06 October, 2010

गज़ल

आदरणीय प्राण भाई साहिब ने आपकी खिदमत मे ये गज़ल भेजी है पढिये और दाद दीजिये। धन्यवाद।
माना कि आदमी को हँसाता  है आदमी
इतना नहीं कि जितना रुलाता है आदमी

माना  गले से सबको लगाता  है आदमी
दिल में किसी- किसी को बिठाता है आदमी

कैसा सुनहरा  स्वांग  रचाता है आदमी
खामी को अपनी खूबी बताता है आदमी

सुख में लिहाफ़ ओढ़ के सोता है चैन से
दुःख में हमेशा शोर  मचाता है आदमी

हर आदमी की  ज़ात  अजीबोगरीब  है
कब आदमी को दोस्तो भाता  है आदमी

आक्रोश, प्यार, लालसा  नफ़रत, जलन, दया
क्या - क्या न जाने दिलमें जगाता है आदमी


दिल का अमीर हो तो कभी  देखिए  उसे
क्या  क्या  खजाने सुख के लुटाता है आदमी
 
दुनिया से खाली हाथ कभी लौटता  नहीं
कुछ राज़ अपने साथ ले जाता है आदमी

अपने को खुद ही दोस्त उठाने का यत्न कर
मुश्किल से आदमी  को उठाता  है आदमी

02 October, 2010

गज़ल ------

बहुत दिनों से हाथ पाँव  पटक रही थी कि मुझे गज़ल सीखनी है। मगर ये उम्र और मन्द बुद्धि! कहीं से बहर की नकल कर लेती और टूटी फूटी गज़ल लिख लेती हूँ।अब तक  ये इल्म नही था कि बहरें  क्या होती हैं। नाम जरूर सुन लिया करती। बडे भाई साहिब श्री प्राण शर्मा जी को इस्सलाह के लिये भेज देती। अब उनके पास भी इतना तो समय नही कि मुझे गज़ल की ए बी सी विधीवत रूप से सिखा सकें। उनसे सवाल भी तो ही कर सकती हूँ अगर मुझे पहले गज़ल के बारे मे कुछ पता हो। फिर भी अब तक उनसे बहुत कुछ सीखा है और सीखती रहूँगी, और श्री तिलक राज कपूर जी, सर्वत भाई साहिब को भी काफी तंग किया है। तिलक भाई साहिब ने पहले पहल मुझे कुछ नोट्स भेजे थे उन से भी बहुत कुछ सीखा उनका भी धन्यवाद करना चाहूँगी। फिर ये अल्प बुद्धि मे बहुत कुछ पल्ले नही पडा।मगर गज़ल के सफर { श्री पंकज  सुबीर जी का गज़ल का ब्लाग} से और उनसे पूछ कर बहुत कुछ सीखा। फिर भी अभी बहुत कुछ सीखना है अभी तो ए बी. सी ही हुयी है।  तो  आज मै अपने सब से छोटे भाई श्री पंकज सुबीर जी से लड पडी। कि मुझे अपने गुरूकुल मे दाखिला दें। मगर उनकी  --- क्या कहूँ--- स्नेह ही कह सकती हूँ, कि "दी" का मोह नही त्याग रहे।  मुझे "निम्मो दी" कह कर टाल रहे हैं।  अभी अर्ज़ी पूरी स्वीकार नही हुयी। मगर मै भी कहाँ पीछे हतने वाली हूँ। आज से जब भी मै गज़ल की बात करूँगी तो उन्हें गुरू जी ही कहूँगी। गज़ल के सफर मे उनके ब्लाग से ही गज़ल के बारे मे विधिवत रूप से जान सकी हूँ । इसके लिये गुरूदेव की आभारी हूं। आज उनके आशीर्वाद से ये गज़ल आपके सामने रख रही हूँ। आज कल वो कुछ मुश्किल दौर मे हैं कामना करती हूँ कि उनकी सभी मुश्किलें जल्दी दूर हों और वो अपने गुरूकुल वापिस लौटें। गुरू जी का धन्यवाद। मिसरा उनका ही दिया हुया है---- नहीं ये ज़िन्दगी हो पर मेरे अशआर तो होंगे,

गज़ल

नहीं ये ज़िन्दगी हो पर मेरे अशआर तो होंगे,
मुहब्बत मे किसी के वास्ते उपहार तो होंगे |

रहे आबाद घर यूं ही, सदा खुशियाँ यहाँ बरसें,
न होंगे हम तो क्या, अपने ये घर परिवार तो होंगे|

ये ऊंचे नीचे रस्‍ते जिंदगी जीना सिखाते हैं
नहीं हो कुछ भी लेकिन तजरुबे दो चार तो होंगे

बिना कारण नही ये दौर नफरत का जमाने मे
कहीं फेंके गये नफरत के कुछ अंगार तो होंगे

यूं ही मरती रहेगी हीर अपनों के ही हाथों से
रहेंगे मूक जब तक लोग अत्याचार तो होंगे

नहीं उत्‍साह अब मन में मनाएं जश्‍ने आज़ादी
कहीं हम आप सब भी इसके जिम्‍मेदार तो होंगे

कहां हिम्‍मत है गैरों में, तबाही कर चले जाएं
छुपे  कुछ अपने ही घर में कहीं ग़द्दार तो होंगे

28 September, 2010

गज़ल

इस गज़ल को आदरणीय प्राण भाई साहिब ने संवारा है। उनका बहुत बहुत धन्यवाद।
गज़ल
कसक ,ग़म ,दर्द बिन ये ज़िन्दगी अच्छी नहीं लगती
मुझे अब आँसुओं  से  दुश्मनी  अच्छी  नहीं लगती

किनारा  कर गये हैं हम नवाला लोग मुश्किल में
मुझे  ऐसी  खुदाया दोस्ती  अच्छी  नहीं लगती

भला लगता है मुझको रोज ही रब  की इबादत पर
फरेबों से भरी  सी बंदगी अच्छी   नहीं   लगती

खुशी में भी उसे हंसना कभी अच्छा नहीं लगता
मुझे उसकी यही संजीदगी अच्छी नहीं  लगती

रुला  कर फिर मनाने की बुरी आदत उसे क्यों है
मुहब्बत में मुझे ये दिल्लगी अच्छी  नहीं  लगती

न काटो डाल जिस पर बैठ कर खुशियाँ  मनाते हो
तुम्हारे हाथों अपनी खुदकशी अच्छी  नहीं  लगती 

किसी से बात दिल की बांटना उसको  नहीं भाता
मेरे यारो  मुझे उसकी  खुदी  अच्छी नहीं  लगती

किसी रोगी को दूं खुशियाँ मुझे अच्छा ये लगता है
चुराऊँ उसके जीवन की खुशी अच्छी  नहीं  लगती

पड़ोसी को  पड़ोसी  की खबर ही अब नहीं  रहती
मुझे"  निर्मल " ये उसकी बेरुखी अच्छी नहीं लगती

26 September, 2010

पा ती अडिये बाजरे दी मुठ

कृप्या मेरी आज की पोस्ट यहाँ पढें। मै अपने इस ब्लाग को अपडेट कर रही हूँ। धन्यवाद।http://veeranchalgatha.blogspot.com/
धन्यवाद्।

23 September, 2010

गज़ल्

आज गज़ल उसताद श्री प्राण शर्मा जी की एक गज़ल पढिये

ग़ज़ल - प्राण शर्मा

क्यों न हो मायूस मेरे राम जी अब आदमी
इक सुई की ही तरह है लापता उसकी खुशी

माना कि पहले कभी इतनी नहीं ग़मगीन थी
गीत दुःख के गा रही है हर घड़ी अब ज़िन्दगी

कितना है बेचैन हर इक चीज़ पाने के  लिए
आदमी को  चाहिए अब चार घड़ियाँ चैन की

झंझटों में कौन पड़ता है जहां में  आजकल
क़त्ल होते देख कर छुप जाते हैं घर में सभी

बात मन की क्या सुनायी जान कर अपना उसे
बात जैसे पर लगाकर हर तरफ उड़ने   लगी

दोस्ती हो दुश्मनी ये बात मुमकिन है मगर
बात ये मुमकिन नहीं कि दुश्मनी हो स्ती

दिन  में चाहे बंद कर लो खिड़कियाँ ,दरवाज़े तुम
कुछ न कुछ तो रहती ही है सारे घर  में रोशनी

कोई कितना भी  हो  अभ्यासी मगर ए दोस्तो
रह ही जाती है सदा अभ्यास में थोड़ी   कमी

हमने सोचा था  करेंगे काम अच्छा रोज़  हम 
सोच इन्सां की ए यारो एक सी कब है  रही

गर कहीं मिल जाए तुमको मुझसे मिलवाना  ज़रूर
एक मुद्दत से नहीं देखी  है  मैंने  सादगी

हो भले ही शहर कोई " प्राण "  लोगों से भरा
सैंकड़ों में मिलता  है पर संत जैसा आदमी 


21 September, 2010

दहेज्-- अपनी बात।

क्या सामर्थ्यवान लोगों को दहेज देना चाहिये?
 मेरे ब्लाग www.veerbahuti.blogspot.com/ पर एक लघु कथा-- दो चेहरे पढ कर खुशदीप सहगल जी ने अपने ब्लाग http://deshnama.blogspot.com/ पर अपने विचार दिये और कई लोगों ने भी अपने अपने विचार दिये। आज उन से ही मन मे कुछ सवाल उठे।किसी का उन से सहमत होना न होना जरूरी नही जरूरी है हम फिर भी संवाद करें और अपने अपने विचार दें तो शायद कोई बीच का रास्ता हमे भी सूझ जाये।
मेरी लघु कथा का जिक्र हुया मुझे खुशी हुयी।लेकिन उस लघु कथा मे विषय ये नही था कि दहेज लिया दिया जाये य नही मै तो बस ये कहना चाहती थी कि लोग  दोहरी नीति अपनाते हैं, जब समाज की बात आती है तो ये कुरीति बन जाती है जब अपने घर की बात आती है तो ये जायज़ है। लेकिन दहेज के बारे मे आज कुछ बातें करना चाहूँगी। कुछ लोगों ने दहेज के लिये कहा कि अगर कोई व्यक्ति अपनी मर्जी से दहेज देना चाहता है तो उसमे कोई बुराई नही। इस बात पर मन मे कुछ सवाल और भ्रम से उत्पन हुये जिन्हें आपके साथ बाँटना चाहती हूँ। िस व्यवस्था के लचीले पन मे कुछ सवाल उभरते हैं।  जिस जगह भी कुछ लचीला पन रहा है वहाँ लोग अपने स्वार्थ के लिये राह तलाश लेते हैं। हर पक्ष के दो पहलू होते हैं,देखने वाली बात ये है कि दोनो मे कौन सा समाज के लिये हानिकारक है और कौन सा सिर्फ कुछ लोगों के खुद के लिये। जो समाज के लिये हनिकारक हो।
 सब से पहले तो हमे ये तय करना चाहिये कि क्या हम लडकियों को समान अधिकार देने के हक मे हैं या नही।
अगर हैं तो लडकी को जब लडकों की तरह पढाया लिखाया जाता है और पिता की सम्पति पर बेटी का भी बेटे के बराबर हक होता है तो फिर दहेज किस बात के लिये। उपर से लडकी ने अगर नौकरी करनी है तो उसकी पूरी कमाई ससुराल मे ही तो जायेगी। फिर भी लडकी वालों को ये मजबूरी क्यों कि वो दहेज दें। अगर सच कहें तो अधिकतर दहेज केवल मजबूरी मे दिया जाता है। वो मजबूरी चाहे समाज की रीत हो या फिर  अपने  मान सम्मान की। ये भावना दहेज की कुरीति से ही पनपी है कि इस पवित्र बन्धन को आज केवल पैसे से तौला जाने लगा है। इसे अपने सम्मान और प्रतिष्ठा से जोडा जाने लगा है।
दूसरी बात जो कुछ लोगों ने उठाई है वो है कि जो समर्थ है वो अगर अपनी मर्जी से अपनी बेटी को कुछ देता है तो उसमे कोई नुकसान नहीं। हाँ सही है, लेकिन इसी लेन देन से बाकी लोगों के लिये एक लकीर खींच दी जाती है कि उसने अपनी लडकी को इतना दिया और हम ने क्या दिया? या हमे क्या मिला?  फिर जब एक ही घर मे दो बहुयें आती हैं एक को माँ बाप ने कैश या दहेज दिया दूसरी बहु बिना कुछ लिये आयी तो घर मे ही दो लकीरें खिंच जाती हैं। हमारा समाज इतना भी उदार नही हुया कि ऐसी बहुयों मे फर्क करना छोड दे।  अपनी एक रिश्तेदारी की बात बताती हूँ।  उन्होंने जब लडकी का रिश्ता किया तो शादी से पहले ही बात हो गयी कि दहेज नही लेंगे। लडकी  बहुत अच्छी जाब कर  रही थी। एक महीने मे 60 हजार रुपये तन्ख्वाह लेती थी। शादी धूम धाम से हो गयी और उसके दो माह बाद ही दूसरे बेटे की शादी की तो उसके माँ बाप ने अपनी लडकी के नाम दहेज  के रूप मे 10 लाख रुपये जमा करवा दिये। अब धीरे धीरे छोटी बहु तो सब की आँखों का तारा बन गयी वो भी जाब करती थी, मगर घर का कोई काम काज आदि नही करती थी और ऐश से रहती। वहाँ दूसरी बहु को पूरा घर भी सम्भालना पडता, मगर घर के लोग दूसरी को कुछ नही कहते।अब बडी बहु के माँ बाप रिटायर हो चुके थे जो धन मिला उससे घर बनाया और तीनों बच्चों को अच्छी तालीम भी दी। कोई सरकारी नौकरी मे कितना धन जोड सकता है आखिर जब लडकी को ताने मिलने लगे तो उन्होंने कुछ राशी लडकी के नाम दे दी।। वो राशी ये सोच कर भी दी कि  दी कि उनके कोई बेटा नही मरने के बाद भी इसी का होगा। उसके बाद मजबूरी मे दूसरी लदकी को भी उतना ही देना पडा। और सारी जमा पूँजी समाप्त हो गयी।लेकिन कुछ समय बाद घर मे बीमारी ने ऐसे पाँव फैलाये कि वो लोग पैसे के अभाव मे आ गये।
आज वो उस की पूर्ती अपने खाने दाने मे और अपनी जरूरतों मे कटौती कर के कर रहे हैं जबकि ससुराल वाले उस बहु की इतनी बडी कमाई से शाही जीवन जी रहे हैं । ऐसे कितने उदाहरण अपने आस पास के दे सकती हूँ।
 अब अगर वो लाखों न दिया होता तो शायद अब उनके काम आता लडकियाँ चाहे कमाती हों मगर इतनी भी आज़ाद नही हुयी कि वो अपने माँ बाप पर अपनी मर्जी से कोई बडा खर्च कर सकें। फिर ऐसे हालात मे जहां बहु की कद्र सिर्फ पैसे से होती हो। इन्सान का मन बहुत विचित्र है। पैसा बडे बडों का ईमान गिरा देता है ये तो आपने देखा ही होगा जैसे इस परिवार का गिराया है। पहले चाहे उन्हों ने इसे कुरीति ही मान कर दहेज नही लिया मगर जब अपने आप आ गया तो लालच बढ गया। अगर आप गौर करें तो देहेज प्रथा मे  लचीलापन उन लोगों की सोच है जिनके लडके हैं। लडकी वालों मे बहुत कम लोग होंगे जो समर्थ होते हुये भी दहेज देना चाहेंगे। ये प्रथा है इस लिये उन्हें ये अपनी बेटी का मान सम्मान लगता है, तो इसे बुरा नही मानते। मगर ये बाकी समाज के असमर्थ लोगों के लिये मजबूरी बन जाता है।
मेरा मानना है कि जिस जगह लचीनापन होता है वहाँ अपने अपने स्वार्थ के लिये रास्ते जरूर खुल जाता हैं।  अगर यही लचीलापन हम केवल लडकियों को बराबरी का हिस्सा देने मे रखें तो शायद बाकी असमर्थ लोगों को कुछ राहत मिले।हिस्सा देने मे जो कुछ विसंगतियाँ आती हों उनके लिये हल खोजे जा सकते हैं।
एक सवाल और पूछना चाहती हूँ कि क्या जो लोग दहेज की हिमायत करते हैं वो इस बात की भी हिमायत करेंगे कि उनका बहु जो कमाती है उसमे से आधा अपने माँ बाप को दे कम से कम बुढापे मे उनके गुजर बसर का जिम्मा ले? कहने को तो हर कोई कह देगा लेकिन होगा नही। जिन के बेटे नही होते उन माँ बाप से तो लडके वालों की और भी आपेक्षायें बढ जाती हैं। कि बाद मे भी तो लडकी को ही मिलेगा इस लिये पहले ही उनकी आँखें लडकी वालों की सम्पति पर लग जाती हैं। इससे पहले कि वो अपना पैसा कहीं और न लुटा दें उन्हे मिल जाये। फिर हर तौहारों पर लेन देन केवल लडकी वालों की जिम्मेदारी होती है। इस प्रथा मे यही काफी नही कि दहेज दिया और छुट्टी मिल गयी। हर त्यौहार पर ससुराल वालों की आपेक्षायें बढती ही जाती हैं, जैसे बेटी को जन दे कर उन्हों ने कोई गुनाह किया है जिस की सजा उन्हें उम्र भर मिलती रहेगी।
 कुछ दिन पहले ही किसी के घर मे ऐसा वाक्या हुया कि लडकी को  अपने माँ बाप के पास जमीन खरीदने के लिये पैसे लेने भेजा गया।  लेकिन लडकी के बाप के पास जो था उसी मे से अपना गुजर बसर करते थे। जब इन्कार किया तो लडकी  को मायके भेजना बन्द कर दिया। अब मरता क्या न करता कुछ पैसे दे कर अपनी बेटी से मिलने का हक लिया।
  कि बाद मे भी तो लडकी को ही मिलेगा इस लिये पहले ही उनकी आँखें लडकी वालों की सम्पति पर लग जाती हैं।
 बहुत कुछ इस विषय पर लिखा जा सकता है। मगर पोस्ट बडी नही करना चाहती। बस एक बात कहना चाहती हूँ कि अपनी सामर्थ्य और अपने मान सम्मान के लिये दिया गया दहेज क्या असमर्थ लोगों के लिये मजबूरी तो नही बन रहा? क्योंकि कई बार ससुराल वाले ताने दे देते हैं देखों फलाँ के घर कितना कुछ आया और तुम्हारे माँ बाप ने क्या दिया। और दिये गये समान मे मीन मेख निकलनी शुरू हो जाती है जिस से सास बहु मे या बाकी सब के दिलों मे मन मुटाव शुरू हो जाता है।अगर ये सब जायज़ है तो समान अधिकारों की बात छोडो।ऎसे कानून का विरोध करो जो लडकी को समान अधिकार देता है।
आज जिस समाज मे लोगों की सोच ये है कि पडोसी को देख कर अपना रहन सहन उनसे ऊँचा रखने की रेस लग जाती है, उस समाज मे ये लचीलापन एक अभिशाप से कम नहीं। फिर भी ये सब होता रहेगा हम और आप केवल बहस करते रहेंगे। बस ।सब की अपनी अपनी भावनायें अपनी अपनी सोच है।
किसी व्यवस्था मे उसके प्रबन्धन मे लचीलापन उस व्यवस्था के लिये घातक होता है, जैसे एक बाप घर की व्यवस्था मे  कई बार सख्ती से काम लेता बच्चों की बेहतरी के लिये  लेकिन माँ का व्यवहार लचीला  होता है जब माँ बच्चों की गलतियाँ  बाप से छुपाती है तो बच्चों को मनमर्जी करने की आदत पड जाती है। और कई बार आपने सुना होगा अकसर ये कहा जाता है इसे माँ ने बिगाडा है। मेरे कहने का तात्पर्य है कि जहाँ लचीलपन होता है वहीं से लोग अपने स्वार्थ का रास्ता तलाश लेते हैं। इन्सान के आपसी व्यवहार  और रिश्तों मे लचीनापन उस व्यवस्था को मजबूत करता है, लेकिन बुनियादी ढाँचे मे हानिकारक होता है। घर की नींव मजबूत हो लेकिन उपर की सज्जा अपनी सामर्थ्य के अनुसार हो यहाँ लचीलापन चलेगा लेकिन नींव मे नही। । अगर आज हमारे संविधान मे लचीलापन न होता तो शायद आज देश का ये हाल न होता। स्वतन्त्रता जब अभिशाप बन जाये तो स्वतन्त्रता के क्या मायने? पंजाबी की कहावत है कि
"भट्ठ पिया सोना जेहडा कन्ना नूँ खावे"  अर्थात उस सोने का क्या फायदा जो कानो को नुकसान दे।
 एक बात और जैसा हमारी हिन्दू संस्कृ्ति व जीवन दर्शन मे[बाकी धर्मों मे भी}, हमारे लिये रहन सहन के नियम  तय किये गये हैं क्या हम उनके अनुसार अपना रहन सहन या व्यव्हार करते हैं। नही!  हम उन्हें रूढीवादी कह कर अपने हिसाब और सुविधा से जीते हैं। तो फिर उस समय के हिसाब से चली व्यवस्था अगर समाज को हानि पहुंचा रही है तो उसे बदलने की जरूरत क्यों नही। लेकिन होगा तब जब हम अपनी सोच को इस जमाने के हिसाब से बदलेंगे। न कि लडकी को अभी भी निरीह प्राणी समझेंगे । शादी सामाजिक व्यवस्था का एक   जरूरी अंग ,इसे सार्थक और सुन्दर बनाने के लिये हमे ऐसी कुरीतियों का विरोध करना ही होगा।  इसकुरीति के चलते  न तो भ्रूण हत्यायें रुकेंगी और न दहेज हत्यायें। धन्यवाद।

19 September, 2010

लघु कथा

दहेज--{ दो चेहरे --  -2}-- लघु कथा
दो चेहरों वाले व्यक्तित्व पर कुछ सवाल उठे थे।मगर समाज मे ऐसे चेहरे हर जगह देखे जा सकते हैं उसी संदर्भ मे कुछ लघु कथायें लिखनए जा रही हूँ। नाम तो दो चेहरे ही रहेगा मगर कडी का नम्बर साथ दूँगी। 

आज जोशी जी अपने लडके के लिये लडकी देखने जा रहे थे। वो ुच्च पद से रिटायर्ड व्यक्ति थे एक ही बेटा था इस लिये चाहते थे कि शादी धूम धाम से हो। उच्च पद पर रहने से शहर मे उनकी मान प्रतिष्ठा थी। कई संस्थायें उन्हें अपने समारोह मे बुलाती जहाँ कई बार उन्हें समाज मे पनप रही बुराईओं पर वक्तव्य भी देने पडते। इस लिये लोग उन्हें समाज सुधारक भी मानते थे।
लडकी के घर पहुँचे। लडके लडकी मे बात चीत हुयी और दोनो ने एक दूसरे को पसंद कर लिया। लडकी के पिता को अन्दर से ये डर खाये जा रहा था कि पिछली बार की तरह इस बार भी दहेज पर आ कर बात न्न अटक जाये। पिछली बार लडके ने कार की माँग रख दी थी। उन्होंने अपना शक मिटाने के लिये जोशी जी से पूछा
" जोशी जी , अब आगे की बात भी हो जाये।यूँ तो हर माँ बाप अपनी बेटी को कुछ न कुछ दे कर ही विदा करता है, फिर भी अगर आपकी   कोई डिंमाँड हो तो हमे निस्संकोच बता दें ।"
" शर्मा जी आपको पता है हमारे घर मे भगवान का दिया सब कुछ है अगर फिर भी आप इतना आग्रह कर रहे हैं तो बता देना चाहता हूँ कि हमे कुछ नही चाहिये, आप कन्यादान स्वरूप  इन दोनो के नाम एक ज्वाँइट एकाउँट खुलवा कर उसमे राशी जमा करवा दें"

16 September, 2010

दो चेहरे- लघु कथा

दो चेहरे
"पापा आज  आप स्टेज पर हीर राँझा गाते हुये रो क्यों पडे थे?"
"समझाईये न पापा"
'तुम नहीं समझोगी"
"समझाईये न पापा"
रनबीर की सात साल की बेटी अचानक अपनी नौकरानी के बेटे गोलू के साथ  खेलती हुयी पापा से आ कर पूछने लगी।
'नहीं पापा मुझे बताओ ना" वैसे ये हीर राँझा क्या होते हैं?"
रनबीर ने बेटी की तरफ देखा और उसे बताने लगा
'बेटी हीर राँझा दो प्रेमी थे दोनो एक दूसरे से बहुत प्यार करते थे मगर दोनो की शादी नहीं हुयी और और दोनो एक दूसरे के लिये तडपते रहे" ये गीत ये गीत हीर राँझा की प्रेम कथा  है, उसका दर्द देख कर किसी के भी आँसू निकल जाते हैं। बहुत दर्दनाक प्रेम कहानी है।' रनबीर सिंह अपने ही ख्याल मे डूबा हुया बेटी को बता रहा था।
"पापा उनके माँ बाप कितने बुरे थे?"
'हाँ बेटी बहुत बुरे"। रनबीर ने बेध्यानी मे जवाब दिया
" पापा1 मेरे पापा तो बहुत अच्छे हैं जब मैं गोलू से शादी करूँगी तो आप हमे कुछ नहीं कहेंगे ना?" बेटी ने भोलेपन से कहा
'चटाक' तभी उसके गाल पर एक ज़ोर से चाँटा पडा और बेटी अवाक पिता की तरफ देख रही थी।
उसे क्या पता था कि इन्सान के दो चेहरे होते हैं एक घर मे एक बाहर।

10 September, 2010

अति अन्त है-- बोध कथा---

अति अन्त है
एक नदिया का पानी रोज़ अपनी रवानगी मे बहता, किनारों की तरफ भागने की कोशिश करता मगर नदी से बाहर नही निकल पाता। उसके मन मे बहुत क्षोभ था कि वो स्वतन्त्र क्यों नही। सामने ऊँचे हिम शिखरों के देख कर उसका मन ललचाता कि काश वो उस शिखर पर पहुँच जाये और दुनिया के नज़ारे देखे। उसने सूरज की किरण से कहा
 "तुम मुझे भाप बना दो ताकि मैं उस हिम शिखर तक पहुँच जाऊँ।"
 किरण ने उसे समझाया " तुम पानी हो नदिया मे ही रहो यही तुम्हारी तकदीर है। दूर की चमक दमक देख कर अपने पाँव के नीचे की जमी मत छोडो"
मगर पानी नही माना। उसने कहा कि --
" ये तुम इसलिये कह रही हो कि मैं कहीं बडा न बन जाऊँ मुझ मे भी पहाड जितनी शक्ती न आ जाये।"
नही मैं इस लिये कह रही हूँ कि तुम जितनी शक्ती किसी मे नही। झुकने मे जो ताकत है वो ऊँचा सिर करने मे नही। तुम खुद को जैसे चाहो ढाल सकती हो। मगर पर्बत की तकदीर देखो वो अपना सर भी नही हिला सकता। कहीं मर्जीसे आ जा नही सकता वो भी तो अपनी सीमाओं मे से बन्धा हुआ है! रोज़ सूरज का इतना ताप सहता है फिर भी अडिग है। क्या तुम उसकी तरह सभी कष्ट सह सकती हो? तभी तो वो पर्बत है। क्या तुम उसकी तरह सभी कष्ट सह सकती हो?भगवान ने सब को कुछ न खुछ काम दे कर संसार मे भेजा है इस लिये जिसको जिस हाल मे भगवान ने रखा है उसे खुशी से स्वीकार कर सब का भला करते रहना चाहिये। तुम भी अपनी सीमा मे बन्ध कर रहना सीखो और सब की प्यास बुझा कर मानवता की सेवा करो। अगर कोई एक बार राह भटक गया तो न घर का रहता है न घाट का।"
मगर पानी ने उसकी एक नही सुनी तो सूरज की किरण कहा कि चलो मैं तुम्हें भाप बना देती हूँ तुम शिखर पर चली जाओ। पानी भाप बन कर पर्बत  पर चला गया और ठंड से बर्फ बन कर चोटी पर जम गया। वो बहुत खुश हुया कि यहाँ से खडे हो कर वो दुनिया के नज़ारे देख सकता है। आज वो भी कितना ऊँचा उठ गया है नदिया यूँ ही नाज़ करती थी कि उसने मुझे पनाह दे रखी है। सूरज की किरण रोज़ उससे मिलने आती तो झूम कर कहता कि देखों आज मैं भी पर्वत हूँ। वो मुस्कुराती और अपनी राह चल देती। मगर एक दिन  पानी का घमंड देख कर उसने कहा कि कुछ दिन ठहरो अब गर्मी आने वाली है। अभी सूरज देवता का ताप इतना बढ जायेगा कि तुम सह न पाओगी। मगर पानी तो अपनी इस सफलता पर झूम रहा था उसे किसी चीज़ की परवाह नही थी। कुछ दिनो बाद गर्मी का मौसम आया।  वहाँ रोज़ सूरज की तपता तो पानी पिघलने लगता। धीरे धीरे पानी पिघलता तो कभी किसी तालाब मे तो कभी कहीं जमीन पर बूँद बूँद टपक जाता। उसे नदिया तक जाने का रास्ता भी नही पता था वो तो सपनों के पंख लगा मदहोश हो  कर पहाड पर आया था। वैसे भी पानी के पहाड पर चले जाने के बाद नदी सूख गयी थी और अब वहां बडी बडी इमारतें खडी हो गयी थीं। पानी के लिये जगह ही कहाँ बची थी? इस तरह कुछ हिस्सा कहीं तो कुछ कहीं गया। जैसे किसी शरीर के टुकडे करके अलग अलग जगह फेंक दिये गये हों। एक दिन किरण को पानी का धडकता हुया दिल एक नाले मे दिखा तो उसने कटा़क्ष किया---
" क्या तुम्हारा दिल पर्बत पर नहीं लगा?"
 पानी दुखी मन से बोला "तुम ने सही कहा था हम दूसरों को ऊँचे उड कर देखते हैं तो सामर्थ्य ना होते हुयी भी वहाँ तक पहुँच जाना चाहते हैं। मगर जिस परिश्रम और कष्ट को उन्होंने सहा है वो सह नही सकते। मुझे आज ये शिक्षा मिली है कि दूसरों को देख कर अपनी सीमायें मत तोडो नहीं तो न घर के रहोगे न घाट के। अगर तुम मानवता की सेवा करना चाहते हो तो खुद को सीमा में बान्धना सीखो। नहीं तो बिखर जाओगे और मेरी तरह  किसी के काम के नही रहोगे।" आखिर हर चीज़ की हर ख्वाहिश की कोई न कोई तो सीमा तो होनी ही चाहिये। अति अन्त है।


05 September, 2010

   बहुत दिन से कुछ अच्छा लिखा नही गया। मूड बनाने के लिये कुछ यत्न करते हैं। चलो आज आपको प्राण भाई साहिब के साथ मेले मे घुमाते हैं। पढिये उनकी गज़ल मेले मे।
मेले में -- प्राण शर्मा
                  
घर वापस जाने की सुधबुध बिसराता है मेले में
लोगों की रौनक में जो भी   खो   जाता है मेले में
 
किसको याद  आते हैं घर के दुखड़े,झंझट और झगड़े
हर कोई खुशियों में खोया   मदमाता    है   मेले में
 
नीले -  पीले लाल- गुलाबी   पहनावे   हैं   लोगों     के
इन्द्रधनुष   का  सागर    जैसे   लहराता    है   मेले   में
 
सजी   -  सजाई    हाट - दुकानें   खेल - तमाशे  और झूले
कैसा  -  कैसा   रंग    सभी   का भरमाता  है   मेले   में
 
कहीं  पकौड़े  , कहीं   समोसे ,  कहीं   जलेबी   की महकें
मुँह   में   पानी   हर   इक  के  ही भर आता है मेले   में
 
जेबें   खाली  कर   जाते हैं   क्या   बच्चे   और क्या  बूढ़े
शायद    ही    कोई      कंजूसी      दिखलाता   है मेले   में
 
तन    तो क्या मन भी मस्ती में झूम उठता है हर इक का
जब   बचपन    का   दोस्त अचानक मिल जाता है मेले में
 
जाने  -  अनजाने   लोगों   में   फर्क   नहीं    दिखता    कोई
जिससे     बोलो    वो    अपनापन    दिखलाता   है   मेले  में
 
डर  कर   हाथ   पकड़   लेती   है हर माँ अपने   बच्चे    का
ज्यों    ही    कोई    बिछुड़ा   बच्चा   चिल्लाता   है   मेले में
 
ये दुनिया   और   दुनियादारी    एक    तमाशा    है     भाई
हर    बंजारा    भेद     जगत   के     समझाता    है    मेले   में
 
रब    न   करे    कोई    बेचारा    मुँह   लटकाए    घर     लौटे
जेब    अपनी   कटवाने    वाला     पछताता     है     मेले    में
 
राम   करे  ,  हर   गाँव -  नगर   में   मेला  नित दिन लगता हो
निर्धन   और  धनी   का    अंतर    मिट  जाता    है   मेले    में
 
 

03 September, 2010

आज कल कुछ लिख नही पा रही हूँ। अनूप की मौत के बाद उसके ब्लाग पर कुछ पँक्तियाँ लिखी थी वही लिख रही हूँ। कुछ सवाल उठे हैं उसके जाने से क्योंकि उसने पुराने जख्म फिर से हरे कर दिये हैं । आजकल बस उसी पर लिख रही हूँ।   ब्लाग बन्द करना भी नही---- चाहती कोशिश करूँगी जल्दी से उसी फार्म मे आऊँ।
कुछ सवाल 
सच मानो-- तुम्हारे जाने से दुखी नही हूँ
दुखी हूँ उस आसमान को देख कर
 जो इस रात के अन्धेरे मे
हम सब को0 आँसू दे कर खुद
जगमगा रहा है
चाँद इतरा रहा है
तारे जैसे मस्ती मे झूम रहे हैं
तुम्हारे उन के पास लौट जाने का जश्न
मगर धरती पर सब ओर सन्नाटा
गहरी उदासी सबकी शब्द भी मूक से हैं
अनुभूतियाँ, अभिव्यक्तियाँ, संवेदनायें
त्रस्त हैं ,कौन किस से क्या कहे?
 कुछ भी नही छोडा तुम्ने कहने को
और मेरा मन कुछ सवालों की
सलीब पर लटक गया है?
सब से पहला सवाल तुम से है
क्या तुम नही जानते थे
कि इन्सान को रोने के लिये भी
एक कन्धा चाहिये होता है
और तुम ने कितनी आसानी से,
या कहूँ कि बेरहमी से
अपना कन्धा खींच लिया
शायद तुम भी आजकल के हिसाब से
प्रैक्टीकल हो गये थे-- यही तो दुख है
 जो दिल से अपने होते हैं
उनका दुख की घडी मे कन्धा खींच लेना
कितना दर्द देता है
दिल की किचरें सम्भाले नही सम्भलती
काश! तुम ये महसूस कर पाते
बाकी सवाल फिर कभी-----

ये सवाल जब तक हम ज़िन्दा रहेंगे उठेंगे
शायद इतना दर्द उस मसीहे को भी
सलीब पर लटक कर नही हुया होगा
तभी तो वो उपदेश दे कर चले गये
मगर हम तो एक दूसरे को
सान्तवना भी नही दे सकते
फिर भी उसे जी कर दिखाना ही होगा

18 August, 2010

शोक समाचार्

शोक समाचार
दुखी हृदय से सूचित कर रही हूँ कि मेरे छोटे दामाद ललित सूरी के छोटे भाई अनूप सूरी का देहान्त हो गया है। वो टी सी एस कम्पनी मे इन्जनीयर थे और फरवरी 2010 से कम्पनी की तरफ से अमेरिका मे थे। वहाँ उनकी एक कार दुर्घटना मे मौत हो गयी उनके साथ भारत से अभी चार दिन पहले कम्पनी से एक दोस्त गया था, उसकी भी उसी के साथ मौत हो गयी। गाडी चलाने वाला लडका बच गया। हंसते खेलते परिवार की खुशियाँ भगवान ने छीन ली। दिसम्बर मे वापिस आने पर उसकी शादी करनी थी।ाभी दोनो की लाश भारत नही आयी, शायद शुक्रवार शाम तक पहुँच जायेगी।
कुछ दिन से पता नही क्यों मन बहुत उदास था, बिना किसी कारण के ।मुझे लग रहा था कि फिर से कुछ होने वाला है। मेरे साथ ऐसा ही होता है। हमारा तो पहले ही पोर पोर दुख से भरा हुया है, ऐसी मौतों की वजह से। मुझे बस सकून इस बात का था कि मेरी बेटियाँ अपने घरों मे बहुत खुश हैं। बस यही रहता मन मे कि ये घर यूँ ही हंसते खेलते रहें। मगर भगवान के आगे किस की चलती है। मेरी बेटी को वो अपनी माँ से भी अधिक सम्मान देता था। मेरे साथ हर दो तीन दिन बाद चैट पर बात होती तो यही कहता कि मैं तो आपका बेटा हूँ,ललित आपका दामाद है। शायद अच्छे लोगों की भगवान को हम से अधिक जरूरत है। उसके माँ बाप को अभी नही बताया हुया इस लिये हम भी अभी वहाँ नही गये।  मन कहीं टिक नही रहा तो आप सब से दुख बाँटने आ गयी। मेरे बच्चों को आशीर्वाद दें कि इस दुख की घडी मे भगवान उनको हौसला दे। बस यही विनती है । आज रात की गाडी से दिल्ली  जा रहे हैं। कुछ दिन फिर नेट से दूर रहूँगी।

13 August, 2010

कसौटी रिश्ते की--- कहानी

कसौटी रिश्ते की
अगली कडी
अब तक आपने पडा कि दोनो पति पत्नि बैठे हुये हैं और पति रो रहे हैं। उनके भाईयों ने उन्हें घर मे से हिस्सा नही दिया था---- पत्नि उन्हें और रुलाना चाहती थी---- पिछली बातें याद कर के ताकि बाद मे रोने के लिये कुछ न बचे।-------
अगली कडी


"ये तो बहुत बडी बडी बातें थी हमे तो एक छोटी सी खुशी भी नसीब नही होती थी। याद है रिश्तेदारी मे एक शादी पर जब मुझे भी सब के साथ जाने का सौभाग्य प्राप्त हुया था। अपनी शादी के कुछ दिनो बाद ही मैं सजना संवरना भूल गयी थी। उस दिन मुझे अवसर मिला था। जब तैयार हो कर आपके सामने आयी तो आपने शायद पहली बार इतने गौर से देखा था--- न जाने कहाँ से एक ावारा सा अरमान आपके दिल मे उठा था अवारा इस लिये कि ऐसे अरमान आपके दिल मे उठते ही नही थे अगर उठते थे तो आप छिपा लेते थे---- तभी आप बोले--
"अज हम सब से पहले घर आ जायेंगे। कुछ पल अकेले मे बितायेंगे।"
"क्या सच????"  मेरी आवाज़ मे छिपा व्यंग इन्हें अन्दर तक कचोट गया था-- चाहे बोले कुछ नही मगर आँखों मे बेबसी के भाव मैने पढ लिये थे। एक दर्द की परछाई इनके चेहरे पर सिमट आयी थी।
मुझे पता था कि मुश्किल है हमे माँजी अकेले मे भेजें। वो नही चाहती थी कि हम दोनो कभी अकेले मे बैठें। मुझे पता नही क्यों उन पर कभी गुस्सा नही आता था उन्हों ने बचपन मे सौतेली माँ के हाथों इतने दुख झेले थे। मेरे ससुर जी की पकिस्तान मे अच्छी नौकरी थी वो पटवारी थी मगर आज़ादी के बाद दंगों मे उ7न्हें सब कुछ वहीं छोड कर भारत आना पडा कुछ अपनी जमीन यहां थी तो नौकरी भी फिर से यहीं मिल गयी । यहाँ भी संयुक्त परिवार था साथ भाईयों का तो मेरी सासू जी सब से छोटी थी इस लिये यहाँ भी उन्हें बहुत दुख झेलने पडे। शायद अब भी उनके मन मे एक असुरक्षा की भावना थी। मुझे कभी कुछ कहती भी नही थी। अपनी बीमारी से भी दुखी थी। इस लिये मुझे उन पर गुस्सा नही आता।  उन्हें डर था कि अगर हम मे प्यार बढ गया तो मैं इन्हें शहर न ले जाऊँ।  और उस दिन भी यही हुया जैसे ही हम खाना खाने के बाद चलने को हुये तो िन्हों ने कहा कि आपने तो रात को आना है हम लोग घर चलते हैं पशुयों को चारा भी डालना है-- तो माँजी एक दम से बोल पडी----" बच्चों को भी साथ ले जाओ।" और मैं एक अनजान पीडा से तिलमिला गयी। फिर अकेले कुछ समय साथ बिताने का सपना चूर चूर हो चुका था।
 इनका रोना रुकने की बजाये बढ गया था यही तो मैं चाक़्हती थी----
" आपको याद है मुझे अपने मायके के सुख दुख मे भी शामिल होना नसीब नही था।मेरे जवान भाई की मौत आपकी भाभी  के बाद 6-8 माह मे ही हो गयी थी---तो संस्कार के तुरन्त बाद ही आप मुझे घर ले आये थे--- मुझे अपनी माँ के आँसू भी पोंछने नही दिये थे--- आप मुझे रोने भी नही देते झट से डांट देते---" रो कर क्या भाई वापिस आ जायेगा?"---- ओह! किस तरह टुकडे टुकडे मेरे दिल को पत्थर बनाया था----: आज तक न कभी हँस पाई न रो पाई। लाडकी को ही क्यों हक नही होता कि वो अपने माँ बाप के सुख दुख मे काम आये जैसे कि आप अपने माँ बाप के काम आ रहे थे।
रगर  एक एक दिन और रात का आपको हिसाब दूँ तो शायद आज आप भी सकते मे आ जायेंगे। आपने केवल अपनी नज़र से ज़िन्दगी को देखा है आज मेरी नज़रों से देखोगे तो आपका दर्द बह जायेगा और मुझे भी शायद कुछ सकून मिलेगा।
इसी लिये मैं आपको रो लेने देना चाहती हूँ। आपको रोने से नही रोकूँगी--- आपको पत्थर नही बनने दूँगी--- भुक्तभोगी हूँ--- जानती हूँ पत्थर बना हुया दिल ज़िन्दगी पर बोझ बन जाता है--- दुनिया के लिये अपने लिये निर्दयी हो जाता है।
राम सीता के लिये कठोर हो सकते हैं मगर दुनिया के लिये तो भगवान ही हैं क्या राम के बिना दुनिया की कल्पना की जा सकती है? मैं सीता कि तरह उदार तो नही हो सकती कि आपको माफ कर दूँ मगर फिर भी चाहती हूँ कि आप दुनिया के लिये ही जीयें_। मैं दुनिया को एक कर्तव्यनिष्ठ इन्सान से वंचित नही करना चाहती।काश भगवान मुझे भी आप जैसाबनाता कामनाओं से मुक्त--- स्वार्थ से परे--- मेरा अपने सुख के लिये शायद स्वार्थ ही था जो आपको कभी माफ नही कर पाई। हाँ लेकिन एक बात का स्कून ज़िन्दगी भर रहा कि मैने वो किया है जो शायद आज तक किसी ने नही किया। अपना दर्द तब भूल जाती हूँ जब गाँव के लोग कहते हैं कि ऐसी बहु न कभी आयी थी न शायद आयेगी। बस इसी एक बात ने मुझे विद्रोह करने से रोके रखा। हाँ जमीन बाँटे जाने तक सब के लिये मैं महान थी मगर जब अपना घर बनाने की बारी आयी तो मैं बुरी हो गयी। जो औरत शादी के पच्चीस  साल तक घर मे सब के लिये वरदान थी वो  बाद मे कैसे बुरी हो गयी? शायद मतलव निकल जाने के बाद ऐसे ही होता है। मुझे हमेशा बहला फुसला कर ही सब ने अपना मतलव निकाला और मै अपने सभी दुख इसी लिये भूल जाती थी।
मेरे वो पल जब मैं अपने पँखों से दूर आकाश तक उडना चाहती थी आपके संग हवाओं फूलों,पत्तियों से ओस की बूँदों तितली के पँखों से रिमझिम कणियों सेआपके संग भीगना चाहती थी लेकिन भीगने के लिये क्या मिला उम्र भर आँसू!--- अपके दिल की धुन से मधुर संगीत सुनना चाहती थी--- आपकी आँखों मे डूब जाना चाहती थी आपकी छाती पर सिर रख कर सपने बुनना चाहती थी--पता नहीं कितने अरमान पाल रखे थे दिल मे क्या मेरे वो सपने कोई लौटा सकता है? आप? आपके भाई? या फिर वो बच्छे जिन्हें अंगुली पकड कर चलना सिखाया। 2 साल का था सब से छोटा --- 9 साल का सब से बडा। क्या कभी उन्हों ने आ कर पूछा है आपका हाल बल्कि सारी उम्र मेरे पास रहे और जब नौकरियां लग गयी शादियाँ हो गयी तो अपने बाप के पास चले गये। अब रास्ते मे देख कर मुँह फेर लेते है।
कैर हम दिल का रिश्ता तो कभी बना नही पाये। सपने जो दिल के रिश्तों के साक्षी थी कब के टूट गये हैं रिश्ता केवल आपने रखा अपने पति होने का। बिस्तर तक सिमटे रिश्ते की उम्र दूध के उफान की तरह होती है बिस्तर छोड और रिश्ता खत्म। एक अभिशाप की तरह था मेरे लिये वो रिश्ता। मगर आज सब कुछ भूल कर हम एक नया रिश्ता तो कायम कर सकते हैं--- एक दूसरे के आँसू पोंछने का रिश्ता---- सुख के साथी तो सभी बन जाते हैं मगर सच्चा रिश्ता तो वही है जो दुख मे काम आये--- निभे-- । और मैने उनका आखिरी आँसू अपनी हथेली पर समेट लिया एक नये अटूट रिश्ते को सींचने के लिये। समाप्त।

11 August, 2010

कसौटी रिश्ते की

कसौटी रिश्ते की --कहानी
उनकी आँखों से आँसूओं का सैलाब थमने का नाम ही नही ले रहा था।मै उनको रोकना भी नही चाहती थी------- आज उनके दर्द को बह जाने देना चाहती थी। ., मैने तो एक दर्द के लिये भी सैंकडों आँसू बहाये हैं, पर इस कर्मनिष्ठ इन्सान ने सैंकडों दर्द सह कर भी कभी एक आँसू नही बहाया-----दर्द का एक एक टुकडा परत दर परत दिल मे दबाते रहे---पर आज एक टुकडा नही पूरा दिल ही जैसे पिघल कर बाहर आने को था--- और जब तक दर्द बाहर न आये उसकी टीस सालती रहती है। इनका दर्द उन अपनो के कारण था जिन के सर पर इन्होंने अपने वज़ूद का आस्मां ताने रखा-- जिस घर की मिट्टी से लेकर इन्सानो तक को इन्होंने प्यार और कुर्बानी के तकाज़ों से संवारा था। अपने अरमान, अपनी ज़िन्दगी के सुनहरी पल ,जवानी के सपने सब उन्हें सौंप दिये थे। आज उन्हीं भाईयों ने इन्हें बाहर का रास्ता दिखा दिया था। जिन भाईयों पर अपना सब कुछ लुटाया उन्हीं ने इन्हें लूट लिया था। जमीन के एक टुकडे के लिये कोई इतना खुद गर्ज़ हो सकता है सोचा नही था। हमे घर जमीन  मे से हिस्सा देना उन्हें गवारा नही था।
मैने उनकी जिम्मेदारिओं को कभी दिल से और कभी मजबूरी मे बाँटा था दिल से इसलिये कि परिवार के लिये हमारा जो फर्ज होता है उसे करना ही चाहिये। मजबूरी मे इस लिये कि कुछ बातें ऐसी होती हैं जिन्हे करने से अगर अपने सभी सपने जल कर खाक हो जायें और वो काम फिर भी करना पडे तो वो मजबूरी मे होता है। जब हम घर के ्रिश्तों मे संतुलन नही रख पाते तो ये स्थिती आ ही जाती है। आखिर मैं भी इन्सान ही थी।
मगर आज अपनी जिम्मेदारी दिल से निभाना चाहती थी उन्हें रुला कर ------क्यों कि मैं जानती थी इन आँसों के साथ बहुत कुछ बह जायेगा--- टीस कुछ कम हो जायेगी-----। आँसू कहीं थम न जायें---- मैने बात शुरू की
"अपको याद है अपनी ज़िन्दगी मे पहली तीन रातें ही अपनी थी। उसके बाद जो तूफान आये उसी मे सब कुछ बह गया।और  जो बचा वो आपके भाई साहिब के पाँच बच्चे--- जो हमारे साथ बन्ध गये--- कोई कैसे सोच सकता है कि नई दुलहन के साथ तीन तीन बच्चे सोयें और दूसरे दो साथ ही दूसरी चारपाई पर ? और उन तीन दिन के बाद ही मेरे सपने जो न जाने कितनी कुवाँरी रातों ने हसरत से संजोये थे,टूट गये। उस दिन मैं भी ऐसे ही रोयी थी,--- आपके और बच्चों के सो जाने के बाद खिडकी मे खडी  हो कर चाँद को देखती---- अपने सपने ढूँढती मगर न उनको आना था और न आये---।"  और दोनो की आँखें निरन्तर बरस रही थीं।
शादी के तीन दिन बाद् ये टूर पर चले गये फिर इनके एग्ज़ाम थे और मैं मायके चली गयी थी। अभी मै दोबारा ससुराल आने ही वाली थी कि अचानक मेरी जेठानी की मौत हो गयी। और उसकी चिता के साथ ही जल गये मेरे सारे सपने। उनके पाँच बच्चे थे। घर मे सास ससुर जेठ जी और एक देवर-- सब इकठे रहते थे। माँ जी अस्थमा की मरीज थी। घर का सारा बोझ एक दम मेरे ऊपर आ गया। जिस  लडकी ने मायके मे कभी रसोई मे कदम नही रखा था उसके लिये ये कितनी बडी परिक्षा थी? मायके मे भाभियाँ बहुत अच्छी थीं हमे अपने बच्चों की तरह प्यार करती थी-- काम को हाथ नही लगाने देती। बस शादी से पहले थोडा बहुत सीखा था।
जेठ जी ने जीते जी कभी पत्नि की परवाह नही की--- उसे मारते पीटते भी थे और वो इसी गम मे पागल हो गयी। लेकिन उसके मरने के बाद उसके गम मे डूबे रहते या शायद उसका गम नही बच्चों को पालने की चिन्ता थी मगर राम सरीखा भाई हो तो क्या मुश्किल है? घर के बाहर के बाकी सब कामों की जिम्मेदारी इन्होंने अपने कन्धों पर ले ली। घर मे एक मुर्गीखाना जिस मे 100 से अधिक मुर्गियाँ थीं अपना इन्कुबेटर था घर मे दो भैंसें एक गाय भी थी कोई सोच सकता है कि कितना काम होता होगा। फिर साथ मे नौकरी भी करनी ।जब कि माँजी अस्थमा के कारण अधिक काम नहीं कर पाती थी।
एक 20-22 वर्ष की दुबली पतली लडकी माँ बाप की राजकुमारी, शाही ज़िन्दगी से निकल कर एक छोटे से गाँव के अस्तव्यस्त घर मे जीने की कल्पना भी नही कर सकती। उस समय तो पिता जी ने सिर्फ लडके की नौकरी ,उनका भविष्य और जमीन जायदाद देख कर रिश्ता किया था मगर होनी को कुछ और ही मंजूर था।
मुझे आज भी याद है वो रात जब मुझे डोली से निकाल कर एक कमरे मे बिठाया गया। उस कमरे के एक कोने मे बाण की चारपाई पडी हुयी थी-- जिसमे से बाण की रस्सियाँ टूट टूट कर लटक रही थीं----- देखते ही मुझे लगा जैसे ये साँप लटक रहे हैं जो मुझे डस जायेंगे --- ज़िन्दगी भर उनका भय मेरे मानस पट पर छाया रहा। दूसरे कोने मे एक चक्की पडी हुयी थी--- मुझे आभास हो गया कि मेरी ज़िन्दगी इस चक्की के दोनो पाटों मे पिसने वाली है------। उस चक्की के पास चप्पलों के चार पाँच जोडे पडे थे उन्हें इतनी बेरहमी से रोंदा गया था कि उनमे छेद हो गये थे---- और ऐसे ही छेद मेरे दिल मे भी हो गये थे ----। कुछ दृ्ष्य पहले ही ज़िन्दगी का आईना बन जाते हैं----- मेरा भी यही ह्श्र होने वाला था। सब ने इन जूतों की तरह मेरे दिल मे छेद किये,खुशियों को डसा, और मेरे अधिकारों और कर्तव्यों के बीच ज़िन्दगी पिस कर रह गयी। भाई साहिब को दूसरी शादी इस लिये नही करने दी ताकि इन बच्चों का भविष्य सौतेली माँ के हाथों खराब न हो। मुझे ही सौतेली बना दिया।--- क्या पाँच बच्चों का बोझ एक 22--23 साल की कुंवारी लडकी उठा सकेगी ? ये क्यों नही सोचा?
खयालों को झटका लगा---,शायद इनके आँसू थमने लगे थे--- शायद उन्हें मेरे अन्दर चल रहे चलचित्र का आभास हो गया था फिर भी मर्द अपने उपर इल्जाम कब लेता है अपनी सफाई के लिये कुछ शब्द ढूँढ रहे थे---- मगर आज मुझे कोई सफाई नही चाहिये थी मै सिर्फ उन्हें रुलाना चाहती थी--- इसलिये नही कि मैं उनसे बदला लेना चाहती थी बल्कि इसलिये कि दोबारा रोने के लिये आँसू न बचें और उनका दर्द , नामोशी, पश्ताताप सब कुछ बह जाये।---
"अपको याद है आप और आपके घर वाले अपना बच्चा ही नही चाहते थे---- और माँ जी भी कहती ये बच्चे भी तो अब आपके ही हैं---- पालने वाले भी तो माँ बाप ही होते हैं अगर चाहो तो यशोदा जैसा प्यार मिल सकता है--- मगर एक औरत के अन्दर की माँ को किसी ने नही देखा। जब गलती से प्रेगनेंसी हुयी तो आप बच्चा गिराने पर जोर देने लगे।अपका तर्क था कि जिस माह बच्चे का जन्म होगा उस माह इन बच्चों के पेपर होंगे--- घर कौन सम्भालेगा? माँ जी बीमार रहती हैं?
और आपने अपने परिवार के प्रति निषठा निभाने के लिये मेरे ममत्व का खून करवा दिया---- दूसरों के बच्चों की खातिर मेरे बच्चे की बलि????????  ओह! आप  इतने कठोर हो सकते हैं?  मै विश्वास नही कर पाई मगर सच मेरे सामने था और उस दिन के बाद मैं पत्थर बन गयी। औरत सब कुछ सह सकती है मगर किसी की खातिर अपने बच्चे की बलि -- ये नही सह सकती और उस दिन से मैं पत्थर बन गयी। माँ बाप के संस्कार थे। सब कुछ सहन करने की शिक्षा मिली थी---- उनको लाज लगवाना नही चाहती थी मगर उस दिन के बाद ज़िन्दगी को एक लाश की तरह ढोया--- उस दिन के बाद मेरा दिल आपके लिये नही धडका----- बस अन्दर ही अन्दर जीने के लिये साँस लेता रहा---- नारी और क्या कर सकती है? समाज मे रहने के लिये उसे अपनी इच्छाओं का बलिदान देना ही पडता है। लेकिन आज कोई आपका भतीजा भतीजी किसी का एक ही बच्चा पाल कर दिखा दे तो समझूँगी कि मैने कोई बडा काम नहीं किया।" मैं बोले जा रही थी----
   मुझे नही याद कि कभी हम एक दूसरे से कभी दिल की कोई बात भी कर पाये कभी इकठे एक जगह अकेले मे बैठ  पाये । सिवा इसके कि आप अपना पति का हक नही भूले---- मगर फर्ज  जरूर भूल गये थे। आपके साथ लिपटे बच्चों को सोये देख कर न जाने कितने खून के आँसू पीती रही हूँ --- कई बार मन करता आप और मैं सिर्फ दोनों हो मगर कहाँ---- " बच्चों को आपसे लिपटे देख कर टीस उठती--- गुस्सा आता मगर बेबस थी आपसे कुछ कहती भी तो किस समय? मेरे लिये तो आपके पास वक्त ही नही था।
" फिर तीन साल बाद अपनी बेटी हुयी। शायद उसकी भी बलि दे दी जाती मगर मैने बताया बहुत देर से। नौकरी और घर परिवार के कामौ मे मेरे लिये उसे पालना मुश्किल हो गया। मै उसके साथ ये जिम्मेदारी नही निभा सकती थी इस लिये उसे मायके मे छोड दिया। किसी ने भी तीन साल मे उसकी सुध नही ली । छुट्टी वाले दिन उसे साईकिल की टोकरी मे आगे बिठा कर गाँव ले आती मगर आपने कभी उसे गोद मे उठा कर नही देखा होगा।हैरान हूँ कभी किसी ने उसके लिये एक खिलौना तक ला कर नही दिया। बस हफ्ते मे एक दिन मेरा उसके लिये नसीब होता था। कौन माँ अपने बच्चों को छोड कर दूसरों के बच्चे पालती है?अपको खेतों से नौकरी से मुर्गीखाने से और उन बच्चों की पढाई से समय मिलता तो कभी देखते कि मैं कैसे तिल तिल कर मर रही हूँ, बेमौत,--- मै भी अपने अधिकार चाहती थी। मानती हूँ कि हमे संयुक्त परिवार मे बहुत कुछ दूसरों के लिये करना पडता है--- अपने सुख छोडने पडते हैं मगर उनकी भी कोई तो हद होती होगी? लेकिन मेरे लिये कोई नही जिस हद तक मुझे सहन करना पडा उसे शायद ही कोई कर पाये।
 आज मै जब उन दिनो के बारे मे सोचती हूँ तो सिहर जाती हूँ। बिमार हूँ या ठीक काम करना ही होता था--- इतनी दुबली पतली लडकी पर कभी किसी ने रहम नही किया। सुबह चार बजे उठना पूरे परिवार का नाश्ता और दोपहर का खाना भी बना कर रखना पडता था । मेरे पडोसी मेरे बरतनों की खनखनाहट सुन कर जान जाते कि चार बज गये हैं। साईकिल चला कर नौकरी पर जाना। दोपहर को वहाँ से बच्चे को देखने जाना और फिर शाम को ड्यूटी के बाद साईकिल चला कर गाँव आना। दिन भर के बर्तन माँजने फिर रात के खाने के लिये जुट जाना। 11 बजे तक काम निपटा कर थकान से बुरा हाल होता, लेकिन इस बात की किसे परवाह थी। बदन दुखा तो अपने आप दर्द की गोली खा कर सो जाना। "
"ये तो बहुत बडी बडी बातें थी हमे तो एक छोटी सी खुशी भी नसीब नही होती थी। याद है रिश्तेदारी मे एक शादी पर जब मुझे भी सब के साथ जाने का सौभाग्य प्राप्त हुया था।"------ क्रमश

28 July, 2010

मेरी हालत आप खुद देख लें

 आज कल मेरा क्या हाल है, ये आप तस्वीर देख कर ही समझ सकते हैं।  बहुत् दिन से नेट से दूर हूँ। , समय नही निकाल पा रही हूँ। कुछ दिन के लिये मेरे घर मे एक परी आयी हुयी है। । अब आप खुद देखिये क्या ऐसे मे मै इसे छोड कर आपके बीच आ सकती हूँ? ।मुझे तो कँघी भी करने की फुरसत नही अगर कर भी लूँ तो भी बाल इसके हाथ मे आये नही कि बस ये हालत हो जाती है। बस हर वक्त ये चाहती है कि नानी के पास ही रहूँ? और  कहती है कि क्या आपको ब्लागिन्ग मुझ से अधिक प्यारी है? मै लाजवाब हो जाती हूँ। शैतान इतनी है कि झट से आवाज पहचान लेती है। बस मेरी आवाज सुनी नही कि कहती है नानी उठा लो। मोबाईल मे गीत सुन कर तो दूध पीती है। या फिर मै इसे लोरी सुनाती हूँ।   इस परी का नाम सावी है। मेरी सब से छोटी नातिन अभी पौने दो माहीने की है मगर मेरे कान कतर दे-- इतनी चालाक है। आज कल के बच्चे भला इतने चुस्त दुरुस्त कैसे होते हैं? पहले तो बच्चे सवा माह मे मुठी नही खोलते थे-- आँखें नही खोलते थे-- और एक ये है कि मुझ से आँख मिला कर बात करती है। कोई अच्छी सी लोरी आप भी लिख दो इसे सुनाऊँगी।
कुछ दिन मे फिर आपसे रूबरू होती हूँ । तब तक इसे आशीर्वाद दें।
हाँ दो तीन दिन पहले राजीव भरोल जी मुझे से मिलने आये थे वो आज कल कैलिफोर्निया मे रहते हैं ,अपने वतन आये तो मुझ से मिले बिना कैसे जा सकते थे? बहुत अच्छा लगा । राजीव धन्यवाद । एक दिन नीरज जाट जी का फोन आया था कि मै श्री नैना देवी के दर्शन करने आ रहा हूँ जाते हुये आपसे मिल कर जाऊँगा। उनका इन्तजार कर रही हूँ। उनको भी धन्यवाद और शुभकामनायें। बस कुछ दिन के लिये क्षमा चाहती हूँ फिर मिलती हूँ। धन्यवाद। हैपी ब्लागिंग।

15 July, 2010

हम कब सुधरेंगे?

हम कब सुधरेंगे?
श्री राज कुमार सोनी जी की यह कविता पढ कर मुझे एक बात  याद आयी
आज फिर किसी
गंदी बस्ती में
सिलाई मशीन बांटेगी

विधानसभा के सामने
रोपेंगी सडियल विचार का
एक पौंधा

वृद्धों के आश्रम जाकर वे
झुर्रीदार शरीर को
ओढाएगी कंबल

कुपोषण के शिकार
बच्चों को केला थमाकर
फोटो भी खींचवाना है उन्हें.

आनन्द मेले में भजिया-पकौड़ी
बेचने के बाद
जब थक जाएंगी
बड़े घर की औरतें
तब उनके मरद
उन्हें प्रभु भक्ति का महत्व समझाएंगे
और फिर वे बड़ी सी कार में
ढोलक लेकर निकल पड़ेंगी
भजन गाने के लिए

महाराज के प्रवचन से लौटकर
जब अपने गर्भवती होने का समाचार
हर किसी को बताएंगी
बड़े घर की औरतें तब...

तब...
झाडू-पौंछा करने वाली एक औरत
बताएंगी कि
साहब ने खुश होने के बाद
दिलवाई है नई साड़ी.
और.. घर की सदस्य बोलकर
अपने हाथों से पिलाया है मजेदार शरबत.

दोस्तों.. फिलहाल
बड़े घर की औरतें
दुनिया के महत्वपूर्ण कामों में
जुटी हुई हैं.

उन्हें उनके काम में
लगे रहने दिया जाए
हम कौन होते हैं उनके
काम मे खलल डालने वाले।----- श्री राज कुमार सोनी 
सोनी जी की ये कविता पढ कर मुझे अपने अस्पताल की एक बात  याद आ गयी। अस्पताल  भाखडा ब्यास मैनेजमेन्ट बोर्ड {बी. बी. एम. बी}  का है मगर अधिकतर  कर्मचारी पंजाब सरकार के हैं। पंजाब की हिस्सेदारी होने के कारण कुछ नियम पंजाब सरकार के चलते हैं। वहाँ जो मरीजों को खाना दिया जाता है वो पंजाब सरकार के तय माणिकों के अनुसार दिया जाता है-- जिसमे सिवा दाल रोटी और एक सब्जी के कुछ नही होता। बी. बी. एम. बी अपने रेडक्रास खाते से  कुछ गरीबों के लिये सहायता करती है और उस सहायता मे टी.बी. के मरीजों के लिये रोज़ एक एक अन्डा देने का प्रावधान है|

 रेड क्रास की मेम्बर लगभग  सभी बी. बी. एम . बी के अफसरों की बीवियाँ होती हैं। अपने अस्पताल मे भी रेड क्रास वाली औरतें आती थी। बेचारियों को सुबह 9 बजे अस्पताल आना होता था-- जो सब से कठिन काम था फिर भी कुछ बडा काम करने के लिये तकलीफ तो उठानी ही पडती है-- और वो 9.30 या 10 बजे तक जरूर पहुँच जाती थी। 3-4 मेम्बर्ज़   पहले घर से सरकारी गाडी मे सब को इकट्ठै करती--- फिर अस्पताल से एक दर्जा 4 कर्मचारी को लेती-- अब भला वो अफसरों की बीवियाँ है, वो  खुद थोडे ही अन्डे  उठायेंगी? । कर्मचारी को बुलाने मे कम से कम आधा घन्टा लग जाता-- उसे ले कर वो  बाजार जाती। वहाँ खुद अपनी खरीदारी करतीं और कर्मचारी उतनी देर तक अन्डे खरीद उनका इन्तजार करता। फिर अस्पताल आ कर वो अन्डों को उबालता और वो समाज सेविकायें पी. एम ओ के वातानुकूल कक्ष मे बैठ कर इन्तज़ार करती। जब अन्डे उबल जाते तो वो कर्मचारी के साथ  गाडी मे बैठ कर अधा किलो मीटर दूर टी बी वार्ड मे अन्डे बाँटने जाते। सभी रेड क्रास की मेम्बर्ज़ बाहर गाडी मे मुंह ढाँप कर बैठी रहती अखिर टी बी. के मरीजों से खुद को इन्फेक्शन होने का डर मन मे रहता और जब वो कर्मचारी सभी मरीजों को एक एक अन्डा दे कर आ जाता फिर उसे अस्पताल छोड कर किसी और जगह चली जाती। मरीज कितने होते थे--- 8 या 10। ये अफसरों की बीबियाँ ऐसे चोंचले करने मे माहिर होती हैं।ीअब आप सोचिये कि उनके रोज़ आने जाने पर कितना खर्च होता होगा ?
 पर गाडी बी. बी. एम. बी की है किसे परवाह है--- शायद जितना पेट्रोल खर्च होता होगा उतने मे पूरे अस्पताल के मरीजों को अन्डे मिल सकते थे। मगर ऐसे मे उनका रेडक्रास के लिये किया गया कार्य कैसे दिखता? फोटो कैसे अखबारों मे छपते?
हमारे एक अफसर ऐसे आये कि उन्हें इस से बडी कोफ्त महसूस होती उनकी बीवी भी् रेडक्रास की मेम्बर थी । उन्हें सब का रोज़ देर तक अपने दफ्तर मे बैठना अच्छा नही लगता था। मेहनती और अपने काम के प्रति बहुत सजग रहते थे। उन्हों ने खुद जा कर मैनेज मेन्ट के बडे अफसरों से बात की और रेडक्रास के अन्डे बन्द करवा कर  अस्पताल के नाम से एक फंड जारी करवा लिया और एक की बजाये हर मरीज को दो दो अन्डे मिलने लगे। शायद जब से अस्पताल बना था यही परंपरा चली आ रही थी। जब रेडक्रास का मेला लगता, तब तो इन बीवियों की पौ बारह होती। किसी और को स्टाल ऐलाट नही होते अगर होते तो नाम किसी अफ्सर की बीवी का ही होता। काम सारा का सारा कर्मचारी करते। 10 दिन पहले ही बी बी एम बी की कई गाडियाँ, कर्मचारी, मेले की तैयारी मे लग जाते।जितना पैसा इस मेले को लगाने मे लगता  है उतना शायद रेड क्रास का पूरा बजट होगा। मगर नाम अफसर की बीवी का  कैसे हो?  वो गर्व से ईनाम ले कर घर जाती। देश ाइसी समाज सेवा ,फिजूल खर्ची और अफसरों के ऐसे कामों से कब  मुक्ति पायेगा?  आखिर ये भार कौन वहन करता है? इस से अच्छा क्यों  न सरकार  अफसरों  की बीविओं के नाम एक फंड जारी कर दे मौज मस्ती के लिये या कुछ गाडियाँ अधिकारित तौर पर उनके नाम कर दे? किटी पर्टियों मे भी कहने को उनका खर्च होता है मगर इसमे भी बहुत सा खर्च सरकारी होता है जैसी शापिन्ग मे गाडियाँ, काम के लिये सरकारी कर्मचारी । ऐसी संस्थाओं या ऐसे  सहायता कार्यों, अनुदान आदि का क्या औचित्य है? कब सुधरेंगे हम।

13 July, 2010

गज़ल

कुछ दिन से मेरे ब्लाग पर पूरे कमेन्ट पोस्ट नही होते --मुझे मेल आती है कि कमेन्ट किया था मगर पोस्ट पर नही दिखा। और मैं भी कई बार  किसी की पोस्ट पर कमेन्ट करती हूँ तो दोबारा देखती हूँ तो कमेन्ट वहाँ नही होता। क्या और भी किसी के ब्लाग पर ये प्राबलम है। अगर नही तो मेरे ब्लाग पर क्यों है क्या कोई बता सकता है? देखिये और साथ ही श्री प्राण शर्मा जी की एक प्यारी से गज़ल पढिये------

गज़ल।
कैसे कैसे शौक मन मे मै जगाया करता हूँ
कागज़ों की कश्तियाँ जल मे बहाया करता हूँ

जानता हूँ मै हवा के सरफिरे झोंके मगर
ताश के पत्तों के फिर भी घर बनाया करता हूँ

थोडी है सादा दिली और थोडी है मुझ मे अदा
इसलिए मै ज़िन्दगी को रास आया करता हूँ

क्यों न ओढूँ नित सच्चाई को सवेरा होते ही
रात भर माना कि मैं सपने सजाया करता हूँ।

काम कानों का भी करते हैं नयन ए दोस्तो
इस लिए मैं गीत बहरों को सुनाया करता हूँ

प्राण कंजूसी दिखाऊँ ये कभी मुमकिन नहीं
मैं खजाने प्यार के खुल कर लुटाया करता हूँ

10 July, 2010

अनन्त आकाश्


अनन्त आकाश-- भाग-- 4
पिछली कडी मे आपने पढाकि मेरे घर के आँगन मे पेड पर कैसे चिडिया और चिडे का परिवार बढा और कैसे उन्हों ने अपने बच्चों के अंडों से निकलने से ले कर उनके बडे होने तक देख भाल की---- पक्षिओं मे भी बच्चों के लिये इस अनूठे प्यार को देख कर मुझे अपना अतीत याद आने लगता है। ब्च्चों को कैसे पढाया लिखाया ।वो विदेश चले गयी बडे ने वहीं शादी कर ली पिता पुत्र की नाराज़गी मे माँ कैसे पिस रही है--| बडे बेटे के बेटा हुया तो उसने कहा माँ आ जाओ हमे आपकी जरूरत है। मगर तब भी ये जाने को तैयार नही हुये। मन उदास रहने लगा।-- अब आगे पढें-----

"राधा ऐसा करो तुम बेटे के पास हो आओ मै टिकेट बुक करवा देता हूँ। तुम्हारा मन बहल जायेगा। मगर मैं नही जाऊँगा।" 

" अकेली? मै आपके बिना क्यों जाऊँ? नही नहीं।"
 "मै मन से कह रहा हूँ। गुस्सा नही हूँ। बस मेरा मोह टूट चुका है और तुम अभी मोह त्याग नही पा रही हो। जानता हूँ वहाँ विदेशी बहु के पास भी अधिक दिन टिक नही पाओगी।इस लिये नही चाहता था कि तुम जाओ।।"
"सोचूँगी।" कह कर मै काम मे लग गयी।
रात भर सोचती रही-- इनकी बातें भी सही थी-- फिर क्या करूँ यही सोचते नींद आ गयी। कुछ दिन इसी तरह निकल गये। मगर कुछ भी निर्णय नही ले पाई। कई बार इन्हों ने पूछा भी मगर चुप रही 

उस दिन  ये सुबह काम पर चले गये और मै चाय का कप ले कर बरामदे मै बैठ गयी। चिडिया के बच्चे अब चिडिया के बच्चे उडने लगे थे मगर दूर तक नही जाते। चिडिया उनके पास रहती और चिदा अकेला दाना चुगने जाता था।  कितना खुश है ये परिवार फिर अपना ही क्यों बिखर गया। सोचते हुये आँख भर आयी।्रात को ये खाना खा रहे थे---
"देखो राधा मै मन से कह रहा हूँ तुम चली जाओ। मेरी चिन्ता मत करो। मै कोई न कोई इन्तजाम कर लूँगा। न हुया तो कुछ दिन की बात है मै़ ढाबे मे खा लूँगा। आज सोच कर मुझे बता देना कल टिकेट बुक करवा दूँगा।"
मै फिर कुछ न बोली। रात भर सोचती रही। सोच मे चिडिया का घोंसला आ जाता--  चिडिया कैसे घोंसले के पास बैठी रहती--- देखते देखते बच्चे फुदकने लगे हैं---चिडिया उन्हें चोंच मारना खाना और उडना सिखाती----धीरे धीरे जब वो पँख फैलाते तो चिडिया खुश होती--- हम भी ऐसे ही उनको बढते पढते देख कर खुश होते थे----- अब मुझे लगता कि चिडिया की खुशी मे एक पीडा भी थी-- अब उडने लगे हैं --- हमे छोड कर चले जायेंगे-----
आज वही पीडा सामने आ रही थी---
आज मैने देखा चिडा चिडिया और बच्चे इकट्ठे बैठे हुये हैं----चोंच से चोंच मिला कर बात कर रहे हैं--- "चीँ  चेँ चीं" चिडिया चिडे की आवाज़ मे उदासी थी।
" चीं  चेँ  चेँ" मगर बच्चों की आवाज मे जोश था--और उसी जोश से वो उड गये दूर गगन मे---
"चाँ चाँ चाँ----- बच्चो हम इन्तजार करेंगे लौट आना।" चिडिया की आवाज़ रुँध गयी थी। दोनो उदास ,सारा दिन कुछ नही खाया।मौसम बदल गया था प्रवासी पक्षियों का आना भी  सतलुज के किनारे होने लगा था। गोविन्द सागर झील के किनारों पर रोनक बढ गयी थी।
थोडी देर बाद चिडा चिडिया की चोंच से चोंच मिला कर चीँ चेँ चेँ कर रहा था---
"चीँ चीं चीं --रानी ऐसा कब तक चलेगा?बच्चे कब तक हमसे चिपके रहते? आखिर हम भी तो ऐसे ही उड आये थे। उनका अपना संसार है उन्हें भी हमारी तरह अपना घर बसाना है-- जो सब के साथ होता है वही अपने साथ हुया है। चलो सतलुज के किनारे चलते हैं। दूर दूर से हमारे भाई बहिन आये हैं उनका दुख सुख सुनते है।।" चिडे ने प्यार से चिडीया के परों को चोंच से सहलाया और दोनो सागर किनारे उड गये।
 हाँ ठीक ही बात है-- सारा देश अपना है लोग अपने हैं बस सोच कर उन्हें प्यार से अपनाने की बात है---
  मेरे भी आँसू निकल गये थे पोंछ् कर  सोचा कि यही संसार का नियम है तो फिर क्यों इतना मोह? आखिर कब तक बच्चे हमारे पल्लू से बन्धे रहेगे। आज कल नौकरियाँ भी ऐसी हैं कहां कहाँ उनके साथ भागते फिरेंगे?। चिडे चिडिया ने जीवन का सच सिखा दिया था।मुझे भी रिटायरमेन्ट के बाद जीने का रास्ता मिल गया था।
 सुबह जब नाश्ता कर के बस्ती मे जाने के लिये तैयार हुये तो मैं बोल पडी--
" मुझे भी अपने साथ ले चलें।"
"क्या सच?" इन्हें सहज ही विश्वास नहीं हुया। इनकी खुशी का ठिकाना नही था। इनकी आँखों मे संतोश की झलक देख कर खुशी से हुयी । बच्चों के मोह मे हम दोनो के बीच एक दूरी सी आ गयी थी -- आज उस दूरी को पाट कर हम दोनो एक हो गये थे---  मैं भी चिडिया की तरह उडी जा रही थी इनके साथ अनन्त आकाश की ओर---। समाप्त




08 July, 2010

आनन्त आकाश

अनन्त आकाश--भाग -3
पिछली कडी मे आपने पढाकि मेरे घर के आँगन मे पेड पर कैसे चिडिया और चिडे का परिवार बढा और कैसे उन्हों ने अपने बच्चों के अंडों से निकलने से ले कर उनके बडे होने तक देख भाल की---- पक्षिओं मे भी बच्चों के लिये इस अनूठे प्यार को देख कर मुझे अपना अतीत याद आने लगता है। ब्च्चों को कैसे पढाया लिखाया ।वो विदेश चले गयी बडे ने वहीं शादी कर ली पिता पुत्र की नाराज़गी मे माँ कैसे पिस रही है-- अब आगे पढें-----

बेटे के बेटा होने की खुशखबरी जब इन्हें सुनाई इनके चेहरे पर खुशी की एक किरण भी दिखाई नही दी--- मैने बात आगे बढाने की कोशिश की---
:" देखिये बहु भी अभी बच्ची ही है वो अकेली कैसे बच्चे को सम्भालेगी? इस समय उन्हें हमारी जरूरत है हमे जाना चाहिये"। मैने डरते हुये इनसे कहा। मगर वही बात हुये इनको गुस्सा आ गया--
"हाँ आज उन्हें हमारी जरूरत है तो हम जायें मगर बहन की शादी पर हमे भी तो उसकी जरूरत थी तब क्यों नही आया था।"
तब उसे गये समय ही कितना हुया था हो सकता है कि उसके पास तब इतने पैसे ही न हों फिर उसने कहा भी था कि इतनी जल्दी मै नही आ सकता आप शादी की तारीख छ: आठ माह आगे कर लें मजबूरी थी उसकी।" मैने बेटे का पक्ष लेने की कोशिश की।
"देखो मै तुम्हें नही रोकता तुम्हें जाना है तो जाओ मगर मैं अभी नही जा सकता। तुम देख रही हो मै बीमार हूँ बी पी कितना बढ रहा है। फिर वहाँ कुछ हो गया तो उनके लिये मुसीबत हो जायेगी। मुझे फिर कभी कहना भी नही मैने मन को पक्का कर लिया है । उनके बिना भी जी लूँगा ।वो वहीं मौज करें।"
गुस्सा इनका भी सही था। मगर माँ का दिल अपनी जगह सही था। माँ भी किस तरह कई बार बाप और बच्चों के बीच किस को चुने वाली स्थिती मे आ जाती है
 पति की बात जितनी सही लगती है बच्चों की नादानी उतनी ही छुपाने की कोशिश मे खुद पिस जाती है। भारतीय नारी के लिये पति के उसूल बच्चों की मोह ममता पर भारी पड जाते हैं। मै भी मन मसूस कर रह गयी । समझ गयी कि अब बेटा हाथ से गया। अगर अब हम चले जाते तो भविष्य मे आशा बची रहती कि वो कभी लौट आयेगा। अब शायद वो भी नाराज़ हो जाये।

मन आज कल उदास रहने लगा था। जब से रिटायर हुयी हूँ तब से तो बहुत अकेली सी पड गयी हूँ।पहले तो स्कूल मे फिर भी दिल लगा रहता था। चार लोगों मे उठना, बैठना, दुख सुख बँट जाते थे। अब घर मे अकेलापन सालता रहता है बच्चों की याद आती है छुप कर रो लेती हूँ। मगर ये जब से रिटायर हुये हैं इन्हों ने एक नियम सा बना लिया है-- सुबह उठ कर सैर को जाना,नहा धो कर पूजा पाठ करना ,फिर नाश्ता कर के किसी गरीब बस्ती की ओर निकल जाना। वहाँ गरीब बच्चों को इक्ट्ठा कर के पढाना और सब की तकलीफें सुनना ,ागर किसी के काम आ सके तो आना।दोपहर को आराम करना फिर शाम को सैर,पूजा पाठ, खबरें सुनना खाना खा कर टहलना और सो जाना। मगर मै कुछ आलसी सी हो गयी थी। मै अभी अकेलेपन की ज़िन्दगी और बच्चों के मोह से अपने आप को एडजस्ट नही कर पा रही थी।---
" क्या बात है आज नाश्ता पानी मिलेगा कि नहीं।"इनकी आवाज़ सुन कर मै वर्तमान मे लौटी। पक्षी अभी भी चहचहा रहे थे।
नाश्ता बना कर इनके सामने रखा और खुद भी वहीं बैठ गयी।
"ापना नाश्ता नही लाई क्या आज नाश्ता नही करना है।"
"कर लूँगी, अभी भूख नही।"
ये कुछ देर सोचते रहे फिर बोले--
"राधा,तुम सारा दिन घर मे अकेली रहती हो-- मेरे साथ चला करो। तुम्हारा समय भी पास हो जायेगा और लोक सेवा भी।"
" सोचूँगी--- अपने बच्चों के लिये तो कुछ कर नही पाई, बेचारों को मेरी जरूरत थी। आखिर मे कन्धे पर तो वो ही उठा कर ले जायेंगे।" मन का आक्रोश फूटने को था।
मुझे किसी से उमीद नही जो देखना है जिन्दा रहते ही देख लिया मर कर कौन देखता है। बाके कन्धे की बात  तो जब मर ही गये तो कोई भी उठाये नही उठायेंगे तो जब पडौसियों को दुर्गन्ध आयेगी तो अप-ाने आप उठायेंगे। मै इन बातों मे विश्वास नही करता।"
मेरी आँखें बरसने लगी और मै उठ कर अन्दर चली गयी। ये नाश्ता कर के अपने काम पर चले गये।"
रात को जब खाना खाने बैठे तो बोले---
"राधा ऐसा करो तुम बेटे के पास हो आओ मै टिकेट बुक करवा देता हूँ। तुम्हारा मन बहल जायेगा। मगर मैं नही जाऊँगा।"  क्रमश:

05 July, 2010

अनन्त आकाश भाग --2

अनन्त आकाश भाग-- 2

 पिछली  किशत मे आपने पढा कि मेरे घर के आँगन मे पेड पर कैसे चिडिया और चिडे का परिवार बढा और कैसे उन्हों ने अपने बच्चों के अंडों से निकलने से ले कर उनके बडे होने तक देख भाल की---- पक्षिओं मे भी बच्चों के लिये इस अनूठे प्यार को देख कर मुझे अपना अतीत याद आने लगता है। अब आगे पढें------
इधर उधर से पक्षी आते और छत पर पडा लड्डूओं का चूरा खाते और उड जाते। आज चिडिया के बच्चों के जन्म के साथ आँगन मे कितनी रौनक आ गयी थी।
ऐसी ही रौनक अपने घर मे भी थी जब हमारे बडा बेटा हुया था। मेरी नौकरी के कारण मेरे सासू जी भी यहीं आ गये थे। स्कूल से आते ही बस व्यस्त हो जाती। हम उसे पा कर फूले नही समा रहे थे अभी से कई सपने उसके लिये देखने लगे थे। इसके बाद दूसरा बेटा और फिर एक बेटी हुयी। तीन बच्चे पालने मे कितने कष्ट उठाने पडे ,ये सोच कर ही अब आँखें भर आती कभी कोई बच्चा बीमार तो कभी कोई प्राबलेम । जब कभी सासू जी गाँव चली जाते तो कभी छुट्टियाँ ले कर तो कभी किसी काम वाले के जिम्मे छोड कर इन्हें जाना पडता ।  अभी बेटी 6 माह की हुयी थी कि सासू जी भी चल बसीं। बच्चों की खातिर मुझे नौकरी छोडनी पडी।उस दिन मुझे बहुत दुख हुया था। मेरी बचपन से ही इच्छा थी कि मै स्वावलम्बी बनूँगी-- मगर हर इच्छा कहाँ पूरी होती है! इनका कहना था कि आदमी अपने परिवार के लिये इतने कष्ट उठाता है अगर अच्छी देख भाल के बिना बच्चे ही बिगड गये तो नौकरी का क्या फायदा । मुझे भी इनकी इस बात मे दम लगा। मगर  बच्चे कहाँ समझते हैं माँ बाप की कुर्बानियाँ  ।उन्हें लगता है कि ये माँ बाप का फर्ज़् है बस। मै नौकरों के भरोसे बच्चों को छोडना नही चाहती थी। हम जो आज़ाद पँछी की तरह हर वक्त उडान पर रहते अब बच्चों के कारण घर के हो कर रह गये।

बच्चे स्कूल जाने लगे ।छोटी बेटी भी जब पाँचवीं मे हो गयी तो लगा कि अब समय है बच्चे स्कूल चले जाते हैं और मै नौकरी कर सकती हूँ। वैसे भी तीन बच्चों के पढाई एक तन्ख्वाह मे क्या बनता है। भगवान की दया से एक अच्छी नौकरानी भी मिल गयी। मैने भाग दौड कर एक नौकरी ढूँढ ली। पता था कि मुश्किलें आयेंगी-- घर परिवार-- और-- नौकरी -- बहुत मुश्किल काम है। मगर मैने साहस नही छोडा बच्चों को अगर उच्चशिक्षा देनी है तो पैसा तो चाहिये ही था।

बच्चे पढ लिख गये बडा साफट वेयर इन्ज्नीयर बना और अमेरिका चला गया दूसरा भी स्टडी विज़ा पर आस्ट्रेलिया चला गया। बेटी की शादी कर दी।हम दोनो बच्चों के विदेश जाने के हक मे नही थे मगर ये विदेशी आँधी ऐसी चली है कि बच्चे पीछे मुड कर देखते ही नही जिसे देखो विदेश जाने की फिराक मे है। बच्चे एक पल भी नही सोचते कि बूढे माँ बाप कैसे अकेले  रहेंगे-- कौन उनकी देखभाल करेगा।कितना खुश रहते हम बच्चों को देख कर। घर मे चहल पहल रहती। कितना भी थकी होती मगर बच्चों के खान पान मे कभी कमी नहीं रहने देती। खुद हम दोनो चाहे अपना मन मार लें मगर बच्चों को उनके पसंद की चीज़ जरूर ले कर देनी होती थी। छोटे को विदेश भेजने पर इनको जो रिटायरमेन्ट के पैसे मिले थे लग गयी ।कुछ बेटी की शादी कर दी। घर बनाया तो लोन ले कर अब उसकी किश्त कटती थी ले दे कर बहुत मुश्किल से साधारण रोटी ही नसीब हो रही थी।
मगर बच्चों को इस बात की कोई चिन्ता नही थी।बच्चों के जाने से मन दुखी था। मुझे ये भी चिन्ता रहती कि वहाँ पता नही खाना भी अच्छा मिलता है या नही-- कभी दुख सुख मे कौन है उनका वहाँ दिल भी लगता होगा कि नही। जब तक उनका फोन नही आता मुझे चैन नही पडती। हफते मे दो तीन बार फोन कर लेते।
बडे बेटे के जाने पर ये उससे नाराज़ थे। हमारी अक्सर इस बात पर बहस हो जाती। इनका मानना था कि बच्चे जब हमारा नही सोचते तो हम क्यों उनकी चिन्ता करें। जिन माँ बाप ने तन मन धन लगा कर बच्चों को इस मुकाम पर पहुँचाया है उनके लिये भी तो बच्चों का कुछ फर्ज़ बनता है। वैसे भी बच्चों को अपनी काबलीयत का लाभ अपने देश को देना चाहिये। मगर मेरा मानना था कि हमे बच्चों के पैरों की बेडियाँ नही बनना चाहिये। बडा बेटा कहता कि आप यहाँ आ जाओ -- मगर ये नही माने--- हम लोग वहाँ के माहौल मे नही एडजस्ट कर सकते।

 बडे बेटे ने वहाँ एक लडकी पसंद कर ली और हमे कहा कि मै इसी से शादी करूँगा। आप लोग कुछ दिन के लिये ही सही यहाँ आ जाओ। मगर ये नही माने। उसे कह दिया कि जैसे तुम्हारी मर्जी हो कर लो। दोनो पिता पुत्र के बीच मेरी हालत खराब थी किसे क्या कहूँ? दोनो ही शायद अपनी अपनी जगह सही थे। उस दिन हमारी जम कर बहस हुयी।---

"मै कहती हूँ कि हमे जाना चाहिये। अब जमाना हमारे वाला नही रहा। बच्चे क्यों हाथ से जायें?"

" वैसे भी कौन सा अपने हाथ मे हैं-- अगर होते तो लडकी पसंद करने से पहले कम से कम हमे
पूछते तो ?बस कह दिया कि मैने इसी से शादी करनी है आप आ जाओ। ये क्या बात हुयी?"

" देखो अब समय की नज़ाकत को समझो। जब हम अपने आप को नही बदल सकते , वहाँ एडजस्ट नही कर सकते तो बच्चों से क्या आपेक्षा कर सकते हैं फिर हमने अपनी तरह से जी लिया उन्हें उनकी मर्ज़ी से जीने दो। फिर हम भी तो माँ बाप को छोड कर इस शहर मे आये ही थे!"

" पर अपने देश मे तो थे।जब मर्जी हर एक के दुख दुख मे आ जा सकते थे। वहाँ न मर्जी से कहीं आ जा सकते हैं न ही वहाँ कोई अपना है।"

कई बार मुझे इनकी बातों मे दम लगता । हम बुज़ुर्गों का मन अपने घर के सिवा कहाँ लगता है? जो सुख छजू दे चौबारे वो न बल्ख न बुखारे। मै फिर उदास हो जाती । बात वहीं खत्म हो जाती।
एक दिन इन्हों ने बेटे से कह दिया कि हम लोग नही आ सकेंगे  तुम्हें जैसे अच्छा लगता है कर लो हमे कोई एतराज़ नही।  मै जानती थी कि ये बात इन्होंने दुखी मन से कही है।
बेटे ने वहीं शादी कर ली। और हमे कहा कि आपको एक बार तो यहाँ आना ही पडेगा। इन्हों ने कहा कि मेरी तबीयत ठीक नहीं वहाँ तुम मेडिकल का खर्च भी नही उठा पाओगे, आयेंगे जब तबीयत ठीक होगी। बेटा चुप रह गया। मगर मै उदास रहती । एक माँ का दिल बच्चों के बिना कहाँ मानता है? छोटे को अभी दो तीन वर्ष और लगने थे पढाई मे उसका भी क्या भरोसा कि वो भी यहाँ वापिस आये या न।
एक साल और इसी तरह निकल गया। बेटे के बेटा हुया। उसका फोन आया तो मारे खुशी के मेरे आँसू निकल गये।उसने कहा कि माँ हमे जरूरत है आपकी आप कुछ दिन के लिये आ जाओ।
इन्हें खुशखबरी सुनाई मगर इन के चेहरे पर खुशी की एक किरण भी दिखाई नही दी।----- क्रमश:

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