05 February, 2010

भूख
लघु कथा
मनूर जैसा काला, तमतमाया चेहरा,धूँयाँ सी मटमैली आँखें,पीडे हुये गन्ने जैसा सूखा शरीर ,साथ मे पतले से बीमार बच्चे का हाथ पकडे वो सरकारी अस्पताल मे डाक्टर के कमरे के आगे
लाईन मे खडा अपनी बारी की इन्तज़ार कर रहा था। मैं सामने खडी बडे देर से उसकी बेचैनी देख रही थी। मुझे लगा उसे जरूर कोई बडी तकलीफ है। वैसे तो हर मरीज बेचैनी और तकलीफ मे होता है मगर मुझे लगा कि उसके अन्दर जैसे कुछ सुलग रहा है, क्यों कि वो अपने एक हाथ की बन्द मुट्ठी को बार बार दबा रहा था-- और बच्चा जब भी उसकी उस मुट्ठी को छूता वो उसे और जोर से बन्द कर लेता।मुझ से रहा न गया,सोचा पता नही बेचारे को कितनी तकलीफ हो,शायद मैं उसकी कुछ सहायता कर सकूँ।---
*भाई साहिब क्या बात है?आप बहुत परेशान लग रहे हैं?* मैने उससे पूछा।
* बहन जी कोई बात नही,बच्चा बिमार है, डाक्टर को दिखाना है। * वो कुछ संभलते हुये बोला।
फिर आप बच्चे को  क्यों झकझोर रहे है, मुट्ठियाँ भीँच कर बच्चे पर गुस्सा क्यों कर रहे हैं?*
*क्या बताऊँ बहन जी, मेरा बच्चा कई दिन से बीमार है। और भरपेट रोटी न दे सकने से भूख से भी बेहाल है।कुछ खाने के लिये मचल रहा है।इस बन्द मुट्ठी मे पकडे पैसों को जो कि मेरा दो दिन की कमाई है इसकी भूख से बचा रहा हूँ।इसे समझा भी रहा हूँ कि बेटा तेरे पेट की भूख से बडी पैसे की भूख है इन पैसों से डाक्टर की पैसे की भूख मिटाऊँगा तब तेरा इलाज होगा। भला गरीब का क्या दो दिन न भी खाने को मिले जी लेगा। मुझे डर है कि मेरी बारी आने से पहले मुझे इसकी भूख तडपा न जाये और डाक्टर की भूख पर डाका डाल ले।* उसकी बात सुन कर मैं सोच रही हूँ कि जब डाक्टर को सरकार से तन्ख्वाह भी मिलती है फिर भी उसे पैसे की भूख है तो इस गरीब की दो दिन की कमाई केवल डाक्टर की फीस चुकाने मे लग जायेगी तो ये परिवार को खिलायेगा क्या???????????


03 February, 2010

गज़ल
इस गज़ल को भी ादरणीय प्राण भाई साहिब ने संवारा है । आखिरी 3-4 शेर बाद मे लिखे थे जिन्हें  अनुज प्रकाश सिंह अर्श ने संवारा है। धन्यवादी हूँ।
गज़ल
दर्द अपने सुनाना नहीं चाहती
ज़ख्म दिल के दिखाना नहीं चाहती

अब न पूछो  कि क्या साथ मेरे हुआ
मैं  हकीकत बताना नहीं   चाहती

मर्ज़ माना हुआ लाइलाज अब मगर
मैं दवा से दबाना  नहीं   चाहती

वो परिंदा  उड़े  तो कहीं  भी   उड़े
मैं जमीं पर गिराना नहीं  चाहती

राह मे जो मिले सब मुद्दई मिले    
 अब उसी राह जाना नहीं चाहती      
           
 मौसमी फूल सा प्यार उसका है जी
 प्यार उससे जताना  नहीं चाहती
              
  कौन बेबस नहीं इस जहाँ मे कहो  
   बेबसी मैं दिखाना नहीं चाहती

आँधियाँ जलजले और वो हादसे
क्या नहीं था बताना नहीं चाहती

चाहती हूँ, खुशी  से कटे  ज़िन्दगी
ग़म की महफ़िल में जाना नहीं चाहती

29 January, 2010

गज़ल
इस गज़ल को भी आदरणीय प्राण भाई साहिब ने संवारा है।बेशक अभी गज़ल मे गज़ल जैसा निखार नहीं आया मगर सीखने की राह पर हूँ। आपसब के प्रोत्साहन से और भाई साहिब के आशीर्वाद से शायद कुछ कर पाऊँगी। तब तक पढते रहिये इन को । धन्यवाद्

जो बनाये यूँ फसाने ये जवानी ठीक है क्या
तोड दे जो बाँध सारे,वो रवानी ठीक है क्या।

क्या नहीं था दिल जलाने के लिये यूँ पास मेरे
पर जलाये दिल मेरा तेरी निशानी ठीक है क्या

कह रही है माँ उसे, ससुराल तेरा मायका है
फिर न बेटी बात माने ये सयानी ठीक है क्या

दर्द आहें और गम उसने दिये हैं मुझको लेकिन
याद उसकी लगती है फिर भी सुहानी ठीक है क्या

क्यों करें वो काम जिसमे हो बुराई ही बुराई
बाँध गठरी पाप की सर पर उठानी ठीक है क्या

आदमी की आदमी से दुशमनी का दौर देखो
भूलना चाहें नहीं बातें पुरानी ठीक है क्या

तू बता क्यों है खफा मुझ से ए हमदम
रूठने की बात जो तूने है ठानी ठीक है क्या


तुझ को खामोशी सदा *निर्मल* बडी अच्छी लगे है
पर जुबाँ पर ही रहे उसकी कहानी ठीक है क्या

27 January, 2010

पुस्तक समीक्षा 
द्वारा- श्रीमती निर्मला कपिला
जब कि पुस्तक समीक्षा मेरी लेखन   विधा नही है मगर जब दीपक चौरसिया 'मशाल' की पुस्तक *अनुभूतियाँ* पढी तो अपने मन में उपजी अनुभूतिओं को लिखे बिना रह नहीं पाई। इस पुस्तक की जिस बात ने मुझे सबसे अधिक प्रभावित किया, वो है मानवीय सम्बन्धों की सुगन्ध, उस सुगन्ध में महके बचपन की अनुभूतियां, स्मृतियाँ और संस्कार। फिर भी उसने समाज के इन्सान के  राजनीति के अच्छे बुरे सब पहलूओं पर बेबाक कलम चलाई है। हर कविता अपने को प्रतीक मान कर उसकी आत्मानुभूतियाँ हैं, जो देखा जो भोगा। ऐसे समय मे जबकि रिश्तों की अहमियत लुप्त हो रही है संयुक्त परिवार की परंपरा खत्म हो रही है,  एक युवा कवि  का उन रिश्तों की अहमियत की बात करना निस्सन्देह किसी संस्कारवान व्यक्तित्व की ओर इशारा करता है और ये  सुखकर भी लगता है। दीपक आज भी उन रिश्तों की यादें मन मे संजोये हैं जिन मे रह कर वो पला बढा और  जो अब दुनिया मे नहीं हैं वो भी उसकी यादों मे गहरे से जीवित हैं। उसकी एक कविता ने मुझे गहरे से छुआ है ''*तुम छोटी बऊ*'' --- छोटी बऊ उसके दादा (बाबा) की चाची थीं जो निःसंतान थीं और जिन्होंने पूरा जीवन इस परिवार को समर्पित कर दिया। बऊ से मिले प्यार और बचपन की अबोध शरारतों को जो उनकी गोद मे किया करते थे उन्हें बहुत सुन्दर शब्दों में उतारा है और उसी कविता की ये अंतिम पँक्तियाँ देखें

'कितना ही सुख पाऊँ
मगर हरदम जीत तुम्हारी ही होगी छोटी बऊ
मदर टेरेसा ना मिली मुझे
पर तुम मे देखा उन्हें प्रत्यक्ष
तुम थीं हाँ तुम्हीं हो
मेरी ग्रेट मदर टेरेसा छोटी बऊ'


    माँ से दुनिया शुरू होती है शायद हर कवि मन माँ के लिये जरूर कुछ लिखता है

'माँ तेरी बेबसी आज भी
 मेरी आँखों मे घूमती है
  तुमने  तोड़े थे सारे चक्रव्यूह
 कौन्तेयपुत्र से भी अधिक
 जबकि नहीं जानती थीं तुम

निकलना बाहर....
या शायद जानती थीं
पर नहीं निकलीं
हमारी खातिर,
अपनी नहीं
अपनों की खातिर'

 माँ की कुर्बानियों को बहुत सुन्दर शब्दों से अभिव्यक्त किया है।
'दुनिया की हर ऊँचाई
तेरे कदम चूमती है
माँ आज भी
तेरी बेबसी
मेरी आँखों मे घूमती है।'

एक और कविता की ये पँक्तियाँ शायद उसके विदेश जाने के बाद माँ के लिये उपजी व्यथा है।
'यहाँ सब बहुत खूबसूरत है
पर माँ
मुझे फिर भी तेरी जरूरत है'

हर युवा की तरह जवानी के प्यार को भी अभिव्यक्त किया है मगर कुछ निराशा से। *कैसे हो*  ये गीत भी गुनगुनाने लायक है। इसमें तारतम्यता, लयबदधता और रस का बोध होता है जिसमे कि दो प्रेम पंछियों को विपरीत स्वभाव वाला कहा गया है....
'उगते हुए लाल सूरज सी तुम
दहकते हुये सुर्ख शोले सा मैं
ठहरे हुये गहरे सागर सा मैं
बहती हुयी एक नदिया सी तुम
तुम मौजों से लड़ना चाहती

मैं साहिल पे चलना चाहता
कहो-कहो तुम्ही कहो...

मुहब्बत मुमकिन कैसे हो?'

हासिल, मजबूरियां, छला गया, इन्तज़ार, कैसे यकीन दिलाऊँ, पागल, मन-चन्चल-गगन पखेरू है, रिश्ता, देखूँगा और  चाहत शीर्षक वाली रचनाओं में प्रेमानुभूति के साथ-साथ एक दर्द है किसी को न पा सकने का... मजबूरियाँ देखिये-
'बात इतनी सी है
कि अब जब  भी
जमीं पर आओ

इतनी मजबूरियाँ ले कर मत आना
कि हम मिल कर भी
न मिल सकें'

एक और कविता देखिये *मैं छला गया* की कुछ पँक्तियाँ
'दिल मे जिसको बसा के हम

बस राग वफा के गाते थे
हम कुछ तो उसकी सुनते थे
कुछ अपनी बात सुनाते थे
पर दिल मे रह  कर दिल को वो
कुछ जख्म से दे कर चला गया
छला गया मैं छला गया'

तो वहीँ  बंदिशें एक व्यंग्य रचना है जो कि राजनीतिक सरहदों की बात करती है और चीड, देवदार के पेड़ों के माध्यम से इंसां को समझाती है कि-
'ये सरहदें तुम्हारी बनायीं हैं
और सिर्फ तुम्हारे लिए हैं'

 ऎसा नही है कि कवि केवल रिश्तों तक ही सीमित रहा... उसने समाज के विभिन्न पहलुओं को बड़ी बेबाकी से छुआ। समाज मे इन्सान के चरित्र की गिरावट, वैर, विरोध, झूठ-कपट कवि के भावुक मन को झकझोरते रहे है और  वो कराहते हुये पुकार उठता है-----

कब आओगे वासुदेव की कुछ पँक्तियाँ
'अधर्म के दलदल में हैं
अर्जुन के भी पाँव
और रथ के पहिये...
कितने कर्ण खड़े हैं

सर संधान करने को
मगर अबकी बार
हल्का क्यों है
सच का पलड़ा?
सच कहो कब आयोगे वासुदेव?'

और अंतर्नाद गीत की एक झलक देखें कैसे उसके पौरुष को ललकारती हैं----

'खुँखार हुये कौरव के शर
गाण्डीव तेरा क्यों हल्का है
अर्जुन रण रस्ता देख रहा
विश्राम नहीं इक पल का है'

ऎक और चीज़ इस पुस्तक में है जिसने मुझे बहुत प्रभावित किया उसका चिन्तन, जिस से उसकी आत्मा सहसा ही अपने मन के अंतर्द्वंद कह उठती है--
'कृष्ण बनने की कोशिश मे
मैं भीष्म होता जा रहा हूँ
अक्सर चाहता हूँ बसन्त होना
जाने क्यों ग्रीष्म होता जा रहा हूँ'

इसी संदर्भ मे उसकी कुछ कवितायें-- चेहरे और गिनती, अपने-पराये, थकावट, फैशनपरस्ती, बड़ा बदमाश और शीर्षक कविताअनुभूतियाँ सराहने योग्य हैं।  ये पँक्तियाँ देखिये----
'शिव रूप पे लगे कलंकों को
तुम कुचल कुचल कर नाश करो
नापाक हुई इस धरती को
खल रक्त से फिर से साफ करो
जो हुया विश्व गुरू अपराधी
आयेंगे फिर न राम
प्रभु कर भी दो विध्वंस जहां'

कई बार खुद अपने को ही समझ नही पाता---- *विलीव इट और नाट* जिसमे आदमी को कई चेहरे लगाये दुनिया का बेस्ट एक्टर  कहता है अपने माध्यम से। ये पंम्क्तियां देखिये----
'स्वप्नों मे आ कर

धमकाती हैं
धिक्कारती हैं
मेरे अन्तस की अनदेखियाँ
झपकती पलकों की अनुभूतियाँ'

कई बार तो इस छट्पटाहट से हताश हो कर वो मन ही मन इन चुनौतिओं से समझौता करने की बात करने लगता है---- मन के कोलाहल को  शाँत करने की कोशिश करता है----

'जब किस्मत में 
उनके साथ ही रहना लिखा है

तो क्यों न उन से
समझौता कर लूँ
बस इस लिये मैंने....
मेरी उलझनो ने...
और मेरी परिस्थितिओं ने
आपस मे समझौता कर लिया।'

   नारी संवेदना को भी उसने दिल से समझा और महसूस किया है। वो आतंकवाद समझती है, साबित करने के लिये, परंपरा की चाल विशेष रूप से उल्लेखनीय रचनायें हैं... परम्परा की चाल स्त्री की तकलीफ भी है और रूढ़िवादी, अनावश्यक परम्परा के खिलाफ आवाज़ भी. साबित करने के लिए देखिये-
'तुम समन्दर हो गये

वो कतरा ही रह गयी
फिर भी डरते हो क्यों
कि वो कहीं उठ न जाये
तुम्हें कतरे का
कर्जदार साबित करने के लिये'

वो देश की राजनीति पर भी मौन नहीं रहा। बापू गान्धी को प्रतीक बना कर आज की राजनीति को उसने खूब आढे हाथों लिया है। *बापू भी खुश होते*, *बोली कब लगनी है* और *तुम न थे* देशभक्ति, राजनीतिक कटाक्ष और महापुरुषों से सीख देने के लिए प्रेरक उल्लेखनीय रचनायें हैं-
'बापू तेरी सच्चाई की
बोली कब लगनी है
घडियाँ, ऐनक सब बिके

कब प्यार की बोली लगनी है'

और जो सब से अच्छी कविता इस सन्दर्भ में मुझे लगी वो है लोकतन्त्र को लेकर--
'मैं अबोला एक भूला सा वेदमंत्र हूँ
खामियों से लथपथ मैं लोकतन्त्र हूँ

तंत्र हूँ स्वतन्त्र हूँ,दृष्टी मे मगर ओझल
मैं आत्मा से परतन्त्र हूँ
कहने को बढ रहा हूँ
पर जड़ों मे न झाँकिये
वहाँ से सड़ रहा हूँ मैं'

और अन्त मे कुछ नया सोचने के लिये प्रेरित करती पँक्तियाँ
'नये सिरे से सोचें हम
नयी सी कोई बात करें'

 *सिगरेट*, बेरोजगारी, जन्मदिन, खंडहर की ईँट, दशहरा, पतंग रचनायें विभिन्न विषयों पर अनुभूतियों के समेटे हैं और सामजिक सरोकारों को लेकर लिखी गयी हैं। कवि अपनी अनुभूतिओं को कोई आवरण नहीं ओढाता बस जस की तस सामने रख देता है। कई बार वहाँ रस और लय का अभाव खटकता है मगर उसने  अपने अन्दर के सच को ज़िन्दा रखने के लिये शब्दों से, कोई समझौता नहीं किया। जैसा की वैदेही शरण 'जोगी' जी ने कहा है कि दीपक की अनुभूतियाँ सत्य की ऊष्मा की अनुभूतियाँ हैं और डाक्टर मोहम्मद आजम जी ने दीपक के बारे मे कहा है कि इनमे कसक, तडप, सच्चाई, बगावत, आग, जज़्बात, इश्क, तहज़ीब, देशभक्ति, तंज व व्यंग, रिश्तों की पाकीज़गी आदि वो सब गुण हैं जो एक व्यक्ति को कवि,शायर का दर्ज़ा देते है।  इस पुस्तक का पूरा श्रेय वो अपने परम आदरणीय गुरूदेव श्री पंकज सुबीर जी को देता है।आज के युवाओं मे गुरू शिष्य परंपरा का जीवन्त उदाहरण है उस का ये समर्पण ।
   पुस्तक का आवरण साज-सज्जा सहज ही आकर्षित करती है। शिवना प्रकाशन इस के लिये बधाई की पात्र है|  आशा है पाठक इस पुस्तक का खुले दिल से स्वागत करेंगे और ये हाथों हाथ बिकेगी। आने वाले समय का ये उभरता हुया कवि, शायर, कहानीकार है।
 जो हर विधा मे लिखता है।  ब्लोग पर इसके इस फन को महसूस किया जा सकता है। कामना करती हूँ इस दीपक की लौ हमेशा सब के लिये दीपशिखा सी हो और इसकी चमक दुनिया भर में फैले।

पुस्तक ---- अनुभूतियाँ
कुल्र रचनायें---56
पृष्ठ संख्या--104
प्रकाशित मूल्य--- २५० रुपये
प्रचार हेतु प्रारंभिक मूल्य- १२५ रुपये
प्रकाशक -- शिवना प्रकाशन , पी.सी.लैब, अपोजिट न्यू बस स्टैंड ,सिहोर(म.प्र.) 466001


25 January, 2010

जीना सीख लिया है। [कविता]
चल रही है दोनो
मखमली सी चाहतें
और
और खार सी जिन्दगी
समानान्तर रेखाओं की तरह
दूरी बना कर
उठता है
दोनो के बीच
एक समुद्र
कुछ अनुभूतियाँ और
कुछ संवेदनाये लिये
कभी कभी बह जाता है
कागज़ की पगडंडियों पर
शब्दों की दो किरणें
उधार ले कर
शायद दोनो ने
जीना सीख लिया है
कागज़ के साथ


23 January, 2010

संजीवनी [कहानी] अन्तिम  कडी

 पिछली कडियों मे आपने पढा कि सुधाँशू की मौत हो गयी। और किस तरह विकल्प ने उसे उन सभी बातों का एहसास करवाया जो उसने कभी सोचने की जरूरत ही महसूस नहीं की। आज जल्दी जल्दी मे पोस्ट लिखी है टाईप की गलतिओं के लिये क्षमा चाहती हूँ अब आगे----
अंतिम रस्मे पूरी हो गयी। रिश्ते दार जा चुके थे
 रहते भी क्यों जैसी औपचारिकता आप निभाती आयीं थीं वही वो निभा कर वले गये।
मैं पिता जी के वचन को पूरा करने के लिये आपसे बात करने रुक गया था। मैं तुम्हें अपने साथ ले जाना चाहता था। तुम से बात की तो तुम ने कह दिया कि मैं नौकरी नहीं छोद सकती। साथ ही मुझे परामर्श दे डाला कि अगर तुम चाहते हो तो मैं यहाँ तुम्हारे लिये एक कम्पनी खोल सकती हूँ। और कहा कि मैं अकेले रह सकती हूँ तुम अपने करियर को देखो।
 * मुझ अतृप्त की कितनी बडी परीक्षा लेना चाहती थी आप। मैं निराश हो गया। आपका तर्क था कि अगर मैं काम मे व्यस्त रहूँगी तो सुधाँशू के गम को भूल पाऊँगी, दूसरा मैं तिम पर बोझ बनना नहीं चाहती।क्या यही दुख हम दोनो मिल कर नहीं बाँट सकते थी? मैने तो सुना था कि माँ बाप बच्चों पर बोझ नहीं होते । बच्चे कभी उनका कर्ज़ नहीं चुका सकते। मगर माँ वो आपकी सोच थी मैं ऐसा नहीं सोचता था। मुझे लगता था कि मैं आपका और आप मेरा बोझ बाँट लेंगी--- जीवन भर की अतृप्त इच्छाओं का बोझ। खैर सारी आशायें छोड मैं फिर से लखनऊ आ गया। आते वक्त पिता जी की कुछ फाईलें और एक डायरी आप से बिना पूछे उठा लाया था। इतना तो उन पर मेरा हक बनता था। मुझे लगा था कि शायद मैं फिर कभी लखनऊ न आ पाऊँगा।यहाँ भी मन नहीं लगता कई बार आपको फोन किया महज औपचारिक बातें हुयी। मैं उसके बाद घर नहीं आया।*
* अभी एक दो दिन पहले मैने पिता जी के डायरी खोली। तब बिना देखे ही रख ली थी। उसमे पिता जी ने मेरे लिये एक लिफाफा रखा था। खोला तो पिता जी का पत्र था। शायद उन्हें आभास हो गया था कि वो अधिक दिन जिन्दा नहीं रहेंगे-- इस लिये आखिरी प्रयत्न करना चाहते थे हम दोनो के बीच की दूरी मिटाने के लिये। पत्र ये भी बहुत बडा है मगर उसमे से कुछ अंश आपको भेज रहा हूँ-- ताकि आप  मेरे इस पत्र का आशय  समझ सको।*

बेटा विकल्प !
          पता नहीं   मैं ठीक हो पाऊँगा या नहीं। अगर मुझे कुछ हो गया तो मेरी आत्मा भटकती रहेगी। तुम्हारे साथ हुये अन्याय से और मानवीतथा तुम्हारे बीच तनाव को ले कर। बेटा! तुम दोनो मुझे बहुत प्रय हो तो क्या मेरी आत्मा की शान्ति के लिये तुम दोनो एक प्रयास नहीं कर सकते? मानवी मेरी कम्ज़ोरी रही हैउसे बहुत प्यार करता हूँ मगर उसे कुछ कहने का साहस नहीं कर पाता। इस लिये तुम्हें एक बात समझाना चाहता हूँ। मुझे लगता है कि तुम मेरी बात को जरूर समझोगे। मानवी दिल की बुरी नहीं है ये यकीन मानो। उसका दोष भी नहीं है, वो जिस आधुनिक महौल मे पली है, जैसे उसे संस्कार मिले हैं वो वैसी ही है---- भावनाओं से दू, प्रेकटीकल्, अति महत्वाकाँक्षी। मक़िं इसी तथ्य को मान कर ,उसकी हर सोच के साथ समझौता करता चला गया। यहीं पर मैं गलत हो गया। ये बात मैं अब जान सका हूँ। दाँपत्य जीवन तो बचा रहा मगर कुछ चाहतों की वजह से मैं भी अतृप्त रहा। तुम्हारे जन्म के बाद मुझे अपनी गलती का एहसास हुया।मगर तब तक देर हो चुकी थी मानवी से कुछ भी कहना बेकार था। मैने उससे बहुत प्यार किया उसके इस भ्रम को इस जीवन सन्ध्या मे तोडना नहीं चाहता। वो भी मुझे बहुत चाहती है मगर उसका अन्दाज़ अलग है। वो मेरे बिना जी नहीं पायेगी। अगर अपने पिता की अत्मा की शाँति के लिये कुछ कर सकते हो तो बस उसे समझने की कोशिश करो और अपने सब गिले भूल जाओ। वो उपर से जितनी कठोर लगती है दिल से उतनी ही कोमल है। वो घुट घुट कर मर जायेगी मगर अपने दिल की बात किसी से नहीं कहेगी। मैं तुम्हारा गुनहगार हूँ--- अपनी वंश बेल बढाने के लिये मैने तुम्हारा बचपन तुम से छीन लिया माँ का प्यार छीन लिया। क्षमा चाहता हूँ मेरी अन्तिम इच्छा पूरी कर सको तो अपनी माँको अपना लो।* तुम्हारा गुनहगार पिता

  पत्र पढते हुये मानवी के सब्र का बाँध टूट गया ओह उसने अपनी सोच के आगे क्यों कभी सोचने देखने की जरूरत नहीं समझी । म्क़ैने सुधाँशू के साथ इतना बडा अन्याय कर दिया और उसने उफ तक नहीं की----- सोचते हुये मानवी विकल्प का पत्र फिर पढने लगी------
*माँ आज फिर से मै एक प्रयास कर रहा हूँ और करता रहूँगा पिता जी के लिये तुम्हें समझने की कोशिश कर रहा हूँ। तुम सोच रही होगी कि अगर मैं रिश्ता सुधारना चाहता हू तो पत्र मे अतनी कडवाहट क्यों भरी? शायद आप नहीं जानती जो कभी अनकहा मन मे रह जाता है वो कभी जीने नहीं देता कभी न कभी सिर उठा लेता है, सालता रहता है। अपने दिल मे तुम्हारे लिये स्थान बनाने के लिये अपने दिल से इस मवाद को निकालना जरूरी था। और मेरा है भी कौन जो मेरे दुख बाँट सके। बहुत कुछ इस लिये भी कहा है कि तुम भी मेरे इस क्षोभ को समझ सको। तुम मेरे बारे मे कुछ नहीं जानती--- कुछ भी नहीं--- तुम्हारा बेटा किस यन्त्रना से गुज़र रहा है। जब ये दर्द तीर की तरह तुम्हारे दिल मे चुभेगा तभी तुम मुझे जान पाओगी। मैं आज आपकी आत्मा को झकझोर देना चाहता हूँ।*
*माँ खिडकी के सामने सडक के उस पार गाय खडी है। बछडा उचक उचक कर कितनी उमंग से उसका दूध पी रहा है--- और गाय बछडे को प्यार से चाट रही है--- शायद ये दुनिया का सब से अनमोल सुख है, तृप्ति है जिस से मैं वंचित रहा हूँ। उसके पास ही एक पेड पर चिडिया अपने घोंसले के पास बैठी है। वो बाहर से दाना चुग कर लाती है और खुद अपने बच्चों के मुंह मे डालती है--- बच्चों की चोंच से चोंच मिला कर प्यार का इज़्हार करती है। माँ क्या इन्सान जानवर से भी बदतर हो गया है पशु पक्षियों की मांयें नहीं बदली  फिर इन्सान के माँ बाप क्यों खुदगर्ज़ हो गये हैं। किसी बच्चे को माँ की गोद मे देखता हूँ तो मन मे टीस उठती है। पता नहीं मुझे जन्म देने वाली माँ की क्या मजबूरी थी ,जो अपनी ममता का गला घोंट दिया। मेरा बचपन तो इस आधुनिकता की भेंट चढ चुका है नगर बाकी जीवन तो बचा सकती हो। आज अपने अन्दर का हर दर्द आपकी आत्मा मे चुभा देना चाहता हूँ मैने सुना है कि पूत कपूत हो सकता है पर माता कुमाता नहीं---- आज मैं देखना चाहता हूँ कि क्या तुम मुझे वो संजीवनी दे सकती हो---- माँ के वात्सलय और स्नेह की संजीवनी---- माँ मैं जीना चाहता हूँ----- बस एक बार बेटा कह कर प्यार से मुझे पुकारो गले लगा लो माँ----* तुम्हारा विकल्प ।

पत्र समाप्त हो चुका था----- एक जलजला आया था मानवी के दिल मे जो उसके व्यक्तित्व को हिला गया ---- किस दुनिया मे जी रही थी वो--- उसके सामने ज़िन्दगी के सुन्दर पल बिखर रहे थे मगर वो देख न पाई---- पहले सुधाँशू ---- फिर विकल्प?-----। अब क्या बचा है उसके पास । दौलत और पद प्रतिषठा के अहं मे किसी की भावनाओं को कभी समझा हे नही। ---- सुधाँशू हर पल पास होते हुये भी कितने अकेले थे---- और विकल्प--- अनथ संतप्त इतना आक्रोश और मन मे इतनी आग जलाये कैसे जी रहा है वो---- फिर भी मेरा सहारा बनना चाहता है और एक मैं कि उसके पिता की मौत पर उसे सहला भी न पाई। उसे लगा कि विकल्प की इस आग ने उसकी अत्मा मे जमी संवेदनहीनता की बर्फ कोपिघला दिया है----- और वो आँसू बन कर आँखों से बह रही है--- आँसू बहे जा रहे थे --- अविरल --- कहीं दूर 3 बजे के घँटे की आवाज़ सुनाई दी---- बरबस ही उसके हाथ टेलिफोन की तरफ बढ गये---  वो विकल्प का नम्बर डायल कर रही थी---- शायद उसकी बची ज़िन्दगी के लिये संजीवनी देना चाहती थी--
*हेलो* दूसरी तरफ से आवाज़ आयी
*बेटा*----- आगे एक शब्द न बोल सकी।
*माँ* ----- और दोनो निशब्द जाने कितनी देर आँसू बहाते रहे।------  समाप्त
हमारे वैग्यानिक अपनी ज़िन्दगी के सब सुख छोड कर हमारी सुख सुविधा के लिये नये नये अविष्कार करते हैं मगर हम अपनी महत्वाकाँषाओं व तृष्णाओं को पूरा करने के लिये उनका दुरुपयोग करने लगते हैं। *इन्विट्रो फर्टेलाईजेशन* भी उन बेऔलाद लोगों के लिये किया ग्या अविश्कार है जो किसी रोग या प्रकृतिक कारणो के चलते अपनी औलाद पैदा करने मे अस्मर्थ हैं लेकिन कुछ माँयें इसका उपयोग केवल अपने फर्ज़  से बचने के लिये, केवल अपने करियर और मातृत्व कष्टों को न सहन करना पडे इस लिये कर रहे हैं। इस के क्या परिणाम हो सकते हैं? इस कहानी की तरह जरूरी नहीं कि सभी बच्चे विकल्प की तरह समझदार हों असली ज़िन्दगी मे ऐसा होता भी कम है।तो वो क्या गलत कदम नहीं उठा सकते । ये कहानी बहुत बडी है इसे संक्षिप्त किया गया है विकल्प अपनी जन्म देने वाली माँ से भी मिलता है मगर पाठक बोर न हों लम्बी कहानी से इस लिये इसे यहीं समाप्त किया जा रहा है।

21 January, 2010

संजीवनी कहानी  अगली कडी
पिछली कडियों मे आपने पढा मानवीएक महत्वाकाँक्षी ,अधुनिक विचारों की औरत है।\उसका करियर खराब न हो और फिगर खराब न हो इस लिये अपने बच्चे को जन्म न दे कर किराये की कोख से बच्चा लिया मगर उसे भी माँ जैसा प्यार न दे सकी । पूरी कहानी मे वो बेटा विकल्प उसे पत्र दुयारा उसकी गलती का एहसास करवा रहा है--- आगे
इसी गम मे पिता जी को एक दिन दिल का दौरा पडा। आपके साथ उस समय एक आध मुलाज़म को छोड कर कोई नहीं था। होता भी कैसे? तुम कभी किसी के दुख सुख मे शरीक हुयी होती तो। तुम ने घबरा कर मुझे फोन किया। मैं पहुँचा तो तुम पिता जी के बेड के पास बैठी रो रही थी। मुझे देखते ही तुम उठी और मेरे गले लग कर  फूट फूट कर रोने लगी। अंदर तक भीग गया मैं। पिता जी की आँखों मे पहली बार हलकी सी सकून की एक किरण देखी। शायद तु7म तब भी एक बेटे के गले नहीं लगी थी बल्कि अपनी खरीदी हुयी वस्तु का प्रयोग कर रही थी। फिर भी बहुत अच्छा लगा कि कम से कम तुम्हें ये तो महसूस हुया कि जीवन म्के ऐसे पल भी आते हैं जब हमे रोने के लिये एक कन्धे की जरूरत पडती है। मुझे कुछ आशा भी हुई कि तुम अब अपनो का महत्व समझोगी।*
मानवी की आँखें नम हुई जा रही थीं ---- सच कहा है विकल्प ने उसे तब किसी की जरूरत महसूस हुई थी जो इस दुख की घडी मे उसका साथ दे सके। कई बार विकल्प को भी इस की जरूरत पडी होगी मगर वो समझ न पाई--- पत्र फिर से आगे पढने लगी---

*पिता जी कुछ संभले तो उन्हें घर ले आये। मैने लम्बी छुट्टी ले ली थी,क्यों कि इस दुनिया मे एक ही इन्सान मेरा अपना था----उन की खातिर मैं कुछ भी कर सकता था आप से समझौता भी। तभी से आपके साथ  सहज् रहने की कोशिश करता। बहुत देर बाद उस दिन हम तीनों ने इकट्ठे खाना खाया था मुझे तुम से बातें करते देख पिता जी बहुत खुश होते। तुम्हारी बातें करियर से ले कर मल्टीनेशनल कम्पनी के बारे मे ही होती। मक़िं चाहता था कि तुम मुझ से मेरे बारे मे भी पूछो कि बेटा तुम अकेले कैसे रहते हो, खाना कहाँ खाते हो, अच्छा लगता है कि नहीं , अपनी सेहत का ध्यान रखते हो कि नहीं आदि आदि।*
*उस दिन हम तीनो खाना खा रहे थे तो पिता जी बोले,"मानवी देखो विकल्प हमारा कितना ध्यान रखता है।*
*वो तो ठीक है,इसे अब अपनी ड्यूटी पर भी जाना चाहिये। नई नई नौकरी है ,इतनी छुट्टी लेना भी ठीक नहींइससे करियर पर असर पडता है।*
*तुम ने ापनी बात कह दी मगर पिता जी की आँखों मे एक साया सा लहराया फिर भी उन्होंने साहस बटोरा---
*क्या ऐसा नही हो सकता कि हम दोनो रिटायरमेन्ट लेकर बेटे के साथ रहें।*
*सुधाँशू तुम होश मे तो हो?* फिर न जाने क्या सोच कर तुम ने बात बनाने की कोशिश की
* देखो हम अच्छे भले बेटे पर बोझ क्यों बनें?ाभी मेरी प्रोमोशन होने वाली है। मुझे अभी और आगे जाना है।* कह कर तुम उठ गयी।
पिता जी ने मेरा हाथ थपथपाया और हम दोनो पिता जी के कमरे मे देर तक बातें करते रहे और तुम स्टडी मे रही।
उस दिन पिता जी ने मेरे साथ बहुत बातें की। सब से अधिक तुम्हारे बारे मे तुम्हारे सपनों और उडान के बारे मे। शायद वो एक भूमिका बना रहे थे कि मैं आपको समझूँ। पिता जी तुम से कितना प्यार करते थे-- एक पल के लिये भी तुम्हें नाराज़ या उदास नहीं देख सकते थे। उस दिन उन्हों ने मुझ से वादा लिया था कि अगर उन्हें कुछ हो जाये तो मैं आपका ध्यान रखूँ चाहे कुछ भी हो। सच मानो मुझे उस दिन आपसे ईर्ष्या  होने लगी थी पिता जी को मुझ से अधिक आपकी चिन्ता थी।*
पढते हुये मानवी के सब्र का बाण्ध टूटने लगा था--- आँसो अविरल बह चले थे। सुधाँशो को याद कर । सक़्च मे सुधाँशू का प्यार सच्चा था। उसने तो कभी सुधाँशू के बारे मे कभी ऐसे सोचा ही नहीं था कि सुधाँशू के लिये कभी कुछ किया हो आज उसे बहुत कुछ विचलित करने के लिये काफी था। फिर पत्र पर न्गाह गयी

*माँ मेरे चाहने जीवन मे कभी हुया है कुछ भी? पिता जी ठीक हुये ,मैं लखनऊ लौट गया। मैं अपने जीवन के कोरे कागज़ पर रंग भरने की सोच ही रहा था, मैं पिता जी की खुशी के लिये आपके साथ रिश्ते सुधारने की कोशिश करना चाहता था। वषों से रिश्तों पर जमी बर्फ को पिघलाने  की कोशिश कर रहा था फोन पर तुम से बात करता। मगर मन की मन मे रह गयी। कुछ दिन बाद ही पिता जी के हमे छोड जाने की खबर ने मुझे तोड दिया। हम दोनो के बीच का सेतु टूट गया था। तुम्हाक़्रे दुख को मैं समझ सकता था मगर मेरे दुख को समझने वाला कोई नहीं था।
* मैं साये की तरह तुम्हारे साथ रहना चाहता था । पिता जी के बचन को निभाना चाहता था। तुम से प्रेम बाँटना चाहता था--- तुम्हें सांत्वना देना चाहता था--- मगर तुम्हें अपनी निज़ी ज़िन्दगी मे दूसरो का हस्तक्षेप पसंद नहीं था। तुम ने मौन धारण कर लिया। तुम ने एक बार भी मेरे सिर पर हाथ नहीं रखा,सांत्वना एक शब्द नहीं कहा। मैं अनाथ हो गया था।
* अंतिम रस्मे पूरी हो गयी। रिश्ते दार जा चुके थे
 रहते भी क्यों जैसी औपचारिकता आप निभाती आयीं थीं वही वो निभा कर वले गये।* क्रमश:


19 January, 2010

संजीवनी----- अगली कडी
पिछली कडियों मे  आपने पढा कि मानवी एक महत्वाकाँक्षी महिला हैं। जो अपने करियर और फिगर को बनाये रखने के लिये बच्चे को जन्म देना नहीं चाहती। मगर पति की इच्छा देखते हुये किराये की कोख से एक बच्चा लिया ।कैसे बच्चा माँ का प्यार दुलार न मिलने से उससे दूर होता चला गया । पति की मौत के बाद जब वो अकेली हो गयी तो विकल्प ने उसे माँ के कर्तव्य समझाने और अपने रोश का कारण बताने के लिये मानवी को एक चिठी लिखी। मानवी वो चिट्ठी पढ रही है------ [ असल मे पूरी कहानी ही एक चिट्ठी के माधयम से कही गयी है अगर विकल्प ये बातें मानवी के सामने आ कर कहता तो शायद उसे देख कर मानवी का अहं सिर उठालेता और वो इस पर अधिक सोच न सकती। इसे सामने रख कर ही पत्र के माध्यम से ये कहानी कही है]--- 
आगे
*माँ बात यहीं खत्म नही हुयी। उसके बाद मेरा पालन पोषण भी किराये की आया के हाथों ही हुया। तुम्हारे पास तो समय ही नहीं था मेरे लिये। मुझे खिलाना पिलाना नहलाना यहाँ तक कि सुलाना भी आयाके हाथ ही रहा। पिताजी जरूर मेरे साथ कुछ समय बिताते , कई बार वो भी तुम्हें नागवार गुजरता-----*\
पढते पढते मानवी को कई पल याद आये जब विकल्प को उसकी जरूरत थी मगर उसके पास समय भी नहीं था। समय हो सकता था अगर उसे दिल से उस बच्चे के लिये प्यार होता। वात्सल्य की एक  किरण भी उसके मन मे कभी फूटी होती। उसे याद आया कि जिस दिन वो बच्चे को घर ले कर आयी थी, तब वो दोनो ही खुश थे सुधाँशू इस लिये कि उसे वारिस मिल गया था और वो इस लिये कि अब उसे बच्चे को जन्म देने का झंझट नहीं करना पडेगा। अगले दिन विकल्प कुछ बिमार हो गया। उसने बिस्तर पर उल्टी कर दी बस फिर क्या था मानवी का मूड उखड गया था।
"मैने पहले ही कहा था कि मुझे ये बच्चो वाला झंझट अच्छा नहीं लगता। कितनी बदबू आने लगी है कमरे मे। "
सुधाँशू चुप रहे मानवी ने आया को आवाज़ दी कि बच्चे और बिस्तर को उठा कर ले जाये । अगले दिन फिर जब सुधाँशू ने बच्चे को साथ सुलाना चाहा तो मानवी नाराज़ हो गयी। उसे अपनी निज़ी ज़िन्दगी मे भी किसी और का होना अच्छा नहीं लगा। फिर कई बार ऐसा हुया जब बिमारी मे बच्चे को माँ की जरूरत होती है तो वो कभी दफ्तर मे तो कभी किसी पार्टी मे होती। बस आ कर आया से बच्चे का हाल पूछ लेती जब खेलता होता तो जरा सा बुला लेती। सोचते सोचते मानवी फिर से पत्र को पढने लगी।  उसे अब अपनी गलती का एहसास होने लगा था शायद --

 माँ मुझे नहीं लगता कि मेरे जन्म दिन के इलावा आप कभी मेरे लिये एक खिलौना भी लाई हो। आप आफिस चली जाती,तो आया अपने बच्चे को ले आती। उसे गोद मे ले कर  बालों को सहलाते हुये ,मेरे हिस्से का आधा दूध पिला देती। इस तरह चार साल का होते होते बहुत कुछ समझने लगा था।
कई बार मुझे नींद नहीं आती, मैं उसी तरह लोरी सुनना चाहता था जैसे आया अपने बच्चे को गोद मे ले कर सुनाती थी । मैं आपसे बतियाना चाहता, खेलना चाहता मगर आपके पास समय नहीं होता । आया के साथ सोते जब मुझे कभी नींद नहीं आती तो आया कडक आवाज़ मे मुझे डांम्ट देती और मैं डर से दुबक जाता। डर उसका बच्चा भी जाता मगर उसे वो अपनी छाती से लगा कर चुप करा लेती। क्या आप कल्पना कर सकती हैं मेरी त्रासदी का? आपकी आधुनिक सोच ने मेरा बचपन का सुख मुझ से छीन लिया। माँ के वात्सल्य से अतृप्त मेरी आत्मा आज भी उस संताप को झेल रही है*

पढते पढते मानवी के सब्र का बान्ध टूट गया आँखें उन सभी क्षणो को याद कर पश्चाताप मे बह रही थी। उसने कभी ऐसे सोचा ही नहीं था । भावुकता को वो कमजोरी समझती थी । सुधाँशू जैसा प्यार करने वाला पति पा कर ही वो दुनिया के बाकी रिश्तों की महक भूल गयी थी। अज भी उसे याद है कई बार विकल्प से कभी वो खुश मूड मे होती तो उसे अपने पास बुला लेती उस दिन सुधाँशू बहुत खुश होता और विकल्प को साथ सुला लेता मगर एक दो दिन बाद ही मानवी उकता जाती और फिर से उसे आया के पास भेज देती। वो पत्र छोड कर खिदकी मे आ कर खडी हो जाती है सामने सर्वेन्ट रूम के आंगन मे आया अपने बच्चे को गोद मे ले कर कैसे दुलार रही है, उसे लोरी सुना रही है और बच्चा खिलखिला कर उस से अठखेलियाँ कर रहा है--- विकल्प ने भी इसी तरह कई बार मचलना चाहा होगा  मगर उसने डाँट  कर उसे चुप करवा दिया था। उसी आया के घर के सामने बन्धी गाय कैसे अपने छोटे बच्चे को अपनी जीभ से चाट कर सहला रही थी--- उस मे कभी ऐसी ममता क्यों नही आयी----- क्या था जिसने मुझे इन भावनाओं से दूर रखा---- शायद उसका स्वार्थ था वो खुद को साबित करना चाहती थी व्यक्तित्व, करियर, और सौंदर्य पर ही उसने अपने ये अनमोल पल गंवा दिये थे  ---- खिडकी से हटने का उसका मन नहीं हो रहा था। बछडे और आया के बच्चे ने उसे विकल्प के बचपन की त्रास्दी और बाद मे उसके प्रति विकल्प के आक्रोश को समझा दिया था। आज उसे महसूस हुया कि औरत को कम से कम माँ का फर्ज़ नज़र अन्दाज़ नहीं करना चाहिये था। एक टीस उठी उसके मन मे विकल्प की उस अवस्था को याद कर उसके अन्दर कुछ पिघलने लगा था। फिर वो पत्र ले कर बैठ गयी
*माँ
मैं आया के बच्चों के संग बडा हुया खेला। उन से गन्दी बातें और गालियाँ सीखा । बडा होते होते तुम्हारे लिये मन मे आक्रोश पनपने लगा। तुम्हारा कहना न मानना ,बार बार तुम्हें तंग करना मेरी आदत मे शुमार हो गया। अपने अन्दर का आक्रोश निकालने के लिये मैं ऊल जलूल हरकतें करता ताकि तुम्हें दुखी कर सकूँ। पिता जी परेशान रहने लगी। फिर तुम्हारी राय पर मुझे रेज़िडेंशल स्कूल मे भेज दिया गया। मैं उस समय तीसरी कलास मे था। मुझे आज भी वो दिन याद है जब पिता जी मुझे छोदने आये तो उनकी आँखों मे आँसू थे। बहुत रोये थे मुझे गले से लगा कर शायद तुम भी उनके प्यार के बदले उन्हे कुछ नहीं दे सकी थी
। यूँ तो मैं हास्टल मे खुश था। पिता जी रोज़ फोन कर लेते और बातों बातों मे तुम्हारे लिये मेरे मन की मैल को साफ करने की कोशिश करते। तुम्हारी मजबूरियां बढा चढा कर बताते। हर माह मुझे एक दो दिन के लिये घर ले आते। उनसे जो प्यार मिला उसी के आसरे3 यहां तक पहुँचा हूँ। वो हर बार एक बात कहना नहीं भूलते* बेटा पढ लेना मुझे लाज मत लगवाना,तुझे बता नहीं सकता तुम मेरे लिये क्या मायने रखते हो मगर कुछ मजबूर हूँ*।कहते हुये वो आँख भर लेते। आज समझ आता है कि उनकी मजबूरी तुम थी। मैं बस उन्हें दुखी नहीं देख सकता था शायद इसी लिये इतना पढ गया*
अन्दर ही अन्दर शायद पिता जी को मेरा गम खाता रहा-- शायद तुम्हारी निष्ठुरता भी----। चलो मैं आई  ए एस बन गया। लखनऊ मे मेरी पोस्टिन्ग हुयी। अब घर आना कुछ कम हो गया था। मेरे और आपके सम्भन्ध कभी प्यार दुलार या सम्मान के नहीं रहे।*
* इसी गम मे पिता जी को एक दिन दिल का दौरा पडा। आपके साथ उस समय एक आध मुलाज़िम को छोड कर कोई नहीं था। आता भी कैसे? तुम कभी किसी के ------ क्रमश:

17 January, 2010

संजीवनी
*इन्विट्रो फर्टेलाईजेशन* जैसे अविष्कार ने आज कल जिस तरह एक व्यापार का रूप ले लिया है,जैसे कि कुछ लोग तो सही मे औलाद चाहते हैं इस लिये कोख किराये पर लेते हैं, मगर कुछ आधुनिक सोच की युवतियाँ जो केवल अपने करियर के लिये और अपने फिगर को बचाये रखने के लिये इस खोज का लाभ उठा रही हैं, उस के कुछ गलत परिणाम कुछ भावनात्मक पहलू भी हैं जिसे ध्यान मे रख कर ये कहानी लिखी गयी है।
संजीवनी {कहानी} अगली कडी   

पहली कडी मे आपने पढा कि मानवी के, उसके पति सुधाँशू की मौत के बाद, बेटे से सम्बन्ध अच्छे नहीं रहे थे।आज जब उसे बेटे विकल्प का पत्र मिला तो वो हैराम हुई, विकल्प ने लिखा था कि वो पत्र घर जा कर फुरसत मे ही पढै। वो घर आ कर उसका पत्र पढने लगी। अब आगे------
    मानवी ने दरवाज़ा अन्दर से बन्द किया और बेड रूम मे पत्र ले कर बैठ गयी। पत्र खोला---
माँ
माँ लिखते हुये खुद पर हैरत हो रही है। मम्मी कहूँ तो शायद् ठीक  रहेगा। क्यों कि पश्चिम के आधूनिकवाद की ओढनी--- नहीँ--- कवच पहन कर आप मम्मी कहलाना ही पसंद करेंगी। मुझे लगता है कि अब समय आ गया है कि आपको अपने 27 वर्षों का लेखा जोखा दूँ जो आपने मेरे लिये किया है। बेशक मेरी बातें आज आपको कडवी लगेंगी मगर बिना सुने आप समझ ही नहीं पायेंगी कि मुझे आपसे शिकायत क्यों रहती है। हम दोनो का रिश्ता सहज क्यों नहीं रहा। मैं वर्षों से जमे मन मे विष को निकालने का एक अवसर माँगना चाहता हूँ और चाहता हूँ कि हमारा रिश्ता हमेशा के लिये माँ-बेटे का पवित्र रिश्ता बन जाये। सब से पहले आपको ये बताना चाहता हूँ कि मैं आपके साथ सहज क्यों नहीं रहता।"
"माँ ये समझने के लिये पहले माँ के अर्थ और उसके वात्सल्य को समझना जरूरी है। माँ सृष्टी की अनुपम रचना है। इस पवित्र रिस्ज्ते के लिये वो अपने आप को मिटा देती है। मैं माँ के जितने रूप जानता हूँ--- वो बताता हूँ, उनमे से तुम खुद तय करना कि तुम कौन सी माँ हो"
एक माँ देवकी होती है जो बच्चे को जन्म देती है। वो गर्भ धाराण से नौ माह तक बच्चे को पेट मे छिपाये, उसे अपने खून से सींचती है। पहले दिन से जब बच्चा कोख मे आता है वो उसकी कल्पना मात्र से रोमाँचित, पुलकित महसूस करती है। उसके भविश्य के लिये सपने बुनने लगती है। नौ माह तकलीफें सह  कर भी उसके माथे पर शिकन तक नहीं आती । पेट मे बच्चे  की जरा सी हलचल उसके मन मे उमंग भर देती है। यहीं से बच्चा बहुत कुछ सीखता है। यहाँ से उसे प्यार की संवेदना का एहसास होता है।अभिमन्यू ने चक्रव्यूह भेदना माँ के पेट मे ही सीखा था।गर्भ से बाहर आते ही बच्चा सब से पहले माँ क स्पर्ष पहचानता है।खून के रिश्ते के साथ साथ वो दोनो संवेदनाओं से भी बन्ध जाते हैं। इसलिये वो माँ से बहुत प्यार करता है। लेकिन तुम ने अपने करियर , और तुम्हारी फिगर खराब न हो, तुम ने सन्तान को जन्म देने का अवसर खो दिया। फिर सन्तान के प्यार की चाह कैसी? अगर मुझे खरीदा भी तोेक वस्तु बना कर रख लिया।"
   " माँ के दूसरे पावन रूप को जानता हूँ वो है यशोधा माँ , जो बच्च्3ए को जन्म तो नहीं देती मगर अपने आँचल की छाँव देती है, पालन पोषण करती है, रातों की नीँद ,ापना सुख चैन उसके लिये लुटा देती है। बच्चे की किलकारिओं मे संसार का सारा सुख पा लेती है। उसकी जरा सी तकलीफ इन माँओं को बहुत बडा दुख लगता है। प्यार तुआग ममता से सराबोर माँ का संरक्षण पा कर बेटा सदा के लिये उसका ऋणी हो जाता है। उस माँ के आँचल की छाँव जीवन भर उसे सहलाती रहती है, उसकी लोरियों का संगीत, लय मे वात्सल्य का अनुराग उसे माँ से बान्धे रखता है। मगर हम दोनो के रिश्ते मे वो भी सुरताल नहीं बना।"
"तीसरी माँ होती है सौतेली माँ।सौतेली माँ भी अगर बच्चे को प्यार नहीं दे पाती तो उसके पीछे भी कई कारण होते हैं उसके लिये वो अकेली ही दोषी नहीं होती। उसे शादी का सुख भोगे बिना अपने कुछ सपनों अरमानों को उस बच्चे के लिये कुरबान करना पडता है ,जिस के लिये और भी बहुत से कारण हैं। फिर भी बहुट सी सौतेली माँये  अपने सौतेले बच्चों से प्यार करती हैं। उनकी तफ्सील मे न जा कर यही कहूँगा कि वो शायद परिस्थितिओं मे बुरी बन जाती है। सपनो के टूट जाने का क्षोभ कभी न कभी उसके व्यवहार मे उभर आता है। मगर तुम्हारे साथ तो ऐसा कुछ भी नहीं हुया। मेरे कारण तुम ने जीवन से कोई समझौता नहीं किया तुम्हारे कोई सपने नहीं टूटे बल्कि मुझे ले कर अपने सपने पूरे किये अपने करियर के लिये मम्तव को छोड दिया।"
"माँ बुरा मत मानना , मुझे आज तक ये समझ नहीं आया कि तुम्हें कौन सी माँ समझूँ? वैसे भी आपको रिश्तों नातों से मोह ही नहीं है। बाकी रिश्तेदारों से इसलिये मेल जोल नहीं रखा कि वो आपकी  पद प्रतिष्ठा का लाभ न उठायें। उन सब को आप मतलवी समझती हैं। आपने भौतिक सम्पदाओं को ही जीवन माना है और उसी मे आप निवेश करती हैं। जीवन मे प्यार सम्मान और रिश्ते पाने के लिये मानवीय संवेदनाओं प्यार और त्याग का निवेश करना पडता है।"
"नीम का पेड लगा कर आम पाने की आशा कैसे की जा सकती है?ापने मातहतों का सैल्यूट पा कर आप गर्व करती हैंपर क्या उन अपने अधीन्स्थ के अतिरिक्त कभी किसी क सम्मान पाया? मैं आप पर अंगुली नहीं उठा रहा मगर ये स्दमझाने की कोशिश कर रहा हूँ कि हम दोनो मे कौन सा प्यार है? किस सम्मान की आशा आप मुझ से करती हैं उसमे आपने क्या निवेश किया? मगर मैं फिर भी चाहता हूँ कि मैं आपके करीब आऊँ। आपसे प्यार करूँ शायद करता भी हूँ तभी तो ये कोशिश कर रहा हूँ कि आप मुझे समझें, प्यार दें।"
"मैं हैरान हूँ कि आपने मेरे पिता जी से प्यार किया। इसका कारण भी शायद पहले उनका रुतवा और रईस परिवार ही था या शायद कच्ची उम्र का तकाज़ा था कि प्यार कर बैठी। मगर पिता जी ने आपके प्यार को बखूबी निभाया। अपने जीवन से आपके लिये सब समझौते किये और उसी समझौते का परिणाम हूँ मैं।"
आदमी अपने सुख के लिये कठिन परिस्थितिओं मे कितनी आसानी से विकल्प ढूँढ लेता है--- अपने स्वार्थ के लिये दूसरे की बलि चढाने वाला विकल्प---- हाँ वही बलि का बकरा विकल्प हूँ मैं। पिता को अपने लिये वारिस चाहिये था मगर आप आधुनिक नारी  अपने करियर, सौंदर्य और फिगर को बच्चे के लिये दाँव पर नहीं लगा सकती थी। महज अपने पति की इच्छा के लिये आपने विकल्प ढूँढ लिया----*किराये की कोख *।"
मेरी नीँव ही धन दौलत,स्वार्थ,मजबूरी, और तृष्णाओं की रेत पर रखी गयी। कैसे भूल सकता हूँ कि मैं अपनी जन्म देने वाली माँ की मजबूरी और दूसरी माँ उन मजबूरिओं की खरीदार के बीच एक व्यवसायी डील का प्रोडक्ट हूँ।"
जिस वैग्यानिक ने इस *इन्विट्रो फर्टेलाईजेशन् {जिसे आज कल *किराये की कोख *के रूप मे देखा जाने लगा है} उसने कभी कल्पना भी नहीं की होगी कि उसका ये अविष्कार लोगों के स्वार्थ के चलते एक व्यापार बन जायेगा। इस तरह मैं किसी की चाहत नहीं बल्कि खरीदी गयी वस्तु बन गया। इस अमीर वंश को आगे बढाने के लिये एक गरीब वंश का अन्त हो गया। माँयही नहीं फिर मेरा आगे का सफर शुरू हुया, असली कहानी तो वहीं से शुरू होती है।------ क्रमश:
 

15 January, 2010

 संजीवनी { कहानी }
जैसे ही मानवी आफिस मे आकर बैठी ,उसकी नज़र अपनी टेबल पर पडी डाक पर टिक गयी। डाक प्रतिदिन उसके आने से पहले ही उसकी टेबल पर पहुँच जाती थीपर वो बाकी आवश्यक काम निपटाने के बाद ही डाक देखती थी। आज बरबस ही उसकी नज़र एक सफेद लिफाफे पर टिक गयी जो सब से उपर पडा था।उसके एक कोने पर भेजने वाले के स्थान पर *वी* लिखा था। पहचान गयी,पत्र विकल्प का था। क्या लिखा होगा इस पत्र मे?वो सोच मे पड गयी। कभी पत्र लिखता नहीं है । टेलीफोन पर बात कर लेता है। अब तो चार महीने से न टेलीफोन किया और न ही घर आया । पीछली बार भी एक दिन के लिये आया था और बहस कर चला गया। शायद मुझ पर रहम खाने आया था। सुधाँशू की मौत के बाद अकेली जो हो गयी हूँण ! मुझ से नौकरी छुदवा कर साथ चलने के लिये कह रहा था। हुउउ ! महज औपचारिकता ! जब मुझे मान सम्मान नहीं दे सकता, मेरी हर बात उसे बुरी लगती है-- तो फिर साथ रखने की औपचारिकता कैसी?  जैसे ही उसने लिफाफा खोला उस मे से एक और लिफाफा निकला जिस पर लिखा था कि इसे घर जा कर फुरसत मे पढें।
मानवी ने लिफाफा पर्स मे रख लिया मगर दिमाग मे हलचल थी कि पता नहीं इस लिफाफे मे ऐसा क्या है जो फुरसत मे पढने वाला है। एक क्षण के लिये सोचा कि आज कोई काम न कर के पत्र पढा जयी मगर उसी क्षण उसने अपना ईरादा बदल लिया। अपने काम और करियर से बढ कर उसके लिये उसके लिये कुछ मायने नहीं रखता था।तभी तो आज वो कम्पनी की एम डी  बनी। ये पत्र तो छोटी सी चीज़ है अपने करियर के लिये उसे अगर विकल्प को भी छोडना पडे तो छोड देगी।
          आजकल क्या मायने हैं औलाद के? बच्चे कहाँ माँ बाप का बुढापे मे ध्यान रखते हैं। वो क्यों किसी की परवाह करे। इन्हीं सोचों मे वो अपना काम करने लगी। मानवी ने अपने व्यक्तित्व और अपनी मान्यताओं से एक कदम भी आगे सोचना सीखा ही नहीं था। जीवन मे उसे सब कुछ सहज ही मिला। आधुनिकता और धन दौलत की पिपासा ने उसे संवेदनाओं से दूर कर दिया था। कागज़ के फूलों की तरह थी वो। जीवन के छोटे छोटे मीठे पल. रिश्तों की महक, ज़िन्दगी की मुस्कान सब कुछ उसकी दफ्तर की फाईलों मे गुम हो कर रह गया था। यूँ भी सुधाँशू की मौत के बाद काम के सिवा और रह भी क्या गया था उसकी ज़िन्दगी मे।अब विकल्प भी दूर होता जा रहा है। उसकी हर बात का विपरीत अर्थ लेता है।जैसे उसका विरोध करना ही विकल्प का एक मात्र ध्येय हो। वो सोचती के अपना -- अपना ही होता है! विकल्प उसका नहीं हो सकता। क्या नहीं दिया उन्होंने विकल्प को? इतना बडा घर बार ऐशो आराम की ज़िन्दगी-- हमारे काराण ही तो वो आई. ए. एस . बन पाया है। नहीं तो उसे जन्म देने वाली गरीब औरत उसकी सरकारी स्कूल की फीस भी नहीं दे पाती। सुधाँशू से उसे फिर भी लगाव था।उसका अपना बेटा जो था। तभी पिता की मौत के बाद उसने घर आना भी छोड  दिया था।
पी. ए के अन्दर आते ही वो सतर्क हो गयी और  अपना काम निपटाने लगी।
पाँच बजे अचानक उसे पर्स मे पडे लिफाफे की याद आयी। मन कुछ बेचैन सा हो गया। पता नहीं शायद सुधाँशू के बाद वो मानसिक तौर पर कुछ कमज़ोर हो गयी है--- क्यों बेचैन है वो पत्र पढने के लिये? वो सात बजे से पहले कभी आफिस से नहीं निकलती थी--- आज पाँच बजे ही उसने पर्स उठाया और आ कर गाडी मे बैठ गयी। पिछली सीट पर बैठते ही उसका मन हुया कि पत्र खोल ले मगर कुछ सोच कर वो रुक गयी। पता नहीं पत्र मे क्या होगा---- कही ड्राईवर ने शीशे मे से उसके चेहरे के भावों को पढ लिया तो? नहीं---- नहीं  --।
 जैसे ही वो घर का दरवाज़ा खोल कर अन्दर पहुँची बाहर सर्वेन्ट रूम से उसे देख कर बाई भी आ गयी।----
"मेम साहिब् , चाय बना लाऊँ।"
 "हाँ चाय बना कर यहाँ रख दो और तुम जाओ। आज खाना बाहर से फोन कर के मंगवा लूँगी।" कह कर वो टायलेट मे चली गयी
चाय रख कर बाई चली गयी। मानसी ने दरवाज़ा अन्दर से बन्द किया और बेड रूम मे पत्र ले कर बैठ गयी। पत्र खोला
"माँ"
चरण स्पर्श।
 माँ लिखते हुये पता नहीं क्यों  आँखें नम हो रही हैं और हैरत भी हो रही है।--- क्रमश:


13 January, 2010

क्या ये नशा है?
सब ओर एक अजीब सा सन्नाटा। अभी बच्चों के जाने के बाद 2-3 दिन मे सब कुछ ठीक हो गया था फिर आज क्या हुया? समझ नहीं आ रही थी। घर की हर चीज़ जैसे मायूस सी थी । घर की हर चीज़ जैसे मुझ से नज़रें चुरा रही थी। सब कुछ अजनबी सा लग रहा था सोचा चलो आज फ्री हूँ कुछ सफाई कर लेती हूँ। तस्वीरें उठा कर साफ करने लगी तो वो भी उदास । नातिन की एक गुडिया यहाँ रह गयी थी उसे साफ करने लगी तो वो जैसे रोने लगी कि उसके जाने के बाद मैने उसे भी नहीं पूछा। खैर किसी तरह सब काम निपटाया। नाश्ता किया । काम खत्म । अब  क्या किया जाये? बस घए मे एक मात्र प्राणे हमारे पति देव मन्द मन्द ,मुस्कुराते नज़र आये तो इनसे कहा कि चलो आज किसी के घर हो आते हैं बहुत दिन हो गये तो व्यंग से मुस्कुराये --हाँ आज तुम फ्री  हो न मगर मुझे बहुत काम है। बस आ कर अपने बिस्तर मे बैठ गयी । जनाब एक बजे तक 3 गज़लें तडा तड लिख लीं-- है न चमत्कार? फिर खाना बनाया। आराम किया । शाम को इन से कहा कि चलो अब एक ताश की बजी लगाते हैं मगर जनाब ऐसे नाराज़ कि कहते मुझे खेलना  भूल गया।शायद मुझे इस ब्लाग के नशे के बिना जीना सिखा रहे थे। मैं तो तंग आ गयी अब समय कैसे बिताया जाये फिर उठा ली कलम कागज़ दो गज़लें और लिख ली। खुद भी हैरान हूँ। बहुत मुश्किल से वो दिन बिताया आगले दिन फिर वही हाल अब तो कलम उठाने को भी मन नहीं किया।
 बस सोचती रही कि इतनी उदास क्यों हूँ। क्या आप सब को समझ आया? नहीं न तो बताये देती हूँ दो दिन से कम्पयूटर खराब था ब्लाग पर जो नहीं आ पाई थीूअपने ब्लाग परिवार से दूर रही तो उदास तो होना ही था । या ये नशा था ब्लाग का? या आप सब का स्नेह? आप बतायें। आज लिखने को कुछ नहीं वो गज़लें अभी पास होने के लिये भेजनी हैं।अज एक पुरानी कविता से काम चला लेते हैं। कल मिलते हैं एक नई रचना के साथ । नमस्कार ।
कविता
सतलुज की लहरों ने
जीवन का सार बताया
सीमा मे बन्ध कर रहने का
गौरव उसने समझाया
कहा! उन्मुक्त बहूँ तो
सिर्फ उत्पात मचाती हूँ
भाखडा बान्ध मे हो सीमित
गोबिन्द सागर कहलाती हूँ
देती हूँ बिजली घर घर
फस्लों को पानी पहुँचाते हूँ
पीने को पानी देती हूँ
सब को सुख पहुँचाती हूँ
जो समाज के नियम मे जीयेगा
वही इन्सान कहायेगा
जो तोडेगा इस के नियम
वो उपद्रवी कहलायेगा
तुम भी अनुशास्न मे रहना सीखो
मानव धर्म कमाओ
सतलुज की लहरों की मानिंद


09 January, 2010

गज़ल 
इस गज़ल को भीादरणीय प्राण भाई साहिब ने संवारा है। उनकी अति धन्यवादी हूँ।
गज़ल
हमारे नसीबां अगर साथ होते
बुरे वक़्त के यूँ न आघात होते.

गया वक़्त भी अपना होता सुहाना
सुहाने हमारे भी दिन रात  होते

जलाते न हम आशियाँ अपने हाथों
सफ़र जिंदगानी के सौगात होते

कभी वो जरा देखते हमको मुड़कर
न बर्बाद होने के हालात  होते

गरूर-ए-जबां यूँ न बेकाबू होती
न झगड़े अगर अपने बेबात होते

चली आंधियां,फासले बढ़ गये हैं
मेरे मौला  ऐसे न  हालात होते

तमन्ना अभी तक वो जिंदा है मुझमें
मुझे  थामते  हाथ में हाथ  होते

07 January, 2010

कविता
 ऐसा पहली बार हुया है कि इतने दिनों बाद पोस्ट लिखी हो। बेटी और नातिन एक माह से  आयी हुये थीं,। उनके जाते ही घर मे उदासी सी छा गयी।  उनके जाने पर मन में कुछ भाव आये  कविता के रूप मे कह रही हूँ ।

ममता
कई दिनों से घर मे थी
रोनक सी एक आयी
हंसी ,ठहाके,खेल तमाशे,
घर मे मस्ती रहती छाई
जब चली गयी घर की खुश्बू
चली गयी सब खुशियाँ
पंम्ख लगा कर उड गयी
छोटी सी वो गुडिया
तितली सी वो उडती थी
फूलों सी मुस्काती
नानी-- नानी कहतीवो
मेरे कन्धों पर चढ जाती
चहक उसकी कानों मे गूँजे
देखूँ इधर उधर
पर घर का हर कोना सूना
झाँकूँ जिधर  जिधर
शरारतें उसकी याद आयें
आँखें भर भर रोऊँ
किसे सुनाऊँ अपनी लोरी
किसे दर्द मैं कहूँ
अपनी इस ममता को
कैसे मैं सहलाऊँ
इन खाली दिवारों से
कैसे मन बहलाऊँ
रुक नहीं सकते उडते पँछी
रुक नहीं सकती बहती धारा
कहीँ भी जाये कहीं  रहे वो
जीवन हो उसका उजियारा


30 December, 2009

सन 2009  तेरा शुक्रिया

वर्ष 2009 का जाते हुये धन्यवाद न करूँ तो ये कृ्त्घ्नता होगी। अगर मैं कहूँ कि ये साल मेरी ज़िन्दगी का सब से खूबसूरत और खुशियाँ देने वाला साल रहा तो गलत न होगा। प्यार रिश्तों का मोहताज़ नहीं होता। अन्तर्ज़ाल जैसी आभासी दुनिया मे भी रिश्ते कैसे फलते फूलते हैं ये महसूस कर अभिभूत हूँ।
जो प्यार और सम्मान मुझे इस साल मे मिला है उसकी तुलना  दुनिया की किसी भी दौलत से नहीं की जा सकती ।। इस ब्लाग जगत ने मुझे अथाह प्यार दिया है, जिस मे अपने सब दुख तकलीफें अकेलापन यहाँ तक कि अपनी बिमारी भी भूल गयी हूँ। सब से बडी उपल्ब्धि मुझे दो भाईयों का प्यार बहुत मिला है। बडे भाई साहिब श्री प्राण शर्मा जी ने जो स्नेह और आशीर्वाद मुझे दिया है उससे मेरी ऊर्जा कई गुना बढ गयी है । आज कल किस के पास इतना समय है। वो मुझे गज़ल ही नहीं सिखाते और भी बहुत अच्छी अच्छी बातें सिखाते  हैं । उनसे बात करके हमेशा खुद को पहले से सबल पाया है। जब मैने गज़ल सीखनी शुरू की तो मैं कहती थी कि मुझे कभी भी गज़ल लिखनी नहीं आ सकती मगर उन्होंने मुझे हमेशा उत्साहित किया। बेशक अभी अधिक अच्छी गज़ल कह नहीं पाती मगर गज़ल के गुर सीख रही हूँ। जब ब्लागिन्ग शुरू की थी तब मुझे कविता और गज़ल मे अन्तर नहीं पता था मगर भाई साहिब के स्नेह, पेशैंस और आशीर्वाद ने सीखने की राह आसान कर दी। उनकी ऋणी हूँ। उसके बाद छोटे भाई श्री पंकज सुबीर जी 01 ने मुझे *दी* कह कर अपने स्नेह मे बाँध लिया है। 1973 और 1983 मे दो भाई खोये थे और 2009 मे दोनो को पा लिया इससे बडी उपल्ब्धि और क्या हो सकती है। इसके बाद राज भाटिया जी ने भी यही सम्मान मुझे दिया। यूँ तो और बहुत से नाम हैं मगर इन से जो प्यार और सहयोग मिला उस की मिसाल नहीं है। दूसरी सब से बडी उपल्ब्धि है मुझे अर्श { प्रकाश सिंह अर्श} जैसा बेटा मिला इस के बारे मे इतना ही कहूँगी कि वो मेरी हर मुश्किल का हल है और मेरे हर सवाल का जवाब है,  हर दुख ,सुख उस से कह लेती हूँ। फिर अच्छे बच्चों की तरह मुझे मश्विरा देता है ।हाँ मेरी गलती पर मुझे डाँट भी देता है।--- मुझे शब्द नहीं सूझ रहे कि उसके लिये क्या कहूँ। इसके बाद दीपक मशाल ने मुझे बहुत सम्मान दिया। यहाँ तक कि वो मुझ से मिलने मेरे पास नंगल भी आये। उसका प्यार और सम्मान पा कर अभिभूत हूँैआज के युग मे ऐसे बच्चे मिलना सच मे बहुत मुश्किल है। इसके बाद मुझे  प्रकाश  गोविन्द जी मिले उनकी क्या कहूँ बस निशब्द हू। इन बच्चों के संस्कार देख कर इनके माँ बाप को सलाम करती हूँ। प्रकाश गोविन्द जी ने मुझे बहुत कुछ सिखाया और हमेशा बहुत कुछ करने की प्रेरणा भी दी मगर मैं ही नालाय्क हूँ अभी तक उन  आपेक्षाओं पर खरी नहीं उतर सकी।इसके अतिरिक्त दर्पण शाह , ने भी बहुत सम्मान दिया है। एक नाम जो मैं बडे गर्व के साथ लेना चाहूँगी वो गौतम राज रिशी जी का है उनके सम्मान और प्यार के लिये भी उनकी ऋणी हूँ। मिथिलेश दुबे छोटे बच्चों की तरह मुझ से बहुत प्यार करता है। कुलवन्त हैपी, लोकेन्द्र विक्रम सिंह  अर्विन्द, धीरज शाह  महफूज़,प्रवीण पथिक, रविन्द्र्,    इम सब ने मुझे बेटोंजैसा प्यार और सम्मान दिया। एक नाम जिस ने एक दम मेरे सामने उपस्थित हो कर मुझे हैरान कर दिया वो थे श्री अकबर खान राणा जी ।मुझे कहते कि आपका आशीर्वाद लेने आया हूँ सोचिये उस समय मेरी खुशी का कोई ठिकाना था?। आज कह सकती हूँ प्यार रिश्तों का मोहताज नहीं होता मुझे ये सभी बेटे अपनी लगते हैं। शायद अपना होता तो कभी पूछता भी नहीं। इसके बाद अपनी बेटियों का नाम भी लेना चहूँगी। एडी सेहर, विनीता यशस्वी, कविता रावत , रश्मि रविज़ा,कविता राजपूत वाणी जी । लडकियाँ मा के लिये इतनी चिन्तित रहती हैं कि अगर दो तीन दिन नेट पर नज़र न आऊँ तो लम्बी सी मेल आ जाती है। इन सभी बच्चों को बहुत बहुत आशीर्वाद
       एक उल्लेखनीय नाम और लेना चाहूँगे जिस से मुझे कुछ और अधिक काम  करने की प्रेरणा मिलती है वो है अनुज खुशदीप सहगल कभी मिली नहीं मगर मिलूँगी जरूर रिश्ता पता नहीं मगर मेरे मन से हर वक्त आशीर्वाद निकलता है उन के लिये, तो लगता है मेरे बेटे जैसे ही हैं। मुफ्लिस जी, दिगम्बर नास्वा जी पंकज मिश्रा जी , श्रीश पाठक जी, स्वपनिल भारतीयम् .निशू तिवारी,अनिल कान्त जी , ओम आर्यजी इन सब की भी आभारी हूँ कि समय समय पर मुझे अपने स्नेह से उत्साहित करते हैं। नीरज गोस्वामी जी ,दिनेश राय दिवेदी जी  की भी आभारी हूँ। स. पावला जी की बहुत आभारी हूँ मुझे पंजाबी लिखने मे जो समस्या आती है उसका हल उनके पास होता है। अगर श्री आशीश खन्डेलवाल जी का नाम न लूँ तो शायद सब से बडी भूल हो जायेगी। मुझे ब्लाग के बारे मे बहुत कुछ उन्होंने सिखाया है। चाहे वो व्यस्त भी रहे हों मै झट से उन्हें बज़ कर देती और चुटकी मे मेरी समस्या हल कर देते।
उपर तो उन लोगों की बात हो रही थी जिन से मेल या चैट दुआरा सम्पर्क मे रहती हूँ । इसके अतिरिक्त मेरे पाठक  जो मुझे अपनी प्रतिक्रियाओं से उतसाहित करते हैं उनकी बहुत बहुत आभारी हूँ। मैं अलपग्य कुछ भी नहीं थी मगर मेरे पाठकों ने मुझे सिर आँखों पर बिठाया। श्री रविन्द्र प्रभात जी के ब्लाग *परिकल्पना* से जब पता चला कि मेरा नाम उन नौं देवियों मे है जिनके ब्लाग इस साल चर्चा मे रहे और आगे रहे। इस से मेरा उत्साह बढा है। उनका आभार ।
   ये सब लिखने का मेरा एक मकसद ये भी है कि प्रोत्साहन इन्सान को आगे बढने की शक्ति देता है । आओ सब पिछले सब झगडे भूल कर नये साल मे ब्लाग जगत मे प्रेम की परिभाषा  सीखें और नये आने वाले शब्दशिलपियों को प्रोत्साहित करेंमैने अपने शहर से भी दो नये ब्लागर्ज़ बनाये हैं। एक राकेश वर्मा जी{ http://akhrandavanzara.blogspot.com/} aur doosare Sanjeev kuraalia jee{ http://kalamkakarz.blogspot.com/}  }इन्हें भी अपना आशीर्वाद दें। ये मेरे इस साल का लेखा जोखा है। मेरी उपल्ब्धियों का और जो प्यार मैने ब्लाग जगत से पाया है। सभी का धन्यवाद।ये  सब मेरे दामाद ललित सूरी  जी की वजह से हुया है। उसे भी बहुत बहुत आशीर्वाद ।
  नये साल की सब को बहुत बहुत बधाई और शुभकामनायें। मेरे बच्चों को आशीर्वाद। दो तीन दिन ब्लाग से दूर रहूँगी। चार पँक्तियाँ नये साल के लिये

नये साल ऐसे तराने सुनाओ
लुटाओ खुशी के खज़ाने लुटाओ

चलो अब मिटा दें गिले सब पुराने
मिलन के कोई तो बहाने बनाओ

न जात और धर्मों का बन्धन रहे
उठो नफरतों के ठिकाने मिटाओ

कहो बात वो प्यार बढता रहे
अंधेरे घरों मे दिये से जलाओ

26 December, 2009

प्यार रिश्तों का मोहताज़ नहीं होता। अन्तर्ज़ाल जैसी आभासी दुनिया मे भी रिश्ते कैसे फलते फूलते हैं ये महसूस कर अभिभूत हूँ।24 दि. रात 9 बजे अचानक फोन आया *मासी जी मैं दीपक बोल रहा हूँ, मै कल सुबह सात बजे आपसे मिलने आ रहा हूँ।* सुन कर खुशी का ठिकाना नहीं रहा। दीपक और कोई नहीं आपका दीपक मशाल है जिसे आप रोज़ ब्लाग पर पढते हैं। बाकी जानकारी फिर से अलग पोस्ट मे दूँगी। अभी एक गज़ल पढिये------
गज़ल

बेवज़ह बातों ही बातों में सुनाना क्या सही है
भूला-बिसरा याद अफसाना दिलाना क्या सही है

कुछ न कुछ तो काम लें संजींदगी से हम ए जानम
पल ही पल में रूठ जाना और मनाना क्या सही है

मुस्करा ऐसे  कि  जैसे  मुस्कराती  हैं   बहारें
चार दिन की ज़िन्दगी घुट कर बिताना क्या सही है

ख्वाब में आकर मुझे आवाज़ कोई  दे  रहा    है
बेरुखी दिखला के उसका दिल दुखाना क्या सही है

तुम इन्हें सहला नहीं पाए मेरे हमदर्द   साथी
छेड़  कर सारी खरोचें दिल दुखाना क्या सही है

अब बड़े अनजान बनते हो हमारी ज़िन्दगी   से
फूल  जैसी ज़िन्दगी को यूँ सताना क्या सही  है

ज़िन्दगी का बांकपन खो सा गया जाने कहाँ अब
सोचती हूँ ,तुम बिना महफ़िल सजाना क्या सही है



23 December, 2009

एक पुरानी कविता जो अभी आप लोगों ने पढी नहीं है। आज भी नया कुछ लिख नहीं पाई। तो इसे ही झेलले़ ।
कविता
मुझे मेरे दिल के करीब रहने दो
न पोंछो आँख मेरी अश्क बहने दो
ये इम्तिहां मेरा है जवाब् भी मेरा होगा
दिल का मामला है खुद से कहने दो
जीते चले गये ,जिन्दगी को जाना नहीं
मुझे मेरे कसूर की सजा सहने दो
उनकी जफा पर मेरी वफा कहती है
खुदगर्ज चेहरों पे अब नकाब रहने दो
तकरार से कभी फासले नहीं मिटते
घर की बात है घर में रहने दो !!

20 December, 2009

कविता
आज एक छोटी सी कविता जो पहले भी शायद कुछ लोगों ने पढी है। आजकल घर की व्यस्ततायों के चलते कुछ नया लिख नहीं पा रही। इसे ही झेल लीजिये।
छोटी सी बात

कई बार
जब हो जाते हैं
हम
मैं और तू
छोटी छौटी बातों पर
कर देते हैं रिश्ते
कचरा कचरा
तर्क---वितर्क
तकरारें--
आरोप--प्रत्यारोप
छिड जाता है
महाँसंग्राम
अतीत की डोर से
कटने लगती है
भविश्य की पतंग
और खडा रह जाता है
वर्तमान
मौन, निशब्द
पसर जाता है
एक सन्नाटा
उस सन्नाटे मे
कराहते हैं
छटपटाते हैं
और दम तोड देते हैं
जीवन के मायने
ओह!
रह जाते हैं
इन छोटी- छोटी  बातों मे
जीने से
जीवन के बडे बडे पल


18 December, 2009

कई दिन से बच्चे आये हुये हैं कुछ अधिक नया लिख नहीं पा रही। ये छोटी सी गज़ल जिसे प्राण भाई साहिब ने संवारा है उनके आशीर्वाद से आपके सामने प्रस्तुत कर रही हूँ
                                                                   गज़ल


करें कितना भरोसा हम इन्हें तो टूट जाना है
दरार आयी दिवारों का भला अब क्या ठिकाना है

ज़मीन पर पाँव रखती हूँ नज़र पर आसमां पर है
नहीं रोके रुकूँगी मैं कि ठोकर पर  जमाना   है

कहाँ औरत रही अबला कहाँ बेबस सी लगती   है
वो पहुँची है सितारों तक ,किसीको क्या दिखाना है

है ऊंची बाड़ के पीछे जड़ें खुद काटता    माली
लुटा जो अपनों के हाथों कहाँ उसका ठिकाना   है

ख़यालों में ही तू खोया रहेगा कब तलक यूँ ही
कि उठ मन बावरे अब ढूंढना तुझको ठिकाना है
               

16 December, 2009

मैं नेता बनूंगा [व्यंग ]
एक दिन बेटे से पूछा ;बेटा क्या बनोगे?:
कौन सा प्रोफेशन अपनाओगे,किस राह पर जाओगे
वह थोडा हिचकिचाया,फिर मुस्कराया और बोला
मैं नेता बनूंगा
मैं हुआ हैरान उसकी सोच पर परेशान
नेता बनना होता है क्या इतना आसान?
फिर पूछा :बेटा नेता जैसी योग्यता कहां से लाओगे?
लोगों में अपनी पहचान कैसे बनाओगे?
वो जरा सा मुस्कराया
और  बोला मुझे सब पता है
नेता के लिये मिनिमम कुयालिफिकेशन है---
1पहली जमात से ऊपर पास हो या फेल
2 किसी न किसी केस में कम से कम एक बार हुई हो जेल
3 गणित मे करोडों तक गिनत जरुरी है
इस के बिना नेतागिरी अधूरी है
4 माइनस डिविजन चाहे ना आये पर
प्लस मल्टिफिकेशन बिना
नेता बनने की चाह अधूरी है
5 सइकालोजी थोडी सी जान ले
ताकि वोटर की रग पह्चान ले
6 डराईंग में कलर स्कीम का ग्याता हो
गिरगिट  की तरह रंग बदलना आता हो
लाल, काले सफेद से ना घबराये
नेता की पोशाक में हर रंग समाये
पिताजी बस अब भाई दादाओं के हुनर जानना है
 उस के लिये किसी अच्छे डान को गुरू मानना है
डाक्टर इंजनिय्र बनकर मै भूखों मर जाऊंगा
नेता बन कर ही होगा गाडी बंगला और विदेश जा पाऊंगा
मैने सोचा, और  बहुमत में नेताओं को ऎसा पाया
बस फिर क्या? अपने बेटे की बुद्धि पर हर्शाया

14 December, 2009

  गज़ल
अपना इतिहास पुराना भूल गये
लोग विरासत का खज़ाना भूल गये
रिश्तों के पतझड मे ऐसे बिखरे
लोग बसंतों का जमाना भूल गये
दौलत की अँधी दौड मे उलझे वो
मानवता को ही निभाना भूल गये
भूल गये  आज़ादी की वो गरिमा
कर्ज़ शहीदों का चुकाना भूल गये
वो बन बैठे ठेकेदार जु धर्म के
वो अपना धर्म निभाना भूल गये
बीवी  के आँचल मे ऐसे उलझे
माँ का ही ठौर ठिकाना भूल गये
परयावरण बचाओ,  देते भाषण
पर खुद वो पेड लगाना भूल गये
भूल गये सब प्यार मुहब्बत की बात्
अब वो हसना हंसाना भूल गये


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