02 March, 2010

सच्ची साधना
{आखिरी किश्त }
pपिछली किश्तों मे आपने पढा कि शिव दास कैसे साधू बना और उसे फिर भी सँतुष्टी नही मिली तो वापिस अपने गाँव लौटा। जहाँ उसे राम किशन { अपने बचपन के दोस्त} का जीवन और लोक सेवा देख कर उसे कैसे बोध हुया कि सच्ची साधना वो नही जो वो कर रहा था सच्ची साधना तो वो है जो रामकिशन कर रहा है। वो ध्यान से देख रहा है रामकिशन की दिनचर्या को अब  आगे पढिये-------

शिवदास तुम हाथ मूंह धोलो तुम्हारा खाना आता ही होगा ।‘‘रामकिशन बोले

आठ बजे वही लडका  कर्ण खाना लेकर आ गया । वह बर्तन उठा कर खाना डालने लगा था कि रामकिशन ने रोक दिया ।

‘‘ तुम जाओ मैं डाल लूँगा । रामकिशन ने उसे जाने के लिये कहा।

‘‘ गुरू जी, माँ ने कहा है कि आप भी खीर जरूर खाना, हवन का प्रसाद है । कर्ण ने जाते हुए कहा ।

‘‘ठीक है, खा लँूगा । वो हंस पड़े । हर बार जब खीर भेजती है तो यही कहती है ताकि मैं खा लूँ ।

रामकिशन ने नीचे दरी के उपर एक और चटाई बिछाई, दो पानी के गिलास रखें और दो थालियों में खाना डाल दिया। एक मे  सब्जी, दाल, दही तथा खीर थी  दूसरी मे खिचडी । शिवदास चटाई पर आकर बैठ गए तो राम किषन ने बड़ी थाली उसके आगे सरका दी ।

‘‘ यह क्या ? तुम केवल खिचड़ी खाओगे ?‘‘

‘‘ हाँ, में रात को फीकी खिचड़ी खाता हूँ। ‘‘

‘‘ मैं भी यही खिचड़ी खा लेता ।‘‘

‘‘ अरे नहीं .... बड़े-बडे भक्तों के यहाँ स्वादिष्ट भोजन कर तुम्हें खिचड़ी कहाँ स्वादिष्ट लगेगी । फिर मैं किसी के हाथ से खाना बनवा कर नही खाता । अपना खाना खुद बनाता हूँ । मगर क्या तुम अपनी पत्नि के हाथ का बना खाना नही खाओगे ?‘‘

‘‘ पत्नी के हाथ का ?‘‘

‘‘ हां, जब भी मेरा कोई मेहमान आता है तो भाभी ही खाना बनाकर भेजती है ।‘‘

शिवदास के मन में बहुत कुछ उमड़ घुमड़ कर बह जाने को आतुर था । क्या पाया उसने घर बार छोड़कर ? शायद इससे अधिक साधना वह घर की जिम्मेदारी निभाते हुए कर लेता या फिर शादी ही न करता .... एक आह निकली । पत्नी के हाथ का खाना खाने का मोह त्याग न पाया .....वर्षों बाद इस खाने की मिठास का आनन्द लेने लगा ।

खाना खाने के बाद दोनों बाहर टहलने निकल गए । रामकिशन ने उसे सारा आश्रम दिखाया । रात के नौ बज चुके थे । बहुत से बच्चे अभी लाईब्रेरी में पढ रहें थे । दूसरे कमरे में कुछ बच्चों को एक अध्यापक पढा रहे थे । वास्तव में रामकिशन ने बच्चों व युवकों के सर्वांगीण विकास व कर्मशीलता का विकास किया है। वह प्रशसनीय कार्य है।

साढे नौ बजे दोनो कमरे में वापिस आ गए । रामकिशन ने अपना बिस्तर नीचे फर्ष पर लगाया और पुस्तक पढने बैठ गए ।

‘‘तुम उपर बैड पर सो जाओ, मैं नीचे सो जाता हूंँ ।‘‘ रामकिशन  बोले,
" नहीं नहीं, मैं नीचे सो जाता हूँ" शिवदास ने कहा
" नही शिवदास मैं रोज़ नीचे ही सोता हूँ। तुम्हें आदत नही होगी आश्रम मे तो गद्देदार बिस्तर होंगे।" 

सच में रामकिशन हर बात में उससे अधिक सादा व त्यागमय जीवन जी रहा है । मैने तो भगवें चोले के अंदर अपनी इच्छाओं को दबाया हुआ है मगर रामकिशन ने सफेद उज्जवल पोषाक की तरह अपनी आत्मा को ही उज्जवल कर लिया है ।

‘‘ अब तुम्हारा क्या प्रोग्राम है ?‘‘

‘‘प्रोग्राम?‘‘ वह सोच से उभरा.....‘‘ कुछ नही। कल चला जाऊँगा ।‘‘

‘यहीं क्यों नही रह जाते ? मिल कर काम करेंगे ।‘‘

‘‘ नही दोस्त, मैं अपने परिवार को कुछ दे तो न सका अब उन्हेने  स्वयं अर्जित सुख का सासँ लिया है उसमें खलल नहीं डालूँगा, उनकी शाँति भंग नही करूँगा । किस मुँह से जाऊँगा उनके सामने? जाने -अनजाने किए पापों का प्रायष्चित  करना चाहता हूँ । याद है मैने तुमसे कहा था कि जब जीवन को समझ  न पाऊँगा तो तुम्हारे पास ही आऊँगा । जो कुछ मैं इतने वर्षों मे न  सीख पाया वह आत्मबोध वो ग्यान  मुझे तुम्हारा जीवन देखकर मिला है । मैं तो योगी बनने का कर भगवान को याद करता रहा मगर उनके उद्देश्य को भूल गया और साधु वाद के मायाजाल में फँसा रहा या यूँ कहें कि जहाँ से चला था वहीं खडा हूँ।

‘‘लेकिन तुम जाओगे कहाँ ? आश्रम भी तुमने छोड़ दिया है ? जीवन - यापन के लिए भी तुम्हारे पास कुछ नही ।‘‘

‘‘ तुम से जो कर्मशीलता और आत्मबल की सम्पति लेकर जा रहा हूँ उसी से तुम्हारे अभियान को आगे ले जाऊँगा । इस दुनियाँ में अभी बहुत अच्छे लोग है जो मानवता के लिए कुछ करना चाहते हैं, उनकी सहायता लँूगा ।‘‘

बातें करते-करते दोनो कुछ देर बाद सो गए । सुबह तीन बजे ही शिवदास की आँख खुली । वह चुपके से उठा नहा-धोकर तैयार होता तो राम किशन की आँख खुल जाती । वह रामकिशन के उठने से पहले निकल जाना चाहता था । एक बार उसका मन  हुआ कि अगर आज रूक जाए तो किसी बहाने अपनी पत्नि और छोटे बेटे को भी देख लेता ...... मगर उसने विचार त्याग दिया... यह तड़प ही उसकी सजा है.... । उसने चुपके से अपना सामान उठाया और धीरे से दरवाज़ा खोलकर बाहर निकल गया ।

बाहर खुले आसमान चाँद तारों की -झिलमिल रोशनी में वह पगडण्डी पर बढा जा रहा था । पाँव के नीचे पेड़ों के -झडे सूखे  पत्तों की आवाज आज उसे संगीतमय लगी । इस धुन से उसके पैरों में गति आ गई ... और वह अपने साधना के उज्जवल भविष्य के कर्तव्य-बोध से भरा हुआ चला जा रहा था  ..... सच्चा साधू बनने ---- सच्ची साधना के लिये।-------- समाप्त

28 February, 2010

हज़ल

हज़ल
होली की आप सब को हार्दिक शुभकामनायें
आज कहानी की आखिरी किश्त  बीच मे रोक कर  अपने छोटे भाई पंकज सुबीर के आदेश पर ये हज़ल पेश कर रही हूँ आप जानते हैं कि रिटायरी कालोनी मे तो होली मनाई नही जाती, तो हमने सोचा कि  पंकज सुबीर के मुशायरे मे चलते हैं लेकिन वहाँ जा कर क्या हाल हुया ये आप सब देख लें । इस भाई ने तो मुझे वो जूते पडवाये कि बस पूछो न। लेने के देने पड गये । कहते कि हज़ल लिखो बाप रे इतनी मुश्किल बहर दे दी मगर हम भी कहाँ कम थे---दे तडा तड वो जूते बरसाये कि होली का आनन्द आ गया हमे कहा कि खूब गोबर जूतों का इस्तेमाल करो। तो आप देखिये कैसे खेली हम ने होली।  पहली बार हज़ल लिखी है बुरा न मानो होली है। मिसरा था-----

उतारो जूतों से आरती अब सनम जी आये गली हमारी
छोटे भाई  ने पता नही किस जन्म का बदला लिया। पतिदेव ने पढ कर हमारे जूते से ही हमारी होली मना दी--- हा हा हा।और सब से बडी खुशखबरी कि उन्हें  उनके उपन्यास  पर नवलेखन ग्यान पीठ पुरुस्कार मिला है जिस के लिये उन्हें बहुत बहुत बधाई।
हज़ल
बहार ले कर है आयी होली खुशी मनाये गली हमारी
उतारो जूते से आर्ती अब सजन हैं आये गली हमारी

सखी ले आना तगारी गोबर गुलाल ले कर उसे सजाना
करो सुवागत जु शान से वो ठहर न पाये गली हमारी

अबीर कीचड मिला बनायें जरा सा उबटन लगे सजीला
खिलाऊं घी गुड चुरी उसे जो पकड के लाये गली हमारी

बना सखी  हार चप्पलों से सडे टमाटर पिरोना उपले
है चाहता तो गधे पे चढ कर चला वो आये गली हमारी

निगाह उसकी मुझे है ढँढे मै बचती छुप छुप सखी के पीछे
बने वो छैला कहे है लैला मुझे सताये गली हमारी

करूँ विनय लो न भाँग धतूरा अभी है मेरी नज़र शराबी
सजी धजी सजनी ले के डंडा तुझे बुलाये गली हमारी

बहुत सताया मुझे है पर अब मै गिन के बदले करूँगी पूरे
बुरा न मानो शुगल करें जो होली मनाये गली हमारी

मुझे सताये बना बहाने बता भला ये उमर है कोई
चखाऊँ उसको बना के भुर्ता मजे से खाये गली हमारी

हैं दाँद नकली चढा है चश्मा झुकी कमर है बने जवाँ वो
ले धूल मिर्ची बुरक उसे जो ये छब बनाये गली हमारी

करो पिटाई करो ठुकाई बुढू को देखो बना मजाजी
मजा चखाऊँ उसे बताऊँ कभी जु आये गली हमारी

निरा ही लम्पट न शक्ल सूरत मलो तो चून औ चाक मुँह पर
बना के जोकर नमूना उसको उठा दिखाये  गली हमारी

ये ब्लाग दुनिया हुयी चकाचक बिखर रही है खुशी जहाँ मे
सुबीर लाये रंगीन होली हसे हसाये गली हमारी

सजे ये होली सजें नशिश्तें सभी तरफ हो खुशी मुहब्बत
मुबारकें है सलाम भी है यूँ खिलखिलाये गली हमारी।

26 February, 2010

सच्ची साधना [कहानी]

सच्ची साधना

कल आपने पढा कि शिवदास अपनी जिम्मेदारियों से भाग कर साधु बन गया और 20-25 साल बाद वो साधु के वेश मे अपने गाँव लौटता है। उसका मन साधु के रूप मे भी अब नही लगता था।  eएक दिन उसका मन बहुत उदास हुया तो उसे अपने घर की याद आयी।वो अपने गाँव लौटता है और अपने दोस्त्राम किशन से मिलता है अब आगे पढिये --------


‘पहले यह बताओ कि तुम बीस--पचीस वर्ष कहाँ रहे ? राम किशन शिवदास के बारे में जानने के उत्सुक थे ।


‘यहां से मैं सीधा उसी बाबा के आश्रम में गया जो हमारे गाँव आए थे । दो वर्ष उनके पास रहा मगर वहाँ मुझे कुछ अच्छा नही लगा । वहां साधु संतों के वेश  में निटठले, लोग अधिक थे । मुझे लगा लोग जिस आस्था से साधू संतों के पास आते हैं उस आस्था के बदले उन्हें रोज-रोज़  वही साधारण से प्रवचन, कथाएं आदि सुनाकर भेज दिया जाता है । उन्हें अपने ही आश्रम से बांधे रखने के लिए कई तरह के प्रलोभन, मायाजाल विछाए जाते हैं । मैं भक्ति की जिस पराकाष्टा पर पहूँचना चाहता था उसका मार्गदर्षन नही मिल पा रहा था । साधू महात्मों की सेवा करते करते करते मेरा परिचय कुछ और साधुओं से हो गया । एक दिन चुपके से मैं किसी और संत के आश्रम में चला गया ।
वहां कुछ वेद पुराण आदि पढे महात्मा जी से बहुत कुछ सीखा भी। वो बहुत अच्छे थे। वहाँ मुझे 4-5 साल हो गये थे। माहौल तो इस आश्रम में भी कुछ अलग नही था मगर वहां से एक वृद्ध संत मुझ पर बहुत आसक्ति रखते थे । उन्हें वेदों का अच्छा ज्ञान था मगर आश्रम की राजनीति के चलते ऐसे ज्ञानवान सच्चे संत के पास भी स्वार्थी लोगों की भीड जमा हो जाती है जो उनकी अच्छाई का फायदा उठा कर अश्रम का संचालन करने लगती है। उन्होंने मुझे समझाया कि तुम अपने सच्चे मार्ग पर चलते रहो बाकी भगवान पर छोड़ दो । हर क्षेत्र में तरह-तरह के लोग हं। आश्रम की व्यवस्था को बनाए रखने के लिए कई बार अपने आप से समझौता करना पड़ता है । मैंने बड़ी मेहनत से यह आश्रम बनाया है । मैं चाहता हूं कि अपनी गददी उस इन्सान को दूं जो सच्चाई, ईमानदारी से इसका विस्तार कर सके । मैं चाहता हँ, कि तुम इतने ज्ञानवान हो जाओं कि मैं निष्चिंत होकर प्रभू भक्ति में लीन हो जाऊं । और इसका सारा प्रबन्ध तुम्हारे हाथों सौंप दूँ

उन्होंने मुझे कथा वाचन में प्रवीन किया । मैं कई शहरों में कथा के लिए जाने लगा । मेरे सतसंग में काफी भीड़ जुटने लगी । आश्रम में षिष्य बड़ी गिनती में आने लगे । दान- दक्षिणा में कई गुणा वृद्धि हुई । महात्मा जी नेअपने आश्रम की बागडोर मेरे हाथ मे सौंप दी,  और मैं उनकी छत्रछाया मे आश्रम का विस्तार करने लगा।  भक्तों में कई दानी लोगों की सहायता से मैंने उस आश्रम में बीस कमरे और बनवा दिए । कुछ कमरे साधू संतों के लिए और कुछ कमरे आश्रम में आने वाले भक्तों के लिए । बड़े महात्मा जी ने मुझे अपना उत्राधिकारी घोषित कर दिया था । धीरे-धीरे आश्रम में सुख सुविधाएं भी बढने लगी  । कुछ कमरे वातानुकूल बन गए । आश्रम के लिए दो गाड़ियां तथा दो ट्रक आ गए । अब कई और साधू इस आश्रम की ओर आकर्षित होने लगे । सुख सुविधओं का लाभ उठाने के लिए कई धीरे- धीरे मुझे से गददी हथियाने के षडयन्त्र रचे जाने लगे, बड़े महात्मा जी के कान भरे जाने लगे । कई बातों में बडे़ महात्मा जी और मुझ में टकराव की स्थिती बनने लगी मुझे लगता था कि बीस वर्ष की मेहनत से जो आश्रम मैंने बनाया वह नकारा लोगों की आरामगाह बनने लगा है । मगर महात्मा जी ये सब देख नही पाते लोगों की चाल को समझ नही पाते।
मेरा मन वहां से भी उचाट होना शुरू हो गया । मुझे लगा कि यह आश्रम व्यवस्था धर्म के नाम पर व्यवसाय बनने लगा है । मेरा मन मुझ से सवाल करने लगा कि तू साधु किस लिए बना ? ये कैसी साधना करने लगा ? भौतिक सुखों, वातानुकूल कमरे और गाड़ी से एक संत का क्या मेल जोल है ? चार पुस्तकेंे पढ कर लोगों को आश्रम के माया जाल में बाँध लेते है और कितने निटठले लोग उनकी खून पसीने की कमाई से अपनी रोजी रोटी चलाते है लोग  संतों के प्रवचन सुनते है बाहर जाते ही सब भूल जाते है । मैं जितना आत्म चिंतन करता उतना ही उदास हो जाता । मुझे समझ नहीं आता खोट कहाँ है मुझ मे या धर्म की व्यवस्था में । इन आश्रमों को सराय न होकर अध्यात्मिक संस्कारों के स्कूल होना चाहिए था ।

एक दिन अचानक आश्रम में कुछ साधुओं का आपत्तिजनक व्यवहार मेरे सामने आया । जिस साधू का ये कृत्य था वो भी महात्मा जी का खास शिष्य था। अगर मैं शिकायत करता तो भी शायद उन्हें विश्वास न आता। इस लिये मैने वहाँ से चले जाने का मन बना लिया। मैंने उसी समय महात्मा जी के नाम चिटठी लिखकर उनके कमरे में भेज दी जिसमें आश्रम में चल रही विसंगतियों का उल्लेख कर अपने आश्रम से चले जाने के लिए क्षमा माँगी थी । उसी समय मैं अपने दो चार कपड़े लेकर वहाँ आया । अचानक लिए फैसले से मैं ये यह निष्चय नही कर पा रहा था कि मैं कहाँ जाऊं । आखिर रहने के लिए कोई तो स्थान चाहिए ही था । मैं वहां से सीधे अपने एक प्रेमी भक्त के घर चला गया । वो बहुत बड़ा व्यवसायी था । मेरे ठहरने का बडिया प्रबन्ध हो गया । अब मैं सोचने लगा कि आगे क्या करना चाहिए । आश्रमों के माया जाल में फँसने का मन नहीं था । अगर कहीं कोई भक्त एक कमरा भी बनवा दे तो लोगों का तांता लगने लगेगा । और मैं फिर उसी चक्कर मे फंस जाऊँगा--- लोगों के अन्धविश्वासऔर धर्म पर आस्था   मुझे फिर एक और आश्रम मे तबदील कर देंगे।  दुनियाँ से मन विरक्त हो गया है । मेरे भक्त आजीवन मुझे अपने पास रखने के लिए तैयार है । अभी कुछ तय नही कर पाया हूँ । बस एक बार तुमसे मिलने की इच्छा हुई, घर की बच्चों की याद आयी तो चला आया । यहाँ जाकर सोचँूगां कि आगे कहाँ जाना है  ये कहकर शिवदास चुप हो गया ।
‘‘इसका अर्थ हुआ जहाँ  से चले थें वही हो । न मोह माया छूटी और न दुनिया के कर्मकाण्ड । अपने परिवार को छोड़कर दूसरों को आसरा देने चले थे उसमें भी दुनिया के जाल में फंस गए । तुमने वेद पुराण पढे वो सब व्यर्थ हो गए । आदमी यहीं तो मात खा जाता है । वह धर्म के रूप को जान लेता है मगर उसके गुणों को नही अपनाता । साधन को साध्य मान लेता है । धर्म के नाम पर चलने वाले जिन आश्रमों के साधु संँतों में भी राजनीति, वैर विरोध गददी के लिए लड़ाई, जमीन के लिए लड़ाई, अपने वर्चस्व के लिए षडयन्त्र, अकर्मण्यता का बोल बाला हो, वह लोगों को क्या शिक्षा दे सकते है ? आए दिन धार्मिक स्थानों पर दुराचार की खबरें, आपस में खूनी लड़ाई के समाचार पढने को मिल रहे हैं । मैं यह नही कहता कि अच्छे साधु सँत नही हैं बहुत होंगे  मगर इस व्यवसाय मे सभी मजबूर होंगे । । ऐसे लोगों के कारण ही धर्म का विनाश, हो रहा है । लोगों की आस्था पर कुठाराघात हो रहा है ....।."-- रामकिशन बोल  रहे थें ।

‘अच्छा छोड़ो यह विषय । अब अपने बारे में बताओ । तुम भी तो आश्रम चला रहे हो ? शिवदास ने पूछा ।

सच्ची साधना ---4

‘‘ यह आश्रम नही बल्कि एक स्कूल है जहाँ बच्चों को उनके खाली समय में सुसंस्कार तथा राष्ट्र प्रेम की षिक्षा दी जाती है । किसी को इस आश्रम के किसी कमरे में ठहरने की अनुमति नहीं है । मुझे भी नही । मेरी यह कोठरी मेरी अपनी जमीन में है । मेरा रहन--सहन तुम देख ही रहे हो । गाड़ी तो दूर मेरे पास साइकिल भी नही है ।‘‘

‘" तुम तो जानते हो स्वतंत्रता संग्राम में मन कुछ ऐसा विरक्त हुआ, शादी की ही नहीं । आजा़दी के बाद कुछ वर्ष राजनीति में रहा । पद प्रतिष्ठा की चाह नही थी । कुछ प्रलोभन भी मिले मगर मैं कुछ ऐसा करना चाहता था जिससे लोंगों में राष्ट्र प्रेम और भारतीय संस्कारों की भावना जिन्दा रहे । इसके लिए मुझे लगा कि आने वाली पीढियों की जड़ें मजबूत होगी, संस्कार अच्छे होंगे तभी भारत को दुनिया के शिखर पर  देखने का सपना पूरा होगा । इस सपने को पूरा करने के लिए मैंने सबसे पहले अपने गाँव को चुना । अगर मेरा यह प्रयोग सफल हुआ तो और जगहों पर भी लोगों द्वारा ऐसे प्रयास करवाए जा सकते हैं ।"

"मेरे पास मेरी - इस झोंपडी  के अतिरिक्त पँद्रह कनाल जमीन और थी जो मेरे बाप दादा मेरे नाम पर छोड़ गए थे । मैंने दो कनाल जमीन बेचकर कुछ पैसा जुटाया और आठ कनाल जमीन पंचायत के नाम कर दी । पंचायत की सहायता से एक कनाल जमीन पर चार हाल कमरे बनवाए । वहाँ मैं सुबह शाम गाँव के बच्चों को इक्ट्ठा करता । गाँव के कुछ युवकों की एक संस्था बना दी जो बच्चों को सुबह व्यायाम, प्रार्थना, खेलकूद तथा राष्ट्र प्रेम और सुसंस्कारों की षिक्षा दें । धीर धीरे यह सिलसिला आगे बढा। गाँव के लोग बच्चों की दिनचर्या और आचरण देखकर इतने प्रभावित हुए कि बड़े छोटे सब ने उत्साह पूर्वक इसमें सहयोग किया । बच्चों को हर अपना कार्य स्वयं करने का प्रषिक्षण दिया जाता । आश्रम की बाकी जमीन में फल-सब्जियाँ उगाए जाते इसके लिए बच्चों में  सब को  एक-एक क्यारी बाँट दी जाती । जिस बच्चे की क्यारी सब से अधिक फलती फूलती उसे ईनाम दिया जाता । इससे बच्चों में खेती बाड़ी के प्रति रूची बढती और मेहनत करने का जज्बा भी बना रहता । फसल से आश्रम की आमदन भी होती जो बच्चों पर ही खर्च की जाती । आश्रम मे पाँच दुधारू पशू भी है जिनका दूध बच्चों को ही दिया जाता है । पूरा गांव इस आश्रम को किसी मंदिर से कम नही समझता । गाँव के ही शिक्षित युवा बच्चों को मुफ्त टयूषन पढाते हैं। खास बात यह है कि इस आश्रम में न कोई प्रधान है न नेता, न कोई बड़ा न छोटा । सभी को बराबर सम्मान दिया जाता है । इसके अन्दर बने मंदिर में जरूर एक विद्धान पुजारी जी रहते हैं जो बच्चों को वेदों व शास्त्रों का ज्ञान देते है । हर धर्म में उनका ज्ञान बंदनीय है । जब तक ज्ञान के साथ कर्म नहीं होगा तब तक लोगों पर प्रभाव नहीं पडता, सुधार नही होता । इसलिए अध्यात्म, योग, संस्कार ज्ञान विज्ञान की शिक्षा के साथ साथ कठिन परिश्रम करवाया जाता है ।"

पाँच छः वर्षों में इस आश्रम की ख्याति बढने लगी । सरकारी स्कीमों का लाभ बच्चों व गाँव वालों को मिलने लगा । आस पास के गाँव भी इस आश्रम की तर्ज पर काम करने लगे हैं इस गाँव का अब कोई युवा अनपढ नही है, नशाखोरी से मुक्त है । इन पच्चीस वर्षों में कितने युवक -युवतियाँ पढ लिखकर अच्छे पदों पर ईमानदारी से काम तो कर ही रहें हैं । साथ-साथ जहाँ भी वो कार्यरत है वहीं ऐसे आश्रमों की स्थापना मे भी कार्यरत हैं । अगर हर गाँव -ेऔर शहर  में कुछ अच्छे लोग मिलकर ऐसे समाज सुधारक काम करें तो भारत की तसवीर बदल सकते है ं । आज बदलते समय के साथ कर्मयोग की षिक्षा का महत्व है । अगर शुरू से ही चरित्र निर्माण के लिए युद्धस्तर पर काम होता तो आज भारत विष्व गुरू होता । जरूरत है उत्साह, प्रेरणा और दृढ निष्चय की । बस मुझे इस मशाल को जलाए रखना  है, जब तक जिन्दा हूँ । इसके लिए हर विधा में अन्तर्राजीय प्रतिस्पर्धाएँ हर वर्ष करवाई जाती हैं जिसका खर्च लोग, पंचायतें व सरकार के अनुदान से होता है ।" राम किषन की क्राँति गाथा को शिवदास ध्यान से सुन रहे थें ।

शाम के  पाँच बज गए थे । रामकिशन उठे  "शिवदास तुम आराम करो मैं बच्चों को देखकर और मंदिर होकर आता हूं । शिवदास ने दूध का गिलास गर्म करके उसे दिया और अपना गिलास खाली कर आश्रम की तरफ चले गए । शिवदास के आगे रखी फलों की प्लेट वैसे की वसे पड़ी थी । राम किशन के जोर देने पर उन्होंने दो केले खाए और लेट गए ।

लेटे-लेटे शिवदास आत्म चिंतन करने लगा । उन्हें लगा कि साधु बन कर उन्होंने जो साधना की है उसका लाभ लोगों को उतना नही मिला जितना रामकिशन की साधना का फल लोगों को मिला है । रामकिशन के व्यक्तित्व के आगे उन्हें अपना आकार बौना लगने लगा ।म न अशाँत हो गया । दोनों ने त्याग किया मगर रामकिशन का त्याग, कर्मठता, मानवतावादी आदर्ष उन्हें साधु-संतों के आचरण से ऊँचे लगे । वो तो मोह माया के त्याग की केवल  शिक्षा ही  देते हैं  और खुद भक्तों के धन से अपने भौतिक प्रसार में ही लगे रहे । आत्मचिन्तन में एक घंटा कैसे बीत गया उल्हें पता ही नही चला । तभी रामकिशन लौट आए । आते ही उन्होंने रसोई में गैस जलाई और पतीली में खिचड़ी पकने के लिए रख दी ।

24 February, 2010

सच्ची साधना--- कहानी
कल आपने पढा कि शिवदास अपनी जिम्मेदारियों से भाग कर साधु बन गया और 20-25 साल बाद वो साधु के वेश मे अपने गाँव लौटता है। उसका मन साधु के रूप मे भी अब नही लगता था।  आगे पढिये\---------
शिवदास मेहनती नही था । बी.ए. करने के बाद उसने कई जगह हाथ पाँव मारे मगर उसका मन किसी काम में न लगता । तो माँ-बाप ने उसकी शादी कर दी । दो--तीन साल  बाद पिता जी के साथ दुकान पर बैठने लगा । उसके दो बेटे भी हो गये मगर उसका मन स्थिर न था न ही उसे कठिन परिश्रम की आदत थी । अब दुकान से भी उसका मन उचाट होने लगा ।

उन्ही दिनों गाँव के मंदिर में एक साधु आकर ठहरे । शिवदास रोज िआश्रम को उनकी सेवा के लिए जाने लगा । घर वाले भी कुछ न कहते । उन्हें लगता शायद साधु बाबा ही उसे कोई बुद्धि दे दें । संयुक्त परिवार में अभी तो सब ठीक-- ठाक चल रहा था मगर शिवदास के काम न करने से भाई भी खर्च को लेकर अलग होने की बात करने लगे थे ।

साधु बाबा की सेवा करते--करते वह उनका दास बन गया । अब उसका सारा दिन मंदिर में ही व्यतीत हो जाता । अब घर वालों को चिन्ता होने लगी । पत्नि भी दुखीः थी । वह पत्नि से भी दूर-दूर रहने लगा । वह साधु लगभग छः माह उस गाँव में रहे । उसके बाद अचानक एक दिन चले गए । उन्हें अपने कुछ और भक्त बनाने थे सो बनाकर चल दिए । अब शिवदास उदास रहने लगा । काम धन्धे पर भी नही जाता । उसके भाईयों ने रामकिषन से विनती की कि शिवदास को कुछ समझायें क्योंकि रामकिशन उसका दोस्त था, शायद उसके समझाने से समझ जाए । एक दिन रामकिशन उसके घर पहूँच गया । शिव्वदास अभी मंदिर से आया था । शिवदास ने उसे बैठक में बिठाया और अंदर चाय के लिए आवाज लगाई ।

‘कहो भई शिवदास कैसे हो । सुबह  दस बजे तक तुम्हारी पूजा चलती है ?

‘पूजा कैसे, बस जिसने यह जीवन दिया है उसके प्रति अपना फर्ज निभा रहा हूं ।‘

‘वो तो ठीक है मगर मा-बाप,, पत्नि  और बच्चों के प्रति भी तो तुम्हारा कर्तव्य है उसके बारे में क्यों नही सोचते ?‘

‘प्रभू है । उसने जन्म दिया है वही पालेगा भी ।‘

‘ शिवदास जो लोग जीवन में संघर्ष नहीं करना चाहते, वही जीवन से भागते है । हमारे शास्त्रों में अनेक ऋषी--मुनि हुए है जिन्होंने अपने पारिवारिक जीवन का निर्वाह करते हुए भगवान को पाया है । कर्म से, कर्तव्य से भागने की शिक्षा कोई धर्म नही देता ।‘

‘देख रामकिशन तू मेरा दोस्त है, तू ही मुझे सच्चे मार्ग से खींच कर मोह माया के -झूठे जाल में फँसाना चाहता है । धर्म का मार्ग ही सत्य है ।‘‘

‘धर्म ? धर्म का अर्थ भी जानता है ?‘

‘वही तो जानना चाहता हूं । यह मेरा जीवन है । मैं अपने ढंग से इसे जीना चाहता हूँ जब मुझे  लगेगा कि मैं भटक रहा हूं तो सबसे पहले तेरे पास ही आऊंगा । बस, अब दोस्ती का वास्ता है, मुझे परेशान मत करो ।‘

‘ठीक है भई, तुम्हारी इच्छा, मगर याद रखना भटकने वालों को कभी मंजिल नही मिलती ।" कहकर रामकिशन चले गए ।

इस बात के अगले दिन ही शिवदास घर छोड़कर चला गया था । बहुत जगह उसे खोजा गया मगर कही उसका पता नही चला । तब से शिवदास को भी कुछ पता नही था कि उसके परिवार का क्या हुआ । पच्चीस वर्ष बाद लौटा है । क्यो ? ... वह नही जानता ।

इन्ही सोचों में डूबा शिवदास पगडंडी पर चला जा रहा था कि सामने से एक 25-28 वर्ष का युवक आता दिखाई दिया..... उसका दिल धड़का .... उसका बेटा भी तो इतना बड़ा हो गया होगा .....

‘बेटा क्या बता सकते हो कि रामकिशन जो स्वतंत्रता सैनानी थे उनका घर कौन सा है ? शिवदास ने पूछा ।

‘रामकिशन ? आप कही गुरू जी की बात तो नही कर रहे ?‘

‘शायद तुम्हारे गुरू हों । उन्होंने शादी नही की, देश सेवा में ही सक्रिय रहे ।‘‘ शिवदास ने कुछ और स्पष्ट किया

‘हां गुरू जी आश्रम में हैं । वहांँ राष्ट्रभक्ति दीक्षाँत समारोह चल रहा है । दाएँ मुड़ जाइए सामने ही आश्रम है । आईए मैं आपको छोड़ देता हूं ।" लड़के ने मुड़ते हुए कहा ।

‘ नही- नही बेटा मैं चला जाऊंगा ।" वह आगे बढ गए और लड़का अपने रास्ते चला दिया । लड़के के शिष्टाचार से शिवदास प्रभावित हुआ । गांँव का लड़का इतना सुसंस्कृ्रत: ....... कैसे हाथ जोड़कर बात कर रहा था । ... यह रामकिशन मुझे नसीहत देता था और खुद गुरू बन गया । क्या इसने भी सन्यास ले लिया ? .... शायद......

जैसे ही शिवदास दाएं मुड़ा सामने आश्रम के प्रांगण में भीड़ जुटी थी । सामने मंच पर रामकिशन के साथ कई लोग बैठे थे । एक दो को वह पहचान पाया । आंगन के एक तरफ लाल बत्ती वाली दो गाड़ियांँ व अन्य वाहन खड़े थे । शिवदास असमंजस की स्थिति में था कि आगे जाए या न जाए----- ,तभी वन्देमातरम के लिए सब लोग खड़े हो गए । वन्देमातरम के बाद लोग बाहर निकलने लगे । शिवदास एक तरफ हट कर खड़ा हो गया । उसने देखा, दो सूटड--यबूटड युवकों ने रामकिशन के पांव छूए और लाल बत्ती वाली गाड़ियों में बैठकर चल दिए । धीरे --धीरे वाकी सब लोग भी चले गए । तभी वो लड़का, जिससे रास्ता पूछा था आ गया ‘ बाबा जी, आप गुरू जी से नही मिले ? वो सामने है , चलो मैं मिलवाता हँ । ‘‘ शिवदास उस लड़के के पीछे--पीछे चल पड़े । रामकिशन कुछ युवकों को काम के लिए निर्देष दे रहे थे । लड़के ने रामकिशन के पाँव छूए ....

"गुरूदेव महात्मा जी आपसे मिलना चाहते है ।" लड़के ने षिवदास की ओर संकेत किया ।‘‘

‘ प्रणाम महाराज ,आईए अन्दर चलते है ।‘‘ रामकिशन उसे आश्रम के एक कमरे में ले गए । ‘‘ काम बताईए ।‘‘

‘यहां नही आपके घर चलते है। ‘‘ शिवदास ने कहा ।

‘कोई बात नही चलो ।‘ कहते हुए वह शिवदास को साथ ले कर आश्रम के पीछे की ओर चल दिए ।

आश्रम के पीछे एक छोटा सा साफ सुथरा कमरा था । कमरे में एक तरफ बिस्तर लगा हुआ था । दूसरी तरफ  पुस्तकों की अलमारी थी । बाकी कमरे में साफ सुथरी दरी विछी हुई थी । कमरे के आगे एक छोटी सी रसोई और पीछे एक टायलेट था । शिवदास हैरान था कि जिस आदमी को सारा गाँव गुरू जी मानता था और बड़े--बड़े प्रषासनिक अधिकारी जिसके पांँव छूते हैं और जिसके नाम पर इतना बड़ा आश्रम बना हो वह इस छोटे से कमरे में रहता हो ? इससे बडिया तो उसका आश्रम था । जिसमें भक्तों की दया से आराम की हर चीज व वातानुकूल कमरे थे । उसके पास भक्तों द्वारा दान दी गई गाड़ी भी थी । इतना सादा जीवन तो साधू होते हुए भी उसने नही व्यतीत किया । अंतस में कही कुछ विचार उठा जो उसे विचलित कर गया ................... आत्मग्लानि का भाव । वह साधू हो कर भी भौतिक पदार्थों का मोह त्याग नही पाया और रामकिशन साधारण लोक जीवन में भी मोह माया ये दूर है .... वो ही सच्चा आत्म ज्ञानी है ।

‘महाराज बैठिए, आपकी क्या सेवा कर सकता हूं ‘‘ उन्होंने बिस्तर पर बैठने का संकेत किया ।

‘मुझे पहचाना नही केशी? ‘‘ शिवदास ने धीरे से पूछा । वो रामकिशन को केशी कह कर ही पुकारा करता था ।

‘‘ बूढा हो गया हूँ । यादाश्त भी कमजोर हो गई है । मगर तुम शिवदास तो नही हो ? रामकिशन ने आश्चर्य से पूछा

‘हां, शिववदास  हूँ तेरा दोस्त‘‘ कहते हुए शिवदास की आँखें भर आई

‘शिववदास तुम,?" उन्होंने शिवदास को गले लगा लिया

‘अभी इस राज को राज ही रखना । ‘ शिवदास घीरे से फुसफुसाया

‘‘ठीक है, तुम आराम से बैठो ।‘

‘गुरूदेव, पानी । ‘ उसी लड़के ने अन्दर आते हुए कहा और पानी पिलाकर चला गया ।

‘ ये लड़का बड़ा भला है । सेवादार है ?‘‘ शिवदास से उत्सुकता से पूछा ।

‘यहां मेरे समेत सभी सेवादार है । तुम भी कितने अभागे हो । जिसे बचपन में ही अनाथ कर गए थे ये वही तुम्हारा बेटा कर्ण है ।‘‘

‘क्या ?‘ शिवदास झटका सा लगा । खून  में तरंग सी उठी । उसका जी चाहा कर्ण को आवाज देकर बुला ले और गले से लगा ले । उसका दिल अंदर से रो उठा ।

‘ तुम्हारे जाने के बाद तुम्हारे परिवार ने बहुत मुसीबतें झेली हैं। मगर तुम्हारी पत्नि ने साहस नही छोड़ा । कड़ी मेहनत करके बच्चों को पढाया लिखाया और काम पर लगाया। काम अच्छा चल निकला है । रामकिशन उन्हें बच्चों और उनके काम काज के बारे में बताते रहे । पर षिवदास का मन बेचैन सा हो रहा था कि पत्नि कैसी है -वो कैसे इतना कुछ अकेले कर पाई होगी---- मगर पूछने का साहस नही हो रहा था । पूछें तो भी किस मुंह से ...... उस बेचारी को वेसहारा छोड़कर चले गए थे । आज वो फेसला नही कर पर रहा था कि उसने अपना रास्ता चुनकर ठीक किया या गलत और माँ बेचारी---- उसे एक बार देखने का सपना लिए संसार से विदा हो गई..............।



‘पहले यह बताओ कि तुम बीस--पचीस वर्ष कहाँ रहे ? राम किशन शिवदास के बारे में जानने के उत्सुक थे ।क्रमश:

22 February, 2010

सच्ची साधना [कहानी]

सच्ची साधना {कहानी}

बस से उतर कर शिवदास को समझ नहीं आ रहा था कि उसके गांव को कौन सा रास्ता  मुड़ता है । पच्चीस वर्ष बाद वह अपने गाँव आ रहा था । जीवन के इतने वर्ष उसने जीवन को जानने के लिए लगा दिए, प्रभु को पाने के लिए लगा दिए । क्या जान पाया वह ? वह सोच रहा था कि अगर कोई उससे पूछे कि इतने समय में तुमने क्या पाया तो शायद उसके पास कोई जवाब नही । यूँ तो वह संत  बन गया है, लोगों में उसका मान सम्मान भी है, उसके हजारों शिष्य भी है फिर भी वह जीवन से संतुष्ट नहीं है । क्या वह भौतिक पदार्थों के मोह से ऊपर उठ चुका है ? शायद नही ...... आश्रम में उसका वातानुकूल कमरा, हर सुख सुविधा से परिपूर्ण था । क्या काम, कोध्र, लोभ, मोह व अहंकार से ऊपर उठ चुका है ? ... नहीं...नहीं...अगर ऐसा होता तो आज घर आने की लालसा क्यों होती ? आज गांव क्यों आया है ? उसे अपना आकार बौना सा प्रतीत होने लगा । पच्चीस वर्ष पहले जहां से चला गया था वहीं तो खड़ा है । अपना घर, परिवार ..... गांव.... एक नज़र देखने का मोह नही छोड़ पाया है.... आखिर चला ही आया । बच्चों की याद, पत्नि का चेहरा, माँ की सूनी आंखे, पिता की  कमजोर काया ..... सब उसके मन में हलचल मचाने लगे थे । आज उसके प्रभू भी उसके मन के आवेग को रोक नही पा रहे थे ....

जहाँ बस से उतरा था वहाँ सड़क के दोनो ओर आधा किलामीटर तक बड़ी-ंउचयबड़ी दुकानें थीं । जब वो वहां से गया था तो यहाँ दो चार कच्ची पक्की दुकानें थी । अब आसपास के गांवों के लिए इस बाजार में से होकर सड़क निकलती थी । 8--10 दुकानों के बाद एक कच्ची सड़क थी ।--- पता नही कहाँ गयी---- किसी से पूछना ही ठीक रहेगा ..... सोचते हुये वो एक दुकान की तरफ बढा---

‘भईया, मेहतपुर गांव को कौन सी सड़क जाती है ? ‘शिवदास ने एक हलवाई की दुकान पर खड़े होकर पूछा । वह पहचान गया था-- कि यह उसका सहपाठी वीरू था । मगर शिवदास अपनी पहचान नही बताना चाहता था । साधु के वेष में लम्बी दाढी, जटाएं कन्धे तक -झूलती हुई , हाथ में कमण्डल .... लामबा सा साधुयों वाला चोला

‘‘वो सामने है बाबा जी ।‘‘ वीरू ने सड़क की तरफ इशारा किया । ‘‘ बाबा कुछ चाय पानी पी लीजिए ।‘‘ वीरू ने सेवा भाव से कहा ‘‘ धन्यवाद भाई, कुछ इच्छा नही ।‘‘ पहचाने जाने के डर से वह आगे बढ गया । मन फिर कसमसाने लगा .... उसे डर किस बात का है ? क्या वह कोई अपराध करके गया है ? ....... शायद चोरी से बुजदिल की तरह घर से भाग गया ...... बीबी, बच्चों का बोझ नही उठा पाया ।

सडक़ पर चलते हुए उसके पाँव भारी पड़ रहे थें । वह किसी भी जगह जीवन से संतुष्ट क्यों नही हो पाता । क्यों भटक रहा है? ... यह तो उसने सोच लिया था कि वह अपने घर नही जाएगा । पहले राम किशन के पास जाएगा, उसके बाद सोचेगा । राम किशन उसका बचपन का दोस्त था। यदि रामकिशन न मिला तो मंदिर में ठहर जाएगा ।

आज यह साँप की तरह बल खाती सड़क खत्म होने को नाम नही ले रही थी । वह अपनी सोच में चला जा रहा था । सड़क खत्म होती ही एक बड़ी सी हवेली थी । वह पहचान गया -\---  ये तो ठाकुर शमशेर  सिंह की हवेली है-- .... समय के साथ हवेली भी अपनी जीवन सँध्या में पहँच चुकी थी । आगे बड़े-बड़े, ऊँचे  पक्के मकान बन गए थे । गाँव का नक्शा  ही बदल गया था । न तालाब .... न पेड़ों के -झुरमुट, न पीपल के आस-ऊँचे से  बने चबूतरे .... । गाँव में जिन घने पेड़ों के नीचे चबूतरों पर सारा दिन यार दोस्त इकटठे होते तो कहकहों के स्वर गूँजते , राजनीति पर चर्चा होती । कही ताश के पत्तों के साथ गम बांटा जाता । ऐसा लगता सारा गांव एक ही खुशहाल परिवार है, जैसे इनकी जिन्दगी में कोई चिन्ता ही नहीं---- कि उपर भी जाना है कुछ भगवान का नाम ले लें मगर आज सब कुछ बेजान है ।

उसे रामकिशन  का ध्यान आया क्या फक्कड़ आदमी था । आज़ादी के आँदोलन में ऐसा बावरा हुआ न शादी की न घर बार बसाया .... न अपना मकान बनाया बस एक  टूटी सी -झोँपड़ी मे ही प्रसन्न रहता । घर रहता ही कितने दिन .... आज़ादी के आँदोलन में कभी जेल तो कभी कहीं चला रहता था । उसे आज भी उसकी दिवानगी याद है ... वह कुछ माह भगत सिंह से साथ भी जेल में रहा था । जब भगत सिंह को फाँसी हुई तों रामकिशन रिहा हो चुका था । भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरू की फाँसी का उसने इतना दुखः मनाया कि तीन--चार दिन उसने कुछ नही खाया । इस दर्दनाक शहादत ने रामकिशन को अन्दर तक -झकझोर कर रख दिया था । वह अपनी -झोँपड़ी के बाहर चारपाई पर पड़ा, आजादी के, भगत सिंह के गीत गाता रहता । गाँव के लोगों को बच्चों को इकट्ठा कर देश भक्तों की कहानियाँ सुनाता, उनके उपर ढाए गए कहर की गाथाएं सुन के लोग अपने आँसू नही रोक पाते । समय के साथ वह फिर उठा और आंदोलन में सक्रिय हो गया । आज़ादी से संबंधित साहित्य छपवा कर लोगों में बांटता तथा आज़ादी के परवानों के साथ काम करता ।
इस सारे काम के लिए धन अपनी जेब से खर्च करता । काम धन्धा तो कुछ था नहीं, पुरखों की जमीन जो उसके हिस्से में आई थी, उसी को बेचकर रामकिषन अपना खर्च चलाता । देष आजा़द हुआ । रामकिषन की खुषी का ठिकाना नहीं था । अब वह राजनिती में भी सक्रिय हो गया था । उसने उसे भी कई बार अपने साथ जोड़ने का प्रयत्न किया मगर षिवदास का मन कुछ दिन में ही उचाट हो जाता । क्रमश:

20 February, 2010

कविता पँखनुचा

कविता--- पंखनुचा

उसके अहं में छिपा विष
उसकी मैं में,
तू की अवहेलना,
शोषण की बुभुक्शा,
कामुक्ता कि लिप्सा,
अभिमान की पिपासा,
कर देती है आहत
तर्पिणी का अनुराग,
सहनशीलता,सहिश्णुता,त्याग
पंखनुचा की आहों से
सिसकता है
घर की दिवारों का
हर कण
क्योंकी
उन दिवारों ने
घुटते देखा है
उस आम औरत को
उस नाम की अर्धांगिनी को
जिसकी पहचान होती है
"बेवकूफ, गंवार औरत,
तुझे अकल कब आयेगी "
हाँ सच है,
उसे अभी अकल नही आयी
और सदियों से सहेजे खडी है
इस घर की चारदिवारी को
पर
जब कभी
अतुष्टी का भावोद्रेक
अत्याचार की अतिमा
हर लेगी
उसकी सहनशीलता
जगा देगी उस के
स्वाभिमान को
तो वो मीरा की तरह
इस विष को
अमृ्त नहीं बना पायेगी
सतयुग की सीता की तरह
धरती मे नहीं समायेगी
ये कलयुग है
क्या नहीं सुन रहा
दंडपाशक का अनुनाद
तडिताका निनाद
बनादेगी तुझे निरंश,पंगल
कर देगी सृ्ष्टी का विनाश
उस प्रलय से पहले
सहेज ले
घर की दिवारों को
अपना उसे
अर्धनारीश्वर की तरह
समझ उसे अर्धांगिनी

17 February, 2010

रिटायरी कालोनी {अपनी बात}

रिटायरी कालोनी
शायद अपना घर सब का ही सपना होता है। फिर जब आदमी अपने जीवन का सुनहरी समय सरकारी मकान मे रह कर गुज़ार दे तो उसके लिए तो अपना घर और भी अहम बात हो जाती है। फिर जब आदमी रिटायर होने के करीब आता है तो लोग अक्सर ये सवाल करने लगते हैं * अपना घर बना लिया *--- कहाँ बना रहे हैं अपना घर?* आदि आदि
मुझे भी जब एक साल रिटायर होने मे रह गया तो हम ने भी अपना घर बनाने की सोची। नंगल शहर मे तकरीबन पूरी जमीन भाखडा ब्यास मैनेजमेन्ट बोर्ड ने आकुपाई कर रखी है ,बस एक आध प्राईवेट आबादी है| बाकी प्राईवेट आबादियां साथ लगते गाँवों से जमीन ले कर बनाई जा रही हैं साथ ही नया नंगल की पूरी जमीन नेशनल फर्टेलाईजेशन कम्पनी ने ले रखी है। वहां भी आस पास के गाँवों से जमीन ले कर ही आबादियां बन रही हैं। नंगल मे जो कुछ वर्ष रह लिया उसका नंगल से जाने का मन नही होता। हम ने भी सोच लिया कि नया नंगल के पास जो कालोनी बनी है,वहीं घर बनायेंगे बडी साफ सुथरी है और रेल्वे स्टेशन , बस स्टैंड आदि की बडी सुविधा है।
 जब मुझ से कोई पूछता कि घर कहाँ बना रहे हो तो मैं बडे गर्व से  कहती शिवालिक एवन्यू मे। क्यों की वहाँ घर बहुत अच्छे बने हुये हैं। सुनते ही उनके चेहरे का रंग बदल जाता * अच्छा वो रिटायरी कालोनी मे* और मुस्कुरा देते, कई तो यहाँ तक कह देते वहाँ मत बनाओ आपका दिल नही लगेगा।। मुझे समझ नही आती कि उस कालोनी मे ऐसा क्या है? आखिर रिटायर हुये लोग भी कहीं तो रहेंगे ही। भाखडा डैम  से और एन. एफ. एल. से ही रिटायर लोग वहाँ अधिकतर रहते हैं। रिटायर होते होते बच्चे पढने या नौकरी करने बाहर निकल जाते हैं। बहुत तो अभी कही पर्मानेन्ट सेट नही हुये होते इस लिये माँ बाप को अपना बसेरा बनाना ही पडता है। खैर मैने किसी की बात पर कभी अधिक ध्यान नही दिया। जब अपना घर बन गया तो वहाँ शिफ्ट हो गये। नंगल मे अपना पास पडोस बहुत अच्छा था। लगभग हर उम्र के लोग उस कालोनी मे थे। ाक्सर ही किसी न किसी के घर कोई न कोई उत्सव आदि होते रहते। बच्चों  के जन्म दिन ,किसी की शादी की वर्षगाँठ, किसी के मुन्डन, कभी किट्टी पार्टी कुछ न कुछ चला ही रहता।अगर और कुछ नही तो सब मिल कर पिकनिक का  प्रोग्राम  बना लेते।     इस कालोनी मे जब आये तो सभी लगभग अकेले पति पत्नि किसी किसी के साथ बच्चे रहते थे। यहाँ हाल ये है कि आये दिन  किसी की मौत हो गयी, किसी की बारखी है किसी के चवर्ख है ,कोई बिमार है। मतलव कहीं न कहीं अफसोस पर जाना ही पडता है। या अधिक से अधिक हुया तो कीर्तन आदि होता है। इन लोगों के लिये मनोरंजन केवल कीर्तन या धार्मिक उत्सव ही है। हर घर का एक अलग गुरू है मतलव बाबाओं की खूब चाँदी है। उन मे से कुछ एक दो ऐसे बाबा हैं जिनकी बाबा बनने से पहले की कुछ करतूतें  अस्पताल मे नौकरी के दौरान देख चुकी थी। इन के बारे मे एक अलग पोस्ट मे लिखूँगी।बहुत लम्बी लिस्ट है। 2 साल से उपर हो गये केवल गली मे एक समारोह, हमारी बेटी की शादी हुयी। मगर पुराने शहर से अब भी शादी व्याह आदि के बहुत निमन्त्रण आते हैं।
अब मुझे पता चला है कि लोग इसे रिटायरी कालोनी कह कर क्यों नाक मुँह चढाते थे। दूसरा सभी उम्र के आखिरी पडाव पर हैं अपना खाना ही मुश्किल से बनता है अगर पडोसी बिमार हो जाये तो कौन उसकी मदद करे। वहां जरा सा बुखार भी हुया कि सभी देख भाल मे लग जाते थे। आपस मे मिलने जुलने का भी कम ही रिवाज है, किसी के घुटने दर्द कर रहे हैं तो किसी को कोई न कोई बिमारी है। वैसे सभी एक ही शहर के होने के नाते एक दूसरे को जानते हैं। भगवान का शुक्र है कि मेरा पडोस बहुत अच्छा है। आस पास दोनो घरों मे बेटे बहुयें हैं उनकी। बाकी पूरी दोनो गलियों मे केवल बूढे पति पत्नि रहते हैं । ये तो भला हो इस ब्लागिन्ग का कि मुझे व्यस्त रहने के लिये एक काम मिल गया है । खूब दिल लगा हुया  है । अगर रिटायरी कालोनी मे बिना ब्लागिन्ग के रहना पडता तो शायद मैं भी अब तक बिमार हो जाती। वैसे मेरी कालोनी बहुत अच्छी है। हर जगह का अपना अपना महत्व होता है। सोच मे पड जाती हूँ कि कैसा समय आ रहा है जहाँ आज माँ बाप को अकेले रहने को मजबूर होना पड रहा है । शायद हर छोटे शहरों मे जहाँ बच्चों के लिये अच्छी नौकरियाँ नहीं हैं वहाँ ऐसी ही रिटायरी कालोनीस जगह जगह बन जायेंगी।  तो ब्लागवुड  की जय बोलिये। कहीं यहाँ ही कोई रिटायरी कालोनी तो नही़ बन जायेगी? हम बुढों के ब्लाग जरूर देख लिया कीजिये उत्साह बना रहता है। कम से कम ये तो नही लगेगा कि हम रिटायरी कालोनी मे रहते हैं।

14 February, 2010

गज़ल

इस गज़ल को भी आदरणीय प्राण भाई साहिब ने संवारा है। उन का बहुत बहुत धन्यवाद ।

गज़ल 

ज़ख़्मी हैं चाहतें, खार सी ज़िन्दगी
क्यों लगे मुझको दुश्वार सी ज़िन्दगी

लाल रुखसार पर प्यारा सा काला तिल
और है प्यारी गुलनार सी ज़िन्दगी

सांवला  चेहरा  मुस्कराते हैं लब
मांग ले आज उपहार सी ज़िन्दगी

बच के रहना सदा तेज तुम धार से
दोस्तो,ये है तलवार सी ज़िन्दगी

चांदनी रात है मस्तियों से भरी
आज दो एक पल उधार सी ज़िन्दगी



सोएँ फूटपाथ पर जब ठिकाना नही
बद नसीबी भी बेकार सी जिन्दगी

छेद दे नाव को  लोग जो  हास में
जी रहें सब वे मझधार सी ज़िन्दगी

12 February, 2010

नई सुबह-- कहानी ]-

नई सुबह-- कहानी ]-- अगली कडी
पिछली कडी मे आपने पढा कि नीतू घर परिवार ्र नैकरी के दो पाटौ मे पिस कर परेशान थी । एक दिन वो दफ्टर से लेट हो जाने पर कि बास की डाँट न खानी पडे अपनी एक आँटी के घर चली जाती है और उस से अपनी परेशानी बताती है। उसकी आँटी उसे समझाती है------ आगे पढिये--
*बेटी ये समस्या केवल तुम्हारी ही नही ,हर कामकाजी महिला की है। अब यहाँ दो बातें आती हैं-- एक तो येकि वो बीसवीं सदी की औरत की तरह वो पूरी तरह अपने परिवार के लिये समर्पित हो कर जीये मगर किसी की ज्यादतियों के खिलाफ मुंह न खोले । अपनी छोटी छोटी जरूरतों के लियेभी दूसरों पर निर्भर रहे अगर तो पति अच्छा आदमी है तब तो ठीक है नही तो आदमी दुआरा शोशित होती रहे ,प्रताडना सहती रहे। अपना आत्मसम्मान अपने सपने भूल जाये।
 दूसरा पहलु है कि शोशित होने की बजाये आतम निर्भर बने और एक संतुलित समाज की संरचना करे। अभी ये काम इस लिये मुश्किल लग रहा है कि सदिओं से जिस तरह पुरुष के हाथ मे औरत की लगाम रही है वो इतनी आसानी से और जल्दी छूटने वाली नही हैुसके लिये समय लगेगा।इस आदिम समाज मे औरत की प्रतिभा और सम्मान को स्थापित करने  के लिये आज की नारी को कुछ तो बलिदान करना ही पडेगा।देखा गया है कि जब भी कोई क्राँति आयी उसके लिये किसी न किसी ने संघर्ष किया और कठिनाईयाँ झेली हैं तभी आने वाली पीढियों ने उसका स्वाद चखा है।
सब से बडी खुशी की बात ये है कि पहले समय से अब तक बहुत बदलाव आया है कोई समय था जब औरत को घूँघट के बिना बाहर नही निकलने दिया जाता थ पढने नही दिया जाता था,  एक आज है जब् औरत आदमी के कन्धे से कन्धा मिला कर चल रही है।ाउत कुछ तो इतना आगे बढ गयी हैं कि समाज की मर्यादाओं को भी भूल गयी हैं जो गलत है।
आज के बच्चे इस बदलाव को समझ भी रहे हैं। किसी स्क़मय मे आदमी ने कभी रसोई की दहलीज़ नही लाँघी थी, आज वो पत्नि के लिये बेड टी बनाने लगा है, दोनो नौकरी पेशा पति पत्नि मिल जुल कर घर चलाने लगे हैं।*
*पर आँटी , विकास के पास तो समय ही नही है अगर कभी हो भी तो कहते हैं मुझे आराम भी करने दिया करो। और सास ससुर जी को तो जैसे भूल ही गया है कि घर कैसे चलता है।*
* बेटी यहाँ भी एक बात तो ये है कि समाज की प्रथानुसार सास अपना एकाधिकार समझती है कि जब बहु आ गयी तो उसे काम की क्या जरूरत है दूसरी जो सब से बडी बात है वो आजकल के बच्चों की बडों से बढती दूरी। बच्चे अपने दुख सुख तकलीफें खुशियाँ केवल अपने तक ही रखते हैं । पार्टी सिनेमा के लिये समय है मगर ,कभी समय नही निकालते कि दो घडी बडों के पास बैठ कर उनसे दो प्यार भरी बातें कर लें या उनके दुख सुख सुन लें फिर बताओ आपस मे सामंजस्य कैसे स्थापित हो पायेगा। ये सब से अहम बात है जो परिवार मे सन्तुलन कायम करती है। क्या तुम ने कभी सास के गले मै वैसे बाहें डाली जैसे अपनी माँ के गले मे डालती थी?*
*आँटी मुझे फुरसत ही कहाँ मिलती है। क्या उन्हें खुद नही ये देखना चाहिये कि मुझे कितना काम करना पडता है?*
*नही बेटा उन्होंने अपने जमाने मे जितना काम किया है आज के बच्चे उतना नही कर सकते। क्या उन्होंने कभी तुम्हें काम के लिये टोका है? या किसी और बात के लिये?*
नही तो वो तो सब से मेरी प्रशंसा ही करती हैं कि बहु बहुत अच्छी है सारा काम करती है मुझे हाथ नही लगाने देती। पहले पहले तो मैं खुशी से फूल कर कुप्पा होती और भाग भाग कर काम करती मग अब बच्चों के होने के बाद मुश्किल हो गयी है।*
तो बेटा तुम्हारी समस्या तो कुछ भी नही है बस तुम्हे जरा सा प्रयास करने की जरूरत है अपनी सास को अपनी सहेली बना लो। उन्हें समझा कर एक नौकरानी रख लो या दोनो मिल कर घर चलाओ अपने पति को भी अपनी समस्या प्यार से बताओ। आधी मुश्किल तो किसी समस्या को अच्छे से न समझ पाने और गलत दृिष्टीकोन अपनाने से होती है। ये शुक्र करो कि तुम अपने परिवार के साथ हो अकेले रहने वाले लोग किस मुश्किल से बच्चे पाल रहे हैं ये तुम्हें अभी पता नही है।एक बार अच्छी तरह सोचो कि क्या तुम पहले रास्ते पर चल कर अपना वजूद कायम रख सकती हों ? या फिर एक नई सुबह के लिये संघर्ष करना चाहती हो।*
ये कह कर आंम्टी चाय के बरतन ले कर उठ गयी और मैं सोच मे पड गयी। आस पास देखा अपनी सहेलियों की बातों पर गौर किया तो लगा कि आँटी की बात मे दम है। अगर हम परिवार मे अपने रिश्तों को  सहेज कर रखें तो जीवन की आधी मुश्किलें तो आसानी से हल हो सकती हैं । मगर हम अपने अहं या तृ्ष्णाओं के भ्रमजाल मे बहुत कुछ अनदे4खा कर देते हैं जिसे समय रहते न देखा जाये तो कई भ्रामक स्थितियाँ पैदा हो जाती हैं।
मुझे शायद अपनी समस्या का समाधान मिल गया था । एक तो ये कि मेरे उपर अगर संघर्ष का दायित्व है तो निभाऊँगी,कुछ पाने के लिये कुछ खोना तो पडेगा ही। और दूसरे ापने रिश्तों को आँटी की तरह एक नई दृष्टी से देखूँगी।अँटी ने ठीक कहा है मैं घर मे माँजी और बाऊ जी से अपनी तकलीफ भी कहूँगी और उनकी भी सुनुंगी। हो सकता है वो मेरी मनोस्थिती जानते ही न हों। मैने कब कभी उनकी तकलीफ जानने की कोशिश की है। अगर समय निकक़लना हो तो बडों के लिये निकाला जा सकता है। जब माँ बिमार होती थी तो मै उनके सिरहाने से उठती नही थी मगर यहाँ आ कर कभी समय ही नही निकाला कि मैं अपनी सास के साथ भी कुछ पल बिताऊँ। पहले पहले जब कभी वो रसोई मे आती तो मैं ही उन्हें हटा देती शायद एक अच्छी बहु साबित करने के लिये । इसके बाद शायद उन्हें भी आदत पड गयी हों और भी बहुत से ख्याल इस नई सोच के साथ मेरे मन मे आने लगे। मुझे लगने लगा था कि कहीं न कहीं मेरी भी गलती जरूर है। एक आशा की किरण लिये मैं उठ खडी हुयी।
*अच्छा आँटी अब मैं चलती हूँ आपसे बात करके मन का बोझ हल्का हो गया है। मै नये सिरे से इस समस्या पर सोचूँगी। नमस्ते आँटी।*
*ठीक है बेटा, सदा सुखी रहो। आती रहा करो *
घर पहुँची तो विकास घर आ चुके थे। माँ जी और बाऊ जी के साथ ही ड्राईँग रूम मे बैठे थे। मुझे जल्दी आये देख कर माँजी ने पूछा कि क्या बात है आज जल्दी घर आ गयी? मैं पहले त चुप रही मेरी आँखों मे आँसू आ गये । जब माँजी ने सिर पर हाथ रखा कि बताओ तो सही क्या हुया है? सभी घबरा भी गये थे। मैने उसी समय माँजी की गोदी मे सिर रख दिया--
*माँजी, बात कुछ नही है मैं बहुत थक गयी हूँ* नुझ से अब नौकरी और घर दोनो काम नही होते।*
अरे बेटी पहले चुप करो। तुम इतनी बहादुर बेटी हो मै तो सब से तुम्हारी तारीफ करते नही थकती। तुम ने कभी बताया क्यों नही कि तुम इतनी परेशान हो?*
* मैने विकास से कहा था कि नौकरी छोड देती हूँ मगर विकास नही माने।*
*वाह बेटी बात यहाँ तक हो गयी और तुम ने अपने माँ बाऊजी को इस काबिल ही नही समझा कि हम से बात करो। असल मे मैं अपने सास होने के गर्व मे तुम्हारी तकलीफ न देख सकी और तुम बहु होने के डर से मुझ से कुछ कह न सकी बस बात इतनी सी थी और् तुम कितनी देर इसी तकलीफ को सहती रही। फिर मैं डरती भी थी कि मेरा रसोई मे दखल तुम्हें कहीं ये एहसास न दिलाये कि मुझे तुम्हारी काबलियत पर भरोसा नही या मुझे तुम्हारा काम पसंद नही। चलो आज से रात का खाना मैं बनाया करूँगी।*
*नीतू तुम खुद ही तो कहा करती थी कि विकास तुम बच्चों को पढाते हुये डाँटते बहुत हो आगे से4 मैं पढाया करूँगी। तो मुझे क्या चाहिये था। मै निश्चिन्त हो गया।* विकास के स्वर मे रोष था
सही है कुछ समस्यायें हम खुद सहेज लेते हैं। हमे लगता है कि हम दूसरे से अच्छा काम कर सकते हैं। यही बात शायद यहाँ हुयी थी।
*देखो बेटा जब तक बच्चा रोये नही माँ भी कई बार दूध नही देती। वैसे अच्छा हुया अगर तुम यही बात सीधी तरह इनसे कहती तो शायद इन पर असर न होता। आज तुम्हारे आँसूओं से देखो तुम्हारी माँ भी पिघल गयी और विकास की क्या मजाल जो अब तुम्हें अनदेखा कर दे।* कह कर बाऊ जी हंस दिये
चलो बटा मेरा आशीर्वाद ले लो इसी बहाने  हमे भी कई साल बाद पत्नि के हाथ का भोजन नसीब होगा जो हमे शिकायत रहती थी।*
-----* तो क्या इसी खुशी मे एक एक कप तुलसी वाली चाय हो जाए, बहु के हाथ की? * माँजी चहकी
शायद आज माँजी को पहली बार इतने खुश देखा था। मुझे लगा सम्स्या का समाधान हमारे आस पास ही कहीं होता है मगर कई बार नासमझी मे हम उसे देख नही पाते जिस से और कई समस्यायें पैदा कर लेते हैं।
 मैं झट से चाये बनाने चली गयी। सुबह इसी तुलसी वाली चाय ने ही तो मुझे नई राह दिखाई थी।मैने कप उठाने के लिये हाथ बढाया तो विकास ने मेरा हाथ पकड लिया बडे प्यार से दबा कर बोले लाओ तुम चलो अगला काम मेरा है।  और विकास कपौ मे चाय डाल रहे थे। मुझे लगा नई सुबह का आगाज़ हो चुका है।इस लिये नही कि विकास काम कर रहे हैं बल्कि इस लिये कि मेरी तकलीफ मे मेरा साथ निभाने का जिम्मा ले रहे हैं। समाप्त ।

09 February, 2010

नई सुबह कहानी

नई सुबह - ----  कहानी
आज मन बहुत खिन्न था।सुबह भाग दौड करते हुये काम निपटाने मे 9 बज गये। तैयार हुयी पर्स उठाया, आफिस के लिये निकलने ही लगी थी कि माँ जी ने हुकम सुना दिया *बहु एक कप तुलसी वाली चाय देती जाना।*
मन खीज उठा , एक तो लेट हो रही हूँ किसी ने हाथ तो क्या बँटाना हुकम दिये जाना है ,फिर ये भी नही कि सब एक ही समय पर नाश्ता कर लें ,एक ही तरह का खा लें सब की पसंद अलग अलग । किसी को तुलसी वाली चाय तो किसी को इलाची वाली। मेरी तकलीफ कोई नही देखता।
आज समाज को पढी लिखी बहु की जरूरत है जो नौकरी पेशा भी हो,कमाऊ हो। घर और नौकरी दो पाटों के बीच पिसती बहु को क्या चाहिये इसका समाधान कोई नही सोचता।
जैसे तैसे चाय बना कर बस स्टाप के लिये भागी, मगर बस निकल चुकी थी।मेरी रुलाई फूटने को हो आयी।मन मे आया बास की डाँट खाने से अच्छा है आज छुट्टी ले लूँ। कई दिन से सोच रही थी आँटी से मिलने जाने का मगर विकास 10 दिन से टूर पर गये थे समय ही नहीं मिल पाया।दूसरा कई दिन से सोच कर परेशान थी नौकरी और घर दोनो के बीच बहुत कुछ छूट रहा था जिन्दगी से। दोनो जिम्मेदारियों मे जो मुश्किल आती वो तो अपनी जगह थी मुझे चिन्ता केवल बच्चों की पढाई की थी। मैं इतनी थक जाती कि रात को बच्चों का होम वर्क करवाने की भी हिम्मत न रहती। विकास की नौकरी ऐसी थी कि अक्सर टूर पर जाना पडता था।मुझे गुस्सा आता कि अगर नौकरी वाली बहु चाहिये तो घर मे नौकरानी रखो। मगर माँजी बाऊ जी नौकरानी के हाथ से बना भोजन नही करते थे।मैने नौकरी छोडने की बात की तो विकास नही माने। मुझे लगता कि अगर माँ जी या बाऊ जी से कहूँगी तो पता नही क्या सोचेंगे-- घर मे कहीं कलेश न हो जाये कि शायद मैं घर के काम से कतराने लगी हूँ । ससुराल मे उतनी आज़ादी भी नही होती जितनी कि मायके मे बात कहने की होती है।
बस स्टैंड पर खडे ध्यान आया कि चलो आज छुट्टी करती हूँ और आँटी के घर हो आती हूँ, अपनी समस्या के बारे मे भी उनसे बात हो जायेगी।वो एक सुलझी हुयी महिला हैं। जरूर कोई न कोई हल मिल जायेगा। मन कुछ आश्वस्त हुया।रिक्शा ले कर मैं उनके घर के लिये चल पडी।
कमला आँटी मेरे मायके शहर की हैं। 15-20 वर्ष से वो इसी शहर मे रह रही हैं। अपने पति की मौत के बाद उन्होंने एक बोर्डिंग स्कूल मे वार्डन की नौकरी कर ली।थी वहीं रह रही हैं। जैसे ही मैं पहुँचीवो  मुझे देख कर ह्रान हो गयी--
*नीतू ,तुम? इस समय? क्या आज छुट्टी है?* उन्होंने एक दम कई प्रश्न दाग दिये।
* आँटी आज आफिस से लेट हो गयी थी तो सोचा बास की डाँट खाने से अच्छा है आपके हाथ की बनी चाय पी ली जाये और कुछ मीठी खटी बातें भी हो जायें।*
* वलो अच्छा हुया तुम आ गयी*इधर बच्चों की छुट्टियां चल रही हैं हास्टल भी खाली है। बैठो मैं चाय बना कर लाती हूँ फिर बातें करते हैं।*
 मैने कमरे मे सरसरी नज़र दौडाई सुन्दर व्यवस्थित छोटा स घर थआँटी बहुत सुघड गृहणी हैं ।ये मैं पहले से जानती थी । रिश्तों को सहेजना और घर परिवार को कैसे चलाना है ये महारत उनको हासिल थी तभी तो उन के बेटे बहुयें उन्हें बहुत प्यार करते हैं । उन्हें अपने पास बुलाते हैं मगर आँटी कहती हैं कि जब तक हाथ पाँव चल रहे हैं तब तक वो काम करेंगी । इसी लिये बेटे की ट्रांस्फर के बाद उनके साथ नही गयी।
चाय की चुस्की लेते हुये आँटी ने बचों का .घर का हाल चाल पूछा।मैं कुछ उदास से हो गयी तो आँटी को पता चल गया कि मैं परेशान हूँ।
* नीतू ,क्या बात है कुछ परेशान लग रही हो?*
*आँटी  मैं नौकरी और बच्चों की पढाई को ले कर परेशान हूँ।नौकरी के साथ घर सम्भालना , बच्चों की पढाई भी करवानी माँ और बाऊ जी का ध्यान, दवा दारू, और रिश्तेदारों की आपे़क्षायें इन सब के बीच पिस कर रह गयी हूँ आपको पता ही है विकास को अकसर टूर पर जाना पडता है अगर घर मे भी हों तो भी बच्चों की तरफ ध्यान नही जाता। माँ जी को कीर्तन सत्संग से फुरसत नही, बिमारी मे भी कोई हाथ बंटाने वाला नहीं। वैसे मुझे घर मे कोई कुछ कहता नही मगर मुझे किसी का कुछ सहारा भी तो चाहिये ।बताईये मै क्या करूँ?*
*बेटी ये समस्या केवल तुम्हारी ही नही है,हर कामकाजी महिला की है । असल मे हमारे परिवारों मे बहु के आने पर ये समझ लिया जाता है कि बस अब काम की जिम्मेदारी केवल बहु की है। सास ननदें कई बार तो बिलकुल काम करना छोड देती हैं बस यहीं से परिवारों मे कलह बढ जाती है।*
अब यहाँ दो बातें आती हैं एक तो ये -------  क्रमश:

07 February, 2010

विकल्प 
लघु कथा
रामू मालिक को सिग्रेट के धूँयें के छल्ले बनाते हुये देखता तो अपनी गरीबी और बेबसी का गुबार सा उसके मन मे उठने लगता। क्यों मालिक अपने पैसे को इस तरह धूयें मे उडाये जा रहे हैं? माना कि दो नम्बर का बहुत पैसा है मगर फिर भी----- उसके घर मे आज चुल्हा नही जला है--- उसके मन मे ख्याल आता है। अगर साहिब चाहें तो इसी धूँएं से उसके घर का चुल्हा जल सकता है। फिर सिगरेट शराब से घुड घुड करती छाती के लिये दवाओं का खर्च  क्या मेरे बुझे चुल्हे का विकल्प नही हो सकता??----
जिस बख्शिश मे मिले अवैध धन की मैं सारा दिन चौकसी करता हूँ क्या किसी के काम नही आ सकता ---- मालिक कभी ये क्यों नही सोचते।
--- ये सब बातें उसके दिमाग मे तब आती जब वो भूखा होता या घर मे चुल्हा नही जलता----  नही तो मालिक से माँग कर वो भी सिग्रेट और शराब पी ही लेता था। आज ये सोचें उसे परेह्सान कर रही थी। जैसे ही मालिक ने उसे आवाज़ दी वो चौंका और मालिक के पास जा खडा हुया
* जा दो बोतल व्हिस्की और दो सिग्रेट की डिब्बी ले आ* मालिक ने उसे पैसे थमाते हुये कहा। और वो थके से कदमो से जा कर सामान ले आया।
वो जब घर जाने लगा तो मालिक ने कहा* लो 50 रुपये बख्शिश के*
बख्शिश मिलते ही उसके मरे हुये से पाँवों फुर्ती आ गयी।और वो भूल गया घर का बुझा चुल्हा,भूख से बिलखते बच्चे,पत्नि की चिथडों से झाँकती इज्जत, भूख से पिचका बूढी मा का पेट  और चल पडा मालिक की तरह बख्शिश मे मिले पैसों को धूँयें मे उडाते हुये वैसे भी ऐसे ख्याल उसे तभी आते जब जेब खाली होती थी । शायद ऐसी कमाई बच्चों की भूख का विकल्प नही हो सकती।


05 February, 2010

भूख
लघु कथा
मनूर जैसा काला, तमतमाया चेहरा,धूँयाँ सी मटमैली आँखें,पीडे हुये गन्ने जैसा सूखा शरीर ,साथ मे पतले से बीमार बच्चे का हाथ पकडे वो सरकारी अस्पताल मे डाक्टर के कमरे के आगे
लाईन मे खडा अपनी बारी की इन्तज़ार कर रहा था। मैं सामने खडी बडे देर से उसकी बेचैनी देख रही थी। मुझे लगा उसे जरूर कोई बडी तकलीफ है। वैसे तो हर मरीज बेचैनी और तकलीफ मे होता है मगर मुझे लगा कि उसके अन्दर जैसे कुछ सुलग रहा है, क्यों कि वो अपने एक हाथ की बन्द मुट्ठी को बार बार दबा रहा था-- और बच्चा जब भी उसकी उस मुट्ठी को छूता वो उसे और जोर से बन्द कर लेता।मुझ से रहा न गया,सोचा पता नही बेचारे को कितनी तकलीफ हो,शायद मैं उसकी कुछ सहायता कर सकूँ।---
*भाई साहिब क्या बात है?आप बहुत परेशान लग रहे हैं?* मैने उससे पूछा।
* बहन जी कोई बात नही,बच्चा बिमार है, डाक्टर को दिखाना है। * वो कुछ संभलते हुये बोला।
फिर आप बच्चे को  क्यों झकझोर रहे है, मुट्ठियाँ भीँच कर बच्चे पर गुस्सा क्यों कर रहे हैं?*
*क्या बताऊँ बहन जी, मेरा बच्चा कई दिन से बीमार है। और भरपेट रोटी न दे सकने से भूख से भी बेहाल है।कुछ खाने के लिये मचल रहा है।इस बन्द मुट्ठी मे पकडे पैसों को जो कि मेरा दो दिन की कमाई है इसकी भूख से बचा रहा हूँ।इसे समझा भी रहा हूँ कि बेटा तेरे पेट की भूख से बडी पैसे की भूख है इन पैसों से डाक्टर की पैसे की भूख मिटाऊँगा तब तेरा इलाज होगा। भला गरीब का क्या दो दिन न भी खाने को मिले जी लेगा। मुझे डर है कि मेरी बारी आने से पहले मुझे इसकी भूख तडपा न जाये और डाक्टर की भूख पर डाका डाल ले।* उसकी बात सुन कर मैं सोच रही हूँ कि जब डाक्टर को सरकार से तन्ख्वाह भी मिलती है फिर भी उसे पैसे की भूख है तो इस गरीब की दो दिन की कमाई केवल डाक्टर की फीस चुकाने मे लग जायेगी तो ये परिवार को खिलायेगा क्या???????????


03 February, 2010

गज़ल
इस गज़ल को भी ादरणीय प्राण भाई साहिब ने संवारा है । आखिरी 3-4 शेर बाद मे लिखे थे जिन्हें  अनुज प्रकाश सिंह अर्श ने संवारा है। धन्यवादी हूँ।
गज़ल
दर्द अपने सुनाना नहीं चाहती
ज़ख्म दिल के दिखाना नहीं चाहती

अब न पूछो  कि क्या साथ मेरे हुआ
मैं  हकीकत बताना नहीं   चाहती

मर्ज़ माना हुआ लाइलाज अब मगर
मैं दवा से दबाना  नहीं   चाहती

वो परिंदा  उड़े  तो कहीं  भी   उड़े
मैं जमीं पर गिराना नहीं  चाहती

राह मे जो मिले सब मुद्दई मिले    
 अब उसी राह जाना नहीं चाहती      
           
 मौसमी फूल सा प्यार उसका है जी
 प्यार उससे जताना  नहीं चाहती
              
  कौन बेबस नहीं इस जहाँ मे कहो  
   बेबसी मैं दिखाना नहीं चाहती

आँधियाँ जलजले और वो हादसे
क्या नहीं था बताना नहीं चाहती

चाहती हूँ, खुशी  से कटे  ज़िन्दगी
ग़म की महफ़िल में जाना नहीं चाहती

29 January, 2010

गज़ल
इस गज़ल को भी आदरणीय प्राण भाई साहिब ने संवारा है।बेशक अभी गज़ल मे गज़ल जैसा निखार नहीं आया मगर सीखने की राह पर हूँ। आपसब के प्रोत्साहन से और भाई साहिब के आशीर्वाद से शायद कुछ कर पाऊँगी। तब तक पढते रहिये इन को । धन्यवाद्

जो बनाये यूँ फसाने ये जवानी ठीक है क्या
तोड दे जो बाँध सारे,वो रवानी ठीक है क्या।

क्या नहीं था दिल जलाने के लिये यूँ पास मेरे
पर जलाये दिल मेरा तेरी निशानी ठीक है क्या

कह रही है माँ उसे, ससुराल तेरा मायका है
फिर न बेटी बात माने ये सयानी ठीक है क्या

दर्द आहें और गम उसने दिये हैं मुझको लेकिन
याद उसकी लगती है फिर भी सुहानी ठीक है क्या

क्यों करें वो काम जिसमे हो बुराई ही बुराई
बाँध गठरी पाप की सर पर उठानी ठीक है क्या

आदमी की आदमी से दुशमनी का दौर देखो
भूलना चाहें नहीं बातें पुरानी ठीक है क्या

तू बता क्यों है खफा मुझ से ए हमदम
रूठने की बात जो तूने है ठानी ठीक है क्या


तुझ को खामोशी सदा *निर्मल* बडी अच्छी लगे है
पर जुबाँ पर ही रहे उसकी कहानी ठीक है क्या

27 January, 2010

पुस्तक समीक्षा 
द्वारा- श्रीमती निर्मला कपिला
जब कि पुस्तक समीक्षा मेरी लेखन   विधा नही है मगर जब दीपक चौरसिया 'मशाल' की पुस्तक *अनुभूतियाँ* पढी तो अपने मन में उपजी अनुभूतिओं को लिखे बिना रह नहीं पाई। इस पुस्तक की जिस बात ने मुझे सबसे अधिक प्रभावित किया, वो है मानवीय सम्बन्धों की सुगन्ध, उस सुगन्ध में महके बचपन की अनुभूतियां, स्मृतियाँ और संस्कार। फिर भी उसने समाज के इन्सान के  राजनीति के अच्छे बुरे सब पहलूओं पर बेबाक कलम चलाई है। हर कविता अपने को प्रतीक मान कर उसकी आत्मानुभूतियाँ हैं, जो देखा जो भोगा। ऐसे समय मे जबकि रिश्तों की अहमियत लुप्त हो रही है संयुक्त परिवार की परंपरा खत्म हो रही है,  एक युवा कवि  का उन रिश्तों की अहमियत की बात करना निस्सन्देह किसी संस्कारवान व्यक्तित्व की ओर इशारा करता है और ये  सुखकर भी लगता है। दीपक आज भी उन रिश्तों की यादें मन मे संजोये हैं जिन मे रह कर वो पला बढा और  जो अब दुनिया मे नहीं हैं वो भी उसकी यादों मे गहरे से जीवित हैं। उसकी एक कविता ने मुझे गहरे से छुआ है ''*तुम छोटी बऊ*'' --- छोटी बऊ उसके दादा (बाबा) की चाची थीं जो निःसंतान थीं और जिन्होंने पूरा जीवन इस परिवार को समर्पित कर दिया। बऊ से मिले प्यार और बचपन की अबोध शरारतों को जो उनकी गोद मे किया करते थे उन्हें बहुत सुन्दर शब्दों में उतारा है और उसी कविता की ये अंतिम पँक्तियाँ देखें

'कितना ही सुख पाऊँ
मगर हरदम जीत तुम्हारी ही होगी छोटी बऊ
मदर टेरेसा ना मिली मुझे
पर तुम मे देखा उन्हें प्रत्यक्ष
तुम थीं हाँ तुम्हीं हो
मेरी ग्रेट मदर टेरेसा छोटी बऊ'


    माँ से दुनिया शुरू होती है शायद हर कवि मन माँ के लिये जरूर कुछ लिखता है

'माँ तेरी बेबसी आज भी
 मेरी आँखों मे घूमती है
  तुमने  तोड़े थे सारे चक्रव्यूह
 कौन्तेयपुत्र से भी अधिक
 जबकि नहीं जानती थीं तुम

निकलना बाहर....
या शायद जानती थीं
पर नहीं निकलीं
हमारी खातिर,
अपनी नहीं
अपनों की खातिर'

 माँ की कुर्बानियों को बहुत सुन्दर शब्दों से अभिव्यक्त किया है।
'दुनिया की हर ऊँचाई
तेरे कदम चूमती है
माँ आज भी
तेरी बेबसी
मेरी आँखों मे घूमती है।'

एक और कविता की ये पँक्तियाँ शायद उसके विदेश जाने के बाद माँ के लिये उपजी व्यथा है।
'यहाँ सब बहुत खूबसूरत है
पर माँ
मुझे फिर भी तेरी जरूरत है'

हर युवा की तरह जवानी के प्यार को भी अभिव्यक्त किया है मगर कुछ निराशा से। *कैसे हो*  ये गीत भी गुनगुनाने लायक है। इसमें तारतम्यता, लयबदधता और रस का बोध होता है जिसमे कि दो प्रेम पंछियों को विपरीत स्वभाव वाला कहा गया है....
'उगते हुए लाल सूरज सी तुम
दहकते हुये सुर्ख शोले सा मैं
ठहरे हुये गहरे सागर सा मैं
बहती हुयी एक नदिया सी तुम
तुम मौजों से लड़ना चाहती

मैं साहिल पे चलना चाहता
कहो-कहो तुम्ही कहो...

मुहब्बत मुमकिन कैसे हो?'

हासिल, मजबूरियां, छला गया, इन्तज़ार, कैसे यकीन दिलाऊँ, पागल, मन-चन्चल-गगन पखेरू है, रिश्ता, देखूँगा और  चाहत शीर्षक वाली रचनाओं में प्रेमानुभूति के साथ-साथ एक दर्द है किसी को न पा सकने का... मजबूरियाँ देखिये-
'बात इतनी सी है
कि अब जब  भी
जमीं पर आओ

इतनी मजबूरियाँ ले कर मत आना
कि हम मिल कर भी
न मिल सकें'

एक और कविता देखिये *मैं छला गया* की कुछ पँक्तियाँ
'दिल मे जिसको बसा के हम

बस राग वफा के गाते थे
हम कुछ तो उसकी सुनते थे
कुछ अपनी बात सुनाते थे
पर दिल मे रह  कर दिल को वो
कुछ जख्म से दे कर चला गया
छला गया मैं छला गया'

तो वहीँ  बंदिशें एक व्यंग्य रचना है जो कि राजनीतिक सरहदों की बात करती है और चीड, देवदार के पेड़ों के माध्यम से इंसां को समझाती है कि-
'ये सरहदें तुम्हारी बनायीं हैं
और सिर्फ तुम्हारे लिए हैं'

 ऎसा नही है कि कवि केवल रिश्तों तक ही सीमित रहा... उसने समाज के विभिन्न पहलुओं को बड़ी बेबाकी से छुआ। समाज मे इन्सान के चरित्र की गिरावट, वैर, विरोध, झूठ-कपट कवि के भावुक मन को झकझोरते रहे है और  वो कराहते हुये पुकार उठता है-----

कब आओगे वासुदेव की कुछ पँक्तियाँ
'अधर्म के दलदल में हैं
अर्जुन के भी पाँव
और रथ के पहिये...
कितने कर्ण खड़े हैं

सर संधान करने को
मगर अबकी बार
हल्का क्यों है
सच का पलड़ा?
सच कहो कब आयोगे वासुदेव?'

और अंतर्नाद गीत की एक झलक देखें कैसे उसके पौरुष को ललकारती हैं----

'खुँखार हुये कौरव के शर
गाण्डीव तेरा क्यों हल्का है
अर्जुन रण रस्ता देख रहा
विश्राम नहीं इक पल का है'

ऎक और चीज़ इस पुस्तक में है जिसने मुझे बहुत प्रभावित किया उसका चिन्तन, जिस से उसकी आत्मा सहसा ही अपने मन के अंतर्द्वंद कह उठती है--
'कृष्ण बनने की कोशिश मे
मैं भीष्म होता जा रहा हूँ
अक्सर चाहता हूँ बसन्त होना
जाने क्यों ग्रीष्म होता जा रहा हूँ'

इसी संदर्भ मे उसकी कुछ कवितायें-- चेहरे और गिनती, अपने-पराये, थकावट, फैशनपरस्ती, बड़ा बदमाश और शीर्षक कविताअनुभूतियाँ सराहने योग्य हैं।  ये पँक्तियाँ देखिये----
'शिव रूप पे लगे कलंकों को
तुम कुचल कुचल कर नाश करो
नापाक हुई इस धरती को
खल रक्त से फिर से साफ करो
जो हुया विश्व गुरू अपराधी
आयेंगे फिर न राम
प्रभु कर भी दो विध्वंस जहां'

कई बार खुद अपने को ही समझ नही पाता---- *विलीव इट और नाट* जिसमे आदमी को कई चेहरे लगाये दुनिया का बेस्ट एक्टर  कहता है अपने माध्यम से। ये पंम्क्तियां देखिये----
'स्वप्नों मे आ कर

धमकाती हैं
धिक्कारती हैं
मेरे अन्तस की अनदेखियाँ
झपकती पलकों की अनुभूतियाँ'

कई बार तो इस छट्पटाहट से हताश हो कर वो मन ही मन इन चुनौतिओं से समझौता करने की बात करने लगता है---- मन के कोलाहल को  शाँत करने की कोशिश करता है----

'जब किस्मत में 
उनके साथ ही रहना लिखा है

तो क्यों न उन से
समझौता कर लूँ
बस इस लिये मैंने....
मेरी उलझनो ने...
और मेरी परिस्थितिओं ने
आपस मे समझौता कर लिया।'

   नारी संवेदना को भी उसने दिल से समझा और महसूस किया है। वो आतंकवाद समझती है, साबित करने के लिये, परंपरा की चाल विशेष रूप से उल्लेखनीय रचनायें हैं... परम्परा की चाल स्त्री की तकलीफ भी है और रूढ़िवादी, अनावश्यक परम्परा के खिलाफ आवाज़ भी. साबित करने के लिए देखिये-
'तुम समन्दर हो गये

वो कतरा ही रह गयी
फिर भी डरते हो क्यों
कि वो कहीं उठ न जाये
तुम्हें कतरे का
कर्जदार साबित करने के लिये'

वो देश की राजनीति पर भी मौन नहीं रहा। बापू गान्धी को प्रतीक बना कर आज की राजनीति को उसने खूब आढे हाथों लिया है। *बापू भी खुश होते*, *बोली कब लगनी है* और *तुम न थे* देशभक्ति, राजनीतिक कटाक्ष और महापुरुषों से सीख देने के लिए प्रेरक उल्लेखनीय रचनायें हैं-
'बापू तेरी सच्चाई की
बोली कब लगनी है
घडियाँ, ऐनक सब बिके

कब प्यार की बोली लगनी है'

और जो सब से अच्छी कविता इस सन्दर्भ में मुझे लगी वो है लोकतन्त्र को लेकर--
'मैं अबोला एक भूला सा वेदमंत्र हूँ
खामियों से लथपथ मैं लोकतन्त्र हूँ

तंत्र हूँ स्वतन्त्र हूँ,दृष्टी मे मगर ओझल
मैं आत्मा से परतन्त्र हूँ
कहने को बढ रहा हूँ
पर जड़ों मे न झाँकिये
वहाँ से सड़ रहा हूँ मैं'

और अन्त मे कुछ नया सोचने के लिये प्रेरित करती पँक्तियाँ
'नये सिरे से सोचें हम
नयी सी कोई बात करें'

 *सिगरेट*, बेरोजगारी, जन्मदिन, खंडहर की ईँट, दशहरा, पतंग रचनायें विभिन्न विषयों पर अनुभूतियों के समेटे हैं और सामजिक सरोकारों को लेकर लिखी गयी हैं। कवि अपनी अनुभूतिओं को कोई आवरण नहीं ओढाता बस जस की तस सामने रख देता है। कई बार वहाँ रस और लय का अभाव खटकता है मगर उसने  अपने अन्दर के सच को ज़िन्दा रखने के लिये शब्दों से, कोई समझौता नहीं किया। जैसा की वैदेही शरण 'जोगी' जी ने कहा है कि दीपक की अनुभूतियाँ सत्य की ऊष्मा की अनुभूतियाँ हैं और डाक्टर मोहम्मद आजम जी ने दीपक के बारे मे कहा है कि इनमे कसक, तडप, सच्चाई, बगावत, आग, जज़्बात, इश्क, तहज़ीब, देशभक्ति, तंज व व्यंग, रिश्तों की पाकीज़गी आदि वो सब गुण हैं जो एक व्यक्ति को कवि,शायर का दर्ज़ा देते है।  इस पुस्तक का पूरा श्रेय वो अपने परम आदरणीय गुरूदेव श्री पंकज सुबीर जी को देता है।आज के युवाओं मे गुरू शिष्य परंपरा का जीवन्त उदाहरण है उस का ये समर्पण ।
   पुस्तक का आवरण साज-सज्जा सहज ही आकर्षित करती है। शिवना प्रकाशन इस के लिये बधाई की पात्र है|  आशा है पाठक इस पुस्तक का खुले दिल से स्वागत करेंगे और ये हाथों हाथ बिकेगी। आने वाले समय का ये उभरता हुया कवि, शायर, कहानीकार है।
 जो हर विधा मे लिखता है।  ब्लोग पर इसके इस फन को महसूस किया जा सकता है। कामना करती हूँ इस दीपक की लौ हमेशा सब के लिये दीपशिखा सी हो और इसकी चमक दुनिया भर में फैले।

पुस्तक ---- अनुभूतियाँ
कुल्र रचनायें---56
पृष्ठ संख्या--104
प्रकाशित मूल्य--- २५० रुपये
प्रचार हेतु प्रारंभिक मूल्य- १२५ रुपये
प्रकाशक -- शिवना प्रकाशन , पी.सी.लैब, अपोजिट न्यू बस स्टैंड ,सिहोर(म.प्र.) 466001


25 January, 2010

जीना सीख लिया है। [कविता]
चल रही है दोनो
मखमली सी चाहतें
और
और खार सी जिन्दगी
समानान्तर रेखाओं की तरह
दूरी बना कर
उठता है
दोनो के बीच
एक समुद्र
कुछ अनुभूतियाँ और
कुछ संवेदनाये लिये
कभी कभी बह जाता है
कागज़ की पगडंडियों पर
शब्दों की दो किरणें
उधार ले कर
शायद दोनो ने
जीना सीख लिया है
कागज़ के साथ


23 January, 2010

संजीवनी [कहानी] अन्तिम  कडी

 पिछली कडियों मे आपने पढा कि सुधाँशू की मौत हो गयी। और किस तरह विकल्प ने उसे उन सभी बातों का एहसास करवाया जो उसने कभी सोचने की जरूरत ही महसूस नहीं की। आज जल्दी जल्दी मे पोस्ट लिखी है टाईप की गलतिओं के लिये क्षमा चाहती हूँ अब आगे----
अंतिम रस्मे पूरी हो गयी। रिश्ते दार जा चुके थे
 रहते भी क्यों जैसी औपचारिकता आप निभाती आयीं थीं वही वो निभा कर वले गये।
मैं पिता जी के वचन को पूरा करने के लिये आपसे बात करने रुक गया था। मैं तुम्हें अपने साथ ले जाना चाहता था। तुम से बात की तो तुम ने कह दिया कि मैं नौकरी नहीं छोद सकती। साथ ही मुझे परामर्श दे डाला कि अगर तुम चाहते हो तो मैं यहाँ तुम्हारे लिये एक कम्पनी खोल सकती हूँ। और कहा कि मैं अकेले रह सकती हूँ तुम अपने करियर को देखो।
 * मुझ अतृप्त की कितनी बडी परीक्षा लेना चाहती थी आप। मैं निराश हो गया। आपका तर्क था कि अगर मैं काम मे व्यस्त रहूँगी तो सुधाँशू के गम को भूल पाऊँगी, दूसरा मैं तिम पर बोझ बनना नहीं चाहती।क्या यही दुख हम दोनो मिल कर नहीं बाँट सकते थी? मैने तो सुना था कि माँ बाप बच्चों पर बोझ नहीं होते । बच्चे कभी उनका कर्ज़ नहीं चुका सकते। मगर माँ वो आपकी सोच थी मैं ऐसा नहीं सोचता था। मुझे लगता था कि मैं आपका और आप मेरा बोझ बाँट लेंगी--- जीवन भर की अतृप्त इच्छाओं का बोझ। खैर सारी आशायें छोड मैं फिर से लखनऊ आ गया। आते वक्त पिता जी की कुछ फाईलें और एक डायरी आप से बिना पूछे उठा लाया था। इतना तो उन पर मेरा हक बनता था। मुझे लगा था कि शायद मैं फिर कभी लखनऊ न आ पाऊँगा।यहाँ भी मन नहीं लगता कई बार आपको फोन किया महज औपचारिक बातें हुयी। मैं उसके बाद घर नहीं आया।*
* अभी एक दो दिन पहले मैने पिता जी के डायरी खोली। तब बिना देखे ही रख ली थी। उसमे पिता जी ने मेरे लिये एक लिफाफा रखा था। खोला तो पिता जी का पत्र था। शायद उन्हें आभास हो गया था कि वो अधिक दिन जिन्दा नहीं रहेंगे-- इस लिये आखिरी प्रयत्न करना चाहते थे हम दोनो के बीच की दूरी मिटाने के लिये। पत्र ये भी बहुत बडा है मगर उसमे से कुछ अंश आपको भेज रहा हूँ-- ताकि आप  मेरे इस पत्र का आशय  समझ सको।*

बेटा विकल्प !
          पता नहीं   मैं ठीक हो पाऊँगा या नहीं। अगर मुझे कुछ हो गया तो मेरी आत्मा भटकती रहेगी। तुम्हारे साथ हुये अन्याय से और मानवीतथा तुम्हारे बीच तनाव को ले कर। बेटा! तुम दोनो मुझे बहुत प्रय हो तो क्या मेरी आत्मा की शान्ति के लिये तुम दोनो एक प्रयास नहीं कर सकते? मानवी मेरी कम्ज़ोरी रही हैउसे बहुत प्यार करता हूँ मगर उसे कुछ कहने का साहस नहीं कर पाता। इस लिये तुम्हें एक बात समझाना चाहता हूँ। मुझे लगता है कि तुम मेरी बात को जरूर समझोगे। मानवी दिल की बुरी नहीं है ये यकीन मानो। उसका दोष भी नहीं है, वो जिस आधुनिक महौल मे पली है, जैसे उसे संस्कार मिले हैं वो वैसी ही है---- भावनाओं से दू, प्रेकटीकल्, अति महत्वाकाँक्षी। मक़िं इसी तथ्य को मान कर ,उसकी हर सोच के साथ समझौता करता चला गया। यहीं पर मैं गलत हो गया। ये बात मैं अब जान सका हूँ। दाँपत्य जीवन तो बचा रहा मगर कुछ चाहतों की वजह से मैं भी अतृप्त रहा। तुम्हारे जन्म के बाद मुझे अपनी गलती का एहसास हुया।मगर तब तक देर हो चुकी थी मानवी से कुछ भी कहना बेकार था। मैने उससे बहुत प्यार किया उसके इस भ्रम को इस जीवन सन्ध्या मे तोडना नहीं चाहता। वो भी मुझे बहुत चाहती है मगर उसका अन्दाज़ अलग है। वो मेरे बिना जी नहीं पायेगी। अगर अपने पिता की अत्मा की शाँति के लिये कुछ कर सकते हो तो बस उसे समझने की कोशिश करो और अपने सब गिले भूल जाओ। वो उपर से जितनी कठोर लगती है दिल से उतनी ही कोमल है। वो घुट घुट कर मर जायेगी मगर अपने दिल की बात किसी से नहीं कहेगी। मैं तुम्हारा गुनहगार हूँ--- अपनी वंश बेल बढाने के लिये मैने तुम्हारा बचपन तुम से छीन लिया माँ का प्यार छीन लिया। क्षमा चाहता हूँ मेरी अन्तिम इच्छा पूरी कर सको तो अपनी माँको अपना लो।* तुम्हारा गुनहगार पिता

  पत्र पढते हुये मानवी के सब्र का बाँध टूट गया ओह उसने अपनी सोच के आगे क्यों कभी सोचने देखने की जरूरत नहीं समझी । म्क़ैने सुधाँशू के साथ इतना बडा अन्याय कर दिया और उसने उफ तक नहीं की----- सोचते हुये मानवी विकल्प का पत्र फिर पढने लगी------
*माँ आज फिर से मै एक प्रयास कर रहा हूँ और करता रहूँगा पिता जी के लिये तुम्हें समझने की कोशिश कर रहा हूँ। तुम सोच रही होगी कि अगर मैं रिश्ता सुधारना चाहता हू तो पत्र मे अतनी कडवाहट क्यों भरी? शायद आप नहीं जानती जो कभी अनकहा मन मे रह जाता है वो कभी जीने नहीं देता कभी न कभी सिर उठा लेता है, सालता रहता है। अपने दिल मे तुम्हारे लिये स्थान बनाने के लिये अपने दिल से इस मवाद को निकालना जरूरी था। और मेरा है भी कौन जो मेरे दुख बाँट सके। बहुत कुछ इस लिये भी कहा है कि तुम भी मेरे इस क्षोभ को समझ सको। तुम मेरे बारे मे कुछ नहीं जानती--- कुछ भी नहीं--- तुम्हारा बेटा किस यन्त्रना से गुज़र रहा है। जब ये दर्द तीर की तरह तुम्हारे दिल मे चुभेगा तभी तुम मुझे जान पाओगी। मैं आज आपकी आत्मा को झकझोर देना चाहता हूँ।*
*माँ खिडकी के सामने सडक के उस पार गाय खडी है। बछडा उचक उचक कर कितनी उमंग से उसका दूध पी रहा है--- और गाय बछडे को प्यार से चाट रही है--- शायद ये दुनिया का सब से अनमोल सुख है, तृप्ति है जिस से मैं वंचित रहा हूँ। उसके पास ही एक पेड पर चिडिया अपने घोंसले के पास बैठी है। वो बाहर से दाना चुग कर लाती है और खुद अपने बच्चों के मुंह मे डालती है--- बच्चों की चोंच से चोंच मिला कर प्यार का इज़्हार करती है। माँ क्या इन्सान जानवर से भी बदतर हो गया है पशु पक्षियों की मांयें नहीं बदली  फिर इन्सान के माँ बाप क्यों खुदगर्ज़ हो गये हैं। किसी बच्चे को माँ की गोद मे देखता हूँ तो मन मे टीस उठती है। पता नहीं मुझे जन्म देने वाली माँ की क्या मजबूरी थी ,जो अपनी ममता का गला घोंट दिया। मेरा बचपन तो इस आधुनिकता की भेंट चढ चुका है नगर बाकी जीवन तो बचा सकती हो। आज अपने अन्दर का हर दर्द आपकी आत्मा मे चुभा देना चाहता हूँ मैने सुना है कि पूत कपूत हो सकता है पर माता कुमाता नहीं---- आज मैं देखना चाहता हूँ कि क्या तुम मुझे वो संजीवनी दे सकती हो---- माँ के वात्सलय और स्नेह की संजीवनी---- माँ मैं जीना चाहता हूँ----- बस एक बार बेटा कह कर प्यार से मुझे पुकारो गले लगा लो माँ----* तुम्हारा विकल्प ।

पत्र समाप्त हो चुका था----- एक जलजला आया था मानवी के दिल मे जो उसके व्यक्तित्व को हिला गया ---- किस दुनिया मे जी रही थी वो--- उसके सामने ज़िन्दगी के सुन्दर पल बिखर रहे थे मगर वो देख न पाई---- पहले सुधाँशू ---- फिर विकल्प?-----। अब क्या बचा है उसके पास । दौलत और पद प्रतिषठा के अहं मे किसी की भावनाओं को कभी समझा हे नही। ---- सुधाँशू हर पल पास होते हुये भी कितने अकेले थे---- और विकल्प--- अनथ संतप्त इतना आक्रोश और मन मे इतनी आग जलाये कैसे जी रहा है वो---- फिर भी मेरा सहारा बनना चाहता है और एक मैं कि उसके पिता की मौत पर उसे सहला भी न पाई। उसे लगा कि विकल्प की इस आग ने उसकी अत्मा मे जमी संवेदनहीनता की बर्फ कोपिघला दिया है----- और वो आँसू बन कर आँखों से बह रही है--- आँसू बहे जा रहे थे --- अविरल --- कहीं दूर 3 बजे के घँटे की आवाज़ सुनाई दी---- बरबस ही उसके हाथ टेलिफोन की तरफ बढ गये---  वो विकल्प का नम्बर डायल कर रही थी---- शायद उसकी बची ज़िन्दगी के लिये संजीवनी देना चाहती थी--
*हेलो* दूसरी तरफ से आवाज़ आयी
*बेटा*----- आगे एक शब्द न बोल सकी।
*माँ* ----- और दोनो निशब्द जाने कितनी देर आँसू बहाते रहे।------  समाप्त
हमारे वैग्यानिक अपनी ज़िन्दगी के सब सुख छोड कर हमारी सुख सुविधा के लिये नये नये अविष्कार करते हैं मगर हम अपनी महत्वाकाँषाओं व तृष्णाओं को पूरा करने के लिये उनका दुरुपयोग करने लगते हैं। *इन्विट्रो फर्टेलाईजेशन* भी उन बेऔलाद लोगों के लिये किया ग्या अविश्कार है जो किसी रोग या प्रकृतिक कारणो के चलते अपनी औलाद पैदा करने मे अस्मर्थ हैं लेकिन कुछ माँयें इसका उपयोग केवल अपने फर्ज़  से बचने के लिये, केवल अपने करियर और मातृत्व कष्टों को न सहन करना पडे इस लिये कर रहे हैं। इस के क्या परिणाम हो सकते हैं? इस कहानी की तरह जरूरी नहीं कि सभी बच्चे विकल्प की तरह समझदार हों असली ज़िन्दगी मे ऐसा होता भी कम है।तो वो क्या गलत कदम नहीं उठा सकते । ये कहानी बहुत बडी है इसे संक्षिप्त किया गया है विकल्प अपनी जन्म देने वाली माँ से भी मिलता है मगर पाठक बोर न हों लम्बी कहानी से इस लिये इसे यहीं समाप्त किया जा रहा है।

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