मेरी नज़र से देखो---गताँक से आगे----कहानी
अनु-------- और वो अचानक अनुजी से अनु पर आ गया था------ मैं फिर असहज हो गयी----- मैं तुम्हरे दुख को समझ सकता हूँ----तुम्हारी भावनाओं की कद्र करता हूँ---महसूस कर सकता हूंम------मैं जानता हूँ कि मुझे देख कर तुम्हें सुमित की याद आती है------- बीते दिनों की यादें------मगर क्या करूँ मैं कितना दुखी हूँ----शायद तुम नहीं समझ सकती------- सुमित ने मुझे आँखें दे कर इस घर से बाँध दिया है------ उसकी आँखें उसके परिवार को ना देखें उसके माँ-बाप को ना देखेंतो ये अपराधबोध मैं सह नहीं सकता------ वरुण के लिये कितने सपने थे इन आँखों मे------ फिर इन आँखों के सपनों का क्या करूँ-------मेरी बातों का बुरा मत मनना मैं किसी परिस्थिति का कोई अनुचित लाभ उठाना नहीं चाहता------- मैं बस ये जानना चाहता हूँ कि क्या तुम इन आँखों के सपनो क्प छीन लेना चाहती हो?------क्या तुम्हें अच्छा नहीं लगता कि मैं उसकी इच्छा पूरी करूँ------ तुम क्यों मुझ से बात करना नहीं चाहती----हम इकठे कितना चहका करते थे-------- ऐसा तो नहीं कि तुम पहले मुझ से बात नहीं करती थी------ बल्कि सुमित से भी अधिक हम दोनो बातें करते थे----- हँसते खेलते थे------- फिर इन आँखों ने क्या कसूर कर दिया-------
नहीं---- सुजान ऐसी कोई बात नहीं है ---तुम समझते क्यों नहीं ------- सुमित के बिना कुछ भी अच्छा नहीं लगता---
सुमित की आँखे?------क्या ये भी नहीं------ सुजान एक दम मेरी आँखों मे झाँक रहा था-------
मै सामने दरिया की ओरे देखने लगी------- सुजान सामने दरिया मे उठती लहरों को देख रहे हो?------ागर ये दरिया के किनारे तोड कर् बाहर बहने लगेंगी तो तबाही मचा देंगी-----सच कहूँ तुम से बात करते हुये मुझे तुम से नहीं इन आखों से डर लगता है------
अगर इन लहरों को मजबूत किनारों से बाँध दिया जये तो ये शाँत दरिया मे बहने लगेंगी------- तुम्हें पता है मम्मी पापा तुम्हारे और वरुण के लिये कितने चिन्तित रहते हैं------- वो तुम से खुल कर कोई बात नहीं कर सकते------- सच कहूँ तो उन्होंने मुझे सुमित की जगह स्वीकार कर लिया है-------क्या तुम ऐसा नहीं कर सकती-----
ये क्या कह रहे हो-------क्या तुम नहीं जानते कि सुमित के बाद मै ाउर वरुण ही मम्मी पापा का सहारा हैं----- मैं उन्हें छोड दूंम्गी ये तुम ने कैसे सोच लिया-------मैं उसकी बातों से कुछ विचलित सी हो गयी थी--------
ये मैने नहीं सोचा मम्मी पापा ने सोचा है---------वो चाहते हैं कि तुम वरुण और उन की खुशी के लिये मुझ से शादी कर लो तो उनकी चिन्ता समाप्त हो जायेगी और इस तरह हम सब एक ही घर मे इकठे रह लेंगे--------
सुजान बस करो मैं ऐसा सोच भी नहीं सकती------सुमित के बिना कुछ भी नहीं ------
मै कब कहता हूँ कि तुम उसके लिये ना सोचो----बल्कि तुम ऐसे सोचो कि जिन आँखों मे तुम्हारी तस्वीर रहती थी वो तुम्हारी इस बेरुखी से आहत नहीं होंगी------- ये आँखें तुम्हारे इन्तज़ार मे बैठी हैं---- मान लो अगर इसके विपरीत आज मेरी आँखें सुमित् के लगी होती तो क्या तुम इन आँखों मे ना देखती------ तुम्हें मुझ से डर नहीं लगता तो फिर इन आँखों से क्यों ----- वो मेरा दोस्त ही नही--- मेरी जान था--- आज जहान भी वही है मेरा----- मैं और तुम मिल कर उसे याद किया करेंगे दुख बाँट लिया करेंगे ---सब जिम्मेदारियां मिल कर निभा सकेंगे --मै तुम्हें एक दम फैसला लेने को नहीं कहता----तुम नहीं चाहती तो कोई बात नहीं मगर सहज व्यवहार तो करो मुझे क्यों सज़ा देती हो-------मुझे इस दर्द से मुक्त करो-----कहते कहते सुजान रो पडा-------
मैं चाय बना कर लाती हूँ----- मैं रसोई मे चली गयी------चाय का पानी खौल रहा था मगर मेरा दिल बेचैन हो रहा था सोच मे खडी रही-------
खैर चाय बना कर बालकनी मे आ गयी
खामोशी ----- बाहर खामोशी मगर दोनो के दिल मे आँधियाँ चल रही थी------ सुजान किनारे मजबूत करना चाहता था-----मगर मैं इन आँखों से डर रही थी----- कैसे बताऊँ सुजान को कि इन आँखों मे झाँकने की उस की कितनी तमन्ना है-----वो तो आँख खुलते ही सुबह पहले इन आँखों मे झाँका करती थी------ जब से इस घर मे आयी थी ----ेआज भी मन होता है------- मगर-------
क्या तुम्हें इन आँखों को देखने की चाह नहीं होती----- अचानक जैसे सुजान ने मेरी चोरी पकड ली थी मेरे दिल की बात जान ली थी------- शायद्
अच्छा तो मैं चलता हूं----- मै यहां इस समय इस लिये आया था कि पापा चाहते थे कि मै तुम से बात करूँ------ वरुण की ज़िन्दगी-------- शहीद बेटे के माँ बाप का सकून------ जो उन्हें ये आँखें देख कर मिलता है--------इन सब के लिये तुम कुछ कर सकती हो मै कर सकता हूँ-------- मै किसी और लडकी से शादी कर के पता नहीं ये जिम्मेडारियाँ निभा पाऊँगा कि नहीं ----- और फिर लोगों को बातें बनाते देर नहीं लगती-------- मैं नही चाहता कि कल को लोग मेरे यहाँ आने पर उँगली उठायें ------ सोच लो फैसला तुम्हारा है अगर फिर भी तुम्हारी ना है तो मैं कहीं दूर चला जाऊँगा-------- कहते हुये सुजान बाहर निकल गया-------
क्या सोचूँ मै------- सुमित तुम कहाँ हो-------- आँखें बह रही थी-------- इस दरिया की तरह----- सुजान ठीक ही तो कहता है सब का सपना टूट जायेगा-------- मम्मी पापा ने तो सुजान की आँखों मे सुमित को पा लिया हओ इसके जाने से वो टूट जायेंगे------- मैं----- हाँ मुझे भी तो सुजान का जाना अच्छा नहीं लगेगा--------कैसे देख पाऊँगी इन आँखों को---
धीरे धी दिन चल रहे हैं-------शाँत हूँ इस दरिया की तरह उसने इस दान से कितने जनों को जीने की राह दिखाई है और मै उसके इस दान को शर्मिन्दा करने जा रही हूँ-------- इस घर को इन आँखों की जरूरत है-------
सुजान रोज़ उसी तरह आता है------- वरुण से खेलता है------- मैं छुप छुप कर उन आँखों को देखती हूँ----वही चमक------वही कशिश् ------- दिल धडक उठता है------ सब की कोशिश रहती है कि जब सुजान आये तो मै उन सब के बीच बैठूँ -------- हाँ सच कहूँ अब मुझे भी उन आँखों का इन्तजार रहता है--------
एक दिन मम्मी पापा बाज़ार गये थे------दिन के 11 बजे थे पापा पैटोल पँप चले गये और मै वरुण को सुला रही थी--------
क्या कर रहे हैं माँ बेटा------- असमय सुजान की आवाज़ सुन कर मै चौँक पडी-------वरुण सो गया था उसे लिटा कर मै बालकनी मे सुजान के पास आ कर खडी हो गयी-------
आज इस वक्त कैसे आयी------- मैने धीरे से पूछा -------
क्या अब इस घर मे आने के लिये मुझे इजाज़त लेनी पडेगी-------- सुजान हंसा
नहीं नहीं ---मैने सोचा कोई काम है-------
बैठौ ------- शुक्र है मुझे देख कर कुछ सोचने भी लगी हो-------- उसने मेरी आँखों मे देखा------ अनु तुम कुछ भी कहो----- मगर ये आँखें तुम्हारी अन्दर तक झाँक लेती हैं------- ये जानती हैं कि तुम चोरी चोरी इन्हें देखती हो----- उसकी नज़र मेरे चेहरे पर थी------
हाँ सुजान------- सुमित शायाद इसी लिये इन्हें तुम्हें दे गया कि मैं इन्हें देख कर जी सकूँ------- उसके होने का एहसास पा सकूँ------- मगर मुझे डर है कि क्या मै तुम से इन्साफ कर पाऊँगी----- तुम मे सुमित को पा सकूँगी-----
अरे सुमित को क्यों भूलेंगे हम दोनो मिल कर उसे ज़िन्दा रखेंगे-------वैसे भी शहीद हो कर अमर हो गया है वो------
हाँ शायद सच कहता था सुमित कि ------ अनु ये आँखें तुम्हें जीनी की शक्ति देंगी ---- इन आखों से तुम्हे बाँध रखूँगा------- और मैने अपना हाथ सुजन के हाथ पर रख दिया------
धूप मे लहरों पर किरणो का नृ्त्य ------झिलमिल करता दरिया---उछलती कूदती लहरें किरणो से गले मिलती----- और दरिया मे हलचल मचा देती------- आज आसपास के पेड फिर से झूमने लगे थे----- इन आंखों ने मेरे दिल मे हलचल मचा दी थी------- वो लौट आया है------ जिन्दा है------ और मै बहे जा रही थी दरिया के साथ साथ ------ समाप्त्

