15 August, 2015

कविता

बहिनो भाईओ सब से पहले सब को स्वतन्त्रता दिवस की हार्दिक शुभ्कामनायें1
उसके बाद  सब के भाजी स बी एस पावला जी का धन्यवाद जिन्हों ने मेरी समस्या का समाधान किया 1पूरी कहानी तो वही बता सकते हैं लेकिन मुझे इतना पता है कि वो शरारत किसने की नाम बताने की मजबूरी ये है कि वहां कुछ अच्छे लोग भी हैं जिनकी वजह से इस बार मै चुप कर गयी वो ये मत सोचें कि आगे से भी चुप रहूंगी1 सरकारें आती जाती रहती हैं  ये भी याद रखें 1किसी ने उसमे एक स्म्रिती इरानी की वीडिओ के साथ जगल नेट वर्क नाम से  कुछ डाउन्लोद कर दिया था1 इस कम्प्यूटर को मै या मेरे बच्चे ही चलाते हैं बच्चे तो आये नही और मै ऎसी चीज़ें डाउन लोड करती नही इस लिये उस शक्स का पता चल गया1लानत है ऎसे लोगों पर, जिनके मन मे इतनी बेईमानी है और जिसके कहने पर ये घ्रिणित काम किया गया उसे भी लानत है1 आज आज़ादी मनाने का दिन कैसे कहूँ कलम की आज़ादी ही छिनती जा रही है1 चलिये एक कविता जो 2006 मे छपी मेरी पुअस्तक से है -------

यथा राजा तथा प्रजा
 
जब समुदाय ,कुल और देश के प्रधान
अधर्म को देंगे अधिमान
 कर आदर्शों का परित्याग
प्रजा पर करेंगे अत्याचार
जब काम क्रोध मोह बढ जायेंगे
तो सत्युग त्र्ता दुआपर से
कलयुग ही आयेंगे
तब
प्रक्रितिक प्रकोप बढ जायेंगे
इन्द्र अग्नि वायू का प्रकोप
माहाप्रलय ही लायेगा
जो सारी मानवता को बहा ले जायेगा

जब जुल्मों की हवाय्रं
तूफां बन जाएंगी
प्रेम प्यार मानवता की
किश्तियां  डूब जायेंगी
धरा हिचकोले खायेगी
भुकम्प की त्रास्दी आयेगी
ऋतु विकार तांडव दिखायेगा
कण कन शोर मचायेगा

यथा राजा तथा प्रजा
नही कहा किसी ने बेवजह
अभी वक्त रहते इसको जान लो
खुद गर्ज़ी के लिये
न मानवता के प्राण लो

अधर्म का कर परित्याग
मानवता और जनपद से कर सद्व्यवहार
तो प्रक्रिति
तुझ पर रहम खायेगी
नही तो  सच मान
कि अब  जल्दी
महा प्रलय ही आयेगी

14 August, 2015

कविता -----ज़िन्दगी

बहुत दिनो बाद आना हुया1 मेरी रूह का शहर कितना सुनसान  पडा है! असल मे जब से इसका टेमलेट बदल गया है तब से यहाण आना अच्छा नही लगता सजावट न हो तोक्या करें इतनी लायक नही हूँ कि खुद इसका टेम्लेट बदल लूँ दूसरी जब पिछली बार खुद कोशिश की तो ब्लाग लिस्ट उड गयी1 उसके बिना भी मुश्किल लगता है1 दूसरा अधिक देर बैठने की समस्या1 देखती हूँ कैसे निपट पाती हूँ इन समस्याओं से1 लीजिये मेरी सब से पहली रछना जो इस ब्लाग पर पोस्ट की थी 1


कविता (जिन्दगी)
खिलते फूल सी मुसकान है जिन्दगी
समझो तो बडी आसान है जिन्दगी
खुशी से जियें तो सदा बहार है जिन्दगी
दुख मे तलवार की धार है जिन्दगी
पतझर बसन्तो का सिलसिला है जिन्दगी
कभी इनायतें  तो कभी गिला है जिन्दगी
कभी हसीना की चाल सी मटकती है जिन्दगी
कभी सूखे पते सी भट्कती है जिन्दगी
आगे बढने वालों के लिये पैगाम है जिन्दगी
भटकने वालों की मयखाने मे गुमनाम है जिन्दगी
निराशा मे जी का जन्जाल है जिन्दगी
आशा मे सन्गीत सी सुरताल है
कहीं मखमली बिस्तर पर सोती है जिन्दगी
कभी फुटपाथ पर पडी रोती है जिन्दगी
कभी होती थी दिल्बरे यार जिन्दगी
आज चौराहे पे खडी है शरमसार जिन्दगी
सदिओं से मा के दूध की पह्चान है जिन्दगी
उसी औरत की अस्मत पर बेईमान है जिन्दगी
वरदानो मे दाऩ क्षमादान है जिन्दगी
बदले की आग मे शमशान है जिन्दगी
खुशी से जीओ चन्द दिन की मेहमान है जिन्दगी
इबादत करो इसकी भगवान है जिन्दगी

05 May, 2015

rishte--- कविता



ये रिश्ते
अजीब रिश्ते
कभी आग
तो कभी
ठंडी बर्फ्
नहीं रह्ते
एक से सदा
बदलते हैं ऐसे
जैसे मौसम के पहर
उगते हैं
सुहाने लगते हैं
वैसाख के सूरज् की
लौ फूट्ने से
पहले पहर जैसे
बढते हैं
भागते हैं
जेठ आशाढ की
चिलचिलाती धूप की
साँसों जैसे
फिर
पड जाती हैं दरारें
मेघों जैसे
कडकते बरसते
और बह जाते हैं
बरसाती नदी नालों जैसे
रह जाती हैं बस यादें
पौष माघ की सर्द रातों मे
दुबकी सी सिकुडी सी
मिटी कि पर्त् जैसी
चलता रहता है
रिश्तों का ये सफर् !!

15 April, 2015

गज़ल्



दर्द के कुछ कौर खा कर भूख मिटा लेते रहे हैं
प्यास अपनी आंसुओं से ही बुझा लेते रहे हैं

इस जमाने ने दिया क्या है सिवा बस ठोकरों के
बिन ठिकाने ज़िन्दगी फिर भी बिता लेते रहे हैं

आसमा है छत जमीं बिस्तर नसीबों मे हमारे
पी गमों के जाम हम तो लडखडा लेते रहे हैं

वो हिसाब किताब क्यों  पूछे  मुहब्बत मे बताओ ?
लोग तो इस इश्क मे जां तक लुटा लेते रहे हैं

कौन कहता है जमाना लडकिओं का आ गया है
लोग बहुओं को अभी तक भी जला लेते रहे हैं

रात तन्हा दिल उदासी  से भरा सा हो कभी तो
बंद पलकों मे कई सपने बिठा  लेते रहे हैं

यूं तमन्ना तो बहुत है हर खुशी हम्को मिले पर
जो मिला आंखों पे उसको ही बिठा लेते रहे हैं

29 August, 2014

दोहे

चलिये आज कुछ पुराने दोहे लिख कर काम चला लेते हैं

कौन  बिछाये बाजरा कौन चुगाये चोग
देख परिन्दा उड गया खुदगर्जी से लोग

इधर भिखारी भूख मे उधर बुतों पर भोग
कैसी है ये आस्था   भूले रस्ता लोग

सबकी करनी देख कर लिखता वो तकदीर
बिना बनाये मांगता क्यों कर मीठी खीर

लुप्त हुई खग जातियां छोड गयी कुछ देश
कहां बनायें घोंसले  पेड रहे ना  शेष

23 August, 2014

दिव्य अनुभूति-- कविता

दिव्य अनुभूति

 ये कैसी है अनुभूति
 कैसा है अनुराग
 मेरे अंतस मे
 तेरे सौरभ की
 रजत किरणों का आभास
 मुझे लिये जाता है
 अनन्त आकाश की ओर
 जहां मै तू है
 और तू मै हू
 सब एक हो जाता है
हां यही है दिव्य अनुभूती
 दिव्य अनुराग
 तेरे सौरभ की
 रजत किरणों का आभास

29 July, 2014

चेकिन्ग प्लीज़
 मेरे ब्लोग पर मेरि पोस्ट दिखाई नही दे रही, क्या कोई मेरि सहायता करेगा? ब्लोग एग्रिगेटर पर भी दिखाई   नही दे रही शायद मै ही सब कुछ  भूल गयी हूँ. ये पोस्ट् केवल चेक करने के लिये लिख रही हूं.

13 July, 2014

गजल 

प्यार मे फकीर हूँ
वक्त की जंजीर हूँ

आत्मा तो मर गयी
सिर्फ इक शरीर हूँ

वश नहीं चला कहीं
हाथ की लकीर हूं

मांगता उधार जब
मारता जमीर हूँ

चार शब्द लिख लिये
सोचता  कबीर हूँ

कुछ पता नहीं कि क्यों
 आज मै अधीर हूँ

हूँ तो मै गरीब ही
दिल का पर अमीर हूँ

23 July, 2012

गज़ल

आजकल जी. मेल मे पता नही क्या प्राबलम आ गयी है। सिर्फ 4-5 मेल ही दिखाता है । कर्सर आगे जाता ही नही न ही मेल भेजी जा रही है। एक साइबर कैफे वाले से पूछा वो कहता है कि पीछे से ही ये प्राबलम ुसके कैफे मे भी नही खुल रही जी मेल्\ मैने अपनी बेटी को दिल्ली मे अपनी मेल खोलने को कहा तो वहाँ खुल गयी। जो लोग मेल भेज रहे हैं उनसे क्षमा चाहती हूँ। अभी कहते हैं कि एक हफ्ता लगेगा इसे सही होने मे । क्या कोई बता सकता है कि और किसी के साथ भी ऐसे हो रहा है? तो चलिये इसी बहाने एक गज़ल हो जाये-=--
गज़ल

आज तक उसने मुझे अपने ख्यालों मे रखा है
हाशिये पर हूँ. बडे मुश्किल सवालों मे रखा है

मर नही सकती मुहब्बत हीर राझें की कभी भी
पाक वो जज़्बा मुहब्बत की मशालों मे रखा है

टूट जायेगा मनोबल गर निराशा यूँ रही तो
आस के कुछ जुग्नुओं को दिल के आलों मे रखा है

आ रही खुश्बू कहीं चम्पा चटक कर हो खिली ज्यों
गुलबदन ने फूल कोई टांक बालों मे रखा है

ज़िन्दगानी के अंधेरों से गिला शिकवा न कर के
हौसले से हर क़दम अपना उजालों मे रखा है

आस्था मे आदमी क्या क्या नही करता है देखो
पूजने के वास्ते पत्थर शिवालों मे रखा है

ज़िन्दगी की अड़चनों ने तोड दी हिम्मत हमारी
बांध कर तकदीर ने अपनी कुचालों मे रखा है

14 May, 2012

गज़ल

गज़ल 
हाज़िर जी कह कर फिर गैर हाज़िर हो गयी जिसके लिये क्षमा चाहती हूँ । आप सब की दया से अब ठीक हूँ।एक आध घंटा रोज़ बैठने की कोशिश करूँगी। बहुत समय से कुछ लिखा भी नही है लगता है जैसे कुछ लिख ही नही पाऊँगी। एक हल्की सी गज़ल प्रस्तुत कर रही हूँ। --- हाँ कोई अगर बता सके तो बहुत आभारी हूँगी कि मेरे ब्लाग पर पोस्ट का कलर अपने आप बदल जाता है कमेन्त्स आदि का भी रंग बदल जाता है टेम्प्लेट भी बदला लेकिन अभी भी वही हाल है क्या कोई मेरी मदद कर सकता है?
गज़ल
 आज रिश्‍ते कर गये फिर से किनारा
 और कितना इम्तिहां होगा हमारा


ज़ख्‍़म उसने ही हमें बेशक दिये पर
आह जब निकली उसे ही फिर पुकारा

हम झुके दुनिया ने जितना भी झुकाया )
जान कर लोगों से सच खुद को सुधारा

कौन पोंछेगा ये आंसू बिन तुम्‍हारे
है घड़ी दुख की तुम्‍हीं कुछ दो सहारा )


दांव पर लगता रहा जीवन सदा ही )
मौत से जीता मगर तुमसे ही हारा )

मोह ममता के परिंदे उड़ गये सब )
किस तरह मां बाप का होगा गुज़ारा )

चल पड़ा है खुद अंधेरा सुब्‍ह लाने
दुख में समझो है ये कुदरत का इशारा

हाथ से अपने सजा दूं आज तुमको
 लाके बिंदिया पर लगा दूं कोई तारा

चांदनी से जिस्‍म पर ये श्‍वेत चूनर
ज्‍यों किसी ने चांद धरती पर उतारा

25 October, 2011

हाज़िर जी

 बहुत दिन से अस्वस्थ रहने के कारण ब्लाग जगत से दूर रही। लेकिन ध्यान हर वक्त ब्लाग जगत मे ही रहा। 
आप सब की दुआ मेरे साथ थी, कितने लोगों के मेल और टेलिफोन आये सच कहूँ तो जब भी किसी का फोन आता तो आँखें नम हो जाती। सेहत की चिन्ता और चल फिर न पाने की वजह से शायद दिमाग मे कोई शब्द भी नही आता कि कुछ लिख सकूँ। बस समझ लीजिये कि आराम करते करते आलसी भी हो गयी हूँ लेकिन बैठे बैठे नाती नातिनों के स्वेटर खूब बना लिये, जिसमे कि मै खुद को बहुत माहिर समझती हूँ लेकिन कई सालों से अपनी इस कला को भुला दिया था।मै उन सब की बहुत बहुत आभारी हूँ जिनके मुझे फोन आये और जिन्हों ने मेरे बारे मे जानने के लिये पोस्ट तक लिखीं मेल किये, और मुझे नई ऊर्जा प्रदान की। विशेश रूप से सलिल वर्मा जी,इनके सात मेल मैने सहेज रखे हैं, भाई हो तो ऐसा हो, डा. दराल जिन्हों ने मुझे मेडिकल एडवाइज़ भी दी, खुशदीप सहगल और उनकी पत्नि यानि कि मेरी बहु, उसकी तो विशेष रूप से आभारी हूँ, स्मार्ट इन्डियन यानी अनुराग शर्मा जी संगीता पुरी जी, समीर लाल [उडन तश्तरी जी} सुरिन्दर मुहलिद, सेहर बेटी, सुबीर जी प्राण शर्मा जी,साधना वैद दिव्या, वाणी जी को भी जब पता चला तो मेरे लिये चिन्त व्यक्त की। कुछ नाम भूल भी गयी हूँ, शायद परेशानी मे यादाश्त भी कम हो गयी है। भेजी}उन सब से क्षमा चाहती हूँ। पूरे ब्लागजगत  की आभारी हूँ जिनके प्रेम और प्रेरणा ने मुझे फिर से सक्रिय होने के लिये उत्साहित किया। अभी भी बहुत देर तक बैठने के लिये मनाही है। अगर रोज़ सब के ब्लाग पर न भी आ सकी तो माफी चाहूँगी और आशा करती हूँ फिर से पहले की तरह आप सब के बीच होऊँगी।धन्यवाद।
दीपावली की आप सब को हार्दिक शुभकामनायें।

25 July, 2011

गज़ल


गज़ल

 कुछ पा लिया कुछ खो लिया
 फिर बेतहाशा रो लिया
आंखों से जब आंसू गिरे
तो ज़ख्म दिल का धो लिया

फिर भी हुयी मुश्किल अगर
आँचल मे माँ की सो लिया

दुश्वारियों का बोझ भी
 जैसे हुया बस ढो लिया

जिसने बुलाया प्यार से
 मै तो उसी का हो लिया

बेकार कर दी ज़िन्दगी
बस खा लिया और सो लिया


करते मुहब्बत सब  मुझे
जो प्यार बाँटा वो लिया

27 June, 2011

गज़ल


गज़ल
ये गज़ल --http://subeerin.blogspot.com/{ गज़ल गुरुकुल} के मुशायरे मे शामिल की गयी थी\ गुरूकुल की छात्रा न होते हुये भी मुझे सुबीर जी जो सम्मान देते हैं और मुझे इन मुशायरों मे शामिल करते हैं उसके लिये उनकी हृदय से आभारी हूँ।उनके ब्लाग गज़ल का सफर से ही गज़लों की तकनीकी जानकारी मिली है। पहले तो बस तुकबन्दी कर लेती थी। जो साहित्य की निश्काम सेवा वो कर रहे हैं उसके लिये गज़ल के इतिहास मे ही नही बल्कि कहानी उपन्यास और कविता के इतिहास मे भी उनका नाम अग्रनी होगा।एक बार फिर से तहे दिल से उनका शुक्रिया करती हूँ। हाँ इस गज़ल के आखिरी 4  शेर अपनी  मर्जी से पोस्ट करने की हिमाकत कर रही हूँ। क्षमा चाहती हूँ।

डर सा इक  दिल मे उठाती गर्मिओं की ये दुपहरी  ====
घोर सन्नाटे मे डूबी गर्मियों की ये दुपहरी


चिलचिलाती धूप सी रिश्तों मैं भी कुछ तल्खियाँ हैं  =====
आ के  तन्हाई बढाती गर्मिओं की ये दुपहरी


हाँ वही मजदूर जो डामर बिछाता है सडक पर   ======
मुश्किलें उसकी बढाती गर्मिओं की ये दुपहरी


है बहुत मुश्किल बनाना दाल रोटी गर्मिओं मे=======
 औरतों पर ज़ुल्म ढाती गर्मिओं की ये दुपहरी


आग का तांडव  कहीँ  और हैं कहीं उठते बवंडर,   ======
यूँ लगे सब से हो रूठी गर्मिओं की ये दुपहरी


तैरना तालाब मे कैसे घडे पर पार जाना  =====
याद बचपन की दिलाती गर्मियों की ये दुपहरी


रात तन्हा थी मगर कुछ ख्वाब तेरे आ गये थे
पर भला कैसे कटेगी गर्मियों की ये दुपहरी  +=====


बर्फ मे शहतूत रख,तरबूज खरबूजे खुमानी
मौसमी सौगात लाती गर्मियों की ये दुपहरी


चमचमाते रंग  लिये चमका तपाशूँ  आस्माँ पर
 धूप की माला पिरोती गर्मिओं की ये दुपहरी


दिल पे लिखती नाम  तेरा ज़िन्दगी की धूप जब 
ज़ख्म दिल के है तपाती गर्मिओं की ये दुपहरी


जब से  छत पर काग बोले आयेगा परदेश से वो
तब शज़र सी छाँव देती गर्मिओं की ये दुपहरी


याचना करती सी आँखें प्यार के लम्हें बुलाती
बिघ्न आ कर डाल जाती गर्मिओं की ये दुपहरी






17 June, 2011

गज़ल

गज़ल

जुलाई 2010 मे इस गज़ल पर  कदम दर कदम------  http://kadamdarkadam.blogspot.com/ { तिलक भाई साहिब }के ब्लाग पर विमर्श हुआ था। जिस से ये गज़ल निकल कर सामने आयी थी। ये तिलक भाई साहिब को ही समर्पित हैीआजकल लिखने पढने का सिलसिला तो खत्म सा ही है । देखती हूँ कब तक/ जीने के लिये कुछ तो करना ही पडेगा फिर कलम के सिवा अच्छा दोस्त कौन हो सकता है?चलिये दुआ कीजिये कि कलम रुके नही।

दर्द आँखों से बहाने निकले
गम उसे अपने सुनाने निकले।

रंज़ में हम से हुआ है ये भी
आशियां अपना जलाने निकले।

गर्दिशें सब भूल भी जाऊँ पर
रोज रोने के बहाने निकले।

आग पहले खुद लगायी जिसने
जो जलाया फिर , बुझाने निकले।

आज दुनिया पर भरोसा कैसा?
उनसे जो  शर्तें  लगाने निकले।

प्‍यार क्‍या है नहीं जाना लेकिन
सारी दुनिया को बताने निकले।

खुद तो  रिश्‍ता ना निभाया कोई
याद औरों को दिलाने निकले!

झूम कर निकले घटा के टुकडे
ज्‍यूँ धरा कोई सजाने निकले।

सब के अपने दर्द दुख कितने हैं?
आप दुख  किसको सुनाने निकले।

07 June, 2011

गज़ल
आज फिर से ब्लाग पर आते हुये खुशी सी महसूस हो रही है\ मै तो उमीद छोड बैठी थी कि अब शायद ऊँगली काटनी ही पडेगी । लेकिन एक दिन श्रीमति संगीता पुरी जी , [गत्यात्मक ज्योतिश वाले ]से अपनी तकलीफ कही तो उन्होंने आश्वासन दिया कि ऐसा गम्भीर कुछ नही है आप जल्दी ठीक हो जायेंगी । उनके आश्वासन से मै फिर से डाक्तर के पास जाने से रुक गयी और एक देसी इलाज शुरू किया, डरी इस लिये भी थी कि पहले एक   अंगूठे मे इसी प्राब्लम के चलते उसका टेंडर कटवाना पडा था।उस देसी दवा से ही ठीक हुयी हूँ लेकिन कुछ दिन स्प्लिन्ट जरूर बान्धना पडा। बेशक ज्योतिश आपकी समस्या हल नही कर देता लेकिन कई बार ऐसे आश्वासन से आशा सी बन जाती है और आशा ही जीवन है। इतने दिनो पढा सब को लेकिन कुछ कह नही पाई लिख नही पाई। अब भी अधिक देर लिखने से अँगुली दुखने लगती है लेकिन ये भी ठीक हो जायेगी कुछ दिन मे । तो चलिये आज एक गज़ल पढिये----



1 गज़ल
न वो इकरार करता है न तो इन्कार करता है
मुझे कैसे यकीं आये, वो मुझसे प्‍यार करता है)

फ़लक पे झूम जाती हैं घटाएं भी मुहब्‍बत से
मुहब्‍बत का वो मुझसे जब कभी इज़हार करता है

मिठास उसकी ज़ुबां में अब तलक देखी नहीं मैंने
वो जब मिलता है तो शब्‍दों की बस बौछार करता है

खलायें रोज  देती हैं  सदा बीते  हुये  कल को
यही माज़ी तो बस दिल पर हमेशा वार करता है

उड़ाये ख्‍़वाब सारे बाप के बेटे ने एबों में
नहीं जो बाप कर पाया वो बरखुरदार करता है

नहीं क्‍यों सीखता कुछ तजरुबों से अपने ये इन्‍सां
जो पहले कर चुका वो गल्तियां हर बार करता है

उसी परमात्‍मा ने तो रचा ये खेल सारा है
वही धरती की हर इक शै: का खुद सिंगार करता है

अभी तक जान पाया कौन है उसकी रज़ा का सच
नहीं इन्‍सान करता कुछ भी, सब करतार करता है

कहां है खो गई संवेदना, क्‍यों बढ़ गया लालच
मिलावट के बिना कोई नही व्यापार करता है

बडे बूढ़े अकेले हो गये हैं किस क़दर निर्मल
नहीं परवाह कुछ भी उनका ही परिवार करता है )

11 May, 2011

टिप्पणी व्यथा{ क्या व्यर्थ जा रहे हैं तारीफ मे लिखे कमेंन्ट}

इस से पहली पोस्ट मे मैने  ज़ाकिर अली रजनीश जी का टिप्पणियों के बारे मे आलेख  पोस्ट किया था और सब  के कमेन्ट पढ कर iइस नतीजे पर पहुँची कि एक तो सब ने एक स्वर मे कहा कि टिप्पणियाँ तो होनी चाहिये ।इससे लेखन क्षमता बढती है और उत्साह मिलता है। कुछ ने कहा कि अलोचना भी होनी चाहिये--- गलत को गलत और सही को सही। बात सही है लेकिन क्या हम समीक्षक हैं ---क्या क्या हम मे खुद मे इतनी प्रतिभा है कि हम उसकी गलतियाँ निकाल सकें? ये काम समीक्षकों का या आलोचकों का है। दूसरा अगर बहुत लोगों के ब्लाग पर जाना है तो संक्षिप्त टिप्पणी ही का जा सकती है। अब अपना पक्ष रखना चाहती हूँ
 मैने जब अपनी पहली पोस्ट लिखी थी तो उसमे कई गलतियाँ थी। आज जब वो पोस्ट पढ्ती हूँ तो खुद पर शर्म सी महसूस होती है जब्कि सभी ने प्रशंसात्मक टिप्पणियाँ ही दी थी। सब से पहली टिप्पणी श्री गिरिजेश राव जी ने की थी और मेरा उत्साह वर्द्धन किया था। उसके बाद नीरज जी प्रकाश सिंह अर्श डा. अनुराग अदि कई  टिप्पणियाँ आयी तो मेरी खुशी का ठिकाना नही रहा। फिर धीरे धीरे सब के ब्लाग पर जाना शुरू किया तोसब की टिप्पणियाँ प्रशंसा भरी ही होती{ लगभग}  ऐसा नही है कि मै किसी की पोस्ट बिना पढे टिप्पणी देती हूँ। अगर मुझे कुछ लगे तो बजाये ब्लाग पर टिप्पणी देने के उसे मेल कर देती हूँ ताकि वो निरुत्साहित न हो। दिव्या जी ने सही कहा कई लोग केवल अपनी भडास निकालने के लिये या खुद को सर्वश्रेष्ट दिखाने के लिये बिना बजह बहस करने लगते हैं  इसका कटु अनुभव हो चुका है। लेकिन कुछ ऐसे उदार लोग भी हैं जो मेल दुआरा अपनी बात या विरोध करते हैं।
 ब्लाग पढना भी मै जरूरी समझती हूँ क्यों कि इसी ब्लाग जग्त से मैने बहुत कुछ सीखा है। जब पढ ही लिया तो कमेन्ट देने मे क्या हर्ज़ है?ये भी जरूरी नही कि सब लोग टिप्पणियाँ जरूर करें।क्यों कि सब के पास इतना समय भी नही होता। लेकिन कुछ लोग खुद को वरिष्ट या श्रेष्ठ समझ कर ही टिप्पणी नही करते जब कि  इनका मार्ग दर्शन नये लेखकों के लिये बहुत जरूरी व उत्साहवर्द्धक होता है। एक बात ये भी है कि कुछ लोग अच्छे साहित्यकार हैं अच्छे ब्लागर हैं जो श्रम पूर्वक साहित्य साधना मे लगे हुये हैं उनके पास समय नही होता ब्लाग पढने का} लेकिन वो अपने मार्ग दर्शन से बहुत से नये साहित्यकारों को जन्म दे रहे हैं ऐसे लोगों के आगे नतमस्तक हूँ।  इसके लिये एक उदाहरण दूँगी-------
 सुबीर संवाद सेवा एक ऐसा ब्लाग है जिसके स्वामी श्री पंकज सुबीर जी हैं ।वो अपना व्यवसाय , घर चलाने के अतिरिक्त एक गुरूकुल चलाते हैं जिसमे गज़लें सिखाई जाती हैं मुशायरे करवाये जाते हैं फिर फिर उन्हें अपने शिष्यों  की गज़लों को दुरुस्त करना होता है। मैं हैरान हूँ कि वो अपना काम कब करते होंगे इसके अतिरिक साहित्य लेखन , काव्य मंचों मे उपस्थिती और पता नही कितने काम होते हैं। इनका समझ आता है कि वो टिप्पणी नही कर सकते ।ये सच्ची साहित्य साधना और साहित्य धर्म का का निर्वाह करते हुये सब का मार्ग दर्शन कर रहे हैं।  कुछ मेरे जैसे केवल टाइम पास होते हैं जो सिर्फ अपनी सुविधा के लिये ही लिखते है। अगर मैं सब ब्लाग्ज़ पर न जाती होती तो कैसे सब से परिचय होता?
लेकिन हम जैसे लोगों को टिप्पणी जरूर करनी चाहिये मेरा तो यही मानना है। सब से परिचय होने से उनसे बहुत कुछ सीखने को मिलता है। जब मै ब्लागजगत मे आयी थी तो मुझे कविता, गज़ल या नज़्म मे फर्क पता नही था।  लेकिन सुबीर जी से गज़ल सीखी नवीन जी से परिचय हुया तो दोहे सीखे, श्री रामेश्वर कम्बोज हिमाँशू जी से परिचय हुया तो हाईकु और आजकल ताँका गीत  सीख रही हूँ। । इतनी लम्बी चौडी बात का अर्थ   यही निकला कि टिप्पणी जरूर करनी चाहिये । जो गलती निकालने की सामर्थ्य रखते हैं जरूर संतुलित शब्दों मे निकालें, \ कम से कम मै आलोचक या समीक्षक नही हूँ। हाँ अगर लगे तो मेल जरूर करती हूँ। समयाभाव के कारण संक्षिप्त टिप्पणी ही हो पाती है। समीर लाल जी की तरह । वो सब को कमेन्ट देते हैं उत्साह वर्द्धन करते हैं तो अच्छा लगता है। वैसे भी बुढापे मे , बेटिओं के चले जाने से व्यस्त रहने का ये जरिया है समय बिताने के लिये। । कमेन्ट करती हूँ धर्म राजनिती बहस  से दूर रहती हूँ हाँ कई बार रोचक बहस हो तो हिस्सा भी बन जाती हूँ। मुझे मेल दुआरा प्रप्त पोस्ट पर टिप्पणी करने से गुरेज होता है जिन को सबस्क्राईब किया है उन्ही मेल वाली पोस्ट पर जाती हूँ या एक दो बार किसी की मेल मिले तो देख लेती हूँ लेकिन हर बार वो मेल करके ही कमेन्ट लें ये अच्छा नही लगता। मेल करने का ये तरीका कमेन्ट के लिये मुझे इसलिये अच्छा नही लगता कि कितना समय तो मेल बाक्स क्लीयर करने मे लग जाता है। ब्लाग का काम ब्लाग पर ही होना चाहिये। बेशक टिप्पणी लेन देन ही हो लेकिन ये दुनिया के किस रिश्ते या व्यवसाय मे नही होता? हम किसी के घर 4 बार जाते हैं लेकिन वो एक बार भी न आये तो कब तक आप जाते रहेंगी?टिप्पणी की परंपरा जीवित रहेगी तभी हम सब को समझ और पढ पायेंगे ।
डा, नलिन चक्रधर महोपाध्याय[ लखनऊ, उन्होंने मुझे कहानियाँ लिखने के लिये उत्साहित किया था। पत्रिका मे मेरा पता देख कर मुझे पत्र लिखा जब कि मै उन्हें जानती नही थी। जब मैने उन्हें धन्यवाद दिया [पत्र मे] तो उनका जवाब आया कि मै अपनी साहित्य धर्मिता का निर्वाह कर रहा हूँ। । उनकी वो बात आज भी मेरे जहन मे है\ इस लिये
टिप्पणी कीजिये लेकिन उत्साहवर्द्ध, अगर गलती निकालनी है तो बेहतर है मेल करें, नही तो विनम्र शब्दों मे गलत को गलत कहें और सही को सही।मेरा मानना है कि तारीफ मे लिखे कमेन्ट कभी व्यर्थ नही जाते बल्कि उत्साहित करते हैं और उत्साह ही आगे बढने के लिये प्रेरित करता है।जब आप खुद टिप्पणी का मोह रखते हैं तो फिर खुद टिप्पणी करने से परहेज क्यों? दूसरे भी आपसे यहीआअपेक्षा करें तो गलत क्या है?
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08 May, 2011

क्या व्यर्थ जा रहे हैं तारीफ में लिखे कमेण्ट ?

आप सब कया सोचते हैं इसके बारे मे। अपने विचार जरूर दें ये आलेख श्री ज़ाकिर अली रजनीश जी के ब्लाग से लिया है। कमेन्ट्स को ले कर ब्लाग जगत मे दुविधा और खींच तान बनी रहती है। कुछ दिन से बार बार इसके बारे मे विचार उठते है। ब्लागजग्त मे सभी साहित्यकार नही हैं लेकिन इन्हीं मे से कभी अच्छे साहित्यकार बनेंगे, इसके बारे मे श्री रवि रतलामी जी का आलेख अगर मिलेगा तो जरूर लगाऊँगी। 

12 March 2011


चाहे किसी ब्‍लॉग पर आने वाली टिप्‍पणियों की संख्‍या चाहे 01 हो अथवा 111, उनमें से 99 प्रतिशत टिप्‍पणियों में सिर्फ और सिर्फ तारीफ लिखी जाती है। टिप्‍पणीकर्ताओं के इस रवैये को लेकर जहां अब तक बहुत कुछ लिखा जा चुका है, वहीं बहु‍त से लोग इसीलिए ब्‍लॉगिंग को पसंद भी नहीं करते हैं। ऐसे में सवाल यह उठता है कि क्‍या ये टिप्‍पणियां व्‍यर्थ ही जा रही हैं ?

जो लोग मानव व्‍यवहार में रूचि रखते हैं, उन्‍हें पता है कि अपने समान्‍य जीवन में व्‍यक्ति कितने भी अच्‍छे काम क्‍यों न कर ले, लोग उसकी प्रशंसा करने में शर्म सी महसूस करते हैं। यही कारण है कि समाज में सकारात्‍मक प्रवृत्तियों का लगातार क्षरण हो रहा है और नकारात्‍मक प्रवृत्तियां परवान चढ़ रही हैं। यदि इसे मेरी सोच की अतिरेकता न माना जाए तो मैं ऐसे पचासों लोगों के उदाहरण दे सकता हूँ, जिनमें लेखन के पर्याप्‍त गुण थे, किन्‍तु तारीफ की दो बूंदे न मिल पाने के कारण उनका सृजन रूपी अंकुर असमय ही काल कलवित हो गया।

पता नहीं हमारे समाज का यह कौन का प्रभव है कि हम दूसरों की छोड़ें अपने सगे-सम्‍बंधियों की भी तारीफ करना गुनाह समझते हैं। अगर हम अपने घर के भीतर ही झांकें, तो अक्‍सर ऐसा होता है कि घर पर रहने वाली ज्‍यादातर स्त्रियों में कोई न कोई ऐसा टैलेण्‍ट अवश्‍य पाया जाता है, जिसके बल पर वे समाज में अच्‍छा खासा नाम कमा सकती हैं। ज्‍यादातर पुरूषों को अपनी पत्नियों के उस गुण के बारे में पता भी होता है, पर बावजूद इसके वे उसकी तरफ से ऑंख मूंदे रहते हैं। अगर किसी भी महिला में कोई विशेष गुण न भी हो, तो इतना तो तय है कि वह कोई न कोई खाना तो अवश्‍य ही अच्‍छा बनाती होगी। लेकिन याद कीजिए आपने आखिरी बार अपनी पत्‍नी के बने खाने की तारीफ कब की थी? माफ कीजिए, शायद आपको वह तिथि, वह महीना अथवा वह साल याद नहीं आ रहा होगा।

पत्‍नी ही नहीं, हमारे बच्‍चे, माता-पिता और भाई बहन अक्‍सर ऐसे काम करते हैं, जो प्रशंसा के योग्‍य होते हैं, लेकिन इसके बावजूद हमारे मुँह से तारीफ से दो शब्‍द नहीं निकलते। हॉं, उनसे ज़रा सी गल्‍ती होने पर उन्‍हें लानत-मलामत भेजना हम अपना पहला अधिकार जरूर समझते हैं। जिसका नतीजा यह होता है कि हमारे सम्‍बंधों की मधुरता धीरे-धीरे समाप्‍त होती चली जाती है। यही कारण है कि हमारे सामाजिक सम्‍बंध बेहद जर्जर हो जाते हैं और जरा सा झटका लगने पर वे टूटने के कगार पर पहुंच जाते हैं।

ऐसे में यदि ब्‍लॉग की वर्चुअल दुनिया में ही सही हम दूसरों की (भले ही झूठी सही) तारीफ करने की आदत अपने भीतर डाल रहे हैं, तो यह समाज के लिए एक शुभ संकेत है। इससे न सिर्फ ब्‍लॉगर्स को प्रोत्‍साहन मिल रहा है, वरन हमारे भीतर भी (अनजाने में ही सही्) परोक्ष रूप में सकारात्‍मक सोच का नजरिया पैदा हो रहा है। इसलिए यदि कोई आपकी टिप्‍पणियों में की गयी तारीफ को लेकर आलोचना कर रहा है, तो उससे विचलित न हों और बिना किसी संकोच के अपना काम करते रहें।

आप मानें या न मानें पर प्रशंसा (भले ही झूठी क्‍यों न हो) शरीर में सकारात्‍मक ऊर्जा को बढ़ाती है, प्रशंसा लक्ष्‍य को प्राप्‍त करने में मदद करती है। प्रशंसा हमें दूसरों के बारे में सोचना सिखाती है, प्रशंसा हमारे शुभेच्‍छुओं की संख्‍या बढ़ाती है, प्रशंसा हमारे जीवन में रस लाती है, प्रशंसा हमारी सफलता को नई ऊंचाईयों की ओर ले जाती है। प्रशंसा अगर समय से की जाए, तो अपने परिणाम अवश्‍य लाती है। प्रशंसा अगर सलीके से की जाए तो चमत्‍कार सा असर दिखाती है। और सबसे बड़ी बात यह है कि भले ही हमें यह पता हो कि सामने वाला व्‍यक्ति हमारी झूठी तारीफ कर रहा है, प्रशंसा फिर भी हमें (कुछ क्षण के लिए ही सही) प्रसन्‍न कर जाती है।

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