई उंमँग से भरी रहती है। आज मेरा मन भी इसी शब्दजाल के मोह मे उलझ गया था----। दस दिन हो गये थे बैंगलोर आये हुये--- आई तो घूमने फिरने और बच्चों से मिलने थी मगर मन पीछे घर मे था -उपर से कुछ अन्दर ही अन्दर मन को सताये जा रहा था ।---
कई दिन से मन उदास सा था ।बेटी का फोन आया था---हम दोनो को बैंगलोर आने के लिये कह रही थी । तभी ये आ गये और मैने जवाब देने की बजाये फोन इन्हें पकडा दिया और आप बाहर चली गयी । बच्चों के इस आग्रह को ठुकराना मेरे बस मे नहीं था-- फिर मैं बच्चों के पास जाना भी चाहती थी पर इनसे कहने की हिम्मत नहीं होती। मुझे पता था कि इन्हें घूमने फिरने का शौक नहीं था और घर को इतने दिन सूना छोड कर जायेंगे भी नहीं।
पता नहीं बच्चों से क्या बात हुई- पूछना मेरी आदत् नहीं थी और बताना इनकी फितरत नहीं थी।मैं जानती थी कि आदमी सोच समझ कर उपयुक्त समय पर बात करते हैं और औरत एक दम कहने सुनने को उतावली हो जाती है।ये कहने सुनने के समय का शून्य भी तो शब्दों का मोहताज ही तो होता है---। पत्नि यूँ भी पति से प्यार -सहानुभूति और प्रशंसा के दो शब्द सुनने के लिये लालायित रहती है। दिन भर के गिले शिकवे उन दो शब्दों की फुहार मे घुल कर बह जाते हैं।
इनसे कभी कुछ पूछो या राय माँगो तो कभी भी उसी समय जवाब नहीं देते---कुछ घन्टों य दिनो बाद इनका जवाब मिलता है तब तक उस बात का क्या औचित्य रह जाता है----++!
रात का खाना खाने के बाद मैने काम निपटाया । ये अखबार ले कर बैठ गये और मैं किताब ले कर -- दोनो मौन थे ------।
**कृ्ष्णा ! आज कल तुम भी कुछ उदास रहती हो। बच्चे आने के लिये कह रहे हैं तो कुछ दिन के लिये हो आओ़**----।
*क्या अकेले ही \**---मन मे एक सँतोष सा हुया कि इन्हें पता है कि आजकल मैं उदास रहती हूँ----।
**हाँ आज कल मुझे छुट्टी मिलना मुश्किल है फिर घर भी सूना रहेगा। तुम हो आओ** ।
**आपका खाना-घर का काम ये सब कैसे चलेगा \ मैने इनकी तरफ देखा** ।
**तुम चिन्ता मत करो काम वाली से बनवा लिया करूँगा** ।
मैने भी सोचा कि चलो ठीक है---इनकी मर्जी । इन्हें भी पता चलेगा कि मेरे बिना घर कैसे चलता है ।जनाब को चार दिन मे नानी याद आ जायेगी---- पता नहीं बच्चों से मिलने को उतावली थी या इन्हें ये दिखाने को कि मेरे बिना घर नहीं चल सकता ---क़ि मैने हाँ कर दी---
अगले दिन ये चंडीगढ चले गये कि कुछ काम है मैने पूछा नहीं कि क्या काम है और इन्होने बताया नहीं । रात को वापिस आये तो मेरे हाथ मे एक कागज़ पकडाते हुये बोले * कि ये तुम्हारा टिकेट है---- लो तुम्हारे जाने का प्रबन्ध हो गया है(* ।
**ये क्या ये तो एयर्वेज़ का टिकेट हैं**\--मैने टिकेट को देख कर हैरानी से कहा **मैने ट्रेन से ही चले जाना था इसकी क्या जरूरत थी**\मैने इनकी तरफ देखा ।
**नहीं तीन दिन का सफर म्रे मुझे यहाँ चिन्ता रहती कि तुम ठीक ठाक पहुँच गयी हो कि नहीं** ।-
फिर वही शब्द जाल ------मन फिर इनमे फंस गया ----तो अपनी चिन्ता मिटाने के लिये हवाई यात्रा का टिकेट ले कर आये हैं\---क्या इतना नहीं कह सकते थे कि आने जाने मे इस तरह छ दिन बच जाते और तुम जल्दी आ जाओगी---- तुम्हारे बिना इतने दिन कैसे रहूँगा----। जानती भी थी कि इन्हें बातें बनानी नही आती--- ना भी रह सकेंगे तो भी कहेंगे नहीं---बस यही बात मुझे चुभती---पत्नि मन इन शब्दों के बिना रीता स रह जाता है।इसी शब्दजाल मे कई बार अच्छे पल भी अच्छे नहीं लगते ।
बैंगलोर आये हुये मुझे 4--5 दिन हो गये थे । पहुँच कर इन्हें फोन कर दिया था । कि ठीक ठाक पहुँच गयी हूँ-----क्रमश

23 July, 2009

आज कुछ् टाईप नहीं कर पाई इस लिये एक कविता जो तहलका काँड पर लिखी थी आपके सामने रख रही हूँ पता नहीं इस काँड का क्या बना मगर इसके बाद तो काँड ही काँड दिखे कोई इस चक्रव्यूह के तोड पाया कि नहीं ये आप सब के सामने है

चक्रव्यूह (कविता )

मेरे देश का प्रजातन्त्र्
कब से
तिल तिल कर मर रहा है
भ्रश्टाचार की आग मे
जल रहा है
देश के शासक
इसकी धक्कियाँ उडा रहे हैं
भूखे भेडियों की तरह खा रहे हैं
और आज जब
एक और अभिमन्यू ने
इन दुर्योधनों के चक्रव्यूह मे
सेँध लगायी
प्रजातँत्र् क बलात्कारी साँसदों की
काली करतूत टी वी पर दिखाई
देश की प्रजा ने
शर्म से सिर झुकाया
प्रजातँत्र भी ना सह पाया
लडखडाते हुये कराहा और बोला
अरे! है कोई अर्जुन् तो आये
मुझे इन दुर्योधनों के
चंगुल से बचाये
और मैं लाचार खडी देख रही हूँ
इसका हाहाकार व्यर्थ जायेगा
इस चक्रव्यूह को
कोई नहीं भेद पायेगा
फिर इतिहास
खुद को दोहरायेगा
और एक दिन
ये अभिमन्यूं भी मारा जायेग


22 July, 2009

यही नसीब है------------कहानी

मैने जिन्दगी से कभी कुछ माँगा नहीं था जो भी मिला जैसा भी मिला अगर अच्छा लगा तो उसमे अपने को ढाल लिया नही भी लगा तो उसको अपने मुताबिक ढाल लिया अगर कभी शिकवा हुया भी तो होठों तक नही आया------ हमेशा कुछ कर दिखाने का जज़्वा लिये साहस से चलती रही------- मगर जब से तुम्हें तिल तिल मरते देखा है साहस टूटता सा नज़र आने लगा था----- जिन्दगी से गिले करने लगी थी----- फिर भी जीना नहीं छोडा था----- लेकिन तुम्हारी मौत ने----- मुझे पूरी तरह तोड दिया है------- जिस दुख को तुम ने वर्शों सहा है मैं कुछ पल के लिये भी जी नहीं पा रही हूँ------ पस्त हो गयी हूँ------ इस लिये आज तुम से दो बातें करने आई हूँ-----तुम्हारे जीते जी तो नहीं कह सकी ------- मगर मरने के बाद ------ क्यों कि जानती हूँ तुम अब भी मुझे भूलना नहीं चाहते------- नहीं चाहिये मुझे तुम्हारा ये जनून------ ये कैसा प्यार था तुम्हारा------ जो मुझ से भी मेरी जिन्दगी छीन लेना चाहते हो------- तुम ने कभी एक बार भी मुझे बताया होता--- तो शायद्--- दुख इसी बात का है कि तुम अपने भ्रम पाले बैठे रहे------ किसी दूसरे के दिल से बेखबर------ मैने तो तुम से प्यार नहीं किया था फिर मुझे सजा किस बात की-------
पता नहीं क्यों---अज किसी कन्धे की जरूरत महसूस हो रही है----- एक ऐसे कन्धे की जो मेरे कुछ गम अपने कन्धे पर उठा सके---------- मेरे आँसूओं की नमी अपनी आँखों मे समेट सके-------- मेरी टीस को अपने दिल की गहराईयों मे महसूस कर सके --- अकेली कब तक इस बोझ को ऊठाऊँगी--------- कितना असहाय हो जाता है कई बार आदमी------- कितना भी जीवट हो मगर किसी ना किसी समय और किसी ना किसी बात पर किच्चर किच्चर बिखर जाता है------- मगर मै भी कितनी नादान हूँ जब मै अपना ही बोझ नहीं उठा पा रही हूँ तो कोई कैसे मेरा बोझ उठा सकता है----वो भी आज की दुनिया मे-------- सभी रिश्तों की तरफ नज़र दौडाती हूँ------- जिनके आँसूओं की नमी ही नहींपूरे के पूरे दरिया को अपनी आँखों से बहाया है----- जिनकी टीस को खुद जीया है-------- जिनको किसी दुख तकलीफ का एहसास नहीं होने दिया-------उनको सिर्फ अपना कन्धा ही नही दिया बल्कि अपने जीवन का हर सुख सौँप् दिया-------- वो भी आज मेरे दुख को महसूस नहीं कर सकते ------ क्यों करें----- मेरे दुख से उनका नाता भी क्या है -------- और---- तुम ------- जो सारी उम्र मेरे लिये ही जीने का दम भरते रहे------ और मुझे सुख देने की बजाये दुख दे गये----- ये कैसा प्यार था------ शायद ये तुम्हारा प्रतिशोध था------- या शायद ये तुम्हारी आखिरी कोशिश कि तुम मुझे अपने प्यार का एहसास करवा सको-------- विश्वास दिला सको------- या शायद तुम भी थक गये थे मुझे विश्वास दिलाते दिलाते-------- तुम्हें भी तो कई बार तलाश रही होगी किसी न किसी कन्धे की ------- किसी ने तुम्हारी नहीं सुनी----- मैने भी नहीं तो फिर अब मैं क्यों रो रही हूँ-------- वैसे भी हर कन्धा इतना सश्क्त तो नहीं होता ना कि उस पर अपना सिर रख दिया जाये-------- शायद हम दोनो के लिये कोई कन्धा बना ही नहीं-------- तुम ने झूठ कहा था कि तुम मुझ से प्यार करते हो---- अगर ऐसा होता तो तुम मुझे छोड कर नहीं जाते------- कम से कम मरते नहीं चाहे कहीं दूर चले जाते----------मुझे ये अपराधबोध दे कर नहीं जाते कि तुम्हारी मौत का कारण मैं हूँ-------- मेरे कारण तुम ने अपनी दुनिया नहीं बसाई----- मैने कोई बेवफाई नहीं की थी--------- मैने तो तुमसे प्यार नहीं किया था ------- तुम ने समय पर एक बार कहा होता------- मुझे सुना होता ------ मैने तो वही किया जो बचपन से सुना देखा और समझा------ और तुम ही तो सिखाया करते थे ये बडी बडी बातें------ तुम भी तो महान बनने का मोह नहीं त्याग पाये----
कभी कभी ऐसा क्यों होता है कि इन्सान को अपनी मान्यतायें संस्कार जिन से उम्र भर नाता जोडे् रखता है------ वो झूठे लगने लगते हैं------- वो उन के खिलाफ वगावत करने पर आमदा हो जाता है-------शायद यही मेरे साथ हो रहा है------- आज सोचती हूँ कि मैने अपनी ज़िन्दगी को क्यों रुस्वा किया----- क्यों इसे इतने दुख सहने दिये----- इसके लिये कुछ तो खुशियाँ तलाशनी चाहिये थीं------- फिर से एक बार उन गलियों मे लौट जाना चाहिये था जहॉ---रिश्तों के बन्धन नहीं होते ----बस होता है बचपन ----- मन एक आज़ाद पँछी की तरह उडता है अपनी अपनी उडान ----- निश्छल प्रेम ---- उमँग ---- कोई दुख नहीं कोई दर्द नहीं------- अगर समय नहीं भी ठहरा तो भी----- जब तुमने मेरे दिल को छूने की कोशिश की थी---- मुझे अपने दिल के कवाड खोल लेने चाहिये थे------तब भी शायद ज़िन्दगी को कुछ ऐसे पल मिल जाते जो आज मेरे जख्मों को सहलाने के काम आते------- शायद अब इन सब बातों का कोई फायदा नहीं है-------- मुझे तो ये भी समझ नहीं आ रहा कि मेरे दुख का कारण क्या है जब तुम से प्यार ही नहीं किया तो दर्द क्यों------- यही तो वजह है कि काश तुम्हीं से किया होता ----- हां यही वजह है------- और अब जब तुम दुनिया से चले गये हो तो मुझे तुम्हारी याद आ रही है----- यही तो दुनिया का दस्तूर है और मै दुनिया की भीड का एक हिस्सा हूँ----- तुम्हारी तरह भीड से हट कर नहीं-----
फिर भी आज एक बार तुम्हारा दर्द महसूस करना चाहती हूँ------- क्यों कि आसमान मे तारों के बीच आज तुम्हारा पहला दिन है------ बाहर लान मे आ कर बैठ जाती हूँ-------तारे निकलने का इन्तज़ार है-----मगर ये क्या देखते ही देखते घटायें छाने लगी हैं-------जान जाती हूँ-----तुम्हारा दिल वहाँ नहीं लग रहा -----जरूर तुम्हारी आँखों मे उदासी के साये लहराये होंगे-------मुझे देख लिया होगा आसमान की ओर देखते------ कि मैं कितनी दुखी हूँ बेचैन हूँ------ दूर बादलों मे तुम्हारा साया देख रही हूँ-------- तुम्हारी बडी बडी आँखें------अज भी बादलों मे बनी तुम्हारी तस्वीर मे वैसी ही दिखाई पड रही हैं------- कुछ बून्दें टपकने लगी हैं------- शायद आज तुम खुद को रोक नहीं पा रहे हो कितनी देर रोके इन्सान पूरी ज़िन्दगी ----एक शून्य मे जीते रहे---- हाँ आज रोकना भी मत---- बहने दो ये आँसू------- वहाँ तो दुनिया का डर नहीं है----- कम से कम अपनी मर्ज़ी से रो तो सकते हो--------अज मैं भी तुम्हें निराश नहीं करूँगी मैने वो बून्दें हाथ पर सहेज ली हैं-------इन को पी भी लिया------ ओह इतनी जलन ----कितना दर्द हुया पीते पीते------ कैसे सहा होगा तुमने पूरा बादल --- मै तो एक टुकडा भी सह नहीं पा रही हूँ----- शायद अब तुम भी सह नहीं पा रहे थे तभी तो चल दिये------- बस इससे अधिक मै तुम्हारा साथ नहीं दे सकती----- अब लगता है कि मैं तुम से प्यार करने लगी हूँ------ और तुम्हारे प्रतिशोध की सजा काट कर ही आऊँगी तुम्हारी तरह तिल तिल कर मरूँगी----- मगर मिल तो फिर भी ना सकेंगे------- किसी के साथ सात जन्म के वचन जो लिये हैं अग्निपथ पर ------ मगर ये अग्निपथ के रिश्ते बहुत बेरहम होते हैं वो तुम्हारे लिये मुझे कभी कन्धा नहीं देंगे----- तुम ने चाहे उन की मर्यादा के लिये अपना जीवन दे दिया मगर वो रिश्ते क्यों कि शरतों पर टिके होते हैं----- आत्मा तो शर्तों पर प्यार नहीं करती इस लिये वो रिशते प्यार का अर्थ नहीं जानते------ असंवेदनशील हो जाते हैं भावनाओं के प्रति------ अब तुम जाओ------रहना तो होगा वही----- जैसे यहाँ रहते थे------- और मुझे भी जीने दो----- कभी मत आना मेरी यादों मे------- यही तो नसीब होता है जिसे हम चाह कर भी बदल नहीं सकते--------

21 July, 2009

मेरी नज़र से देखो---गताँक से आगे----कहानी

अनु-------- और वो अचानक अनुजी से अनु पर आ गया था------ मैं फिर असहज हो गयी----- मैं तुम्हरे दुख को समझ सकता हूँ----तुम्हारी भावनाओं की कद्र करता हूँ---महसूस कर सकता हूंम------मैं जानता हूँ कि मुझे देख कर तुम्हें सुमित की याद आती है------- बीते दिनों की यादें------मगर क्या करूँ मैं कितना दुखी हूँ----शायद तुम नहीं समझ सकती------- सुमित ने मुझे आँखें दे कर इस घर से बाँध दिया है------ उसकी आँखें उसके परिवार को ना देखें उसके माँ-बाप को ना देखेंतो ये अपराधबोध मैं सह नहीं सकता------ वरुण के लिये कितने सपने थे इन आँखों मे------ फिर इन आँखों के सपनों का क्या करूँ-------मेरी बातों का बुरा मत मनना मैं किसी परिस्थिति का कोई अनुचित लाभ उठाना नहीं चाहता------- मैं बस ये जानना चाहता हूँ कि क्या तुम इन आँखों के सपनो क्प छीन लेना चाहती हो?------क्या तुम्हें अच्छा नहीं लगता कि मैं उसकी इच्छा पूरी करूँ------ तुम क्यों मुझ से बात करना नहीं चाहती----हम इकठे कितना चहका करते थे-------- ऐसा तो नहीं कि तुम पहले मुझ से बात नहीं करती थी------ बल्कि सुमित से भी अधिक हम दोनो बातें करते थे----- हँसते खेलते थे------- फिर इन आँखों ने क्या कसूर कर दिया-------
नहीं---- सुजान ऐसी कोई बात नहीं है ---तुम समझते क्यों नहीं ------- सुमित के बिना कुछ भी अच्छा नहीं लगता---
सुमित की आँखे?------क्या ये भी नहीं------ सुजान एक दम मेरी आँखों मे झाँक रहा था-------
मै सामने दरिया की ओरे देखने लगी------- सुजान सामने दरिया मे उठती लहरों को देख रहे हो?------ागर ये दरिया के किनारे तोड कर् बाहर बहने लगेंगी तो तबाही मचा देंगी-----सच कहूँ तुम से बात करते हुये मुझे तुम से नहीं इन आखों से डर लगता है------
अगर इन लहरों को मजबूत किनारों से बाँध दिया जये तो ये शाँत दरिया मे बहने लगेंगी------- तुम्हें पता है मम्मी पापा तुम्हारे और वरुण के लिये कितने चिन्तित रहते हैं------- वो तुम से खुल कर कोई बात नहीं कर सकते------- सच कहूँ तो उन्होंने मुझे सुमित की जगह स्वीकार कर लिया है-------क्या तुम ऐसा नहीं कर सकती-----
ये क्या कह रहे हो-------क्या तुम नहीं जानते कि सुमित के बाद मै ाउर वरुण ही मम्मी पापा का सहारा हैं----- मैं उन्हें छोड दूंम्गी ये तुम ने कैसे सोच लिया-------मैं उसकी बातों से कुछ विचलित सी हो गयी थी--------
ये मैने नहीं सोचा मम्मी पापा ने सोचा है---------वो चाहते हैं कि तुम वरुण और उन की खुशी के लिये मुझ से शादी कर लो तो उनकी चिन्ता समाप्त हो जायेगी और इस तरह हम सब एक ही घर मे इकठे रह लेंगे--------
सुजान बस करो मैं ऐसा सोच भी नहीं सकती------सुमित के बिना कुछ भी नहीं ------
मै कब कहता हूँ कि तुम उसके लिये ना सोचो----बल्कि तुम ऐसे सोचो कि जिन आँखों मे तुम्हारी तस्वीर रहती थी वो तुम्हारी इस बेरुखी से आहत नहीं होंगी------- ये आँखें तुम्हारे इन्तज़ार मे बैठी हैं---- मान लो अगर इसके विपरीत आज मेरी आँखें सुमित् के लगी होती तो क्या तुम इन आँखों मे ना देखती------ तुम्हें मुझ से डर नहीं लगता तो फिर इन आँखों से क्यों ----- वो मेरा दोस्त ही नही--- मेरी जान था--- आज जहान भी वही है मेरा----- मैं और तुम मिल कर उसे याद किया करेंगे दुख बाँट लिया करेंगे ---सब जिम्मेदारियां मिल कर निभा सकेंगे --मै तुम्हें एक दम फैसला लेने को नहीं कहता----तुम नहीं चाहती तो कोई बात नहीं मगर सहज व्यवहार तो करो मुझे क्यों सज़ा देती हो-------मुझे इस दर्द से मुक्त करो-----कहते कहते सुजान रो पडा-------
मैं चाय बना कर लाती हूँ----- मैं रसोई मे चली गयी------चाय का पानी खौल रहा था मगर मेरा दिल बेचैन हो रहा था सोच मे खडी रही-------
खैर चाय बना कर बालकनी मे आ गयी
खामोशी ----- बाहर खामोशी मगर दोनो के दिल मे आँधियाँ चल रही थी------ सुजान किनारे मजबूत करना चाहता था-----मगर मैं इन आँखों से डर रही थी----- कैसे बताऊँ सुजान को कि इन आँखों मे झाँकने की उस की कितनी तमन्ना है-----वो तो आँख खुलते ही सुबह पहले इन आँखों मे झाँका करती थी------ जब से इस घर मे आयी थी ----ेआज भी मन होता है------- मगर-------
क्या तुम्हें इन आँखों को देखने की चाह नहीं होती----- अचानक जैसे सुजान ने मेरी चोरी पकड ली थी मेरे दिल की बात जान ली थी------- शायद्
अच्छा तो मैं चलता हूं----- मै यहां इस समय इस लिये आया था कि पापा चाहते थे कि मै तुम से बात करूँ------ वरुण की ज़िन्दगी-------- शहीद बेटे के माँ बाप का सकून------ जो उन्हें ये आँखें देख कर मिलता है--------इन सब के लिये तुम कुछ कर सकती हो मै कर सकता हूँ-------- मै किसी और लडकी से शादी कर के पता नहीं ये जिम्मेडारियाँ निभा पाऊँगा कि नहीं ----- और फिर लोगों को बातें बनाते देर नहीं लगती-------- मैं नही चाहता कि कल को लोग मेरे यहाँ आने पर उँगली उठायें ------ सोच लो फैसला तुम्हारा है अगर फिर भी तुम्हारी ना है तो मैं कहीं दूर चला जाऊँगा-------- कहते हुये सुजान बाहर निकल गया-------
क्या सोचूँ मै------- सुमित तुम कहाँ हो-------- आँखें बह रही थी-------- इस दरिया की तरह----- सुजान ठीक ही तो कहता है सब का सपना टूट जायेगा-------- मम्मी पापा ने तो सुजान की आँखों मे सुमित को पा लिया हओ इसके जाने से वो टूट जायेंगे------- मैं----- हाँ मुझे भी तो सुजान का जाना अच्छा नहीं लगेगा--------कैसे देख पाऊँगी इन आँखों को---
धीरे धी दिन चल रहे हैं-------शाँत हूँ इस दरिया की तरह उसने इस दान से कितने जनों को जीने की राह दिखाई है और मै उसके इस दान को शर्मिन्दा करने जा रही हूँ-------- इस घर को इन आँखों की जरूरत है-------
सुजान रोज़ उसी तरह आता है------- वरुण से खेलता है------- मैं छुप छुप कर उन आँखों को देखती हूँ----वही चमक------वही कशिश् ------- दिल धडक उठता है------ सब की कोशिश रहती है कि जब सुजान आये तो मै उन सब के बीच बैठूँ -------- हाँ सच कहूँ अब मुझे भी उन आँखों का इन्तजार रहता है--------
एक दिन मम्मी पापा बाज़ार गये थे------दिन के 11 बजे थे पापा पैटोल पँप चले गये और मै वरुण को सुला रही थी--------
क्या कर रहे हैं माँ बेटा------- असमय सुजान की आवाज़ सुन कर मै चौँक पडी-------वरुण सो गया था उसे लिटा कर मै बालकनी मे सुजान के पास आ कर खडी हो गयी-------
आज इस वक्त कैसे आयी------- मैने धीरे से पूछा -------
क्या अब इस घर मे आने के लिये मुझे इजाज़त लेनी पडेगी-------- सुजान हंसा
नहीं नहीं ---मैने सोचा कोई काम है-------
बैठौ ------- शुक्र है मुझे देख कर कुछ सोचने भी लगी हो-------- उसने मेरी आँखों मे देखा------ अनु तुम कुछ भी कहो----- मगर ये आँखें तुम्हारी अन्दर तक झाँक लेती हैं------- ये जानती हैं कि तुम चोरी चोरी इन्हें देखती हो----- उसकी नज़र मेरे चेहरे पर थी------
हाँ सुजान------- सुमित शायाद इसी लिये इन्हें तुम्हें दे गया कि मैं इन्हें देख कर जी सकूँ------- उसके होने का एहसास पा सकूँ------- मगर मुझे डर है कि क्या मै तुम से इन्साफ कर पाऊँगी----- तुम मे सुमित को पा सकूँगी-----
अरे सुमित को क्यों भूलेंगे हम दोनो मिल कर उसे ज़िन्दा रखेंगे-------वैसे भी शहीद हो कर अमर हो गया है वो------
हाँ शायद सच कहता था सुमित कि ------ अनु ये आँखें तुम्हें जीनी की शक्ति देंगी ---- इन आखों से तुम्हे बाँध रखूँगा------- और मैने अपना हाथ सुजन के हाथ पर रख दिया------
धूप मे लहरों पर किरणो का नृ्त्य ------झिलमिल करता दरिया---उछलती कूदती लहरें किरणो से गले मिलती----- और दरिया मे हलचल मचा देती------- आज आसपास के पेड फिर से झूमने लगे थे----- इन आंखों ने मेरे दिल मे हलचल मचा दी थी------- वो लौट आया है------ जिन्दा है------ और मै बहे जा रही थी दरिया के साथ साथ ------ समाप्त्

20 July, 2009

मेरी नज़र से देखो------- कहानी------ गताँक से आगे

मैं सुबह उठते ही पहले अखबार देखती थी----- एक दिन अखबार पढते 2 एक खबर पर नज़र अटक गयी------- तो आँखों के आगे अँधेरा छा गया सुमित सुमित कारगिल मे शहीद हो गये थे------- मेरी दुनिया लुट गयी थी माँ बाप के घर का चिराग बुझ गया था------- मगर अभी यकीन करने का मन नहीं था------ उनकी युनिट से कोई खबर नहीं आई थी----अभी तो सुजान के सदमे से नहीं उभरे थे-----

किसी से बात करबे की स्थिती मे नहीं थी------ बेटा उठ गया था पर मुझे होश ही नहीं था मा बाहर आयी मुझे अखबार पकडे सदमे मे देखा तो मुझ से अखबार ले कर देखने लगी----फिर क्या था घर मे कोहराम मच गया ------ एक घन्टे बाद सिपाही भी खबर ले कर आ गया-------मुझे कुछ पता नहीं फिर क्या हुआ-------जब होश आया तो मेरे सामने सुमित की लाश थी------- तिरंगे मे लिपटी हुई------- कोई मुझे लाश से कपडा नहीं उठाने दे रहा था-----मैं बस एक बार सिर्फ एक बार सुमित का चेहरा देखना चाहती थी मुझे यकीन था कि ये सुमित नहीं हो सकता वो मेरे साथ इतना बडा धोखा नहीं कर सकता--------उसकी आँखों को देखना चाहती थी------ जिन्हें देख कर मेरे दिल की धडकन बढ जाती थी----- जिन्हें देख कर मैं खुद पर काबू नहीं रख पाती थी------ मैं सुमित से कहती ऐसे मेरी तरफ मत देखा करो ये आंम्खे किसी दिन मेरी जान ले लेंगी-------तो सुमित हँस पडते------- नहीं अनु---ये आँखें तो तुम्हें जीने की शक्ति देंगी------बस इब आंम्खों से बान्ध रखूँगा तुमको-------
आज उन आँखों की एक झलक देखना चाहती थी-------मगर वो आंम्खें तो सुमित दान कर गया था---- सुजान के लिये-------तो क्या सुजान मुझ से भी प्यारा था------ तो क्या मै फिर देख सकूँगी सुमित की आँखें------- आखिरी बार मुझे सुमित का चेहरा भी नहीं दिखाया गया------ पापा के कन्धे से लगी देख रही थी सारा शहर और युनिट के लोग----- सलामी के लिये फौज़ की टुकडी------- युनिट के साथी उस की बहादुरी की गाथा सुना रहे थे ---मुझे कुछ अच्छा नहीं लग रहा था ----- मेरा संसार उजड गया ये बडी बडी बातें मुझे सकून नहीं दे रही थी------पता नहीं क्या क्या हो रहा था------ कुछ याद नहीं मेरे तो दिन रात सूने हो गये थे--------
सुजान को सुमित की आँखे मिल गयी थी------ बहुत रोया था वो----- उसके दुख को कौन जान सकता था----- सब ने कहा कि रोना नहीं ये सुमित की आँखें हैं इन्हें कोई तकलीफ ना हो------- सुजान और उसकी मा हमारे घर मे ही थे----- सुजान ने तो जैसे अपने आप को इस घर के लिये समर्पित सा कर दिआ था दोनो मा बेटा रात को घर जाते थे मम्मी बीमार रहने लगी------ मैने तो अपने को कमरे मे जैसे कैद कर लिया था---- सुजान के मम्मी सरा काम करते वरुण को सम्भालते बाहर का सारा काम धीरे धीरे आँखें ठीक होते ही सुजान ने अपने जिम्मे ले लिया था------- मै बस शाम को कुछ देर उन लहरों को देखने लान मे आती उन से सुमित के बारे मे पूछती------ मगर कहीं से कोई जवाब नहीं मिलता---------वो मेरी हालत से आहत हो कर दरिया मे समा जाती-------
सुजान बहुत कोशिश करता मुझ से बातें करने की-------मेरा मन बहलाने की------ मगर ना जाने क्यों मुझे सुजान की तरफ देखते डर लगता था------ये सुमित की आँखें------- कहीं मुझे-------- नहीं नहीं-------ये सुजान की आँखें हैं------कई बार मन होता कि उन आँखों मे झाँक कर देखूँ---------- मगर हिम्मत नहीं होती------इन आँखों मे तो मैं रहती थी------ ओह सुमित ये क्या कर दिया तुमने/-------
एक वर्ष हो गया था सुमित को गये-------- मम्मी पापा जब मुझे बहलाते तब मै सोचती कि मुझे तो इन का सहारा बनना चाहिये-----सुमित की निशानी--- वरुण की जिम्मेदारी भी मुझे पर है-----कितने सपने थे सुमित के अपने बच्चे को ले कर मुझे जीना होगा----- वरुण के लिये मम्मी पापा के लिये-------
वरुण ढेड साल का हो गया था------ सुजान से काफी हिलमिल गया था पापा ने और सुजान ने मिल कर पैट्रोल पम्प खोल लिया था------ दोनो व्यस्त हो गये थे------सुजान शाम को पापा को घर छोड कर थोडी देर वरुण के साथ खेलता फिर अपने घर चला जाता --- सुबह फिर पापा को लेने आ जाता------ मै और मम्मी सुमित की बातें ले कर बैठ जाती------ पापा चाहते थे कि मैं कहीं नौकरी ज्वाईन कर लूँ---ताकि मेरा ध्यान बँट सके----- मगर सुमित के बिना मुझे कुछ अच्छा नहीं लगता था-------
पिछले दो तीन महीने से देख रही थी कि सुजान मुझ से बार करने की बराबर कोशिश करता-----उस दिन कह रहा था------- अनुजी मुझे जाने क्यों एक अपराधबोध सा रहता है----अप मुझ से बात नहीं करती तो लगता है कि आप मुझ से नाराज़ हैं------- क्या आपको अच्छा नहीं लगा कि सुमित की आँखें मुझे मिल गयी हैं--------
नहीं नहीं ---- ऐसी बात नहीं है-----बस सुमित के बिन कुछ अच्छा नहीं लगता------ आपसे कोई नाराज़गी क्यों होगी------ मै उसे कैसे बताती कि मैं इन आँखों की तरफ नहीं देख सकती------- ये आँखें तो मुझे बेकाबू कर देती हैं-----
मैं समझ सकता हूँ------ मुझे देख कर आपको सुमित की याद आती होगी------
मैं क्या जवाब दूँ------हाँ चोर नज़रों से उन आँखों को देखने की हसरत बनी रहती-------
आज सुमित की बहुत याद आ रही थी------ मम्मी पापा गाँव गये हुये थे-------शाम ढलने लगी थी----- चाय का कप ले कर बालकनी मे आ कर बैठ गयी वरुण सो रहा था-------सूरज की किरणे धीरे धीरे जा रही थी------मगर दो चार किरने अभी भी लहरों के साथ खेल रही थी कितना कठिन होता है बिछुडना------- इन का भी मन लहरों से दूर जाने का नहीं है मगर समय को कौन बान्ध सका है ------ सब चलायमान है -------
अनु देख रही हो ना इन किरणो को मेरा मन भी इन किरणो की तरह तुम से दूर जाने का नहीं होता------- सुमित मेरा हाथ पकड कर अक्सर कहते----
हाँ मै भी तुम्हारे जाने पर उदास हो जाती हूँ----- इन लहरों की तरह------ सुमित हसरत भरी निगाह से देखते और मैं उनकी बाहों मे समा जाती------
अनुजी कहाँ खोई हैं आप----- मैं यहाँ कब से खडा हूँ-----सुजान की आवज़ सुन कर चौँक पडती हूँ ------
ओह तुम आओ बैठो-----मैने कुरसी की तरफ इशारा करते हुये कहा-------सुमित की यादों मे खोई सुजान के आने की आहट सुन ही ना पाई थी-------बैठो मैं पानी लाती हूँ-------मैं उठते हुये बोली-----
पानी नहीं मै आज आपके हाथ की चाय पीना चाहता हूँ------- बहुत दिन से आपके हाथ की बनी चाय नहीं पी---- सुजान ने सीधा मेरी आँखों मे देखते हुये कहा---तो अन्दर से काँप गयी ------ वही चमक थी आँखों मे------ मैं कैसे धोखा खा सकती हूँ -------
अभी बन कर लाती हूँ मुझे तो वहाँ से उठने का बहाना चाहिये था------ मै तो सुजान की आँखों से दूर रहना चाहती थी------- उस के आते ही मै असहज हो उठी थी
नहीं पहले बैठो मै आपसे कुछ बात करना चाहता हूँ------ बैठो-----
मै उठते उठते बैठ गयी------
क्रमश:

19 July, 2009

तुम ज़िन्दा हो------- कहानी

जाने क्यों इस सुरमई शाम का अब भी मुझे इन्तज़ार रहता है--- जब सूर्य देवता दूसरी दुनिया को रोशन करने चल पडते हैं तो इस दुनिया को अलविदा कहती किरणों की विरह से आत्मसात होना एक सकून देता है-------- देखती रहती हूँ तब तक --- जब तक कि आखिरी किरण विदा नहीं ले लेती------- फिर सुबह की पहली किरण का इन्तज़ार ------- तो और भी------ अच्छा लगता------ सतलुज दरिया पर जैसे ही सुबह की पहली किरन अपनी झलक दिखाती-----शांन्त बहते दरिया मे लहरें मचलने लगती------ शोख किरणो की सरगम पर अठखेलियाँ करती लहरों का नृत्य देखते ही बनता था------- सारा दिन किरणो और लहरों की आँख मिचौली चलती रहती------ शाम होते ही लहरें शाँत हो दरिया मे समा जाती------- बिलकुल मेरी तरह-----उदास---जीवन है तो बस जीना है------ सुमित के बिना---- जीवन की उमँग के बिना-------झरों की तो अगली सुबह फिर आयेगी------- कहीँ और--- पर मैं------- बस यादें ही तो रह गयी हैं-------- प्यार और आदर्शों से सनी इस घर की एक एक ईँट ----इस सुर्मई शाम मे उदास हो उठती है-----अब सुमित के ठहाके जो नहीं गूँजते------- जब पूरा परिवार शाम को इस लान मे चाय पीता तो सुमित की हँसी शरारतों से लहरें भी मचलने लगती आसपास के पेद पौधेलहरा कर उसे और बहका देते----- सुमित की आँखों की चमक तब देखते ही बनती थी------ीनहीं आँखों की दिवानी थी मैं--------- एक अजीब कशिश थी उन आँखों मे---
छ्ह वर्ष हुये थे मुझे व्याह कर इस घर मे आये ---- मैं सुमित के साथ इस परिवार को पा कर धन्य हो गयी थी--- इन के पापा एस डी ओ रिटायर हुये थे और मम्मी सुघड गृहणी थी------ एक बहन थी जिसकी शादी हो चुकी थी ----- छोटा सा पढा लिखा परिवार था सुमित डेफेंस मे थे ----- जब हमारी शादी हुई तो सुमित अम्बाला मे थे------ शादी के 6 माह् के अन्दर ही इन्हे परिवार को साथ रखने की स्वीकृती मिल गयी थी------ सुजान इनका बचपन का सब से प्यारा दोस्त था सगे भाईयों से भी बढ कर प्रेम था दोनो मे------- सुजान की पोस्टिँग भी अम्बाला मे इनकी युनिट मे ही थी------ दोनो गाते बहुत अच्छा थे और सारी युनिट के चहेते थे------- संयोगवश दोनो की पोस्टिंम्ग एक साल बाद लखनऊ हो गयी-------- दोनो कैप्टन बन गयी थे------- एक माह बाद सुमित मुझे भी साथ ले गये -----मौज मस्ती मे ढाई साल कैसे गुजर गये पता हे नहीं चला------- घूमना फिरना ----पार्टियाँ क्लब क्या जीवन था सुजान भी अकसर रोज़ आ जाता था--------
शायद हमारी खुशियों को किसी की नज़र लग गयी थी------- सुजान की ट्राँसफर काश्मीर हो गयी------- सुमित कई दिन उदास रहे-------- उसके बिना पार्टियों मे भी इनका दिल ना लगता था------ तीन महीने बाद ही मनहूस खबर आ गयी कि सुजान उग्रवादियों के साथ मुठभेद मे घायल हो गया है--------ये सुन कर सुमित घबरा गये------- मुझे नंगल भेज कर खुद छुट्टी ले कर काश्मीर चले गये--- पूरा एक महीना सुजान के पास रहे----- इस हादसे मे सुजान की आँखें चली गयी थी--- सरी युनिट के लोग ही क्या सरा शह्र उदास था सुमित का और हम सब का बुरा हाल था सुमित अपनी मा का अकेला बेटा था पिता छोटी उम्र मे छोड कर चले गये थे ----- उसकी मा को हम लोग अपने घर ले आये थे------- सुमित तो जैसे सुजान की परछाई बन गये थे इनके चार दोस्तों ने प्रतिग्याली कि अगर किसी हादसे मे इनकी आँखें चली जायें तो मरणोपरान्त उनकी आँखे सुजान को लगा दी जायें------- सुजान तो अभी चाहते थे कि उसकी एक आंम्ख उसे लगा दें मगर किसी ने इस की इज़ाजत ना दी------- इसी दौरान सुमित की गुहार और दोनो की दोस्ती और सुजान की लाचारी को देखते हुये सुमित की ट्रांम्सफर भी काश्मीर मे हो गयी ---कश्मीर फैमिली स्टेशन नहीं था------ वैसे भी मै माँ बनने वाली थी------ इस लिये मुझे घर ही रहना पडा------ मैने चान्द से बेटे को जन्म दिया था------ लेकिन अभी सुजान अस्पताल मे थे इसलिये सुमित आ नहीं सके थे------ तीन माह बाद जब उसको अस्पताल से छुट्टी मिली तब् उसे घर ले कर ही आये ----- सुजान का गाँव भी नंगल से दो कि मी पर था मगर इन्होंने फैसला किया कि सुजान नंगल मे हमारे घर ही रहेगा और उसके मम्मी को भी अपने घर ले आये------ गाँव मे सुजान खुश ना रह सकेगा -----मगर उसके मम्मी ने केवल एक हफ्ता तक उसे यहाँ रखा छुटी खत्म होते ही ये चले गये-- और मुझे और पापा को कह कर गये कि कभी क्भी सुजान को घर ले आया करें------ मुझे कहते----अनु तुम जानती हो सुजान मेरी जान है------- उसे कभी उदास ना होने देना------ मैं जल्दी ही उसकी आँखों का प्रबन्ध करूँगा--------
सुमित चले गये------- सब उदास थे इन दोनो की वजह से------ कश्मीर की सीमा पर भी हालात खराब थे अखबारों से ही कुछ पता चलता था------ किसी को घर मे कुछ बता नहीं सकते थे------- और एक दिन-----क्रमश:

18 July, 2009

अपनी बात

मै जब भी कोई कहानी लिखती हूँ तो अक्सर मुझे मेल आती हैं कि ये कहनी मेरे जीवन से सम्बन्धित तो नहीं मैने आज तक लगभग 70 कहानियाँ लिखी हैं क्या 70 ही मेरी हो सकती हैं तो मैं स्पश्ट करना चाहूँगी कि मैं अधिकतर आत्मकथानक मे कहानी लिखती हूँ वो मेरी कहनी नहीं होती मेरे दुआरा लिखित जरूर होती है क्यों कि मैने अस्पताल जैसे स्थान पर नौकरी की है जहाँ ज़िन्दगी को बहुत ही करीब से देखने का अवसर मिला है और मुझे जिस जीवन मे कुछ लिखने योग्य मिला उस पात्र के बहुत करीब गयी हूँ उसे दिल से महसूस किया और उनकी भावनाओं को कागज़ पर उतारा मात्र है इनमे बहुत से पात्र मेरे दिल के करीब अब भी हैं जानती हूँ उनके दुख सुख बाँटती हूँ जिसमे फिर से एक नयी कहानी मिल जाती है इस लिये जिसके साथ कहानी लिखा हो वो केवल कहानी होती है ----हाँ अपने जीवन से संमबन्धित कुछ प्रसंगों को भी कहानी का रूप दिया है उन्हें भी आपके सामने रखूँगी और जरूर बताऊँगी कि ये मेरी कहानी है
अपने बारे मे --अपनी रचनाओं के बारे मे स्वयं कुछ लिखना कठिन भी है और रोचक भी कारण कि अपनी निन्दा करना खुद को बुरा लगता है और प्रशंसा करना पाठक को------ वास्तव मे अपनी निगाह मे अपने को देखना असम्भव जैसा है क्यों कि हम उसे केवल अपने नज़रिये से देखते हैं लेकिन भावुक और संवेदनशील व्यक्ति स्वयं को अभिव्यक्त किये बगैर रह भी नहीं सकता
साहित्य हृदय की पुकार है--मनुष्य के आन्तरिक मनोभावों का बाह्म चित्रण है --साहित्यकाए समाज के आन्दर निवास करता है और समाज के अन्याय और् प्रिस्थितियों से प्रभावित होता है इस लिये वो समय की धारा और परिवेशगत प्रभावों से अछूता नहीं रहता--कहना ना होगा कि साहित्य का मूल तत्व जीवन हैऔर उसे साकार करने वाली शक्तियाँ प्रिस्थितियों मे होती हैं कोई भी रचना बादल से गिरी हुई बून्द नहीं होती रचना तो हृदय की उर्वर्क भूमि मे ही अँकुरित होती है और बुद्धि इस की परवरिश करती हैमेरा मानना है कि मनुष्य़ अपने सुख दुख से ही प्रभावित नहीं होता दूसरों के दुख सुख भी उसे प्रभावित करते हैंइस निगूढ्रहस्य को हृदयंगम कर कोई भी रचनाकार कल्पना के सहारेअपने भावों को प्रकट कर सकता हैसंवेदना ही इस कल्पना की जननी है लेकिन कल्पना भी एक शक्तिशाली सत्य होती है क्यों की ये मानसिक अनुभूतियों वेदनाओं और रंग विरंगेसामाजिक और परिवेशगत प्रभावों का अद्भुत प्रतिफल है चूँकि मैअपने पारिवारिक और सामाजिक परिवेश एवं उसके प्रभावों की साक्षी रही हूँ जिसे मैने अन्य लोगों के साथ अपनी रचना प्रक्रिया के जरिये बाँटना चाहा है कहानी किसी की भी हो मगर जो बात ज़िन्दगी की रेत पर कई सवाल छोड जाये वो कहानी समाज की कहानी बन जाती है सो मेरी कहानियां समाज की कहानियां हैं मुझे ज़िन्दगी के बारे मे लिखना पढना जानना और चिन्तन करना बहुत अच्छा है

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