28 May, 2009

तुम थे हम हैं
जीत उसकी नहीं जिसने किसी को ठुकराया
जीता वो जिसने हार कर भी ना इमान भुलाया

वो तुम थे जो मेरी नज़र से दुनिया देखा करते थे
अज मेरे सामने हो कर भी दुनिया को देख रहे हो

वो तुम थे जो मेरी जरा सी चुभन से रो देते थे
आज भी तुम हो जो जिगर मे तीर चुभो कर हंसते हो

वो तुम थे जो मेरी साँस से अपनी नब्ज़ देखा करते थे
आज भी तुम हो जो मेरी टूटी साँसों से राहत ले रहे हो

इस फर्क को समझो तो जीत इमान की हुई
तुम कभी हुअ करते थे हम अब भी वहीं हैं

27 May, 2009

( बाल कविता )

बिटिया रानी
आसमान से उतरी है वो
ज्यों परियों की रानी
ठुमक ठुमक कर चलती है वो
जैसे गुडिया जापानीAlign Center

छोटी सी वो गोल मटोल
प्यारे मीठे उसके बोल्
बातें करते तुतलाती है
फिर मँद मँद मुस्काती है

हँसे खेले धूम मचाये
है वो बडी सयानी
जब खाने की बारी आये
तो करती है मनमानी

दाल भात उसे ना भाये
फल सब्जी से मुँह चुराये
जब देखे वो दूध की बोतल
झट से पुस्सी कैट बन जाये

हँसती है वो फूलों जैसे
कलियों जैसे मुस्काती है
नयी शरारत कर के वो
बुलबुल से इतराती है

नेट पर देख के नाना नानी
उसकी प्यारी सी अदायें
सात समन्दर पार वो बैठे
देख उसे बहुत हर्षायेँ

मम्मी की वो लाडली
पापा की है मानो जान
ऐसी प्यारी से बेटी को
सब खुशियाँ देना भगवान

बच्चो दूध मलाई खाओ
फल सबजी से ना मुँह चुराओ
अगर अच्छा होगा खान पान
तभी बनोगे तुम महान

26 May, 2009

( कविता )

तुझे ढूँढाते रहे
तेरे साथ दिवाली थी घर आँगन क्या
मेरे दिल के दिये भी जलते रहे
तेरे बाद दिवाली पे किसी कोने में
इक छोटी सी किरण को तरसते रहे

तू मेरे घर का चिराग था
तेरे दम से था ये घर रोशन्
तेरे बाद जरा सी खुशी के लिये
दूसरों का मुँह तकते रहे

तेरे देश मे दिवाली पे
यूँ दिये जलते नहीं क्या
हम उठा के मुँह सारी रात
आसमाँ मे तेरा घर ढूँढते रहे

ऎ खुदा इक माँ पे तो रहम खाया करो
उसके चिराग को दिवाली पे तो जलाया करो
इसी इन्तज़ार मे अंधेरी ज़िन्दगी के
सहकते से पहर कटते रहें

24 May, 2009


( कविता )

जड
धरती के अन्दर
आँख खोलते ही
वो इठलाती है
बाह्यें फैलाती है
और गर्व से
फूल जाती है
कि उस से ही है
पेड का जीवन
पर उसका अपना
वज़ूद क्या है
आसमान से कम
क्या होगा!
बाहें पसारती है
फल फूल पत्तों से
खुद को सजाती
संवारती है
फिर इन्तज़ार करती है
कोई आयेगा उसे सराहेगा
उसके गुण गायेगा
हाँ बहुत लोग आते हैं
फूलों की महक
फलों के स्वाद्
पत्तों की घनी छाया के
गीत सुनाते हैं
मंदिरों तक मे यही
पूजे जाते हैं
और वो धरती मे
सिकुडी सिमटी
पेड का बोझ उठाये
जमीन से बाहर आने को अधीर
क्यों बोझ उठाये
क्यों अपनी आज़ादी गंवाये
तभी कहीं से आती है
एक आवाज़
जड़ है तो पेड है
बस इतने मे ही
पा लेती है अपना अस्तिव
जब हो जाता है ये बोध्
तब अपना कर्तव्य्
नही लगता बोझ
औरये जड माँ है
वो है तो जहाँ है

22 May, 2009

( कविता )

मृ्ग अभिलाशा
हम विकास की ओर !
किस मापदंड मे?
वास्तविक्ता या पाखन्ड मे !
तृ्ष्णाओं के सम्मोहन मे
या प्रकृ्ति के दोहन मे
साईँस के अविश्कारों मे
या उससे फलिभूत विकरों मे
मानवता के संस्कारो मे
या सामाजिक विकरों मे
धर्म के मर्म या उत्थान मे
या बढ्ते साम्प्रदायिक उफान मे
पूँजीपती के पोषण मे
या गरीब के शोषण मे
क्या रोटी कपडा और मकान मे
या फुटपाथ पर पडे इन्सान मे
क्या बडी बडी अट्टालिकाओं मे
या झोंपड पट्टी कि बढती सँख्याओं मे
क्या नारीत्व के उत्थान मे
या नारी के घटते परिधान मे
क्या ऊँची उडान की परिभाषा मे
या झूठी मृ्ग अभिलाषा मे
ऎ मानव कर अवलोकन
कर तर्क और वितर्क
फिर देखना फर्क
ये है पाँच तत्वोँ का परिहास
प्राकृ्तिक सम्पदाओँ का ह्रास
ठहर 1 अपनी लालसाओँ को ना बढा
सृ्ष्टि को महाप्रलय की ओर ना लेजा




21 May, 2009

रोई (ग़ज़ल)

याद आई भूली दास्ताँ कोई
दिल रोया पलकों की जुबाँ रोई

जब भी जली अरमानों की चिता
ज़िन्दगी बन के धूआँ रोई

कभी काँटा लगा डाली से
कली सरे गुलिस्ताँ रोई

देख कर तेरी बेरुखी ज़ालिम
सिर छुपा के गिरेवाँ रोई

अँधेरों से बहुत डर लगता है
देख कर चाँद मेहरवाँ रोई

बेशक बेवफा तू भी नहींहै
तकदीर भर आसमाँ रोई




20 May, 2009

मुझे निभाना है प्रण ( कविता )

जीवन मे हमने
आपस मे
बहुत कुछ बाँटा
बहुत कुछ पाया
दुख सुख
कर्तव्य अधिकार
इतने लंबे सफर मे
जब टूटे हैं सब
भ्रमपाश हुये मोह भँग
क्या बचा
एक सन्नाटे के सिवा
मै जानती थी
यही होगा सिला
और मैने सहेज रखे थे
कुछ हसीन पल
कुछ यादें
हम दोनो के
कुछ क्षणो के साक्षी1
मगर अब उन्हें भी
तुम से नहीं बाँट सकती
क्यों कि मै हर दिन
उन पलों को
अपनी कलम मे
सहेजती रही हूँ
जब तुम
मेरे पास होते हुये भी
मेरे पास नही होते
तो ये कलम मेरे
प्रेम गीत लिखती
मुझे बहलाती
मेरे ज़ख्मों को सहलाती
तुम्हारे साथ होने का
एहसास देती
अब कैसे छोडूँइसका साथ्
अब् कैसे दूँ वो पल तुम्हें
मगर अब भी चलूँगी
तुम्हारे साथ साथ्
पहले की तरह्
क्यों की मुझे निभाना है
अग्निपथ पर
किये वादों का प्रण

19 May, 2009

अब और तब ( कविता )

तब रिश्ते
अग्नि के चारों ओर
फेरे दे कर
तपाये जाते
प्रण ले कर
निभाये भी जाते
सात जन्मों तक
जबकि
कई बार
रिश्तों मे
एक पल निभाना भी
हो जाता है कितना कठिन
पर निभते थे ताउम्र 
समय कितना 
बदल गया  
तभी तो आजकल
रिश्ते कागज़ पर
लिखाये जाते हैं
अदालत मे और
बनाये जाते है
वकील दुआरा
अब कितना आसान हो गया
रिश्ते को तोड्ना
कागज़ पर कुछ
शब्द जोड्ना
बन्धन से आज़ाद
और हो जाना

17 May, 2009

कविता


बस जीना है


जीवन के सागर मंथन मे
नारी ने क्या पाया
उसके हिस्से तो बस
विष ही आया
फिर भी जीवन से
डरती नही
मरती नही
क्यों कि
माँ न यही सिखाया
जब रिश्तों की
गठरी को थमाया
फर्ज़ों का सँदूक दिया
खुद से ज़ुदा किया
वो तब भी नही घबराई
फिर से दुनिया बसाई
उमडती घुमड्ती
सपने सँजोती
आशा के मोती पिरोती
जीवन के यथार्थ से टकराती
जब थक जाती
आँखों से तकदीर टपकाती
डरती नही
और ना मरती है
हारती तब है जब्
ये सृ्ष्टि की रचयित
अपनी ही रचना दुआरा
ठगी जाती है
ठुकराई जाती है
पर वो अपने कर्तव्य् को
तब भी नही भूलती
इस सत्य को जानते हुये
कि अगर वो
इस विष को
अमृ्त नही बना पायी
तो वो अपने रचयिता को
क्या मुँह दिखलायेगी
क्यों कि वो जानती है
अपनी रचना दुआरा
रचयिता को
ठगे जाने का दुख
फिर भी
चलती है जीती है
और ये विष पीती है

14 May, 2009


क्या पाया


ये कैसा शँख नाद
ये कैसा निनाद
नारी मुक्ति का !
उसे पाना है अपना स्वाभिमान
उसे मुक्त होना है
पुरुष की वर्जनाओ़ से
पर मुक्ति मिली क्या
स्वाभिमान पाया क्या
हाँ मुक्ति मिली
बँधनों से
मर्यादायों से
सारलय से
कर्तव्य से
सहनशीलता से
सहिष्णुता से
सृ्ष्टि सृ्जन के
कर्तव्यबोध से
स्नेहिल भावनाँओं से
मगर पाया क्या
स्वाभिमान या अभिमान
गर्व या दर्प
जीत या हार
सम्मान या अपमान
इस पर हो विचार
क्यों कि
कुछ गुमराह बेटियाँ
भावोतिरेक मे
अपने आवेश मे
दुर्योधनो की भीड मे
खुद नँगा नाच
दिखा रही हैँ
मदिरोन्मुक्त
जीवन को
धूयें मे उडा रही हैं
पारिवारिक मर्यादा
भुला रही हैं
देवालय से मदिरालय का सफर
क्या यही है तेरी उडान
डृ्ग्स देह व्यापार
अभद्रता खलनायिका
क्या यही है तेरी पह्चान
क्या तेरी संपदायें
पुरुष पर लुटाने को हैँ
क्या तेरा लक्ष्य
केवल उसे लुभाने मे है
उठ उन षडयँत्रकारियों को पहचान
जो नहीं चाहते
समाज मे हो तेरा सम्मान
बस अब अपनी गरिमा को पहचान
और पा ले अपना स्वाभिमान
बँद कर ये शँखनाद
बँद कर ये निनाद्

13 May, 2009


मिड -डे मील

पुराने से फट से टाट पर
स्कूल के पेड के नीचे
बैठे हैं कुछ गरीब बस्ती के बच्चे
कपडों के नाम पर पहने हैं
बनियान और मैले से कछे
उनकी आँखों मे देखे हैं कुछ ख्वाब
कलम को पँख लगा उडने के भाव
उतर आती है मेरी आँखों मे
एक बेबसी एक पीडा
तोडना नही चाहती
उनका ये सपना
उन्हें बताऊँ कैसे
कलम को आजकल
पँख नही लगते
लगते हैँ सिर्फ पैसे
कहाँ से लायेंगे
कैसे पढ पायेंगे
उनके हिस्से तो आयेंगी
बस मिड -डे मीळ की कुछ रोटियाँ
नेता खेल रहे हैं अपनी गोटियाँ
इस रोटी को खाते खाते
वो पाल लेगा अंतहीन सपने
जो कभी ना होंगे उनके अपने
वो तो सारी उम्र
अनुदान की रोटी ही चाहेगा
और इस लिये नेताओं की झोली उठायेगा
काश्1 कि इस
देश मे हो कोई सरकार
जिसे देश के भविश्य से हो सरोकार्

11 May, 2009

मुझे गज़ल लिखनी नही आती कोशिश की है अगर इस पर प्रतिक्रिया देते समय कोई मुझे इसमे गलती बतायेगा तो मुझे बहुत खुशी होगी उसका उपकार्र मानूँग क्या कोई मेरी कलम को प्रेरित कर्ने और दिशा देने की कृ्पा करेगा?

गज़ल

बुज दिली कहो या कहो तकदीर
लाँघ सकी ना हाथ की एक लकीर

दूर नहीं था सुन्दर सा सपना
पर साथ नहीं थी मेरी तकदीर

परँपरा के कर्ज़ चुकाते ढोते
रह गये दिल के हम फकीर

इतिहास पढा था बचपन मे
पढी थी उसमे एक तहरीर

लाँघने वाले प्रेम के दरिया
चढ गये भेँट कई राँझे ही्र

दिल रोता है आँखेँ रोती हैँ
दिल मे रहती उसकी तसवीर

उसने भी मुड कर ना देखा
ना सोची समझी कोई तदबीर

शायद देना चाहता हो दर्द मुझे
सालता रहे मुझे मेरा जमीर

10 May, 2009

बचपन की याद

आँगन की बौराई बेरी ने
ऐसी कसक जगाई है
बच्पन की कोई याद मुझे
फिर गाँव खींच ले आई है

दस बीस घरों का होता एक दालान
सब् रहते वहाँ इक परिवार समान
दादा ताया चाचा भाई
दादी बूआ चाची ताई
एक आँगन मे बिछती थी
सब की इकठी चारपाई
बारी बारी सब कथा सुनाते
नकलें उतारते खूब हंसाते
दुनिया भर की बातें बताते
आज़ादी का इतिहास सुनाते
वो बीते पल ही
जीवन की सच्चाई है
बचपन की-------------------------
ये गलियाँ वो बाग बहार
दादी बूआ का लाड दुलार
खेलना कूदना धूम मचाना
बारिश की बूँदो मे
किलकारियां मार नहाना
फिर तलाब मे तैर घडे पर
उस पार निकल जाना
बरसों उसकी एक एक बूँद
आँखों से बर्साई है
बचपन की----------------------------
वो सखियाँ वो झूले
कुछ कोमल एह्सास ना भूले
लुकन मीटी छू छुपाई
गीटों से वो पूर भराई
कभी हारना कभी हराना
कुछ खोना कुछ पाना
तोड बेर जामुन अमरूद खाना
फिर सावन के झूलों पर
सपनों के गीत सुनाना
आज उस झूले की बल्ली
किसने काट गिरायी है
बचपन की--------------------------------
बचे हुये कुछ लम्हों क
इन यादों मे बिताना चाहती हूं
बचपन की सखियों के संग
आज बतियाना चाहती हूँ
पर उनकी दूरी की पीडा
दर्द बन उभर आई है
अपनी लाचारी पर
आँख मेरी भर आई है
जीवन की इस संध्या मे
ये कैसी रुसवाई है
बचपन की कोई याद आज
मुझे गाँव खीँच ले आई है

09 May, 2009

इंद्र धनुष

रोज़ कितने वायदे करते
कसमे खाते
तुम कहते
जो चाहोगी
ले आऊँगा
मै केहती
तारे तोड लाना
इन अंतहीन वायदों मे
भूल जाते एक वायदा
पल पल साथ निभाने का
इंद्रधनुष की चाह मे
चल देते विदेश
मुझे छोड कर
घर
और छूट जाते
जीवन के कुछ
सुहाने पल
जवानी के
हसीन ख्वाब
प्रिय छोडो अब
इस मृ्गतृ्ष्णा को
क्यों ये पल भी गवायें
जो पास है उसे
क्यों ठूकरायें
आओ
अपने छोटेसे
घर की
छत के नीचे
एक दूसरे की
बाहों मे
अपनी साँसों के
इंद्रधनुष
महका लें
इस छोटे से जीवन के
बाकी पल
अपने बना लें

30 April, 2009

नेता

राजनीति के भंवर मे सब नेता बन गये हैं
इस देश के निर्माता अभिनेता बन गये हैं
महिलाओं की आज़ादी के भाषण कूटते हैं
चौरास्ते पर उनकी इज्जत लूटते हैं
गरीबों की भलाई के लिये क्या नही करते
उनके नाम की ग्रांट से अपनी जेबें भरते
भ्रष्टाचार खत्म करने की कसमे खाते हैं0
बेईमानी की गंगा मे दिन रात नहाते हैं
जो सच्चा इनसान हो उससे तो कतरातेहैं
वो काम कराने जाये तो उसे डराते है
काम कराना हो इनसे तो नेतगिरी दिखलाओ
विपक्षी की निन्दा करो इस नेता के गुण गाओ

25 April, 2009

माँ की पुकार

बेटी जब से ससुराल गयी है
मेरी सुध ना किसी ने जानी ह
दिल मै उसकी यादें हैं
और आँखों मे पानी है
सुनसान है घर का कोना कोना
जहाँ गूंजते थे उसके कहकहे
ना घर की रोनक वही रही
ना दिवरों के रंग ही वो रहे
पापा तेरे इक कोने मे
चुपचाप से बैठे रहते हैं
याद तुझे कर कर के बेटी
उनकी आँख से आँसू बहते हैं
समाज बनाने वलों ने
ये कैसी रीत बनाई है
माँ के जिगर के टुकडों की
दुनिया दूर बसाई है
दिल करता है तुझे बुलाऊँ
पर तेरी भी है मजबूरी
पर तेरे बिन प्यारी बेटी
तेरी माँ है बडी अधूरी
जब भी घर के पिछवडे से
गाडी की सीटी सुनती हूँ
इक झूठी सी आशा मे बेटी
तेरे पाँव की आहट सुनती हूँ
आओ जीते जी कुछ बातें कर लो
फिर कौन तुझे बुलायेगा
आज इस घर मे मै रोती हूँ
फिर ये घर तुझे रुलायेगा
माँ बेटी के रिश्ते की
दर्द भरी कहानी है
माँ बिना फिर कैसा मायका
सब रिश्ते बेमानी हैं

17 April, 2009


( कविता )

आत्मा की आग
यूँ तो किसी ना किसी आग को
मेरी आत्मा
सदियों से सवीकार रही है
तडप उठती
यदा कदा
मगर अब चीतकार रही है
क्योंकि
ये आग
मिलन की नहीं
विछोह की नही
कुछ पाने की नहीं
कुछ खोने की नही
ये आग
कर्मठ की
अक्रमण्यता से
इन्सान की हैवानियत से
नेताओं के फरेब से
शहीदों की आत्मा से रिसते घाव से
साधूयों सन्तों के ऐश्वर्य
ए.सी आश्रम ए सी गाडियों से
राज्यवाद भाषावाद जातिवाद
और भ्रष्टाचार से
मेरे दिल मे सुलगी है
मेरी आत्मा पुकार रही है
हे गाँधी, हे नहरू
हे भगतसिह राजगुरू
हे आज़ाद हे पटेल
कहाँ हो?
फिर धरती पर आओ
अपने उतराधिकारी शासकोंसे त्रस्त
देशवासियों को बचाओ
इन्हें राष्ट्र प्रेम की
पाँचवीं पास तो कराओ
नहीं तो ये आग
पता नहीं क्या गुल खिलायेगी
जनता अब नहीं सह पायेगी
अब तो जनता
नेताओं पर
जूते भी बरसाने लगी है
देश भगतों की याद
सताने लगी है
आओ जलदी आओ
मेरी आत्मा की आग बुझाओ

15 April, 2009

श्रीमती प्रकाश कौर जी की एक कविता [माँ] मैने अपने पंजाबी ब्लोग पंजाब दी खुश्बू पर पोस्त की थी गलती से वो मेरे वीरबहुटी ब्लोग पर भी प्रकाशित हो गयी थी 1 अर्शजी और श्री. रूपचन्द शास्त्री मंयक जी ने उसका हिन्दी अनुवाद करने के लिये कहा मैने प्रयास किया है पर कई बार भाषा के कुछ शब्द कवित की सुन्दरता को चार चाँद लग देते हैं फिर भी उसे कहने की कोशिश की है-----

माँ

मायका अब मुझे घर नहीं लगता
घर होते हैं माँ के साथ
माँ बिना अब कैसा मायका
झूठा मान भाईयों के साथ

कौन मेरा अब सिर मुँह चूमे
भींचे कौन प्यार के साथ
कौन सुनेगा दिल के दुखडे
लाड और मल्हार के साथ

माँ के पास तो बहुत समय था
दुख और सुख सुनाने को
पर मेरे पास समय नही था
उसके साथ बिताने को

दिल भर बातें कभी ना की
सदा तुझे तडपाया माँ
रात तेरे पास रहने का
नया बहाना बनाया माँ

तेरी गोद तो वो चुंबक थी
जिस से सारे जुड जाते थे
जिधर कहे तू चल पडते थे
जिधर कहे तू मुड जाते थे

पर इक तेरे ना होने ने
कितने अनर्थ करवाये माँ
सब की दुनिया अलग हो गयी
हो गये सब पराये माँ

माँ तो सच मुच माँ होती है
माँ का कोई भी सानी नहीं
माँ जैसा हमदर्द ना कोई
माँ जैसा कोई दिलजानी नहीं

माँ की दुनिया माँ की दुनियां
जिसे देवी देवते तरसते हैं
माँ है वो प्रकाश कि जिस से
सूरज चाँद सितारे चमकते है

माँ की ममता रुख बोहड[बट] का
माँ की छाँव तो ठंडी छाँव है
माँ तो ममता का है मंदिर
माँ तो रब का दूज नाम है
माँ तो रब का दूजा नाम है1



14 April, 2009

गज़ल


मेहरबानियों का इज़हार ना करो
महफिल मे यूँ शर्मसार ना करो

दोस्त को कुछ भी कहो मगर
दोस्ती पर कभी वार ना करो

प्यार का मतलव नहीं जानते
तो किसी से इकरार ना करो

जो आजमाईश मे ना उतरे खरा
ऐसे दोस्त पर इतबार ना करो

जो आदमी को हैवान बना दें
खुद मे आदतें शुमार ना करो

इन्सान हो तो इन्सानियत निभाओ
इन्सानों से खाली संसार ना करो

कौन रहा है किसी का सदा यहां
जाने वाले का इन्तज़ार ना करो

मरना पडे वतन पर कभी तो
भूल कर भी इन्कार ना करो

पाप का फल वो देता है जरूर
फिर माफी की गुहार ना करो
गज़ल


मेहरबानियों का इज़हार ना करो
महफिल मे यूँ शर्मसार ना करो

दोस्त को कुछ भी कहो मगर
दोस्ती पर कभी वार ना करो

प्यार का मतलव नहीं जानते
तो किसी से इकरार ना करो

जो आजमाईश मे ना उतरे खरा
ऐसे दोस्त पर इतबार ना करो

जो आदमी को हैवान बना दें
खुद मे आदतें शुमार ना करो

इन्सान हो तो इन्सानियत निभाओ
इन्सानों से खाली संसार ना करो

कौन रहा है किसी का सदा यहां
जाने वाले का इन्तज़ार ना करो

मरना पडे वतन पर कभी तो
भूल कर भी इन्कार ना करो

पाप का फल वो देता है जरूर
फिर माफी की गुहार ना करो


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