24 February, 2009


कुछ दिन के लिये आप सब से क्षमा चाहती हूं
मेरे पती के बडे भाई सहिब की मृ्त्यु हो गयी है
3 दिन से गाँव मे थे आज ही फिर जा रहे हैं अ
एक हफ्ते बाद आप सब से मुलाकात होगी बहुत
mail आ रही हैं मगर मै जवाब नही दे पा रहि
इस लिये क्षमा chahti हूँ इसे अन्यथा ना लें नमस्कार्

20 February, 2009

  1. (कविता)


    सपने सहेजना सNumbered Listपने सजाना
    आ ही गया हमे दिल लगाना
    हकीकत मे खुश है भी कौन
    आता है मुझे कुछ खो कर कुछ्पाना
    रोज़ चली जाती हूँ सपनो के चाँद पर
    वो लायेगा कभी चाँद ये किसने जाना
    सपने सहेजना सपने सजाना-------------
    ज़िंदगी की धूप छाँव को
    कल्पनाओं के पर लगानराकाश छूना
    कभी सागार मे उतर जाना
    सपने सहेजना सपने सजाना-----------
    सपनों की छाँव मे दो पल सकून ले लें
    फिर ज़िन्दगी मिले ये किसने जाना
    हकीकत मे शायद वो कभी मिले य ना मिले
    सपनो मे लगा रहेगा उसका आना जाना
    सपने सहेजना सपने सजाना
    आ ही गया हमे दिल लगाना-

19 February, 2009


(कविता)


कितने लोगे इम्तिहान
ये था मेरा आत्मसम्मान
कि मैं पृ्थ्वि मे
विलीन हो गयी
मेरा त्याग मेरी व्यथा
राम की मर्यादा
मे समो गयी
पर मेरी त्रास्दी
मेरी वेदना है कि
नारी फिर भी
तुलसी दुआरा
ताडिन की
अधिकारी हो गयी
विश को अमृ्त बनाया
यम से पति को बचाया
और जिस पुरुश को
जन्म दिया उसके लिये
मैं भारी हो गयी
और कितने लोगे इम्तिहान्


17 February, 2009



साली


दुल्हे की बेचैनी भाँप कर
बोले एक सज्जन
"दुल्हे राजा पत्नी बैठी बगल में-
फिर क्यों नज़रें इधर उधर"
दुल्हा बोले
"भई पत्नी तो मेरी हो गई
अब कहाँ जायेगी
साली होती आधी घर वाली
वो नज़र कब आयेगी?"
ये सुन सज्जन ने सोचा
दुल्हे को छकाया जाये
इसी की बात पर
इसे उल्लू बनाया जाये
वो कुछ चहके
"देख तुम्हारी जिन्दादिली
अपने कदम भी बहके
ऐसा करो अपनी साली ले लो पूरी
मुझ को दे दो मेरी आधी वाली
जो तेरी बगल मे दुल्हन
है वो है मेरी साली !!


13 February, 2009


वेलेन्टाइन डे पर तो बहुत व्यस्त रहूँगी
इस दिन कुछ् न लिखूं ये कैसे हो सकता है
मै भी तो इन्सान हूँ क्या हुया जो बाल सफेद हो गये हैं!
मगर टी.वी देख देख कर अपना भी दिल मचलने लगा
सोचा कुछ भी हो इस बार जरूर व.डे मनायेंगे
तो देखिये कैसे मनाया
वेलंटाईन डे
वेलंटाईन डे
पर टी.वी चैनल ने
इतना शोर मचाया
कि हमारे दिल मे भी
एक ख्याल आया कि
क्यों ना इस बार पती पर
प्यार का रंग चढाया जाए
और वेलंताइन डे मनाया जाए
सुबह उठते ही किया ऐलान
ए जी!ेआज् आप दफ्तर नहीं जायेंगे
आज हम भी वेलंटाइन डे मनायेंगे
सुन कर पती थोडा चकराय
फिर मुस्कुराये और बोले
"रानी तेरा हुक्म बजाता हूँ
अभी बाजार हो के आता हूँ"
सुन कर हम पर
ऐसा छाया सरूर
कि चेहरे पे आया नूर्
सोचा वो लायेंगे गिफ्ट
और लाल गुलाब जरूर्
मन ही मन झूमने लगे
आँखों मे गिफ्ट
और गुलाब घूमने लगे
एक घंटे बाद
जनाब गुनगुनाते हुयेआये
हाथों मे दो गोभी के फूल उठाये
बोले 'रानी चलो
गोभी के पकौडे बनाओ
और अपना वेलेन्टाइन डे
धूम धाम से मनाओ

ये तो आज के दिन के लिये एक व्यंग था
अब डर सताने लगा कि कविता पढ कर कहीं पतिदेव
नाराज़ ना हो जायें कि हमने उनका भेद खोल दिया
तो उनकी नज़र मे चँद शब्द भी लिख दें
जिन्दगी तेरे नाम हुई
तेरे जलाने से जली है शमा जिन्दगी की
ये जिन्दगी तेरे नाम हुई
सुबह कि आँख खुली तेरे दीदर कि हसरत लिये
तेरी सूरत देखते शाम हूई
निकल आया चाँद उमीदों का
मायूसियों की घटाओं के पीछे से
हो गयी रोशन ये जिन्दगी
जो तेरी नजरें ईनाम् हुई
तेरे प्यार की गहराई को समझा
तो महसुस हुआ
मेरी मंजिल मुझे मिल गयी
मेरी जिन्दगी तुझे अंजाम हुई

11 February, 2009


गज़ल

सितम सहने की आदत डाल ली
कुछ ना कहने की आदत डाल ली

दुनिया आग को हवा देती है
दरिया सी बहने की आदत डाल ली

तकरार से फासले नहीं मिटते
खामोश सहने की आदत डाल ली

ज़िन्दगी की हर डगर पर यारो
चलते रहने की आदत डाल ली

दिल में छुपाये फिरते हैं दर्द हम
पर हंसते रहने की आदत दाल ली

कौन किसी का हमदर्द है जहाँ मे
दिल की दिल से कहने की आदत डाल ली

10 February, 2009


मेरे गीत मेरे सपने मेरे अपने हैं
ना इन की वज़्म पर ऐतराज करो
जिन्दगी को तो मर मर के जिया है
अब कल्पनाओं को तो ना बरबाद करो
अगर दिल में होंगे भी कोई अरमान तो
कब्र तक साथ रहेंगे यकीं मेरे यार करो
मेरे जज़्बातों पर लगे है पहरे दुनिआ के
जो हो नहीं मुमकिन् ना ऐतबार करो
अब तो कल्पनाओं के सिवा जिन्दगी कुछ भी नहीं
ना हो यकीं तो मेरे मरने तक इन्तजार करो
ना बनाओ इन के अफसाने यारो
गर हो सके तो मुझ से इकरार करो

08 February, 2009


मेरे रहनुमां
दुनिअ के तमाम रिश्ते
मेरे लिये गुमनाम बन गये
ये चँद कागज़ के टुकडे
दिल के राज़दान बन गये
जो कह सके ना अपनों से बात
उसकी ये दास्तान बन गये
अब ना किसी दोस्त न हमदम की तमन्ना
ये मेरी तमन्नाओं के चाहवान बन गये
ये चुभायेंगे ना तीर अपनी जफा का ज़िगर में
ये मेरे दर्दे ज़िगर क हम नाम बन गये
चीरते हैं कलम से इनका दिल तो उफ नहीं करते
ये कागज़ मेरे कितने मेहरवान बन गये
आये हैं इनकी बदौलत आपकी महफिल में
शुक्रिया इनका हम इस महफिल के कद्र्दान बन गये !!

07 February, 2009


फिज़ा अब बस करो
क्यों पीट रही हो लकीर
तेरी लुट चुकी है तकदीर
बेकार है हर तदबीर
क्या नहीं देखी थी
अखबार मे वो तस्वीर
जो भेजी थी चँद्र्यान ने
उसने ये भी बताया था
कि चाँद के सीने में
धडकता हुआ दिल नहीं है
वहाँ पथरीली चट्टाने है
और उसकी आँख मे कभी
जो पानी हुआ करता था
वो अब मर चुका है
उसी कि तलाश मे है चन्द्र्यान
उसने ये भी बताया था
चाँद अपनी सीमा के
अभेद्य सन्नाटे मे है
वो तो अपनी बाहरी
चमक दमक से
दुनिया को लुभाता रहा है
कभी मोहन बन कर
कभी मोहम्म्द बन कर
भरमाता रहा है
और उसकी सीमा
इतनी मजबूत है
कि कोई फिज़ा उसे
भेद नहीं सकती
अब सब्र कर
छोड चाँद छुने की जिद
इतना ही काफी है
तेरे लिये कि
तू सबक बन गयी है
लोगों के लिये
अब कभी कोई फिजा
किसी चाँद को पाने
उसकी सीमा पर
जाने से पहले घबरायेगी
चली भी गयी
तो तेरी मौत मर जायेगी

05 February, 2009


बचपन की कोई याद


मखमली खेतों पर
सुसज्जित हिमकिरणों की
अरुणाइ ने फिर
लालसा जगाई है
पावन पवन
निर्मल मधुर
झरनों की कलकल
केसर की भीनी महक
मुझे फिर खींच लायी है
बचपन की कोई याद
आज गाँव की देहरी पर आई है
शरद पूर्णिमा मे
ठिठुरते हंसते होंठ
आँखों की चंचलता पर
पलकों ने रोक लगायी है
मुझे देख तेरेगालों पर
लालिमा सी छाई है
बच्पन की कोई याद आज
गाँव की देहरी पर आई है
कुचालें उन्मुक्त हिरणी जैसी
रिमझिम बूँदों से भीगा
बदन लिये
मेरे सामने आयी है
तेरी काली जुल्फें देख
कली घटा शरमाई है
बच्पन की कोई याद आज
गाँव की देहरी पर आई है
मुझे देख शर्माना
छलावा बन छुप जाना
कभी तिड बगीचे से
आम अम्रुद जामुन खाना
मुझे लग पेड के पीछे से
निकल मेरे सामने आई है
फिर अपनी कल्पना पर
आँख मेरी भर आई है
बच्पन की कोई याद
आज
गाँव की देहरी पर्
आई है
आज
अतीत और वर्तमान में
समन्वय नही बिठा पाऊँगा
एक अभिलाषा एक लालसा
फिर वैसे ही ले जाऊँगा
शायद फिर ना आ पाऊँगा
तुझे क्यों नहीं आज्
याद मेरी आयी ह
जीवन संध्या मे
ये कैसी
रुसवाई ह
वचपन की कोई याद
आज गाँव की देहरी पर आई है !!

03 February, 2009


  • इन्सानियत के किस दौर मे इन्सान है
    आज आदमी से आदमी परेशान है

  • लम्हा लम्हा है बेहाल जिन्दगी
    बन गयी है इक सवाल जिन्दगी
    बेहाल जिन्दगी इक सवाल जिन्दगी

    गरीब का हक हडपती है जिन्दगी
    तंदूर मे सुलगती तड्पती है जिन्दग
    कचरे के ढेर पर तरसती है जिन्दगी
    दरिण्दगी से हुई हैमलाल जिन्दगी
    बेहाल जिन्दगी--
    नोट पर रख के खाते हैं हीरोइन
    वाँदी के गिलास मे परोसते हैं"जिन"
    बिन साँप नही कोई भी आस्तिन्
    ऐश परस्ती बनी है चाल जिन्दगी
    बेहाल जिन्दगी--
    ना संस्कार ही रहे ना दीन और धर्म
    ना रिश्तों की मर्यादा नआँख की शर्म
    प्रधान बनता है जो कर बुरे कर्म
    दौलत की भूख रह गयी खयाल जिन्दगी
    बेहाल जिन्दगी---

01 February, 2009


धर्म करता है
आन्तरिक प्राकृ्ति
मानवता गुण सचेत
शिव और मानव्
हो जाता है एक
साम्प्रदाय करता ह
बाह्म अमानवता गुण
सचेत
शिव और आत्मा
हो जाते हैँ अचेत
और्
ब्राह्मन्ड
एक से अनेक् !!

31 January, 2009


रिश्ते


ये रिश्ते
अजीब रिश्ते
कभी आग
तो कभी
ठंडी बर्फ्
नहीं रह्ते
एक से सदा
बदलते हैं ऐसे
जैसे मौसम के पहर
उगते हैं
सुहाने लगते हैं
वैसाख के सूरज् की
लौ फूट्ने से
पहले पहर जैसे
बढते हैं
भागते हैं
जेठ आशाढ की
चिलचिलाती धूप की
साँसों जैसे
फिर
पड जाती हैं दरारें
मेघों जैसे
कडकते बरसते
और बह जाते हैं
बरसाती नदी नालों जैसे
रह जाती हैं बस यादें
पौष माघ की सर्द रातों मे
दुबकी सी सिकुडी सी
मिटी कि पर्त् जैसी
चलता रहता है
रिश्तों का ये सफर् !!


29 January, 2009


वक्त रुक गया है ये किस मुकाम पे
जिन्दगी घिर गयी है किस तुफान से

देख सलीका अपनों का खामोश हो गये
संभलने की सोची तो गुम होश हो गये
विश्वास उठ गया है धरमो-ईमान से
जिन्दगी घिर गयी है------------------------------
ना देते जख्म तो ना चाहे बात पूछते
ना लेते खबर मेरी न जज़बात पूछ्ते
हम भी न गुजरते इस इम्तिहान से
जिन्दगी घिर गयी-----------------------------------
ना था गुमा कि दिल को यूँ लगेगी चोट
अपनों के मन मे भी आ जायेगा यूँ खोट
दँग रह गये हैँ हम रिश्तों के इनाम से
जिन्दगी घिर गयी है -------------------------------

23 January, 2009

जिन्दगी कतरा कतरा
दूर जाना चाहती हूँ
तुम्हारे मोहपाश से
जब भौ करती हूँ प्रयास
आता है एक हवा का झोंका
तुम्हारे जिस्म को छू कर
लिपट जाता है मेरे तन से
और खीँच लाता है मुझे
तुम्हारे और करीब
जब कभी इन दिवारों मे
घुट्ने लगता है दम
मेरी अपनी साँसें
बार बार टकराती हैं मुझसे
ऊब जाती हूँ जीवन से
तभी आता है हवा का एक झोंका
तुम्हारी साँसों की खुश्बू लिये
महक जाता है तन मन
और आ जाती हूँ
तुम्हारे और करीब
कभी जीवन का बोझ
कर देता है उदास्
दिखने लगती है आँखों मे
टूटे सपनों की परछाईयाँ
फिर आता है एक हवा का झोंका
तुम से बिछुड जाने का दर्द समेटे
और कर जाता है आँखों को नम्
बहने लगता है मेरे सामने
मेरी मजबूरियों का दरिया
इन लहरों की छिटकन में
बह रही है
जिन्दगी कतरा कतरा


21 January, 2009


थोडी सी मुस्कान चाहिये
चंद साँसें आसान चाहिये
नहीं और् कोइ भी चाहत
बस रोटी वस्त्र् मकान चाहिये
बन सकता है देश स्वर्ग
शासकों मे ईमान चाहिये
नेताओं की इस् भीड् मे
कोई तो इन्सान चाहिय
जो दे गरीब को रोटी
शासक वो भगवान चाहिये
हर ओर खुशी का आलम हो
हर घर में धन धान चाहिये
विश्व गुरु कहलाये भारत
और नहीं वरदान चाहिये
जिसे सोने की चिडिया कहते थे
फिर वैसा हिन्दोस्तान चाहिये !!

20 January, 2009

(व्यंग)

इक दिन आधी रात को
जब लोग सो रहे थे
तो हमारे पडोसी रो रहे थे
हमारी पडोसन ने हमे आ जगाया था
हमने समाज सेवा का बीडा जो उठाया था
जाके देखा उनका बच्चा दर्द से रो रहा था
पती चद्दर तान के सो रहा था
हमे तरस आयासे
बच्चे को उठा अस्पताल पहुँचाया
बच्चा ठीक हुआ तो सब को चैन आया
सहेली ने पती को उठाते हुऎ
हमारी सेवा का ऎहसास कराया
ये सुन पति उबासी लेते हुये बोले
"माफ करना बहिनजी
आपको तकलीफ हुई कष्ट उठाना पडा
हमने पिछले जनम आपकी जो सेव की थी
उसका बदला इस तरह आधी रात को चुकाना पडा
तब पता चलाकि हम समाज सेवा से
लोगोंका कुछ नहीं संवर रहे हैं
हम तो बस पिछले जनम के
कर्ज ही उतार रहे हैं

19 January, 2009



जब उनके जीने का हम मकसद हुआ करते थे
हर खुशी के मेरे दर पे दस्तक हुआ करते थे
लोग देते थे मिसाल हमारी दोस्ती की अक्सर
हमारी दोस्ती लोगों के सबक हुआ करते थे
पीने का कोइ ना कोइ सबब आ ही जाता था
जब सीधे मयखानेमे हमकदम हुआ करते थे
कितनी सहज हो जाती थी राहें अपनी
उनकी उल्झन का हम हल हुआ करते थे
वो दिन भी क्या दिन थे बहारें ही बहारें थी
उनके साथ गली कूचे गुलशन हुआ करते थे
फिर उन वफाओं को किस की नजर लग गयी
क्यों दुश्मन बन गये जो दोस्त हुआ करते थे
मुझे सामने देख कर भी अजनबी बने रहते हैं
जो लाखों मे मुझ से हमनजर हुआ करते थे
इन बादलों के बरसने अर भी नजर नहींेआते
जो बहक जते थे जैसे बादल हुआ करते थे
पाक दोस्ती का तकाज़ा है वो आयेंगे कभी जरूर
अभी सितारे गर्दिश मे हैं जो रहमते नजर हुआ करते थे !!

17 January, 2009


आज महफिल में सुनने सुनाने आयेंगे लोग
समाज के चेहरे से नकाब ऊठाने आएंगे लोग
बीते जमाने के सब लगते हैं अफसाने
नये जमाने की हकीकत बताने आयेंगे लोग
किसी की मौत पे रोना गुजरे दिनों की बात है
अब दिखावे को मातम मनाने आयेंगे लोग
घर की आग से धुआं उठने ना देना कभी
नहींतो आग को हवा दिखाने आयेंगे लोग
डर के भागना बुजदिली है दोस्तो
जितना डरोगे उतना डराने आयेंगे लोग
सच बोलना है तो हिम्मत से काम लेना
जख्मी सांप की तरह बल दिखाने आयेंगे लोग
कौन किसी की आंख से आंसू पोंछना चाहे
किसी का दुख देख अपना दिल परचाने आयेंगे लोग
दोस्ती के नकाब में छुपे हैं आज दुश्मन
पहले जख्म देंगे फिर सहलाने आयंगे लोग
जिन नेताओं को देते हैं गालियां
अन के बुत पर फूल चढाने आयेंगे लोग
जीते जी मां-बाप को रूखी रोटी न दें
पुर्खों के नाम पे पंडितों को खीर खिलाने आएंगे लोग् !!



सरहद पर दुश्मन फुंकार रहा है
भारत को ललकार रहा है
सत्य अहिंसा माने ना वो
मानवता को जाने ना वो
अमरीका की खैरात पे जीना
फिर बेशर्मि से ताने सीना
बच्चे बूढे जवान उठो
झाँसी की संतान उठो
कह गये अपने बडे सयाने
लातों के भूत बातोंसे ना माने
जब गीदड भागे शेर की ओर
कौआ चले हंस की तोर
अंत समय आया समझो
करनी का फल पाया सम्झो
उसे दूध छठी का याद दिलाओ
उसको उसकी औकात बताओ
कर दो उसका बंटाधार
विपद पडे ना बारम्बार
माँ के दूध का कर्ज चुकाओ
अपना दम खम उसे दिखाओ
युवाशक्तिपुंज तुम से है आशा
पूर्ण करो भारत माँ की अभिलाषा
पाक पर तिरंगा फहरा दो तुम
फिर् इक इतिहास बना दो तुम् !!


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