संजीवनी कहानी अगली कडी
पिछली कडियों मे आपने पढा मानवीएक महत्वाकाँक्षी ,अधुनिक विचारों की औरत है।\उसका करियर खराब न हो और फिगर खराब न हो इस लिये अपने बच्चे को जन्म न दे कर किराये की कोख से बच्चा लिया मगर उसे भी माँ जैसा प्यार न दे सकी । पूरी कहानी मे वो बेटा विकल्प उसे पत्र दुयारा उसकी गलती का एहसास करवा रहा है--- आगे
इसी गम मे पिता जी को एक दिन दिल का दौरा पडा। आपके साथ उस समय एक आध मुलाज़म को छोड कर कोई नहीं था। होता भी कैसे? तुम कभी किसी के दुख सुख मे शरीक हुयी होती तो। तुम ने घबरा कर मुझे फोन किया। मैं पहुँचा तो तुम पिता जी के बेड के पास बैठी रो रही थी। मुझे देखते ही तुम उठी और मेरे गले लग कर फूट फूट कर रोने लगी। अंदर तक भीग गया मैं। पिता जी की आँखों मे पहली बार हलकी सी सकून की एक किरण देखी। शायद तु7म तब भी एक बेटे के गले नहीं लगी थी बल्कि अपनी खरीदी हुयी वस्तु का प्रयोग कर रही थी। फिर भी बहुत अच्छा लगा कि कम से कम तुम्हें ये तो महसूस हुया कि जीवन म्के ऐसे पल भी आते हैं जब हमे रोने के लिये एक कन्धे की जरूरत पडती है। मुझे कुछ आशा भी हुई कि तुम अब अपनो का महत्व समझोगी।*
मानवी की आँखें नम हुई जा रही थीं ---- सच कहा है विकल्प ने उसे तब किसी की जरूरत महसूस हुई थी जो इस दुख की घडी मे उसका साथ दे सके। कई बार विकल्प को भी इस की जरूरत पडी होगी मगर वो समझ न पाई--- पत्र फिर से आगे पढने लगी---
*पिता जी कुछ संभले तो उन्हें घर ले आये। मैने लम्बी छुट्टी ले ली थी,क्यों कि इस दुनिया मे एक ही इन्सान मेरा अपना था----उन की खातिर मैं कुछ भी कर सकता था आप से समझौता भी। तभी से आपके साथ सहज् रहने की कोशिश करता। बहुत देर बाद उस दिन हम तीनों ने इकट्ठे खाना खाया था मुझे तुम से बातें करते देख पिता जी बहुत खुश होते। तुम्हारी बातें करियर से ले कर मल्टीनेशनल कम्पनी के बारे मे ही होती। मक़िं चाहता था कि तुम मुझ से मेरे बारे मे भी पूछो कि बेटा तुम अकेले कैसे रहते हो, खाना कहाँ खाते हो, अच्छा लगता है कि नहीं , अपनी सेहत का ध्यान रखते हो कि नहीं आदि आदि।*
*उस दिन हम तीनो खाना खा रहे थे तो पिता जी बोले,"मानवी देखो विकल्प हमारा कितना ध्यान रखता है।*
*वो तो ठीक है,इसे अब अपनी ड्यूटी पर भी जाना चाहिये। नई नई नौकरी है ,इतनी छुट्टी लेना भी ठीक नहींइससे करियर पर असर पडता है।*
*तुम ने ापनी बात कह दी मगर पिता जी की आँखों मे एक साया सा लहराया फिर भी उन्होंने साहस बटोरा---
*क्या ऐसा नही हो सकता कि हम दोनो रिटायरमेन्ट लेकर बेटे के साथ रहें।*
*सुधाँशू तुम होश मे तो हो?* फिर न जाने क्या सोच कर तुम ने बात बनाने की कोशिश की
* देखो हम अच्छे भले बेटे पर बोझ क्यों बनें?ाभी मेरी प्रोमोशन होने वाली है। मुझे अभी और आगे जाना है।* कह कर तुम उठ गयी।
पिता जी ने मेरा हाथ थपथपाया और हम दोनो पिता जी के कमरे मे देर तक बातें करते रहे और तुम स्टडी मे रही।
उस दिन पिता जी ने मेरे साथ बहुत बातें की। सब से अधिक तुम्हारे बारे मे तुम्हारे सपनों और उडान के बारे मे। शायद वो एक भूमिका बना रहे थे कि मैं आपको समझूँ। पिता जी तुम से कितना प्यार करते थे-- एक पल के लिये भी तुम्हें नाराज़ या उदास नहीं देख सकते थे। उस दिन उन्हों ने मुझ से वादा लिया था कि अगर उन्हें कुछ हो जाये तो मैं आपका ध्यान रखूँ चाहे कुछ भी हो। सच मानो मुझे उस दिन आपसे ईर्ष्या होने लगी थी पिता जी को मुझ से अधिक आपकी चिन्ता थी।*
पढते हुये मानवी के सब्र का बाण्ध टूटने लगा था--- आँसो अविरल बह चले थे। सुधाँशो को याद कर । सक़्च मे सुधाँशू का प्यार सच्चा था। उसने तो कभी सुधाँशू के बारे मे कभी ऐसे सोचा ही नहीं था कि सुधाँशू के लिये कभी कुछ किया हो आज उसे बहुत कुछ विचलित करने के लिये काफी था। फिर पत्र पर न्गाह गयी
*माँ मेरे चाहने जीवन मे कभी हुया है कुछ भी? पिता जी ठीक हुये ,मैं लखनऊ लौट गया। मैं अपने जीवन के कोरे कागज़ पर रंग भरने की सोच ही रहा था, मैं पिता जी की खुशी के लिये आपके साथ रिश्ते सुधारने की कोशिश करना चाहता था। वषों से रिश्तों पर जमी बर्फ को पिघलाने की कोशिश कर रहा था फोन पर तुम से बात करता। मगर मन की मन मे रह गयी। कुछ दिन बाद ही पिता जी के हमे छोड जाने की खबर ने मुझे तोड दिया। हम दोनो के बीच का सेतु टूट गया था। तुम्हाक़्रे दुख को मैं समझ सकता था मगर मेरे दुख को समझने वाला कोई नहीं था।
* मैं साये की तरह तुम्हारे साथ रहना चाहता था । पिता जी के बचन को निभाना चाहता था। तुम से प्रेम बाँटना चाहता था--- तुम्हें सांत्वना देना चाहता था--- मगर तुम्हें अपनी निज़ी ज़िन्दगी मे दूसरो का हस्तक्षेप पसंद नहीं था। तुम ने मौन धारण कर लिया। तुम ने एक बार भी मेरे सिर पर हाथ नहीं रखा,सांत्वना एक शब्द नहीं कहा। मैं अनाथ हो गया था।
* अंतिम रस्मे पूरी हो गयी। रिश्ते दार जा चुके थे
रहते भी क्यों जैसी औपचारिकता आप निभाती आयीं थीं वही वो निभा कर वले गये।* क्रमश:
इसी गम मे पिता जी को एक दिन दिल का दौरा पडा। आपके साथ उस समय एक आध मुलाज़म को छोड कर कोई नहीं था। होता भी कैसे? तुम कभी किसी के दुख सुख मे शरीक हुयी होती तो। तुम ने घबरा कर मुझे फोन किया। मैं पहुँचा तो तुम पिता जी के बेड के पास बैठी रो रही थी। मुझे देखते ही तुम उठी और मेरे गले लग कर फूट फूट कर रोने लगी। अंदर तक भीग गया मैं। पिता जी की आँखों मे पहली बार हलकी सी सकून की एक किरण देखी। शायद तु7म तब भी एक बेटे के गले नहीं लगी थी बल्कि अपनी खरीदी हुयी वस्तु का प्रयोग कर रही थी। फिर भी बहुत अच्छा लगा कि कम से कम तुम्हें ये तो महसूस हुया कि जीवन म्के ऐसे पल भी आते हैं जब हमे रोने के लिये एक कन्धे की जरूरत पडती है। मुझे कुछ आशा भी हुई कि तुम अब अपनो का महत्व समझोगी।*
मानवी की आँखें नम हुई जा रही थीं ---- सच कहा है विकल्प ने उसे तब किसी की जरूरत महसूस हुई थी जो इस दुख की घडी मे उसका साथ दे सके। कई बार विकल्प को भी इस की जरूरत पडी होगी मगर वो समझ न पाई--- पत्र फिर से आगे पढने लगी---
*पिता जी कुछ संभले तो उन्हें घर ले आये। मैने लम्बी छुट्टी ले ली थी,क्यों कि इस दुनिया मे एक ही इन्सान मेरा अपना था----उन की खातिर मैं कुछ भी कर सकता था आप से समझौता भी। तभी से आपके साथ सहज् रहने की कोशिश करता। बहुत देर बाद उस दिन हम तीनों ने इकट्ठे खाना खाया था मुझे तुम से बातें करते देख पिता जी बहुत खुश होते। तुम्हारी बातें करियर से ले कर मल्टीनेशनल कम्पनी के बारे मे ही होती। मक़िं चाहता था कि तुम मुझ से मेरे बारे मे भी पूछो कि बेटा तुम अकेले कैसे रहते हो, खाना कहाँ खाते हो, अच्छा लगता है कि नहीं , अपनी सेहत का ध्यान रखते हो कि नहीं आदि आदि।*
*उस दिन हम तीनो खाना खा रहे थे तो पिता जी बोले,"मानवी देखो विकल्प हमारा कितना ध्यान रखता है।*
*वो तो ठीक है,इसे अब अपनी ड्यूटी पर भी जाना चाहिये। नई नई नौकरी है ,इतनी छुट्टी लेना भी ठीक नहींइससे करियर पर असर पडता है।*
*तुम ने ापनी बात कह दी मगर पिता जी की आँखों मे एक साया सा लहराया फिर भी उन्होंने साहस बटोरा---
*क्या ऐसा नही हो सकता कि हम दोनो रिटायरमेन्ट लेकर बेटे के साथ रहें।*
*सुधाँशू तुम होश मे तो हो?* फिर न जाने क्या सोच कर तुम ने बात बनाने की कोशिश की
* देखो हम अच्छे भले बेटे पर बोझ क्यों बनें?ाभी मेरी प्रोमोशन होने वाली है। मुझे अभी और आगे जाना है।* कह कर तुम उठ गयी।
पिता जी ने मेरा हाथ थपथपाया और हम दोनो पिता जी के कमरे मे देर तक बातें करते रहे और तुम स्टडी मे रही।
उस दिन पिता जी ने मेरे साथ बहुत बातें की। सब से अधिक तुम्हारे बारे मे तुम्हारे सपनों और उडान के बारे मे। शायद वो एक भूमिका बना रहे थे कि मैं आपको समझूँ। पिता जी तुम से कितना प्यार करते थे-- एक पल के लिये भी तुम्हें नाराज़ या उदास नहीं देख सकते थे। उस दिन उन्हों ने मुझ से वादा लिया था कि अगर उन्हें कुछ हो जाये तो मैं आपका ध्यान रखूँ चाहे कुछ भी हो। सच मानो मुझे उस दिन आपसे ईर्ष्या होने लगी थी पिता जी को मुझ से अधिक आपकी चिन्ता थी।*
पढते हुये मानवी के सब्र का बाण्ध टूटने लगा था--- आँसो अविरल बह चले थे। सुधाँशो को याद कर । सक़्च मे सुधाँशू का प्यार सच्चा था। उसने तो कभी सुधाँशू के बारे मे कभी ऐसे सोचा ही नहीं था कि सुधाँशू के लिये कभी कुछ किया हो आज उसे बहुत कुछ विचलित करने के लिये काफी था। फिर पत्र पर न्गाह गयी
*माँ मेरे चाहने जीवन मे कभी हुया है कुछ भी? पिता जी ठीक हुये ,मैं लखनऊ लौट गया। मैं अपने जीवन के कोरे कागज़ पर रंग भरने की सोच ही रहा था, मैं पिता जी की खुशी के लिये आपके साथ रिश्ते सुधारने की कोशिश करना चाहता था। वषों से रिश्तों पर जमी बर्फ को पिघलाने की कोशिश कर रहा था फोन पर तुम से बात करता। मगर मन की मन मे रह गयी। कुछ दिन बाद ही पिता जी के हमे छोड जाने की खबर ने मुझे तोड दिया। हम दोनो के बीच का सेतु टूट गया था। तुम्हाक़्रे दुख को मैं समझ सकता था मगर मेरे दुख को समझने वाला कोई नहीं था।
* मैं साये की तरह तुम्हारे साथ रहना चाहता था । पिता जी के बचन को निभाना चाहता था। तुम से प्रेम बाँटना चाहता था--- तुम्हें सांत्वना देना चाहता था--- मगर तुम्हें अपनी निज़ी ज़िन्दगी मे दूसरो का हस्तक्षेप पसंद नहीं था। तुम ने मौन धारण कर लिया। तुम ने एक बार भी मेरे सिर पर हाथ नहीं रखा,सांत्वना एक शब्द नहीं कहा। मैं अनाथ हो गया था।
* अंतिम रस्मे पूरी हो गयी। रिश्ते दार जा चुके थे
रहते भी क्यों जैसी औपचारिकता आप निभाती आयीं थीं वही वो निभा कर वले गये।* क्रमश: