08 October, 2009

दोहरे माप दंड ---कहानी [गताँक से आगे

पिछली बार आपने पढा
कि रिचा और रिया दोनो स्कूल मे इकठी पढती थीं । दोनो सहेलियाँ थी। रिया शहर मे और रिचा साथ लगते गाँव मे रहती थी। जिस दिन स्कूल मे छुटियाँ हुई उस दिन जब रिचा स्कूल से घर नहीं पहुँची तो उसके घर वालों को चिन्ता हुई। उसके पिता पोलिस मे केस दर्ज नहीं करवाना चाहते थे। सभी इसी सोच मे थे कि क्या किया जाये उसे कहाँ ढूँढा जाये। tतभी पता चला कि वो खून् से लथपथ खेत मे पडी है उसे असपताल लाया गया। पोलिस मे केस दर्ज हुया मगर रिचा के पिता ने उसे मना कर दिया कि किसी का नाम मत बताये क्योंकि उन्हें रिचा ने बता दिया था कि वो साथ के गाँव के ्रपंच का बेटा था रिचा घर आ गयी। मगर उसे किसी से बात करने की इजाजत नहीं थी वो अकेली अन्दर बैठी आँसू बहाती रहती उसकी सहेली रिया उससे मिलने आती है। रिचा रिया को बताती है कि कैसे उसके दिल मे एक लावा सा फूट रहा है घर वालों .समाज और उन दरिन्दों के लिये। औसके पढने पर भी प्रतिबँध लग जाता है रिया उसे आश्वासन देती है कि वो अपने माँ बाप को कह कर उसके घर वालों को समझायेगी। ्रिया के पिता के समझाने पर रिचा के पिता उसे घर मे ही पढने की इजाजत दे देते हैं उसकी शादी के लिये भी कोशिश शुरु हो जाती है रिया के पिता उसका रिश्ता अपने पडोसी रवि से करवा देते हैं जिसकी पत्नि की मौत हो चुकी हओ रवि अच्छा लडका है मगर उसकी माँ इस रिश्ते से खुश नेहीं थी और रिचा को तंग करती रहती थी। अब आगे पढिये-------



घर आ कर मै अपनी माँ की गोद मे सिर रख कर खूब रोई। क्या सच मे एक लडकी इतनी कमज़ोर और बेबस होती है?बिना किसी कसूर के हर तरफ से उसे ही सज़ा? मैने माँ और पिता जी को सारी बातें बतायी।फिर माँ और पिता जे के साथ दो तीन बार उनके घर गयी । पिताजी ने धीरे धीरी उसके पिता से उसके बारे मे बात की कि इसे अब स्कूल भेजना चाहिये मगर वो स्कूल भेजने के लिये किसी तरह भी राज़ी ना हुये।मगर पिता जी के बहुत समझाने पर उसके पिता उसे घर रह कर पढाने के लिये मान गये। उसने अब घर रह कर पढना शुरू कर दिया मै हर दूसरे तीसरे दिन उसके घर चली जाती । उसने पलस टू के बाद घर मे ही बी.ए करनी शुरू कर दी और मैने इन्जनीरिन्ग मे प्रवेश ले लिया। उसके माँ बाप उसके लिये लडका ढूँढने लगे। वो जल्दी से उसकी शादी कर देना चाहते थे ।अभी 18 साल की भी पूरी नहीं हुई थी। वो जहाँ भी बात चलाते, वहीं उसके अतीत की परछाई पहले पहुँच जाती। अब तो हम लोग भी चाहते थे कि उसकी शादी हो ही जाये तो सही रहेगा ।इन हालात मे वो अच्छी तरह पढ भी नहीं पा रही थी।

हमारे पडोस मे धर्मपाल जी रहते थे।उनके एक बेटा और दो बेटियां थी।उनका लडका रवि जिस कीदो वर्श पहले शादी हो चुकी थी,मगर शादी के बाद बहुएक बेटे को जन देते ही दुनिया से विदा ले गयी। छोटा सा बच्चा अपनी दादी के पास पलने लगा।रवि की नौकरी दिल्ली मे थी । उसके माँ बाप चाहते थे कि उसकी दोबारा शादी कर दें तो बच्चे को माँ मिल जायेगी ।एक दिन मेरी मम्मी ने ये रिश्ता सुझाया मेरे पिता जी ने रिचा के पिता से बात की। उन्हें क्या आपति हो सकती थी जानते थे कि उनकी बेटी को अब इस से अच्छा घर और लडका नहीं मिल सकता। उसे जो दाग लग गया है इस के साथ इसे कौन स्वीकार करेगा वही जिसमे खुद मे कोई कमी होगी। मगर रवि बहुत अच्छा लडका था पडोस मे होने के कारण हम लोग इकठे खेला भी करते थे मेर अच्छा दोस्त था वो। पिता जे ने और मैने रवि को समझाया तो वो भी मान गया।उसके घर मे सभी मान गये मगर उसकी माँ कुछ असमजस मे थी। रवि की हाँपर उसे भी मानना पडा। उसकी मां को भी यही बात सता रही थी कि लोग क्या कहेंगे कि ऐसी लडकी ही मिली थी इनके लडके को क्योंकि लडके की कोई भी कमी समाज को कमी नहीं लगती।मगर लडकी बेकसूर होते हुये भी अपराधी बन जाती है।लडके मे चाहे लाख अवगुण हों मगर लडकी 16 कला सम्पूर्ण चाहिये होती है। उनको ये भी था कि अभी अपनी लडकियों की शादियाँ करनी हैं तो उनके रिश्ते करने मे इस लडकी के कारण अडचने आयेंगी। लेकिन रवि के समझाने से उन्हें झुकना पडा।मै बहुत खुश थी इस रिश्ते से चाहे रवि एक बच्चे का बाप था मगर फिर भी हर तरह से रिचा के लिये अच्छा पति साबित होगा ये मुझे विश्वास था। वो बहुत संवेदन शील और सनझदार लडका था।वैसे भी उससे अच्छा लडका उसे और कोई मिल नहीं सकता था। शादी हो गयी और रिचा हमारे शहर मे आ गयी पडोस मे होने से मुझे तो खुशी थी ही मगर वो भी खुश थी ।

रवि ने दो महीने की चुटी ले रखी थी। उन दो महीनों मे रिचा के मुँह पर् रोनक लौटने लगी थी।ब्च्चे को वो ऐसे सम्भालती जैसे उसकी सगी माँ हो। शायद उसे ये भी एहसास हो गया था कि रवि एक अच्छा पति है जो उसकी भावनाओं का ध्यान रखता है तो उसे भी अपना ्र्तव्य अच्छी तरह से निभाना है।रवि ने उसे पूरा प्यार दिया उससे कभी उस हादसे का ज़िक्र नहीं किया ना ही उसे एहसास होने दिया कि उसमे कोई दोश है। समाज मे विरले ही ऐसे लोग होते हैं। अब रिचा को भी विश्वास होने लगा कि पाँचों उँगलियाँ बराबर नहीं होती समाज मे अच्छे बुरे सब तरह के लोग होते हैं। दो महीने की छुट्टी के बाद रवि दिल्ली चला गया अपनी ड्यूटी पर।उसका विचार था कि दिल्ली मे मकान ढूँढ कर फिर रिचा को साथ ले जायेगा। दूसरी बात कि रिचा तब तक बच्चे को सम्भालना नहलाना भी सीख लेगी। रवि की माँ पुराने विचारों की औरत थी। र्वि के कारण चाहे उसने शादी की रज़ामंदी दे दी थी मगर अन्दर ही अन्दर उसे रिचा का अतीत कचोटता रहता । आस पडोस की कोई औरत कभी सहानुभूति जताने के बहाने बात छेड लेती तो वो तिलमिला उठती। उसे रिचा का बन ठन कर रहना भी अच्छा न लगता था।बेटियों के रिश्ते की बात कहीं नहीं बनती तो रिचा के सिर भँडा फोड देती।* मै पहले ही कहती थीहमारी बेटियों को कोई अपनी बहु नहीं बनायेगा इस कुलटा के कारण । रवि के जाने के बाद वो उसे काफी रोकने टोकने लगी थी।,पर रिचा कोई जवाब न देती। कई बार मैं उसे बाज़ार ले जाती तो आते ही उसे ताने सुनाने लगती।---* मुझे तुम्हारा कहीं जाना अच्छा नहीं लगता।कहीं पहले जैसी कोई बात हो गयी तो हमारी भी नाक कटवायेगी।* रिचा अन्दर ही अन्दर आहत हो जाती।रवो को पत्र लिखती या फोन करती तो भी माँ की बातें न बताती। वो रवि की एहसान मंद थी कि कम से कम उसने उसका हाथ थामने की हिम्मत तो की।

रवि के कहने पर उसने आगे पढाई भी शुरू कर दी। रिचा उस दिन सारी रात सो न पाई थी।सुबह देर से आंम्ख खुली तो सास गर्म हो गयी।मगर वो कुछ न बोली।सरा काम जल्दी से खत्म किया। आज वो बाज़ार जाना चाहती थी।ागले हफ्ते रवि का जन्म दिन था उसके लिये कोई तोह्फा खरीदना चाह्ती थी।उसने अपनी ननद को साथ चलने के लिये कहा तो उसने मना कर दिया।------ * न बाबा न तेरे साथ नहीं जा सकती।मैं ही ला देती हूँ जो मंगवाना है।* *नहीं दीदी मैं अपनी पसंद से लेना चाहती हूँ।* उधर उसकी सास सुन रही थी ,बोल पडी * हाँ हँ इसे तो बाहर घूमने के लिये बहाना चाहिये। मायके मे भी तो ऐसे ही घूमती थी तभी तो बदमाश उठा कर ले गये।* *माँ क्या ऐसा खतरामुझे ही है भगवान से डरिये,अप बेटियों की मा होकर भी ऐसी बातें करती हैं। * कह कर रिचा अंदर चली गयी और रोने लगी।

आज मेरी दादी ने उसकी यही बात सुनी थी सास ने क्या कहा ये उन्होंने ध्यान नहीं दिया। जिस से दादी पर मुझे भी गुस्सा आ गया था। अपना गुस्सा शाँत होने पर मैने दादी को सारी बात बताई।कि उसकी सास किस तरह के ताने उसे देती है ।तब दादी को भी बुरा लगा। क्रमश: अगले दिन मैं अभी सोयी हुई थी कि पिता जी के कमरे से कुछ आवाज़ें आ राही थी मै उठ खडी हुई । उनके कमरे मे जा कर देखा तो रिचा की सास रो रही थी और रिचा सकते की हालत मे खडी थी। उनकी छोटी बेटी घर से गायब थी।जब वो सुबह पाँच बजे उठे तो आशा उनकी बेटी अपने बेड पर नहीं थी।इस लिये वो पिता जी के पास सहायता के लिये आयी थी। मैं जानती थी कि उसका किसी लडके के साथ अफेयर चल रहा है वो जरूर उसके साथ भाग गयी होगी।एक बार तो मन मे आया कि चुप रहूँ इसकी भी बदनामी हो तो रिचा का दर्द ये समझे। लेकिन मैं ऐसा न कर सकी। बदले की भावना से एक लडकी की ज़िन्दगी क्यों बर्बाद होने दूंम फिर रवि को कितना दुख होगा जब उसे पता चलेगा। मैने अपना शक पिता जी को बताया।पिता जी भी समझ गये। उन्होंने उन्हें समझा कर घर भेज दिया कि मैं देखता हूँ।अप वो रिचा के ससुर को ले कर थाने चले गये।थाने के एस़ एच़ औ पिता जी के दोस्त थे।उन्हों ने सारी बात सुन कर तुरन्त गुप चुप तरीके से कार्यवाई की और -23 घन्टे मे लडकी बरामद कर ली।मामला लडकी की इज़्जत का था सो केस दर्ज नहीं करवाया। लडकी घर वापिस आ गयी।

रिचा के घर मे आज सुबह से ही शाँति थी नहीं तो सुबह उठते ही रिचा के पीछे पड जाती थी। रवि को रात ही फोन कर दिया था।दोपहर तक वो पहुँचने वाला था। आज मुझे भी मौका मुल गया था और मैने सोच लिया था कि अब रिचा के दुखों का अन्त कर दूँगी। उसे सब कुछ बता दूँगी। दोपहर को वो घ आया मैने सोचा अभी खा पी ले बाद मे शाम को बात करूँगी। सारे शहर मी बात फैल गयी थी। शाम को पाँच बजे मैं रिचा के घर पहुँची। सभी एक कमरे मे बैठे थे।रवि अपनी बहन को डाँट रहा था मुझ से कोई लुकाव छुपाव तो था नहीं इस लिये बात चलती रही।थोडी देर बाद मैने अपनी बात शुरू की * देखो माँ जी जो हुया बहुत बुरा हुया।मगर सच पूछो तो रिचा के कारण आपकी कुछ इज़्जत बच गयी।क्यों कि पिता जी रिचा को अपनी बेटी मानते हैं।अज आपसे एक सवाल जरूर पूछना चाहूँगी कि आपने आज तक रिचा को इतना बुरा भला कहा रोज़ दिन मे सौ बार उसे आप उस बात का ताना देती मगर रिचा ने कभी उफ तक न की क्या उस बात मे रिचा का कोई कसूर था?। नहीं ना? आज आपकी बेटी के साथ जो हुया उसमे आपकी बेटी का कसूर है।

मुझे ये समझ नहीं आता कि एक औरत दूसरी औरत का दर्द क्यों नहीं समझती? क्यों उसके दुखों का कारण बन जाती है?* रवि हैरान सा मेरे मुँह की तरफ देख रहा था उसे तो कुछ पता नहीं था कि माँ रिचा के साथ कैसा सलूक करती है। *रवि,मैं जानती हूँ कि आप एक अच्छे इन्सान हैं। आपने रिचा को बहुत सम्मन और प्यार दिया मगर आपके जाने के बाद जो उसे सहना पडा वो अगर मैं होती तो कब की घर चोड कर चली जाती।ाब कहीं ऐसा न हो कि उसकी सहनशक्ति जवाब दे जाये इस लिये मैं एक बहन और दोस्त के नाते चाहती हूँ कि तुम रिचा को अपने साथ ले जाओ।* * नहीं नहीं बेटा मुझे माफ कर दो। मैं रिचा के पाँव पकड कर माफी माँगती हूँ कि मैने उसका दिल दुखाया है।* वो सच मुच रिचा के पाँ पकडने लगी। * नहीं नहीं मा जी मुझ पर पाप मत चढायें* वो पीछे हट गयी। रवि कब से सब कुछ सिन रहा था एक दम से उठा *रिचा चलो सामान बान्धो, हमे आज ही निकलना है।* * सुनो कोई मेरी भी सुनो।* रिचा जोर से बोली देखो रवि मुझे किसी से कोई शिकायत नहीं है। माँ जी ने मुझे जो भी कहा वो अपनी तरफ से सही हैं जो समाज से इन्होंने लिया सीखा वही कहा । वो समाज का हिस्सा हैं और समाज्के लोग दूसरों की इज़्जत को इज़्जत नहीं समझते झट से दूसरे की तरफ उँगली उठा देते हैं ये नहीं सोचते कि एक उंगली दूसरे की तरफ उठी है तो चार अपनी तरफ भी उठी हैं। फिर जब तक अपना हाथ न जले जलन का एहसास कैसे हो सकता है?

मुझे इतना ही बहुत है कि आपने कम से कम समाज की परवाह न करते हुये मुझे अपनाया,मेरे अतीत के साथ और अपने मन से।इसलिये आज मैं इस घर को अपने मन से अपनाना चाहती हूँ।माँ और पिताजी की बेटी बनना चाहती हूँ। आज किसी से कोई गिला शिकवा नहीं है।* कह कर वो चुप हो गयी मुझे लगा कि आज उसके अन्दर का सारा लावा बह गया है। आज वो बिलकुल शाँत और दृ्ढ लग रही थी। आज उसकी सास भी समझ गयी थी लेकिन तब जब अपनी इज़्जत पर बन आयी। *आज तक जिसने जो कहा मैं मानती रह, मगर आज आप सब को मेरी बात माननी होगी ।मैं अभी तक यहीं अपने घर मे ही रहूँगी।जब तक ये बच्चा भी कुछ बडा नहीं हो जाता और दोनो बहनों की शादी नहीं हो जाती।* रवि माँ की ओरे देख रहा था कि अब बताऔ रिचा अभागिन है या हम लोग? * माँ देखा हम कितने भाग्यवान हैं जो हमे रिचा जैसी लडकी मिली?।* आज रिचा के चेहरे पर फिर से वही विश्वास लौट आया था जिसने उसके अतीत को भगा दिया था। और र्मैं सोच रही थी कि काश ये समाज नारी के प्रति कुछ संवेदन शील हो सके कम से कम नारी तो नारी की भावनाओं को समझे।उसके साथ हो रहे अन्याय से लडे न कि खुद ही उससे अन्याय करने लगे। अपनी और पराई बेटी के लिये समाज के दोहरे मापदंड क्यों, अखिर क्यों।

समाप्त

05 October, 2009

दोहरे माप दंड ---कहानी [गताँक से आगे

पिछली बार आपने पढा कि रिचा और रिया दोनो स्कूल मे इकठी पढती थीं । दोनो सहेलियाँ थी। रिया शहर मे और रिचा साथ लगते गाँव मे रहती थी। जिस दिन स्कूल मे छुटियाँ हुई उस दिन जब रिचा स्कूल से घर नहीं पहुँची तो उसके घर वालों को चिन्ता हुई। उसके पिता पोलिस मे केस दर्ज नहीं करवाना चाहते थे। सभी इसी सोच मे थे कि क्या किया जाये उसे कहाँ ढूँढा जाये। tतभी पता चला कि वो खून् से लथपथ खेत मे पडी है उसे असपताल लाया गया। पोलिस मे केस दर्ज हुया मगर रिचा के पिता ने उसे मना कर दिया कि किसी का नाम मत बताये क्योंकि उन्हें रिचा ने बता दिया था कि वो साथ के गाँव के ्रपंच का बेटा था रिचा घर आ गयी। मगर उसे किसी से बात करने की इजाजत नहीं थी वो अकेली अन्दर बैठी आँसू बहाती रहती उसकी सहेली रिया उससे मिलने आती है। रिचा रिया को बताती है कि कैसे उसके दिल मे एक लावा सा फूट रहा है घर वालों .समाज और उन दरिन्दों के लिये। औसके पढने पर भी प्रतिबँध लग जाता है रिया उसे आश्वासन देती है कि वो अपने माँ बाप को कह कर उसके घर वालों को समझायेगी। अब आगे पढिये------------


घर आ कर मै अपनी माँ की गोद मे सिर रख कर खूब रोई। क्या सच मे एक लडकी इतनी कमज़ोर और बेबस होती है?बिना किसी कसूर के हर तरफ से उसे ही सज़ा? मैने माँ और पिता जी को सारी बातें बतायी।फिर माँ और पिता जे के साथ दो तीन बार उनके घर गयी । पिताजी ने धीरे धीरी उसके पिता से उसके बारे मे बात की कि इसे अब स्कूल भेजना चाहिये मगर वो स्कूल भेजने के लिये किसी तरह भी राज़ी ना हुये।मगर पिता जी के बहुत समझाने पर उसके पिता उसे घर रह कर पढाने के लिये मान गये। उसने अब घर रह कर पढना शुरू कर दिया मै हर दूसरे तीसरे दिन उसके घर चली जाती । उसने पलस टू के बाद घर मे ही बी.ए करनी शुरू कर दी और मैने इन्जनीरिन्ग मे प्रवेश ले लिया। उसके माँ बाप उसके लिये लडका ढूँढने लगे। वो जल्दी से उसकी शादी कर देना चाहते थे ।अभी 18 साल की भी पूरी नहीं हुई थी। वो जहाँ भी बात चलाते, वहीं उसके अतीत की परछाई पहले पहुँच जाती। अब तो हम लोग भी चाहते थे कि उसकी शादी हो ही जाये तो सही रहेगा ।इन हालात मे वो अच्छी तरह पढ भी नहीं पा रही थी।

हमारे पडोस मे धर्मपाल जी रहते थे।उनके एक बेटा और दो बेटियां थी।उनका लडका रवि जिस कीदो वर्श पहले शादी हो चुकी थी,मगर शादी के बाद बहुएक बेटे को जन देते ही दुनिया से विदा ले गयी। छोटा सा बच्चा अपनी दादी के पास पलने लगा।रवि की नौकरी दिल्ली मे थी । उसके माँ बाप चाहते थे कि उसकी दोबारा शादी कर दें तो बच्चे को माँ मिल जायेगी ।एक दिन मेरी मम्मी ने ये रिश्ता सुझाया मेरे पिता जी ने रिचा के पिता से बात की। उन्हें क्या आपति हो सकती थी जानते थे कि उनकी बेटी को अब इस से अच्छा घर और लडका नहीं मिल सकता। उसे जो दाग लग गया है इस के साथ इसे कौन स्वीकार करेगा वही जिसमे खुद मे कोई कमी होगी। मगर रवि बहुत अच्छा लडका था पडोस मे होने के कारण हम लोग इकठे खेला भी करते थे मेर अच्छा दोस्त था वो। पिता जे ने और मैने रवि को समझाया तो वो भी मान गया।उसके घर मे सभी मान गये मगर उसकी माँ कुछ असमजस मे थी। रवि की हाँपर उसे भी मानना पडा। उसकी मां को भी यही बात सता रही थी कि लोग क्या कहेंगे कि ऐसी लडकी ही मिली थी इनके लडके को क्योंकि लडके की कोई भी कमी समाज को कमी नहीं लगती।मगर लडकी बेकसूर होते हुये भी अपराधी बन जाती है।लडके मे चाहे लाख अवगुण हों मगर लडकी 16 कला सम्पूर्ण चाहिये होती है। उनको ये भी था कि अभी अपनी लडकियों की शादियाँ करनी हैं तो उनके रिश्ते करने मे इस लडकी के कारण अडचने आयेंगी। लेकिन रवि के समझाने से उन्हें झुकना पडा।

मै बहुत खुश थी इस रिश्ते से चाहे रवि एक बच्चे का बाप था मगर फिर भी हर तरह से रिचा के लिये अच्छा पति साबित होगा ये मुझे विश्वास था। वो बहुत संवेदन शील और सनझदार लडका था।वैसे भी उससे अच्छा लडका उसे और कोई मिल नहीं सकता था। शादी हो गयी और रिचा हमारे शहर मे आ गयी पडोस मे होने से मुझे तो खुशी थी ही मगर वो भी खुश थी ।रवि ने दो महीने की चुटी ले रखी थी। उन दो महीनों मे रिचा के मुँह पर् रोनक लौटने लगी थी।ब्च्चे को वो ऐसे सम्भालती जैसे उसकी सगी माँ हो। शायद उसे ये भी एहसास हो गया था कि रवि एक अच्छा पति है जो उसकी भावनाओं का ध्यान रखता है तो उसे भी अपना ्र्तव्य अच्छी तरह से निभाना है।रवि ने उसे पूरा प्यार दिया उससे कभी उस हादसे का ज़िक्र नहीं किया ना ही उसे एहसास होने दिया कि उसमे कोई दोश है। समाज मे विरले ही ऐसे लोग होते हैं।

अब रिचा को भी विश्वास होने लगा कि पाँचों उँगलियाँ बराबर नहीं होती समाज मे अच्छे बुरे सब तरह के लोग होते हैं। दो महीने की छुट्टी के बाद रवि दिल्ली चला गया अपनी ड्यूटी पर।उसका विचार था कि दिल्ली मे मकान ढूँढ कर फिर रिचा को साथ ले जायेगा। दूसरी बात कि रिचा तब तक बच्चे को सम्भालना नहलाना भी सीख लेगी। रवि की माँ पुराने विचारों की औरत थी। र्वि के कारण चाहे उसने शादी की रज़ामंदी दे दी थी मगर अन्दर ही अन्दर उसे रिचा का अतीत कचोटता रहता । आस पडोस की कोई औरत कभी सहानुभूति जताने के बहाने बात छेड लेती तो वो तिलमिला उठती। उसे रिचा का बन ठन कर रहना भी अच्छा न लगता था।बेटियों के रिश्ते की बात कहीं नहीं बनती तो रिचा के सिर भँडा फोड देती।* मै पहले ही कहती थीहमारी बेटियों को कोई अपनी बहु नहीं बनायेगा इस कुलटा के कारण । रवि के जाने के बाद वो उसे काफी रोकने टोकने लगी थी।,पर रिचा कोई जवाब न देती। कई बार मैं उसे बाज़ार ले जाती तो आते ही उसे ताने सुनाने लगती।---* मुझे तुम्हारा कहीं जाना अच्छा नहीं लगता।कहीं पहले जैसी कोई बात हो गयी तो हमारी भी नाक कटवायेगी।*

रिचा अन्दर ही अन्दर आहत हो जाती।रवो को पत्र लिखती या फोन करती तो भी माँ की बातें न बताती। वो रवि की एहसान मंद थी कि कम से कम उसने उसका हाथ थामने की हिम्मत तो की। रवि के कहने पर उसने आगे पढाई भी शुरू कर दी। रिचा उस दिन सारी रात सो न पाई थी।सुबह देर से आंम्ख खुली तो सास गर्म हो गयी।मगर वो कुछ न बोली।सरा काम जल्दी से खत्म किया। आज वो बाज़ार जाना चाहती थी।ागले हफ्ते रवि का जन्म दिन था उसके लिये कोई तोह्फा खरीदना चाह्ती थी।उसने अपनी ननद को साथ चलने के लिये कहा तो उसने मना कर दिया।------ * न बाबा न तेरे साथ नहीं जा सकती।मैं ही ला देती हूँ जो मंगवाना है।* *नहीं दीदी मैं अपनी पसंद से लेना चाहती हूँ।* उधर उसकी सास सुन रही थी ,बोल पडी * हाँ हँ इसे तो बाहर घूमने के लिये बहाना चाहिये। मायके मे भी तो ऐसे ही घूमती थी तभी तो बदमाश उठा कर ले गये।* *माँ क्या ऐसा खतरामुझे ही है भगवान से डरिये,अप बेटियों की मा होकर भी ऐसी बातें करती हैं। * कह कर रिचा अंदर चली गयी और रोने लगी। आज मेरी दादी ने उसकी यही बात सुनी थी सास ने क्या कहा ये उन्होंने ध्यान नहीं दिया। जिस से दादी पर मुझे भी गुस्सा आ गया था। अपना गुस्सा शाँत होने पर मैने दादी को सारी बात बताई।कि उसकी सास किस तरह के ताने उसे देती है ।तब दादी को भी बुरा लगा।
क्रमश:

03 October, 2009

दोहरे माप दँड
पिछली बार आपने पढा
कि रिचा और रिया दोनो स्कूल मे इकठी पढती थीं । दोनो सहेलियाँ थी। रिया शहर मे और रिचा साथ लगते गाँव मे रहती थी। जिस दिन स्कूल मे छुटियाँ हुई उस दिन जब रिचा स्कूल से घर नहीं पहुँची तो उसके घर वालों को चिन्ता हुई। उसके पिता पोलिस मे केस दर्ज नहीं करवाना चाहते थे। सभी इसी सोच मे थे कि क्या किया जाये उसे कहाँ ढूँढा जाये। tतभी पता चला कि वो खून् से लथपथ खेत मे पडी है उसे असपताल लाया गया। पोलिस मे केस दर्ज हुया मगर रिचा के पिता ने उसे मना कर दिया कि किसी का नाम मत बताये क्योंकि उन्हें रिचा ने बता दिया था कि वो साथ के गाँव के ्रपंच का बेटा था रिचा घर आ गयी। मगर उसे किसी से बात करने की इजाजत नहीं थी वो अकेली अन्दर बैठी आँसू बहाती रहती उसकी सहेली रिया उससे मिलने आती है। आब आगे पढिये-------


दोहरे माप दँड

मै जैसे ही रिचा के घर पहूँची सामने आँगन मे उसकी बेबे{माँ} बैठी थी।
*बेबे नमस्ते।* मैने उन्हें प्यार से बुलाया।
* नमस्ते बेटी आओ।* एक अप्रयातिश खुशी के साथ उनकी आँखें भर आयी।
*रिचा कहाँ है मै उस से मिलने आयी हूँ हम लोग रात ही लुधियाना से आये हैं।*
मुझे बहुत दिन से तेरा इन्तज़ार था रिचा ने बताया था कि तुम लोग लुधियाना गये हो। बेटी उसे समझाओ । वो अन्दर बैठी अपनी तकदीर पर आँसू बहाती रहती है।* कहते हुये उनके आँसू बह गये।
मेरा दिल अन्दर तक एक पीडा से भर गया। बेशक अभी छोटी थी दुख देखा नहीं था मगर समाज मे रहती थी । औरत की, एक माँ की बेबसी देख कर दिल तडप गया।
जैसे ही अन्दर जाने लगी,उसके पिता से सामना हो गया।मेरी नमस्ते का जवाब भी उन्होंने बडी उपेक्षा से दिया। मन को झटका लगा, शायद् मेरा आन भी उन्हें अच्छा नहीं लगा था।पुरुश को किसी भी चीज़ से अधिक अपने घर की इज्जत और अहं प्यारा होता है। अपनी आबरू के आगे औलाद का प्यार दर्द उन्हें नहीं पिघला सकता। शायद घर की बात बाहर न जाये इस लिये उन्हें रिचा का किसी से मिलना अच्छा नहीं लगता था।
कैसा निर्दयी बाप है! बेटी पर क्या गुज़र रही है कैसे अकेली इस सदमे मे घुट रही है? उसकी संवेदनाओं से अधिक समाज का डर है। मन विशाद से भर गया।
मैं अन्दर गयी तो रिचा दिवार की तरफ मुँह करके लेटी हुई थी।
*रिचा<*, मैने उसका हाथ पकडते हुये उसे पुकारा। वो अपलक छत की ओर देख रही थी एक महीना हो गया था इस हादसे कोमगर उसके चेहरे पर अब भी खौफ था। बहुत कमजोर हो गयी थी।उस भयानक हादसे को सुन कर किसी की भी रूह काँप जाये फिर उसने तो झीला था।
*रिचा, क्या मुझ से नाराज़ हो?*
मैने धीमे से उसे हिलाया,उसने मेरी तरफ मुड कर देखा और फफक कर मेरे गले लग गयी।अँ सू ऐसे बहने लगे जैसे बरसाती नदी बान्ध तोड कर बिखरती है। मैने जोर से उसे भीँच लिया जैसे एक माँ अपने बच्चे को भीँचती है। मै उसे रोने देना चाहती थी।पीडा का कुछ अंश तो ये आँसू बहा ही लेते हैं।यूँ तो औरत की नियती ये आँसू ही हैं,इन्हीं से जीवन का ताना बाना बुनती है,मगर अबला नारी अकेली रो भी नहीं सकती उसे रोने के लिये भी एक कन्धा चाहिये होता है ।
मैं बेशक छोटी थी मगर दुनिया को समझने लगी थी। मैने सोच लिया कि चाहे कुछ भी हो मैं उसे कन्धा दूँगी। उसका साथ नहीं छोडूंगी।
*रिचा बस बहुत हो गया ,संभालो अपने आप को।* मैने उसे पेछे सिरहाना रख कर बैठनी मे मदद करते हुये कहा।
*जानती हो जितना दुख मुझे इस हादसे से था उस से भी अधिक इस बात का कि मेरी जान से प्यारी सहेली भी मेरे पास नहीं है,मुझे लगा शायद वो भी दुनिया की भीड मे खो गयी है।*
*तुम जानती थी माँ का आप्रेशन था। क्या मुझ पर भी विश्वास नहीं रहा?*
*विश्वास?जब अपने खून के रिश्तों मे ही मेरा द्र्द समझने का एहसास नहीं तो और किसी से क्या उमीद रखी जा सकती है।* उसने एक लम्बी साँस भर कर कहा
*रोचा अगर एक हादसे से विश्वास टूटने लगेगा तो कैसे चलेगा।जीवन तो अपने आप मे एक हादसा है । अगर आदमी मे मनोबल रहेगा तभी वो जी सकता है।*
अच्छा बताओ अब जख्म ठीक हैं?* मैने उसके शरीर पर नज़र दौदाते हुये कहा।
*तन के ज़्ख्म तो भर गये हैं,पर मन के ज़ख्मों मे इतना मवाद भर गया है कि मौत ही इससे छुटकारा दिला सकती है।*
*देखो रिचा,मरना तो सब को एक दिन है ,ागर मरने से पहले जीना सीख लें तभी मरने पर भी शान्ति मिलेगी। बस इन्साम को निराश नहीं होना चाहिये।*
*सब कहने की बातें हैं। कहने और सहने मे बहुत अन्तर है।एक अफसाना है दूसरा सच्चाई,यथार्थ अगर ये हादसा उस घटना तक ही सीमित रहता तब भी कभी न कभी इस दुख से उभर आती,मगर उसके बाद जो हो रहा है---- अपनों का समाज का इपेक्षापूर्ण व्यवहार,तिरस्कार उस से कैसे उबर सकती हूँ?*
*जानती हो जैसे ही मुझे होश आया, मै एक दम चीख मार कर उठी,मन था कि अभी उन दरिंदों को गोली से उडा दूँ। उन का घिनौना अत्याचार सहा था मैने,म्रे रोम रोम से एक लावा उठ रहा था। मैने जोर से कहा कि मैं उन्हें गोली मार दूँगी मुझे एक पिस्तौल चाहिये--- तभी पोता ने जोर से मुह पर थप्पड मारा-*चुप रह चुपचाप बेड पर पडी रह, नाक तो कटवा ही दी अब और क्या करेगी।*
सच कहूँ उस समय ,इझे मेरा बाप उन बदमाशों से भी निर्दयी लगा।मेरा क्या कसूर था?पिता के चेहरे पर क्रोध और मेरे बेटी होने की शर्मिन्दगी की काली परछाई देख कर दिल टूट गया था। लगा उन दुश्टों से तो हारी ही अपने आप से और जीवन से भी हार गयी हूँ।*
---*माँ की आँखों मे दया ढूँढी वहाँ द्या से अधिक बेबसी के साये थे। वो भी औरत थी इस आदम समाज की वंदिनी एक इज्जतदार पति की कर्तव्यनिष्ठ पत्नी!जो चाहते हुये भी कुछ नहीं कर सकती थी।---
--*भाई ने तो नज़र उठा कर देखना भी गवारा नहीं समझा।उसे तो एक ही चिन्ता थी कि वो लोगों से नज़र कैसे मिलायेगा।मुझे तो ये उमीद थी कि मैं उसकी इकलौती लाडली बहन हूँ वो अभी जायेगा और उन दुश्टों कोगोली से उडा देगा। मगर उसे भी अपनी इज्जत और भविश्य ही प्यारा था। *----
*मेरे साथ अन्याय हुया है ,मुझे न्याय कौन दिलायेगा? कौन?*
*रिचा शाँत हो जाओ।* सच मे इतने दिनो से उसके अन्दर का लावा फूट रहा था।
*किसी को एहसास नहीं कि मैं किस तरह का संताप झेल रही हूँ।कैसे पर कटे पक्षी की तरह छटपटा रही हूँ।* और वो फूट फूट कर रोने लगी थी।
अच्छा अब चुप हो जाओ। तुम अपनी पढाई क्यों नहीं शुरू कर रही हो? मैने बात बदलने की कोशिश की।
*अब कौन भेजेगा मुझे स्कूल ? पिताजी ने मना कर दिया है*
मुझे एक झटका सा लगा। क्या इस की जिन्दगी बरबाद कर देना चाहते हैं?
*देखो तुम अपने आप को सम्भालो तुम्हारा कोई कसूर नहीं है इस लिये किसी से डरने की जरूरत नहीं।तुम घर पर रह कर तो पढ सकती हो ना? पढाई शुरू करो आगे देखते हैं। मैं अपने मम्मी पापा को ले कर आऊँगी वो तुम्हारे पिता से बात करेंगे।चिन्ता मत करो सब सही हो जायेगा और मै अब आती रहूँगी। * इसके बाद मै उसे माँ के आप्रेशन के बारे मे बताती रही ।बेबे चाय ले कर आयी चाय पी ही थी कि तभी मेरे पिता जी लेने आ गये। क्रमश;



01 October, 2009

दोहरे माप दँड----
पिछली बार आपने पढा
कि रिचा और रिया दोनो स्कूल मे इकठी पढती थीं । दोनो सहेलियाँ थी। रिया शहर मे और रिचा साथ लगते गाँव मे रहती थी। जिस दिन स्कूल मे छुटियाँ हुई उस दिन जब रिचा स्कूल से घर नहीं पहुँची तो उसके घर वालों को चिन्ता हुई। उसके पिता पोलिस मे केस दर्ज नहीं करवाना चाहते थे। सभी इसी सोच मे थे कि क्या किया जाये उसे कहाँ ढूँढा जाये।

गताँक से आगे कहानी
अब आगे

अभी वो लोग कुछ और फैसला लेते तभी एक आदमी भागा भागा आया--* जल्दी चलिये ट्यूवेल के पास रिचा खून से लतपथ बेहोश पडी है।*
सभी आनन फानन मे उधर दौदे साथ वाला फौजी अपनी गाडी ले आया। ये ट्यूवेल इसी गाँव के आखिरी खेत पर था साथ मे दूसरा गाँव बेला पुर की जमीन पडती थी। वहाँ भी एक टयूवेल था।
रिचा को देख कर एक बार तो सब की रूह काँप गयी।शरीर पर कई जगह चाकू के निशान भी थी।सारे कपडे खून से सने थे मुँह पर खरोंचों से खून रिस रहा था। जल्दी से तीन चार लोगों ने उसे उठा कर गाडी मे डाला।ाउर अस्पताल ले गये। अस्पताल वलों ने पोलिस क्प सूचना भेज कर उसका इलाज शुरू कर दिया।जाँच मे पाया गया कि लडकी का बलात्कार किया गया है साथ ही चाकूओं कई जगह वार किया गया है। लडकी की हालत बेहद गम्भीर थी।माँ बाप को काटो तो खून नहीं।भाई बेबसी मे हाथ मल रहा था।बाप सोच रहा था कि पोलिस लडकी का ब्यान लेगीपता नहीं कितनी बार क्या क्या सवाल पूछे जायेंगे और फिर अदालत मे वकील जिर्ह करेंगे तो लडकी की और मिट्टी पलीत होगी कितनी बदनामी होगी । फिर वो बदमाश पता नहीं कौन होंगे और कितने ताकतबर होंगे,ाइसे मे दुशमनी मोल ले कर भविश्य के लिये मुसीबतें खडी करने से क्या फायदा। धन और इज्जत दोनो की बरबादी होगी।
इज्जत जानी थी सो जा चुकी।ाब चुपचाप कडवा घूँट ही पीना होगा।। उन्हों ने अपनी पत्नि को भी समझा दिया कि जैसे ही लडकी को होश आये उसेसमझा दे कि किसी का नाम नहीं लेना।ाउर कह दे कि मुझे बेहोश कर दिया गया था मैं शक्ल नहीं देख सकी।पत्नि ने विरोध करना चाहा मगर पति ने घुडकी दे कर चुप करवा दिया। शायद एक लाचार बाप यही कर सकता हो कह देना आसान है कि उनको सजा दिलवानी चाहिये थी मगर शायद बाप को भी अपनी इज्जत बेटी के दुख और आक्रोश से अधिक प्यारी थी।
अगले दिन लडकी को होश आया तो उसने माँ को सारी बात बताई।वो बदमाश साथ के गाँव के सरपँच का बेटा था।साथ मे उसके दो दोस्त थे । तीनो उसे उठा कर अपने खेत वाले टूवेल पर ले गयी थे।उसके साथ कुकर्म किया विरोध करने पर उसके चाकू मारे। और साथ मे धमकी दी कि अगर किसी को हमारा नाम बताया तो पूरे खानदान को खत्म कर देंगे। एक तो बार बार कह रहा था कि इसे मार दो मगर दूसरे ने मना किया कि ऐसे ही फेंक दो। शयद अपनी तरफ से मार कर ही फेंक गये थे। अगर अधा घँटा और वहाँ पडी रहती तो प्राण पखेरू उड गये होते।
बाप जानता था कि उस सरपंच के पास पैसे की ताकत तो थी ही ,उसके सम्बन्ध भी बडे बडे नेताओं से थे और आप भी वो बदमाश किस्म का आदमी थाीऐसी हालत मे उनसे लोहा लेना धन,समय और बची खुची इज्जत की बरबादी होगी।
पोलिस ने भी खाना पूर्ती कर के केस की फाईलें अलमारी मे बन्द कर दी उन्हें पैसा और सिफार्श ने काबू कर लिया था।फिर लडकी के ब्यान भी यही थे कि वो किसी को नहीं पहचानती।
इस तरह एक मासूम के साथ अत्याचार और इन्साफ थाने की फाईलों मे दब कर रह गये थे।इन्साफ की देवी तो खुद देख नहीं सकती उसकी आँखों पर तो पट्टी बन्धी रहती है,ापराधियों को सजा कैसे हो सकती है आम आदनी तो ऐसे राक्षसों से लड भी नहीं सकता।
वक्त के साथ साथ लोग समाज के उन दरिन्दों को तो भूल गये मगर ये नहीं भूले कि इस लडकी की इज्जत लुट चुकी है। उसे सहानुभूति रखने की बजाये उसे हेय दृश्टी से देखा जाने लगा। माँ बाप के लिये भी अब वो शाप बन गयी थी । जितने लोग उतनी बातें। कुछ का कहना था कि ये जान बूझ कर स्कूल से लेट आयी और खुद ही उन लडकों के साथ गयी होगी।
चाहिये तो ये था कि कोई उसकी भी भावनायें समझता, उसके दुख को सुनता, उसे हादसा भूलने मे मदद करता, मगर नहीं --- समाज ने औरत के साथ न्याय किया ही कब है। अगर किसी ने उसके भाई को एक थप्पड भी मारा होता तो शायद बाप बेटा दोनो मरने मारने पर उतारू हो जाते। मगर आज इनके लिये बेटी से अधिक अपनी इज्जत प्यारी हो गयी।बाकी लोग क्यों उसकी भावनाओं पर ध्यान दें जब घर वाले ही उसे कलंक समझने लगे थे।
मुझे इस हादसे से अधिक दिख उसके माँ बाप के रवैये को देख कर हुया।मन विद्रोह सा कर उठा था।। इस हादसे से दूसरे दिन ही हम लोग तो लुधियाना चले गयी थे क्यों की मेरी मम्मी के आप्रेशन की तारीख ले रखी थी। वहाँ भी मुझे रिचा की चिन्ता रहती बेचारी किस मानसिक कश्ट से गुज़र रही होगी कोई उससे बात करने वाला भी नहीं होगा। हमे लुधियाना मे एक महीना लग गया। अभी हमारी एक हफ्ते की छुटियां पडी थी। घर आते ही मैने रिचा से मिलने की सोची।
सुबह मैने नाश्ता करते हुये मां से पूछा
* माँ मैं रिचा से मिल आऊँ?*
*बेटी तुम्हारी सहेली है तुम्हें जरूर जाना चाहिये ।* मा जवाब देती इस से पहले हीपिताजी बोल पडे।
*ये क्या करेगी जा कर सुना नहीं लोग तरह तरह की बातें कर रहे हैं?* दादी एकदम बोल पडी
माँ लोगों का क्या हैकिसी को भी कुछ भी कह देते हैं । इसमे उस बेचारी का क्या कसूर है? हम लडकी वाले हैं कल को हमारी बेटी के साथ कुछ हो तो हमे भी ऐसे ही कहेंगे। दोस्त मित्र के दुख मे साथ देना हमारा कर्तव्य है।* पिता जी ने दादी को समझाया।
मै जानती थी कि मेरे पोता बहुत सुलझे हुये और अच्छे इन्सान हैं। काश कि समाज के सब लोग मेरे पोता जैसे हो जायें तो शायद समाज मे कोई समस्या ही ना हो।पिता जी ने मुझे कहा कि मै तुम्हें छोड आता हूँ दोपहर को ले आऊँगा। 2-3 कि मी तो गाँव है। क्रमश:

29 September, 2009

दोहरे मापदंड --कहानी
*देख कैसी बेशर्म है? टुकर टुकर जवाब दिये जा रही है।भगवान का शुक्र नहीं करती कि किसी शरीफ आदमी ने इसे ब्याह लिया है। छ: महीने मे ही इसके पर निकल आये हैं। सास को जवाब देने लगी है।* दादी न जाने कब से बुडबुडाये जा रही थी।
*ठीक है दादी,किसी बात की हद होती है! उस बेचारी का क्या दोश?जरा सी बात पर उसकी सास इसके अतीत के गडे मुर्दे उखाडने लगती है।* मुझे दादी की बात पर गुस्सा आ गया था।
* तू चुप रह ।इस पढाई लिखाई ने लडकियों का दिमाग खराब कर दिया है।तभी तो ऐसे हादसे होते हैं! *
* दादी भला ये क्या बात हुई? मै उस से कितना अधिक पढ गयी मगर मेरे साथ तो ऐसा हादसा नहीं हुया है।वो तो बेचारी गाँव की सीधी सादी लडकी थी।ाउरतों की इज्जत से खेलना मर्दों का शुगल है ये आज ही नहीं हुया उगों युगों से होता आया है ।मुझे एक बात बताओ कि उस दिन तुम ने महाभारत की कहानी सुनी थी तो दुर्योधन को कैसे गालियाँ निकाल रही थी। द्रोपती के लिये दुख था तो आज अगर रिचा के साथ हादसा हुया है तो इस के लिये दुख क्यों नहीं? क्यों कि औरत के आधे दुखों का कारन ही औरत है। कोई एक भी औरत उठी रिचा के हक मे ?किसी माँ बहन बेटी ने आवाज़ बुलन्द कि रिचा के साथ दुश्कर्म करने वालों को सजा होनी चाहिये? येहीं तक नहीं बल्कि उस पर कटा़क्ष करने मे सब से आगे औरतें ही हैं। और मर्द तो जैसे ये मान बैठे हैं कि ऐसा तो होता ही रहता है ।*
मै अपनी दादी से बहुत प्यार करती थी उनसे कभी ऊँची आवाज़ मे बात नहीं की थी।बात बात मे उनके गले लगना रूठना,शरारतें करना लाड आये तो उनके हाथ से ही खाना खाना।पर आज मुझे दादी पर गुस्सा आगया था।
* बिन्दू ये तुम्हें क्या हो गया तुम क्यों भरी बैठी हो?मैने तुझे तो कुछ नहीं कहा।* दादी हैरान सी मेरे सिर पर हाथ फेरने लगी।
* दादी मुझे औरत का यही रूप अच्छा नहीं लगता। आपके जमाने और थे ौरतें घुट घुट कर जीना सीख लेती थी़, अत्याचार सह लेती थी, और आने वाली अपनी संतानो को यही सहन करने की शिक्षा देती थी। तब अनपढता थी आज नारी पुरुश के कन्धे से कन्धा मिला कर चल रही है तो क्यों अत्याचार सहे?वो भी समाज के दरिँदों का, बदमाशों के घृणित कुकर्म का?* मैने देखा दादी चुप कर गयी थी।शायद बात के मर्म को जान गयी थी।
* दादी आपने उसे एक बार जवाब देते तो सुन लिया, क्या उस के अन्दर जो लावा जल रहा है उसे कभी देखने, महसूस करने की कोशिश की? ये आज उसका जवाब देना उस लावे का धुँअँ है ।जिसे एक दिन फटना ही था । मैं तो चाहती हूँ कि एक दिन ये फटे ताकि वो जी सके कब तक घुट घुट कर मरती रहेगी उस बात के लिये ताने सुनती रहेगी जो उस ने की ही नहीं?। दादी प्लीज़ उसे जी लेने दो।, अगर कुछ कहना है तो उस की सास को समझाओ कि उस की दुखती रग पर हाथ न रखा करे।उसे अतीत का ताना न दे।* कहते कहते मै रोने लगी थी। और भाग कर अन्दर अपने कमरे मे चली गयी।
रिचा मेरी स्कूल की सहेली थी।वो इस शहर के साथ लगते गाँव रायेपुर से पढने आती थी।शरीफ खानदान से थी। घर अधिक अमीर नही था मगर बच्चों को पढाने के लिये पिता ने काफी मेहनत की। वो पढने मे भी लायक थी। ऊँचे ऊँचे सपने थे उसके। मगर उसके साथ ऐसा खौफनाक हादसा हुया कि सब सपने बिखर गयेपतझड के पत्तों की तरह अब उसे सिर्फ समाज और घर वालों के रहम पर जीना था।
पाँचवीं कक्षा से ही हम दोनो साथ थी दसवीं तक पहुँचते -2 हमारी दोस्ती पक्की हो गयी। एक दूसरे के बिना एक दिन भी दूर रहना अच्छा न लगता था।
उस दिन गर्मियों की छुट्टियाँ हो रही थी। कितने दिन मिलना ना हो सकेगा । उसे मेरी कापी से कुछ नोट्स भी उतारने थे। हम दोनो क्लास रूम मे ही बैठ गयी।15 20 मिनट मे सभी बच्चे जा चुके थे। हम ने भी काम खत्म होते ही अपने बैग सम्भाले और अपने अपने रास्ते चल दी।
उसका गाँव दो तीन कि, मी, की दूरी पर था गाँव वालों के लिये ये रास्ता कोई दूर नहीं था।बच्चे अक्सर पैदल या साईकलों पर ही आते थे।गाँव का स्कूल प्राईमरी तक ही था इस लिये उन्हें शहर के स्कूल आना पडता था।
उस दिम चूँकि हम क्लास्रूम से 15-20 मि, लेट निकली थी तो उस्के गाँव के सब बच्चे जा चुके थे। रोज़ का रास्ता था दिन मे डर की कोई बात नहीं थी।
गर्मी के दिन थे।दोपहर की चिलचिलाती धूप मे रास्ता एकदम सुनसान था। मगर वो रोज़ की तरह बेपरवाह चली जा रही थी। अचानक पीछे सीक गाडी उसके पास आ कर रुकी, इससे पहले कि वो कुछ समझ पाती गाडी मे से दो हट्टे कट्टे लदके उतरे और उसे गाडी मे धकेल कर अन्दर किया और तीसरे ने गाडी स्टार्त कर दी।
जब छुट्टी से दो तीन घन्टे बाद तक भी वो घर नहीं पहुँची तो उसकी खो शुरू हुई।स्कूल जा कर देखा उसकी सहेलियों और सब जगह पता किया मगर उसका कुछ पता न चला।
घर वालों का घबराहट से बुरा हाल था जितने मुह उतनी बातें।। माँ के आँसू थमने का नाम नहीं ले रहे थे।पिता किसी अनजान शंका से सहम गये थे।भाई इधर उधर मारा मारा फिर रहा था । लोगों को बातें बनाने का अवसर मिल गया था। कहाँ खोजें लडकी की इज़्जते का सवाल था। ेआस पास खबर हुई तो किसी ने सलाह दी कि पुलिस मे जाना चाहिये।मगर उसके पिता इतनी जल्दी कोई फैसला लेना नहीं चाहते थे।--- क्रमश:

26 September, 2009

आज कल कुछ व्यस्त हूँ मया लिख नहीं पा रही इसलिये एक पुरानी कविता ठेल रही हूँ कृप्या झेल ले।जहाँ सिर्फ मै हूँ

कितनी बेबस हो गयी हूँ
क्यों इतनी लाचार हो गयी हूँ
जब से गया है
वो काट कर् मेरे पँख्
बैठ गया आसमान पर
ले गया यशोधा होने का गर्व
जानती हूँ कभी नहीं आयेगा
कभी माँ नहीँ बुलायेगा
फिर भी खींचती रहती हूँ लकीर
जानते हुये कि
नहीं बदला करती तकदीर्
और ढूँढने लगती हूँ उधार के
कुछ और कृ्ष्ण
फिर सहम जाती हूँ
दहल जाती हूँ
कि आखिर कब तक
अपनी तृ्ष्णा को बहकाऊँगी
और जब वो भी खो जायेगा
दुनिया की भीड मे तो
क्या और दुख उठा पाऊँगी?
एक दिन उसे ना देख कर
सहम जाती हूँ
दहल जाती हूँ
बहुत डर गयी हूँ
इन उधार के रिश्तों से
मन मे एक् दहशत
इन को खो देने की
कहाँ कब बन पाये ये मेरे
क्यों पाले बैठी हूँ ये मृ्गत्रिश्णा
जानती हूँ मेरे नसीब मे
नहीं है इनका साथ
होता तो वो ज़िन्दा रहता
नहीं नहीं
मुझे इन तृ्ष्णाओं से
दूर जाना है बहुत दूर
और चली जा रही हूँ
अपने अंतस की गहराईयों मे
जहाँ बस मै हूँ
और मेरे जीवन का अंधकार है
कुछ भी तो नहीं उधार



24 September, 2009

गज़ल
ये गज़ल भी मेरे बडे भाई साहिब श्रद्धेय प्राण शर्मा जी के आशीर्वाद से लिखी और उन दुआरा ही संवारी गयी है।

इसकी पूजा करती रहूँ मै
भारत की ही बेटी हूँ मैं

क्या मंदिर और क्या गुरुदुआरा
सब का ही सन्मान करूँ मैं

इश्क मुहब्बत मुल्क है मेरा
इसको ही महबूब कहूँ मैं

खूँ का हर कतरा है इसका
अर्पण इसको क्यों न करूँ मै

दुर्गा जैसा बल हो मुझ मे
दुश्मन से न कभी भी डरूँ मैं


देश के खेतों खलिहानों मे
मस्त पवन सी मुक्त बहूँ मैं

देश का गौरव जिस कारण हो
ऐसे अद्भुत काम करूँ मैं

देश की सरहद पर डट जाऊँ
सच्ची पहरेदार बनूँ मै

22 September, 2009

कवच --- गताँक से आगे कहानी
पिछली किश्त मे आपने पढा कि आशू एक कम उम्र की लडकी अपने ही कालेज के प्रोफेसर से प्यार करने लगती है मगर बाद मे पता चलता है कि वो शराबी कबाबी आदमी है वो मायके आ जाती है वहाँ भी उसे वो तंग करता है जब कि वो पढ लिख कर अपने पाँव पर खडे होना चाहती है । अब आगे -----

*अशू वो तलाक के कागज़ ले कर चिल्ला रहा है कि अगर नहीं आयेगी तो ये तलाक के कागज़ साईन कर के भेज दे।* मैने आशू को बताया।
*तलाक? कभी नहीं। मुझ से तलाक ले कर ये किसी और की ज़िन्दगी बर्बाद करेगा मैं ऐसा कभी नहीं होने दूँगी।*
* तो इस तरह तंग करता है तो पोलिस की मदद ले लेते हैं।*
*नहीँ, अगर आज पोलिस की मदद ले भी लूँ तो क्या फायदा।,ाइसे दानव तो दुनिया मे भरे पडे हैं क्या पता पोलिस मे इस से भी बडे बडे दानव हों वो इसके साथ मिल जयें तो क्या करूँगी। ये अन्त हीन प्रयत्न होगा।*
* भाभी आपने मुझे माँ दुर्गा की कहानी सुनाई थी ना?उसने अपनी नौ शक्तियों के साथ कैसे दानवों का संहार किया था!अपने बताया था कि रक्त्बीज नाम के राक्षस को मारने के लिये उसे अपनी शक्ति *काली* की सहायता लेनी पडी। माँ दुर्गा जब भी रक्तबीज पर प्रहार करतीउस दानव के खून की बूँद से एक और रक्तबीज पैदा हो जाता।तभी उसने अपनी शक्ति काली से कहा कि वो दानव के शरीर से गिरने वाली हर बूँद को पी जाये।इस तरह दुर्गा ने उस की शक्ति को शीण कर के उसका वध किया।*भाभी वो सतयुग की नारी थी। मगर सृ्श्टी का दस्तूर तो वही है। मैं पढ लिख कर शक्ति अर्जित करूँगी और कलयुगी रक्तबीजों का संहार करूँगी।उस आदमी ने मुझ नासमझ को बहका कर गुरू-शिश्य के रिश्ते को कलंकित किया है। मैं अपनी गलती का प्रायश्चित करूँगी।अप देखना भाभी दुराचारी आदमी के पास बल क्षणिक होता है। इसके बाद तो उसके मन मे एक डर समाया रहता है। वो मुझे आगे बडते हुये देख ईर्ष्या मे ही समाप्त हो जायेगा। इसी लिये मैं उसे और गिर लेने देना चाहती हूँ।जिस ने भगवान की दी हुई सौगात प्रेम का अपमान किया है वो कभी किसी का प्यार नहीं पा सकेगा।*
मै आशू के मुँह की तरफ देख रही थी।एक अधखिली कली इतनी सयानी बन गयी थी। चोट आदमी को बहुत कुछ सिखा देती है बस धर्य होना चाहिये।
दिन निकलते गये।।उसने बी ए फर्स्ट कलास मे पास की। उसके बाद वो आ.- ए- एस् की तैयारी करने लगी।दीपक की हरकतों से उसके मनोबल मे वृ्द्धी ही हुई। जब दीपक ने देखा कि उसकी हर कोशिश बेकार है तो उसने कुछ रिश्तेदारों को मध्यस्त बना कर दवाब डाला।काफी कोशिश के बाद आशू को मना लिया कि एक बार फिर से कोशिश करनी चाहिये ।उसके माँ बाप भी यही चाहते थे कि अब वो अपनी गलतियाँ मान रहा है तो उसे एक अवसर देना चाहिये। इस तरह आशू फिर से उसके साथ घर चली गयी। मगर आब उसने निश्चय कर लिया था कि उसका कोई जुल्म नहीं सहेगी।
कुछ दिन तो थीक चलता रहा। मगर वो पंजाबी की एक कहावत है कि कि वादडियाँ सजादडियाँ निभण सिराँ दे नाल् [अर्थात् अच्छी बुरी आदतें जब तक आदमी जिन्दा है साथ ही रहती हैं} तीन चार महीने बाद फिर वही सिलसिला शुरू होने लगा।अशू ने सब तरह से कोशिश कर के देख ली मगर उसके व्यव्हार मे कओई फर्क नहीं आया असल मे उसका असली मकसद उसे आई-ए-एस की परीक्षा से रोकना था जो उसने पूरा कर दिया और वो प्रिलिमिनरी टेस्ट पास ना कर सकी इतने तनाव मे कर भी नहीं सकती थी। अब आशू फिर से अपने मायके चली गयी।फिर उसने सोच लिया कि अब चाहे कुछ भी हो जाये वो उसके पास कभी नहीं आयेगी।अपनी पढाई की ओरे ध्यान देगी।
दीपक ने भी जैसे कसम खा ली थी कि वो उसे पढने नहीं देगा।ाब सरेआम वो दूसरी लडकी के साथ घूमने लगा और लोगों से आशू के बारे मे उलटी सीधी बातें करने लगा।ाशू के भाई की नौकरी दिल्ली मे ही लग गयी और वो अपने भाई के पास दिल्ली चली गयी। इसके माँ बाप भी वहीं रहने लगे।
तीन साल हो गये थे। मगर फिर कभी आशू की कोई खबर नहीं आयी। ना ही उसने कोई पत्र लिखा। शायद वो अपना पता किसी को बताना नहीं चाहती थी।
तीन साल बाद अचानक उसका एक पत्र आया था ,जिसमे उसने लिखा था कि भाभी आपकी बहुत याद आती है और सच मानो तो आपके कारण ही मैं अपनी जिन्दगी को नया मोड दे पाई। आपने मुझे दुर्गा की कथा पडने के लिये कहा था, बस उस कथा ने मेरी सोच बदल दी और मुझे शक्ति दी कि मैं आगे बढूँ।अब भी रोज़ वो कथा पढती हूँ और जल्दी ही मुझे फल मिलने वाला है, जिस दिन दुर्गा मुझे वो कवच दे देंगी तो सीधे पहले आपके पास ही आऊँगी।
इस पत्र को आये भी चार पाँच महीने हो गये थे। आज सुबह मैं काम से निबट कर बाल्कनी मे बैठ गयी।अंदर काम वाली काम कर रही थी। अचानक नीचे हमारे घर के सामने एक लाल बत्ती वाली गाडी आ कर रुकी।उसमे से एक सिपाही निकला।मैं सरसरी नज़र डाल कर अंदर चली गयी,सोचा नीचे वाले वकील साहिब से कोई मिलने आया होगा। तभी सीडियों पर पैरों की आवाज़ सुन कर मैं दरवाजे पर आयी। एक सिपही मेरे दर्वाजे पर खडा था। दिल धक से रह गया----
*मैडम नीची आपको हमारे आफिसर बुला रहे हैं*
* लेकिन क्यों?इस समय मेरे पति घर पर नहीं हैं आप काम बतायें मैं उन्हें फोन कर के बुला लेती हूँ।
*उन्हों ने आपकी ननद के बारे मे बात करनी है।* सिपाही बोला।
मै डर गयी।ाभी चार माह पहले तो उसकी शादी हुई है।वो अपने घर मे बहुत खुश है,फिर ऐसी क्या बात हो गयी कि पोलिस आयी है? डर से मेरी टाँगें काँप रही थी।जैसे तैसे मैं सीढीयाँ उतर कर गाडी के दर्वाज़े के पास पहुँची,तभी एक दम गाडी का दरवाज़ा खुला और आशू एक दम मेरे गले से लिपट गयी।आश्चर्य और खुशी से मेरी चीख निकल गयी।
*अशू ये क्या मज़ाक है तुम ने तो मेरी जान ही निकाल दी? कहते हुये मैने उसे बाहों मे भर लिया।
*भाभी आज तुम्हारी दुर्गा आयी है ,तुम क्यों डर रही हो?डर तो उन रक्तबीजों को होना चाहिये जिन्हें मै एक एक कर निगलने वाली हूँ। आशू हँसते हुये बोली।
रात भर हमने खूब बातें की। उसने मुझे बताया कि उसे जब पता चला कि दीपक ने उस लडकी से शादी कर ली है तो मैने सब से पहले उस पर केस दर्ज़ करवाया। आप देखना मैं इस आदमी का क्या हाल करती हूँ बहुत सी लडकिओं के सबूत हैं मेरे पास जिन को इसने शादी का झाँसा दे कर लूटा ।
भाभी मैने अपनी भूल का प्रय्श्चित कर लिया है। माँ दुर्गा मे मुझे आई ए एस बना कर शक्ति दी है।
*हाँ आशू भूल कर के ही तो पता चलता है कि हम कहाँ गलत थे। भगवान जो ्रता है अच्छे के लिये ही करता है। उसके खेल को किस ने जाना। समाप्त


20 September, 2009

कवच ------कहानी


पडोस के घर के बाहर कोई ऊँचे ऊँचे गालियाँ बक रहा था।मैं बाहर निकली तो देखा उनका दामाद दीपक था जो नशे मे था और उनके दरवाजे के बाहर खडा गालियाँ निकाल रहा था।ाउर बार बार आशू को बुला रहा था *एक बार् बाहर निकल--- [गाली] मैं तेरी क्या गत बनाता हूँ। तू जो पढने का बहाना ले कर्माँ की गोद मे छुपी बैठी है। मै सब जानता हूँ तो क्या गुल खिला रही है!*
मैं देख कर एक बार तो अंदर चली गयी, पर फिर रहा नहीं गया ।एक तो चोरी उपर से सीना जोरी? मै बाहर आयीमुझे लग रहा था कि आशू अकेली होगी
*दीपक ये क्या मज़ाक है?इस गली मे श्रीफ लोग रहते हैं। अगर ये ड्रामा बन्द नहीं किया तो मै पोलिस को फोन कर दूँगी।*
पता नहीं वो क्या सोच कर भुनभुनाते हुये चला गया।मैने आशू से दरवाज़ा खुलवाया और अंदर चली गयी।अशू रो रही थी।उसे चुप करवाया और धीरे धीरे बातों मे लगाया।
*आशू तुम एक जिन्दादिल और साहसी लडकी हो,ागर इस तरह दिल छोड दोगी तो कैसे चलेगा?*
*भाभी< बहुत कोशिश करती हूँ लेकिन बार बार मनोबल टूट जाता है।*
*अच्छा तुम रोज़ दुर्गा पाठ किया करो। उससे साहस आता है। मन मे प्रण कर लो कि आज के बाद इस जैसे दानव से कैसे निपटना है।ाउर कैसे अपनी ज़िन्दगी को आगे बढाना है। तुम इतनी लायक हो अगर जरा सी कोशिश करो तो बुलन्दियाँ छू सकती हो।*
*हाँ कोशिश करती हूँ लेकिन ये शख्स उस पर पानी फेर देता है।*
*लगता है अब इस से सख्ती से निपटना होगा। तुम चिन्ता ना करो हम सब साथ हैं ना देखते हैं क्या कर सकते हैं*
*हाँ मम्मी पापा भी आज वकील के पास गये हैं।*
*चलो अब निश्चिन्त हो कर पढो।*
*ठीक है भाभी मैं अपना सारा ध्यान पढने मे लगा दूँगी।*
आशू हमारे पडोस वालों की बेटी थी।उसका भाई एम.बी.बी.एस कर रहा था। वो अपने माँ बाप के साथ रह रही थी। चंचल सुन्दर बेबाक लडकी थी।पढाई मे सब से आगे।कालेज मे कोई कम्पीटीशन हो तो वो सब से आगे होती थी।हर पहला इनाम उसका होता था। वो बी ए के दूसरे वर्ष मे थी। सब की प्रशंसा और लाड प्यार से थोडा जिद्दी हो गयी थी।कालेज मे पढते हुये एक लेक्चरर के प्रेम जाल मे फंस गयी।माँ बाप ने बहुत समझाया मगर वो शादी की ज़िद करने लगी।उम्र अभी18-19- साल की थी मगर वो लेक्चरर्33--34 साल का था ।जब किसी तरह दोनो नहीं माने तो माँ बाप को ये भी डर था कि कहीं खुद दोनो कोई गलत कदम ना उठा लें इस लिये दोनो की शादी कर दी।
शादी के कुछ दिन तक तो सब ठीक चलता रहा,मगर जल्दी ही उसे दीपक की कमज़ोरियों का आभास होने लगा।ाब वो कभी कभी शराब पी कर घर आने लगा।धीरे धीरे उसकी ये आदत बढती गयी।ाभी शादी को 4-5शीने ही हुये थे ।उसे अब पता चल गया था कि वो शराब के बिना नहीं रह सकता।इस वजह से दोनो मे झगडा होने लगा ।जिस दिन झगडा होता वो अपने दोस्तों को घर ले आता। उस्रात घर मे देर रात तक महफिल जमती।ाब दोस्तों के सामने उससे गाली गलौच करने लगा।सब के लिये इतनी रात गये खाना बनाने का हुकम दे देता जिस से उसे भी गुस्सा आ जत और धीरे धीरी मार पिटाई की नौबत आने लगी।
ये कैसा प्यार था?वो सोचती जो दीपक कालेज मे सारा दिन उसके आगे पीछे घूमता था,अज जब वो उसके पास है तो उसे परवाह नहीं?उसके सब सपने टूट गये थेेआशू का भी कालेज मे ये आखिरी साल था। वो देख रही थी कि दीपक आज कल किसी दूसरी लडकी को जाल मे फसा रहा था जब वो उससे इसके बारे मे बात करती तो कहता कि तुझे सभी लडकियाँ अपनी तरह ही नज़र आती हैं ।अशू तिलमिला उठती। कच्ची उम्र थी पहले कुछ सोचा ही नहीं बस अनजाने मे जाल मे फंस गयी।ाब उसने अपने माँ बाप को सब कुछ बता दिया। क्या करते लडकी को अपने घर ले आये।
पेपर आने वाले थे। वो पढना चाहती थी ,मगर दीपक को ये गवारा ना था।उसकी और दोस्तों की खातिर कौन करे खाना कौन बनाये? फिर ऐसे लोगों को औरत के दिल या भावनाओं से क्या लेना देना ।उसे तो जसे घर की नौकरानी बना कर रखना चाहता था।ाउर दिल बहलाने को बाहर बहुत कुछ था उसके लिये।माँबाप की भी गलती थी कि शादी से पहले उसके बारी मे पूरी छानबीन नहीं की। आज कल वो पेपरों की तैयारी अपने मायके रह कर कर रही थी।
दो तीन दिन बाद शाम को दीपक ने फिर वही ड्रामा किया।वो बाहर बके जा रहा था। मैं पिछले दरवाजे से आशू के घर चली गयी शायद वो उसके माँ बाप को कहीं जाते हुये देख लेता था तो ऐसे समय आता जब वो घर नहीं होते थे।
*अशू एक बार तू खुद उसे डाँट क्यों नही देती?*
*नहीँ भाभी मैने अब सोच लिया है मैं उसे नहीं रोकूँगी।*
*क्यों? ऐसे तो इसकी हिम्मत बढ जायेगी।*
* भाभी एक बात बताऊँ?मैं इसे इस लिये नहीं रोकूँगी कि इसकी एक एक गाली मेरी ताकत बनती जा रही है।जब तक मैं इससे पूरी तरह नफरत नहीं करने लग जाती तब तक मेरा मनोबल टूटता रहेगा। मैने इरादा कर लिया है जितना ये आदमी नीचे गिरेगा उतना ही मै उपर उठती जाऊँगी।* घटिया आदमीैअपनी नापाक हरकतों से जितना नीचे गिरता है,ाच्छा आदमी उस नफरत को ही अपनी ताकत बना लेता है।ाउर उसकी अच्छाई की आग मे ही वो बुरा जल कर खाक हो जाता है। मैं इसे और उकसाना चाहती हूँ ताकि हद से भी नीचे गिर जाये ।अप देखना किसी दिन यही आदमी मेरे आगे नाक रगडेगा। इसने औरत की सिर्फ कमज़ोरी देखी है उसकी ताकत नहीं । वो जितना प्यार करती है उससे कहीं गुना अधिक नफरत भी कर सकती है।*
मैं आशू के मुँह की तरफ देख रही थी क्या ये वही लडकी है?
मैने जरा सा खिडकी मे से देखा--
*अशू वो तलाक के कागज़ ले कर चिल्ला रहा है कि अगर नहीं आयेगी तो ये तलाक के कागज़ साईन कर के भेज दे।* क्रमश:

18 September, 2009

गज़ल
श्री प्राण जी कब से मेरे बडे भाई बने हुये थे । जब से गज़ल सीखने लगी मैने गुरू जी कहना शुरू कर दिया। शायद इसी वज़ह से वो नाराज़् हं कि मुझे ब्लाग पर आ कर आशीर्वाद नहीं दिया । इस लिये आज से मैं उन्हें भाई साहिब ही कहूँगी क्यों की इस रिश्ते को वो बहुत पवित्र और महत्वपूर्ण मानते हैं। तो मैं भी उन्हें छोटी बहन के स्नेह से वंचित नहीं करूँगी ये गज़ल भी उनके आशीर्वाद से ही लिखी है । उन्हों ने इसकी गलतियां सही कर इसे संवारा है। ये गज़ल अपने बडे भाई साहिब श्री प्राण शर्मा जी को समर्पित है आशा है कि वो अपनी छोटी बहन को जरूर आशीर्वाद देंगे।


महक उठा हर कोना तन का
फूल खिला क्या मेरे मन का

भारत माँ की बेटी रहूँ मैं
ख्वाब यही मेरे जीवन का

पल पल रूप तू अपना बदले
फिर क्यों दोश कहे दरपन का

मन मे है पापों की दुरगंध्
तिलक लगाये है चंदन का

माली ही तोडे फूलों को
हाल कहें क्या उस गुलशन का

जीवन है सब खेल तमाशा
कोई हल ना इस उलझन का

पहरे दारो आँखें खोलो
मत इतबार करो दुश्मन का

लोग सभी घायल दिखते हैं
शोर सुने कोई क्रंदन का

15 September, 2009

मेरा ये तीसरा गीत भी मेरे गुरूदेव श्रद्धेय प्राण जी को समर्पित है । इसे भी उनके कर कंमलो़ ने सजाया संवारा है।


मैं बदली सी लहराती हूँ
मैं लतिका सी बल खाती हूँ

मंद पवन का झोंका बन कर
साजन के मन बस जाती हूँ

बन धन दौलत माया ठगनी
मैं मानव को भरमाती हूँ

फूल कली बन कर जब आऊँ
मैं गुलशन को महकाती हूँ

रंग विरंगी तितली बन कर
बच्चों को यूँ बहकाती हूँ

मैं नारी कमज़ोर नहीं हूँ
बस थोडी सी जज्बाती हूँ

मत खेलो मेरी अस्मत से
मैं घर की दीया बाती हूँ

छोड विदेश गये जब साजन
तन्हा मैं अश्क बहाती हूँ

13 September, 2009

गीत
मेरा दूसरा गीत भी मेरे गुरूदेव श्रद्धेय प्राण जी को समर्पित है।जिसे उन्हों ने गलतियां ठीक करके प्रस्तुत करने लायक बनाया।

कंचन जैसा सब का हो मन
खुशियों से महका हो जीवन

धोवो इस को यूँ ही मल मल
उजला सा हो मन का दर्पण

नाथ मुझे अब शरण लगाओ
मेरा तन मन तुझ को अर्पण

पर्यावरण बचाओ बँधू
मत काटो सारे जंगल बन

दुनिया सेक्या ले जाना है
रहना है भाई भाई बन

मुरली धुन सुन मीरा नाची
जन्मों से उसक वो जोगन

मुझ पर भी उपकार करो माँ
करती हूँ तेरा पद वंदन

प्यासी धरा की प्यास बुझे अब
रिमझिम रिमझिम बरसो आ घन

11 September, 2009

गीत
आज ये मेरी 150 वीं पोस्ट जो मेरे श्रद्धेय दुरूदेव श्री प्राण शर्मा जी को समर्पित है
मेरा ये गीत मेरे गुरूदेव श्रद्धेय प्राण शर्मा जी को समर्पित है। गुरू जी ने लिखने के लिये तो गज़लें दी थी मगर मुझ अल्पग्य ने गीत रच दियेौर गुरू जी ने इन्हें संवार कर और मेरी गलतियाँ निकाल कर इन्हें भी सुन्दर बना दिया । उनमे से ये पहला गीत अपके सामने प्रस्तुत करने का आदेश दिया।

मैं गिरधर के घर जाऊँगी
उसकी जोगन बन जाऊँगी

मैं तेरे नाम की प्यासी कृ्ष्णा
अब अपनी प्यास बुझाऊँगी

मन मे मेरे तू ही तू है
तेरे दर्शन को आऊँगी

तू मेरी अर्ज़ सुने न अगर
प्राणों का भोग लगाऊँगी

अब कर लो मेरा वरन प्रभू
मै भटक भटक मर जाऊँगी

तुझ बिन मुझ को ना भावे कुछ्
हर पल ही तुझ को ध्याऊँगी

ये मेरा वादा रहा तुझ से
इक पल न तुझे विसराऊँगी

मुरली को बजाओ फिर कान्हा
मै मीरा बन कर गाऊँगी

तेरे बिन कोई ना मेरा
मै किस घर को जाऊँगी

09 September, 2009

सुनो मेरी वेदना

सूरजमुखी सी
समर्पित्
दिन भर ताकती हूँ
करती हूँ
तेरी किरणो से
अठखेलियाँ
पलकों मे सजा कर
कुछ सपने
तेरे मिलन के
तुझ मे
आत्मसात हो जाने के
मगर तुम निष्ठुर
चले जाते हो फिर भी
नहीं जान पाते
मेरा अनुराग
नहीं देख पाते मेरी वेदना
चाँद भी पिघल जाता है
देखकर मेरा
कुम्हलाया चेहरा
और टपका देता है
कुछ बूँदें मेरी पलकों पर
हे प्राणाधार
सारी रात तेरे इन्तज़ार मे
मेरे आँसूओं से
सुबह तक भीग जाती है
सारी धरती
तुम सुबह आते हो
और हंस देते हो
समझ कर इसे ओ
क्या तुम् 
नहीं जान पाते ?
ये ओस नहीं मेरे आँसू हैं
तुझ से मिलन की
चाह लिये बहाये हैं रात भर्
हे प्राणेश्वर आओ
स्वीकार करो
मेरा समर्पण
और ले जाओ
अपनी दिव्य किरणो मे
आत्मसात कर
दूर अपनी दुनिया मे

07 September, 2009

पिँजरे का दर्द ----
कितनी कोशिश करती हूँ--- बस अब और नहीं मगर फिर भी बेसब्री से सुबह का इन्तज़ार रहता है---- उठते ही खिडकी से झाँकती हूँ--- उस पर नज़र पडते ही जैसे मन को एक स्कून सा मिलता है -- तपती रेत पर बारिश की दो बून्दें ----एक आशा मन मे जागने लगती है---- शायद---- पंख फडफडाता है और चीं चीं करने लगता है जैसे पूछ रहा हो-- मा कैसी हो?-- हाथ उठाती हूँ उसे आशीर्वाद देने के लिये और फिर जलदी से खिडकी की ओट मे हो जाती हूँ---- कहीं मेरी तृ्श्णा फिर से ना सर उठाने लगे---- मेरी आँख नम ना हो जाये वो चाहे कितना ही दूर दूर भागे मगर जानती हूँ मेरे आँसू देख कर आँख उसकी भी नम हो जायेगी ---- कम से कम उसे कोई तकलीफ नहीं पहुँचाना चाहती।---- वो जाते जाते फिर चीँ चीं करता है, जैसे कह रहा हो * अपना ध्यान रखना--- और मैं उदास हो कर अपने बिस्तर पर लेट जाती हूँ---- फिर बुझे से मन से काम मे लग जाती हूँ । काम के बाद फिर से उस खिडकी मे आ कर बैठ जाती हूँ --- एक झलक उसे देखने की चाह मिटा नहीं पाती --- दिखता नहीं है मगर जानती हूँ कि इसी कालोनी के किसी पेड पर बैठा है--- शायद मेरी खिडकी के सामने हो मगर पत्तों मे छिप जाता है देख लेती हूँ उसके पँखों की एक झलक ---- और दिन भार याद करती रहती हूँ उसकी मीठी 2 बातें---- उसका चहकना, उसकी उडान, खाना खाते हुये मुझे भी अपने साथ खिलाने का उसका अन्दाज़ याद कर के आँखें भर आती हैं अपनी चोंच मे रोटी का टुकडा उठा कर खिडकी के पास आ जाता जैसे बुला रहा हो कि मा आप भी खाओ न ! ----
उस दिन मैं खिडकी पर बैठी थी कि अचानक पास की एक डाली पर आ कर चीं चीं करने लगा जैसे पूछ रहा हो आप इतनी उदास क्यों हैं और मुझे अपनी प्यारी प्यारी शरारतों से लुभाने लगा--- और मैं उससे एक दो दिन मे इतना घुलमिल गयी कि मुझे लगा कि मेरे घर मे फिर से बहार लौट आयी है मेरे बच्चों के जाने के बाद ये घर एक दम सुनसान सा हो गया था जिस घर मे हर दम सन्नाटा पसरा रहता वहाँ अब रउनक ही रउनक थी---- फिर एक दिन जब वो खिडकी मे आया मैने उसे बाहर जाने ही नहीं दिया --- खिडकी पर बारीक जाली लगवा दी---- वो घर के कोने कोने मे घूमता--- खुशी से पंख फैलाता और मैं उसके साथ बच्ची सी बनी सारा दिन जैसे हवा मे ुडती फिरती--- कितना खुशनुमा हो गया था जीवन उससे अपने सारे गम कह लेती वो मेरे एक एक पल का साक्षी बन गया था मुझे लगता वो इस दुनिया से अलग है किसी भीड का हिस्सा नहीं ., काश कि ये इन्सान होता। मैं हैरान थी कि मेरे जीवन मे इतनी खुशियाँ कहाँ से आ गयी? अब जीवन मे कुछ नहीं चाहिये इस के सहरे जी लूँगी--- मगर कुछ दिन मे ही जैसे सब कुछ बदलने लगा था -- वो इस घर से उब गया । शायद बाहर बाकी पक्षियों की आवाज़ सुन कर उसे उनकी याद आती थी---- वो खिडकी से बाहर देखते देखते उदास हो जाता --- मैं अन्दर से डर जाती मुझे लगता अब इसके बिना जी नहीं पाऊँगी--- बच्चों की तरह उसे लुभने की कोशिश करती --- शायद अपने घर की जिम्मेदारियों के चलते अपने बच्चों का बचपन भी अच्चे से जी नहीं पाई थी ---- उसी को जीने की चाह ने इसके करीब कर दिया--- एक दिन उसे उदास देख कर मैने खिडकी से जाली उठा दी---- और वो एक पल गवाये बिना उड गया---- बहुत रोई थी उस दिन --- वो मुझे समझाना चाहता था कि कुछ दुनियादारी सीखो --- इतना मोह अच्छा नहीं फिर उसे अभी दुनिया देखनी है सब समझती थी जानती थी मगर समझ कर भी अनजान बनी रही---- कितने दिन रो रो कर उसे आवाज़ लगाती रही मगर उसका दिल ना पसीजा
चाहती हूँ घर बदल लूँ सामने खिडकी पर बैठा हो और मुझ से बात ना करे--- दिल से टीस सी उठती है--- बहुत दर्द होता है--- मगर
मेरे दुख मेरी तन्हाई से उसे क्या लेना उसका अपना जीवन है जब अपने ही अपने नहीं होते तो दूसरे से कैसे अपेक्षा की जा सकती है?--- मगर वो ये नहीं जानता था कि मै उसे इस भीड का हिस्सा नही समझती थी--- और ना ही मैं खुद इस भीड का हिस्सा हूँ---- सीख जाऊँगी धीरे धीरे जीना---- कितने हादसे सहे तब भी तो जिन्दा रही हूँ अब भी रह लूँगी---- कितना मुश्किल होगा जब कि पता हो वो सामने किसी पेड पर बैठा होगा---- अब उसका सुबह पेड पर आना भी एक दर्द दे जाता है, कितना परायापन होता है उसकी चीं चीं मे-- शायद उसे रहम आता है मेरी दशा पर और देखने आता हो कि जिन्दा हूं या नहीं उसके बिना?--- आखिर चाहता तो वो भी मुझे था---- इस बात को कैसे भूल सकती हूँ--- मेरा दिल कहता है|--- वो मेरे पास आ कर एक छोटा सा अबोध बालक सा बन जाता था----- इस का एहसास मेरी ममता ने किया है--- और ममता कैसे झूठ बोल सकती है----- शायद बच्चे उस ममता की मृगतृिश्ना को नहीं समझ सकते--------
जो उधार की खुशी के पल उसने दिये थे उनका कर्ज ज़िन्दगी भर चुकाती रहूँगी--- शायद उधार मे मिले प्यार, और रिश्तों का यही हश्र होता है----- और फिर जब उधार देने वाला पल पल सामने हो--- ओह कितना तक्लीफदेह है ---- आसमान से जब कोई जमीन पर धडाम से गिरता है---- चाहती हूँ खिडकी बन्द ही कर लूँ मगर-- अभी नहीं कर पा रही---- जब तक - ये आँसू सूख नहीं जाते--- पता नहीं कितने जीवन चाहिये इन्हें सूखने मे-- या शायद आशा की एक किरण बचा कर रखना चाहती हूँ---- कभी मन करे तो खिडकी खुली देख कर आ ही जाये या फिर --- बस उसकी एक झलक देखने के लिये ताकि दिन भर तन्हाई मे एक टीस तो साथ हो जिससे उसे महसूस कर सकूँ----- जीने का एक ये भी अंदाज़ है----- मुझे अच्छा लगता है---- पिँजरे का दर्द ऐसा ही होता है--- कोई उसमे है तो भी उसे कैद करने का अपराधबोध ---- उसे आज़ाद होने के लिये तडपते देखना भी तो दर्द देता है----- अगर पिंजरे ने उसे रिहा कर दिया तो भी विरह का दर्द--- उसे तो हर हाल मे दर्द सहेजना ही है------ ।
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05 September, 2009

संवेदनाओं के झरोखे से--संस्मरण गताँक से आगे

उस दिन हम मौसम का आनन्द लेते हुये लेडी डाक्टर से गीत सुन रहे थे।अचानक बडे जोर से हवा चलनी शुरू हो गयी। देखते देखते बदे तूफान का रूप धारण कर गयी सब ओर अन्धेरा छा गया हम सब कमरे मे बन्द हो गए। इतना भयंकर तूफान पहली बार देखा था। अब याद नहीं कि कितनी देर इसका ताँडव चला मगर जैसे ही क्छ थमा हम लोग एमर्जेन्सी मे आ गये। पता था कि इस से बहुत बडी तबाही हुयी होगी। हम लोग एमर्जेन्सी मे सामान तैयार करने लगे । 10 मिनट भी नहीं बीते थे तूफान थमे हुये, कि घायल लोग आने शुरू हो गये। एक घन्टे मे एमर्जेन्सी के अंदर बाहर भीड ही भीड जमा हो गयी आसपास के हिमाचल और पंजाब के गाँव इसी अस्पताल पर निर्भर थे। जो मरीज सब से अधिग गन्भीर हालत मे थे पहले उन सब को अंदर रखा गया सारे स्टाफ को डय़ूटी पर बुला लिया गया। ैतना चीख चिहाडा था कि एक दूसरे की बात सुनना भी मुश्किल था। देखते देखते उन घायलों मे 10 --12 मरीज़ अपना दम तोड चुके थे। बाकी गम्भीर चोटों से चीख रहे थे कुल मिला कर वो दृष्य किसी भी इन्सान को हिला देने के लिये काफी था।

उस समय हमे ये होश नही रही कि हमारे घरों का बच्चों का क्या हुया होगा। मैं तो जैसे जड हो गयी थी मगर उस समय ना जाने कहाँ से इतना साहस आ गया कि झट से हम मरीज़ों को संभालने लगे। उस दिन पहली बार मैने घावों पर टाँके लगाये वो भी पूरे 30। मुझे जरा भी डर नहीं लगा । हाथ कपडे सारा दिन खून से लथपथ रहे 100 से उपर मरीज़ों को राहत दी गयी थी। जो निस्सँदेह स्टाफ की मेहनत के कारण ही हुया था । और मैं खुद को उस दिन धन्य समझ रही थी कि आज मुझ मे सेवा भाव जगा था और उस दिन सोच लिया था कि अब ये नौकरी कभी नहीं छोडूँगी। नहीं तो मैं सोचा करती कि मैं ये काम नहीं कर सकूँगी। मरीज़ के सूई चुभेगी तो दर्द मेरे होगा। उस दिन मैने जाना कि हमारी संवेदनायें मरती नहीं बल्कि दूसरों को राहत पहुँचाने मे हमे शक्ति देती हैं।

हमारे भी घर का बहुत नुक्सान हुया था ।सभी स्टाफ कर्मचारियों के कुछ ना कुछ हुया ही था मगर उन्हें समय नहीं था कि अपने घरों की सुध ले सकते।देखने वाले को जरूर लगता है कि ये लोग पत्थर दिल हैं। और दीदी की वो बात धीरे धीरे वाली याद आ गयी। किसी को देख कर ही संवेदन हीन कह देना कितना आसान होता है। मैं भी तो पहले दीदी को ऐसे ही समझती थी। उस तूफान मे क्या क्या हुया ये बहुत बडी कहानी हो जायेगी। इस लिये इसे यहीं विराम देती हूँ मगर ये बता दूँ कि उस दिन सारा दिन हम लोगों ने कुछ भी खाया पीया नहीं । सुबह आठ बजे से रात के आठ बज गये थे मगर अभी पोस्टमार्टम भी सब का नहीं हुया था लगता था कि आज शायद सारी रात यहीं लगेगी। सारा शहर इन मरीज़ों की सहायता के लिये इकठा हो गया था । मुझे तो अब चक्कर आने लगा था । इतना काम कभी किया ही नहीं था । अब भूख भी बहुत जोरों से लगी थी। हम लोगों ने चाय मगवाई और सुबह के जो समोसे मंगवाये थे वही खाने लगे। बाहर अभी भी 5 लाशें पडी थीं। उस दिन फिर मुझे अपनी वो बात याद हो आयी।जब मैं दीदी को पोस्टमार्टम से आते ही चाय पीते देखा था कि दीदी आप ऐसे कैसे चाय पी लेती हो । मुझे समझ आया कि जिसे मैं संवेदन्हीनता समझ रही थी वो मजबूरी थी ,समय की माँग थी। कितना आसान होता है दूसरों की संवेदनहीनता को चिन्हित करना समझ तभी आती जब खुद उनमे से गुज़रना पडता है।---

फिर भी लोगों मे गुस्सा था कि सब को पूरी सहायता नहीं मिली जब कि सारा स्टाफ अपने घर की परवाह किये बिना काम कर रहा था। अगले दिन अस्पताल के खिलाफ नारे भी लगे। मैं ये नहीं कहती कि अस्पताल मे लापरवाही नहीं होती मगर हर बार उन्हें ही दोशी ठहरा देना सही नहीं है। आप लोगों से भी यही प्रार्थना है कि जब भी आपको ऐसा लगे तो नारेबाजी करने से पहले तथ्य जरूर देख लें कहींिस तरह आरोप लगा कर आप कर्मनिष्ठ कर्मचारियों के साथ अन्याय तो नहीं कर रहे और फिर कई बार क्षुब्ध हो कर कर्मचारी काम के प्रति उदासीन होने लगते हैं।

कुछ दिनो मे ही मुझे महसूस होने लगा कि मैं पहले से भी अधिक संवेदनशील हो गयी हूँ । काम से जब भी समय मिलता किसी ना किसी मरीज के दुख दर्द जरूर सुनती। मेरी ये कहानियां उसी संवेदना की देन है। अभी भी बहुत से पात्र मेरे दिल मे हैं जिन्हें लिखना है। कुल मिला कर कहूँ कि जितनी मुश्किल मेरी ज़िन्दगी रही थी मायके ससुराल मे जवान मौतों के कारण जिम्मेदारियां बढी थी उनका मुकावला शायद मैं इन्हीं संवेदनाओं के कारण कर सकी। ये मरीज़ मेरे दुख सुख के साथी रहे। और मेरे पिताजी मेरे पथप्रदर्श क जिन्होंने कभी मेरे साहस को ढ्हने ना दिया।इसी लिये मेरी सारी रचनायें संवेदनाओं और जीवन के बारे मे ही होती हैं। बस यही है मेरे पास। और भी बहुत से संस्मरण ऐसे हैं जिनसे मैने बहुत कुछ सीखा है फिर कभी कहूँगी।

समाप्त ।

03 September, 2009

संवेदनाओं के झरोखे से--संस्मरण--4

नौकरी छोडने की बात मन मे घर करने लगी थी। अगले दिनो मे भी बहुत कुछ देखा मगर वही दीदी की बात कि धीरे धीरे सब ठीक हो जायेगा । 10 --15 दिन ऐसे ही निकल गये।इस संस्मरण को लिखना तो नहीं चाहती थी मगर इसे लिखने का मकसद इतना है कि सेहत विभाग वालों के प्रति एक आम भावना होती है कि ये लोग बहुत बेशर्म या खुले विचारों के होते हैं या इनकी भाशा को ले कर कई चुटकुले घडे जाते हैं । उस समय भी लडकियों को नर्स का कोर्स करवाना बडे बडे घरों मे सम्मान की नज़र से नहीं देखा जाता था। मुझे भी इस कोर्स के लिये पिता जी मान नहीं रहे थे मगर मेरा बडा भाई अमृतसर मेडिकल कालेज मे ही MBBSकर रहा था जब मुझे MBBSमे दाखिला नहीं मिला तो उसने फार्मेसी करने के लिये पिता जी को मना लिया कि इस मे नर्सों जैसा काम नहीं होता बस दवाओं से ही वास्ता रहता है। इस लिये पिताजी मान गये थे।

मगर इस अस्पताल मे हर जगह डयूटी करनी पडती थी । और हर तरह का काम भी जो मुझे अच्छा नहीं लगता था।मैं बहुत शर्मीली और सीधी सादी लडकी थी। एक दिन एमर्जेन्सी मे केस आया । एक बज़ुर्ग को बैल ने मारा था उसके जननेन्द्री पर बहुत बडा घाव् हो गया जहाँ टाँके लगने थे । जैसे ही डाक्टर साहिब उसे देखने लगे मैं बाहर आ गयी। उनके पास वार्ड अटेन्डेट तो था ही। तभी डा़ साहिब ने मुझे बुलाया और गुस्से मे बोले कि तुम्हारी डयूटी यहाँ है बाहर क्या कर रही ह। तुम्हें पता नहीं कि स्टिचिन्ग करनी है। मैने कहा कि मुझे अभी अच्छी तरह स्टिचिन्ग नहीं आती। तो बोले कि असिस्ट तो करवाना है ।-- तुम्हें ये समझ लेना चाहिये कि यहाँ हम स्त्रि या पुरुष नहीं होते केवल डाक्टर होते हैं जिन्हें बस मरीज का इलाज करना होता है। चलो स्टिच का सामान लाओ। काँपते हाथों से केस असिस्ट करवाया अपने से भी अधिक तरस उस बज़ुर्ग पर आ रहा था जो आँखों पर हाथ रखे स्टिच लगवा रहा था । उस दिन तो पक्का ही सोच लिया कि अब ये सब मेरे बस का नहीं । दीदी ने पूछा कि क्या हुआ है तो मैने बता दिया वो फिर हँसने लगी ---- बस इतनी सी बात? तो इसमे क्या हो गया । ये तो हमारा काम है । तुम नयी हो ना धीरे धीरे सब ठीक हो जयेगा। अब इसमे ठीक होने जैसी क्या बात थी। समझ नहीं आया। आखिर शर्म हया भी तो कोई चीज़ होती है। सच मे ही ये लोग बहुत बेशर्म होते हैं।

दो चार दिन फिर ऐसे ही निकल गये। मेरा मन बिलकुल काम मे नहीं लगता था । मैने दीदी से कहा कि अगर धीरे धीरे सब ठीक ही हो जाना है तो फिर अभी मेरी डयूटी एमर्जेन्सी मे मत लगाओ जब सब ठीक हो जायेगा तब लगा देना। शायद दीदी को मुझ पर तरस आ गया उन्होंने मेरी डयूटी ापने वाले मेडिसिन के काऊँटर पर लगा दी । साथ मे दूसरी फार्मासिस्ट भी थी। वहां का महौल ऐसा था कि कई बा र्दीदी की कोई सहेली आ कर बैठ जाती आपस मे खुल कर बातें करती मुझे वो भी अच्छा नहीं लगता दीदी को इतना तो ध्यान करना चाहिये कि मैं एक अविवाहित लडकी उनके पास बैठी हूँ मगर उनके लिये ये सब बातें आम थी।बिमारी के बारे मे प्रेग्नेन्सी के बारे मे डिलिवरी के बारे मे। इतनी भी बेशर्मी क्या कि आप ये भी ना देखो कि किस के सामने बात करनी है। बाहर इतने लोग खडे होते हैं,कई बातें उनके कान मे भी पडती रहती। अब धीरे धीरे समझ आने लगा था कि इन लोगों का ये रोज़ का काम है इन्हें ना तो ये शर्म की बात लगती है, ना बुरा लगता है। अब बिमार औरतें इनके पास आयेंगी तो ऐसी ही बातें करेंगी। सोचा कि चलो देखा जायेगा जब तक चलता है काम करे जाती हूँ।

एक दिन अपनी भाभी से मैने ऐसे ही मज़ाक मे कुछ कह दिया उनकी प्रेग नेन्सी के बारे मे वो तो मेरे मुह की तरफ देखने लगी--- तुम्हें क्या हो गया आगे तो तुम ऐसी बातें नहीं करती थी । मुझे एक दम झटका लगा ये सब धीरे धीरे का असर था शायद। दो तीन महीने मे मुझे कुछ सहज सा लगने लगा, जो बातें सुन देख कर मुझे गुस्सा आता था वो अब तटस्थ भाव से देख सुन लेती। कई बार सोचती कि अब मुझे गुस्सा क्यों नहीं आता दीदी की बातों पर। शायद अब मैं भी बदल रही थी। उसके बाद कई मौतें हुई एमर्जेन्सी मे । रोने की आवाज़ सुनती तो मन मे दुख तो होता मगर उस तरह से रोना नहीं आता जैसे कि पहले पहले आता था। फिर भी मरीज के रिश्तेदारों को ढाडस बन्धवाना आदि से अपने को रोक नहीं पाती। मगर अब लगने लगा था कि धीरे धीरे कोई चीज़ जरूर है जो इन्सान को पत्थर बना देती है, शायद मैं भी पत्थर बन जाऊँगी ---सब की तरह---
मैं धीरी धीरे कैसे बदल रही हूँ ।

जब ये संस्मरण लिखना शुरू किया था तो लगता था कि छोटा सा ही है म तब इतना ही बताना चाहती थी कि आदमी एक ही जगह एक ही काम करते हुये कैसे उस काम के प्रति और वातावरण के प्रति संवेदनहीन हो जाता है ।मगर अब मुझे लगता है कि जब तक मैं सभी हालात का वर्णन नहीं करूँगी तब तक कैसे समझ आयेगा कि इन्सान को अपने अन्दर आ रहे बदलाव का क्यों पता नहीं चलता। दूसरी बात कि अस्पताल वालों को सब गालियां ही निकालते हैं, कोई उनकी मुश्किलों को क्यों नही समझता । ऐसी बात भी नहीं कि सभी जगह सभी लोग एक जैसे ही होते हैं कई वहाँ भी अच्छी बुरे दोनो तरह के लोग होते हैं मगर ऐसे तो सब जगह ही होते हैं फिर भी अस्पताल वालों की मुश्किलें कोई नही समझता । मेरा अपने लोगों के प्रति दायित्व भी बनता है कि मैं उनकी समस्या को सब के सामने रखूँ ।इस लिये इस आलेख की श्रिंखला को बढाना पडा। शायद आप लोग अच्छे से झील रहे हैं मुझे, इस बात का भी फायदा उठाना चाहती हूँ । सही है या नहीं ये आप बतायें मगर अभी मेर सफर जारी है--- मैं कैसे धीरे धीरे के प्रभाव मे आयी और कैसे निकली। एक सीधी सादी संवेदनशील लडकी कुछ समय के लिये कैसे संवेदनहीन सी बन गयी थी। मगर वो संवेदनहीनता भी नहीं कही जा सकती क्यों कि काम करते हुये खुद को डरपोक या मैदान छोड कर भाग जाने वाली कहलाना भी मुझे अच्छा नहीं लगता था। फिर ऐसे अवसरों पर पिता जी का प्रोत्साहन तो मिलता ही था।

उस दिन कुछ गर्मी अधिक थी। 10 बजते बजते आकाश पर बादल छाने लगे थे। मेरी डय़ूटी एमर्जेन्सी मे थी । साथ मे एक लेडी डाक्टर की डयूटी भी थी। मगर चाय का टाईम भी होने वाला था, तो हम सब लोग OPD मे इकठे हो जाते। डाक्टर कहने लगी कि आज मौसम अच्छा हो रहा है समोसे मगवा लेते हैं। किसी को समोसे लेने भेज दिया। देखते देखते आसमान काला होने लगा। कई मरीज बिना दवा लिये घर भागने लगे। डाक्टर ने बाहर बरामदे मे अपनी कुर्सी रखवा ली और हम लोग भी मौसम का आनन्द लेने लगे।नंगल शहर को नहरों और पहाडों का शहर कहा जाता अस्पताल के सामने पहाड और हरियाली देखते ही बनती है। एक दम ऐसा लगने लगा जैसे रात हो गयी है मन मे हम लोग डर भी गये थे कि बहुत बडा तुफान आने वाला है। OPD पोरी तरह मरीज़ों से खाली हो गयी। शायद डाक्टर ने हमारे तनाव को भाँप लिया था| उन्होंने अचानक हमे एक गीत सुनाना शुरू कर दिया। उनकी आवाज़ इतनी सुरीली थी कि हम लोग उसमे खो गये।

------- क्रमश :

02 September, 2009

सवेदनाओं के झरोखे से--संस्मरण --3


उस दिन मैं घर गयी तो जाते ही लेट गयी। खाना भी नहीं खाया। रह रह कर उस लडकी का चेहरा मेरी आँखों के सामने आ जाता। कैसे होगा उनके घर का गुज़ारा कोई और कमाने वाला भी नहीं । मा भी पढी लिखी नहीं थी उसकी । क्या ऐसे दुख भी होते हैं ---- माँ ने पूछा कि क्या बात है --तो मैने बताया कि आज एक आदमी की मौत हो गयी उसी से मन ठीक नहीं है। माँ भी समझाने लगी कि वह अस्पताल है वहाँ तो रोज़ ही ऐसे केस आते रहें गे तो क्या तू ऐसे ही रोयेगी? चल उठ खाना खा ले, धीरे धीरे सब ठीक हो जायेगा । अभी तूने ये सब पहले कभी देखा नहीं इस लिये। फिर पिताजी आ गये--* मेरी लाडली बेटी को क्या हुया? * मा ने बताया तो मेरे सिर पर हाथ फेरने लगे--- बेटा ये तो ज़िन्दगी की शुरूयात है अब समझो कि ज़िन्दगी शुरू हुई है । दुख और सुख जीवन के दो पहलू हैं आगर दुख ना हो तो सुख का कोई महत्व नहीं रह जाता । मगर यही दुख ज़िन्दगी की पाठशाला है । इन से ही आदमी मे दया, करुणा ,प्रेम क्षमा आदि संवेदनाओं का समावेश होता है। आज जिस तरह तुम मे रहम की भावना का उद्भव हुया है बस इसे समेट लो और हर दुखी के लिये ये भावना जब उपजेगी तो तुम्हें एक अच्छा इन्सान बनायेगी। तुम मे इन को सहन करने की शक्ति विकसित करनी होगी जो समय के साथ हो जाती है बस इतनी सी बात है। अब मन मे ठान लो कि दुखी की सेवा करनी है इसी लिये तुम्हें ये नौकरी मिली है। बात करने का ढंग था। सब कहते कि धीरी धीरे तुम इनकी आदि हो जाओगी मगर आदी होने मे और पिता जी की बातों मे अन्तर समझ आ गया था।
3 - चार दिन आराम से निकल गये । दीदी जब दवा की खिडकी पर बैठी होती तो मैं उनके पास बैठ कर उनके काम करने के तरीके को देखती रहती। हम लोग अन्दर से दरवाज़ा बन्द कर लेते बाहर भीड इतनी होती कि 50--60 मरीज खिडकी पर खडे ही रहते दवाईयाँभे उस समय अस्पताल मे बहुत मिलती थीं । भाखडा दैं का काम जोरों पर होने से शहर की जनसंख्या भी दिन पर दिम बढ रही थी।100 बिस्तर का अस्पताल था मगर 200 से कम मरीज दखिल नहीं रहते बरामदों मे भी अपने बिस्तर ला कर लोग इलाज करवाते थे।

मैं देखती कि दीदी बहुत ऊँचे बोलती हैं और जल्दी जल्दी से मरीज़ को खिडकी से हटने की हिदायत भी देती।लगातार बोलते जाना--- जल्दी करो --लाईन मे आओ--- ये इतने दिन की दवा है --- ये ऐसे खानी है--- इतने इतनी रोज़ खानी है आदि अब दिन मे कम से कम 700 मरीज़ नया पुराना 6 घण्टे मे निपटाना कोई आसान काम नहीं था दो जने भी बहुत मुश्किल से निपटा पाते अगर कोई मरीज़ दूसरी बार कुछ पूछ लेता तो दीदी डाँट देती--- अपना ध्यान इधर रखा करो हम कोई बादाम खा कर नहीं आते कि सारा दिन भौँकते रहें ---- । मुझे बहुत अजीब लगता बेचारे मरीज के मुँह की तरफ देखती रहती। कई मरीज तो लडने पर उतारू हो जाते तो ये समझ नहीं पाती कि कसूर किस क है। कभी मरीज पूरे दिन दवा खा चुका होता तो दीदी कहती जाओ पर्ची रिपीट करवा के आओ तो मरीज कहता कि भीड बहुत है आज दे दो कल करवा लूँगा । दीदी का मूड सही होता तो दे देती नहीं तो डाँट के भगा देती मुझे तब भी बहुत बुरा लगता कोई मरीज़ इतना दुखी होता कि खडा भी नहीं हो पाता वो लाईन से निकल कर दवा लेने आता तो दीदी डाँट देती मुझे बहुत तरस आता मगर दीदी कहती तुम्हें नहीं पता खिडकी पर आ कर सभी ऐसे बन जाते हैं मैं किस किस को देखूँ कि अधिक बीमार है या कम । लाईन मे लगे लोगों की गालियाँ नहीं सुननी मुझे। मतलव कि यहाँ भी मुझे यही लगता कि दीदी मे संवेदनायें मर चुकी हैं उन्हें तो किसी मशीन की तरह बस काम करने का पता है।जब कभी इन बातों पर चर्चा होती तो दीदी का वही पुराना जवाब धीरे धीरे सब समझ जाओगी और तुम भी ऐसी ही हो जाओगी।

इस धीरे धीरी ऐसी ही हो जाओगी मेरी जहन मे इतना घर कर गया कि हर बात पर मैं सोचने लगती कि अगर मैं ऐसी ही हो जाऊँगी तो मैं नौकरी छोड दूँगी मगर पत्थर दिल नहीं बनूँगी। मगर ये बदलाव सच मे इतने धीरे धीरे ही होता है कि इन्सान को पता भी नहीं चलता और वो इस से बचने के लिये अपने पक्ष मे कई बहाने घड लेता है। जैसे बच्चा हर वक्त मा के पास रहता है उसे कब पता लगता है कि किस दिन कितना कद बढा । मशीन की तरह काम करते हुये आदमी मशीन हो जाता है।

तीन चार दिन बाद पुलिस एक व्यक्ति की लाश ले कर आयी जो कि नहर से मिली थी उसका पोस्टमार्टम करवाना था। इस बा र्यहाँ किसी और फार्मासिस्ट की डयूटी थी। मगर दीदी ने कहा कि मुन्नी को भी अब सीखना पडेगा ये सब मैं जाती हूँ और इसे साथ ले जाती हूँ,तुम मेरी सीट देख लो। डाक्टर साहिब तैयार खडे थे। मुझे भी जाना ही पडा। वहाँ मार्चरी मे इतनी दुर्गन्ध आ रही थी मेरा मन खराब होने लगा। सफाई सेवक ने अगरबत्ती जलाई और खिडकियाँ दरवाजे खोले। इसके बाद हम सब लाश के पास खडे हो गये पहली बार इस दृ्श्य को देखा था लाश से दुर्गन्ध आ रही थी सफाई सेवक ने उस पर से कपडा उठाया तो मैं जरा पीछे हट गयी सभी के समने नँगी लाश को देखना अच्छा नहीं लगा। मगर दीदी नी बजू पकड कर साथ खडा कर लिया। सफाई सेवक ने पहले उसके पेट को चीरा और एक एक अंग निकाल कर डाक्टर को दिखाया और उसे जार मे रख्ता गया इस तरह उसने 5-6 जार तैयार किये । डाक्टर ने सभी कुछ नोट किया दीदी ने लाश का माप आदि लिया। मुझे एक दम वोमिट आयी और मैं बाहर भागी। आज तो मन मे पक्का सोच लिया था कि मैं नौकरी नहीं करूँगी। वपिस जा कर दीदी ने फटा फट चाय मंगवाई और साथ मे विसरा पैक करने लगी। वहीं टेबल पर विसरा पडा था और वहीं वो खडे हो कर चाय पी रही थी। मैने कहा दीदी आप बिना नहाये चाय कैसे पीने लगी। लाश के पास हो कर जो आते है वो पहले नहाते हैं फिर खाने की चीज़ को हाथ लगाते हैं, फिर आपने तो लाश को छूआ भी है। दीदी हंस पडी--धीरे धीरे सब जान जाओगी----- अब इसमे जानने की क्या बात है, यही सोचते हुये घर चली गयी मगर जा कर उस दिन भी खाना नहीं खाया गया। उल्टी सी आने को होती रही । नहा कर मैं सो गयी। सोचा शाम को पिताजी से बात करूँगी मुझे ये नैकरी नहीं करनी ये अस्पताल वाले तो निर्दयी और पशूओं जैसे हैं। इन्हें जिन्दा या मरे मे भी फर्क नज़र नहीं आता_।

फिर वही धीरे धीरे सब ठीक हो जाता है----- शायद--- क्या मै भी ऐसी ही हो जाऊँगी-------क्रमश:

01 September, 2009

संवेदनाओं के झरोखे से-2---संस्मरण

पिछले अंक मे घटना का जिक्र किया था कि कैसे लगता है किसी को अपने आस पास के वातावरण के प्रति संवेदनहीन होते देख कर । मैं तो इतनी पत्थर दिल नहीं हो सकती कि पास मे तीन लाशें पडी हों और मै उनके सामने चाय पी लू। मगर् दीदी कहती कि देखना तुम भी असिएए ही हो जाओगी। और उनकी ये बात मैं हमेशा याद करती रहती ताकि मैं भी उस तरह की ना बन जाऊँ। आब बात करती हूँ अपनी नैकरी के पहले दिन से तभी वो सब कह पाऊँगी जो कि मैं कहना चाहती हूँ कि कैसे धीरे धीरेिआदमी मे परिवर्तन आता है अगर वो समय समय पर आत्मचिन्तन ना करे या फिर उसके अपने साथ कोई घटना ना घटे तो वो संवेदनहीन हो जाता है। पहला दिन तो दफ्तर की फारमैलितीज़ पूरी करते हुये बीत गया । उसमे दीदी सारा दिन मेरे साथ रही ।मैने कहा भी कि दीदी मैं करवा लूँगी काम आप अपना काम करें तो उन्होंने कहा --*मुन्नी तुम्हें नहीं पता कि ये कलर्क लोग कितने खराब हैं मैं तुम्हें अकेले दफ्तर मे नहीं भेजूँगी।* उनकी आत्मीयता देख कर मन मे उनके प्रति आदर भाव और बढ गया।

जब मैने डिप्लोमा के बाद 3 माह की practical training उनके पास ली थी तब भी उनके प्रति बहुत आदर था वो सख्ती से जरूर पेश आती मगर हमारे फायदे के लिये ही । वैसे भी उनक रोब पूरी OPD ही नहीं पूरे अस्पताल मे था। इमानदारी,. अपने काम के प्रति निष्ठा ,साफ आचरण बहुत सी ऐसी बातें थी जिन से मैं बहुत प्रभावित थी। मुझे अपनी बेटी की तरह ही समझा और प्यार दिया।उन से सब डरते थे । दफ्तर के बाद हम लोग OPD मे आ गये। उस दिन दीदी ने मुझे काफी काम समझा दिया। उनकी डयूटी दवा के मैन counter पर थी साथ मे एक जुनीयर फार्मासिस्ट थी क्यों कि दीदी को emergency भी देखेनी होती सब फार्मा सिस्ट्ज़ की डयूटी भी लगानी होती थी। पूरी OPD सफाई आदि भी देखनी होती थी।उस समय वहाँ कुल 18 फार्मासिस्ट थे जो कि आम अस्पताल से 3 गुना अधिक थे। female हम तीन थी। उस समय भाखडा डैम् का काम बहुत जोरों पर चल रहा था । अस्पताल भी बहुत बडा था। इसे आज भी मिनी पी जी आई कहा जाता है । क्यों कि इसका खर्च भाखडा बोर्ड ही वहन करता था और दवा और साधनों की कमी नहीं थी। खैर अब पिछली बात पर आती हूँ।

अस्पताल मे आज दूसरा दिन था। पहले दिन तो दीदी के साथ काम समझती रही। अगले दिन मेरी डयूटी एमर्जेन्सी विभाग मे लग गयी ।कुछ दिन के लिये दीदी की डयूटी भी मेरे साथ ही लगी ताकि मैं काम सीख जाऊँ। वैसे मैने प्रेक्टीकल टरेनिन्ग भी यहीं ली थी इस लिये काम तो जानती ही थी। उस टरेनिन्ग के दौरान तो देखा बहुत कुछ था मगर जब ऐसे केस आते तो मैं अकसर दूसरे कमरे मे चली जाती। रोने चीखने की आवाज़ सुन कर बाहर नहीं आती दूसरे कमरे मे ही रोने लगती। मुझे लगता था कि मैं अस्पताल मे नौकरी नहीं कर पाऊँगी। दुख कभी देखा ही नहीं था। खुशहाल बचपन से सीधी इस जगह पर आ गयी थी।

आठ बजे डय़ूटी शुरू ही हुई थी कि एक केस आ गया। सभी उस मरीज के इलाज मे जुट गयी मगर उसे बचा नहीं पाये। मरीज की मौत हो गयी उम्र कोई 40 साल थी ।पहली बार किसी को सामने मरते देखा था। समझ नहीं पा रही थी कि ऐसे कैसे आदमी मर जाता है। उसके साथ उसकी दो बेटियाँ और पत्नि थी। उनकी चीख पुकार सुन कर मैं भी रोने लगी। वहाँ अपने अस्पताल के सब से बजुर्ग डाकटर की डयूटी थी। मुझे रोते देख उन्हों ने मुझे डाँट दिया---* ये क्या तमाशा है तुम डयूटी पर हो । जाओ दूसरे कमरे मे और यहां किसी और को भेज दो।* फिर बाद मे जब सारा काम हो गया और सब लोग उस मृतक को ले कर चले गयी तो डाक्टर साहिब ने मुझे बुलाय और समझाया कि इतने संवेदनशील नहीं होना चाहिये। मैं उनकी बातें सुन कर फिर OPD मे चली गयी वहां जाते ही मेरी फिर रुलाई फूट पडी। इस आदमी की बेटी और पत्नि का चेहरा बार बार आँखों के सामने घूम जाता।

फिर दीदी ने समझाया कि देखो पहले पहले सब के साथ ऐसे ही होता है फिर धीरे धीरे आदत पड जाती है और कह कर वो जोर से हँस पडती---- मुझे मन से अच्छा नहीं लगता क्या धीरे धीरे हमारी संवेदनायें मर जाती हैं? किसी का दुख देख कर हमारी आँखें नम क्यों नहीं होती। तभी तो सभी कहते हैं कि अस्पताल वाले रूखे स्वभाव के होते हैं। उन मे रहम कम होता है आदि आदि। मगर मैं ऐसी नहीं हो सकती। मैं इनकी तरह पत्थर नहीं बन सकती। मुझे लगता है जब मैने ये संस्मरण लिखना शुरू किया था तो बात छोटी सी लगी अब लगता है जब तक इसे पूरी तरह कुछ और दिनों की बातें नहीं कहूँगी तब तक जिन संवेदनाओं की मैं बात करना चाहती हूँ नहीं कर पाऊँगी। इस लिये आपको इसे अभी 1--2 भागों मे और झेलना पडेगा।-----अभी तो शायद भूमिका ही बाँध पाई हूँ अपने असली मुद्दे की।

क्रमश:

31 August, 2009

जीवन के कुछ संस्मरण ---- संवेदनाओं के झरोखे से

जैसे ही बरामदे मे कदम रखा लोगों की भीड देख कर डर गयी एमेरजेंसी रूम तक आते आते पता चला कि एक परिवार की गाडी दुर्घटना ग्रस्त होने से घर के तीन सदस्यों की मृत्यु हो गयी है और तीन लो ग बुरी तरह घायल हैं दो को कुछ कम चोट लगी है । मन दुखी हो गया। रूम मे तीन लाशें पडी थी घायलों को वार्ड मे शिफ्ट किया जा रहा था। सामने ही दूसरे कमरे मे से मेरी सीनियर जिसे मैं दीदी कहती थी उन्होंने मुझे देखा तो आवाज़ दी।
"जी दीदी " मेरी आवाज़ जैसे गले मे अटक रही थी। कभी ऐसा दृश्य देखा ही नहीं था । अभी अस्पताल मे मेरी नौकरी का ये तीसरा ही दिन था।

" मुन्नी,ऎसा करो वार्ड अटेँडेन्ट से कहो कि मरीज़ शिफ्ट करवा के इन शवों को बाहर रखवा दे और 4 कप चाय के ले आये। हाँ साथ मे कुछ खाने के लिये भी।" और डाक्टर ने भी उनकी हाँ मे हँ मिलाई। मैं नयी और उम्र मे उनसे बहुत छोटी थी इस लिये वो प्यार से मुझे मुन्नी कहने लगी थी यूँ भे मैं बहुत पतली दुबली थी और उम्र से छोटी लगती थी उनके बुलाने से अस्पताल के सभी लोग मुझे मुन्नी के नाम से ही बुलाने लगे थे मुझे अच्छा भी लगता था। आज 37 साल बाद भी { आज तक भी शहर मे अधिक लोग मुझे मुन्नी के नाम से जानते हैं किसी की मुन्नी दीदी किसी की मुन्नी आँटी , आगे उनके बच्चों की मुन्नी नानी बन गयी हूँ।} हाँ तो मैं बात कररही थी उस दिन की-----

मैं उनकी बात सुन कर सन्न रह गयी ऐसे मे दीदी यहां बैठ कर चाय कैसे पीयेंगी उनका मन कैसे कर रहा है चाय पीने के लिये \ वो मेरी सोच से बेखबर अपने रजिस्टर पर नज़रें गडाये काम कर रही थी डक्टर साहिब उनके मेडिकल रिपोर्ट तैयार कर रहे थे। वार्ड अटेण्डेण्ट अपना काम करने लगा और मैं बाहर जा कर बरामदे मे खडी हो गयी

वार्ड अटेन्डेंट ने चाय ला कर कप मे डाली और सब के सामने रख दी भीड वार्ड की ओर चली गयी मगर शवों के पास बरामदे मे अभी भी कई लोग खडे थे। एक औरत और एक लडकी बहुत जोरों से रो रही थी। मैं भी उन्हें चुप करवाने की बेकार कोशिश करने लगी और मेरे आँसू रुकने का नाम नहीं ले रहे थे।उस औरत का पति और जवान बेटा मारे गये थे साथ मे डराईवर मारा गया। ऐसा दृश्य देख कर कौन ना रो उठेगा। तभी अन्दर से दीदी की आवाज़ आयी । अंदर आयी तो चाय आ चुकी थी। "लो चाय पीओ" दीदी ने बिना नज़र उठाये कहा।
"दीदी मैं नहीं पीऊँगी।''दीदी ने नज़र उठा कर मुझे देखा---- ''अरे तुम रो रही हो ? अब ये तो रोज़ का काम रहेगा कब तक रोती रहिगी?न चलो चाय पीओ।
"अभी नयी है ना इसलिये अपने आप कुछ दिनो मे आदी हो जायेगी।" डाक्टर साहिब धीरे से मुस्कराये।
ये लोग इतने संवेदन हीन कैसे हो सकते हैं बाह्र तीन लाशें पडी हैं लोग रो रहे हैं और ये लोग मज़े से चाय पी रहे हैं। मन क्षुब्ध सा हो गया
'देखो मुन्नी हम लोग दस बजे से एक टाँग पर खडे हैं सुबह 8 बजे का एक कप चाय का पीया है उसके बाद समय ही नहीं मिला आब तो टाँगे भी काँप रही हैं अगर ये चाय ना पी तो घर तक भी नहीं पहुँचा जायेगा। फिर ये तो रोज़ का काम है ।हम भी अगर इसी तरह रोते रहे तो काम कौन करेगा \पता है जो जख्मी हैं उनकी हालत कैसी थी बहुत कोशिश के बाद उन्हें स्टबल कर पाये फिर खुद डाक्टर साहिब की तबीयत भी ठीक नहीं। चलो चाय पीओ देखना तुम भी एक दिन ऐसी ही हो जाओगी सी ? " खैर मैने चाय दूसरे कमरे मे जा कर वाशबेसिन मे फेंक दी।
मैं सोचने लगी कि सच मे आदमी इतना संवेदन्हीन हो सकता है? कुछ भी हो मैं ऐसी नहीं हो सकती।

बचपन खुशियों से भरा था। दुख क्या होता है जाना ही नहीं था तभी तो कहीं आस पडोस मे जरा सी दुख की बात हो, किसी को जरा सा दुख हो जाये तो आँसू थमने का नाम नहीं लेते थे। दिल पसीज उठता था।
जब अस्पताल मे मेरी नयी नयी नौकरी लगी तो बहुत खुश थी। मैने जिद करके मैडिकल मे दाखिला लिया था । एम बी बी एस मे तो दाखिला नहीं मिला मगर फार्मेसी मे दाखिला ले कर सोचा था कि इसके बाद बी फार्मेसी कर लूँगी। खैर हमेशा इन्सान के चाहने से क्या होता है । डिप्लोमा करते ही 2 माह मे नौकरी मिल गयी और घर वालों को शादी की चिन्ता थी इसलिये आगे ना पढ सकी। घर पर बी ए की तयारी करने लगी।

इस नौकरी को भी मैं अपने लिये वरदान समझती थी। पिता जी कहा करते थे कि वो लोग भाग्यवान होते हैं जिन्हें आजीविका कमाने के साथ साथ लोगों की सेवा करने का अवसर मिलता है। और मैं ये अवसर खोना नहीं चाहती थी इस लिये नौकरी join कर ली। नयी नयी नौकरी थी। बहुत खुश थी। मगर दो तीन दिन मे ही लगने लगा कि ये सफर इतना आसान नहीं है जितना मैने सोचा था।ास्पताल मे तो सब दुखी ही आते हैं । मैं उनके दुख देख कर द्रवित हो जाती और कई बार रोने लगती। अभी पहला दिन ही था मुझे इस अस्पताल मे आये कि एमरजेँसी विभाग मे एक मरीज़ की मौत हो गयी।उम्र कोई 40 वर्श के आस पास होगी।------ क्रमश:
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