21 January, 2010

संजीवनी कहानी  अगली कडी
पिछली कडियों मे आपने पढा मानवीएक महत्वाकाँक्षी ,अधुनिक विचारों की औरत है।\उसका करियर खराब न हो और फिगर खराब न हो इस लिये अपने बच्चे को जन्म न दे कर किराये की कोख से बच्चा लिया मगर उसे भी माँ जैसा प्यार न दे सकी । पूरी कहानी मे वो बेटा विकल्प उसे पत्र दुयारा उसकी गलती का एहसास करवा रहा है--- आगे
इसी गम मे पिता जी को एक दिन दिल का दौरा पडा। आपके साथ उस समय एक आध मुलाज़म को छोड कर कोई नहीं था। होता भी कैसे? तुम कभी किसी के दुख सुख मे शरीक हुयी होती तो। तुम ने घबरा कर मुझे फोन किया। मैं पहुँचा तो तुम पिता जी के बेड के पास बैठी रो रही थी। मुझे देखते ही तुम उठी और मेरे गले लग कर  फूट फूट कर रोने लगी। अंदर तक भीग गया मैं। पिता जी की आँखों मे पहली बार हलकी सी सकून की एक किरण देखी। शायद तु7म तब भी एक बेटे के गले नहीं लगी थी बल्कि अपनी खरीदी हुयी वस्तु का प्रयोग कर रही थी। फिर भी बहुत अच्छा लगा कि कम से कम तुम्हें ये तो महसूस हुया कि जीवन म्के ऐसे पल भी आते हैं जब हमे रोने के लिये एक कन्धे की जरूरत पडती है। मुझे कुछ आशा भी हुई कि तुम अब अपनो का महत्व समझोगी।*
मानवी की आँखें नम हुई जा रही थीं ---- सच कहा है विकल्प ने उसे तब किसी की जरूरत महसूस हुई थी जो इस दुख की घडी मे उसका साथ दे सके। कई बार विकल्प को भी इस की जरूरत पडी होगी मगर वो समझ न पाई--- पत्र फिर से आगे पढने लगी---

*पिता जी कुछ संभले तो उन्हें घर ले आये। मैने लम्बी छुट्टी ले ली थी,क्यों कि इस दुनिया मे एक ही इन्सान मेरा अपना था----उन की खातिर मैं कुछ भी कर सकता था आप से समझौता भी। तभी से आपके साथ  सहज् रहने की कोशिश करता। बहुत देर बाद उस दिन हम तीनों ने इकट्ठे खाना खाया था मुझे तुम से बातें करते देख पिता जी बहुत खुश होते। तुम्हारी बातें करियर से ले कर मल्टीनेशनल कम्पनी के बारे मे ही होती। मक़िं चाहता था कि तुम मुझ से मेरे बारे मे भी पूछो कि बेटा तुम अकेले कैसे रहते हो, खाना कहाँ खाते हो, अच्छा लगता है कि नहीं , अपनी सेहत का ध्यान रखते हो कि नहीं आदि आदि।*
*उस दिन हम तीनो खाना खा रहे थे तो पिता जी बोले,"मानवी देखो विकल्प हमारा कितना ध्यान रखता है।*
*वो तो ठीक है,इसे अब अपनी ड्यूटी पर भी जाना चाहिये। नई नई नौकरी है ,इतनी छुट्टी लेना भी ठीक नहींइससे करियर पर असर पडता है।*
*तुम ने ापनी बात कह दी मगर पिता जी की आँखों मे एक साया सा लहराया फिर भी उन्होंने साहस बटोरा---
*क्या ऐसा नही हो सकता कि हम दोनो रिटायरमेन्ट लेकर बेटे के साथ रहें।*
*सुधाँशू तुम होश मे तो हो?* फिर न जाने क्या सोच कर तुम ने बात बनाने की कोशिश की
* देखो हम अच्छे भले बेटे पर बोझ क्यों बनें?ाभी मेरी प्रोमोशन होने वाली है। मुझे अभी और आगे जाना है।* कह कर तुम उठ गयी।
पिता जी ने मेरा हाथ थपथपाया और हम दोनो पिता जी के कमरे मे देर तक बातें करते रहे और तुम स्टडी मे रही।
उस दिन पिता जी ने मेरे साथ बहुत बातें की। सब से अधिक तुम्हारे बारे मे तुम्हारे सपनों और उडान के बारे मे। शायद वो एक भूमिका बना रहे थे कि मैं आपको समझूँ। पिता जी तुम से कितना प्यार करते थे-- एक पल के लिये भी तुम्हें नाराज़ या उदास नहीं देख सकते थे। उस दिन उन्हों ने मुझ से वादा लिया था कि अगर उन्हें कुछ हो जाये तो मैं आपका ध्यान रखूँ चाहे कुछ भी हो। सच मानो मुझे उस दिन आपसे ईर्ष्या  होने लगी थी पिता जी को मुझ से अधिक आपकी चिन्ता थी।*
पढते हुये मानवी के सब्र का बाण्ध टूटने लगा था--- आँसो अविरल बह चले थे। सुधाँशो को याद कर । सक़्च मे सुधाँशू का प्यार सच्चा था। उसने तो कभी सुधाँशू के बारे मे कभी ऐसे सोचा ही नहीं था कि सुधाँशू के लिये कभी कुछ किया हो आज उसे बहुत कुछ विचलित करने के लिये काफी था। फिर पत्र पर न्गाह गयी

*माँ मेरे चाहने जीवन मे कभी हुया है कुछ भी? पिता जी ठीक हुये ,मैं लखनऊ लौट गया। मैं अपने जीवन के कोरे कागज़ पर रंग भरने की सोच ही रहा था, मैं पिता जी की खुशी के लिये आपके साथ रिश्ते सुधारने की कोशिश करना चाहता था। वषों से रिश्तों पर जमी बर्फ को पिघलाने  की कोशिश कर रहा था फोन पर तुम से बात करता। मगर मन की मन मे रह गयी। कुछ दिन बाद ही पिता जी के हमे छोड जाने की खबर ने मुझे तोड दिया। हम दोनो के बीच का सेतु टूट गया था। तुम्हाक़्रे दुख को मैं समझ सकता था मगर मेरे दुख को समझने वाला कोई नहीं था।
* मैं साये की तरह तुम्हारे साथ रहना चाहता था । पिता जी के बचन को निभाना चाहता था। तुम से प्रेम बाँटना चाहता था--- तुम्हें सांत्वना देना चाहता था--- मगर तुम्हें अपनी निज़ी ज़िन्दगी मे दूसरो का हस्तक्षेप पसंद नहीं था। तुम ने मौन धारण कर लिया। तुम ने एक बार भी मेरे सिर पर हाथ नहीं रखा,सांत्वना एक शब्द नहीं कहा। मैं अनाथ हो गया था।
* अंतिम रस्मे पूरी हो गयी। रिश्ते दार जा चुके थे
 रहते भी क्यों जैसी औपचारिकता आप निभाती आयीं थीं वही वो निभा कर वले गये।* क्रमश:


19 January, 2010

संजीवनी----- अगली कडी
पिछली कडियों मे  आपने पढा कि मानवी एक महत्वाकाँक्षी महिला हैं। जो अपने करियर और फिगर को बनाये रखने के लिये बच्चे को जन्म देना नहीं चाहती। मगर पति की इच्छा देखते हुये किराये की कोख से एक बच्चा लिया ।कैसे बच्चा माँ का प्यार दुलार न मिलने से उससे दूर होता चला गया । पति की मौत के बाद जब वो अकेली हो गयी तो विकल्प ने उसे माँ के कर्तव्य समझाने और अपने रोश का कारण बताने के लिये मानवी को एक चिठी लिखी। मानवी वो चिट्ठी पढ रही है------ [ असल मे पूरी कहानी ही एक चिट्ठी के माधयम से कही गयी है अगर विकल्प ये बातें मानवी के सामने आ कर कहता तो शायद उसे देख कर मानवी का अहं सिर उठालेता और वो इस पर अधिक सोच न सकती। इसे सामने रख कर ही पत्र के माध्यम से ये कहानी कही है]--- 
आगे
*माँ बात यहीं खत्म नही हुयी। उसके बाद मेरा पालन पोषण भी किराये की आया के हाथों ही हुया। तुम्हारे पास तो समय ही नहीं था मेरे लिये। मुझे खिलाना पिलाना नहलाना यहाँ तक कि सुलाना भी आयाके हाथ ही रहा। पिताजी जरूर मेरे साथ कुछ समय बिताते , कई बार वो भी तुम्हें नागवार गुजरता-----*\
पढते पढते मानवी को कई पल याद आये जब विकल्प को उसकी जरूरत थी मगर उसके पास समय भी नहीं था। समय हो सकता था अगर उसे दिल से उस बच्चे के लिये प्यार होता। वात्सल्य की एक  किरण भी उसके मन मे कभी फूटी होती। उसे याद आया कि जिस दिन वो बच्चे को घर ले कर आयी थी, तब वो दोनो ही खुश थे सुधाँशू इस लिये कि उसे वारिस मिल गया था और वो इस लिये कि अब उसे बच्चे को जन्म देने का झंझट नहीं करना पडेगा। अगले दिन विकल्प कुछ बिमार हो गया। उसने बिस्तर पर उल्टी कर दी बस फिर क्या था मानवी का मूड उखड गया था।
"मैने पहले ही कहा था कि मुझे ये बच्चो वाला झंझट अच्छा नहीं लगता। कितनी बदबू आने लगी है कमरे मे। "
सुधाँशू चुप रहे मानवी ने आया को आवाज़ दी कि बच्चे और बिस्तर को उठा कर ले जाये । अगले दिन फिर जब सुधाँशू ने बच्चे को साथ सुलाना चाहा तो मानवी नाराज़ हो गयी। उसे अपनी निज़ी ज़िन्दगी मे भी किसी और का होना अच्छा नहीं लगा। फिर कई बार ऐसा हुया जब बिमारी मे बच्चे को माँ की जरूरत होती है तो वो कभी दफ्तर मे तो कभी किसी पार्टी मे होती। बस आ कर आया से बच्चे का हाल पूछ लेती जब खेलता होता तो जरा सा बुला लेती। सोचते सोचते मानवी फिर से पत्र को पढने लगी।  उसे अब अपनी गलती का एहसास होने लगा था शायद --

 माँ मुझे नहीं लगता कि मेरे जन्म दिन के इलावा आप कभी मेरे लिये एक खिलौना भी लाई हो। आप आफिस चली जाती,तो आया अपने बच्चे को ले आती। उसे गोद मे ले कर  बालों को सहलाते हुये ,मेरे हिस्से का आधा दूध पिला देती। इस तरह चार साल का होते होते बहुत कुछ समझने लगा था।
कई बार मुझे नींद नहीं आती, मैं उसी तरह लोरी सुनना चाहता था जैसे आया अपने बच्चे को गोद मे ले कर सुनाती थी । मैं आपसे बतियाना चाहता, खेलना चाहता मगर आपके पास समय नहीं होता । आया के साथ सोते जब मुझे कभी नींद नहीं आती तो आया कडक आवाज़ मे मुझे डांम्ट देती और मैं डर से दुबक जाता। डर उसका बच्चा भी जाता मगर उसे वो अपनी छाती से लगा कर चुप करा लेती। क्या आप कल्पना कर सकती हैं मेरी त्रासदी का? आपकी आधुनिक सोच ने मेरा बचपन का सुख मुझ से छीन लिया। माँ के वात्सल्य से अतृप्त मेरी आत्मा आज भी उस संताप को झेल रही है*

पढते पढते मानवी के सब्र का बान्ध टूट गया आँखें उन सभी क्षणो को याद कर पश्चाताप मे बह रही थी। उसने कभी ऐसे सोचा ही नहीं था । भावुकता को वो कमजोरी समझती थी । सुधाँशू जैसा प्यार करने वाला पति पा कर ही वो दुनिया के बाकी रिश्तों की महक भूल गयी थी। अज भी उसे याद है कई बार विकल्प से कभी वो खुश मूड मे होती तो उसे अपने पास बुला लेती उस दिन सुधाँशू बहुत खुश होता और विकल्प को साथ सुला लेता मगर एक दो दिन बाद ही मानवी उकता जाती और फिर से उसे आया के पास भेज देती। वो पत्र छोड कर खिदकी मे आ कर खडी हो जाती है सामने सर्वेन्ट रूम के आंगन मे आया अपने बच्चे को गोद मे ले कर कैसे दुलार रही है, उसे लोरी सुना रही है और बच्चा खिलखिला कर उस से अठखेलियाँ कर रहा है--- विकल्प ने भी इसी तरह कई बार मचलना चाहा होगा  मगर उसने डाँट  कर उसे चुप करवा दिया था। उसी आया के घर के सामने बन्धी गाय कैसे अपने छोटे बच्चे को अपनी जीभ से चाट कर सहला रही थी--- उस मे कभी ऐसी ममता क्यों नही आयी----- क्या था जिसने मुझे इन भावनाओं से दूर रखा---- शायद उसका स्वार्थ था वो खुद को साबित करना चाहती थी व्यक्तित्व, करियर, और सौंदर्य पर ही उसने अपने ये अनमोल पल गंवा दिये थे  ---- खिडकी से हटने का उसका मन नहीं हो रहा था। बछडे और आया के बच्चे ने उसे विकल्प के बचपन की त्रास्दी और बाद मे उसके प्रति विकल्प के आक्रोश को समझा दिया था। आज उसे महसूस हुया कि औरत को कम से कम माँ का फर्ज़ नज़र अन्दाज़ नहीं करना चाहिये था। एक टीस उठी उसके मन मे विकल्प की उस अवस्था को याद कर उसके अन्दर कुछ पिघलने लगा था। फिर वो पत्र ले कर बैठ गयी
*माँ
मैं आया के बच्चों के संग बडा हुया खेला। उन से गन्दी बातें और गालियाँ सीखा । बडा होते होते तुम्हारे लिये मन मे आक्रोश पनपने लगा। तुम्हारा कहना न मानना ,बार बार तुम्हें तंग करना मेरी आदत मे शुमार हो गया। अपने अन्दर का आक्रोश निकालने के लिये मैं ऊल जलूल हरकतें करता ताकि तुम्हें दुखी कर सकूँ। पिता जी परेशान रहने लगी। फिर तुम्हारी राय पर मुझे रेज़िडेंशल स्कूल मे भेज दिया गया। मैं उस समय तीसरी कलास मे था। मुझे आज भी वो दिन याद है जब पिता जी मुझे छोदने आये तो उनकी आँखों मे आँसू थे। बहुत रोये थे मुझे गले से लगा कर शायद तुम भी उनके प्यार के बदले उन्हे कुछ नहीं दे सकी थी
। यूँ तो मैं हास्टल मे खुश था। पिता जी रोज़ फोन कर लेते और बातों बातों मे तुम्हारे लिये मेरे मन की मैल को साफ करने की कोशिश करते। तुम्हारी मजबूरियां बढा चढा कर बताते। हर माह मुझे एक दो दिन के लिये घर ले आते। उनसे जो प्यार मिला उसी के आसरे3 यहां तक पहुँचा हूँ। वो हर बार एक बात कहना नहीं भूलते* बेटा पढ लेना मुझे लाज मत लगवाना,तुझे बता नहीं सकता तुम मेरे लिये क्या मायने रखते हो मगर कुछ मजबूर हूँ*।कहते हुये वो आँख भर लेते। आज समझ आता है कि उनकी मजबूरी तुम थी। मैं बस उन्हें दुखी नहीं देख सकता था शायद इसी लिये इतना पढ गया*
अन्दर ही अन्दर शायद पिता जी को मेरा गम खाता रहा-- शायद तुम्हारी निष्ठुरता भी----। चलो मैं आई  ए एस बन गया। लखनऊ मे मेरी पोस्टिन्ग हुयी। अब घर आना कुछ कम हो गया था। मेरे और आपके सम्भन्ध कभी प्यार दुलार या सम्मान के नहीं रहे।*
* इसी गम मे पिता जी को एक दिन दिल का दौरा पडा। आपके साथ उस समय एक आध मुलाज़िम को छोड कर कोई नहीं था। आता भी कैसे? तुम कभी किसी के ------ क्रमश:

17 January, 2010

संजीवनी
*इन्विट्रो फर्टेलाईजेशन* जैसे अविष्कार ने आज कल जिस तरह एक व्यापार का रूप ले लिया है,जैसे कि कुछ लोग तो सही मे औलाद चाहते हैं इस लिये कोख किराये पर लेते हैं, मगर कुछ आधुनिक सोच की युवतियाँ जो केवल अपने करियर के लिये और अपने फिगर को बचाये रखने के लिये इस खोज का लाभ उठा रही हैं, उस के कुछ गलत परिणाम कुछ भावनात्मक पहलू भी हैं जिसे ध्यान मे रख कर ये कहानी लिखी गयी है।
संजीवनी {कहानी} अगली कडी   

पहली कडी मे आपने पढा कि मानवी के, उसके पति सुधाँशू की मौत के बाद, बेटे से सम्बन्ध अच्छे नहीं रहे थे।आज जब उसे बेटे विकल्प का पत्र मिला तो वो हैराम हुई, विकल्प ने लिखा था कि वो पत्र घर जा कर फुरसत मे ही पढै। वो घर आ कर उसका पत्र पढने लगी। अब आगे------
    मानवी ने दरवाज़ा अन्दर से बन्द किया और बेड रूम मे पत्र ले कर बैठ गयी। पत्र खोला---
माँ
माँ लिखते हुये खुद पर हैरत हो रही है। मम्मी कहूँ तो शायद् ठीक  रहेगा। क्यों कि पश्चिम के आधूनिकवाद की ओढनी--- नहीँ--- कवच पहन कर आप मम्मी कहलाना ही पसंद करेंगी। मुझे लगता है कि अब समय आ गया है कि आपको अपने 27 वर्षों का लेखा जोखा दूँ जो आपने मेरे लिये किया है। बेशक मेरी बातें आज आपको कडवी लगेंगी मगर बिना सुने आप समझ ही नहीं पायेंगी कि मुझे आपसे शिकायत क्यों रहती है। हम दोनो का रिश्ता सहज क्यों नहीं रहा। मैं वर्षों से जमे मन मे विष को निकालने का एक अवसर माँगना चाहता हूँ और चाहता हूँ कि हमारा रिश्ता हमेशा के लिये माँ-बेटे का पवित्र रिश्ता बन जाये। सब से पहले आपको ये बताना चाहता हूँ कि मैं आपके साथ सहज क्यों नहीं रहता।"
"माँ ये समझने के लिये पहले माँ के अर्थ और उसके वात्सल्य को समझना जरूरी है। माँ सृष्टी की अनुपम रचना है। इस पवित्र रिस्ज्ते के लिये वो अपने आप को मिटा देती है। मैं माँ के जितने रूप जानता हूँ--- वो बताता हूँ, उनमे से तुम खुद तय करना कि तुम कौन सी माँ हो"
एक माँ देवकी होती है जो बच्चे को जन्म देती है। वो गर्भ धाराण से नौ माह तक बच्चे को पेट मे छिपाये, उसे अपने खून से सींचती है। पहले दिन से जब बच्चा कोख मे आता है वो उसकी कल्पना मात्र से रोमाँचित, पुलकित महसूस करती है। उसके भविश्य के लिये सपने बुनने लगती है। नौ माह तकलीफें सह  कर भी उसके माथे पर शिकन तक नहीं आती । पेट मे बच्चे  की जरा सी हलचल उसके मन मे उमंग भर देती है। यहीं से बच्चा बहुत कुछ सीखता है। यहाँ से उसे प्यार की संवेदना का एहसास होता है।अभिमन्यू ने चक्रव्यूह भेदना माँ के पेट मे ही सीखा था।गर्भ से बाहर आते ही बच्चा सब से पहले माँ क स्पर्ष पहचानता है।खून के रिश्ते के साथ साथ वो दोनो संवेदनाओं से भी बन्ध जाते हैं। इसलिये वो माँ से बहुत प्यार करता है। लेकिन तुम ने अपने करियर , और तुम्हारी फिगर खराब न हो, तुम ने सन्तान को जन्म देने का अवसर खो दिया। फिर सन्तान के प्यार की चाह कैसी? अगर मुझे खरीदा भी तोेक वस्तु बना कर रख लिया।"
   " माँ के दूसरे पावन रूप को जानता हूँ वो है यशोधा माँ , जो बच्च्3ए को जन्म तो नहीं देती मगर अपने आँचल की छाँव देती है, पालन पोषण करती है, रातों की नीँद ,ापना सुख चैन उसके लिये लुटा देती है। बच्चे की किलकारिओं मे संसार का सारा सुख पा लेती है। उसकी जरा सी तकलीफ इन माँओं को बहुत बडा दुख लगता है। प्यार तुआग ममता से सराबोर माँ का संरक्षण पा कर बेटा सदा के लिये उसका ऋणी हो जाता है। उस माँ के आँचल की छाँव जीवन भर उसे सहलाती रहती है, उसकी लोरियों का संगीत, लय मे वात्सल्य का अनुराग उसे माँ से बान्धे रखता है। मगर हम दोनो के रिश्ते मे वो भी सुरताल नहीं बना।"
"तीसरी माँ होती है सौतेली माँ।सौतेली माँ भी अगर बच्चे को प्यार नहीं दे पाती तो उसके पीछे भी कई कारण होते हैं उसके लिये वो अकेली ही दोषी नहीं होती। उसे शादी का सुख भोगे बिना अपने कुछ सपनों अरमानों को उस बच्चे के लिये कुरबान करना पडता है ,जिस के लिये और भी बहुत से कारण हैं। फिर भी बहुट सी सौतेली माँये  अपने सौतेले बच्चों से प्यार करती हैं। उनकी तफ्सील मे न जा कर यही कहूँगा कि वो शायद परिस्थितिओं मे बुरी बन जाती है। सपनो के टूट जाने का क्षोभ कभी न कभी उसके व्यवहार मे उभर आता है। मगर तुम्हारे साथ तो ऐसा कुछ भी नहीं हुया। मेरे कारण तुम ने जीवन से कोई समझौता नहीं किया तुम्हारे कोई सपने नहीं टूटे बल्कि मुझे ले कर अपने सपने पूरे किये अपने करियर के लिये मम्तव को छोड दिया।"
"माँ बुरा मत मानना , मुझे आज तक ये समझ नहीं आया कि तुम्हें कौन सी माँ समझूँ? वैसे भी आपको रिश्तों नातों से मोह ही नहीं है। बाकी रिश्तेदारों से इसलिये मेल जोल नहीं रखा कि वो आपकी  पद प्रतिष्ठा का लाभ न उठायें। उन सब को आप मतलवी समझती हैं। आपने भौतिक सम्पदाओं को ही जीवन माना है और उसी मे आप निवेश करती हैं। जीवन मे प्यार सम्मान और रिश्ते पाने के लिये मानवीय संवेदनाओं प्यार और त्याग का निवेश करना पडता है।"
"नीम का पेड लगा कर आम पाने की आशा कैसे की जा सकती है?ापने मातहतों का सैल्यूट पा कर आप गर्व करती हैंपर क्या उन अपने अधीन्स्थ के अतिरिक्त कभी किसी क सम्मान पाया? मैं आप पर अंगुली नहीं उठा रहा मगर ये स्दमझाने की कोशिश कर रहा हूँ कि हम दोनो मे कौन सा प्यार है? किस सम्मान की आशा आप मुझ से करती हैं उसमे आपने क्या निवेश किया? मगर मैं फिर भी चाहता हूँ कि मैं आपके करीब आऊँ। आपसे प्यार करूँ शायद करता भी हूँ तभी तो ये कोशिश कर रहा हूँ कि आप मुझे समझें, प्यार दें।"
"मैं हैरान हूँ कि आपने मेरे पिता जी से प्यार किया। इसका कारण भी शायद पहले उनका रुतवा और रईस परिवार ही था या शायद कच्ची उम्र का तकाज़ा था कि प्यार कर बैठी। मगर पिता जी ने आपके प्यार को बखूबी निभाया। अपने जीवन से आपके लिये सब समझौते किये और उसी समझौते का परिणाम हूँ मैं।"
आदमी अपने सुख के लिये कठिन परिस्थितिओं मे कितनी आसानी से विकल्प ढूँढ लेता है--- अपने स्वार्थ के लिये दूसरे की बलि चढाने वाला विकल्प---- हाँ वही बलि का बकरा विकल्प हूँ मैं। पिता को अपने लिये वारिस चाहिये था मगर आप आधुनिक नारी  अपने करियर, सौंदर्य और फिगर को बच्चे के लिये दाँव पर नहीं लगा सकती थी। महज अपने पति की इच्छा के लिये आपने विकल्प ढूँढ लिया----*किराये की कोख *।"
मेरी नीँव ही धन दौलत,स्वार्थ,मजबूरी, और तृष्णाओं की रेत पर रखी गयी। कैसे भूल सकता हूँ कि मैं अपनी जन्म देने वाली माँ की मजबूरी और दूसरी माँ उन मजबूरिओं की खरीदार के बीच एक व्यवसायी डील का प्रोडक्ट हूँ।"
जिस वैग्यानिक ने इस *इन्विट्रो फर्टेलाईजेशन् {जिसे आज कल *किराये की कोख *के रूप मे देखा जाने लगा है} उसने कभी कल्पना भी नहीं की होगी कि उसका ये अविष्कार लोगों के स्वार्थ के चलते एक व्यापार बन जायेगा। इस तरह मैं किसी की चाहत नहीं बल्कि खरीदी गयी वस्तु बन गया। इस अमीर वंश को आगे बढाने के लिये एक गरीब वंश का अन्त हो गया। माँयही नहीं फिर मेरा आगे का सफर शुरू हुया, असली कहानी तो वहीं से शुरू होती है।------ क्रमश:
 

15 January, 2010

 संजीवनी { कहानी }
जैसे ही मानवी आफिस मे आकर बैठी ,उसकी नज़र अपनी टेबल पर पडी डाक पर टिक गयी। डाक प्रतिदिन उसके आने से पहले ही उसकी टेबल पर पहुँच जाती थीपर वो बाकी आवश्यक काम निपटाने के बाद ही डाक देखती थी। आज बरबस ही उसकी नज़र एक सफेद लिफाफे पर टिक गयी जो सब से उपर पडा था।उसके एक कोने पर भेजने वाले के स्थान पर *वी* लिखा था। पहचान गयी,पत्र विकल्प का था। क्या लिखा होगा इस पत्र मे?वो सोच मे पड गयी। कभी पत्र लिखता नहीं है । टेलीफोन पर बात कर लेता है। अब तो चार महीने से न टेलीफोन किया और न ही घर आया । पीछली बार भी एक दिन के लिये आया था और बहस कर चला गया। शायद मुझ पर रहम खाने आया था। सुधाँशू की मौत के बाद अकेली जो हो गयी हूँण ! मुझ से नौकरी छुदवा कर साथ चलने के लिये कह रहा था। हुउउ ! महज औपचारिकता ! जब मुझे मान सम्मान नहीं दे सकता, मेरी हर बात उसे बुरी लगती है-- तो फिर साथ रखने की औपचारिकता कैसी?  जैसे ही उसने लिफाफा खोला उस मे से एक और लिफाफा निकला जिस पर लिखा था कि इसे घर जा कर फुरसत मे पढें।
मानवी ने लिफाफा पर्स मे रख लिया मगर दिमाग मे हलचल थी कि पता नहीं इस लिफाफे मे ऐसा क्या है जो फुरसत मे पढने वाला है। एक क्षण के लिये सोचा कि आज कोई काम न कर के पत्र पढा जयी मगर उसी क्षण उसने अपना ईरादा बदल लिया। अपने काम और करियर से बढ कर उसके लिये उसके लिये कुछ मायने नहीं रखता था।तभी तो आज वो कम्पनी की एम डी  बनी। ये पत्र तो छोटी सी चीज़ है अपने करियर के लिये उसे अगर विकल्प को भी छोडना पडे तो छोड देगी।
          आजकल क्या मायने हैं औलाद के? बच्चे कहाँ माँ बाप का बुढापे मे ध्यान रखते हैं। वो क्यों किसी की परवाह करे। इन्हीं सोचों मे वो अपना काम करने लगी। मानवी ने अपने व्यक्तित्व और अपनी मान्यताओं से एक कदम भी आगे सोचना सीखा ही नहीं था। जीवन मे उसे सब कुछ सहज ही मिला। आधुनिकता और धन दौलत की पिपासा ने उसे संवेदनाओं से दूर कर दिया था। कागज़ के फूलों की तरह थी वो। जीवन के छोटे छोटे मीठे पल. रिश्तों की महक, ज़िन्दगी की मुस्कान सब कुछ उसकी दफ्तर की फाईलों मे गुम हो कर रह गया था। यूँ भी सुधाँशू की मौत के बाद काम के सिवा और रह भी क्या गया था उसकी ज़िन्दगी मे।अब विकल्प भी दूर होता जा रहा है। उसकी हर बात का विपरीत अर्थ लेता है।जैसे उसका विरोध करना ही विकल्प का एक मात्र ध्येय हो। वो सोचती के अपना -- अपना ही होता है! विकल्प उसका नहीं हो सकता। क्या नहीं दिया उन्होंने विकल्प को? इतना बडा घर बार ऐशो आराम की ज़िन्दगी-- हमारे काराण ही तो वो आई. ए. एस . बन पाया है। नहीं तो उसे जन्म देने वाली गरीब औरत उसकी सरकारी स्कूल की फीस भी नहीं दे पाती। सुधाँशू से उसे फिर भी लगाव था।उसका अपना बेटा जो था। तभी पिता की मौत के बाद उसने घर आना भी छोड  दिया था।
पी. ए के अन्दर आते ही वो सतर्क हो गयी और  अपना काम निपटाने लगी।
पाँच बजे अचानक उसे पर्स मे पडे लिफाफे की याद आयी। मन कुछ बेचैन सा हो गया। पता नहीं शायद सुधाँशू के बाद वो मानसिक तौर पर कुछ कमज़ोर हो गयी है--- क्यों बेचैन है वो पत्र पढने के लिये? वो सात बजे से पहले कभी आफिस से नहीं निकलती थी--- आज पाँच बजे ही उसने पर्स उठाया और आ कर गाडी मे बैठ गयी। पिछली सीट पर बैठते ही उसका मन हुया कि पत्र खोल ले मगर कुछ सोच कर वो रुक गयी। पता नहीं पत्र मे क्या होगा---- कही ड्राईवर ने शीशे मे से उसके चेहरे के भावों को पढ लिया तो? नहीं---- नहीं  --।
 जैसे ही वो घर का दरवाज़ा खोल कर अन्दर पहुँची बाहर सर्वेन्ट रूम से उसे देख कर बाई भी आ गयी।----
"मेम साहिब् , चाय बना लाऊँ।"
 "हाँ चाय बना कर यहाँ रख दो और तुम जाओ। आज खाना बाहर से फोन कर के मंगवा लूँगी।" कह कर वो टायलेट मे चली गयी
चाय रख कर बाई चली गयी। मानसी ने दरवाज़ा अन्दर से बन्द किया और बेड रूम मे पत्र ले कर बैठ गयी। पत्र खोला
"माँ"
चरण स्पर्श।
 माँ लिखते हुये पता नहीं क्यों  आँखें नम हो रही हैं और हैरत भी हो रही है।--- क्रमश:


13 January, 2010

क्या ये नशा है?
सब ओर एक अजीब सा सन्नाटा। अभी बच्चों के जाने के बाद 2-3 दिन मे सब कुछ ठीक हो गया था फिर आज क्या हुया? समझ नहीं आ रही थी। घर की हर चीज़ जैसे मायूस सी थी । घर की हर चीज़ जैसे मुझ से नज़रें चुरा रही थी। सब कुछ अजनबी सा लग रहा था सोचा चलो आज फ्री हूँ कुछ सफाई कर लेती हूँ। तस्वीरें उठा कर साफ करने लगी तो वो भी उदास । नातिन की एक गुडिया यहाँ रह गयी थी उसे साफ करने लगी तो वो जैसे रोने लगी कि उसके जाने के बाद मैने उसे भी नहीं पूछा। खैर किसी तरह सब काम निपटाया। नाश्ता किया । काम खत्म । अब  क्या किया जाये? बस घए मे एक मात्र प्राणे हमारे पति देव मन्द मन्द ,मुस्कुराते नज़र आये तो इनसे कहा कि चलो आज किसी के घर हो आते हैं बहुत दिन हो गये तो व्यंग से मुस्कुराये --हाँ आज तुम फ्री  हो न मगर मुझे बहुत काम है। बस आ कर अपने बिस्तर मे बैठ गयी । जनाब एक बजे तक 3 गज़लें तडा तड लिख लीं-- है न चमत्कार? फिर खाना बनाया। आराम किया । शाम को इन से कहा कि चलो अब एक ताश की बजी लगाते हैं मगर जनाब ऐसे नाराज़ कि कहते मुझे खेलना  भूल गया।शायद मुझे इस ब्लाग के नशे के बिना जीना सिखा रहे थे। मैं तो तंग आ गयी अब समय कैसे बिताया जाये फिर उठा ली कलम कागज़ दो गज़लें और लिख ली। खुद भी हैरान हूँ। बहुत मुश्किल से वो दिन बिताया आगले दिन फिर वही हाल अब तो कलम उठाने को भी मन नहीं किया।
 बस सोचती रही कि इतनी उदास क्यों हूँ। क्या आप सब को समझ आया? नहीं न तो बताये देती हूँ दो दिन से कम्पयूटर खराब था ब्लाग पर जो नहीं आ पाई थीूअपने ब्लाग परिवार से दूर रही तो उदास तो होना ही था । या ये नशा था ब्लाग का? या आप सब का स्नेह? आप बतायें। आज लिखने को कुछ नहीं वो गज़लें अभी पास होने के लिये भेजनी हैं।अज एक पुरानी कविता से काम चला लेते हैं। कल मिलते हैं एक नई रचना के साथ । नमस्कार ।
कविता
सतलुज की लहरों ने
जीवन का सार बताया
सीमा मे बन्ध कर रहने का
गौरव उसने समझाया
कहा! उन्मुक्त बहूँ तो
सिर्फ उत्पात मचाती हूँ
भाखडा बान्ध मे हो सीमित
गोबिन्द सागर कहलाती हूँ
देती हूँ बिजली घर घर
फस्लों को पानी पहुँचाते हूँ
पीने को पानी देती हूँ
सब को सुख पहुँचाती हूँ
जो समाज के नियम मे जीयेगा
वही इन्सान कहायेगा
जो तोडेगा इस के नियम
वो उपद्रवी कहलायेगा
तुम भी अनुशास्न मे रहना सीखो
मानव धर्म कमाओ
सतलुज की लहरों की मानिंद


09 January, 2010

गज़ल 
इस गज़ल को भीादरणीय प्राण भाई साहिब ने संवारा है। उनकी अति धन्यवादी हूँ।
गज़ल
हमारे नसीबां अगर साथ होते
बुरे वक़्त के यूँ न आघात होते.

गया वक़्त भी अपना होता सुहाना
सुहाने हमारे भी दिन रात  होते

जलाते न हम आशियाँ अपने हाथों
सफ़र जिंदगानी के सौगात होते

कभी वो जरा देखते हमको मुड़कर
न बर्बाद होने के हालात  होते

गरूर-ए-जबां यूँ न बेकाबू होती
न झगड़े अगर अपने बेबात होते

चली आंधियां,फासले बढ़ गये हैं
मेरे मौला  ऐसे न  हालात होते

तमन्ना अभी तक वो जिंदा है मुझमें
मुझे  थामते  हाथ में हाथ  होते

07 January, 2010

कविता
 ऐसा पहली बार हुया है कि इतने दिनों बाद पोस्ट लिखी हो। बेटी और नातिन एक माह से  आयी हुये थीं,। उनके जाते ही घर मे उदासी सी छा गयी।  उनके जाने पर मन में कुछ भाव आये  कविता के रूप मे कह रही हूँ ।

ममता
कई दिनों से घर मे थी
रोनक सी एक आयी
हंसी ,ठहाके,खेल तमाशे,
घर मे मस्ती रहती छाई
जब चली गयी घर की खुश्बू
चली गयी सब खुशियाँ
पंम्ख लगा कर उड गयी
छोटी सी वो गुडिया
तितली सी वो उडती थी
फूलों सी मुस्काती
नानी-- नानी कहतीवो
मेरे कन्धों पर चढ जाती
चहक उसकी कानों मे गूँजे
देखूँ इधर उधर
पर घर का हर कोना सूना
झाँकूँ जिधर  जिधर
शरारतें उसकी याद आयें
आँखें भर भर रोऊँ
किसे सुनाऊँ अपनी लोरी
किसे दर्द मैं कहूँ
अपनी इस ममता को
कैसे मैं सहलाऊँ
इन खाली दिवारों से
कैसे मन बहलाऊँ
रुक नहीं सकते उडते पँछी
रुक नहीं सकती बहती धारा
कहीँ भी जाये कहीं  रहे वो
जीवन हो उसका उजियारा


30 December, 2009

सन 2009  तेरा शुक्रिया

वर्ष 2009 का जाते हुये धन्यवाद न करूँ तो ये कृ्त्घ्नता होगी। अगर मैं कहूँ कि ये साल मेरी ज़िन्दगी का सब से खूबसूरत और खुशियाँ देने वाला साल रहा तो गलत न होगा। प्यार रिश्तों का मोहताज़ नहीं होता। अन्तर्ज़ाल जैसी आभासी दुनिया मे भी रिश्ते कैसे फलते फूलते हैं ये महसूस कर अभिभूत हूँ।
जो प्यार और सम्मान मुझे इस साल मे मिला है उसकी तुलना  दुनिया की किसी भी दौलत से नहीं की जा सकती ।। इस ब्लाग जगत ने मुझे अथाह प्यार दिया है, जिस मे अपने सब दुख तकलीफें अकेलापन यहाँ तक कि अपनी बिमारी भी भूल गयी हूँ। सब से बडी उपल्ब्धि मुझे दो भाईयों का प्यार बहुत मिला है। बडे भाई साहिब श्री प्राण शर्मा जी ने जो स्नेह और आशीर्वाद मुझे दिया है उससे मेरी ऊर्जा कई गुना बढ गयी है । आज कल किस के पास इतना समय है। वो मुझे गज़ल ही नहीं सिखाते और भी बहुत अच्छी अच्छी बातें सिखाते  हैं । उनसे बात करके हमेशा खुद को पहले से सबल पाया है। जब मैने गज़ल सीखनी शुरू की तो मैं कहती थी कि मुझे कभी भी गज़ल लिखनी नहीं आ सकती मगर उन्होंने मुझे हमेशा उत्साहित किया। बेशक अभी अधिक अच्छी गज़ल कह नहीं पाती मगर गज़ल के गुर सीख रही हूँ। जब ब्लागिन्ग शुरू की थी तब मुझे कविता और गज़ल मे अन्तर नहीं पता था मगर भाई साहिब के स्नेह, पेशैंस और आशीर्वाद ने सीखने की राह आसान कर दी। उनकी ऋणी हूँ। उसके बाद छोटे भाई श्री पंकज सुबीर जी 01 ने मुझे *दी* कह कर अपने स्नेह मे बाँध लिया है। 1973 और 1983 मे दो भाई खोये थे और 2009 मे दोनो को पा लिया इससे बडी उपल्ब्धि और क्या हो सकती है। इसके बाद राज भाटिया जी ने भी यही सम्मान मुझे दिया। यूँ तो और बहुत से नाम हैं मगर इन से जो प्यार और सहयोग मिला उस की मिसाल नहीं है। दूसरी सब से बडी उपल्ब्धि है मुझे अर्श { प्रकाश सिंह अर्श} जैसा बेटा मिला इस के बारे मे इतना ही कहूँगी कि वो मेरी हर मुश्किल का हल है और मेरे हर सवाल का जवाब है,  हर दुख ,सुख उस से कह लेती हूँ। फिर अच्छे बच्चों की तरह मुझे मश्विरा देता है ।हाँ मेरी गलती पर मुझे डाँट भी देता है।--- मुझे शब्द नहीं सूझ रहे कि उसके लिये क्या कहूँ। इसके बाद दीपक मशाल ने मुझे बहुत सम्मान दिया। यहाँ तक कि वो मुझ से मिलने मेरे पास नंगल भी आये। उसका प्यार और सम्मान पा कर अभिभूत हूँैआज के युग मे ऐसे बच्चे मिलना सच मे बहुत मुश्किल है। इसके बाद मुझे  प्रकाश  गोविन्द जी मिले उनकी क्या कहूँ बस निशब्द हू। इन बच्चों के संस्कार देख कर इनके माँ बाप को सलाम करती हूँ। प्रकाश गोविन्द जी ने मुझे बहुत कुछ सिखाया और हमेशा बहुत कुछ करने की प्रेरणा भी दी मगर मैं ही नालाय्क हूँ अभी तक उन  आपेक्षाओं पर खरी नहीं उतर सकी।इसके अतिरिक्त दर्पण शाह , ने भी बहुत सम्मान दिया है। एक नाम जो मैं बडे गर्व के साथ लेना चाहूँगी वो गौतम राज रिशी जी का है उनके सम्मान और प्यार के लिये भी उनकी ऋणी हूँ। मिथिलेश दुबे छोटे बच्चों की तरह मुझ से बहुत प्यार करता है। कुलवन्त हैपी, लोकेन्द्र विक्रम सिंह  अर्विन्द, धीरज शाह  महफूज़,प्रवीण पथिक, रविन्द्र्,    इम सब ने मुझे बेटोंजैसा प्यार और सम्मान दिया। एक नाम जिस ने एक दम मेरे सामने उपस्थित हो कर मुझे हैरान कर दिया वो थे श्री अकबर खान राणा जी ।मुझे कहते कि आपका आशीर्वाद लेने आया हूँ सोचिये उस समय मेरी खुशी का कोई ठिकाना था?। आज कह सकती हूँ प्यार रिश्तों का मोहताज नहीं होता मुझे ये सभी बेटे अपनी लगते हैं। शायद अपना होता तो कभी पूछता भी नहीं। इसके बाद अपनी बेटियों का नाम भी लेना चहूँगी। एडी सेहर, विनीता यशस्वी, कविता रावत , रश्मि रविज़ा,कविता राजपूत वाणी जी । लडकियाँ मा के लिये इतनी चिन्तित रहती हैं कि अगर दो तीन दिन नेट पर नज़र न आऊँ तो लम्बी सी मेल आ जाती है। इन सभी बच्चों को बहुत बहुत आशीर्वाद
       एक उल्लेखनीय नाम और लेना चाहूँगे जिस से मुझे कुछ और अधिक काम  करने की प्रेरणा मिलती है वो है अनुज खुशदीप सहगल कभी मिली नहीं मगर मिलूँगी जरूर रिश्ता पता नहीं मगर मेरे मन से हर वक्त आशीर्वाद निकलता है उन के लिये, तो लगता है मेरे बेटे जैसे ही हैं। मुफ्लिस जी, दिगम्बर नास्वा जी पंकज मिश्रा जी , श्रीश पाठक जी, स्वपनिल भारतीयम् .निशू तिवारी,अनिल कान्त जी , ओम आर्यजी इन सब की भी आभारी हूँ कि समय समय पर मुझे अपने स्नेह से उत्साहित करते हैं। नीरज गोस्वामी जी ,दिनेश राय दिवेदी जी  की भी आभारी हूँ। स. पावला जी की बहुत आभारी हूँ मुझे पंजाबी लिखने मे जो समस्या आती है उसका हल उनके पास होता है। अगर श्री आशीश खन्डेलवाल जी का नाम न लूँ तो शायद सब से बडी भूल हो जायेगी। मुझे ब्लाग के बारे मे बहुत कुछ उन्होंने सिखाया है। चाहे वो व्यस्त भी रहे हों मै झट से उन्हें बज़ कर देती और चुटकी मे मेरी समस्या हल कर देते।
उपर तो उन लोगों की बात हो रही थी जिन से मेल या चैट दुआरा सम्पर्क मे रहती हूँ । इसके अतिरिक्त मेरे पाठक  जो मुझे अपनी प्रतिक्रियाओं से उतसाहित करते हैं उनकी बहुत बहुत आभारी हूँ। मैं अलपग्य कुछ भी नहीं थी मगर मेरे पाठकों ने मुझे सिर आँखों पर बिठाया। श्री रविन्द्र प्रभात जी के ब्लाग *परिकल्पना* से जब पता चला कि मेरा नाम उन नौं देवियों मे है जिनके ब्लाग इस साल चर्चा मे रहे और आगे रहे। इस से मेरा उत्साह बढा है। उनका आभार ।
   ये सब लिखने का मेरा एक मकसद ये भी है कि प्रोत्साहन इन्सान को आगे बढने की शक्ति देता है । आओ सब पिछले सब झगडे भूल कर नये साल मे ब्लाग जगत मे प्रेम की परिभाषा  सीखें और नये आने वाले शब्दशिलपियों को प्रोत्साहित करेंमैने अपने शहर से भी दो नये ब्लागर्ज़ बनाये हैं। एक राकेश वर्मा जी{ http://akhrandavanzara.blogspot.com/} aur doosare Sanjeev kuraalia jee{ http://kalamkakarz.blogspot.com/}  }इन्हें भी अपना आशीर्वाद दें। ये मेरे इस साल का लेखा जोखा है। मेरी उपल्ब्धियों का और जो प्यार मैने ब्लाग जगत से पाया है। सभी का धन्यवाद।ये  सब मेरे दामाद ललित सूरी  जी की वजह से हुया है। उसे भी बहुत बहुत आशीर्वाद ।
  नये साल की सब को बहुत बहुत बधाई और शुभकामनायें। मेरे बच्चों को आशीर्वाद। दो तीन दिन ब्लाग से दूर रहूँगी। चार पँक्तियाँ नये साल के लिये

नये साल ऐसे तराने सुनाओ
लुटाओ खुशी के खज़ाने लुटाओ

चलो अब मिटा दें गिले सब पुराने
मिलन के कोई तो बहाने बनाओ

न जात और धर्मों का बन्धन रहे
उठो नफरतों के ठिकाने मिटाओ

कहो बात वो प्यार बढता रहे
अंधेरे घरों मे दिये से जलाओ

26 December, 2009

प्यार रिश्तों का मोहताज़ नहीं होता। अन्तर्ज़ाल जैसी आभासी दुनिया मे भी रिश्ते कैसे फलते फूलते हैं ये महसूस कर अभिभूत हूँ।24 दि. रात 9 बजे अचानक फोन आया *मासी जी मैं दीपक बोल रहा हूँ, मै कल सुबह सात बजे आपसे मिलने आ रहा हूँ।* सुन कर खुशी का ठिकाना नहीं रहा। दीपक और कोई नहीं आपका दीपक मशाल है जिसे आप रोज़ ब्लाग पर पढते हैं। बाकी जानकारी फिर से अलग पोस्ट मे दूँगी। अभी एक गज़ल पढिये------
गज़ल

बेवज़ह बातों ही बातों में सुनाना क्या सही है
भूला-बिसरा याद अफसाना दिलाना क्या सही है

कुछ न कुछ तो काम लें संजींदगी से हम ए जानम
पल ही पल में रूठ जाना और मनाना क्या सही है

मुस्करा ऐसे  कि  जैसे  मुस्कराती  हैं   बहारें
चार दिन की ज़िन्दगी घुट कर बिताना क्या सही है

ख्वाब में आकर मुझे आवाज़ कोई  दे  रहा    है
बेरुखी दिखला के उसका दिल दुखाना क्या सही है

तुम इन्हें सहला नहीं पाए मेरे हमदर्द   साथी
छेड़  कर सारी खरोचें दिल दुखाना क्या सही है

अब बड़े अनजान बनते हो हमारी ज़िन्दगी   से
फूल  जैसी ज़िन्दगी को यूँ सताना क्या सही  है

ज़िन्दगी का बांकपन खो सा गया जाने कहाँ अब
सोचती हूँ ,तुम बिना महफ़िल सजाना क्या सही है



23 December, 2009

एक पुरानी कविता जो अभी आप लोगों ने पढी नहीं है। आज भी नया कुछ लिख नहीं पाई। तो इसे ही झेलले़ ।
कविता
मुझे मेरे दिल के करीब रहने दो
न पोंछो आँख मेरी अश्क बहने दो
ये इम्तिहां मेरा है जवाब् भी मेरा होगा
दिल का मामला है खुद से कहने दो
जीते चले गये ,जिन्दगी को जाना नहीं
मुझे मेरे कसूर की सजा सहने दो
उनकी जफा पर मेरी वफा कहती है
खुदगर्ज चेहरों पे अब नकाब रहने दो
तकरार से कभी फासले नहीं मिटते
घर की बात है घर में रहने दो !!

20 December, 2009

कविता
आज एक छोटी सी कविता जो पहले भी शायद कुछ लोगों ने पढी है। आजकल घर की व्यस्ततायों के चलते कुछ नया लिख नहीं पा रही। इसे ही झेल लीजिये।
छोटी सी बात

कई बार
जब हो जाते हैं
हम
मैं और तू
छोटी छौटी बातों पर
कर देते हैं रिश्ते
कचरा कचरा
तर्क---वितर्क
तकरारें--
आरोप--प्रत्यारोप
छिड जाता है
महाँसंग्राम
अतीत की डोर से
कटने लगती है
भविश्य की पतंग
और खडा रह जाता है
वर्तमान
मौन, निशब्द
पसर जाता है
एक सन्नाटा
उस सन्नाटे मे
कराहते हैं
छटपटाते हैं
और दम तोड देते हैं
जीवन के मायने
ओह!
रह जाते हैं
इन छोटी- छोटी  बातों मे
जीने से
जीवन के बडे बडे पल


18 December, 2009

कई दिन से बच्चे आये हुये हैं कुछ अधिक नया लिख नहीं पा रही। ये छोटी सी गज़ल जिसे प्राण भाई साहिब ने संवारा है उनके आशीर्वाद से आपके सामने प्रस्तुत कर रही हूँ
                                                                   गज़ल


करें कितना भरोसा हम इन्हें तो टूट जाना है
दरार आयी दिवारों का भला अब क्या ठिकाना है

ज़मीन पर पाँव रखती हूँ नज़र पर आसमां पर है
नहीं रोके रुकूँगी मैं कि ठोकर पर  जमाना   है

कहाँ औरत रही अबला कहाँ बेबस सी लगती   है
वो पहुँची है सितारों तक ,किसीको क्या दिखाना है

है ऊंची बाड़ के पीछे जड़ें खुद काटता    माली
लुटा जो अपनों के हाथों कहाँ उसका ठिकाना   है

ख़यालों में ही तू खोया रहेगा कब तलक यूँ ही
कि उठ मन बावरे अब ढूंढना तुझको ठिकाना है
               

16 December, 2009

मैं नेता बनूंगा [व्यंग ]
एक दिन बेटे से पूछा ;बेटा क्या बनोगे?:
कौन सा प्रोफेशन अपनाओगे,किस राह पर जाओगे
वह थोडा हिचकिचाया,फिर मुस्कराया और बोला
मैं नेता बनूंगा
मैं हुआ हैरान उसकी सोच पर परेशान
नेता बनना होता है क्या इतना आसान?
फिर पूछा :बेटा नेता जैसी योग्यता कहां से लाओगे?
लोगों में अपनी पहचान कैसे बनाओगे?
वो जरा सा मुस्कराया
और  बोला मुझे सब पता है
नेता के लिये मिनिमम कुयालिफिकेशन है---
1पहली जमात से ऊपर पास हो या फेल
2 किसी न किसी केस में कम से कम एक बार हुई हो जेल
3 गणित मे करोडों तक गिनत जरुरी है
इस के बिना नेतागिरी अधूरी है
4 माइनस डिविजन चाहे ना आये पर
प्लस मल्टिफिकेशन बिना
नेता बनने की चाह अधूरी है
5 सइकालोजी थोडी सी जान ले
ताकि वोटर की रग पह्चान ले
6 डराईंग में कलर स्कीम का ग्याता हो
गिरगिट  की तरह रंग बदलना आता हो
लाल, काले सफेद से ना घबराये
नेता की पोशाक में हर रंग समाये
पिताजी बस अब भाई दादाओं के हुनर जानना है
 उस के लिये किसी अच्छे डान को गुरू मानना है
डाक्टर इंजनिय्र बनकर मै भूखों मर जाऊंगा
नेता बन कर ही होगा गाडी बंगला और विदेश जा पाऊंगा
मैने सोचा, और  बहुमत में नेताओं को ऎसा पाया
बस फिर क्या? अपने बेटे की बुद्धि पर हर्शाया

14 December, 2009

  गज़ल
अपना इतिहास पुराना भूल गये
लोग विरासत का खज़ाना भूल गये
रिश्तों के पतझड मे ऐसे बिखरे
लोग बसंतों का जमाना भूल गये
दौलत की अँधी दौड मे उलझे वो
मानवता को ही निभाना भूल गये
भूल गये  आज़ादी की वो गरिमा
कर्ज़ शहीदों का चुकाना भूल गये
वो बन बैठे ठेकेदार जु धर्म के
वो अपना धर्म निभाना भूल गये
बीवी  के आँचल मे ऐसे उलझे
माँ का ही ठौर ठिकाना भूल गये
परयावरण बचाओ,  देते भाषण
पर खुद वो पेड लगाना भूल गये
भूल गये सब प्यार मुहब्बत की बात्
अब वो हसना हंसाना भूल गये


12 December, 2009

कथित बाबा सचिदानन्द का कच्चा चिट्ठा और कुछ सवाल --गताँक से आगे
नवांशहर  पंजाब के बाबा सचिदानन्द को पुलिस् ने कविता के कत्ल के जुर्म  मे गिरफ्तार कर लिया तो कविता की माँ के हाथ एस एस पी राकेश अग्रवाल के लिये दुआ देने को उठे कि बाकी लोगों को तो कम से कम उसके चँगुल से छुडा लिया।वो खुद को रिटायर्ड जज और अपनी मुँह बोली बेटी को को आई,  पी, एस. अधिकारी बताता था। जब कि हकीकत मे वो 10वीं पास था।अपने श्रद्धालुयों की संख्या बढाने के लिये बाबा साधना चैनल पर प्रवचन भी देता था। अब सवाल ये है कि क्या ये धार्मिक चैनल हिन्दु धर्म का कुछ भला कर रहे हैं या उन्हें ऐसे ढोंगी बाबाओं के चँगुल मे फसाने का साधन बन रहे हैं। वो साधना चैनल को एक प्रवचन का ढेड लाख रुपया देता था। अनपढ लोगों को क्या पता कि चैनल पर आने वाले उन श्रद्धालूयों के पैसे खर्च करके ही प्रवचन देते हैं। मैने एक-दो गली की औरतों से  पूछा कि क्या उन्हेंसे पता है कि चैनल पर बाबा कैसे प्रवचन करने पहुँचते हैं तो उसे नहीं पता था। उसने कहा कि वो पहुँचे हुये बाबा होंगे तभी तो चैनल पर आते हैं।
हम लोग ब्लाग्स पर रोज़ धर्म के लिये लडते झगडते हैं लेकिन ऐसे ढोंगी बाबाओं के खिलाफ क्यों नहीं कुछ बोलते?  ऐसे धार्मिक चैनलों के खिलाफ क्यों नहीं कुछ कहते जिन को देख कर लोग इन के झाँसे मे आ जाते हैं। दो साल पहले मैं नये घर मे आयी थी। यहाँ प्राईवेट कालोनी है पहले हम जहाँ रहते थे वहाँ सभी नौकरी पेशा लोग थे औरतें भी अधिकतर नौकरी पेशा थी । हम मे धर्म पर बहुत कम बात होती थी। लेकिन इस कालोनी मे 70% लोग रिटायरी हैं और साथ ही आस पास ग्रामिण इलाका भी लगता है। मेरी अपनी गली मे 20 के आस पास घर हैं जहाँ हर घर किसी न किसी बाबा को मानता ह। और हर आये दिन किसी न किसी बाबा का कीर्तन प्रवचन होता है। बहुत अच्छी बात हैलेकिन मन तब और दुखी होता है जब आर्ती के समय केवल उस बाबा की ही आरती होती है। हरेक बाबा ने अपनी अलग अलग आरती लिख रखी है, उसे या उसकी तस्वीर को ही भोग  लगाया जाता है। उसकी बहुत बडी तस्वीर होती है और उसके नीचे छोटी छोटी तस्वीरें हिन्दू देवी देवतायों की रखी होती हैं जैसे वो बेचारे इनके दास हों। अब आस पडोस की बात है ऐसे समारोह मे जाना भी पड्ता था। लेकिन अब मैने ऐसे घरों मे जाना बन्द कर दिया है जो बाबा संस्कृ्ति को बढावा देते हैं। मगर मन मे क्षोभ होता है कि आखिर ये हो क्या रहा है।उनमे तो कई बाबा अनपढ ही हैं बस कथा कहानिया सुना कर चले जाते हैं। उनके प्रवचनों  मे एक बात पर ही बल दिया जाता है कि गुरू के बिना गति नहीं। बस गुरू ही आपका भगवान है। सही बात है मगर क्या गुरू के मायने भी उन्हें बताते हैं कि गुरू मे क्या विशेशतायें होनी चाहिये।
अब मेरा सवाल ये है कि आज के इस युग मे जहाँ हम ये तय नहीं कर सकते कि कौन सच्चा है कौन झूठा तो धर्म के नाम पर ऐसे आश्रम और बाबाओं की जरूरत है? 
क्या इन बाबाओं के बिना लोग धर्म का ग्यान नहीं ले सकते?
धार्मिक चैनल क्या ऐसे लोगों को बढावा नहीं देते? ये दोनो की दुकानदारी मिली भगत नहीं है?
दूसरा इन धार्मिक चैनलों का अगर फायदा है तो क्या हानि नहीं है? ऐसे लोगों को दिखा कर ये धर्म को हानि नहीं पहुँचा रहे? ऐसे ढोंगी बाबाओं के रोज़ प्रवचम सुन कर ही लोग इनके चंगुल मे नहीं फसते? क्या धार्मिक चैनलों पर कुछ प्रतिबन्ध नहीं लगने चाहिये? ये इन दुकानों के व्यापार मे साझीदार हैं।
क्या सरकार को इस मामले मे हस्तक्षेप करना चाहिये?
आज पंजाब इन्हीं बाबाओं की वजह से जल रहा है लुधिआना मे दो दिन कर्फ्यू और बन्द रहाुआये दिन कोई न कोई शहर इस आग की लपेट मे आ जाता है।
क्या साधु सन्तों को ए.सी गाडियाँ,एसी आश्रम और सुख सुविधा के साधन रखने चाहिये? अगर नहीं तो आपमे से कितने हैं जो ऎसे गुरुओं का वहिष्कार   करते हैंजो भौतिक वस्तुयों का उपयोग कर रहे हैं?


आखिर धर्म के ठेकेदार क्यों नहीं कुछ करते। मेरे हिसाब से तो सभी आश्रम बन्द होने चाहिये जिसे धर्म का प्रचार करना है वो साधु बन कर रहे और केवल धार्मिक स्थान मन्दिर आदि मे ही प्रवचन दे और लोगों से कोई धन न ले। खुद सादा जीवन व्यतीत कर वैभव  और भौतिक साधनों का मोह छोड कर एक छोटी सी कुटी मे रहे जहाँ किसी को भी आने की अनुमति न हो बस प्रवचन के लिये शहर का मंदिर  या  कोई सार्वजनिक स्थान चुन सकते हैं। । जगह जगह मन्दिर अपने- अपने नाम से बनवाये जा रहे हैं, जिन की न तो सफाई का उचित प्रबन्ध है न ही और रखरखाव का। बस चढावे के रूप मे धन इकट्ठा करना ही इनका मकसद है। क्या लाभ है ऐसे मन्दिर निर्माण करने का जहाँ भगवान उपेक्षित होते हों?  क्या एक छोटे शहर मे एक मन्दिर काफी नहीं? आज इस बाबा संस्कृ्ति पर लगाम कसने की जरूरत है। नहीं तो एक दिन लोग ये भूल जायेंगे कि हिन्दु देवी देवता कौन हैं उनकी जगह इन बाबाओं के नाम ही होंगे। ये सिर्फ हिन्दु धर्म की बात नहीं है किसी भी धर्म मे ये बाबा लोग दीमक की तरह उसे चाट जायेंगे। आईये हम सब मिल कर इस बाबा संस्कृ्ति से लडें। जब लोग समझ जायेंगे तो फिर अपने आप ये दुकाने बन्द हो जायेंगी । इन  आश्रमों मे होने वाले कुकर्मों और शोषण के विरुध आवाज़ उठायें। इस मे सब का भला है। ये लोग एक नाम दे देते हैं और लोग इसी को बस धर्म समझ कर जपते रहते हैं मगर धर्म के मर्म तक कम ही लोग जाते हैं, अगर जाते तो आज दुनिया मे इतने अपराध न होते।   आज हम केवल धार्मिक बन रहें अध्यात्म क्या है इसे जानते ही नहीं।  आओ लोगों को बाबा संस्कृ्ति का सच बतायें और इन के चंगुल से लोगों को बचायें। मैं तो जहाँ भी जाती हूँ जम कर इन लोगों के खिलाफ बोलती हूँ। बोलती रहूँगी। हम लोग धर्म के नाम पर ब्लाग्स पर भी आपस मे लडते रहते हैं लेकिन इन असली गुनहगारों के खिलाफ एक शब्द भी क्यों नहीं कहते?

10 December, 2009

ढोंगी बाबा सचिदानन्द निकला कातिल

  ये खबर कल दैनिक जागरण  अखबार मे थी। नंवाशहर, पंजाब मे कुछ दिन पहले कविता नाम की एक महिला का कत्ल हुया था। तब से पुलिस कातिल  की तलाश मे थी। अखबार के अनुसार ये बाबा लोगों को बहला फुसला कर उन से धन सम्पति एंठता था। बाबा उर्फ सतिन्दर कुमार् ही कविता का कातिल निकला। पोलिस ने सोमवार रात को उसे गिरफ्तार कर लिया।बाबा ने गला घोंट कर उसकी हत्या की थी।वो कई लोगों को अपने झाँसे मे ले कर बर्बाद कर चुका था। कविता भी इस के झाँसे मे आ गयी।करीब 4 साल मे वो बाबा पर 4--5 लाख लुटा चुकी थी। विदेश से उसके बेटे जो पैसे भेजते वो बाबा के चरणो मे अर्पित कर देती। इसी दौरान कविता को बाबा के ढोंगी पहरावे की भनक लगी तो वो अपना पैसा वपिस मांगने लगी। कविता को पता चला कि बाबा सचिदानन्द पर गुरदासपुर के कस्बे कादियाँ मे धोखा धडी के कई केस दर्ज हैं और पोलिस रिकार्ड मे भगौडा है। पोल खुलने पर उसने बाबा से अपने पैसे लौटाने के लिये कहा और वापिस न करने पर पोल खोल देने की धमकी दी।


28 नवम्बर की रात करीब 11 बजे बाबा कविता के घर पहुँचा और उसे समझाया। कविता के बार बार अपनी बात पर अडे रहने के बाबा ने पजले उसके सिर पर जोर से घूँसा जडा और बाद मे उसी की चुन्नी से उसका गला घोंट दिया।हत्या को लूट का मामला बनाने के लिये उसने उस के बाल बिखेर दिये और घर का सारा सामान भी बिखेर दिया।ुसके 2 मोबाईल फोन भी नष्ट कर दिये।। फिर कमरे को ताला लगा कर दूसरे दरवाजे से चला गया ।अगली सुबह छ: बजे बाबा अपने चेलों को साथ ले कर गाडी से कुरुक्षेत्र चला गया। इसके बाद वो जालन्धर और अमृतसर मे भी घूमा।। 7 दिस्मबर को जब वो नवां शहर लौटा तो पोलिस ने उसे दबोच लिया।जाँच के दौरान पोलिस लो पता चला कि  कविता का उस बाबा के पास काफी आना जाना था। बाबा कविता का भाई बना हुया था। पोलिस ने जब सबूत जुटाने शुरु किये तो सभी कडियाँ खुलती चली गयी।

पोलिस को पता चला कि बाबा लोगों को सम्मोहित करने की क्रिया जानता था।बस बात यहीं तक नहीं थी जो लोई भी उसके पास आता वो उसी का हो कर रह जाता। 1990 मे खुद को बाबा कह कर प्रचार करने वाले बाबा पर ठगी धोखाधडी अवैध हथियार रखने, हत्या का प्रयास करने के चार केस दर्ज हुये। वो उसके बाद अपने परिवार को वहीं छोड कर दिल्ली के गनेश नगर मे चमन लाल मूँगा के घर पहुँचा।। वहाँ उन्को उनके बेटे की मौत का वहम डाल कर उन से लाखों रुपये ठग लिये यही नहीं मूँगा परिवार की लडकी नेहा को भी अपने जाल मे फंसा लिया और उसे अपने साथ ही नवांशहर ले गया। नेहा इस कदर बाबा के चंगुल मे फसी कि उसने अपने ही पिता समेत 11 लोगों पर बलात्कार का केस दर्ज करवा दिया। इस के इलावा कई पोलिस वाले भी बाबा के सम्मोहन मे थे। पोलिस जब पूछताछ करती तो बाबा अपने सम्मोहन और प्रवचनों से सम्म्मोहित कर लेता।
फिर एस एस पी श्री राकेश अग्रवाल ने खुद पूछताछ शुरू की तो वो टूट गया और सारी कडियाँ खुल गयी। 
ये खबर तो अखबार की है बाकी खबर कल और फिर इसी को ले कर मेरे  कुछ सवाल होंगे। बाकी कल ।
क्रमश:



07 December, 2009

गुरू मन्त्र {कहानी}-------- गताँक से आगे

पिछली कडी मे आपने पढा कि मदन लाल ज अपनी पत्नि से बहुत प्रेम करते थे उसने कभी अपने लिये उनसे कुछ नहीं माँगा था मगर आज कल उसे हरिदचार जा कर गुरू धारण करने की इच्छा थी जिसे मदन लाल जी ने पूरी करने के लिये अपना स्कूटर तक बेच दिया । बेशक उन्हें इस दाधु सन्तों पर इतना विश्वास नहीं था मगर पत्नी के मन को ठेस पहुँचाना नहीं चाहते थे। वो उसे ले कर हरोदवार पहुँचे और आश्रम मे एक कमरा किराये पर ले लिया। और धर्म के नाम पर जो लूट और धर्मिक सन्तों का वैभव देखा उसने उसके मन मे इन बाबाओं के प्रति और भी नफरत भर दी। अगर वो अपनी पत्नि को घर बैठ कर ही सब कुछ बताते तो शायद वो उन्हें नास्तिक कहती मगर प्रत्यक्ष रूप मे सामने सब कुछ देख कर सन्ध्या पर क्या असर हुया ये पढिये आगे------

दन लाल जी बहुत परेशान हो गए थे । आज कमरे का किराया भी पड़  गया । अगर कल भी समय रहते काम न हुआ तो एक दिन का किराया और पड़ जायेगा । उनके पास एक हजार रू बचा था । 280 / रू जाने का किराया भी लग जायेगा । उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि क्या करें। मदन लाल जी कुछ सोच कर उठे और बाहर चल दिए । आज चाहे उन्हें कुछ भी करना पडे वह करेंगे । जब गंरू जी का काम चोर दरवाजे से चलता है तो वो भी थोड़ा झूठ बोलकर काम निकलवा लेंगे । सोचते हुए वो  पिछले दरवाजे की तरफ गए तो उन्हें गुरू जी का एक सेवक् मिल गया । पिछले दरवाजे पर अभी भी कुछ लोग अन्दर आ- जा रहें थे । मदन लाल जी आगे लपके ‘महाराज, देखिए मैं एक अखबार का प्रतिनिधि हू । मेरे पास छुटटी नही है अगर इन लोगों के साथ हमें भी गुरू जी के साथ मिलवा दें तो बड़ी कृपा होगी । अखबार में इस आश्रम के बारे में जो कहें लिख दूगा । नही तो निराश  होकर जाना पड़ेगा ।" मदन लाल जी ने झूठ का सहारा लिया।

 ‘‘ठीक है आप 15-20 मिनट बाद आना, मैं कुछ करता हूं ‘‘ वह कुछ सतर्क सा होकर बोला ।

मदन लाल जी मन ही मन खुश हो गए । उनका तीर ठिकाने पर लगा था । वह जल्दी से अपने कमरे कें गए और संध्या को साथ लेकर उसी जगह वापिस आ गए । संध्या के पांव धरती पर नहीं पड़ रहे थे । इस समय वह अपने को मंत्री जी से कम नहीं समझ रही थी । उसके चेहरे की गर्वोन्नति देख मदन लाल जी मन ही मन उसकी सादगी पर  मुरूकराए । वो सोच रही थी कि यह उसकी भक्ति और आस्था की ही चमत्कार है जो गुरू जी ने इस समय उन पर कृपा की है । उसने मदन लाल की तरफ देखा ‘‘ देखा गुरू जी की महानता ।‘‘ वो  हस पड़े ।


पाच मिनट में ही वो सेवक  उन्हें गुरू जी के कमरे में ले गया । संध्या ने दुआर पर नाक रगड़ कर माथा टेका । जैसे ही उसने अंदर कदम रखा उसे लगा वह स्वर्ग के किसी महल में आ गई है । ठंडी हवा के झोंके से वह आत्म विभोर हो गई । उसने पहली बार वातानुकूल कमरे को देखा था । उसके पाँव किसी नर्म चीज में धंसे  जा रहे थे । उसने नीचे देखा, सुन्दर रंगीन गलीचा बिछा था, इतना सुन्दर गलीचा उसने जीवन में पहली बार देखा था । कमरे में तीन तरफ बड़े- 2 गददेदार सोफे थे । छत पर बड़ा सा खूबसूरत फानूस लटक रहा  था । कमरे की सजावट देख कर लग रहा था कि वह किसी राजा के राजमहल का कमरा था । सामने गुरू जी का भव्य आसन था । और कमरे मे दो जवान सुन्दर परिचातिकायें सफेद साडियों मे  खडी थीं।वि आगे बढे और  दोनों ने गुरू जी के चरणों में माथा टेका । संध्या ने गुरू दक्षिणा भेंट की । गुरू जी ने आशीर्वाद दिया । वों दोनों आसन के सामने गलीचे पर बैठ गए ।

 

‘‘ देखो बच्चा, हमें किसी चीज का लोभ नही । मगर भक्तों की श्रद्धा का हमें सम्मान करना पड़ता है । उनकी आत्म संतुष्टी में ही हमारी खुशी है । बहुत दूर-2 से भक्त आते है । विदेशों में भी हमारे बहुत शिष्य  है । यह इतना बड़ा आश्रम भक्तों की श्रदा और दान से ही बना है ।‘‘ मदन ला जी मन ही मन समझ रहें थे कि गुरू जी उन्हें यह सब क्यों बता रहे है ।

‘‘स्वामी जी मेरी पत्नि टेलिविजन पर आपका प्रवचन सुनती रहती है । इसकी बड़ी इच्छा थी कि आपसे गुरू मंत्र ले । ‘‘ मदन लाल जी अपना काम जलदी करवाना चाहते थे । उन्हें डर था कि कहीं गुरु जी ने अखवार के बारे में पूछ लिया तो संध्या के सामने भेद खुल जाएगा ।

 ‘‘बेटी तुम राम-2 का जप करा करो यही तुम्हारा गुरू मंत्र है ।‘‘संध्या ने सिर झुकाया ‘‘पर गुरू जी मुझे पूजा -विधि बिधान नही आता । भगवान को कैसे पाया जा सकता है ? ‘‘ संध्या की बात पूरी नही हुई थी कि गुरु जी के टेलिफोन की घंटी बज गई । गुरू जी बात करते-2 उठ गए । पता नही किससे फोन पर बात हो रही थी कि। उन्हें गुस्सा आ गया और वो बात करते-2 दूसरे कमरे में चले गए ----- उन दोनों के कान में इतनी बात पड़ी ------ "उस साले की इतली हिम्मत ? मैं मंत्री जी से बात करता हू ------‘‘


मदन लाल और संध्या का मन कसैला सा हो गया । आधे धंटे बाद उनके एक सेवक  ने आकर बताया कि अब गुरू जी नही आ पाएगे । उनका मूड ठीक नही है, कोई समस्या आ गई है ।वो दोनो निराश  से बाहर आ गए ।

दोनो के मन मे एक ही सवाल था क्या संतों का मूड भी खराब होता है? अगर ये लोग अपने मन पर काबू नहीं पा सकते तो लोगों को क्या शिक्षा देते होंगे। क्या इन लोगों को भी क्रोध आता है? क्या ये लोग भी अपशब्द बोलते हैं -- ये लोग हम से अधिक भौतिक सुखों भोगते हैं। स्वामी जी के कमरे मे कितना बडा एल सी डी लगा था।----- ऐसे कई प्रश्न----

 ‘‘संध्या ! आने से पहले तुम्हारे मन में जो स्वामी जी की तस्वीर थी क्या अब भी वैसी ही है ?"

‘‘पता नही जी, मैंने तो सोचा भी नहीं था कि साधु संत इतने वैभव-ऐश्वर्य में रहते है । खैर ! वो गुरू जी हैं, अन्तर्यामी है उन्होने मेरी सच्ची आस्था को समझा तभी तो इतने लोगों को छोड़कर हम पर कृपा की ‘‘ संध्या अपनी आस्था को टूटने नहीं देना चाहती थी ।

‘‘तुम जैसे भोले लोग ही तो इनके वैभव का राज है । तुम जानती हो कि हम लोगों को क्यों पहले बुलाया ?"

‘‘क्यों?", संध्या हैरानी से मदन लाल को देख रही थी । मदन लाल ने उसे नूरी बात बताई कि किस तरह उन्होंने पत्रकार बनकर सेवक को पटाया था । क्योंकि उनके पास पैसे भी कम पड़ रहें थे । उधर मुनीम जी उनकी नौकरी से छुट्‌टी न कर दें ।‘‘

" पता नहीं जी यह सब क्या है ?" क्या सच? मैं तो समझी गुरू जी अन्तर्यामी हैं--वो मेरी आस्था को जान गये हैं इस लिये जल्दी बुलाया है?संध्या ने मदनला की ओरे देखा।

‘‘फिर तुमने देखा फोन पर बात करने का ढंग ? गाली देकर बात करना फिर मंत्री जी की धोंस दिखाना, क्रोध में आना क्या यह साधु संतों का काम है?"अगर साधू सन्तो मे धैर्य न हो तो वो भक्तों को क्या शिक्षा देंगे?क्या ये सब साधू संतों का आचरण है?: मदन लाल सन्ध्या की मृगत्रिष्णा मे सेंध लगाने की कोशिश कर रहे थे।

"फिर देखो साधू सन्तों का रहन सहन क्या इतना भैववशाली होना चाहिये?वातानुकूल महलनुमां कमरे,बडी बडी ए सी गाडियाँ अमीर गरीब मे भेद भाव। तुम ही बताओ क्या ये हम जैसे भोले भाले लोगों को गुमराह नहीं कर रहे?हमे कहते हैं भौतिक वस्तुयों से परहेज करो धन से प्यार न करो,और हम से धन ले कर उसका उपयोग अपने सुख भैवव के लिये कर रहे हैं।" मदन लाल ने एक और कील ठोंकी।

":देखो जी मुझे तो कुछ समझ नहीं आ रहा।फिर भी सब कुछ ठीक ठाक सा नहीं लगा।"

"संध्या आज वो साधू सन्त नहीं रहे जो लोगों को धर्म का मार्ग बताते थे। खुद झोंपडिओं मे रहकर लोगों को सुख त्याग करने का उदहारण पेश करते थे। आज धर्म के नाम पर केवल व्यापार हो रहा है। किसकी दुकान कितनी उँची है ये भक्त तय करते हैं। कुकरमुत्तोंकी तरह उगते ये आश्रम असल मे दुकानदारी है व्यापार है चोर बाज़ारी है जहाँ अपराधी लोग शरण पाते हैं और फिर कितना खून खराबा इन लोगों दुआरा करवाया जाता है लोगों की भावनायों को भडका कर राजनेताओं को लाभ पहुँचाना आदि काम भी यही लोग करते हैं। मैं ये नहीं कहता कि सब ऐसे होंगे अगर कोई अच्छा होगा भी तो लाखों मे एक जो सामने नहीं आते। लाखों रुपये खरच कर ये टी वी पर अपना प्रोग्राम दिखाते हैं जहाँ से तुम जैसे मूर्ख इन के साथ जुड जाते हैं। अगर इन्हें धर्म का प्रचार करना है तो गली गली घूम कर धर्मस्थानों पर जा कर करें वहाँ जो रूखा सूखा मिले उस खा कर  आगे च्लें मगर लालच वैभव और मुफ्त का माल छकने के लिये ये बाबा बन जाते हैं।" मदन लाल जी अपना काम कर चुके थे।

 चलो इसी बहाने तुम ने कुछ क्षण ही सही वातानुकूल कमरे.गद्देदार कालीन का आनन्द तो उठा लिया ? साधु-सन्तों का मायाजाल भी देख लिया, अपना मायाजाल तोड कर ।ऎसे साधुयों के काराण ही तो लोग धर्म विमुख हो रहे हैं।" मदन लाल को लगा कि अब वो सन्धया की मृग त्रिष्णा को भेद चुके हैं।

   सन्ध्या सब समझ गयी थी।वो मदन लाल से आँख नहीं मिला पा रही थी।उसकी आस्था ऐसे सन्तों से टूट चुकी थी।उसे आज मदन लाल जी इन सन्तों से महान नज़र आ रहे थे जिन्हों ने अपना स्कूटर बेच कर उसका मन रखने के लिये अपने सुख का त्याग किया था।अब उन्हें रोज़ पैदल ही दफ्तर जाना पडेगा। सच्चा मन्त्र तो ईश्वर की बताई राह पर चलना है। मगर मैं साधन को साध्य समझ कर भटक गयी थी

 प्रेम भाव और दूसरे की खुशी के लिये अपने सुख का त्याग करना---ओह्! यही तो है वो मन्त्र! इसे मैं पहले क्यों नहीं समझ पाई? आज इस आत्मबोध को सन्ध्या ने धारण कर लिया था -गुरू-मन्त्र की तरह । 

समाप्त







05 December, 2009

गुरू मन्त्र {कहानी}-------- गताँक से आगे
पिछली कडी मे आपने पढा कि मदन लाल जी अपनी पत्नि से बहुत प्रेम करते थे, उसने कभी अपने लिये उनसे कुछ नहीं माँगा था मगर आज कल उसे हरिदचार जा कर गुरू धारण करने की इच्छा थी जिसे मदन लाल जी ने पूरी करने के लिये अपना स्कूटर तक बेच दिया । बेशक उन्हें इन साधु सन्तों पर इतना विश्वास नहीं था मगर पत्नी के मन को ठेस पहुँचाना नहीं चाहते थे। वो उसे ले कर हरिदवार पहुँचे और आश्रम मे एक कमरा किराये पर ले लिया। अब आगे पढें-----

मई महीने की कड़कती गर्मी से बेहाल लोग आश्रम के प्रांगण में स्वामी जी का इन्तजार कर रहें थें । दोपहर का प्रचंड रूप भी आज संध्या को भला लग रहा था । आज उसकी बरसों की आशा पूर्ण होने जा रही थी । संध्या बड़ी श्रदा से गुरू दक्षिणा का सामान संभाले मदन लाल के साथ आश्रम के प्रांगण में एक पेड़ के नीचे आकर बैठ गई । वह ध्यान से आस पास के लोगों का निरीक्षण कर रही थी । लोग बड़े-2 उपहार फलों के टोकरे मिठाई मेवों के डिब्बे, कपडे और , बड़े-2 कंबलों के लिफाफे लिए बैठे थे । साथ ही एक परिवार की औरत दूसरी औरत को दिखा रही थी कि वो 50 ग्राम सोने की चेन, विदेशी घड़ी गुरू दक्षिणा के लिए लाई है । साथ ही बता रही थी कि यह तो कुछ भी नही लोग गुरू जी को लाखों रूपये चढ़ावा चढ़ाते है । सुनकर संध्या ने कुछ शर्मिदा सा हो लिफाफे को कसकर बगल में दबा लिया ताकि उसकी तुच्छ सी भेंट कोई देख न ले । उस गरीब के लिए तो यह भी बहुत बड़ा तोहफा था ।

मदन लाल जी का गर्मी से बहुत बुरा हाल था । पाँच बजने वाले थें मगर गुरू जी का कोई अता पता नही था । मदन लाल को गुस्सा भी आ रहा था । साधु सन्तों को लोगों की असुविधा, तकलीफ का कुछ तो एहसासा होना चाहिए । फिर सुध्या ने तो सुबह से कुछ खाया ही नही था । गुरू मन्त्र लेना है तो व्रत तो रखना  ही था।  । पवित्र काम के लिए शुद्धि आवश्यक होती है ।
‘‘देखो जी लोग गुरू दक्षिणा के लिए कितना कुछ ले कर आए है । मुझे तो अपनी छोटी सी भेंट पर शर्म आ रही है । क्योंं न कुछ रूपये और रख दें । ‘‘ संध्या तो बस एक ही बात सोच रही थी । मगर कह नहीं पा रही थी।
‘‘महाराज क्या आज गुरू जी के दर्शन  होंगे ?‘  मदन लाल ने वहाँ एक आश्रम के सेवक से पूछा  ‘हाँ- हाँ, बस आने वाले है ।‘‘ उसने जवाब दिया ।
"हमारा नंबर जल्दी लगवा दीजीए, दूर से आए हैं , थक भी गए है ।"
‘‘ठीक है, बैठो-2 ‘‘ उसका ध्यान मोटी आसामियों पर था ।

संध्या तो मगन थी मगर मदल लाल जी को झुंझलाहट हो रही था । वो सोच ही रहे थे  कि बाहर कहीं जाकर कुछ खा पी लिया जाए तभी उन्होंने देखा कि 4-5 गाड़ियों का काफिला आश्रम के प्रांगण में आकर रूका । गाड़ियों में से गुरू जी तथा कुछ उनके शिश्य   उतरे और गुरू जी के कमरे में चले गए । सँत जी ने बाहर बैठे, सुबह से इन्तजार करते भक्तों की तरफ आँख उठा कर भी नहीं देखा । लोग जय जय कार करते रहे । संध्या कितनी श्रद्धा से आँख  बन्द कर हाथ जोड़ कर खड़ी थी । मदन लाल का मन क्षोभ से भर गया मगर बोले कुछ नहीं ।

सात बजे एक सेवक  अन्दर से आया । उसने लोगों को बताया कि गुरू जी थक गए है । सुबह आठ बजे सबको गुरू मन्त्र मिलेगा । जो लोग यहाँ ठहरना चाहते है उनके लिए हाल में दरियां विछा दी है । सब को खाना भी मिल जाएगा वहीं भजन कीर्तन करें । संध्या बहुत खुश  थी । वह सोच रही थी कि गुरू आश्रम मेंं सतसंग कीर्तन का आनन्द उठाएंगे, ऐसा सौभाग्य कहा रोज -2 मिलता है । मगर मदन लाल जी मन ही मन कुढ़ कर रह गए । - गुरू जी कौन सा हल जोत कर आए हैं जो थक गए है । ।महंगी ए- सी- गाड़ी में आए है। उन्हें क्यों ध्यान नही आया कि लोग सुबह से भूखे प्यासे कड़कती धूप में उनका इन्तजार कर रहे है । यह कैसे सन्त है जिन्हें अपने भक्तों की असुविधा, दुख दर्द का एहसास नही । उन्हेे तो पहले ही ऐसे साधु सन्तों पर विश्वास नही है जो वातानुकूल गाड़ियों में धूमते तथा महलनुमा वातानुकूल आश्रमों में आराम दायक जीवन जीते है । उनका मन हुआ कि यहा से भाग जाए । मगर वह संध्या के मन को चोट पहुचाना नही चाहते थे ।

दोनो ने कमरे में आकर कुछ आराम किया । फिर 8-30 बजे खाना खाकर वो सतसंग भवन में आकर बैठ गए जहाँ कीर्तन भजन चल रहा था । मदन लाल धीरे से ‘अभी आया‘ कहकर उठ गया । मन का विषाद भगाने के लिए वह खुली हवा में टहलना चाहते थे ।  वह आश्रम के पिछली तरफ बगीचे में निकल गया । सोचने लगा कि उनका क्षोभ अनुचित तो नही ? गुरू जी के मन का क्रोध उन्हें पाप का भागी तो नही बना रहा ------------ इन्ही सोचों में चलते हुए उसकी नजर आश्रम के एक बड़े कमरे के दरवाजे पर पड़ी । शायद वह गुरू जी के कमरे को पिछला दरवाजा था । दरवाजे पर गुरू जी का एक सेवक् 2-3 परिवारों के साथ खड़ा था । तभी अन्दर से एक आदमी तथा एक औरत बाहर निकले । सेवक  ने तभी एक और  परिवार को अन्दर भेज दिया । अब मदन लाल जी की समझ में सारा माजरा आ गया । मालदार लोगों के लिए यह चोर दरवाजा था , जहा से गुरू जी तक चाँदी की चाबी से पहूंचा जा सकता था । यह धर्म का कैसा रूप है ? यह साधु-सन्त है या व्यवसाई? उन्हें नही चाहिए ऐसे संतों का गुरूमन्त्र ! वह वापिस जाना चाहते थे मगर संध्या की आस्था का तोड़ उनके पास नही था । वह अनमने से संध्या के पास जाकर बैठ गए ।

कीर्तन के बाद कमरे में आकर उन्होंने संध्या को सब कुछ बताया मगर वह तो अपनी ही रौ में थी , ‘‘ आप भी बस जरा-2 सी बात में दोष ढूंढने लगते है । क्या सतसंग में सुना नही छोटे महात्मा जी क्या कह रहे थे ? हमें दूसरों के दोष ढूंढने से पहले अपने दोष देखने चाहिए । मगर तुम्हें तो साधु सन्तों पर विवास ही नही रहा । संध्या की आस्था के आगे उसके तर्क का सवाल ही नही उठता था । वह चुपचाप करवट लेकर सो गया ।

सुबह पाँच   बजे उठे नहा धोकर तैयार हुए और छ: बजे आरती में भाग लेने पहूंच गए । यहाँ भी गुरू जी के शिश्य  ही आरती कर रहे थे । संध्या ने व्रत रखा था । वह शुद मुख से मंत्र लेना चाहती थी । वह आठ बजे ही प्रांगण में जाकर बैठ गई और आस पास के लोगों से बातचीत द्वारा गुरू जी के बारे में अपना ज्ञान बांटने लगी । मदन लाल जी 9 बजे बाहर से नाश्ता करके उसके पास आकर बैठ गए । आठ बजे की बजाए गुरू जी 10 बजे आए और अपने आसन पर विराजमान हो गए । आस पास उनके सेवक  खड़े थे और कुछ सेवक  लोगों को कतार में आने का आग्रह कर रहे थे ।

गुरू जी ने पहले गुरू-शिष्य  परंपरा की व्याख्या जोरदार शब्दों में की । लोगों को मोह  माया त्यागने का उपदेश  दिया फिर बारी बारी एक-2 परिवार को बुलाने लगे । उन्हें धीरे से नाम देते फिर आाीर्वाद देते । लोगों की दान दक्षिणा लेकर ाष्यों को सपुर्द कर देते । जिनकी दान दक्षिणा अक्ष्छी होती उन्हें फल मिठाई को प्रसाद अधिक मिल जाता । उनको हंस कर आशीर्वाद देते, कुछ बातें भी करते । मदन लाल ने कई बार उठने की चेष्टा की मगरसेवक उन्हें हर बार बिठा देता । वह मालदार असामी को ताड़कार पहले भेज देता । मदन लाल मन मार कर बैठ जाते । उन्हें चिन्ता थी कि अगर दो बजे तक फारिग न हुए तो आज का दिन भी यहीं रहना पड़ेगा । चार पाच सौ रूपये और खर्च हो जाएगा ।

एक बजे तक बीस पचीस लोग ही गुरू मंत्र ले पाए थे । उनमें से कुछ पुराने भक्त भी थे । एक मास में केवल 3 दिन ही होते थे गुरू म्रत्र पाने के लिए । एक बजे गुरू जी उठ गए । भोजन का समय हो गया था । लोग मायूस होकर अपने’-2 कमरों में लौट गए । जिनके पास कमरे नहीं थे वो वृक्षों के नीचे बैठ गए । कई लोग तीसरी चौथी बार आए थें अभी उनहें गुरू मंत्र नही मिला था । चार बजे फिर गुरू जी ने मंत्र देना था । लोग इन्तजार कर रहें थे । पाँच बजे गंरू जी के सेवक  ने बड़े गर्व से लोगों को बताया कि अभी थोड़ी देर में एक मंत्री जी गुरू जी के दर्शन करने आने वाले है । इसलिए कल 10 बजे गुरू जी आपसे मिलेंगे । तभी चमचमाती कारों का काफिला प्रांगण में आकर रूका । मंत्री जी व उनके साथ आए लोग सीधे गुरू जी के कमरे में चले गए । चाय पानी के दौर के बाद गुरू जी मंत्री जी को आश्रम का दौरा करवाने निकले । इस काम में 7 बज गए । मंत्री जी आश्रम के लिए 50 हजार का चैक भी दे गए थे ।     
क्रमश:

03 December, 2009

गुरू मन्त्र
कहानी
मदन लाल ध्यान ने संध्या को टेलिवीजन के सामने बैठी देख रहें हैं । कितनी दुबली हो गई है । सारी उम्र अभावों में काट ली, कभी उफ तक नही की । वह तो जैसी बनी ही दूसरों के लिए थी । संयुक्त परिवार का बोझ ढोया, अपने बच्चों को पढ़ाया लिखाया और शादियां की और फिर सभी अपने-अपने परिवारों में व्यस्त हो गए । मदन लाल जी और संध्या को जैसे सभी भूल गये । मदन लाल जी क्लर्क के पद से रिटायर हाने के बाद अभी तक एक साहूकार के यहां मुनिमी कर रहे हैं । बच्चों की शादियों पर लिया कर्ज अभी बाकी है । फिर भी वे दोनों खुश  है । संध्या आजकल जब भी फुरस्त में होती है तो टेलिविजन के सामने बैठ जाती है , कोई धार्मिक चैनल लगाकर । साधु -संतों के प्रवचन सुनकर उसे भी गुरू धारण करने का भूत सवार हो गया है। मगर  मदन लाल को पता नही क्यां इन साधु संन्तों से चिढ़ है । संध्या कई बार कह चुकी है कि चलो हरिद्वार चलते हैं । पड़ोस वाली बसन्ती भी कह रही थी कि स्वामी श्रद्वा राम जी बड़े पहूंचे हुये महात्मा है । उनका हरिद्वार में आश्रम है । वो उन्हें ही गुरू धारण करना चाहती हैं ।
संध्या ने प्रवचन सुनते-सुनते एक लग्बी सास भरी । तो मदन लाल जी की तन्द्रा टूटी । जाने क्यों उन्हें संध्या पर रहम सा आ रहा था । उन्होंने मन में ठान लिया कि चाहे कही से भी पैसे का जुगाड़ करना करें, मगर संध्या को हरिद्वार जरूर लेकर जाएंगे । आखिर उस बेचारी ने जीवन में चाहा ही क्या है । एक ही तो उसकी इच्छा है ।
‘‘संध्या तुम कह रही थी हरिद्वार जाने के लिए, क्या चलोगी‘क्या,?"
 वह चौंक सी गई ------‘‘मेरी तकदीर में कहा जिन्दा जी जाना बदा है । अब एक ही बार जाना है हरिदुयार मेरी अस्थिया लेकर‘ । ‘‘ वह कुछ निराश् सी होकर बोली ।
‘‘ऐसा क्यों कहती हो ? मदन लाल के मन को ठेस सी लगी । अब बुढापे मे तो दोनो के केवल एक दूसरे का ही सहारा था।
‘‘सच ही तो कहती हूं । पैसे कहाँ से आऐंगे ? बच्चो की शादी का कर्ज तो अभी उतरा नही । बेटा भी कुछ नही भेजता । आज राशन वाला लाला भी आया था ।‘‘
‘‘ तुम चिन्ता मत करो । मैं सब कर लूंगा । बच्चों की तरफ से जी मैला क्यों करती हो । नइ -2 ग्‌ृहस्थी बसाने में क्या बचता होगा उनके पास । हम हरिद्वार जरूर जाएंगें ‘‘ कहते हुए वह बाहर निकल गया । मदन लाल भावुक होकर संध्या से कह तो बैठे, मगर अब उन्हें चिन्ता सता रही थी कि पैसे का इन्तजाम कैसे करें । मन में एकाएक विचार आया कि क्यों न अपना स्कूटर बेच दें । यूं भी बहुत पुराना हो गया है । हर तीसरे दिन ठीक करवाना पड़ता है । बाद में किश्तों  पर एक साईर्कल ले लेंगे । वैसे भी साईकिल चलाने से सेहत ठीक रहती है --उसने अपने दिल को दोलासा दिया।  हाँ, यह ठीक रहेगा । मन ही मन सोच कर इसी काम में जुट गए । चार-पाच दिन में ही उन्होने पाँच हजार में अपना स्कूटर बेच दिया । उन्हें स्कूटर बेचने का लेश  मात्र भी दुख न था । बेशक  उनका अपना मन हरिदार जाने का नही था मगर वह संध्या की  एक मात्र इच्छा पूरी करना चाहतें थें ।
संध्या बड़ी खुश थी । उसे मन चाही मुराद मिल रही थी । उसने धूमधम से हरिदार जाने की तैयारी शुरू कर ली । अब गुरू मन्त्र लेना है तो गुरू जी के लिए गुरू दक्षिणा भी चाहिए, कपड़े, फल, मिठाई आदि कुल मिलाकर दो ढाई हजार का खर्च । चलो यह सौभाग्य कौन सा रोज रोज मिलता है । जिस प्रभू ने इतना कुछ दिया उसके नाम पर इतना सा खर्च हो भी गया तो क्या ।
 हरिदार की धरती पर पाव रखते ही संध्या आत्म विभोर हो गई । मदन लाल जी गर्मी से वेहाल थे मगर संध्या का सारा ध्यान स्वामी जी पर ही टिका हुआ था । अब उसका जीवन सफल हो गया । गुरू मंत्र पाकर वो धन्य हो जायेगी। मदन लाल जी भी  नास्तिक तो नही थे मगर धर्म के बारे में उनका नजरिया अलग था । वो संध्या की आस्था को ठेस पहूंचाना नही चाहते थे ।
दोपहर बारह बजे वो आश्रम पहूंचे । आश्रम के प्रांगण में बहुत से लोग वृक्षों की छांव में बैठे थें । मदन लाल जी रात भर ट्रेन के सफर में थक गए थे । पहले वह नहा धोकर फ्रेश् होना चाहते थे । आश्रम के प्रबन्धक से ठहरने की व्यवस्था पूछी । तीन सौ रूपये किराए से कम कोई कमरा नहीं था । चलो एक दिन की बात है यह सोचकर उन्होंने एक कमरा किराए पर ले लिया । थोड़ा आराम करके नहा धोकर तैयार हुए । 2 बजे के बाद गुरू दीक्षा का समय था ।------ क्रमश

30 November, 2009

अच्छा लगता है (कविता )
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कभी कभी
क्यों रीता सा
हो जाता है मन
उदास सूना सा
बेचैन अनमना सा
अमावस के चाँद सी
धुँधला जाती रूह
सब के होते भी
किसी के ना होने का आभास
अजीब सी घुटन सन्नाटा
जब कुछ नहीं लुभाता
तब अच्छा लगता है
कुछ निर्जीव चीज़ों से बतियाना
अच्छा लगता है
आँसूओं से रिश्ता बनाना
बिस्तर की सलवटों मे
दिल के चिथडों को छुपाना
और
बहुत अच्छा लगता है
खुद का खुद के पास
लौट आना
मेरे ये आँसू मेरा ये बिस्तर
मेरी कलम और ये कागज़
और
मूक रेत के कणों जैसे
कुछ शब्द
पलको़ से ले कर
दो बूँद स्याही
बिखर जाते हैँ
कागज़ की सूनी पगडंडियों पर
मेरा साथ निभाने
हाँ कितना अच्छा लगता है
कभी खुद का
खुद के पास लौट आना

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